25 अप्रैल 2010

शंकराचार्य और कामकला

आदि शंकराचार्य जी जब पूरे देश में घूम घूमकर शास्त्रार्थ कर रहे थे और परम्परा के अनुसार अन्य विद्धानों को शास्त्र ज्ञान मुकाबले के लिये कहते और हार जाने पर हार जाने वाले को अपनी माला उतारकर उनके गले में डालनी होती थी ।
शंकराचार्य परकाय प्रवेश विद्या के निष्णात साधक थे । जब मंडन मिश्र और शंकराचार्य का शास्त्रार्थ हुआ तो ये तय हुआ कि इनमें से जो हारेगा वो दूसरे का शिष्य बन जायेगा ।
मण्डन मिश्र भारत के विख्यात विद्धान और ग्रहस्थ थे । उनकी पत्नी सरस्वती भी अत्यन्त विद्धान थी । शंकराचार्य संन्यासी थे और उन्होंने शास्त्रार्थ के माध्यम से भारत विजय करने के उद्देश्य से अनेक यात्रायें की थी ।
मगर वे सर्वश्रेष्ठ तभी माने जा सकते थे । जब वे महा विद्वान मण्डन मिश्र को पराजित करते । इन दोनों के शास्त्रार्थ का निर्णय कौन करता ? क्योंकि कोई सामान्य विद्वान तो इसका निर्णय नही कर सकता था ।
अतः शंकराचार्य के अनुरोध पर निर्णय के लिये मिश्र की पत्नी सरस्वती का ही चयन किया गया । यह शास्त्रार्थ 21 दिन चला और आखिरकार मण्डन मिश्र हार गये । यह देखकर सरस्वती ने निर्णय दिया कि मिश्र जी हार गये हैं अतः वे शंकराचार्य का शिष्यत्व स्वीकार करें और संन्यास दीक्षा लें । यह कहकर वह विद्वान पत्नी निर्णायक पद से नीचे उतरी और शंकराचार्य से कहा - मैं मण्डन मिश्र की अर्धांगिनी हूं । अतः अभी तक मिश्र जी की आधी ही पराजय हुयी है । जब आप मुझे भी पराजित कर देंगे तब मिश्र जी की पूरी पराजय मानी जायेगी ।
यह बात एकदम सही थी । अबकी बार मण्डन मिश्र निर्णायक बने । सरस्वती तथा शंकराचार्य में शास्त्रार्थ होने लगा ।
21 वें दिन जब सरस्वती को लगा कि अब उसकी पराजय होने ही वाली है ।
तब उसने शंकराचार्य से कहा - अब मैं आपसे अंतिम प्रश्न पूछती हूं और इस प्रश्न का भी उत्तर यदि आपने दे दिया तो हम अपने आपको पराजित मान लेंगे और आपका शिष्यत्व स्वीकार कर लेंगे । शंकराचार्य के हाँ कर देने पर सरस्वती ने कहा - सम्भोग क्या है । यह कैसे किया जाता है और इससे संतान का निर्माण किस प्रकार हो जाता है ?
यह सुनते ही शंकराचार्य प्रश्न का मतलब और उसकी गहराई समझ गये ।
यदि वे इसी हालत में और इसी शरीर से सरस्वती के प्रश्न का उत्तर देते तो उनका संन्यास धर्म खन्डित होता है । क्योंकि संन्यासी को बाल बृह्मचारी को संभोग का ज्ञान होना असम्भव ही है । अतः संन्यास धर्म की रक्षा करने के लिये उत्तर देना सम्भव ही नहीं था और बिना उत्तर दिये हार तय थी । लिहाजा दोनों ही तरफ़ से नुकसान था ।
कुछ देर विचार करते हुये शंकराचार्य ने कहा - क्या इस प्रश्न का उत्तर अध्ययन और सुने  गये विवरण के आधार पर दे सकता हूँ या इसका उत्तर तभी प्रमाणिक माना जायेगा । जबकि उत्तर देने वाला इस प्रक्रिया से व्यवहारिक रूप से गुजर चुका हो ।
तब सरस्वती ने उत्तर दिया  कि - व्यवहारिक ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान होता है । यदि आपने इसका व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त किया है । अर्थात किसी स्त्री के साथ यौन क्रिया आदि कामभोग किया है तो आप निसंदेह उत्तर दे सकते हैं ।
शंकराचार्य जन्म से ही संन्यासी थे अतः उनके जीवन में कामकला का व्यावहारिक ज्ञान धर्म संन्यास धर्म के सर्वथा विपरीत था ।
अतः उन्होंने उस वक्त पराजय स्वीकार करते हुये कहा कि - मैं इसका उत्तर 6 महीने बाद दूंगा । तब शंकराचार्य ने मंडन मिश्र की पत्नी से छ्ह माह का समय लिया और अपने शिष्यों के पास पहुँचकर कहा कि - मैं 6 महीने के लिये दूसरे शरीर में प्रवेश कर रहा हूँ तब तक मेरे शरीर की देखभाल करना । यह कहकर उन्होनें अपने सूक्ष्म शरीर को उसी समय मृत्यु को प्राप्त हुये 1 राजा के शरीर में डाल दिया ।
मृतक राजा अनायास उठकर बैठ गया ।
राजा के अचानक जीवित हो उठने पर सब बहुत खुश हुये । लेकिन राजा की 1 रानी जो अलौकिक ज्ञान के विषय में जानती थी । उसे मरकर जीवित हुये राजा पर शक होने लगा । 
क्योंकि पुनर्जीवित होने के बाद राजा केवल कामवासना में ही रुचि लेता था और तरह तरह के प्रयोग सम्भोग के दौरान करता था । रानी को इस पर कोई आपत्ति न थी पर जाने कैसे वह भांप गई कि राजा के शरीर में जो दूसरा है । वो अपना काम समाप्त करके चला जायेगा ।
तब इस हेतु उसने अपने विश्वस्त सेवकों को आदेश दिया - जाओ, आसपास गुफ़ा आदि में देखो । कोई लाश ऐसी है जो संभालकर रखी गयी हो या जिसकी कोई सुरक्षा कर रहा हो । ऐसा शरीर मिलते ही नष्ट कर देना ।
उधर राजा के शरीर में शंकराचार्य ने जैसे ही ध्यान लगाया । उन्हें खतरे का आभास हो गया और वो उनके पहुँचने से पहले ही राजा के शरीर से निकलकर अपने शरीर में प्रविष्ट हो गये ।
इस तरह शंकराचार्य ने कामकला का ज्ञान प्राप्त किया । इस प्रकार सम्भोग का व्यवहारिक ज्ञान लेकर शंकराचार्य पुनः अपने शरीर में आ गये । इस तरह से जिस शरीर से उन्होंने संन्यास धर्म स्वीकार किया था उसको भी खन्डित नहीं होने दिया । 

इसके बाद पुनः मन्डन मिश्र की पत्नी सरस्वती को उसके संभोग विषयक प्रश्न का व्यवहारिक ज्ञान से उत्तर देकर उन पर विजय प्राप्त की और उन दोनों पति पत्नी को अपनी शिष्यता प्रदान की और अपने आपको भारत का शास्त्रार्थ विजेता सिद्ध किया ।

20 अप्रैल 2010

जो भविष्य के सपनों में जो जीता हैं



पहले प्रेम और फिर संग के कारण प्रेमी विवाह कर लेते हैं । और फिर श्रंगार की तरह बस्त्रो को, मंगल सूत्र को, और बिंदी इत्यादि को पहनते हैं सिर्फ प्रेम बस । संन्यास तो परम प्रेम में जीना है । अपने प्रियतम के प्रति । फिर ये माला, ये रोब ये माँ या स्वामी के साथ नया नाम हमें हर पल प्रेम से और प्रेम की ओर, ध्यान से और ध्यान की ओर प्रेरित कर उर्जा देता रहता है । और कभी कभी किसी अन्य मित्र की प्यास को भी जगा देता है । और ये साहस दीवानों में ही पाया जाता है । पर ओशो इतने अदभुत है कि उन्होंने 1 साथ नदी के दोनों किनारों को संभाला है । ठीक इसके विपरीत छोर को भी कि किसी चीज़ की कोई जरूरत नहीं । न माला की । न रोब की । न संन्यास की । जब तक मन है । हम इसी तरह चालाकी से उनके वक्तव्यों का उपयोग करते रहेंगे । अपनी सुविधा को देखते हुए हम चुनाव करते हैं । और आश्चर्य यह है कि भगवान श्री ने सभी के लिये अपने द्वार खोल रखे हैं ।
असली बात भीतर प्रवेश करने की है । पर मुझे माला से रोब से बहुत प्यार है । ध्यान है तो सब कुछ । ध्यान नहीं तो कुछ भी नहीं - ओशो ।
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आदमी सदा यही सोचता हैं कि मुझे यही रहना । नही ये याद रखना ही होगा । अंत जरुर है । अपने घर की तलाश करनी होगी । प्रेम की । परमात्मा की । जो भविष्य के सपनों में जो जीता हैं । वो तो बुद्धू है । जो 1 इंच के लिए मर मिटते हैं । कभी विचार में जीते हैं । कभी अतीत से । कभी भविष्य पर जीते हो । वर्तमान में विचार नही होता है । तो घर भी तुम अपना मान लेते हो । यह मन की बाते है । वर्तमान भी मन में नही रहता है । कल और काल । काल मृत्यु है । कल भी भविष्य । ये कभी भी आ सकता है । समय भी मौत है ।
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माँ से अगर बच्चे को प्रेम की सीख ना मिल पायी - बेशर्त प्रेम की । तो फिर वो कहाँ से सीखेगा ? पहली पाठशाला ही चूक गयी । कुंआ पहले झरने पे ही जहरीला हो गया - ओशो ।
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जब तक तुम मृत्यु को जाने नहीं । तभी तक तुम्हें डर है । जीवन भी मृत्यु के बाद में शुरू होता । और मृत्यु है । यह कांटा जब चुभ जाए । तो संसार भी निरथर्क हो जाता है । शास्त्र भी फ़िर कुछ काम नही है । मृत्यु में ही मंगल होता है । जीवन बनाने में पूरा जीवन चला गया । और मृत्यु को जान लेना जीवन भी हंसकर पार हो सकते हैं ।
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जो दूसरे को जानने की चेष्टा करेगा । दूसरे से परिचित होना चाहेगा । पुरुष स्त्री से परिचित होना चाहता है । स्त्री पुरुष से परिचित होना चाहती है । हम मित्र बनाना चाहते हैं । हम परिवार बनाना चाहते हैं । हम चाहते हैं । अकेले न हों । अकेले होने में कितना भय लगता है । कैसी कठिन हो जाती हैं वे घड़ियां । जब हम अकेले होते हैं । कैसी कठिन और दूभर । झेलना मुश्किल । क्षण क्षण ऐसे कटता है । जैसे वर्ष कटते हों । समय बड़ा लंबा हो जाता है । संताप बहुत सघन हो जाता है । समय बहुत लंबा हो जाता है । तो हम दूसरे से परिचय बनाना चाहते हैं । ताकि यह अकेलापन मिटे । हम दूसरे से परिवार बनाना चाहते हैं । ताकि यह अजनबीपन मिटे । किसी तरह टूटे यह अजनबीपन । लगे कि यह हमारा घर है ! सांसारिक व्यक्ति मैं उसी को कहता हूं । जो इस संसार में अपना घर बना रहा है । हमारा शब्द बड़ा प्यारा है । हम सांसारिक को " गृहस्थ " कहते हैं । लेकिन तुमने उसका ऊपरी अर्थ ही सुना है । तुमने इतना ही जाना है कि जो घर में रहता है । वही संसारी है । नहीं । घर में तो संन्यासी भी रहते हैं । छप्पर तो उन्हें भी चाहिए पड़ेगा । उस घर को चाहे आश्रम कहो । चाहे उस घर को मंदिर कहो । चाहे स्थान कहो । मस्जिद कहो । इससे कुछ फर्क पड़ता नहीं । घर तो उन्हें भी चाहिए होगा । नहीं । घर का भेद नहीं है । भेद कही गहरे में होगा ।
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आत्मा को कमजोर करता है भय - ओशो । शरीर के बिना कुछ आनंद लिए जा सकते हैं । जैसे समझें । 1 विचारक है । तो विचारक का जो आनंद है । वह शरीर के बिना भी उपलब्ध हो जाता है । क्योंकि विचार का शरीर से कोई संबंध नहीं है । तो अगर 1 विचारक की आत्मा भटक जाए । शरीर न मिले । तो उस आत्मा को शरीर लेने की कोई तीव्रता नहीं होती । क्योंकि विचार का आंनद तब भी लिया जा सकता है । लेकिन समझो कि 1 भोजन करने में रस लेने वाला आदमी है । वह शरीर के बिना भोजन का रस नहीं ले सकता है । उसके प्राण छटपटाने लगते हैं कि वह कैसे शरीर में प्रवेश कर जाए । और जब उसके योग्य गर्भ नही मिलता है । तब वह कमजोर आत्मा - कमजोर आत्मा से मतलब है ऐसी आत्मा । जो अपने शरीर का मालिक नहीं है । उस शरीर में वह प्रवेश कर सकता है । किसी कमजोर आत्मा की भय की स्थिति में । और ध्यान रहे - भय का 1 बहुत गहरा अर्थ है । भय का अर्थ है - जो सिकोड़ दे । जब आप भयभीत होते हैं । तो आप सिकुड़ जाते हैं । जब आप प्रफुल्लित होते हैं । तो आप फैल जाते हैं । जब कोई व्यक्ति भयभीत होता है । तो उसकी आत्मा सिकुड़ जाती है । और उसके शरीर में बहुत जगह छूट जाती है । जहां कोई दूसरी आत्मा प्रवेश कर सकती है । 1 नहीं । बहुत आत्माएं भी एकदम से प्रवेश कर सकती हैं । इसलिए भय की स्थिति में कोई आत्मा किसी शरीर में जाती है । और
ऐसा करने का कुल कारण इतना होता है कि उसके जो रस हैं । वह शरीर से बंधे हैं । इसलिए वह दूसरे के शरीर में प्रवेश करके रस लेने की कोशिश करती है । इसकी पूरी संभावना है । इसके पूरे तथ्य हैं । इसकी पूरी वास्तविकता है । इसका यह मतलब हुआ कि 1 तो भयभीत व्यक्ति हमेशा खतरे में है । जो भयभीत है । उसे खतरा हो सकता है । क्योंकि वह सिकुड़ी हुई हालत में होता है । वह अपने मकान में । अपने घर के 1 कमरे में रहता है । बाकी कमरे उसके खाली पड़े रहते हैं । बाकी कमरों में दूसरे लोग मेहमान बन सकते हैं । कभी कभी श्रेष्ठ आत्माएं भी शरीर में प्रवेश करती हैं - कभी कभी । लेकिन उनका प्रवेश दूसरे कारणों से होता है । कुछ कृत्य हैं - करूणा के । जो शरीर के बिना नहीं किये जा सकते । जैसे समझें । 1 घर में आग लगी है । और कोई उस घर को आग से बचाने नहीं जा रहा है । भीड़ बाहर
घिरी खड़ी है । लेकिन किसी की हिम्मत नहीं होती है कि आग में बढ़ जाए । और तब अचानक 1 आदमी बढ़ जाता है । और वह आदमी बाद में बताता है कि मुझे समझ में नहीं आया कि मैं किस ताकत के प्रभाव में बढ़ गया । मेरी तो हिम्मत न थी । और वह बढ़ जाता है । और आग बुझाने लगता है । और आग बुझा लेता है । और किसी को बचाकर बाहर निकल आता है । वह आदमी खुद कहता है कि ऐसा लगता है कि मेरे हाथ की बात नहीं है यह । किसी और ने मुझसे करवा लिया है । ऐसी किसी घड़ी में जहां कि किसी शुभ कार्य के लिए आदमी हिम्मत नहीं जुटा पाता हो । कोई श्रेष्ठ आत्मा भी प्रवेश कर सकती है । लेकिन ये घटनाएं कम होती हैं ।

