28 जनवरी 2011

आईये आपका अंधविश्वास और भी बढाऊँ ।

अगर किसी इंसान को जहरीला सर्प डस ले । तो इलाज में दस - बीस हजार के तो इंजेक्शन ही लगते हैं । लेकिन कोई इंसान यदि आपसे यह कहे कि पीपल की एक स्वस्थ पत्तेदार डाली तोङ लायें । और मरीज को लिटाकर बारबार दो पत्ते तोङकर उसकी डंडी ( शाखा से जुङने वाली ) की तरफ़ से मरीज के दोनों कानों में आहिस्ता आहिस्ता प्रवेश करायें । इस पर मरीज तङपेगा और चीखेगा । इस तरह दो तीन बार करायें । जब मरीज शान्त हो जाय । तो पत्ते बदलकर फ़िर वही क्रिया करायें । फ़िर तङपने आदि की स्थिति रिपीट होगी । इस तरह जब सर्पदंश से प्रभावित व्यक्ति डंडी प्रवेश कराने पर जब पीङा का बिलकुल अहसास न करे । तब समझिये उसका जहर उतर गया । ( है ना कोरी गप्प । )..यह गप्प प्रतिष्ठित धार्मिक पत्रिका । कल्याण । गीता प्रेस गोरखपुर में लगभग 17 साल पहले प्रकाशित हुयी थी । बाद में उसकी छोटी बङी कई पुस्तकों में प्रकाशित हुयी । फ़िर जिक्र के अनुसार । कादम्बिनी आदि पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुयी ।..उस समय फ़ोन का आम चलन नहीं था । अतः इसके एक्सपर्ट सज्जन ने अपना नाम पता आदि सभी लेख के अंत में दिया था । जिससे उनके पास सैकङों पत्र पहुँचे । और सीधे सीधे मिलने भी लोग गये । महत्वपूर्ण बात यह है । कि ये उनकी सिर्फ़ मौखिक बात नहीं थी । उन्होंने तमाम पीङितों को इससे अच्छा किया था । जिसके प्रत्यक्षदर्शी गवाह गाँववालों के साथ समय समय पर अनेक लोग बने । यह कोई दबी छुपी बात न होकर बहुचर्चित लेख था । जिससे कल्याण का पूरा स्टाफ़ परिचित था । जिसको भी इसकी पूरी जानकारी चाहिये हो । गीता प्रेस से सम्पर्क कर सकते है ।
AND..मैं इस मामले में भाग्यशाली हूँ कि आज तक मुझे कुत्ते ने नहीं काटा । कुत्ते के काटने पर दो हजार के लगभग इंजेक्शन लगते हैं । पहले तो ये पेट में लगाये जाते थे ।..जिला मैंनपुरी उत्तर प्रदेश में विघरई नाम का एक गाँव है । गाँव में एक बहुत प्रसिद्ध कुँआ है । जिसका पानी आम प्रयोग में न होकर कुत्ता काटने के इलाज के लिये अधिक होता है । ( है ना कोरी गप्प ) अस्पष्ट जानकारी ( लेकिन सिर्फ़ मेरी । स्थानीय लोगों और वहाँ पहुँचे लोगों को पूरी बात सही मालूम है । ) के अनुसार बहुत पहले वहाँ कोई महात्मा हुये । जिनसे जुङी किसी बात से यह संभव हुआ । कुत्ते द्वारा काट लेने पर आज भी इस कुँए का पानी पीने बहुत दूर दूर से लोग आते हैं । इस कूपजल के प्रभाव के अनेक आसपास के लोग तो गवाह हैं ही । दूर दूर के लोग भी हैं । जिनकी मैंनपुरी के पास जान पहचान हो । फ़ोन से कई वर्षों से प्रमाणित इस सच्चाई का पता लगा सकते हैं ।
AND NOW ..RAJEEV BABA *** जिस बात से यह पोस्ट लिखी गयी..??.. वैसे इस बात को शायद मैं कभी नहीं जान पाता । पर ब्लाग के STATS पर निगाह डालते समय मेरी निगाह रैफ़र साइटस पर गयी । जिसमें.. प्रवीण शाह.ब्लाग स्पाट. काम का नाम दर्ज था । और इसका सीधा सा मतलब था कि उक्त ब्लाग से मेरे ब्लाग का लिंक जुङ रहा था । मैंने यू आर एल पर क्लिक किया । तो मेरी एक पोस्ट का जिक्र लेकर पूरा लेख प्रकाशित था ।..कहते हैं । आलोचना ही स्वस्थ चिंतन को जन्म देती है । मैंने इस आलोचनात्मक पोस्ट को पढा । और नये सिरे से इस पर विचार किया कि क्या सही है । और क्या गलत ?..यह बात मुझे करनपुर के स्वयँ आनन्द वेवाह उर्फ़ पुजारी बाबा ( तीन वर्ष पहले अशरीर ) ने बतायी थी । वास्तव में इस विधि में उनकी बतायी एक लाइन मैं लिखना भूल गया । वो ये कि..जीभ नाक की नोक और अन्दर गले के काग को समान रूप से स्पर्श करे । मतलब अन्दर भी उसका मुङाव हो । और बाहर भी । लेकिन ये दो अलग स्थिति हैं । एक ही समय में न समझें ।..इसका अभ्यास मैंने कुछ ही दिन किया । और छोङ दिया । क्योंकि धूम्रपान की आदत होने से मेरी जीभ मुँह आदि की मांसपेशियां कङी रहती थीं । इसलिये मेरे लिये ये अभ्यास नामुमकिन जैसा ही था । मुझे इस अभ्यास और इसके फ़ल में कोई अधिक रुचि भी नहीं थी । इस अभ्यास का कोई अनुभूत प्रयोग मैंने नहीं देखा था । पुजारी बाबा से क्योंकि सामान्य जिक्र में मैंने इस रोचक बात को सुना था । और मेरा उनसे अधिक मिलना भी नहीं होता था । इसलिये इस प्रयोग का सफ़ल प्रयोगकर्ता कौन था । ये भी मुझे नहीं पता था । लेकिन इस बात पर आंशिक ही सही विश्वास करने के कुछ कारण थे ?
जैसा कि श्री प्रवीण शाह जी । और कुछ टिप्पणीकर्ताओं ने । कुछ लोगों के उदाहरण भी दिये । जिनकी जीभ जन्मजात ही नाक को छूती थी । और प्रमाण के लिये ऐसे लोगों के चित्र भी प्रकाशित थे । मुझे नहीं मालूम विष के साथ उनके शरीर का क्या व्यवहार रहता होगा ?..लेकिन मेरे ख्याल में इस तरह की जीभ पर ये नियम लागू नहीं हो सकता । क्योंकि प्रयास द्वारा बङाई गयी जीभ । शरीर में यौगिक क्रियाओं का परिणाम लाती है । किसी भी यौगिक क्रिया से शरीर की आंतरिक संरचना । रसायनों में फ़ेरबदल होता है । जिससे यह संभव हो सकता है । जबकि जन्मजात ऐसा बाडी पार्ट सामान्य ही होगा । AND....इसका सबसे बङा सफ़ल जीता जागता हालिया उदाहरण बाबा रामदेव का अनुलोम विलोम है । नाक के छिद्रों से तो वैसे भी आवागमन करती वायु । उसी तरह निकलती है । फ़िर उसको थोङा सा घुमा फ़िरा देने से । वो जटिल रोगों में । शरीर को स्वस्थ रखने में । अत्यन्त प्रभावशाली कैसे हो सकती है ?? AND.. दर्द हार्ट में हो रहा है । और हथेली के किसी बिंदु पर दवाव देने से । हार्ट में लाभ कैसे हो सकता है ? ( एक्यूप्रेशर थैरेपी । जिसका इस्तेमाल बाबा रामदेव भी करते हैं । विश्व के अनेक लोगों द्वारा अपनायी गयी । AND..कुछ बाबाओं की संगति में मैंने सुना है । ये आयुर्वेद की कुछ पुस्तकों में भी मिलता है कि संखिया जैसा तीक्ष्ण विष थोङा सा । मटर के दाने का भी आधा । सिल पर घिसें । घिसा हुआ पूरा संखिया कपङे से बिलकुल साफ़ करके । सिल के उस स्थान पर उंगली घिसकर चाटें । यही क्रिया अनेकों महीने तक करें । विष शरीर पर निष्प्रभावी हो जाता है । AND..सांप के जहर से कुछ लोग एक बार काटने से ही मर जाते हैं । जबकि कुछ लोग धीरे धीरे अभ्यास से सर्पदंश सहन करते हुये । सर्पदंश से अप्रभावित हो जाते हैं । इस तरह के कई कार्यक्रम डिस्कवरी । नेशनल ज्योग्राफ़िक जैसे चैनलों पर प्रसारित हो चुके हैं । होते रहते हैं ।
AND..क्या किसी स्टील आदि धातु की चम्मच चमचा को एकटक एकाग्रता से देखते हुये मोङी जा सकता है । जापान जैसे देश में यह योग सिखाया जाता है । इसका सफ़ल प्रयोग मैंने टीवी पर देखा । AND..आगरा के खचाखच भरे सूरसदन हाल में । शायद मुम्बई से आये किसी व्यक्ति ने बाइक की इग्नीशन में लगी चाबी दूर से ही घुमा दी । तीस के लगभग एकाग्रता के प्रयोग दिखाते हुये सभी महिला पुरुषों को चमत्कृत कर दिया । सभी बङे अखबारों द्वारा कवरेज और प्रकाशित । AND.. क्या स्कूटर के एक्सीडेंट से रीढ में खराबी होने पर । लकवा हो जाने पर । डाक्टरों द्वारा लाइलाज घोषित किये मरीज को सिर्फ़ डेढ महीने के शीर्षासन द्वारा ( दीवाल के सहारे । एक खूँटी से पैर बाँधकर । योगी द्वारा सहारा देकर कराया गया । शीर्षासन । वैसे तो अच्छा भला शीर्षासन नहीं कर पाता । फ़िर लकवा पेशेंट कैसे करेगा । ) एकदम चंगा कर देना । आधा घंटा की डाक्यूमेंटरी दूरदर्शन पर अनेकों बार प्रसारित । AND..अभी कुछ ही दिनों पहले मैंने बिजली के बारे में पोस्ट लिखी । जोर का झटका धीरे से । जिसमें झांसी के प्रसिद्ध करेंट बाबा के बारे में है । ( प्रसिद्ध और अखबारों में प्रकाशित । ) इस पोस्ट पर ब्लागर श्री ललित शर्मा । श्री विनय शर्मा । ने कमेंट दिया कि ऐसा ही एक प्रोग्राम दूरदर्शन पर उन्होंने देखा था । जिसमें एक व्यक्ति 22000 वोल्ट का करेंटयुक्त नंगा तार जीभ से स्पर्श करता था ।
AND..ज्यादा पुरानी नहीं । लगभग पन्द्रह साल ही पुरानी बात है । जब एक नये नये बाबा रामदेव का अवतार हुआ था । बाबा ने जब ये कहा कि एक नाक छिद्र से खींची फ़ूंक को दूसरे नाक छिद्र से निकालो । फ़िर इसी क्रिया को विपरीत तरीके से करो । बाबा ने इसको अनुलोम विलोम बताया । तो इससे डायबिटीज । ब्लड प्रेशर । हार्ट डिसीज आदि तमाम जटिल रोग ठीक हो जायेंगे । तब 85 % विश्व की जनता । डाक्टर और हम महान भारतवासी बाबा रामदेब की खिल्ली उङाते हुये नहीं थकते थे ।..लेकिन यह क्या..15 -18 सालों में ही विश्व के तमाम पार्कों में सुबह सुबह ही करोङों जनता बाबा की तरकीब से नाक से फ़ूँ फ़ूँ करने लगी । ( जिसको इस बात का विश्वास न हो । हरिद्वार जाकर देख सकते हैं । हरिद्वार नहीं जा पाओगे । कोई बात नहीं । सुबह सुबह अपना टीवी तो खोलकर देख ही सकते हो । )..भाई आप लोग पाला बदलने में हमेशा से माहिर रहे हो । जिसका भी पलङा भारी देखा । कूदकर उधर ही पहुँच गये । AND....आगे तो बाबा ने गप्प लङाने की हद ही कर दी । बाबा ने कहा । नाखून से नाखून घिसने पर बाल मजबूत होते हैं । बङे होते हैं ।..और यह क्या ? तमाम नजाकती फ़ेशनेबल महिलायें भी स्टेशन जैसे स्थानों पर परस्पर नाखून घिसते देखी गयीं । ( बाबा की यह भी गप्प कामयाब रही । )
AND..आगे और भी..पहले जिस लौकी को मरीजी भोजन कहते थे । खाने के नाम पर नाक भों सिकोङते थे । इस लौकी का जूस बेहद फ़ायदेमन्द हैं ।..स्टेटमेंट देकर बाबा ने लौकी के दाम इंटरनेशनल मार्केट में इस कदर उछाल दिये । कि लौकी का एक एक शेयर ( एक रुपये वाली एक लौकी बीस रुपये तक ) एक रुपये से बीस रुपये की उछाल मारने लगा । गरीबों की लौकी दुर्लभ होकर अमीरों के जूसर में पहुँच गयी । ..ढाई कपङा ( एक अंगोछा । एक लुंगी । एक लंगोट । ) पहनने वाले इस बाबा ने विश्व के तमाम स्थापित सिद्धांतो की चूलें हिलाकर रख दी ।
AND..1 अपनी दुकान के सामने हरी मिर्च नीबू लटकाने वाले । 2 भवन पर राक्षस मुख का मुखौटा लगाना । 3 जच्चा के सोअर कक्ष के बाहर निरंतर धुँआ करना । 4 जच्चा के सिरहाने चाकू आदि रखना । 5 पैदा हुये बच्चे का नाम विधि विधान से क्यों रखवाते हो । आप ही क्यों नहीं सोनू मोनू रख लेते । 6 जो मर गया । वो तो गया । फ़िर क्यों लम्बे खर्चीले ठठाकर्म करते हो । 7 विवाह में एक कन्या और एक वर को आजीवन साथ निभाने का वादा करना होता है । फ़िर इसके लिये इतने लम्बे तामझाम की क्या आवश्यकता । चार लोगों के बीच वैसे ही यह शपथ ली जा सकती है । मैं विवाह मन्त्र और रीतरिवाजों की बात कर रहा हूँ । 8 शोक संदेश में लिखते हो । फ़लाना स्वर्गवासी हुआ । आपको कैसे गारंटी है । मृतक स्वर्ग ही गया ? 9 किसी बकरा के शरीर पर अल्लाह लिखा हो सकता है । 10 क्या किसी बिल्ली की जेर ( बिल्ली के प्रसव के बाद । शिशु का आवरण टायप ) तिजोरी या बक्से में रखने से धन हमेशा बना रहेगा । इस जेर की मुँहमांगी कीमत देने के लिये बङे बङे अच्छे तैयार रहते हैं । पर कहा जाता है । बिल्ली इस जेर को खा लेती है । 11 वास्तु । फ़ेंगशुई आदि का कोई बैग्यानिक आधार हो सकता है । + एक छोटा सा फ़ङ लगाने वाले से लेकर अम्बानी जैसे । मित्तल जैसे लोग भी सुबह बिजनेस की शुरूआत अगरबत्ती को भगवान के आगे घुमाकर । फ़िर अपने दुकान आदि के सामानों पर घुमाकर लगाते हैं । इनमें मैंने विदेशों में शिक्षा प्राप्त M B B S डाक्टर को भी देखा है । 12 नवजात शिशु से लेकर दो तीन साल के शिशु को कमर करधनी पहनाने का औचित्य क्या है । 13 उसके काजल का टीका माथे पर लगाने का औचित्य क्या है । 14 उसके अकारण ज्यादा रोने ( नजर लग जाने पर ) पर मिर्च आदि के धुँये से उसकी नजर उतारने का औचित्य क्या है ? घर के किसी बुजुर्ग से पूछना । 15 चलते समय छींक और बिल्ली का रास्ता काटना तो घिसी पिटी बातें हैं । 16 किसी कार्य बिजनेस आदि के शुरू करते समय धार्मिक क्रियाओं हवन । कथा । पूजा आदि का क्या महत्व है ? जबकि किसी को भी ये गारन्टी नहीं । भगवान है भी या नहीं ??
AND..कहाँ कहाँ तक गिनाऊँ । भाई आप अँधविश्वासी लोग गंगा जैसी नदी को माँ मानते हो । आपको कौन और कितना समझायेगा ?? मैं तो हार गया ।
AND..और ये थी वो पोस्ट । जिससे ये पोस्ट । पोस्ट हुयी ।.." एक बार देख ही लीजिये कि क्या आप भी अपनी नाक को अपनी जीभ से छू सकते हैं ? " PRAVEENSHAH.BLOGSPOT.COM
AND..डिस्क्लेमर:- मैंने ये देखा है । कि मेरी एक मामूली पोस्ट से लोगों के पेट में दर्द हो जाता है । इस बिना पर आप ऐसे विषय पर तमाम हालीवुड बालीबुड एनी..बुड फ़िल्मों । हैरी पाटर जैसे देशी विदेशी उपन्यासों । इस तरह के तंत्र मंत्र साहित्य के लिये फ़िर क्या कहेंगे ? क्या करेंगे ? मैंने अपनी ज्यादातर पोस्टों में परमात्मा की सरल । सहज । संत परम्परा द्वारा बतायी गयी । धर्मगृन्थों में वर्णित भक्ति अपनाने पर ही जोर दिया है । बाकी मैटर संतो आदि के सानिध्य के अनुभव । और प्राचीन साहित्य में उपलब्ध जानकारी पर सिर्फ़ हमारे आसपास के ग्यात अग्यात रोचक प्रमाणित अप्रमाणित रहस्यों पर चर्चा करना मात्र है ।
AND..और अंत में मेरी माँ की सीख...बचपन में कभी कोई गलती हो जाने पर । मैं माँ से कहता । उस लङके ने ऐसा करने को कहा था । उसने मुझे प्रेरित किया था । तब माँ कहती । वह लङका अगर कहे । कुऍ में कूद जा । तो तू कूद जायेगा । तेरी अपनी फ़ूटी हैं क्या ?... जाहिर है । हम कुछ भी करते हैं । तो हमारा कोई न कोई निजी स्वार्थ अवश्य रहता है ।