15 अप्रैल 2010

रामायण में नाम की महिमा जो वास्तव में गुप्त है ??

रामचरित मानस प्रायः बहुत लोग पढते हैं और इसके २४ घन्टे के अखन्ड पाठ का काफ़ी प्रचलन है . मैं जब तक सतगुरु की शरण में नहीं पहुँचा था . मैं भी इसके रहस्यों से अनभिग्य था . महाराज जी से ही मुझे मालूम हुआ कि रामायण में दशरथ नन्दन राम की कथा के अतिरिक्त अनेकानेक रहस्य और भी हैं जितने कि वास्तव में गीता में भी नहीं हैं .
ढाई अक्षर का महामन्त्र जिसे कि संत गुप्त होने की वजह से प्रकट रूप में नाम कहते हैं . इस नाम की रामायण में अपार महिमा हैं . वास्तव में आत्मा की मुक्ति हेतु इसके अतिरिक्त और कोई उपाय है ही नहीं . ये नाम पहले तो गुप्त है . फ़िर भी यदि कहीं से किसी को पता चल भी जाय तो इस नाम को बिना गुरु के जपना बेहद नुकसानदायक हो सकता है .और यदि ये नाम आपको मिल चुका है फ़िर भी आपका आत्मिक स्तर पर कोई उत्थान नहीं हुआ हैं तो नाम को देने वाला गुरु पहुँचा हुआ नहीं है . ये चर्चा फ़िर कभी फ़िलहाल आप नाम की महिमा निम्नलिखित दोहो में देखिये और इस सम्बन्ध में कुछ कठिनाई या प्रश्न आपके मन में हो तो आप मुझसे सहायता ले सकते हैं (रामायण में नाम की महिमा जो वास्तव में गुप्त है और ढाई अक्षर का महामन्त्र है और समस्त महाशक्तियां जिसके अधीन हैं )
सबहिं सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा
(सबके लिये हैं चाहे वो किसी जाति , देश या धर्म का हो . समस्त कलेश दूर करने वाला )
बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी॥
( वाल्मीक नारद ने जपा और अपनी होनी स्वयं बतायी )
महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासी मुकुति हेतु उपदेसू
( शंकर जी स्वयं जपते हैं और काशी में मरने वाले के कान में बताते हैं )
महिमा जासु जान गनराउ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ
( गणेश जपते हैं नाम के प्रभाव से प्रथम पूजा होती है )
जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू
( वाल्मीक ने जपा डकैत से महर्षि हुये )
सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेईं पिय संग भवानी
( शंकर भवानी सहित जपते हैं )
नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को
( शंकर नाम का प्रभाव जानकर विष पी गये )
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू॥
समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी॥
नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी
देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना
नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी॥
( नाम रूप की कहानी अकथनीय है इसको अनुभवी ही ठीक जान सकता है )
नाम जीह जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी॥
साधक नाम जपहिं लय लाए। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाए
जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी
( भारी संकटो को खत्म कर देता है )
चहू चतुर कहु नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा
चहु जुग चहु श्रुति नाम प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ
सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन।
नाम सुप्रेम पियूष हद तिन्हहु किए मन मीन
मोरे मत बड़ नामु दुहू ते। किए जेहिं जुग निज बस निज बूते॥
उभय अगम जुग सुगम नाम ते। कहेउ नामु बड़ ब्रह्म राम ते॥
नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा॥
राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥
( राम ने अहिल्या तारी नाम ने अनेकों तारे )
सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा॥
नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे॥
नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं
ब्रह्म राम ते नामु बड़ बर दायक बर दानि।
रामचरित सत कोटि महं लिय महेस जिय जानि
नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी॥
सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी
नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू॥
नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू
ध्रुव सगलानि जपेउ हरि नाऊं। पायउ अचल अनूपम ठाऊ॥
सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू
अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ॥
कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई
चहु जुग तीनि काल तिहु लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका॥
नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला॥
नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥
भाय कुभाय अनख आलसहू। नाम जपत मंगल दिसि दसहू॥
जपत उमा संग संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी॥
बिबसहु जासु नाम नर कहहीं। जनम अनेक रचित अघ दहहीं॥
मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब।
महामत्त गजराज कहु बस कर अंकुस खर्ब॥
जासु नाम सुमरत एक बारा । उतरहिं नर भवसिंधु अपारा।।
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।
उमा कहउं मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना।।
जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अविनासी।।
पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं। अति अपार भवसागर तरहीं।।
औरउ एक गुपुत मत सबहि कहंउ कर जोरि।
संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि
निज अनुभव अब कहउ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहि कलेसा।।