24 जनवरी 2011

महामन्त्र का मामला एकदम अलग और विलक्षण है ।

जय हो सतगुरु श्री शिवाननद जी महाराज परमहँस जी की जय हो । नमस्कार राजीव कुमार साहेब । मैं आपके ब्लाग का एक पाठक हूँ । मैंने आपके ब्लाग के आर्टीकल पढे थे । मुझे पढकर बहुत अच्छा लगा । विश्वास करें । एक बार को तो दिल हुआ था कि भागकर आपको मिलने आगरा आ जाऊँ । बट टाइम निकाल नहीं पाया । कुछ मजबूरियों की वजह से । मैं आपसे कुछ जानना चाहता हूँ । बहुत जरूरी है । मैं हरियाणा का रहने वाला हूँ । मैंने आपके आर्टीकल में पढा था । सुरति शब्द साधना के बारे में । जो आपके अनुसार महामन्त्र से की जाती है । जो ढाई अक्षर का नाम है । हरियाणा में मैं राधा स्वामी सतसंग में गया था । एन्ड वहाँ उन्होंने कहा कि सुरति शब्द योग की साधना पाँच शब्दों का नाम है । उससे की जाती है । मैंने राधा स्वामी संस्था की पुस्तक भी पढी थी । किसी दोस्त से लेकर । जो वहाँ पर नौकरी करता है । उस पुस्तक में भी अनामी पुरुष और काल पुरुष एन्ड माया आदि के बारे में लिखा हुआ था । मैं ये प्रश्न सिर्फ़ अपनी जिग्यासा हेतु पूछ रहा हूँ । ना कि आपका टेस्ट लेने हेतु । या आपको परेशान करने हेतु । क्योंकि जब तक कोई सही इंफ़ोर्मेशन नहीं होगी । सही फ़ैसला भी नहीं हो पायेगा । इसलिये राजीव कुमार साहब मेरा प्रश्न ये है कि क्या सुरति शब्द योग दो हैं ? या एक है ? क्योंकि आपके अकार्डिंग ढाई अक्षर के नाम की साधना सुरति शब्द योग की साधना है । एन्ड राधा स्वामी के अकार्डिंग पाँच शब्द के नाम की साधना सुरति शब्द योग है । कृपया आप इसके बारे में विस्तार से अपने आर्टीकल में लिखें । और इन दोनों नामों ( ढाई अक्षर वाला और पाँच शब्द वाला ) की महिमा समझायें । मेरी प्रार्थना है कि आप शान्त मन से इसके बारे में पूरा एक लेख लिखें । मेरे ख्याल से ये भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है । क्योंकि मैंने इस पाँच शब्द वाले नाम की बहुत महिमा सुनी है । मैं पहली बार आपको सम्पर्क कर रहा हूँ । ई मेल की तरफ़ से । इसलिये कृपया इस प्रश्न पर विशेष ध्यान देते हुये । इस बारे में जितनी जानकारी आप दे सके ( नियम अनुसार ) आने आने वाले लेख में जरूर दें । ये भी बता दें कि सुरति शब्द साधना या सुरति शब्द योग या आत्मग्यान साधना या ग्यान योग या सहज योग या राजयोग या सांख्ययोग या केवल्य की साधना या निर्वाण की साधना । क्या ये सब एक ही साधना के नाम हैं । जिसको मुक्ति की साधना या मोक्ष की साधना बोलते हैं । अगर कोई बात आपको मेरी ठीक न लगी हो । तो कृपया क्षमा करें । जय हो सतगुरु श्री शिवानन्द जी महाराज परमहँस जी की जय हो । ( श्री सुशील कुमार जी । हरियाणा । ई मेल से । )
मेरी बात.. सबसे पहले तो सुशील जी । काफ़ी महत्वपूर्ण और सर्वजन उपयोगी प्रश्न पूछने के लिये आपका बेहद धन्यवाद । आभार ।..अब आपके प्रश्नों का प्वाइंट टू प्वाइंट उत्तर देने की कोशिश करूँगा ।
आप आगरा या जहाँ भी मेरी या महाराज जी की उस समय उपस्थिति हो । आ सकते हैं । आपका । सबका । किसी का भी । स्वागत हैं । परन्तु कृपया पहले से पूछकर आयें । तो आपको खाली वापस लौटने की स्थिति नहीं आयेगी । क्योंकि साधु संतो की.. रमता जोगी बहता पानी.. वाली स्थिति होती है ।..लेकिन बेहतर होगा कि आने में किराया । धन । समय । परेशानी आदि को देखते हुये । इससे सस्ता और बेहतर उपाय आप महाराज जी से निसंकोच फ़ोन पर बात करके अपनी शंकाओं का समाधान कर लें । बात लम्बी हो । तो ई मेल या ब्लाग कमेंट द्वारा मुझसे पूछ सकते हैं । जब आपकी सभी शंकाओं का समाधान हो जाय । तब आपको आने का वास्तविक लाभ प्राप्त होगा । मतलब आपके भाव पूरे । श्रद्धायुक्त और स्थायी हो जाने से लाभ कई लाख गुना हो जायेगा ।..संत मिलन को चालिये । तजि माया अभिमान । ज्यों ज्यों पग आगे धरो । कोटिन यग्य समान ।
सुरति शब्द योग दो नहीं हैं । एक ही है । पर इसमें महत्वपूर्ण बात ये होती है कि जहाँ तक का पहुँचा हुआ गुरु आपको मिला है । वो वहीं तक आपको ले जा सकता है । उदाहरण के लिये ररंकार निरंकार भी सुरति शब्द योग ही हैं । पर ये राधास्वामी के पंचनामा से काफ़ी नीचे की स्थिति है । ढाई अक्षर का नाम आपके दीक्षा के शुरूआत के समय ही प्रकट होकर आपको आखीर तक ले जाता है । जबकि पंचनामा की साधना अलग तरह से होती है । और ये मुँहजबानी दिये गये नाम असल रूप में किसी विरले के ही प्रकट हो पाते हैं । हालांकि राधास्वामी मत भी कालातीत ग्यान है । और ये भी किसी सच्चे गुरु से मिल जाय । तो उसका भी बेङापार ही समझो । पर ये वो ग्यान नहीं हैं । ये वो मार्ग नहीं हैं । जिसकी चर्चा मेरे ब्लाग्स में है । यदि ऐसा होता । तो मैंने किसी न किसी स्थान पर अवश्य इसका जिक्र किया होता कि भाई राधास्वामी का पंचनामा और महामन्त्र एक ही बात है । महामन्त्र का मामला एकदम अलग और विलक्षण है ।..शबद शबद सब कोय कहे । शबद न जाने कोय । आदि शब्द जो गुप्त है । बूझे बिरला कोय ।.इसी को सरल भाषा में इस तरह कहा गया है ।..नाम नाम सब कोय कहे । नाम न जाने कोय । आदि नाम जो गुप्त है । बूझे बिरला कोय ।..पहले तो राधास्वामी मत में जो आपने लोगों की भरमार देखी होगी । वो इसी मत के अनुसार वहाँ तक भी नहीं पहुँच पाते । जो उनका मत कह रहा है ।..लेकिन किसी प्रकार कोई पहुँच भी जाय । तो यह अंतिम स्थिति नहीं है । इससे आगे बहुत कुछ है...? जहाँ पंचनामा नहीं ले जा सकता ।
लेकिन आपके प्रश्न के प्रसंग में मैं अपने सभी पाठकों को यह बता देना चाहता हूँ । कि किसी भी साधना या परमात्मा की नामभक्ति को भी हलवाई की दुकान का रसगुल्ला मत समझो । जिसको खाना आसान है । अगर किसी ने आपसे यह कहा है । कि ये मन्त्र ले लो । पंचनामा ले लो । बस हो गया काम । हो गया उद्धार ? नहीं । ऐसा हरगिज नहीं है । ऐसा कहने वाला सफ़ेद झूठ बोल रहा है ।.. ये भी एक पूरी पढाई है । चाहे राधा स्वामी हो या अन्य कोई मत । उसमें नियमानुसार साधक को पहले हँसदीक्षा दी जाती है । इस दीक्षा का ग्यान ही इक्का दुक्का लगनशील ही पास कर पाता है । हँसदीक्षा बृह्ममंडल में पहुँचाकर छोङ देती है । यानी वहाँ इसका कार्य समाप्त हो जाता है । तब जब साधक की शरीर से निकलने की स्थिति ( हँस पूरा कर लेने पर । ) बनने लगती है । फ़िर उसको आगे बङाते हुये अन्य दीक्षा दी जाती है । इसके बाद भी एक दीक्षा है । जो सब गोपनीय मैटर है । तो कहने का मतलब आप हँस पूरा कर लो । यही बहुत बङी उपलब्धि होती है ।..जैसे उसी कार्य । उसी नौकरी के अमेरिका में अच्छे पैसे मिलते हैं । ये कोई जान तो गया । पर अमेरिका में सैटल होना । बातों द्वारा जानने जैसा आसान नहीं है ।..चलिये एक मिनट के लिये मान लेते हैं । पानी पियो छान के । गुरु करो जान के । की तर्ज पर आप जान गये कि महामन्त्र ही सर्वोच्च है । और राजीव के माध्यम ( महाराज जी से ) से बात बन ही जायेगी । आप आगरा भी आ गये । नामदान मिल भी गया । सब बात ठीक से समझ में आ भी गयी । तो इससे फ़ायदा तो हुआ । लेकिन उद्धार नहीं हुआ ।..दरअसल असली बात तो अब शुरू हुयी है । अभी तक तो आपका संशय रूपी कचरा हटा है । अब आपको बहुत मेहनत करनी है । बहुत पढाई करनी है । सुरति शब्द साधना । या सुरति शब्द योग । या आत्मग्यान साधना । या सहज योग या राजयोग एक ही है । बाकी चीजें अलग हैं ।.. जिसको मुक्ति की साधना या मोक्ष की साधना बोलते हैं ?...मुक्ति अलग है । मोक्ष यानी मुक्त होना अलग है । मुक्ति द्वैत ग्यान में होती है । यानी इस कष्टमय भवसागर और 84 लाख योनियों से लम्बे समय के लिये मुक्त हो जाने को मुक्ति कहा गया है । ये चार प्रकार की होती है । मुक्त हमेशा के लिये होता है । मुक्त कालातीत ( काल की सीमा से पार । ) हो जाता है । मुक्तिवाला काल की सीमा यानी बृह्ममंडल तक ही जा पाता है ।
पाँच शब्द वाले नाम की महिमा के बारे में ..जैसा कि आप जानते ही हैं । राष्ट्रपति देश का सर्वोच्च होता है । फ़िर प्रधानमन्त्री होता है । फ़िर गृहमन्त्री । रक्षामन्त्री । मुख्यमन्त्री आदि ।..अब आप गृह .. रक्षा .. मुख्यमन्त्री आदि की कम वैल्यू नहीं समझ सकते । इनके पास भी काफ़ी पावर होती है । इसी तरह पंचनामा की महिमा वाकई बहुत है । पर वो राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री हरगिज नहीं है । इसमें कोई शक नहीं है । वो सबका बाप और इन सबका भी बाप अलग ही है । वो लाटसाहब सबसे अलग ही है । वो साहेब सबसे अनूठा अलग ही है । इसलिये मेरी बातों का सही भाव गृहण करते हुये दिन में जितनी बार याद आ जाये । साहेब..साहेब करते हुये संतो की तरह पुकारना सीख लो ।..और सबसे महत्वपूर्ण बात हरेक पाठक के लिये । उस लाटसाहब ( देखा । उससे यारी का फ़ायदा । आप में से कोई ऐसे मेरी तरह कह सकता है उससे ? ) ने नियम बना रखा है कि बिना संत । बिना गुरू के वो किसी से नहीं मिलता ।..चिंता न करें । नो प्राब्लम । मैं आपसे खुद को या अन्य किसी को भी गुरू बनाने की नहीं कह रहा । बस आप जो .. हाय .. हल्लो .. नमस्कार ..नमस्ते..प्रणाम..राम राम..राधे राधे..जय शंकर की..गुड मार्निंग..सलामवालेकुम..गाड ब्लेस यू..गुडबाय..वङक्कम जी..वेलकम..ग्लैड टु मीट यू..नाइस टु मीट यू..आदि अभिवादन करते हो । बस इसकी जगह । जय जय श्री गुरुदेव । जय गुरुदेव की । ये दो अभिवादन छोटे बङे सभी से करें । सभी को सिखायें । प्रेरित करें । अकेले में भी इसको दोहरायें । चिंता परेशानी आदि स्थितियों में बारबार रिपीट करें । इसको अपने जीवन में इस तरह उतार लें कि स्वतः ही ये आपके मुख से निकलने लगे । फ़िर अपने जीवन में इसका कमाल देखना ।.. अब इसका तकनीकी पक्ष समझो । मैं यहाँ किसी गुरू विशेष की बात नहीं कर रहा । परमात्मा जो सच्चे गुरू के रूप में । आंतरिक गुरू के रूप में । आपके अन्दर विराजमान है । उससे आपका सीधा सम्बन्ध जुङ जाता है । बाह्य गुरू । सच्चा शरीर गुरू यही तो करता है । वो आपको आपके अन्दर के गुरू से मिला देता है । अब संक्षेप में नाम यानी महामन्त्र की बात जो आपका मुख्य प्रश्न है । वास्तव में नाम या शब्द एक ही है । लेकिन इस बात को ठीक से समझने के लिये आप डीजे पर बजते हुये उस गीत की कल्पना करें । जो आपसे दो किमी ( उदाहरण के लिये इतनी दूरी मान लें । वैसे दो किमी से डीजे सुनाई नहीं देगा । ) दूर बज रहा है । जाहिर है । इतनी दूरी से अस्पष्ट ही सुनाई देगा । आप कुछ कदम उस दिशा में चले । आवाज पहले से साफ़ हुयी । फ़िर कुछ चले । और साफ़ । फ़िर..और साफ़ । इस तरह ज्यों ज्यों आप उसके नजदीक पहुँचते जाते हैं । आवाज क्लीयर होती जाती हैं । अंत में डीजे के बिलकुल पास पहुँच जाने पर सब कुछ क्लीयर हो जाता है । यही स्थिति नाम या शब्द के बारे में है । राधास्वामी आदि तमाम मत अपने अपने मंडल तक की बात करते हैं । और डीजे से आपकी दूरी की ही तरह । इस एक ही नाम की भी अलग अलग स्थितियाँ बन जाती हैं । जिसको अलग अलग खोजियों ने अपने हिसाब से कहा है । पर जहाँ सुरति शब्द में समा ही गयी । फ़िर कोई नाम नहीं बचता । यानी पंचनामा का सफ़र पूरा करने पर पता चला कि अभी भी नाम ध्वनि आगे दूर से सुनाई दे रही है । इसका मतलब बात कुछ और भी है । पर सुरति के शब्द में समा जाने के बाद सब समाप्त हो जाता है । जाप मरे..अजपा मरे..अनहद हू मर जाय । सुरति समानी शव्द में । ताको काल न खाय । राम खुदा सब कहें । नाम कोई बिरला नर पावे । है । बिन अक्षर नाम । मिले बिन दाम । सदा सुखकारी । बाई शख्स को मिले । आस जाने मारी । बहुतक मुन्डा भये । कमन्डल लये । लम्बे केश । सन्त के वेश । दृव्य हर लेत । मन्त्र दे कानन भरमावे । ऐसे गुरु मत करे । फ़न्द मत परे । मन्त्र सिखलावें । तेरो रुक जाय कन्ठ । मन्त्र काम नहि आवे । ऐसे गुरु करि भृंग । सदा रहे संग । लोक तोहि चौथा दरसावें । कोटि नाम संसार में । उनसे मुक्ति न होय । आदि नाम जो गुप्त है । बूझे बिरला कोय ।..धन्यवाद । यदि मेरी अग्यानतावश कोई बात रह गयी हो । तो आप निसंकोच पुनः पूछ सकते हैं ।