10 अप्रैल 2010

जिसे पाने के लिए सारा संसार दौड़ रहा है

तुम परमात्मा का आश्रय किसलिए खोजते हो । कभी तुमने ख्याल किया ? कभी विश्लेषण किया ? परमात्मा का भी आसरा तुम किन्हीं वासनाओं के लिए खोजते हो । कुछ अधूरे रह गये हैं - स्वप्न । तुमसे तो किये पूरे नहीं होते । शायद परमात्मा के सहारे पूरे हो जायें । तुम तो हार गये । तो परमात्मा के कंधे पर बन्दूक रखकर चलाने की योजना बनाते हो । तुम थक गये । और गिरने लगे । अब तुम कहते हो - प्रभु ! अब तू सम्हाल । असहाय का सहारा है तू । दीन का दयाल है तू । पतित पावन है तू । हम तो गिरे । अब तू सम्हाल । लेकिन अभी सम्हलने की आकांक्षा बनी है । इसे अगर गौर से देखोगे । तो इसका अर्थ हुआ । तुम परमात्मा की भी सेवा लेने के लिये तत्पर हो अब । यह कोई प्रार्थना न हुई । यह परमात्मा के शोषण का नया आयोजन हुआ । वासना तुम्हारी है । वासना की तर्पित की आकांक्षा तुम्हारी है । अब तूम परमात्मा का भी सेवक की तरह उपयोग कर लेना चाहते हो । अब तुम चाहते हो । तू भी जुट जा मेरे इस रथ में । मेरे खिंचे नहीं खींचता । अब तू भी जुट जा । अब तू ही जुटे । तो ही खींचेगा । 
हालांकि तुम कहते बड़े अच्छे शब्दों में हो । लफ्फाजी सुन्दर है । तुम्हारी प्रार्थनाएं । तुम्हारी स्तुतियां । अगर गौर से खोजी जायें । तो तुम्हारी वासनाओ के नये नये आडंबर हैं । मगर तुम मौजूद हो । तुम्हारी स्तुति में तुम मौजूद हो । और तुम्हारी स्तुति परमात्मा की स्तुति नहीं । परमात्मा की खुशामद है । ताकि किसी वासना में तुम उसे संलग्न कर लो । ताकि उसके सहारे कुछ पूरा हो जाये । जो अकेले अकेले नहीं हो सका । ज्ञानी वही है । जिसने जागकर देखा कि पाने को यहाँ कुछ भी नहीं है । जिसे हम पाने चले हैं । वह पाया हुआ है । फिर आश्रय की भी क्या खोज ? फिर आदमी निराश्रय निरालंब होने को तत्पर हो जाता है । उस निरालंब दशा का नाम ही सन्यास है । अष्टावक्र महागीता
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प्रेम एक रासायनिक घटना है । यदि किसी का ह्रदय भी तुम्हारी ओर प्रवाहित हो रहा है । तो ह्रदय के द्वारा परमात्मा ही तुम तक आ पहुंचा है । किसी ने प्रेम भरी चितवन से तुम्हे निहारा । उस क्षण परमात्मा ने ही तुम्हारी ओर अपनी दृष्टि उठाई है । जरा उन प्रेम भरी आंखों की झील में देखो । वहाँ प्रेम ही प्रेम छलक रहा है । और तुम वहाँ हर धडकन में परमात्मा को धडकता पाओगे । क्योंकि जो हमेशा प्रेम करता है । वह परमात्मा ही तो है । प्रेम करना । परमात्मा ही बन जाना है । प्रेम घटने की अनुमति देना ही परमात्मा बन जाना है - ओशो ।
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आदमी सुखी हो सकता है । अगर वह प्रतिपल, जो उसे मिल रहा है । उसे पूरे अनुग्रह से और पूरे आनंद से आलिंगन कर ले । सांझ फूल मुरझाएगा । अभी तो फूल जिंदा है । सांझ की चिंता अभी से क्या ? जब तक फूल जिंदा है । तब तक उसके सौंन्दर्य को जीया जा सकता है । और जिस व्यक्ति ने जिंदा फूल के सौन्दर्य को जी लिया । वह जब फूल मुरझाता है । और गिरता है । तब वह दिन भर के सौन्दर्य से इतना भर जाता है कि फूल की संध्या और गिरती हुई पंखुड़ियां भी फिर उसे सुंदर मालूम पड़ती हैं । आंख में सौन्दर्य भर जाए । तो पंखुड़ियों का गिरना पंखुड़ियों के खिलने से कम सुंदर नहीं है । और आंख में सौंन्दर्य भर जाए । तो बचपन से ज्यादा सौन्दर्य बुढ़ापे का है । लेकिन जीवन भर दुख से गुजरता हो । तो सांझ भी कुरूप हो जाती है । सांझ कुरूप हो ही जाएगी । वह जिंदगी भर का जोड़ है ।
मैं समझ पाता हूं कि अगर एक नया मनुष्य पैदा करना है । जो कि नये समाज के लिए जरूरी है । तो हमें क्षण में सुख लेने की क्षमता और क्षण में सुख लेने का आदर और अनुग्रह और ग्रॅटीट्यूड पैदा करना पड़ेगा । हमें यह कहना बंद कर देना पड़ेगा कि सांझ फूल मुरझा जाएगा । सांझ तो सब मुरझा जाएंगे । सांझ तो आएगी । लेकिन सांझ का अपना सौंन्दर्य है । सुबह का अपना सौन्दर्य है । और सुबह के सौन्दर्य को सांझ के सौन्दर्य से तुलना करने की भी कोई जरूरत नहीं है । जिंदगी का अपना सौन्दर्य है । मृत्यु का अपना सौन्दर्य है । दीये के जलने का अपना सौन्दर्य है । दीये के बुझ जाने का अपना सौन्दर्य है । चांद की रात ही सुंदर नहीं होती । अंधेरी अमावस की रात का भी अपना सौम्दर्य है । और जो देखने में समर्थ हो जाता है । वह सब चीजों से सौन्दर्य और सब चीजों से सुख पाना शुरू कर देता है ।
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हंत का एक अर्थ और भी है । जो बड़ा कीमती है । हम तो इसका एक ही तरह से उपयोग करते हैं साधारण भाषा में । जब कोई आदमी अपने को मार लेता है । तो हम कहते हैं - आत्महंता । हंत का अर्थ होता है । जिसने अपने को मिटा लिया । जिसने अपने को समाप्त कर दिया । जिसके भीतर " मैं " न रहा । जिसके भीतर अहंकार न रहा । जिसने अपने को बिलकुल समाप्त कर दिया । जिसने अपनी कोई रूप रेखा न बचायी । नाम पता न छोड़ा । जो शून्यवत हुआ । जो महा शून्य हुआ । निर्वाण को उपलब्ध हुआ ।
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कुछ है तुम्हारे भीतर । जिसका तुम्हें भी पता नहीं । तुम उसे भूल रहे हो । तुम अनजान बने घूम रहे हो । बस कुछ करने की जरूरत नहीं है । बस उसे फलने दो । उसे उगने दो । एक सूरज है वो । जो तुम्हारी उर्जा को चमका देगा । जिसके अनन्त आनन्द का बोध तुम्हें होगा ।
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तुम्हारा मिलन भगवान से कभी न हो सकेगा । तुम जब तक खोजते रहोगे । तब तक भटकते रहोगे । क्योंकि तुम जब तक खोजते रहोगे । तुम तुम ही बने रहोगे ।
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अहंकार ही कठोरता को पहचानता है । जहां अहंकार खो गया । वहां तो सिर्फ महा करुणा ही ज्ञात होती है । वहां तो गुरु गरदन पर तलवार भी रख दे । तो फूलों का हार ही रखा हुआ मालूम होता है । वहाँ तो गुरु मार भी डाले । तो भी शिष्य मरने को तत्पर होता है । क्योंकि गुरु के हाथ से मौत । इससे शुभ और क्या होगा ? इससे महाजीवन और क्या हो सकता है ? यह तो गुरु की महा अनुकंपा है कि वह गरदन को अलग कर दे । तो तुम पिंजरे से मुक्त हो जाओ । अगर मृत्यु भी दे गुरु । और अहंकार न हो । तो करुणा का दर्शन होगा । और अगर अहंकार हो । और गुरु महाजीवन भी देता हो । तो भी संदेह उठेंगे ।
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आश्चर्य प्रभु ! जनक कहने लगे अष्टावक्र से कि जिसे पाने के लिए सारा संसार दौड़ा जा रहा है । जन्मों जन्मों की यात्रा चल रही है । अनंत की खोज चल रही है । अनंत से चल रही है । उसे पाकर भी, उस सिंहासन पर विराजमान होकर भी योगी में हर्ष का भी पता नहीं होता । वह वहाँ भी साक्षी बना रहता है । उसका साक्षी भाव वहां भी नहीं खोता । जरा भी तरंग उठती नहीं । आकाश उसका कोरा का कोरा रहता है । न दुख के बादल । न सुख के बादल । बादल घिरते ही नहीं ।
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तुमने देखा । चूल्हा जलाते हो । धुआं उठता है । धुआं आकाश में फैलता है । लेकिन आकाश को गंदा नहीं कर पाता । न छूता । इतने बादल उठते हैं । सब धुआं हैं । फिर फिर खो जाते हैं । कितनी बार बादल उठे हैं । और कितनी बार खो गये हैं । आकाश तो जरा भी मलिन नहीं हुआ । न तो शुभ्र बादलों से स्वच्छ होता है । न काले बादलों से मलिन होता है ।
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अज्ञानी जगत को गंभीरता से लेता है । ज्ञानी हंसकर लेता । बस, उतनी मुस्कुराहट का फासला है । पत्नी मर जाती है । तो अज्ञानी भी उसे मरघट तक छोड़ आता है । लेकिन रोता, चीखता, चिल्लाता । ज्ञानी भी मरघट तक छोड़ आता । एक खेल पूरा हुआ । एक नाटक समाप्त हुआ । पर्दा गिरा । रोने, चीखने, चिल्लाने जैसा कुछ भी नहीं है । भीतर वह साक्षी ही बना रहता है । द्रष्टा भाव उसका क्षण भर को नहीं खोता । इतना ही भेद है ।
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पहला सूत्र । जनक ने कहा - हंत, भोग लीला के साथ खेलते हुए आत्म ज्ञानी धीर पुरुष की बराबरी संसार को सिर पर ढोने वाले मूढ़ पुरुषों के साथ कदापि नहीं हो सकती है । पहला शब्द है - हंत ! उसमें सारी श्रद्धा उंडेल दी । हंत बड़ा प्यारा शब्द है । जैनों में उसका पूरा रूप है - अरिहंत । बौद्धों में उसका रूप है - अर्हत। हिंदू संक्षिप्त " हंत । का उपयोग करते हैं । हंत का । अरिहंत का । अर्हत का अर्थ होता है - जिसने अपने शत्रुओं पर विजय पा ली । काम, क्रोध, लोभ, मोह, भोग, त्याग, इहलोक, परलोक । जिसने अपनी समस्त आकांक्षाओं पर विजय पा ली । जो निष्कांक्षा को उपलब्ध हुआ है । वही है - अरिहंत ।
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जनक कहते हैं - उस पद को जानने वाले का अंतःकरण ऐसे ही हो जाता है । जैसे - आकाश ।
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पत्नी की अंग्रेजी - घोंचू लाल अपनी पत्नी को अंग्रेजी का प्रशिक्षण दे रहे थे । दोपहर में उनकी पत्नी ने कहा - यह लो डिनर ।
घोंचू लाल - पागल, यह डिनर नहीं लंच है ।
पत्नी - पागल होगा तू । यह कल रात का बचा खाना है ।
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Universal Truth -  Kaamyabi TOILET  Ki smell ki tarah hoti hai .
Bardasht tabhi hoti hai, Jab apni hoti hai...
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सच्ची हंसदीक्षा वाले अपने पूर्व जन्म के संस्कार कर्म फ़ल और शिष्यता के कष्ट के अतिरिक्त हर प्रकार के दैहिक दैविक भौतिक तापों से परे हो जाते हैं । आम जीवात्मा वाले प्रभाव उन पर नहीं होते ।

ब्रह्माण्ड में एक कंपन वायव्रेशन हो रहा है ??

कम्पन ..वायव्रेशन को जानें .???
जो यह पढने सुनने या अनुभव में आने वाला सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है .वह दो ध्रुव वाला है . इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एक ऐसा स्पंदन हो रहा है यानी ब्रह्माण्ड में एक कंपन वायव्रेशन हो रहा है . यह स्पंदन आत्मा के कारण ही ब्रह्म के होने से उत्पन्न हुआ है . जो सारे जल थल आकाश वायु प्रथ्वी सूर्य चन्द्र तारे लोक लोकान्तर इस परमात्मा के कंपन से गति कर रहे हैं . जैसे हवा की गति के कारण जल में लहर पैदा हो जाती है . यही स्पंदन जीवात्मा के शरीर में स्वांस की क्रिया को सक्रिय किये हुये है . इस स्पंदन में ही अक्षर की उत्पत्ति का होना संभव है तथा शरीर में स्वांस के आने तथा जाने पर अक्षर प्रकट हो गयें हैं जिससे शरीर की सारी क्रियायें हो रही हैं . इस स्पंदन से ही वायु गति को धारण किये हुये है . स्पंदन में ही सुरति को प्रवेश किया जाय तो जिससे यह स्पंदन हो रहा है उसका कारण पारब्रह्म ही है . उसका साक्षात्कार हो जाता है .यही स्पंदन पारब्रह्म के साक्षात्कार करने का माध्यम रूप है . जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में वह कंपन करता है . यानी स्पंदनमय है . इसके भय से ही सूर्य तप रहा है . प्राण गति कर रहा है . जिससे देवता दैत्य पशु पक्षी तथा कीट सभी लोकों में कंपन हो रहा है .
जो जीव भाव भाव को छोङकर शुद्ध चेतन अवस्था को पा जाता है जो जाग्रत सुषुप्त स्वप्न इन तीनों अवस्थाओं के परे तुरीय अवस्था में स्थित रहता है तथा भय निद्रा मैथुन आहार आदि में लिप्त नहीं रहता है . एवं जो अपने स्वरूप को पहचान लेता है . वह सीधा ब्रह्मरन्ध्र मार्ग से होता हुआ दसवें द्वार से निकलकर ब्रह्मालोक में जाता है .तथा जाने के पहले संकल्प के आधार पर स्थित हुआ पुनः उसी शरीर में आ जाता है ऐसा पुरुष जीवन मुक्त होकर जनम मरण से मुक्त शरीर में ही हो जाता है .
विधाओं में परा विधा ही स्वरूप है जो मेरे में संगति करती है यह विधा सब विधाओ की माँ है क्योंकि यहाँ से ही तीनों प्रकार की वाणियाँ मध्यमा पश्यन्ति बैखरी प्रकट हुयी है . परा वाणी का एक सिरा शब्दों को प्रकट करने वाला एवं एक सिरा बिन्दु पर रखा हुआ है . जब साधक इस परा विधा के अभ्यास के द्वारा शब्द में लीन हो जाता है तब वह परमात्मा के शुद्ध स्वरूप का साक्षात्कार कर लेता है .
जब परमात्मा एक है तो उसका नाम भी एक होना चाहिये वास्तव में उस परमात्मा का नाम व स्वरूप एक ही है .जीव एक शरीर छोङने से पहले दूसरे शरीर की रूपरेखा में स्पर्श करता है . जब जीव देहाभिमान से रहित हो जाता है तब वह अपने अन्तर में पूरी तरह प्रवेश कर जाता है .
ओंकार से शरीर की रचना हुयी है ??
ऊँ - यह ऊँ पाँच मात्राओं वाला है जिसमें तीन वर्णात्मक तथा चौथी सत्य एवं पाँचवीं मात्रा ध्वनात्मक रूप में है . जैसे अ उ म (ँ ) (ं ) आदि पाँच मात्राओं से मिलकर ऊँ की रचना हुयी है . अ से ईश्वर भाव उ से जीव भाव म से प्रकृति भाव अर्धचन्द्र से सत्य भाव नित्यता को दर्शाने वाला बिन्दु रूप व्यापक सर्वत्र परब्रह्म का विभुवत स्वरूप है
साधक ऊँ को इस रूप में समझकर लम्बे स्वर से उच्चारण कर परमात्मा में निष्ठा रखता है तो मुझ परमात्मा को सर्वग्य को जान लेता है .
जव जीव अपनेपन के भाव को छोङकर शरीर से निकलने एवं प्रविष्ट होने की विधा में पारंगत हो जाता है तब उसे अलग होने में पल का समय नहीं लगता वह जनम मरण और मृत्यु को लाँघकर मुक्त रूप का साक्षात्कार कर लेता है उसकी इन्द्रियां अपने आप उससे संगति करती है . मुक्त पुरुष सम्पूर्ण ब्रह्माणड में अपनी अखण्ड शक्ति के साथ विचरने लगता है . जनम मरण से रहित मुक्त आत्माएं संसार में निवास करती हैं