23 जनवरी 2011

असली पूजा के रहस्य ???

आईये आज आपको असली पूजा । असली भक्ति । असली इवादत के बारे में बताते हैं । जिसके सिर्फ़ चार तरीके हैं । और जिसको ग्यान मुद्रा भी कहते हैं । 1 भूचरी मुद्रा । 2 खेचरी मुद्रा । 3 अगोचरी मुद्रा । 4 उनमनी मुद्रा । आप किसी भी जाति । किसी भी धर्म । किसी भी अवस्था । किसी भी स्थिति में क्यों न हो । यदि आप इंसान है । तो भगवान । अल्लाह । रब्ब । GOD की भक्ति का यही असली एकमात्र उपाय है ।
1 भूचरी मुद्रा ।.. भूचरी मुद्रा चेतनधारा से खुद को जोङकर उसमें रमण करना होता है । यह विधि अत्यंत सरल होती है । और कई प्रकार के शारीरिक मानसिक कलेशों का शमन करती है । इसी मुद्रा को महामन्त्र के साथ रमण किया जाय । तो इसकी शक्ति करोङों गुना बङ जाती है । भू चरी का अर्थ है । जमीन पर फ़ैली हुयी । या गति करती हुयी । हँस रूपी आत्मा विषय वासना में फ़ँसकर अग्यान की भूमि पर विचरने लगी है । और इसी को सत्य मान बैठी है । भूचरी में रमण करने से असार खुद ही अलग होने लगता है । और सार गृहण होने लगता है ।..सार सार को गहि रहे थोथा देय उङाय । जैसा कि मैंने पहले भी कहा है । इन अपरिचित और रहस्यमय शब्दों पर ना जायँ । सुरति शब्द साधना के किसी भी ग्यान ध्यान में बेहद सरल क्रियायें और आनन्द ही आनन्द होता है । राम..रमैया..रमता जोगी इसी के साधक को कहा गया है । सृष्टि के कणकण में विधमान परमात्मा के आनन्दधाम जाने का पथ इसी भूचरी मुद्रा से ही जाता है ।
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आगे की बात कुछ रहस्य वाली है ।..प्रमुख मार्ग तीन हैं । दाँया मार्ग । जो सिद्धों का क्षेत्र है । बाँया मार्ग । इसमें तो आप अरबों साल से । पहले से ही जन्म जन्म से चल रहे हो । साइंस के अनुसार भी आप मष्तिष्क के बायें हिस्से का बेहद न्यूनतम उपयोग करते हो । क्योंकि शास्त्र के अनुसार जीव को अल्पग्य कहा गया है । यह काल भगवान और उसकी पत्नी माया का क्षेत्र है । इसी की भक्ति द्वैत भक्ति के अंतर्गत आती है । जिसको सही रूप से करने पर स्वर्ग और देवादि उपाधियाँ आदि प्राप्त होती हैं । इसमें चार प्रकार की मुक्ति होती है । पर जीव सही रूप में मु्क्त नहीं होता । और काल माया के जाल में फ़ँसा रहता है । ( मैं काल की पत्नी को मायावती डार्लिंग के नाम से बुलाता हूँ । समस्त जीव इसी के चंगुल में विषय वासना के हथकन्डों द्वारा फ़ँसे हुये हैं । पर यह संतों की उपस्थिति की छाया मात्र से ही अत्यंत भयभीत हो जाती है । इससे बचने का उपाय संतो का दिया ग्यान और उस पर चलकर अपने को उद्धार करना ही है । ) मध्यमार्ग । यानी दाँये बाँयें के बीच में जो सीधा मार्ग जाता है । यही संतों का मार्ग है । यही सतलोक या अमरलोक का रास्ता है । यही परमात्मा के घर जाना है । वास्तव में यही अपने घर जाना है । इस मार्ग के किसी भी सच्चे संत द्वारा ग्यान मिलने पर मायावी ( सिद्ध ) और कालमाया ( असार जीवन ) का प्रभाव छँटने लगता है ।
2 खेचरी मुद्रा ।..इस मुद्रा की सिद्ध के सबसे फ़ेमस उदाहरण अंजनी पुत्र हनुमान जी हैं । जो इसी मुद्रा की शक्ति से सैकङों योजन का सागर पार करके रावण धाम लंका गये थे । हनुमान जी ऋषियों के शाप से अपना यह ग्यान भूल गये थे । उसी शाप के अनुसार आवश्यकता पङने पर उन्हें यह ग्यान याद आ गया था । इस मुद्रा का अभ्यास मुँह के अंदर ऊपर तालू में ( पौन इंची गोल गङ्ङा सा होता है । जहाँ हड्डी नहीं होती । ) जीभ को लगाने का निरंतर अभ्यास करने से होता है । निरंतर अभ्यास से यहाँ एक छोटा सा छेद बन जाता है । जिसमें से अमीरस ( अमृतरस ) मुँह के अन्दर गिरने लगता है । तब अदभुत आनन्द की अनुभूति होती है । एक अजीव सी स्थायी शान्ति में जीव चला जाता है । आगे और अभ्यास से यह मुद्रा सिद्ध हो जाती हैं । तब साधक को कई प्रकार की अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं । भूचरी की अपेक्षा ये काफ़ी ऊँचे परिणाम देने वाली मुद्रा हैं ।..लेकिन इसमें साधक को बिना मार्गदर्शन और किसी संत का संरक्षण प्राप्त न होने पर डरावने अनुभव हो सकते हैं । अतः मेरी सलाह यही है । अत्यंत उच्चस्तर की सिद्धियाँ देने वाली इस साधना को सावधानी से और किसी संरक्षण में ही करें ।..इसी कृम में एक मिलती जुलती साधारण बात आपको बता रहा हूँ । जिसका किसी पूजा किसी साधना से कोई सम्बन्ध न होकर शरीर के रहस्यों से सम्बन्ध है । वो ये कि आप अपनी जीभ को निकालकर नाक की तरफ़ लाने का अभ्यास करें । यह काफ़ी कठिन अभ्यास है । पर निरंतर प्रयास से जीभ बङने लगेगी । जिस दिन आपकी जीभ नाक की नोक को छूने लगेगी । उस दिन आप पर किसी भी प्रकार के विष का असर नहीं होगा । जिनकी जीभ सामान्य से बङी होती है । लचकीली होती है । उनके लिये तो ये अभ्यास करना बेहद सरल होता है ।
3 अगोचरी मुद्रा ।..तुलसीदास ने कहा है ।..गो गोचर जहाँ लगि मन जायी । सो सब माया जानों भाई । अर्थात इन्द्रियाँ ( गो ) और उनके विचरने का स्थान ( गोचर ) जहाँ तक मन जाता है । वह सब माया है । तो जैसा कि इस मुद्रा के नाम से ही स्पष्ट है । अगोचरी । यानी जहाँ इन्द्रियों ( 5 ग्यान इन्द्रियाँ । 5 कर्म इन्द्रियाँ । और मन । ) का जाना नहीं हो सकता । वह अगोचर है । इसके लिये संतमत में कई दोहे हैं । जिनमें दो बेहद फ़ेमस हैं ।..आँख कान मुँह ढाँप के । नाम निरंजन लेय । अंदर के पट तब खुलें । जब बाहर के देय । तीनों बन्द लगाय कर । अनहद सुनो टंकोर । सहजो सुन्न समाधि में । नहिं सांझ नहिं भोर ।..ये मुद्रा कई तरह के नाम ध्यान में प्रयोग की जाती है । जैसे ॐ ध्यान में भी इसी को करते है । जिन्होंने बाबा रामदेव का प्रोग्राम देखा होगा । तो प्रोग्राम के लास्ट में बाबाजी कान । आँख । मुँह बन्द करके ॐ..ॐ..ॐ..ॐ का गहरा गम्भीर उच्चारण करते हैं ।..पर बाबा रामदेव के अभ्यास की जगह..जो बात में बता रहा हूँ । वो बेहद अलग और ऊँची राम स्थिति है । ॐ शरीर है । निरंजन राम है । लेकिन तरीका वही है । अंगूठे के पास वाली दोनों उंगली दोनों कानों में इतनी टाइट मगर सहनीय घुसायें । कि कान बाहरी आवाज के प्रति साउंडप्रूफ़ हो जाँय । अब बीच वाली दोनों बङी उंगली से । दोनों आँखे मूँदते हुये । थोङा ही टाइट ( ताकि दुखने न लगें । ) रखकर दबायें रहें । शेष बची दोनों उंगलियाँ । मुँह बन्द करते हुये होठों पर रखकर हल्का सा दबायें रहें । दोनों अंगूठे । गर्दन पर । या आपकी शरीर की बनाबट के अनुसार जहाँ भी सरलता से । आरामदायक स्थिति में रख जाँय । रख लें । इनके कहीं भी होने से कुछ ज्यादा अंतर नहीं होता । बस अभ्यास करते समय असुविधा और कष्ट महसूस न हो । यह ख्याल विशेष रखना है ।..अब जैसा कि बाबा रामदेव ॐ..ॐ..ॐ करते हैं । ऐसा कुछ नहीं करना । कोई जाप नहीं करना । कुछ बोलना नहीं है । कुछ विशेष नहीं करना । बस अंदर मष्तिष्क के बीचोबीच में स्वत सुनाई देने वाली आवाज को सुनते रहना है । यह बेहद आसानी से हरेक को पहली ही बार में सुनाई देगी । शुरूआत में रथ के पहियों के दौङने की घङघङाहट सुनाई देगी । यह सूर्य का रथ है । इसको काल पहिया या चक्र भी कह सकते हैं । पर एक कालचक्र दूसरा भी होता हैं । ये आवाज किसी किसी को घर की चाकी चलने से निकलने वाली आवाज जैसी भी सुनाई देती है । वास्तव में सृष्टि में पाप पुण्य वाले दो पहियों का रथ निरंतर दौङता रहता है । और जीव इन्ही दोनों पहियों से बँधा अग्यान में घिसटता रहता है । समदर्शी संत पाप पुण्य दोनों में लात मारकर इसी रथ के ऊपर बैठकर जीवन सफ़र तय करता है । इसी स्थिति के लिये कबीर ने कहा है । चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय । दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय । अर्थात जीव अपने स्वरूप को भूलकर पाप पुण्य के दो पाट वाली चाकी में अनंतकाल से पिस रहा है ।..खैर..इस रथ की आवाज के बाद आपको किसी बाग में चहकती अनेकों चिङियों की आवाज सुनाई देगी । इसके बाद निरंजन यानी राम धुनि यानी ररंकार सुनाई देगा । यही ध्वनि रूपी असली राम का नाम है । शंकर जी ने पार्वती को यही अमरकथा सुनाई थी । यह घटाकाश में निरंतर गूंज रहा है । तुलसीदास ने रामायण में संकेत रूप में इसी के अखंड पाठ की सलाह दी थी । न कि भोंपू लगाकर । रामायण को पढकर । पङोसियों के कान फ़ोङने की ।..कागभुशुंडि ने भी इसी के बारे में कहा था कि मैं निरंतर राम कथा का पान करता हूँ ।..इसके सुनते वक्त बस ये ध्यान रखना है । कि मष्तिष्क के बीचोबीच वाली आवाज ही सुनें दाँये बाँये की नहीं ।
4 उनमनी मुद्रा । मुझे बङी हैरत है कि विश्व के लाखों लोग इसका प्रतिदिन अभ्यास करने के बाबजूद इसके बारे में कुछ भी नहीं जानते । शायद इसी को कहा गया है । घर में छोरा । शहर ढिंढोरा ।..जी हाँ । यानी जो आप करते हैं । मेडीटेशन । पर ठीक से करना नहीं जानते । क्योंकि किसी ने बताया ही नहीं । जैसा बताया । वैसा करते हो । चलिये आज मैं ही बता देता हूँ । क्रिया वही । मेडीटेशन वाली । यानी भोंहो के मध्य ध्यान टिकाना । उनमनी याने संसार से उदासीनता का भाव । उन ( यानी प्रभु ) मनी ( मन लगा देना ) प्रभु से मन लगा देना । जय हो । जय हो । कितनी सुन्दर बात है ।..मेरे कहने का आशय यह है कि ध्यान के समय संसार से उदासीन होकर प्रभु से प्रेम भाव से मन को जोङना । आईये इसका भी सरल तरीका आपको बतायें । शुरूआत करते समय । खुली आँखों से कुछ देर तक नाक की नोक को देखते रहें । इससे सुरति एकाग्र होकर स्वतः ही नाक की जङ ( बिन्दी या तिलक के ठीक नीचे का स्थान । भ्रूमध्य के ठीक नीचे । ) पर पहुँच जायेगी । और आपकी आँखे आटोमेटिक बन्द होती चली जायेंगी । अपने को ढीला छोङ दें । और इसके बाद कुछ न करते हुये । जो हो रहा है । उसको होने दें । कुछ अभ्यास के बाद इसी स्थिति के बीच लेट जाने का प्रयत्न करें । इसके लिये अभ्यास गुदगुदे गद्दे पर करें । तो आरामदायक महसूस करेंगे । इसकी सही क्रिया जान लेने पर यह आंतरिक लोकों की सहज यात्रा कराती है ।
विशेष - जिस तरह बिजली का सावधानी से सही इस्तेमाल आपके जीवन को सुख सुविधा और भरपूर आनन्द देता है । लेकिन असावधानी से गम्भीर परिणाम या मौत के मुँह में पहुँचा सकता है । ठीक यही बात साधना पर लागू होती है । इसलिये मनमुखी आचरण के बजाय किसी जानकार से पहले मार्गदर्शन लेना उचित रहता है ।