जब जीव आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है ??

जीवात्मा का प्रमाण लिंग रूप में पाया गया है ??
जीवात्मा का प्रमाण लिंग रूप में पाया गया है . वह देखने में लिंग जैसा प्रतीत होता है . लिंग शरीर प्रकृति के साथ सम्बन्ध हो जाता है तो जनम मरण का चक्कर आरम्भ हो जाता है . इस जीवात्मा को अंगूठे के आकार वाला देखा गया है .जीवात्मा संकल्प के आधार पर आगे बङता है . योगी संकल्प से ही एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करता है .जब जीव आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है तब वह जीव भाव को त्यागकर अपने अविनाशी स्वरूप को प्राप्त हो जाता है . योग साधना रत साधक कुम्भक पूरक रेचक के अभ्यास के द्वारा ओंकार स्वरूप को पाता है . ओंकार को नाद में लय देखता है . ओंकार जब नाद में लय हो जाता है तब नाद प्राण की सूक्ष्मता का भाष करता हुआ बिन्दु रूप वाले एक रूप परमात्मा से मिले हुये बिन्दु में पहुँच जाता है ..बिन्दु के टूट जाने पर वह आत्मा में संगत होता हुआ जीव को अपने स्वरूप का दर्शन कराता है इसलिये उस तत्व को जानों जिससे प्राण नाद तथा अक्षर उत्पन्न हुआ है जिसे जानकर वह जीव ब्रह्म की संग्या वाला हो जाता है फ़िर वह अपनी इच्छा से आता जाता है .वह बन्धन मुक्त होकर आकाश की तरह सर्वत्र व्यापक रूप को धारण करता है .

तीन शरीर मुख्य है ??

जीव की संरचना इस प्रकार की है .??
आकृति - तीन शरीर मुख्य है .स्थूल शरीर - बाह्य शरीर , ये कृतिम है और खोल या आवरण मात्र है .सूक्ष्म शरीर - ये आता जाता है . और भोग और इच्छाओं या अन्य बहुत से प्रयोजनों के लिये आवरण धारण करता है .मत्यु के बाद यही जाता है . कारण शरीर - जिस कारण हेतु ये शरीर धारण हुआ है वो कारण बीज में निहित है .
* इसके अतिरिक्त तीन शरीर और है पर वे योगियों के होते हैं . जीव इन तीन श्रेणियों को पारकर ही उन्हें जान सकता है और वह योग अवस्था कहलाती है .
स्थूल शरीर पाँच तत्वों का बना है . प्रथ्वी , जल , वायु , अग्नि , आकाश
शरीर में प्रथ्वी का अंश - त्वचा , हड्डी , नाङी , बाल , माँस हैं
जल का अंश - रक्त , वीर्य , पसीना , मूत्र , लार हैं
अग्नि का अंश - भूख , प्यास , आलस , नींद ,तेज हैं
वायु का अंश - चलना , बोलना , दौङना , फ़ैलाना , सिकोङना हैं
आकाश का अंश - काम , क्रोध , लोभ , मोह , भय , हैं
इनकी सहायक प्रकृतियां भी हैं तथा इस सम्बन्ध में ग्यानियों में मतभेद भी हैं पर एक नजर देखने पर इन मुख्य प्रकृतियों में कोई दोष नजर नहीं आता है . नाभि में जो चक्र है उसमें शरीर की सारी नाङियाँ गुथी हुयीं है . उसमें संयम करने से शरीर के सारे व्यूह का ग्यान होता है .वक्षस्थल में कछुए की आकार की नाङी है . यहाँ साधक का चित्त और शरीर दोनों ही स्थिर हो जाते हैं .कण्ठ में संयम करने से अपने स्वरूप को जान लेता है तथा भूख प्यास से रहित हो जाता है .
जिह्वा के ऊपर जो कपाल में छिद्र गया है उसे ब्रह्माण्ड कहते हैं . उसमें संयम करने से साधक संसार सागर से उठकर स्वर्ग लोक तक विचरने वाले सिद्धों के दर्शन होते हैं क्योंकि ब्रह्माण्ड में वयान प्राण ( वायु ) विचरण करता है उससे सूक्ष्मता और हल्कापन आ जाता है . भगवान शंकर ने बताया कि जितनी योनियां एवं सूक्ष्म योनियां याने चौरासी लाख उतने ही आसन है . उनमें चौरासी श्रेष्ठ है . चौरासी में दस श्रेष्ठ हैं . दस में चार आसन मुख्य हैं .

इच्छानि स्रष्टि - संकल्प द्वारा स्रष्टि करना

दस मुद्राओं के बारे में जाने .??
परमात्मा ने जैसे ब्रह्माण्ड की रचना की . उसी नमूना में मनुष्य शरीर की रचना की .
इच्छानि स्रष्टि - संकल्प द्वारा स्रष्टि करना ,जिसे योगी आज भी कर लेते हैं .
सासिद्धक स्रष्टि - इच्छानुसार शरीर बना लेना , मारीच हिरन बना .
मुद्राएं -
परमात्म साक्षात्कार के लिये की गयी क्रिया अवस्था को मुद्रा कहतें हैं .
यह दस प्रकार की है .
1 - चाचरी - आँख बन्द कर अन्तर में नाभि से नासिका के अग्रभाग तक द्रण होकर देखना .
2 - खीचरी - जीभ को उलटकर ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचाकर स्थिर कर लें .
3 - भूचरी -परमात्मा का नाम ( हँसो ) अजपा जप को प्राण के मध्य ध्यान में रखकर मनन करना .
4 - अगोचरी - कानों को बन्द कर अन्दर की ध्वनि सुनना .
5 - उनमनी - द्रष्टि को भोंहों के मध्य टिकाना .
अन्य पाँच विशेष मुद्राएं है . उनका साक्षात्कार प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है .
1 - साम्भवी - जीवों में संकल्प से प्रवेश कर उनके अन्तकरण का अनुभव करना
2 - सनमुखी - संकल्प से ही कार्य होने लगे .
3 - सर्वसाक्षी - स्वयं को , तथा परमात्मा को सबमें देखना .
4 - पूर्णबोधिनी - जिसका विचार करता है उसकी पूर्ति तथा बोध पल भर में ही हो जाता है . एक ही जगह स्थित सम्पूर्ण जगत की बात जानना .
5 -उनमीलनी - अनहोने कार्य करने की सिद्धि .
.. भय उत्पन्न होने पर निसन्देह विनाश के गाल में पहुँच जाता है क्योंकि यह जीव के लक्षणों में संगति करता है . भय , निद्रा , मैथुन , आहार ,जब तक ये ह्रदय से बाहर नहीं होते तब तक वह परमात्मा की पूर्ण निष्ठा का दर्शन नहीं करता . हर जीव को मृत्यु का भय व्यापता है . इसी भय के कारण जीव मृत्यु को प्राप्त होता है . वरना तो जीव अविनाशी है .

परमात्मा का अनुभव । ध्यान । सुमरन । चिन्तन ।


अविनाशी अक्षर क्या है ?? वह शब्द ( जो वास्तव में ध्वनि रूप है । और अनादिकाल से निरन्तर हो रहा है । ) जो सम्पूर्ण बृह्माण्ड में स्पंदन करता है । और सारी सृष्टि में समाया हुआ है । वह अविनाशी अक्षर ही स्वांस की आने जाने की क्रिया को चलाता है । तथा प्राण का कारण रूप है । परमात्मा का अनुभव । ध्यान । सुमरन । चिन्तन । सुरति ( मन । बुद्धि । चित्त । अहम । ये अंतकरण के चार छिद्र होते हैं । इनको योग विधि द्वारा एक कर दिया जाता है । तब ये सुरति कहलाती है । )  द्वारा किया जाता है । जब सुरति अक्षर ( एक ध्वनि । जो अखन्ड रूप से अंतर आकाश में गूंज रही है । जिसकी वजह से ही प्रत्येक चीज का निरन्तर क्षरण और निर्माण होता है । जैसे किसी बालक का बढना और साथ ही साथ वृद्धावस्था की और जाना । अक्षर से ही होता है । संसार की धुनों में इसके समान वैसे कोई ध्वनि है तो नहीं । पर ये बहुत कुछ झींगुर की आवाज से मिलती जुलती होती है । )  में पूर्ण रूप से पहुँच जाती है । तब वह अक्षर से प्राण में । और प्राण से सूक्ष्म भूमा में पहुँच जाता है ।
भूमातत्व का उदाहरण - नींद में स्वप्न में आनन्द । इन्द्रियों का आत्मबोध ।
साधक इन्द्रियों को स्थिर कर प्राण में अक्षर को जानता है । अक्षर की संगत से वह बार बार अक्षर में ध्यान करता है । तब अक्षर के घर्षण से भूमानन्द का अनुभव होता है । वह भूमा आत्मा ही प्रथम पाद है ।
आकाश अणुओं से भरा पङा है । सुई की नोक के बराबर खाली स्थान नहीं है । उदाहरण - सूर्य के प्रकाश में दिखने वाले अणु परमाणु आदि । जिस प्रकार वाष्प से बिन्दु बनता है । बिन्दु से ध्वनात्मक शब्द उत्पन्न होता है । तथा ध्वनात्मक से " हँसो " वर्ण का रूप धारण कर लेता है । जब प्राण से प्राण टकराता है । तब एक झीना शब्द प्रकट कर लेता है । आकाश अक्षर में स्थित है । आकाश का सूक्ष्मतत्व । शब्द । शून्यता । चिन्ता । मोह । संदेह । ये सारे गुण आकाश के ही हैं  । जीव अपने को कर्ता मानता हुआ कार्य करता है । इसलिये उसे उसका भोग मिलता है  । आत्मसुख में बाधा डालने वाली ये विषय वासना ही है । जब अभ्यास से जीव बैराग्य को प्राप्त करता है । और प्राण में प्राण को होम करता है । तो  प्राण सूक्ष्म होने लगता है । जो कि अभी ( साधारण स्थिति में ) स्थूलता को प्राप्त है ।

जो यह ओंकार शब्द है .

आत्मा ज्योर्तिमय आनन्दमय है .
ओंकार को नेत पुकारा , यह सुन शब्द वेद से पारा .
अंडा सुन्न में सैर करायी , सो वो शब्द परखिया भाई
जो यह ओंकार शब्द है . वह वेद की वाणी से परे यानी उससे अलग है जिसमें प्रवेश होने से जो यह अंडाकार ब्रह्मांड है उसमें पहुँचकर परमात्मा का दर्शन कराने वाला हैं जिसे विदेह स्थित में जानो . आत्मा सब भूत तत्वों में निवास करती है . आत्मा ज्योर्तिमय आनन्दमय है . जब इन्द्रियां अपने स्वरूप में स्थित हो जाती है तथा मन बुद्धि के निर्णय से शान्त हो जाता है और अहंग चित्त में स्थित होकर देखता है तब वह पराविधा को ही देखता है .जो वाणियों का माध्यम परावाणी है . वह आत्मा से ही उत्पन्न होती है जिस प्रकार आकाश का गुण वायु है.आत्मा का गुण पराविधा है . बुद्धि आदि इन्द्रियों से सम्बद्ध होने के कारण आत्मा को साक्षी कहा जाता है . जब बुद्धि से अविवेक दूर हो जाता है तब आत्मा का साक्षीपन मोक्ष में बाधा नहीं डालता है .
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड शून्य है क्योंकि ब्रह्माण्ड की आकृति शून्य जैसी गोल है . इससे सारी ही आकृतियां गोल है .सूर्य , चन्द्र , तारे प्रथ्वी सभी शून्य जैसी आकृति वाले है .सभी अण्ड गोल वृक्ष पहाङ शून्य के समान प्रतीत होते हैं . अतः अण्ड पिण्ड ब्रह्माण्ड सब शून्य है . मन जब विचारों से शून्य हो जाता है तब समाधि में समा जाता है .

परमात्मा का साक्षात्कार

आत्मा के बारे में जानें ?  आत्मा आकाश की तरह सूक्ष्म तथा सर्वत्र समाया हुआ है । आत्मा के स्वरूप का ज्ञान होने पर जीव अपने जीव होने के भाव को छोङ देता है । इसे ( आत्मा ) जानकर जीव का स्वभाव आत्मा के समान न जनमने वाला न मरने वाला अविनाशी भाव हो जाता है । अविवेक अनित्य है । यानि ज्ञान होने पर नष्ट हो जाता है । ज्ञान विज्ञान आत्मा के ही अधीन है । जिस प्रकार सर्व व्यापक आकाश में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड संगत पाता है । उसी प्रकार आत्मा भी आकाश की तरह इससे भी अति सूक्ष्म है । बिना आत्मा की संगति के शरीर चेष्टा नहीं पाता । आत्मा अपनी इच्छा से ही सिमट जाती है । शरीर का अस्तित्व नहीं रहता । शरीर के द्वारा ही वह ज्ञान करता है । ध्यानावस्था में सुरति के द्वारा स्वर में शब्द को पूरक कुम्भक रेचक स्थिति को पा जाता है । फ़िर कुछ देर का अभ्यास वर्ण वाले शब्द को पार करके बिन्दु रूप में पहुँच जाता है । बिन्दु रूप में पहुँच कर वह बिन्दु परमात्मा में संगत पाता है । इसलिये बिन्दु के द्वारा ब्रह्म में मिलकर उस परमात्मा का साक्षात्कार करता है । साधक इन्द्रियों को एकाग्र कर लेता है । तथा सुषमणा में प्रवेश करता है । तब सूक्ष्म शरीर सुषमणा से ब्रह्मरन्ध्र में होता हुआ शरीर में ऊपर दसवें द्वार होकर आत्मा में लीन हो जाता है । इन्द्रियों के सब दरवाजे बन्द करें । तब तन मन अन्दर ही जम जायेगा । तथा दबाया हुआ मन ह्रदय में ही पङा रहेगा । तब प्राण के द्वारा अक्षर का ध्यान करना चाहिये । जो प्राण तथा प्राण के परे भी है । फ़िर ब्रह्मरन्ध्र से होता हुआ ध्यान को ऊपर की ओर ले जाकर परमात्मा में स्थिर कर दें । जो परमात्मा सर्वत्र सर्व शक्तिमान प्रकाश स्वरूप आनन्द का भंडार है । ऐसी स्थिति में योगी सुषमना से शब्द में मिलकर शरीर से निकल जाता है । तथा परमात्मा का साक्षात्कार करता है ।
साधक जब ध्यानावस्था में स्थिति होकर अन्तःकरण को प्राण के समान सूक्ष्म तथा स्वच्छ बना लेता है । तब वह वाणी से परावाणी का प्रत्यक्ष अनुभव कर उसमें लीन हो जाता है । उस परा में लीन होने पर वह एक ऐसी शक्ति का अनुभव करता है । जिसकी शक्ति से सारे संसार के जीव अपनी क्रिया कर रहे हैं । तथा प्रकृति भी क्रीङा करती हुयी इसी जगत  में दिखायी देती है । यह सारे काम परमात्मा की सत्ता में ही क्रियावान है । साधक सुरति से परा शब्द का बोध करता है । तो वह परा में प्रवेश होकर आत्मा का साक्षात्कार करता है ।.

06 अप्रैल 2010

समझ लेना तुम । तुम्हारी ही मृत्यु के कारण बन रहे हो

इस संसार में जितना सेक्स को बुरा कहा गया । उतना ही आंतक, अराजकता, अनैतिक का जन्म हुआ है । यह मेरा निजी भी अनुभव है कि जब भी बीज रोपते हैं । तो उस वक्त जो वर्तमान में जो स्थिति है । वो ही विचार पैदा होता है । उस बीज में वही संस्कार आ जाते हैं ।
जिसने भी लड़ते झगड़ते मारपीट कर या नशा करके जो भी भोग या सेक्स में उतरेगा । समझ लेना तुम । तुम्हारी ही मृत्यु के कारण बन रहे हो । जब बीज जो आचार विचार आपके द्वारा उसमें गये हैं । बस वो ही तुम ही हो । तेरे बिना मैं पैदा भी नही हो सकता है । और मैं ही तुम हो । तुम ही बेटा हो । तुम ही बाप हो । तो जो युवा है । वो जरुर जीवन को जानें ।  पर आने वाला ही तुम उसके साथ जीवन सुंदर बने । जीवन को जानो । और जीवन साथी को भी जानो । और मिटा दो । अपने अंहकार को । और प्रेम देना शुरू करो । लेना नही । हर छोटी सी बात को अपने अंदर नहीं रखना । हर शब्द को पकड़ना नहीं है । अपने आप नहीं सताना है । अपने लिए जिओ । अपने से मित्रता पैदा करो । तो पूरे घर और मोहल्ला और देश में भी प्रेम फ़ैलेगा ।
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हसीबा खेलीबा धरीबा ध्यानम - मूर्ख दूसरों पर हंसते हैं । बुद्धिमत्ता खुद पर - ओशो ।
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27 अक्टूबर 1986 सुमिला । आपके नाम के साथ सेक्स गुरु और अमीरों के गुरु आदि भ्रांति पूर्ण विशेषण क्यों जुड़े हुये हैं ? 
ओशो - हर्षिदा ! यह बहुत बड़ी अंतर्राष्ट्रीय साज़िश है । हिटलर का यह पुराना फार्मूला है कि झूठ को यदि बारबार दोहराया जाये । तो वह सच मालूम होने लगता है । अब मेरे प्रवचनों को लेकर अब तक 400 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । और उनमें से एक है - संभोग से समाधि । और उन पुस्तक में छपे मेरे पाँच प्रवचनों का सार यही है कि तुम सेक्स से कैसे मुक्त हो सकते हो ? उसका कैसे अतिक्रमण कर सकते हो ? वह किताब सेक्स के बारे में कुछ ऐसी जानकारी नहीं देती । जो सेक्सुअल हो । अश्लील हो । यदि ऐसा होता । तो उस किताब पर सरकार तुरन्त प्रतिबंध लगा देती । अब जिन धर्म गुरुओं की मैं आलोचना करता था । उन्होंने पुस्तक के नाम को मेरे विरुद्ध हथियार की तरह इस्तेमाल करते हुये मुझे " संभोग से समाधि वाला बाबा " कहकर प्रचारित करना शुरू कर दिया । अब उनके भी अनुयायी तो हैं ही । और वह अनुयायी बड़े बड़े राजनेता और पूंजीपति हैं । जो अखबारों के मालिक हैं । सारी दुनियां में उन्होंनें मुझे सेक्स गुरु के नाम से प्रचारित कर दिया । अब यही बात मेरे धनियों का गुरु होने के संबंध में भी है । मैंने बारबार कहा है कि - धन की व्यर्थता का बोध होने पर अंतर्यात्रा प्रारम्भ होती है । और जिनके पास धन है । केवल उन्हीं को धन की व्यर्थता दिखाई देती है । भूखे व्यक्ति को पहले परमात्मा नहीं । रोटी चाहिये । भूखे व्यक्ति को ध्यान सिखाने से लाभ क्या ? मैं तो चाहता हूँ । देश समृद्ध हो । संसार समृद्ध हो । गरीबी जड़ मूल से समाप्त हो । क्योंकि दुनिया में जितनी अधिक सम्रद्धि होगी । हम अध्यात्म की प्यास उतनी ही अधिक बढ़ा सकते हैं । अब यदि इसका यह अर्थ निकाला जाय कि मैं धनपतियों का गुरु हूँ । और उनके पास प्रचार के साधन हों । तो वह दुनिया भर में यह झूठ फैला देते हैं । और मैं अकेला आदमी हूँ । जो पूरी दुनिया से लड़ रहा हूँ । लेकिन झूठ के पास चाहे जितनी ताकत हो । पर सत्य के आगे झूठ नपुंसक है । झूठ के पैर नहीं होते । मैं इनका खंडन इसलिए नहीं करता । क्योंकि झूठ संतति नियमन के सिद्धांत को नहीं मानता । मेरे उर्जावान सत्य के साहसी युवक युवतियों और सृजनशील सम्रद्ध लोगों का जो प्रवाह आकर्षित हो रहा है । उसे देखकर ये लोग ईर्ष्या से भर गये हैं । और उनके पास उन्हें रोकने का कोई उपाय नहीं है । मैं मानव कल्याण के अन्य श्रेष्ठतम कार्यों में व्यस्त हूँ ।
मेरे प्रति प्रचारित असत्य । अपनी मौत आप मरेंगे ।
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मुझसे बारबार पूछा जाता रहा है कि - मैं लोगो को तभी संबुद्ध घोषित करता हूँ । जब वह अपना शरीर छोड़ देते हैं । यह केवल इसलिये है । जिससे कम्यून में शांति बनी रहे । यदि मैं किसी को संबुद्ध घोषित कर दूं । तो तुम उसे जीने नहीं दोगे । तुम यह सहन नहीं कर पाओगे कि यह व्यक्ति बुद्धत्व को उपलब्ध हो गया । तुम उसमें हज़ार कमियां खोज लोगे । तुम ईर्ष्या से भरकर उसकी निंदा करोगे । उसके जीवन के गड़े मुर्दे उखाड़कर तुम अपने आपको उससे श्रेष्ठ सिद्ध करने का जी तोड़ प्रयास करोगे । तुम कहोगे । वह तो अभी नया शिष्य है । मुझे तो संन्यास लिये उससे दस वर्ष अधिक हो गये । मैंने उससे अधिक ध्यान किया है । मैं उससे अधिक शिक्षित और समझदार हूँ । तुम ईर्ष्या से भरकर महत्वाकांक्षा की दौड़ में शामिल हो जाओगे । तुम अपनी अंतर्यात्रा की बात भूल ही जाओगे । मैंने रजनीशपुरम में प्रयोग के रूप में कुछ लोगो की बुद्धत्व को उपलब्ध होने की घोषणा की थी । उस सूची में मैंने जानबूझ कर ऐसे कई नाम सम्मलित कर दिये गये थे । जो स्वयं भी जानते थे कि बुद्धत्व घटना तो दूर वे अभी तक ध्यान की गहराई में भी नहीं उतरे हैं । उनका मन महत्वाकांक्षा से भरा हुआ है । वे सहज, सरल और निर्दोष नहीं थे । उनमें अधिकतर ऐसे लोग सम्मलित थे । जिनका नाम यदि सूची में सम्मलित न किया जाता । तो वे ईर्ष्या से भरकर कुछ भी कर सकते थे । ऐसे लोगों ने अपने सम्मान में स्वयं पैसे खर्च कर स्वागत समारोहों का आयोजन शुरू कर दिया । वे अकड़ कर चलने लगे । आज संन्यासी भी उनके चरण स्पर्श कर अपने को धन्य मानने लगे । पर जिन्हें बुद्धत्व सचमुच घटा था । वे लोग जैसे पहिले रहते थे । वैसे ही शांत निरासक्त और मौन रहे ।
उनमें से एक मैत्रय जी भी थे । जब लोग उनके चरण स्पर्श करने लगे । उन्होंने अपने पैर समेटते हुये कहा था - मुझे कुछ भी नहीं घटा । भगवान तो ऐसे मज़ाक करते ही रहते हैं । यह भी उनका एक मज़ाक है । मैं जैसा पहले था । वैसा अब भी हूँ । लोग हैरान रह गये यह सुनकर । जिनके नाम उस सूची में सम्मलित नहीं थे । और उन्हें यह भ्रम था कि उन्हें कुछ घटा है । उन लोंगो ने कई तरह से मुझे लिखकर या किसी और के द्वारा यह जताने की कोशिश की कि वे सम्बुद्ध हैं । और उनका नाम सूची में मैं शायद शामिल करने से भूल गया हूँ ।
किसी जीवित व्यक्ति को संबुद्ध घोषित करने से । यदि कोई उसके प्राण न भी ले । फिर भी उसके लिये कई परेशानियां खड़ी हो जायेंगी ।
अब यदि वह सिगरेट पी रहा है । या बियर की चुस्कियां लगा रहा है । तो लोग उसे टोकेंगें - यह कैसा बुद्ध पुरुष है ? उसे शर्म आयेगी । मेरे जर्मन संन्यासी तो बिना बियर के रह ही नहीं सकते । वह उसका प्रयोग पानी की तरह करते हैं । वह उनकी जीवन शैली का एक अंग बन गई है । उनके लिये तो बियर की ख़ास छूट देनी ही होगी । अब बुद्धत्व को उपलब्ध मेरे संन्यासी लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिये उनके अनुशासन से नहीं चलने वाले हैं । वे अपने छंद से जियेंगे । मैं नहीं चाहता कि तुम्हें शर्म का अनुभव करना पड़े । अच्छा है । तुम संबुद्ध होने की कोशिश कर रहे हो । राह में हर चीज़ का रस और मज़ा लो । जब तुम आराम से कब्र में लेटे होगे । मैं तुम्हें संबुद्ध घोषित कर दूंगा । फिर तुम्हें सिगरेट, बियर और प्रेमिकाओं के कारण न कोई परेशान कर सकता है । और न तुम्हें शर्म का अनुभव होगा । तुम कब्र में अधिक से अधिक करवटें ही तो बदल सकते हो ।