21 जनवरी 2011

मौत की हंडिया ।

1981 मैं ग्यारह साल का था । और अभिभावकों की सर्विस की वजह से हम एक छोटे शहर में रह रहे थे । जहाँ दस किमी के क्षेत्र में तांत्रिकों मांत्रिकों का बेहद बोलबाला था । लेकिन उस समय मैं न तो इन बातों को ठीक से जानता था । और न ही मेरी कोई दिलचस्पी थी । लेकिन उन दिनों जो पहली घटना मेरे साथ हुयी । उसने मेरी दिलचस्पी इन बातों में स्वाभाविक ही पैदा कर दी । हुआ दरअसल ये कि मैं सुबह के समय दूध लेने और टयूशन पढने के लिये जाता था । फ़रबरी माह के शुरूआत की बात है । मैं सुबह साढे चार बजे के लगभग डोलचे में दूध लेने जा रहा था कि मेरी 32 वर्षीय पङोसन उसी गली में एकदम नंगी तेजी से चली जा रही थी । स्वाभाविक ही मेरे मुँह से निकलने वाला था कि ताई तुम नंगी क्यों हो ? और कहाँ जा रही हो ? पर जीवन में पहली बार किसी महिला को नग्न और रहस्यमय स्थिति में देखने के प्रभाव ने मेरे मुँह पर ताला जङ दिया । और मैं चुपचाप उनके पीछे पीछे खुद को छुपाता चलने लगा । गली के अंत में एक खाली अहाते में बबूल बेरी आदि के कांटेदार वृक्ष कुछ अन्य वृक्षों के साथ लगे थे । उस औरत ने लङकियों द्वारा चोटी में बाँधा जाने वाला रिबन ( पहले ज्यादातर लङकियाँ एक चोटी या दो चोटी करके रंग बिरंगे फ़ीते फ़ूल सा बनाकर बाँध लेती थी । ) और कलावा ( हिंदुओं की सत्यनारायण कथा में हाथ पर बाँधा जाने वाला । गेरुआ सफ़ेद मिक्स कलर का धागा । ) बेरी के वृक्ष में बाँध दिया । और लोटे से वृक्ष पर जल चङाकर तेजी से लगभग घर की तरफ़ वापस भागती चली गयी ।..मैंने माँ से आकर इस बात का जिक्र किया । तो वो एकदम घबरा सी गयीं । उस पङोसन को उसके आदमी ने छोङकर 15 किमी दूर शहर की एक अन्य औरत को रख लिया था । और अब उसी के पास रहता था । जिसके लिये उस लाचार पङोसन ने यह टोटका किया था । अब जैसा कि स्वाभाविक था । दो तीन दिन तक इन बातों की उस पङोसन के पीछे चर्चा होने लगी । उसी चर्चा में मैने यह सुना कि जब पानी बिलकुल नहीं बरसता । तब भी कुछ औरतें एकदम नग्न अवस्था में खेत में प्रतीकात्मक हल चलाती हैं । और नग्न युवा औरतों से प्रसन्न होने वाला । पानी बरसाने का आदेश देने वाला । इन्द्र देवता जल बरसा देता है ।..इस घटना से हुआ ये कि मुहल्ले की सभी औरतों ने अपने बच्चों को सतर्क कर दिया कि इस औरत के घर कतई न जायें । और खाने की कोई चीज या प्रसाद आदि दे । तो उसको कतई न खायें । और फ़ेंक दें । साथ ही घर आकर अवश्य बतायें ।
खैर..ये मेरे जीबन में तंत्रमंत्र से पहला परिचय था । इसके चार महीने बाद जून माह में मैं घरवालों के साथ छत पर लेटा हुआ था । रात के साढे दस बजने वाले थे । और मैं अपना प्रिय कार्य यानी आसमान के तारों को एकटक देखने में तल्लीन था कि तभी मेरी निगाह एक अदभुत चमकीली चीज पर गयी । लगभग दस ग्यारह इंच ऊँचाई वाली ये चीज जमीन से कोई 700 मीटर की ऊँचाई पर एक पक्षी की गति से उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर जा रही थी । मैंने तुरन्त अपने माता पिता को बताया । तो उन्होंने एकदम भयभीत सा होकर उस चीज को देखने से मना कर दिया । पर बेहद जिग्यासावश मैं चादरे के अंदर से छिद्र बनाकर उसे तब तक देखता रहा । जब तक वह दिखती रही । वैसे उस समय ऐसे उङते हुये प्रकाश को देखना कोई अचरज नहीं था । क्योंकि कुछ शौकीन रात के समय कंडील वाली पतंग उङाते थे । जिसका केवल प्रकाशयुक्त कंडील ही नजर आता था । पर ये पतंग या तो एक ही जगह स्थिर नजर आती थी । या कभी कभी थोङा सा लहराते समय बीस तीस फ़ुट की दूरी में ही घूमती नजर आती थी । और कभी इधर तो कभी उधर होती थी । पर ये चमकीली चीज सीधी एक दिशा में सामान्य गति से जा रही थी । रात भर मुझे इसकी जिग्यासा बनी रही । और सपने में भी वही नजर आई । पर सुबह इसका भेद खुल ही गया । क्योंकि छत पर सोये कई लोगों ने इसे देखा था । और ये उस दिन मुहल्ले में चर्चा का विषय थी ।
लोगों के अनुसार ये हंडिया थी । मौत की हंडिया । किसी तांत्रिक द्वारा । किसी व्यक्ति के लिये किया गया । मौत का तांत्रिक मांत्रिक । मारण अनुष्ठान । उनकी बातचीत से पता चला कि ये हंडिया ( एक छोटे दस इंच के घङे के समान मिट्टी का बर्तन । टेसू झांझी में झांझी जैसा पात्र । औरतों के करवाचौथ वृत में अर्क चढाने वाले पात्र करवा जैसा बर्तन । ) तांत्रिक मारण अनुष्ठान से अभिमंत्रित करके लक्ष्य की तरफ़ भेज दी जाती है । इसको तैयार करने के लिये । टारगेट व्यक्ति के सिर के बाल । वस्त्र । या उसके इस्तेमाल की कोई प्रमुख चीज । या कई चीजें । करवाने वाले व्यक्ति द्वारा तांत्रिक को मुहैया करानी होती है । फ़िर तांत्रिक एक मिट्टी । कपङे या काठ की । टारगेट की । गुङिया के साइज की मूर्ति । टारगेट के लिंग के अनुसार बनाता है । यानी स्त्री है । तो स्त्री गुङिया । पुरुष टारगेट है । तो पुरुष गुड्डा । इसके बाद टारगेट व्यक्ति के बाल । वस्त्र आदि उसके लगाकर गुङिया को मंत्र से बाँध दिया जाता है । फ़िर लक्ष्य व्यक्ति का नाम आदि हंडिया के साथ मंत्रों में अभिमंत्रित करके उस मूर्ति को मृत्यु उन्मुख करके हंडिया को मारण लक्ष्य की ओर रवाना कर दिया जाता है । तब आश्चर्यजनक रूप से ये निर्जीव हंडिया किसी पक्षी के समान सजीव होकर । मन्त्र शक्ति से उङती हुयी लक्ष्य के सामने जाकर गिर जाती है । और अनेक कारणों से ( मुँह से खून निकलना । सीने में अचानक दर्द । पेट में भयानक दर्द आदि की शिकायत होकर । ) लक्ष्य तङपता हुआ । उसी समय या एकाध दिन में दम तोङ देता है ।..उस दिन स्वाभाविक ही इस प्रकार की चर्चायें जारी रहीं । जिनमें कोई चोरी आदि कबूलवाने के लिये एक छोटी कटोरी लक्ष्य को लक्षित करके चलाई जाती हैं । ये बेहद छोटा प्रयोग होता है । जमीन पर स्वतः मंत्रशक्ति से चलती हुयी कटोरी लक्ष्य के सामने जाकर रुक जाती है ।..फ़िर उसी दिन अभिमंत्रित सरसों के दाने । किसी के बुरे के लिये प्रयोग करना ।..किसी बकरे आदि जानवर का सिर या हड्डी । किसी के दरबाजे पर लगा देना । या दरवाजे के आसपास जमीन में गाङ देना ।..किसी को मारने हेतु पुङिया पढवाकर खाने आदि में देना ।..सेही चूहे का कांटा किसी की दीवाल में घुसाकर उसके घर में कलेश करवा देना ।..किसी शराब न पीने वाले के नाम से । किसी जिन्न बसेरा । वृक्ष बबूल आदि पर । शराब का एक क्वार्टर चढाकर । शराब से नफ़रत करने वाले को भी घोर शराबी बना देना..आदि जैसी तांत्रिक क्रियाओं की जानकारी मुझे उन्ही दिनों सुनने को मिली । पर मेरी दिलचस्पी इनमें से किसी में न होकर । निर्जीब हंडिया उङ कैसे जाती है ? और निर्जीब कटोरी अपने आप चल कैसे जाती है ? इस बात में ज्यादा रहने लगी । अपने खोजी स्वभाव से मजबूर मैं इसी पर प्रयोग करने लगा । मेरे पिता पेशकार होने से फ़ील्ड में रहते थे । माँ अध्यापिका होने से निश्चित समय पर आती थी । इसलिये निश्चित होकर मैं पुरानी हंडिया और कटोरी लेकर उन्हे सुने आधार पर रंग रंगाकर औम..तङोम..कङोम आदि मंत्र बोलता हुआ । मुझ पर दादागीरी दिखाने वाले । सुनील दीपक आदि लङकों को मार डाल । कहता हुआ । हंडिया के उङने का इंतजार करता । पर उङना तो बहुत दूर । हंडिया कटोरी हिली तक नहीं ।..लेकिन इन अनोखी रहस्यमय जिग्यासाओं के कारण बीज मेरे बाल मन में पङ गये । लेकिन बाद में..आज तक किसी भी ऐसे तांत्रिक मांत्रिक से मेरा भेंटा नहीं हुआ । जो इसका जानकार हो । और इस क्रिया को मैं प्रत्यक्ष देखूँ । जबकि इससे कहीं बहुत ऊंची स्थिति के जानकार मिले । समय गुजरता गया ।..1989 की बात है । मैं किशनी के पास बेला विधूना में उन दिनों था । और लगभग 19 का हो चुका था । हमारे पास उमेश नाम का 20 साल का हट्टाकट्टा लङका रहता था । जो अपने परिवार में सबसे बङा था । उसके परिवार में दो अन्य बहनें और एक छोटा भाई था । उमेश के खानदानी लोगों से खेत की जमीन को लेकर भूमि विवाद था । और वे उसे हङपना चाहते थे । उमेश के घरवाले सभी सीधे थे । पर उमेश दादा टाइप था । और उसका हट्टेकट्टे लङकों का पूरा एक गिरोह जैसा था । जाहिर था कि उन लोगों की उमेश की वजह से दाल नहीं गलती थी । और वे उसे रास्ते से हटाना चाहते थे । तब हंडिया मेरे जीवन में दूसरी और अब तक अंतिम बार आई । ये हंडिया उमेश को लक्ष्य करके भेजी गयी थी । लेकिन सौभाग्य से उमेश बन्द दरबाजे की पीछे कमरे में था । अतः हंडिया ग्यारह फ़ुट बाहर आगे गिरकर फ़ूट गयी । इसके बाद उमेश पर इसका क्या असर हुआ ? यह तो उसके घरवालों ने किसी को बताया नहीं । पर उन्होंने शीघ्रता से इसका कोई उपाय कराया । और उसे रिश्तेदारी में अग्यात स्थान पर भेज दिया । ये अच्छी बात थी कि उमेश अंदर होने के कारण इस मारण प्रयोग से बच गया था । क्योंकि कहते हैं । इस प्रयोग की सफ़लता के लिये लक्ष्य का खुले में होना आवश्यक है । ये हंडिया भी रात आठ बजे के समीप आयी थी । और इसको तीन चार स्थानीय लोगों ने चालीस फ़ुट ऊँचाई से उतरते देखा था । पर जैसा कि निश्चित है । इन तांत्रिक चीजों से बङे से बङे दादे भी पंगा नहीं लेते । इसलिये फ़िजा में तीन चार दिन भय की तरंगे फ़ैलती रही ।