तू अनादि आदम अजाति है तेरी कोई जाति नहीं है .

कर्मकाण्ड में रिद्धी सिद्धी यन्त्र तन्त्र मन्त्र होते हैं .उपासना काण्ड में स्तुति प्रार्थना आदि जो जैसा उपासक है और
मानता है .योगकाण्ड में अनुलोम विलोम प्राणायाम यम नियम संयम आसन प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि , स्वांस ब्रह्माण्ड में चङाना आदि .
ग्यानकाण्ड में ब्रह्मसिद्धी .विग्यानकाण्ड में आत्मा .भक्तिकाण्ड में सेवापद .अंतकरण की मलीनता विषयासक्ति है , इसी को मल कहते हैं .बुद्धि में होने वाली चंचलता को विक्षेप कहते हैं .माया मोह का परदा चैतन्य पर पङा है इसी को आवरण कहते हैं .झांई-विशेष अग्यान दशा गाफ़िली में कल्पित परमात्मा से मिलने को ब्रह्मग्यानी विग्यान रूपदशा धारण कर लेते हैं इसी को झांई कहते हैं .
काल- कर्म उपासना योग अग्यानी जीवों का बन्धन हैं इसी को काल कहिये .संधि-जो जगत का कर्ता कल्पना से माना उसकी प्राप्ति के लिये ग्यानकाण्ड के परोक्ष व अपरोक्ष के कर्म की मानिन्दी को संधि कहिये .
वेद शास्त्र स्मृत और पुराना , पढ पढ सब पंडित हारा ..बिनु सतगुरु और बिना शबद सुर्त , कोई न उतरे पारा
चार अठारह नौ पढे, षट पढ खोया मूल ..सुरत शब्द चीन्हे बिना, ज्यों पंक्षी चंडूल
तुलसी या संसार में पाँच रतन है सार ..साधु संग सतगुरु सरन , दया दीन उपकार
सोना काई ना लगे , लोहा घुन नहीं खाय ..भला बुरा जो गुरु भगत कबहुँ न नरके जाय
कबीर गुरु की भगति बिनु नारि कूकरी होय ..गली गली भूँसति फ़िरे टूक न डारे कोय

ईश्वर, तुम्हारे स्वयं के भीतर ही है

संसार के 90%  मनुष्यों की दौड़ ईश्वर को पा लेना होती है । यह मनुष्य को जन्म से ही सिखाया जाता है कि मंदिर में भगवान है । उसको हाथ जोड़ो । उससे डरो । और तरह तरह के डर भर दिये जाते हैं । हम भी उनके बताये को मानने लगते हैं । और चल पड़ते हैं । और जहाँ जहाँ मंदिर मिलते हैं । वहाँ वहाँ चलते चलते हाथ जोड़कर या मुन्डी हिलाकर चल देते हैं । और समझ लेते हैं कि जिसको हमने हाथ जोड़े । या मुन्डी हिलाकर अभिवादन किया है । वह नाराज नही होंगे । और यदि नमन नहीं किया । तो वे नाराज हो जायेंगे । और जो जो भी हमे मिलता है । उसको भी बताने लगते हैं । फिर कुछ धार्मिक पुस्तकें बता दी जाती हैं कि इनको पढ़ें । इनको पढ़कर तुम ज्ञानी हो जाओगे । और फिर हम जिन्दगी भर उनसे जुझते रहते हैं । और स्वयं को ज्ञानी समझते रहते हैं । किन्तु हमने जितना भी जहाँ से भी पढा है । या सुना है । या बताये गये को माना है । सबका सब कचरा अपने अंदर भर लिया है । वह ज्ञान नहीं । अज्ञान ही इकट्ठा कर लिया है । और उसने हमारे भीतर अहंकार को जन्म दे दिया है । और उस ज्ञान के अहंकार ने हमे अंदर ही अंदर खोखला कर दिया है । और उस अज्ञान को हम और और ग्रहण करने में लगे रहते हैं । और जितने हमारे सानिध्य में आते हैं । उनको भी बताते रहते हैं । और दूसरी तरफ जब हमें कोई ज्ञानी सतगुरू मिल जाता है । तो वह सबसे पहले हमारा मंदिर जाना, पूजा करना, हमारा धार्मिक पुस्तकों को पढ़ना रोकता है । वह कहता है कि जो जो भी तुम धर्म के लिये या अध्यात्म के लिये अभी तक कर रहे थे । सब बंद कर दो । और स्वयं को जानना प्रारंभ कर दो । यह जान लो कि वास्तव में तुम हो क्या ? क्या तुम शरीर हो ? या कुछ और हो ? इसको जान लो । क्योंकि ईश्वर, तुम्हारे स्वयं के भीतर ही है । वह बाहर भी संपूर्ण ब्रह्माण्ड में है । किन्तु उसको जानना स्वयं के भीतर ही संभव है । क्योंकि अभी तक जो कर रहे थे । उनसे तुम्हारा काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार कम होने के स्थान पर और बढ़ता जाता है । जिसके कारण तुम शांत होने के स्थान पर और और अशांत व दुःखी होते जाते हो । और यदि तुम स्वयं के भीतर रूकने लगते हो । तो बाहर के सारे विचार रूपी वासना रूपी कचरा जब भीतर कम होता है । या भीतर जाना बंद होता है । तो तुम शांत होने लगते हो । और शांत होना ही सुखी होना है । धीरे धीरे निरंतर अभ्यास और योग्य गुरू के सतसंग से तुम में और शांति बढ़ती जाती है । और तुम पूर्णरूप से शांत हो जाते हो ।
नाद ब्रह्म ध्यान योग धाम आश्रम इन्दौर ।
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ये भजन मेरे एक मित्र ने सुनाया है जिसमें जीवात्मा को सचेत रहने की सलाह दी गयी है . ये भजन प्रत्येक के लिये उपयोगी हो सकता है यदि आप इसको समझने का प्रयत्न करें .
चौकी पे चौकीदार हो तुम चौकस रहियो भैया .
चौकी चार चार कर्मन की दफ़ा है न्यारी न्यारी . सम्मन कर तामील मुकद्दमा हो जायेगा जारी .
रहना लङने को तैयार हो . तुम चौकस रहियो भैया
जीत गये तो इस चौकी पर ड्यूटी रहे तुम्हारी . हार गये तो दफ़ा मुताबिक होवे जेल करारी .
बचना मुश्किल होय तुम्हार हो . तुम चौकस रहियो भैया
काम क्रोध मद लोभ मोह की छाय रही अंधियारी . गुरु ग्यान का दीप हाथ ले देखो नैन उघारी .
मौका मिले न बारम्बार हो . तुम चौकस रहियो भैया
पारख द्रष्टि दया सतगुरु की , कोई कोई पावे अधिकारी . अमोल भवजल बहुर ना आवे , कहे कबीर पुकारी .
संशय रूपी ये संसार हो ,तुम चौकस रहियो भैया
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मक्की के फायदे - ताजे दूधिया मक्का के दाने पीसकर शीशी में भरकर खुली हुई शीशी धूप में रखें । दूध सूखकर उड़ जाएगा । और तेल शीशी में रह जाएगा । छानकर तेल को शीशी में भर लें । और मालिश किया करें । दुर्बल बच्चों के पैरों पर मालिश करने से बच्चा जल्दी चलेगा । 1 चम्मच तेल शर्बत में मिलाकर पीने से बल बढ़ता है । भुट्टा जलाकर उसकी राख पीस लें । इसमें स्वादानुसार सेंधा नमक मिला लें । नित्य 4 बार चौथाई चम्मच गर्म पानी से फंकी लें । खांसी में लाभ होगा । ताजा मक्का के भुट्टे पानी में उबालकर उस पानी को छानकर मिश्री मिलाकर पीने से पेशाब की जलन गुर्दों की कमजोरी दूर हो जाती है । मक्का के भुट्टे जलाकर राख कर लें । जौ जलाकर राख कर लें । दोनों को अलग अलग पीसकर अलग अलग शीशियों में भरकर उन शीशियों पर नाम लिख दें । 1 कप पानी में 2 चम्मच मक्का की राख घोलें । फिर छानकर इस पानी को पी लें । इससे पथरी गलती है । पेशाब साफ आता है । जिसे टीबी का पूर्व रूप हो । उसे मक्का की रोटी खानी चाहिए । गरमागरम भुट्टे और उसके विविध व्यंजन खाने का 1 अलग ही मजा है । भुट्टा ग्रेमिनी कुल का 1 प्रसिद्ध धान्य है । आयुर्वेद के अनुसार कच्ची मक्का का भुट्टा तृप्तिदायक वातकारक कफ पित्त नाशक मधुर और रुचि उत्पादक अनाज है । भुट्टे में पौष्टिक तत्व कार्बोहाइड्रेट प्रचुर मात्रा में पाया जाता है । इसमें मुख्य रूप से प्रोटीन होता है । हालांकि इस प्रोटीन को अपूर्ण प्रोटीन माना गया है । 100 ग्राम भुट्टे के दानों से काफी कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है । भुट्टे के 100 ग्राम दानों;  कच्ची मक्का में काफी पोषक तत्वों की मात्रा खनिज एवं विटामिन पाए जाते हैं ।
औषधीय गुण - मक्का के ताजे दानों को पानी में अच्छी तरह से उबालकर उस पानी को छानकर शहद या मिश्री मिलाकर सेवन करने से गुर्दों की कमजोरी दूर होती है ।
- मक्का के दाने भूनकर खाने से पाचन तंत्र के रोग दूर होते हैं ।
- भूना हुआ भुट्टा खाने से दांत एवं दाढ़ मजबूत होते हैं । तथा ये दाने लार बनाने में भी सहायक हैं । जिससे मुख व दांतों की दुर्गंध भी दूर होती है ।