19 जनवरी 2011

दुनियाँ होशियार । मैं पागल ।

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नमस्कार राजीव जी । मैं आपको आज मैसेज करने ही वाली थी । लेकिन अभी हमारे घर कुछ गेस्ट आ गये थे । वो लोग आज वापस गये । उनकी खातिरदारी में समय का अभाव रहा । आज फ़्री होकर मैंने लास्ट डे के आपके आर्टीकल पढे । मुझे आज बङा अजीव लगा कि आप तो इतना अच्छा ( अनमोल ग्यान दे रहें हैं । )काम कर रहे हैं । और लोग ब्लाग पर गाली ( आप समझ ही गये होंगे । ) कमेंट के साथ सेंड करते हैं । आपको उल्टे पुल्टे QUISTION भी पूछते हैं । सबसे बङी हैरानी हुयी कि जो रेगुलर रीडर हैं । वो आपके आर्टीकल पढकर भी ऐसा सवाल पूछते हैं कि बङी हैरत होती है । जैसे कोई आपके आर्टीकल को पढकर ये पूछे कि राजीव जी आत्मा क्या सचमुच में होती है ? तो उससे पूछा जाय कि आप लोग आर्टीकल क्या ध्यान से नहीं पढते ? या आपको समझ में नहीं आता ? बाकी दुनियादारी में तो बहुत सयाने हो । और जो लोग धार्मिक समझते हैं । अपने आपको । क्या उनको ये फ़र्स्ट और बेसिक बात समझ में नहीं आयी कि आत्मा हम ही हैं । और ये फ़िजीकल बाडी तो आत्मा का एक क्लाथ ही है । समझ में नहीं आता कि लोग किस सोच और किस नशे में जी रहे हैं ? और रही बात उस गाली सेंड करने वालों की । तो वो गाली वाली बात मुझे भी आहत कर गयी । अगर कहीं वो बात किसी ने मेरे सामने कही होती । तो मैं सच्च्ची ( .... ) उतारकर उसके मुँह पर मार देती । और जिन लोगों को ये बातें झूठी लगती हैं । तो फ़िर इस ब्लाग पर आते क्यों हैं । उनको तो बाजार जाकर फ़िल्म देखनी चाहिये । और आइसक्रीम खानी चाहिये । ( हा हा .. ताकि दिमाग ठंडा रहे । इस मेल में ये बात मेरी तरफ़ से है । ) राजीव जी । आप ठीक काम कर रहे हैं । प्लीज करते रहिये । आप ( ....? ) की परवाह मत करें । जो ( ...? ) की तरह जीता है । बेचारा मौत भी ( ...? ) की ही मरता है । मैं तो सोचती थी ( पहले ) कि शायद ( एक जाति..) या ( ....लोग ) ही मोस्टली बेबकूफ़ हैं । पर अब पता चलता जा रहा है कि ( ..... ) लोगों में भी इसकी पूरी भरमार है । बहुत ज्यादा है । आपने ठीक कहा था कि हिन्दू अगर ऐसी बात करे । सनातन धर्म के बारे में उल्टी पुल्टी । तो सच्ची बहुत हैरत होती है । मिर्जा गालिब ने सही कहा था । बेबकूफ़ों की दुनियाँ में कमी नहीं । एक तलाश करो । हजार मिलते हैं । ( तब ) अब शायद करोङ मिल जायँ । आप मेरे मार्गदर्शक हैं । प्लीज मार्गदर्शक बने रहिये । मैं आपके साथ हूँ । धन्यवाद । शुभ दिन । ( एक संवेदनशील । भावुक ह्रदय । महिला पाठक । ई मेल से । )
मेरी बात..मुझे दरअसल गाली । भद्दी गाली आदि की कभी कोई परवाह ही नहीं रही । एक साधु जीवन वाले को गाली और आदर या प्रणाम दोनों ही परिस्थितियों से गुजरना होता है । इस सम्बन्ध में सबसे मशहूर वाकया गौतम बुद्ध जी के साथ हुआ था । वे अपने दल के साथ एक गाँव से गुजर रहे थे । तो रास्ते में खङे युवाजनों ने उनकी साधुता को ढोंगपना आदि करार देते हुये उच्चस्वर में गालियाँ दी । ताकि वे आराम से सुन सके । बुद्ध के साथ चल रहे उनके अनुयायी ( जो निरे बाबा ही नहीं । अच्छे खासे हट्टे कट्टे भी थे । ) आस्तीनें समेटते हुये आन द स्पाट ही निपटारा करने के लिये आगे बङे । किन्तु बुद्ध ने सख्ती से मना कर दिया ।..प्रभु की लीला से जब बुद्ध शान्त मुद्रा में ही आगे बङ गये । तो गालीदाता को पश्चाताप हुआ कि नाहक ही मैंने साधु को गाली दी । और आश्चर्य । साधु को कतई क्रोध नहीं आया । वह लपकता हुआ तेजी से बुद्ध के आगे पहुँचा । और बोला । महात्मन । हमने आपको इतनी गालियाँ दी । फ़िर भी आपको क्रोध नहीं आया । बुद्ध सौम्य शीतल मुस्कान के साथ बोले । प्रिय भाई । जब हम लोग पिछले गाँव से आ रहे थे । तो वहाँ के लोगों ने कहा । महाराज जी । कुछ भोजन पानी कर लें । परन्तु भूख न होने से हमने उनका भोजन स्वीकार नहीं किया । तब वह भोजन किसके पास रहा ? गालीदाता बोला । उसी के पास ।
बुद्ध फ़िर बोले । आपके शब्द हमारे किसी काम के नहीं थे । अतः हमने उन्हें स्वीकार नहीं किया । तब वे किसके पास रहे ? गालीदाता बोला । मेरे पास । बुद्ध बोले । जब हमारा कोई लेन देन ही नहीं हुआ । फ़िर क्रोध किस बात का । गालीदाता उनके पैरों पर गिर पङा । और बोला । क्षमा कर दो । महाराज । मुझसे भारी भूल हुयी ।
..लेकिन मौखिक गाली । ब्लाग कमेंट @ गाली..में काफ़ी अंतर होता है । ये गाली न सिर्फ़ नये विजिटर्स पर असर डाल सकती है । बल्कि ऐसी प्रवृति के अन्य लोगों को प्रोत्साहन भी दे सकती है । इस तरह एक गलत परम्परा ही शुरू हो जाती है । इसके रिएक्ट में मेरे द्वारा प्रकाशित पोस्ट का भी टिप्पणीकर्ता पर प्रतिकूल असर ही हुआ । और उन्होंने फ़िर से रिएक्ट पोस्ट पर कमेंट दिया ।..मूर्खानन्द..पहले पढ लिखकर समझो । तर्कशील बनो ।..बात यहीं समाप्त करने हेतु मैंने इसे डिलीट कर दिया ।
अबकी बार इस कमेंट से मुझे कोई क्षोभ नहीं हुआ । क्योंकि अबकी ये उपहार मेरे लिये था । जबकि पहले दिव्या जी के लिये । तब मैंने निंदक नियरे राखिये..की तर्ज पर । अपना आत्मवलोकन शुरू किया ।..गाली से मुझ पर कोई असर नहीं हुआ था । अतः संतों द्वारा सिखाई गयी सहिष्णुता कायम थी ।
मूर्खानन्द का खिताब बुरा नही है । अर्थ ।..मूर्खो को भी आनन्द पहुँचाने वाला । दुनियाँ की नजरों में मूर्ख होने के बाद भी आनन्द में रहने वाला । आदि । हमारे मंडल में एक पागल बाबा उर्फ़ पागलानन्द जी हैं । उन्होंने अपने बैग पर पेंटर से लिखा रखा है । पागल बाबा ।..किसी के पूछने पर हाथ जोङकर कहते हैं । भैया । दुनियाँ होशियार । मैं पागल । इसलिये अपना परिचय खुद ही लिखा रखा है ।
.. अब.. पहले पढ लिख..इन्होंने कुछ सजेस्ट नहीं किया । क्या पढूँ ? मैं खुद बता देता हूँ । क्योंकि प्रायः लोग फ़ोन पर भी ऐसा सवाल करते हैं । स्कूली शिक्षा - B A । सब्जेक्ट । हिन्दी । राजनीति शास्त्र । BOTH ENGLISH । इंटरमीडियेट । हिन्दी । मनोबिग्यान । टेक्नीकल आर्ट । उर्दू । इंगलिश । HIGH SCHOOL । हिन्दी । इंगलिश । संस्कृत । बायोलोजी । गणित । फ़िजिक्स केमिस्टी । अतिरिक्त ।.. फ़ाइन आर्ट का डिप्लोमा । कम्प्यूटर कोर्स ।..धार्मिक..चार वेद । 18 प्रमुख पुराण । अन्य पुराण भी संक्षिप्त में । 6 उपनिषद । गीता । रामचरित मानस । वाल्मीकि रामायण । सत्यार्थ प्रकाश । वेदान्त दर्शन । कबीर साहित्य । संतमत की लगभग सभी पुस्तकें आदि । इसके अलावा देश विदेश के साहित्यिक और दार्शनिक लेखकों की पुस्तकें । तंत्र मंत्र साहित्य आदि । रुचि । कार्टून फ़िल्म मेकिंग का बङा स्तर पर कार्य करने की थी । और स्वयँ सीखा भी था । इसके अलावा फ़िल्म मेकिंग की भी थी । जिसके लिये बैनर । माडर्न फ़िल्म प्रोडक्शन । के नाम से IMPA में 2012 तक के लिये रजिस्टर्ड है । जो लगभग 2002 में रजिस्टर्ड कराया था ।
 लेकिन अब ये सब विचार समाप्त हो गये । क्योंकि इन तमाम एक्टिविटीज के साथ साथ साधना में रुचि थी । जिसके लिये प्रयास और साधुओं से मिलना जुलना बना रहा । इस सबके साथ साथ साधना भी कम अधिक चलती रही । 2003 में द्वैत की एक साधना । अति उत्साह में । अपनी गलती से । उल्टी पङ गयी । और लेने के देने पङ गये । किसी भी क्षण मृत्यु की आशंका होने लगी । और निरंतर मायावी संसार में भटकते रहने की स्थिति बन गयी । सब साधना भूलकर प्रभु से निरंतर प्रार्थना करने लगा कि किसी तरह इस जंजाल से निकाल दो । तब छह महीने बाद ( संभवतः प्रभु ने सोचा । और मजा ले के देख बेटा । यानी मुझे मनमुखता का सबक सिखाया । ) मेरा श्री महाराज जी ( वर्तमान अद्वैत संत । श्री शिवानन्द जी महाराज । ) से मिलना हुआ ।
मेरे द्वारा प्रथम प्रणाम के उत्तर में जैसे ही महाराज जी ने आशीर्वाद के लिये हाथ उठाया । छह महीने से उस क्षण तक जारी सभी तिलिस्म और शक्तियाँ रफ़ूचक्कर हो गयी । भन भन करता दिमाग शीतल हो गया । तब महाराज जी ने कहा । साधना के नाम पर तुम अब तक भटकते रहे । अब सबसे बङी और सबसे सरल साधना जानों आदि..।
अब आखिरी बात..तर्कशील बनो ।..ये भी मुझे समझ में नहीं आया । संतों द्वारा प्रदत्त जिस ग्यान को ब्लाग पर पढकर बङे बङे लोगों के तर्क समाप्त हो जाते हैं । उनकी वर्षों से कुलबुला रही शंका का समाधान हो जाता है ।..और मैं धर्म के ज्यादातर मैटर को पोंगापन्थी के बजाय तथ्यात्मक और तार्किक अंदाज में ही आप लोगों के सामने रखता हूँ । जिसकी प्रशंसा और पुष्टि हजारों सुधी पाठकों ने की है । यहाँ तक कि बीच में दो महीने मेरे नेट पर अनुपस्थित रहने पर बहुत लोगों को बैचेनी रही । और तमाम मेल आये कि भाई कहाँ हो ?
ALL THE EVIDENCE SHOWS THAT GOD WAS ACTUALLY QUITE A GAMBLER . AND THE UNIVERSE IS A GREAT CASINO . WHERE DICE ARE THROWN . AND ROULETTE WHEELS SPIN ON EVERY OCCASION...STEPHEN HAWKINS .
आशा है । आगे भी आप लोगों का प्यार और प्यार भरी गालियाँ मिलती ही रहेंगी । कुछ देते ही हो भाई । लेते तो नहीं । अतः मेरा तो फ़ायदा ही फ़ायदा है ।