जो देखा सो दुखिया हो

भीष्म पितामह शरशैया पर लेटे हुये चिन्तन कर रहे थे कि मैंने पूरे जीवन उत्तम धर्म कर्तव्य का पालन किया । फ़िर मेरी ये गति ( दुर्दशा ) क्यों हुयी ? उसी समय भगवान श्रीकृष्ण उनसे मिलने आये । भीष्म पितामह ने कहा - प्रभो ! मैं ध्यान क्रिया द्वारा अपने सौ जन्म देख सकता हूँ । और मैंने देखा कि मैंने सौ जन्मों में ऐसा कोई कार्य नहीं किया । जिस हेतु मुझे ये दुख उठाना पङे । तब भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कराते हुये कहा कि - मैं तुम्हें इससे और ऊपर लेकर चलता हूँ । तब तुम सचाई को जान सकोगे । श्रीकृष्ण योगविधि द्वारा उन्हें एक सौ छठवें जन्म में ले गये । जब वे एक राजकुमार थे । और घोङे पर सवार होकर मार्ग में जा रहे थे । तो रास्ते में एक दोमुहाँ साँप उनके बीच आ गया । तब उस राजकुमार ने तीर की नोक पर उस साँप को उठाकर एक और उछाल दिया । वह सर्प झरवेरी की झाङियों में जाकर गिर गया । और कांटो में फ़ंस जाने के कारण निकल नहीं सका । और उसी अवस्था में कई दिनों बाद दम तोङ दिया । ये पाप कर्म राजकुमार के खाते में जुङ गया । वैसे रा्जकुमार स्वभाव से पाप कर्म वाला नहीं था ।
श्रीकृष्ण ने कहा कि - तुम सौ जन्मों तक भले करम ही करते रहे । अतः उस पाप बीज को उत्पन्न होने के लिये जमीन नहीं मिली । लेकिन हस्तिनापुर में जब तुम समर्थ होते हुये भी कई अन्याय देखते रहे । और द्रौपदी चीर हरण जैसे घृणित कार्य में भी मूकदर्शक बने रहे । तो उस पाप बीज को मौसम मिल गया । और वो फ़लने लगा । अंत में इस परिणाम को प्राप्त हुआ । श्रीकृष्ण ने कहा कि - हे पितामह ! चाहे वह कितनी ही बङी शक्ति क्यों न हो । यदि उससे कोई अपराध हो जाता है । तो वो उसको भुगतना ही होगा ।
काया से जो पातक होई । बिनु भुगते छूटे नहि कोई ।

राम कृष्ण से कौन बङ । तिन्हूँ ने गुरु कीन । 
तीन लोक के ये धनी । गुरु आज्ञा आधीन ।
धनवन्ते सब ही दुखी । निर्धन है दुख रूप । 
साध सुखी सहजो कहे । पायो भेद अनूप ।
तन धर सुखिया कोई न देखा । जो देखा सो दुखिया हो । 
उदय अस्त की बात कहतु है । सबका किया विवेका हो ।
घाटे बाढे सब जग दुखिया । क्या गिरही बैरागी हो । 
शुकदेव अचारज दुख के डर से । गर्भ से माया त्यागी हो ।
जोगी दुखिया जंगम दुखिया । तपसी का दुख दूना हो । 
आसा त्रस्ना सबको व्यापे । कोई महल न सूना हो ।
साँच कहौ तो कोई न माने । झूठ कहा नहि जाई हो । 
ब्रह्मा विष्नु महेसर दुखिया । जिन यह राह चलाई हो ।
अबधू दुखिया भूपति दुखिया । रंक दुखी विपरीती हो । 
कहे कबीर सकल जग दुखिया । संत सुखी मन जीती हो ।
कोई तो तन मन दुखी । कोई चित्त उदास ।
एक एक दुख सभन को । सुखी संत का दास ।
भीखा भूखा कोई नहीं । सबकी गठरी लाल ।
गिरह खोल न जानही । ताते भये कंगाल ।
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गुरु होश में लाता है - गुरु का 1 ही अर्थ है । तुम्हारी नींद को तोड़ देना । तुम्हें जगा दे । तुम्हारे सपने बिखर जाएं । तुम होश से भर जाओ । नींद बहुत गहरी है । शायद नींद कहना भी ठीक नहीं । बेहोशी है । कितना ही पुकारो । नींद के परदे के पार आवाज नहीं पहुँचती । चीखो और चिल्लाओ भी । द्वार खटखटाओ । सपने काफी मजबूत हैं । थोड़े हिलतें हैं । फिर वापस अपने स्थान पर जम जाते हैं । निश्चित ही काम कठिन है । और न केवल कठिन है । बल्कि शिष्य को निरंतर लगेगा कि गुरु विघ्न डालता है । जब तुम्हें कोई साधारण नींद से भी उठाता है । तब तुम्हें लगता है । उठाने वाला मित्र नहीं - शत्रु है । नींद प्यारी है । और यह भी हो सकता है कि तुम 1 सुखद सपना देख रहे हो । और चाहते थे कि सपना जारी रहे । उठने का मन नहीं होता । मन सदा सोने का ही होता है । मन आलस्य का सूत्र है । इसलिए जो भी तुम्हें झकझोरता है । जगाता है । बुरा मालूम पड़ता है । जो तुम्हें सांत्वना देता है । गीत गाता है । सुलाता है । वह तुम्हें भला मालूम पड़ता है । सांत्वना की तुम तलाश कर रहे हो । सत्य की नहीं । और इसलिए तुम्हारी सांत्वना की तलाश के कारण ही दुनिया में 100 गुरुओं में 99 गुरु झूठे ही होते हैं । क्योंकि जब तुम कुछ मांगते हो । तो कोई न कोई उसकी पूर्ति करने वाला पैदा हो जाता है । असदगुरु जीता है । क्योंकि शिष्य कुछ गलत मांग रहे हैं । खोजने वाले कुछ गलत खोज रहे हैं । अर्थशास्त्र का छोटा सा नियम है - मांग से पूर्ति पैदा होगी । डिमांड क्रिएटस द सप्लाय । अगर हजारों लाखों, करोड़ों लोगों की मांग सांत्वना की है । तो कोई न कोई तुम्हें सांत्वना देने को राजी हो जाएगा । तुम्हारी सांत्वना की शोषण करने को कोई न कोई राजी हो जाएगा । कोई न कोई तुम्हें गीत गाएगा । तुम्हें सुलाएगा । कोई न कोई लोरी गाने वाला तुम्हें मिल जाएगा । जिससे तुम्हारी नींद और गहरी हो । सपना और मजबूत हो जाए । जिस गुरु के पास जाकर तुम्हें नींद गहरी होती मालूम हो । वहां से भागना । वहां 1 क्षण रूकना मत । जो तुम्हें झकझोरता न हो । जो तुम्हें मिटाने को तैयार न बैठा हो । जो तुम्हें काट ही न डाले । उससे तुम बचना । जीसस का 1 वचन है कि लोग कहते हैं कि मैं शांति लाया हूं । लेकिन मै तुमसे कहता हूं । मैं तलवार लेकर आया हूं । इस वचन के कारण बड़ी ईसाइयों को कठिनाई रही । क्योंकि 1 ओर जीसस कहते हैं कि - अगर कोई तुम्हारे 1 गाल पर चांटा मारे । तुम दूसरा भी उसके सामने कर देना । जो तुम्हारा कोट छीन ले । तुम कमीज भी उसे दे देना । और जो तुम्हें मजबूर करे 1 मील तक अपना वजन ढोने के लिए । तुम 2 मील तक उसके साथ चले जाना । ऐसा शांति प्रिय व्यक्ति जो कलह पैदा करना ही न चाहे । जो सब सहने को राजी हो । वह कहता है - मैं शांति लेकर नहीं । तलवार लेकर आया हूं । यह तलवार किस तरह की है ? यह तलवार गुरु की तलवार है । इस तलवार का उस तलवार से कोई संबंध नहीं । जो तुमने सैनिक की कमर पर बंधी देखी है । यह तलवार कोई प्रगट में दिखाई पड़ने वाली तलवार नहीं । यह तुम्हें मारेगी भी । और तुम्हारे खून की 1 बूंद भी न गिरेगी । यह तुम्हें काट भी डालेगी । और तुम मरोगे भी नहीं । यह तुम्हें जलाएगी । लेकिन तुम्हारा कचरा ही जलेगा । तुम्हारा सोना निखरकर बाहर आ जाएगा । हर गुरु के हाथ में तलवार है । और जो गुरु तुम्हें जगाना चाहेगा । वह तुम्हें शत्रु जैसा मालूम होगा । फिर तुम्हारी नींद आज की नहीं । बहुत पुरानी है । फिर तुम्हारी नींद सिर्फ नींद नहीं है । उस नींद में तुम्हारा लोभ । तुम्हारा मोह । तुम्हारा राग । सभी कुछ जुड़ा है । तुम्हारी आशाएं । आकांक्षाएं सब उस नींद में संयुक्त है । तुम्हारा भविष्य । तुम्हारे स्वर्ग । तुम्हारे मोक्ष । सभी उस नींद में अपनी जडों को जमाए बैठे हैं । और जब नींद टूटती है । तो सभी टूट जाता है । तुम ध्यान रखना । तुम्हारी नींद टूटेगी । तो तुम्हारा संसार ही छूट जाएगा । ऐसा नहीं । जिसे तुमने कल तक परमात्मा जाना था । वह भी छूट जाएगा । नींद में जाने गए परमात्मा की कितनी सच्चाई हो सकती है ? तुम्हारी दुकान तो छूटेगी । तुम्हारे मंदिर भी न बचेंगे । क्योंकि नींद में ही दुकान बनाई थी । नींद मे ही मंदिर तय किये गये थे । जब नींद की दुकान गलत थी । तो नींद के मंदिर कैसे सही होंगे ? तुम्हारी व्यर्थ की बकवास ही न छूटेगी । तुम्हारे शास्त्र भी 2 कौड़ी के हो जाएंगे । क्योंकि नींद में ही तुमने उन शास्त्रों को पढ़ा था । नींद में ही तुमने उन्हें कठंस्थ किया था । नींद में ही तुमने उनकी व्याख्या की थी । और तुम्हारे दुकान पर रखे खाते बही अगर गलत थे । तो तुम्हारी गीता । तुम्हारी कुरआन । तुम्हारी बाइबल भी सही नहीं हो सकती । नींद अगर गलत है । तो नींद का सारा फैलाव गलत है । इसलिए गुरु तुम्हारी जब नींद छीनेगा । तो तुम्हारा संसार ही नहीं छीनता । तुम्हारा मोक्ष भी छीन लेगा । वह तुमसे तुम्हारा धन ही नहीं छीनता । तुमसे तुम्हारा धर्म भी छीन लेगा । कृष्ण ने अर्जुन को गीता में कहा है - सर्वधर्मान परित्यज्य - तू सब धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जा । तुम हिंदू हो । गुरु के पास जाते ही तुम हिंदू न रह जाओगे । और अगर तुम हिंदू रह गए । तो समझना गुरु झूठा है । तुम मुसलमान हो । गुरु के पास जाते ही तुम मुसलमान न रह जाओगे । अगर फिर तुम्हें मुसलमानियत प्यारी रही । तो समझना । तुम गलत जगह पहुंच गए । तुम जैन हो । बौद्ध हो । या कोई भी हो । गुरु तुमसे कहेगा - सर्वधर्मान परित्यज्य । सब धर्म छोड़कर तू मेरे पास आ जा । धर्म तो अंधे की लकड़ी है । उससे वह टटोलता है । शास्त्र तो नासमझ के शब्द हैं । जो नहीं जानता । वह सिद्धांतों से तृप्त होता है । गुरु के पास पहुँचकर तुम्हारे शास्त्र । तुम्हारे धर्म । तुम्हारी मस्जिद । मंदिर । तुम खुद । तुम्हारा सब छिन जाएगा । इसलिए गुरु के पास जाना बड़े से बड़ा साहस है । ओशो ।

04 अप्रैल 2010

क्योंकि पत्थर आखिर पत्थर ही है

शर्मिष्ठा - मा आनंद मधु । प्रभु श्री फिर कुछ रूककर बोले - इतिहास में अभी तक प्रारम्भ से ही स्त्रियों के साथ उचित न्याय नहीं हुआ है । जिस स्त्री ने पुरुष को जन्म दिया है । उस स्त्री को ही पुरुष ने सम्पति समझ कर उसका उपभोग किया । उसका शोषण किया । उसने स्त्री को केवल भोग की वस्तु माना । ईसामसीह को भी जब क्रूस पर चढ़ाया जा रहा था । तो डर के कारण उनके सभी शिष्य भाग गए थे । केवल 3 स्त्रियां ही उनके शव को लेने श्रद्धा पूर्वक जल्लाद के सामने खड़ी थीं । पर इसके बाबजूद ईसाई धर्म ने भी स्त्री को उचित सम्मान नहीं दिया । जैन धर्म तो कहता है कि - स्त्री की मुक्ति संभव ही नहीं है । उसे पहले पुरुष के रूप में जन्म लेना होगा । तभी उसकी मुक्ति होगी । मल्लिनाथ जिन्हें तीर्थंकर माना गया । वह 1 स्त्री थी । पर उसे भी पुरुष का नाम दिया गया । बुद्ध और महावीर दोनों ही स्त्री को दीक्षित करने में उत्सुक नहीं थे । क्योंकि उनका विचार था कि स्त्री के कारण उनका धर्म शीघ्र नष्ट हो जायेगा । सनातन धर्म तो स्त्री को नर्क का द्वार मानता है ।  स्त्री की प्रतिष्ठा न रामायण काल में थी । और न महाभारत काल में । सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी । 1 धोबी के कहने से उन्हें जंगल में धकेल दिया गया । द्रोपदी को 5 पति स्वीकार करने पड़े । वह जुए के दावं पर लगा दी गई । पर मैं चाहता हूं कि स्त्री को उसका खोया सम्मान मिले । इसलिये सबसे पहले नव संन्यास ग्रहण करने के लिये 1 स्त्री को पहले आमंत्रित कर रहा हूं । इस अवसर पर आज मुझे अपनी नानी की बहुत याद आ रही है । शायद बहुतों को यह न मालूम हो कि मेरे बुद्धत्व प्राप्त करने के 3 दिन बाद ही मेरी नानी ने सबसे पूर्व संन्यास लिया था । और मैं उसका साक्षी था । 1967 में वह बुद्धत्व को उपलब्ध हो गई थी । इसलिये आज भी मैं नव संन्यास देने के लिये सबसे पहले 1 नारी को ही आमंत्रित कर रहा हूं । वह हैं - शर्मिष्ठा । जिसे सदैव प्रत्येक धर्म के द्वारा नारी के प्रति की गई उपेक्षा व्यथित करती रही । पुलक और आनंद शर्मिष्ठा के अंग अंग से फूट रही थी । आमंत्रण मिलते ही वह जैसे ही संन्यास लेने के लिये उठी । पूरा हाल फिर तालियों से 

गूंज उठा । शर्मिष्ठा आगे बढ़कर प्रभु श्री के चरणों में गिर पड़ी । उसे प्रेम से उठाते । और उसकी भ्रकुटी पर अंगूठा रखकर शक्तिपात करते हुये प्रभु श्री मुस्कुरा कर बोले - आज से इसका नाम आनंद मधु है । जैसे ही प्रभु श्री ने शर्मिष्ठा के मस्तक पर अंगूठा रखकर कुछ दबाते हुये शक्तिपात किया । उसे विद्युत का तीव्र झटका सा लगा । अंग प्रत्यंग तरंगित हो उठे । उसे लगा । जैसे वह आनंद के सागर में डूबती जा रही है । फिर जैसे ही प्रभु ने अपने चित्र वाली माला पहनाई । पूरा हाल फिर तालियों से गूंज उठा । फिर प्रभु श्री ने अपनी बाईं कलाई पर बंधी गोल्डन वाच उतारते हुये मधु को पहनाते हुये घोषणा की - यह घड़ी मुझे बनारस में उस ज्योतिषी ने दी थी । जिसने मेरे बचपन में मेरे बुद्ध होने की घोषणा की थी । मैंने बचपन में उसका मस्तक देखकर उसके भिक्षु होने की भविष्यवाणी की थी । ज्योतिषी ने कहा था कि यदि मेरा कथन सिद्ध हुआ । तो यह अपनी गोल्डन वाच शर्त हार जाने के उपलक्ष्य में मुझे देगा । इसलिये आज वह घड़ी स्मृति के रूप में नव संन्यास में सर्वप्रथम दीक्षित होने वाली मधु को दे रहा हूं । फिर अन्य सभी साधक साधिकाओं को नव संन्यास देते हुये भगवान श्री ने कहा -  मैं तुम्हें वह सब कुछ दे देना चाहता हूं । जो मेरे पास है । पर यह तुम्हारी ग्राह्यता पर निर्भर है कि तुम कितना कुछ ले पाते हो । मैं तो अपना प्रेम । अपनी करुणा । अपना आनंद उलीच ही रहा हूं । मैं सोचता हूं । तुम्हें क्या भेंट दूं ? क्या कोई कीमती पत्थर ? नहीं नहीं । क्योंकि पत्थर आखिर पत्थर ही है । फिर क्या कोई सुंदर फूल ? नहीं नहीं । क्योंकि फूल तो मैं दे भी न पाऊंगा कि वह मुरझा जायेगा । मैं तुम्हें अपने हृदय का प्रेम देता हूं । क्योंकि इस पूरे जगत में प्रेम ही अकेला है । जो कि पत्थर नहीं है । और प्रेम ही ऐसा है । जो कभी मुरझाता नहीं । प्रेम मनुष्य के हृदय में परमात्मा की सुगंध है । प्रेम मनुष्य के प्राणों में परमात्मा का संगीत है ।
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जीवन का संगीत पैदा होता है - प्रेम और ध्यान से । दोनों को सम्हालो । जब अकेले तब - ध्यान में । जब कोई मौजूद हो । तब - प्रेम में ।
जब प्रेम में । तो अपने को बिल्कुल भूल जाओ । और जब ध्यान में । तो दूसरे को बिलकुल भूल जाओ । और यह रूपांतरण इतना सहज होना चाहिए । इतना तरल होना चाहिए कि इसमें जरा भी अड़चन न हो । यह सहज रूप से हो जाए । जैसे तुम घर के बाहर आते । भीतर जाते । जैसे श्वास लेते । श्वास छोड़ते । इतना ही सहज होना चाहिए । ओशो
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प्रिय आत्मन ! जब भी कोई बुद्ध पुरुष हुआ हैं । तो उसकी कोई नहीं मानते हैं । जैसे कोई राजनीति में ईमानदार आते ही भष्टाचार खत्म हो जाता है । वैसे ही धर्म के ठेकेदार का नकली धर्म की पोल खुल जाती है । तो वो विरोध सबसे पहले वही ही करते हैं । मेरे 1 नाम ( महाप्रभु ) रखने से कई पंडितों की चोटी खिंची जाती है । जब कोई जागा हुआ इंसान अंधेरी नगरी में जाते ही रोशनी हो जाती है । तो यह तो होता आया है । और बुद्ध पुरुष को या तो औरत में । या धन दौलत में  बदनाम करेंगे । और हम भी ऐसे ही हैं । बुराई करने में और सुन लेने में बड़ा आनंद आता हैं । चाहे कोई लेना देना ना हो । ओशो
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मन हमें अपने साथ लिए घूमता है । जब तक सही जगह नहीं मिल जाती । तब तक वह हमें बैठने नहीं देता है । हम कहीं बैठते हैं । तो वह बारबार हमें उठा देता है । जब उसे लगता है कि हाँ अब सही जगह मिल गयी । तब वह पूरी तसल्ली करता है । और जब संतुष्ट हो जाता है । तभी वह हमसे विदाई लेता है । उससे पहले वो विदा नहीं हो सकता । इसलिए मन को बहुत बहुत धन्यवाद । सीमा आनंदिता
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परमात्मा के पास जाने के लिये कोई रास्ता नहीं । छोटी छोटी पगडंडियां हैं । वह भी जब तुम चलना शुरु करोगे । तब बननी शुरु होगी - ओशो ।
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अगर ब्रह्मचर्य इस जगत में फला है । तो वासना से ही फला है । फल को तो तुम आदर देते हो । वृक्ष को इंकार करते हो ? तो तुम भूल कर रहे हो । तो तुम्हारे जीवन के गणित में साफ सुथरापन नहीं । बड़ी उलझन है । बड़ा विभ्रम है ।
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कहाँ से आया कहाँ जाओगे । खबर करो अपने तन की ।
सदगुरु मिले तो भेद बतावे । खुल जाये अंतर खिड़की ।
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हम दूसरे में उतना ही देख सकते हैं । उसी सीमा तक । जितना हमने स्वयं में देख लिया है । हम दूसरे की किताब तभी पढ़ सकते हैं । जब हमने अपनी किताब पढ़ ली हो । कम से कम भीतर की वर्णमाला तो पढ़ो । भीतर के शास्त्र से तो परिचित होओ । तो ही तुम दूसरे से भी शायद परिचित हो जाओ । और मजा ऐसा है कि जिसने अपने को जाना । उसने पाया कि दूसरा है ही नहीं । अपने को जानते ही पता चला कि बस 1 है । वही बहुत रूपों में प्रगट हुआ है । जिसने अपने को पहचाना । उसे पता चला । परिधि हमारी अलग अलग । केंद्र हमारा 1 है । जैसे ही हम भीतर जाते हैं । वैसे ही हम 1 होने लगते हैं । जैसे ही हम बाहर की तरफ आते हैं । वैसे ही अनेक होने लगते हैं । अनेक का अर्थ है - बाहर की यात्रा । 1 का अर्थ है - अंतर्यात्रा ।

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