18 जनवरी 2011

कब्रें कब्रें सब 1 जैसी होती है

जब तक तुम सत्य को स्वीकार करते हो । तब तक वह सत्य ही नहीं रह जाता । इतनी देर लगा देते हो स्वीकार करने में । लड़ने झगड़ने में । विवाद में इतना समय गंवा देते हो कि तब तक सत्य पर बहुत धूल जम जाती है । धूल जाती है । तब तुम स्वीकार करते हो । क्योंकि तब सत्य तुम्हारे शास्त्र जैसा मालूम होने लगाता है । तुम्हारे शास्त्र पर भी धूल जमी है बहुत । जब समय की धूल जम जाती है  शास्त्रों पर । तो वह परंपरा बन जाता है । जब शास्त्र सत्य को जन्माता नहीं । सत्य
की कब्र बन जाता है । तब तुम स्वीकार करते हो । इसीलिए तुम स्वीकार करते हो । कब्रें कब्रें सब 1 जैसी होती है । क़ब्रों में तो सिर्फ नाम का ही फर्क होता है । जिंदा आदमियों में फर्क होता है । कब्र किस
की है । पत्थर पर लिखा होता है । बस इतना ही फर्क होता है । और तो कोई फर्क नहीं होता । धम्म पद । जब कब्र बन जाता है । तो गीता की कब्र । और कुरआन की कब्र । और वेद उपनिषद या बाइबल की कब्र में कुछ फर्क नहीं रह जाता है । तब तुम स्वागत करते हो । तुम पुराने का स्वागत करते हो । सत्य जब नया होता है । तब सत्य होता है ।
जितना नया होता है । उतना ही सत्य होता है । क्योंकि उतना ही ताजा
ताजा परमात्मा से आया होता है । जैसे गंगा गंगोत्री में जैसी स्वच्छ है । फिर वैसी काशी में थोड़ी ही होगी । हालांकि तुम काशी जाते हो पूजने । काशी तक तो बहुत गंदी हो चुकी । बहुत नदी नाले गिर चुके । बहुत अर्थ मिश्रित हो चुका । न जाने कितने मुर्दे बहाये जा चुके । काशी तक आते आते तो गंगा अपवित्र हो गई । कितनी ही पवित्र रही हो गंगोत्री में । जैसे वर्षा होती है । तो जब तक पानी की बूंद न जमीन नहीं छुई । तब तक वह परम शुद्ध होती है । जैसे ही जमीन छुई । कीचड़ हो गई । कीचड़ के साथ 1 हो गई । ओशो
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25 दिसम्बर 1973 वुडलैंडस अपार्टमेंट । बम्बई । भारत । पतंजलि योग सूत्र । Alfa & Omega - पतंजलि बुद्ध पुरुषों की दुनिया के आइंस्टीन हैं । वह अंतर्जगत के सबसे बड़े वैज्ञानिक हैं । वे ही प्रारम्भ हैं । वे ही अंत हैं । 5 000 वर्षों में कोई उनसे ज्यादा उन्नत नहीं हो सका । लगता है । उनसे ज्यादा उन्नत हुआ ही नहीं जा सकता । वे अंतिम वचन ही रहेगें । क्योंकि यह जोड़ ही असंभव है । वैज्ञानिक द्रष्टिकोण रखना । और आतंरिक जगत में प्रवेश करना । करीब करीब असंभव संभावना है । वे बड़ी मजबूत तर्कसंगत प्रष्ठभूमि बनाये रखते हैं । वे विश्लेषण करते हैं । विच्छेदन करते हैं । पर उनका लक्ष्य हृदय ही है । वे चाहते हैं कि तुम तर्क के द्वारा तर्क के पार चले जाओ ।
पतंजलि के योग सूत्र के पहले सूत्र " अथ योगानुशासनम " अर्थात अब योग का अनुशासन समझने का प्रयास करें । अब शब्द मन की उस अवस्था की ओर संकेत करता है कि अब तुमने सभी इच्छाओं की व्यर्थता को पूरी तरह जान लिया है । संसार का सारा पागलपन अच्छी तरह तुम्हारी समझ में आ गया है । तुम्हारा मोह भंग हो गया है । अब जीवन अर्थहीन हो गया है । भविष्य के लिए अब कुछ बचा नहीं ।
पतंजलि कहते हैं कि यदि ऐसा क्षण आ गया है । तो अब योग का अनुशासन, जिज्ञासा जब मुमुक्षा बन जाती है । 1 अभीप्सा जाग उठती हैं । आशाओं और सपनों की सारी गति समाप्त हो जाती है । तभी योग का अनुशासन प्रारम्भ होता है । अनुशासन का अर्थ है - अपने भीतर 1 व्यवस्था निर्मित करना । तुम जो हो अन्दर से विचारो की 1 भीड़ हो । योग तुम्हारे भीतर एकजुट केंद्र का निर्माण करना चाहता है । अब तुम्हें लयबद्ध होना होगा । 1 बनना होगा । और जब तक तुम स्वकेन्द्रित self centered   न हो जाओ । तुम सीख नहीं सकते । क्योंकि अनुशासन सीखने की क्षमता देता है । तो योग के अनुशासन का अर्थ है - होने की क्षमता । जानने की क्षमता । सीखने की क्षमता ।
पतंजलि कहते हैं - यदि तुम अपना शरीर हिलाये बिना मौन रहकर कुछ घंटे बैठ सकते हो । तब तुम्हारे भीतर होने की क्षमता बढ़ रही है । पर शरीर सतत चंचल है । बिना हिले डुले, बिना खुजलाये तुम बैठ ही नहीं सकते । यह सभी हिलने के बहाने हैं । अर्थात तुम शरीर के मालिक नहीं हो । आत्मस्थ नहीं हो । तुम 1 सतत कंपित ज्वरग्रस्त हलचल हो । 1 आसन पर बिना हिले डुले बैठने से शरीर गुलाम बनता है । और जितना ही शरीर तुम्हारा अनुगमन करेगा । उतना ही अधिक शक्तिपूर्ण और विराट बनेगा - तुम्हारे भीतर का अस्तित्व । स्थिर आसन केवल शारीरिक प्रशिक्षण नहीं है । गतिहीन शरीर के साथ मन भी गतिमय नहीं हो सकता । मन को गतिवान होने के लिये शरीर का सहयोग चाहिये । अंतस में केन्द्रस्थ होकर ही तुम विनम्र, ग्रहणशील बनोगे । खाली हो सकोगे । और इसी रिक्तता में गुरु अपने को तुममें उड़ेल सकता है ।
पतंजलि योगसूत्र - स्मृति के सब प्रकार से शुद्ध हो जाने पर जब वह स्मृति अपने मूल स्वरुप शून्य 0 के अर्थ में परिणत हो जाती है । तो उस अवस्था में नाम, रूप, ज्ञान तीनों ही नहीं रहते । इसे ही निवितर्क समाधि कहते है । इसमें साधक स्वयं ब्रह्मरूप ही बन जाता है । अतः उसे तत्परायण कहते हैं । इस निर्विकल्प समाधि का फल । जो कि निर्बीज समाधि है । वही वास्तव में ब्रह्म की प्राप्ति है । इसे समापत्ति कहते हैं । इस अवस्था में पहुंचे हुए पुरुष को ब्रह्मवेत्ता कहते हैं । शुद्ध ब्रह्मतत्त्व ( साक्षी ) से प्रथम मन सत्ता उपजी । उसने जब आकाश को चेता । तब आकाश हुआ । उसके उपरान्त पवन हुआ । फिर अग्नि और जल हुआ । और उसकी दृढ़ता से पृथ्वी हुई । तब चित्त शक्ति के दृढ़ संकल्प से 5 भूतों को प्राप्त हुई । और अन्तःकरण जो सूक्ष्म प्रकृति है । पृथ्वी, तेज और वायु से मिलकर भोजन में बना । उसको जब पुरुष भोजन करते हैं । तब वह परिणाम होकर वीर्य और रुधिर रूप होकर गर्भ में निवास करता है । जिससे मनुष्य उपजता है । पुरुष जन्म मात्र से वेद पढ़ने लगता है । फिर गुरु के निकट जाता । और क्रम से उसकी बुद्धि विवेक द्वारा चमत्कारवान हो जाती है । तब उसको ग्रहण और त्याग और शुभ अशुभ में विचार उपजता है । और निर्मल अन्तःकरण सहित स्थित होता है । और क्रम से सप्त भूमिका चन्द्रमा की तरह उसके चित्त में प्रकाशती हैं ।
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किसी क्षण केवल जीकर देखो - जीवन का आदर्श क्या है ? 1 युवक ने पूछा है । रात्रि घनी हो गयी है । और आकाश तारों से भरा है । हवाओं में आज सर्दी है । और शायद कोई कहता था कि कहीं ओले पड़े हैं । राह निर्जन है । और वृक्षों के तले घना अंधेरा है । और इस शांत शून्य 0 घिरी रात्रि में जीना कितना आनंदमय है । होना मात्र ही कैसा आनंद है । पर हम " मात्र जीना " नहीं चाहते हैं । हम तो किसी आदर्श के लिए जीना चाहते हैं । जीवन को साधन बनाना चाहते हैं । जो कि स्वयं साध्य है । यह आदर्श दौड़ सब विषाक्त कर देती है । यह आदर्श का तनाव सब संगीत तोड़ देता है । अकबर ने 1 बार तानसेन से पूछा था - तुम अपने गुरु जैसा क्यों नहीं गा पाते हो ? उनमें कुछ अलौकिक दिव्यता है । उत्तर में तानसेन ने कहा था - वे केवल गाते हैं । गाने के लिए गाते हैं । और मैं । मेरे गाने में उद्देश्य है । किसी क्षण केवल जीकर देखो । केवल जीओ । जीवन से लड़ो मत । छीना झपटी न करो । चुप होकर देखो । क्या होता है । जो होता है । उसे होने दो । जो है - उसे होने दो । अपनी तरफ से सब तनाव छोड़ दो । और जीवन को बहने दो । जीवन को घटित होने दो । और जो घटित होगा । मैं विश्वास दिलाता हूं - वह मुक्त कर देता है । आदर्श का भ्रम सदियों पाले गये अंधविश्वासों में से 1 है । जीवन किसी और के लिए । कुछ और के लिए नहीं । बस जीने के लिए है । जो " किसीलिए " जीता है । वह जीता ही नहीं है । जो केवल जीता है । वही जीता है । और वही उसे पा लेता है । जो कि पाने जैसा है । वही आदर्श को भी लेता है । उस युवक की ओर देखता हूं । उसके चेहरे पर 1 अदभुत शांति फैल गयी है । वह कुछ बोलता नहीं है । पर सब बोल देता है । कोई 1 घंटा मौन और शांत बैठकर वह गया है । वह बदलकर गया है । जाते समय उसने कहा है - मैं दूसरा व्यक्ति होकर जा रहा हूं ।
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जब तुम सिनेमा हाल में बैठते हो । तो हर चीज तुम्हारे सामने पर्दे पर दिखती है । रंगों का बहाव, रूप, गीत और संगीत, सब कुछ । लेकिन मजेदार बात यह है कि पर्दे पर कुछ भी नहीं है । सब कुछ तुम्हारे पीछे है । जहाँ प्रोजेक्टर लगा हुआ है । वहाँ से चीजें पर्दे पर प्रक्षेपित की जा रही हैं । और हम उन्हें पर्दे पर देख रहे हैं । जहाँ वे असल में नहीं हैं । तुम कभी भी वहाँ नहीं देखते । जहाँ वे हैं ? बल्कि तुम उनकी तरफ पीठ रखते हो । ओशो

17 जनवरी 2011

मनोज बनाम स्वप्नयोद्धा ।

बस मौला ज्‍यादा नहीं । कर इतनी औकात । सर उँचा कर कह सकूं । मैं मानुष की जात ।..
आदरणीय राजीव जी । नमस्कार । कल से मुझे मेल करने का मन कर रहा था । एक स्वप्न मैं बराबर देखता हूं । कुछ घर या बाग का दृश्य होता है । कोई चोर या बदमाश टाइप का आदमी होता है ।
या तो वह किसी को खासकर महिला को परेशान कर रहा होता है । या फिर चोरी । हत्या । कभी कभार मुझ पर भी आक्रमण करता है । मैं उससे भिड़ जाता हूं । फिर उसे भगाने या मारने के क्रम में ज़ोर से चीखता हूँ । या बोलता हूँ ।
और इसी के साथ या तो मेरी नींद भय के कारण । या पत्नी द्वारा झकझोर कर उठा दिए जाने के कारण टूटती है । कृपया इस पर प्रकाश डालें । और ये कैसे बंद होगा ? कुछ समाधान भी बताएं । श्री मनोज कुमार जी । कोलकाता । ई मेल से ।

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मेरी बात..हालांकि ये किसी भूत प्रेत का मामला नहीं है । पर अपनी छिराया या छहराया नामक पोस्ट में इससे ही मिलती जुलती स्थिति वाले एक अल्पशक्ति नगण्य से प्रेत की मैंने बात कही है । जो कतई और किसी रूप  में हानिकारक नहीं होता । कमोवेश लगभग प्रत्येक इंसान को अपनी जिंदगी में इस प्रेत का या ऐसी ही स्थिति का अनुभव होता है । जैसी कि आपने ऊपर बतायी है ।

 लेकिन उस स्थिति में दो प्रकार हो जाते हैं । 2 % लोगों के मुँह से गूँ गूँ  या इससे मिलती जुलती भयभीत होने की अस्पष्ट आवाज निकलती है । और 98 % लोगों को ये लगता है कि वो चीख चीखकर अपने  किसी परिजन को बुला रहे हैं । लेकिन वो सुन नहीं रहा । या सुन नहीं पा रहा । पर वास्तव में होता ये है कि आवाज निकल ही नहीं रही होती । इसमें एक मामला तो निसंदेह छिराया का ही होता है । और  उसकी सेम परिस्थियाँ ऐसी ही होती है । जैसी आपने ऊपर कहीं ।

बस एक बात अलग हैं । इसका एक ही दृश्य बार बार रिपीट नहीं होता । लेकिन दूसरे प्रकार में छिराया आपके पास न भी आये । तो लोग निम्नलिखित कारणों से किसी ऐसे स्थल ( जिसे नीचलोक या अंधेरे लोक कहना अधिक उचित है । ) पर पहुँच जाते हैं । जहाँ दुष्ट या  नीच आत्माओं का वास होता है ।

घबराईये नहीं । जागते की नहीं । उसी स्वप्निल अवस्था की ही बात कर रहा हूँ । इसमें क्या होता है । कि छाती पर हाथ रखने । या भारी वजन रखने । या बीमारी की वजह से रक्तप्रवाह का धीमा होना । या अधिक मोटापा होने से रक्तसंचार में बाधा । या ठीक स्थिति में न सोने पर किसी हिस्से पर दबाब पङने से रक्तप्रवाह में बाधा आना । आदि ऐसे कारण है । जिनमें रक्तवेग में रुकावट आने से शरीर की सचेतक सामान्य रक्षा प्रणाली कुछ समय के लिये निष्क्रिय हो जाती है ।

क्योंकि सिस्टम की कनेक्टविटी डिस्टर्ब हो चुकी होती है ।..इस दरम्यान ही आपको अपने सुरक्षा गार्ड के बिना रहना होता है । और चेतना शरीर के वर्जित क्षेत्रों ( जहाँ सामान्य स्थिति में नहीं जाती । ) में रक्तप्रवाह के बहाब के साथ चली जाती है । और वहाँ के लोग आपसे वैरभाव दिखाते हैं । क्योंकि आप अजनवी हैं ।

इधर आपके शरीर की पुलिस ( सामान्य रक्षा प्रणाली ) जहाँ अक्षम हो जाती  है । तब S T F ( विशेष रक्षा प्रणाली ) सक्रिय होकर खोजते हुये आपके पास पहुँच जाती है । उसको देखते ही वे लोग भाग जाते हैं । और तब आप किसी भी कारण से जाग जाते हैं । आपने अक्सर देखा होगा । इस  तरह की घटना हम अधिक से अधिक तीन चार दिन में ही भूल जाते हैं । ये माया का कार्य होता है । क्योंकि यदि घटना आपको हमेशा याद रहेगी । तो चेतना बारबार आकर्षित होकर वहीं पहुँचेगी ।..

लेकिन आपके मामले में इनमें से कोई बात नहीं हैं । आपका मामला किसी पूर्वजन्म के गहरे संस्कार से जुङा है । जो आपकी चित्रानाङी में लगभग अमिट स्याही जैसा अंकित हो गया है । क्योंकि इस व्यक्ति से किसी कारणवश आपका घोर वैरभाव रहा होगा । इसलिये नींद में जाते ही आप दोनों दुश्मन की तरह अखाङे में पहुँच जाते हैं ।

 अब मामला यह है कि आपके सोते समय वो पावरफ़ुल है । और जागते समय आप पावरफ़ुल हैं । क्योंकि आप न सोंये । तो उसका अस्तित्व भी आपको याद नहीं आयेगा । और जगी हुयी अवस्था में उसके पिताजी भी आप से तू मैं करने नहीं आ पायेंगे । लेकिन सोना भी आवश्यक है ।

अब समाधान की बात करते हैं । व्यक्तिगत तौर पर गुप्त समाधान मैंने आपको मेल से भेज ही दिया है । और आपका रिप्लाई मेल भी आ गया है । मेल में शीघ्रता की वजह से यह लिखना भूल गया कि कनेक्टिविटी आप बाहरी लोगों से शो न करें । मिसाल के तौर पर किसी से ये न कहें । कि राजीव ने ये उपाय बताया है । ये मामले गुप्त होते हैं । फ़िर उपाय इतना असरदायक नहीं रहता ।

अब..सार्वजनिक रूप से सर्वजन हिताय एक उपाय बता रहा हूँ । मैंने अक्सर कहा है । परमात्मा यानी जिसे संत लोग साहेब कहते हैं । उससे बङी कोई शक्ति नहीं है । ईश्वर । भगवान । देवी । देवता आदि महाशक्तियाँ सब उसी के अधीन हैं । और उसकी साधारण और सरल भक्ति से ( मेरा मतलब तंत्र मंत्र आदि प्रपंच । ये दरअसल भक्ति नहीं इलाज होते हैं । और अहम शक्ति को बङाना होता है । ) ज्यादा किसी भक्ति में ताकत नहीं है । और भक्ति का फ़ल भी नहीं हैं ।

 पर आप गलती कहाँ करते हो ?? आप हे भगवान । हे प्रभु । हे ईश्वर । हे राम आदि कहते हो । और उसको याद करते समय आपके दिमाग में देवी देवता आ जाते हैं । जो कि उसके बहुत छोटे कर्मचारी हैं । और नियमों से बँधे हुये हैं । अतः वे आपकी सहायता कर तो सकते हैं । पर नियम के अंतर्गत । जबकि परमात्मा पर किसी का कोई नियम लागू नहीं होता । उसके एक बन्दे ( सच्चा संत । ध्यान दें । साहेब सिफ़ारिश आदि नहीं करते । ) की दृष्टि होते ही आपके ऊपर से कठोर प्रावधान हट जाते हैं । यानी लाइलाज समस्या एकदम सरल हो जाती है । जैसे डेंगू का इलाज सिर्फ़ एक सेरिडान खाने से हो जाय ।

इसको बारीकी से समझने के लिये । तकनीकी रूप से समझने के लिये । आपकी समस्या को एक लाइन मान लेते है । जिसको या तो मिटाना हो । या फ़िर वो छोटी ( महत्वहीन ) हो जाय । यानी उसका प्रभाव कम हो जाय । मिटाना ?? मिटाने के लिये यदि आप अंतर्योग जानते हो । तो आसानी से इस लाइन को उसी तरह मिटा सकते हैं । जैसे इरेजर से मिटाते हैं । ( कंठ पर संयम करके । उसी संस्कार को जाग्रत करके । योग अग्नि से जला देते हैं । और समस्या खत्म । )

पर ये विशेष योग जनसामान्य को तो आते नहीं । अतः इससे भी प्रभावी और सरल उपाय वही है । जो मैंने ऊपर बताया । यानी परमात्मा की भक्ति । यानी वो लाइन । जिसके आगे सभी तुच्छ हैं ।

अब इसका तरीका भी जान लीजिये । अगर किसी ने संतमत वाले संतों का कभी सानिध्य किया होगा । तो वो संतजन थोङी थोङी देर में साहेब..साहेब कहते हुये याद करते रहते हैं । और कई वर्षों के अभ्यास से उनका भाव ये बन जाता है कि साहेब यानी जो सबका मालिक है । और जिसका मालिक कोई नहीं । यानी परमात्मा ।  इस तरह आपकी पुकार ( एप्लीकेशन ) सीधी । बिना किसी माध्यम के साहेब के पास पहुँचती है ।

और फ़िर क्या कहने । आप खुद ही समझदार हैं..हो गयी । तेरी बल्ले बल्ले । हो जायेगी । तेरी बल्ले बल्ले । हूँ..तुङुक तुङुक धुन..तुङुक तुङुक धुन..ना ना ना ना रे..।

धन्यवाद ।.. तू अजर अनामी वीर । भय किसकी खाता । तेरे ऊपर । कोई न दाता ।

16 जनवरी 2011

योग 1 अस्तित्वगत प्रयोग है


गुरु का अर्थ है - जिसके भीतर परमात्मा सर्वाधिक सजगता से जी रहा है । और तो कोई अर्थ नहीं है । चट्टान के भीतर ही परमात्मा है । लेकिन बिलकुल सोया हुआ । तुम्हारे भीतर भी परमात्मा है । लेकिन शराब पिया हुआ । चोर के भीतर भी परमात्मा है - लेकिन चोर । हत्यारे के भीतर भी परमात्मा है - लेकिन हत्यारा ।  गुरु का क्या मतलब है ? गुरु का इतना ही मतलब है । जिसके भीतर परमात्मा अपने शुद्धतम रूप में प्रकट है । जिसमें अग्नि शुद्धतम रूप में जल रही है । जिसमें धुआं बिलकुल नहीं है । निर्धूम अग्नि - गुरु का अर्थ है । अगर तुम्हें वहां नहीं दिखाई पड़ती - अग्नि । तो तुम्हें कहां दिखाई पड़ेगी ? जहां धुआं ही धुआं है । वहां दिखाई पड़ेगी ? जब निर्धूम अग्नि नहीं दिखाई पड़ती । तो जहां धुआं ही धुआं है । वहां तुम्हें कैसे दिखाई पड़ेगी ? वहां तो धुएं के कारण तुम्हारी आंखें बिलकुल बंद हो जाएंगी । गुरु के पास तुम्हारी आंख नहीं खुलती । तो तुम्हारी आंख पत्थरों के पास कैसे खुलेगी ? गुरु तो केवल प्रतीक है । अर्थ है । जिसने जान लिया । अगर तुम उसके पास झुको । तो तुम भी उसकी आंखों से देख सकते हो । और तुम भी उसके हृदय से धड़क सकते हो । और तुम भी उसके हाथों से परमात्मा को छू सकते हो । 1 बार तुम्हारी पहचान करवा देगा वह । फिर तो बीच से हट जाता है । फिर बीच में कोई जरूरत नहीं है । पर 1 बार तुम्हारी पहचान करवा देना जरूरी है । गुरु का इतना ही मतलब है कि परमात्मा तुम्हें अपरिचित है । उसे परिचित है । तुम भी उसे परिचित हो । परमात्मा भी उसे परिचित है । वह बीच की कड़ी बन सकता है । वह तुम्हारी मुलाकात करवा दे सकता है । वह थोड़ा परिचय बनवा दे सकता है । वह तुम दोनों को पास ला दे सकता है । 1 दफा पहचान हो गई । फिर वह हट जाता है । उसकी कोई जरूरत नहीं है फिर । लेकिन यह मत सोचो कि तुम समर्पण अस्तित्व के प्रति कर सकते हो । कर सको । तो बहुत अच्छा । वही तो है सारी शिक्षा सभी गुरुओं की कि तुम समर्पित हो जाओ । अस्तित्व के प्रति । लेकिन धोखा मत देना अपने को । कहीं यह न हो कि गुरु से बचने के लिए तुम कहो । हम तो अस्तित्व के प्रति समर्पित हैं । अस्तित्व क्या है ? वृक्ष के सामने झुकोगे ? पत्थर के सामने झुकोगे ? कहां झुकोगे ? झुकने की कला अगर तुम्हें आ जाए । तो गुरु तो केवल 1 प्रशिक्षण है । वह तुम्हें झुकना सिखा देगा । तिब्बत में जब शिष्य दीक्षित होता है । तो दिन में जितनी बार गुरु मिल जाए । उतनी बार उससे साष्टांग दंडवत करना पड़ता है । कभी कभी - हजार बार । क्योंकि जितनी बार गुरु आश्रम में शिष्य रहता है । गुरु गुजरा । फिर शिष्य मिल गया । पानी लेने जा रहे थे । बीच में गुरु मिल गया । भोजन करने गए । गुरु मिल गया । जब मिल जाए । तभी साष्टांग दंडवत । पूरे जमीन पर लेटकर । पहला काम - साष्टांग दंडवत । 1 युवक 1 तिब्बती मानेस्ट्री में रहकर मेरे पास आया । मैंने उससे पूछा -  तूने वहां क्या सीखा ? क्योंकि वह जर्मन था । और 2 साल वहां रहकर आया था । उसने कहा कि - पहले तो मैं बहुत हैरान था कि यह क्या पागलपन है । लेकिन मैंने सोचा । कुछ देर करके देख लें । फिर तो इतना मजा आने लगा । गुरु की आज्ञा थी कि जहां भी वह मिलें । उसको झुकूं । फिर धीरे धीरे जो भी आश्रम में थे । जो भी मिल जाते । साष्टांग दंडवत में इतना मजा आने लगा कि फिर मैंने फिक्र ही छोड़ दी कि क्या गुरु के लिए झुकना । जो भी मौजूद है । फिर तो मजा इतना बढ़ गया कि लेट जाना पृथ्वी पर सब छोड़कर । ऐसी शांति उतरने लगी कि कोई भी न होता । तो भी मैं लेट जाता । साष्टांग दंडवत करने लगा - वृक्षों को । पहाड़ों को । झुकने का रस लग गया । तब गुरु ने 1 दिन बुलाकर मुझे कहा । वह युवक मुझसे बोला । अब तुझे मेरी चिंता करने की जरूरत नहीं । अब तो तुझे झुकने में ही रस आने लगा । हम तो बहाना थे कि तुझे झुकने में रस आ जाए । अब तो तू किसी के भी सामने झुकने लगा है । और अब तो ऐसी भी खबर मिली है कि तू कभी कभी कोई भी नहीं होता । और तू साष्टांग दंडवत करता है । कोई है ही नहीं । और तू दंडवत कर रहा है । उस युवक ने मुझे कहा कि - बस झुकने में ऐसा मजा आने लगा - ओशो ।
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दूर आकर्षित करता है । पास विकर्षित करता है । सातवें अंबर के पार बैठा भगवान हमे लुभाता है । ह्रदय में भी प्रभु बैठें हैं । इसका हमें यकीन नहीं होता । दूर के ढोल सुहावने । इसका असर ये होता है कि हम सदा भागते ही रहते हैं । भागते ही रहते हैं । पास की वस्तुओं का आकर्षण क्यों खो जाता है - मन में । और दूर की वस्तुओं पर क्यों लट्टू हो जाता है मन । इतनी सी बात समझ में आ जाय । तो यही टर्निंग प्वाइंट बन जाता है । और इसी बात पर बदल जाती है - जिंदगी ।
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तुर्गनेव की 1 बड़ी प्रसिद्ध कथा है । 1 गांव में 1 महामूर्ख था । लोग उस पर बहुत हंसते थे । गांव का महामूर्ख । सारा गांव उस पर हंसता था । आखिर गांव में 1 फकीर आया । और उस महामूर्ख ने उस फकीर से कहा कि - और सब पर तुम्हारी कृपा होती है । मुझ पर भी करो । क्या जिंदगी भर मैं लोगों के हंसने का साधन ही बना रहूंगा ? लोग मुझे महामूर्ख समझते हैं । और मैं हूं नहीं । फकीर ने कहा - 1 काम कर । जहां भी कोई किसी ऐसी चीज की बात कर रहा हो । जिसको सिद्ध करना कठिन हो । तू विरोध में हो जाना । जैसे कोई कह रहा हो कि ईश्वर की कृपा । तू फौरन पकड़ लेना शब्द कि कहां है ईश्वर । कैसा ईश्वर ? सिद्ध करो । कोई कहता हो । चांद सुंदर है । फौरन पकड़ लेना । जबान पकड़ लेना कि क्या प्रमाण है ? मैं कहता हूं । कहां है सौंदर्य ? कैसा सौंदर्य ? कोई कहता हो । गुलाब का फूल सुंदर है । कोई कहता हो । यह स्त्री जा रही है । देखो । कितनी प्रसाद पूर्ण है । कितनी सुंदर । पकड़ लेना जबान उसकी । छोड़ना मत । जहां भी सौंदर्य की । सत्य की । शिवम की कोई चर्चा हो रही हो । तू पकड़ लेना । क्योंकि न सत्य सिद्ध होता । न सौंदर्य सिद्ध होता । न शिवम सिद्ध होता । ये चीजें सिद्ध होती ही नहीं । इनके लिए कोई प्रमाण नहीं है । और कोई जब सिद्ध नहीं कर पाएगा । तो तू 7 दिन में देखना । गांव भर तुझे पंडित मानने लगेगा । उसने । महामूर्ख तो था ही । वह उसके पीछे पड़ गया लाठी लेकर । वह गांव में घूमने लगा । उसने लोगों की बोलती बंद कर दी । उसको लोग देखकर चुप हो जाते कि कुछ मत कहो । कोई कह रहा है कि शेक्सपियर की किताब बड़ी सुंदर है । वह खड़ा हो जाता कि किसने कहा ? कोई कहता - यह चित्र देखते हो । चित्रकार ने बनाया है । कितना प्यारा । वह कहता - इसमें है क्या ? रंग पोत दिए हैं । कोई मूरख पोत दे । इसमें रखा क्या है ? इसमें तुम्हें दिखायी क्या पड़ रहा है ? उसने सारे गांव को चौकन्ना कर दिया । 7 दिन के भीतर गांव में यह अफवाह फैलने लगी कि यह आदमी महा पंडित हो गया है । महामूर्ख नहीं है । यह ज्ञानी है । हमने अब तक इसे पहचाना नहीं । वह वही का वही आदमी है । लेकिन गांव की दृष्टि उसके बाबत बदल गयी ।
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ध्यान शुद्ध रूप से 1 समझ है । यह प्रश्न केवल शांत होकर बैठ जाने का नहीं है । न यह प्रश्न मंत्र जाप करने का है । यह प्रश्न तो मन की सूक्ष्म कार्य विधि को समझने का है । यदि तुम मन की कार्य विधि को 1 बार समझ गये । तुम्हारे अंदर 1 बहुत बड़ी जागरुकता या होश का उदय होता है । जिसका मन से कोई संबंध नहीं । इस जागरुकता का उदय तुम्हारे अस्तित्व से । तुम्हारी आत्मा से । और चेतनता से होता है ।.
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योग विश्वास नहीं है । इसलिए यह कठिन है । दुष्कर है । और कई बार
तो लगता है कि बिलकुल असंभव है । योग 1 अस्तित्वगत प्रयोग है । तुम किसी विश्वास के द्वारा सत्य को नहीं पाओगे । बल्कि अपने ही अनुभव द्वारा पाओगे । अपने ही बोध द्वारा उसे उपलब्ध करोगे । और इसका अर्थ हुआ कि तुम्हें आमूल स्वप्न से स्वपांतरित होना होगा ।
तुम्हारा दृष्टिकोण । तुम्हारे जीने का ढंग । तुम्हारा मन । तुम्हारे चित्त का पूरा ढांचा । यह सब जैसा है । उसे चकनाचूर कर देना होगा । कुछ नये का सृजन करना होगा । उसी नव तत्व के साथ तुम यथार्थ के सम्पर्क मे आ सकोगे ।

क्या यही ज़िंदगी है ?

विचार की तरंगें - 1 हिटलर पैदा होता है । तो पूरी जर्मनी को अपना विचार दे देता है । और पूरे जर्मनी का आदमी समझता है कि ये मेरे विचार है । ये उसके विचार नहीं हैं । एक बहुत डाइनेमिक आदमी अपने विचारों को विकीर्ण कर रहा है । और लोगों में डाल रहा है । और लोग उसके विचारों की सिर्फ प्रतिध्‍वनियां हैं । और यह डाइनामिज्‍म इतना गंभीर और इतना गहरा है कि मोहम्‍मद को मरे हजार साल हो गए ।
जीसस को मरे 2 000  साल हो गए । क्रिश्चियन सोचता है कि मैं अपने विचार कर रहा हूं । वह 2 000 साल पहले जो आदमी छोड़ गया है - तरंगें । वे अब तक पकड़ रही हैं । महावीर या बुद्ध या कृष्‍ण, कबीर, नानक । अच्‍छे या बुरे कोई भी तरह के डाइनेमिक लोग जो छोड़ गए हैं । वह तुम्‍हें पकड़ लेता है । तैमूर लंग ने अभी भी पीछा नहीं छोड़ा है । दिया है मनुष्‍यता का । और न चंगीज खां ने पीछा छोड़ा है । न कृष्‍ण, न सुकरात, न सहजो ने, न तिलोमा । न राम, न रावण । पीछा वे छोड़ते ही नहीं । उनकी तरंगें पूरे वक्‍त होल रही है । तुम्‍हारी मनस्थिति जैसी हो । या जिस हालात में हो । वहीं तरंग को पकड़ उसमें सराबोर हो जाती है । सही मायने में तुम तुम हो ही नहीं । तुम 1 मात्र उपकरण बनकर रहे गये हो - मात्र रेडियो ।
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जागना ही अपने होने की पहली शर्त है । ध्‍यान जगाने की कला का नाम है । ध्‍यान तुम्‍हारी आंखों को खोल पहली बार तुम्‍हें ये संसार दिखाता है । सपने के सत्‍य में । जागरण के सत्‍य में क्या भेद है ?
केवल - ध्‍यान ।
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प्रेम के बिना जीवन 1 ऐसे वृक्ष के समान है । जिस पर न कोई फूल हो । न फल । सुना है । कृष्ण भोजन करने बैठे हैं । और रुक्मणि उन्हें पंखा झल रही है । अचानक वे थाली छोड्कर उठ खड़े हुए । और द्वार की तरफ भागे । रुक्मणि ने पूछा - क्या हुआ है ? कहां भागे जा रहे हैं ? लेकिन शायद उन्हें इतनी जल्दी थी कि वे उत्तर देने को भी नहीं रुके । द्वार तक गये भागते हुए । फिर द्वार पर जाकर रुक गये । थोड़ी देर में लौट आये । और भोजन करने वापस बैठ गये । रुक्मणि ने कहा - मुझे बहुत हैरानी में डाल दिया आपने । एक तो पलल की भांति उठकर भागे बीच भोजन में । और मैंने पूछा । तो उत्तर भी नहीं दिया । फिर द्वार तक जाकर वापस भी लौट आये । क्या था प्रयोजन ? 
कृष्ण ने कहा - बहुत जरूरत आ गयी थी । मेरा 1 प्यारा 1 राजधानी से गुजर रहा था । राजधानी के लोग उसे पत्थर मार रहे थे । उसके माथे से खून बह रहा था । उसका सारा शरीर लहूलुहान हो गया था । उसके कपड़े उन्होंने फाड़ डाले थे । भीड़ उसे घेरकर पत्थरों से मारे डाल रही थी । और वह खड़ा हुआ गीत गा रहा था । न वह गालियों के उत्तर दे रहा था । न वह पत्थरों के उत्तर दे रहा था । जरूरत पड़ गयी थी कि मैं जाऊं । क्योंकि वह कुछ भी नहीं कर रहा था । वह बिलकुल बेसहारा खड़ा था । मेरी एकदम जरूरत पड़ गयी ।
रुक्मणि ने पूछा - लेकिन आप द्वार तक जाकर वापस लौट आये ?
कृष्ण ने कहा - जब तक मैं द्वार तक पहुंचा । तब सब गड़बड़ हो गयी । वह आदमी बेसहारा न रहा । उसने पत्थर अपने हाथ में उठा लिये । अब वह खुद ही पत्थर का उत्तर दे रहा है । अब मेरी कोई जरूरत नहीं है । इसलिये मैं वापस लौट आया हूं । अब उस आदमी ने खुद ही अपना सहारा खोज लिया है । अब वह बेसहारा नहीं है ।
यह कहानी सच हो कि झूठ । इस कहानी के सच और झूठ होने से मुझे कोई प्रयोजन नहीं है । लेकिन 1 बात मैं अपने अनुभव से कहता हूं कि जिस दिन आदमी बेसहारा हो जाता है । उसी दिन परमात्‍मा के सारे सहारे उसे उपलब्ध हो जाते हैं । लेकिन हम इतने कमजोर हैं । हम इतने डरे हुए लोग हैं कि हम कोई न कोई सहारा पकड़े रहते हैं । और जब तक हम सहारा पकड़े रहते हैं । तब तक परमात्मा का सहारा उपलब्ध नहीं हो सकता है । स्वतंत्र हुए बिना सत्य की उपलब्धि नहीं है । और सारी जंजीरों को तोड़े बिना कोई परमात्मा के द्वार पर अंगीकार नहीं होता है ।
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क्या यही ज़िंदगी है ? या इससे भी आगे कुछ है ? क्या फायदा रोटी रोज खा लो । फिर भूख लगा लो । फिर रोटी रोज खा लो । फिर भूख लगा लो ? हर रोटी नई भूख ले आती है । हर भूख नई रोटी की मांग ले आती है । यह तो 1 वर्तुल हुआ । जिसमें हम घूमते चले जाते हैं ।  इससे सार क्या है । तुमने कभी सोचा ? 

14 जनवरी 2011

परपुरुष से संतान नियोग या संभोग ?

सर जी मैं भी आपके ब्लाग का एक रीडर हूँ । मुझे मेरे बहुत से सवालों के जवाव आपके ब्लाग से मिल गये । तो मुझे किसी से कुछ पूछने की जरूरत नहीं हुयी । लेकिन एक सवाल मेरे मन में है ? उस पर जरा प्रकाश डालिये । ये नियोग विधि क्या होती है ?? मैंने गूगल में सर्च किया । तो कुछ खास मैटर नहीं मिल पाया । सिर्फ़ इतना पढने को मिला कि नियोग विधि में औरत अपने पति के अलावा किसी दूसरे पुरुष से प्रेगनेंट हो सकती है ? जैसे किसी देवर या रिश्तेदार से ? लेकिन पति की रजामन्दी से अगर पति को कोई फ़िजीकल प्राब्लम हो । या पति मर चुका हो ? ये महाभारत में भी क्या महाराज पान्डु के मरने के बाद कुन्ती ने बच्चे नियोग विधि से पैदा किये । ( देवताओं से फ़िजीकल रिलेशन द्वारा । ) तो क्या कर्ण भी नियोग विधि से पैदा हुआ ? पान्डवों की तरह ? इस पर जरा प्रकाश डालिये । शुक्रिया ।..( विनोद त्रिपाठी  ई मेल से । )
मेरी बात - भारतीय पौराणिक इतिहास में नियोग पद्धति से पैदा होने वालों की एक लम्बी लिस्ट है । जिसमें कर्ण । युधिष्ठर । भीम । अर्जुन । नकुल । सहदेव आदि पांडव हैं । इन्ही के पिता पांडु । ताऊ धृतराष्ट्र । चाचा विदुर भी नियोग से उत्पन्न हुये थे । परशुराम जी के पिता जमदग्नि ऋषि और उनके मामा । ( भृगु ऋषि जो परशुराम के बाबा GRAND FATHER लगते थे । उनके द्वारा दी गयी खीर खाकर । औरतों द्वारा पीपल और गूलर वृक्ष के आलिंगन से हुये थे । ) भी नियोग से पैदा हुये थे ।
अयोध्या के महाराज दशरथ के चारों पुत्र राम । लक्ष्मण । भरत । शत्रुहन भी । दशरथ के रिश्ते के बहनोई । श्रंगी ऋषि द्वारा । पुत्रेष्टि यग्य में आहुति देने । और परिणाम स्वरूप चरु यानी यग्य फ़ल रूपी खीर का प्रसाद यग्य से मिलने पर । रानियों द्वारा उसको खाने पर पैदा हुये थे । ) ईसामसीह भी नियोग से उत्पन्न हुये थे । हनुमान जी भी शंकर जी और अंजनी के नियोग से उत्पन्न हुये थे । इन प्रमुख और प्रसिद्ध लोगों के अलावा नियोग से पैदा होने वालों की संख्या अच्छी खासी है ।.. यह तो रही खास या किसी भी तरह की दिव्यता से जुङे लोगों की बात । अब जैसा कि आपने लिखा है । सामान्य स्त्री पुरुषों द्वारा नियोग ? जैसे किसी पुरुष के वीर्य में यह क्षमता नहीं हैं कि वह अपनी औरत को गर्भवती कर सके ।..या वह शारीरिक रूप से इतना अशक्त है कि अपनी पत्नी से संभोग नहीं कर सकता । ऐसी स्थिति में किसी दूसरे पुरुष द्वारा नियोग कैसे होता है ? और उसकी विधि क्या है ?
..आपकी बात का उत्तर देने से पहले मुझे एक बहुत मजेदार बात याद आती है ।..एक आदमी का बाप मर गया । वो बिलकुल नहीं रोया । माँ मरी । अब भी नहीं रोया । बहन मरी । भाई मरा । फ़िर भी नहीं रोया । लेकिन बीबी मरी..तो फ़ूट फ़ूटकर रोया । लोगों को बङी हैरत हुयी । अजीब आदमी है । माँ । बाप । भाई । बहन किसी के मरने पर एक आँसू तक नहीं निकला । बीबी के मरने पर बिलख बिलखकर रो रहा है ।..तब उस आदमी ने कहा । मुझे गलत मत समझो । भाईयो । जब बाप मरा । तो बाप की उमर वाले लोगों ने कहा । चिंता न करो । हम तुम्हारे बाप के समान हैं ( यानी खुद को अनाथ मत समझो । ) माँ के मरने पर भी उस उमर की औरतों ने ऐसा ही कहा । भाई के मरने पर । बहन के मरने पर । मुझे ये भी दूसरे मिल गये ।..पर बीबी के मरने पर..किसी एक भी औरत ने यह नहीं कहा । चिंता न करो । मैं तुम्हारी बीबी के समान हूँ ?? एक चुटकले जैसी यह कहानी हमारी नियोग पद्धति के बारे में बहुत कुछ कहती है ।
हिन्दू शास्त्रों में संतान उत्पत्ति में असमर्थ लोगों के लिये कई तरह के तरीके बताये हैं । जैसे कि विधवा औरत या किसी अक्षम पुरुष की पत्नी के लिये उसके देवर या ऐसे ही किसी संबन्धी द्वारा पूरे शरीर पर घी आदि का लेपन करके । तथा उस औरत द्वारा पूरे शरीर पर पीली पडुआ मिट्टी ( जो मुल्तानी मिट्टी जैसी होती है । ) का लेप करके । इतने दिनों तक संभोग करना चाहिये । जब तक गर्भ ठहर न जाय..आदि ।..अब क्योंकि प्राचीन समय में धर्म । कर्म । पाप । पुण्य । स्वर्ग । नरक आदि का आज की अपेक्षा अधिक बोलबाला था । अधिक दबदबा था । गाय आपसे मर जाय । सजा समाज देगा ? कोई धार्मिक सामाजिक गलती हो जाय । तो भी सजा धार्मिक ठेकेदार या ऐसे ही लोग देंगे । कहने का अर्थ हमारा सामाजिक कानून धर्म पुस्तकों में लिखे नियम से संचालित हो रहा था ।..इस तरह के माहौल में । सही बात कहने वाले । मजा लेने वाले । मौके का फ़ायदा उठाने वाले । उस समय भी । किसी समय भी । आज भी ..ये तीन तरह के लोग हमेशा रहे हैं । अब क्योंकि हमारी सनातन धर्म परम्परा आदिकाल से ही ब्राह्मणों । पंडितो । क्षत्रियों । ऋषियों । मुनियों आदि के हाथ रही । यानी इन्होंने जो कह दिया । वही सत्य हो गया । पंडित जो कहे । वही पत्रा में लिखा है ।
..परन्तु एक भारी अंतर था । शुरूआत के ब्राह्मण ( सबसे ऊँचे । बृह्म का हकीकी ग्यान रखने वाले । बृह्म में स्थित । बृह्म में विचरण करने वाले । या सीधी पहुँच रखने वाले थे । ) पंडित ( उस विषय के वास्तविक विद्वान । ) आदि वस्तुस्थिति का सही ग्यान रखते थे । पर समय गुजरने के साथ साथ उस पर लीक पीटने वाले ज्यादा रह गये ।..अब क्योंकि ये लोग दिव्यगुणों ( जिसके अन्य तत्व होते हैं । साधारण इंसान 5 तत्वों के बारे में ही जानता है । जबकि कुल तत्व 32 होते हैं । ) से वाकिफ़ नहीं थे । वास्तविक नियोग का रहस्य नहीं जानते थे ? और जीव बुद्धि द्वारा यही सोच सकते थे कि स्त्री पुरुष जब तक संभोग करके वीर्य का शुक्राणु और स्त्री डिम्ब का अंडाणु नहीं मिलायेंगे । संतान पैदा नहीं होगी । यह उसी तरह का मजाकिया सवाल है कि पहले मु्र्गी हुयी या अंडा ? अगर आप कहें । मुर्गी । तो मुर्गी बिना अंडे के कहाँ से आयी ? अगर आपने कहा कि अंडा । तो बिना मुर्गी के अंडा कहाँ से आया ?..जबकि इसमें कोई बडी बात नहीं है । निसंदेह मुर्गी पहले हुयी ।
 हमारे पौराणिक इतिहास में इससे संबन्धित घटनाओं की भरमार है । क्या आपको वाल्मीकि द्वारा सीता पुत्र कुश को कुशा के तिनकों द्वारा बनाने की बात याद है ? क्या आपको बृह्मा द्वारा श्रीकृष्ण की परीक्षा लेने पर श्रीकृष्ण द्वारा एक महीने तक तमाम गोपिकाओं के डुप्लीकेट बना देने की याद है ? क्या आपको मालूम है । द्रोपदी यग्य अग्नि से पैदा हुयी ? जिसकी वजह से उसका एक नाम याग्यसेनी भी था । क्या आपको मालूम है कि मेघनाथ ने राम और उनकी सेना को भृमित करने के लिये माया सीता का निर्माण किया था ? क्या आपको मालूम है । सीताहरण से पहले ही उसका स्थान नकली सीता ले चुकी थी । कितने उदाहरण बताऊँ । शुरू में आपका बाप परमात्मा अकेला ही था । तब उसने इच्छा व्यक्त की । मैं एक से अनेक हो जाऊँ । ( ये पूर्ण अवस्था में होता है । ) बताइये । उस समय संभोग करने के लिये कौन सी औरत मौजूद थी ? जो बच्चे पैदा करती । इससे निम्न मंडलों की सृष्टि भी ऐसे ही हुयी । जिसे संकल्प सृष्टि कहते हैं । इच्छानि सृष्टि नाम की ये योग सिद्धि या उपलब्धि एक उच्चग्यान द्वारा प्राप्त होती है । जो इन दिव्यात्माओं को प्राप्त थी । पुरुष के वीर्य से निकला । एक चेतन शुक्राणु । जो स्त्री की योनि में डिम्ब से क्रिया करके संतान का निर्माण करता है । उसका निर्माण शरीर से नहीं होता । बल्कि ये चेतन तत्व स्वतः विधमान है ।
अब अदृश्य प्रकृति और चेतन के इस रहस्य को जानने वाले अपनी क्षमता अनुसार उसका मनचाहा उपयोग कर लेते हैं । जो क्रिया संतान निर्माण हेतु स्त्री के गर्भ में होती है । ( वहाँ भी तो प्रकृति ही का कार्य है । ) वही वे चेतन केन्द्रक का बाहर प्रयोग करके उस पर प्रकृति के आवश्यक मैटेरियल आवरण चढा देते हैं । और नये शरीर का जन्म हो जाता है । क्योंकि जो धर्म इतिहास द्रोपदी को भरी सभा में अपने ही घरवालों द्वारा नंगा किये जाने की बात लिखने की हिम्मत रखता है । जो राम के पिता दशरथ को संतानोत्पति में अक्षम कहने की हिम्मत रखता है । उसे फ़िर ये लिखने में क्या आपत्ति हो सकती थी ? कि व्यास ने पांडु । धृतराष्ट । विदुर की माँ के साथ संभोग करके उनको पैदा किया था ? जो इतिहास ये बता सकता है कि स्वर्ग के राजा देवराज इन्द्र ने गौतम नारी अहिल्या के साथ छल से संभोग किया था । और अहिल्या संभोग से पहले ही जान गयी थी कि उसके साथ यौन सहवास करने वाला उसका पति गौतम नहीं कोई और है । अपनी लडकी अंजनी यानी हनुमान की माँ द्वारा देख लेने पर उससे ये कहना कि अपने पिता को मत बताना ।
जो इतिहास ये सब लिखने की हिम्मत रखता है । उसे ये लिखने में क्या संकोच होगा कि कुन्ती ने देवताओं से कामभोग कर बच्चे पैदा किये । क्योंकि उसका पति अक्षम था । या पौराणिक कथाओं में औरतों के विचलित होने या कामभावना में बहक जाने के किस्से हैं नहीं क्या ? साफ़ साफ़ लिखे गयें हैं ।..तो उन्ही धर्मगृन्थों का सहारा लेकर बाद में समाज के लोगों ने दैहिक संभोग को नियोग बता दिया । क्योंकि वे कल्पना भी नहीं कर सकते थे समागम के बिना भी देह का निर्माण हो सकता है । आप उस समय की बात छोङ दें । इस समय औरतें जब पति के द्वारा बच्चा पैदा नहीं होता । तो अपनी कदर कम होने के डर से । बच्चे की अत्यधिक इच्छा से । वंश चलाने आदि की इच्छा से । बिना किसी धार्मिक क्रियाकलाप के । बिना पडुआ मिट्टी लेपन करे । उल्टे परफ़्यूम आदि से चमाचम होकर । इच्छित पुरुष के पास चली जाती हैं ।
 तो निष्कर्ष यही है कि शास्त्रों की देखादेखी । जो नियम बनाकर कि शास्त्र इसकी इजाजत देते हैं ?? स्त्री पुरुष को नियोग के नाम पर संभोग की छूट दी गयी । वो दरअसल नियोग नहीं संभोग था । संभोग है । लेकिन व्यास प्लस हस्तिनापुर की रानियों द्वारा । कुन्ती प्लस देवताओं द्वारा । श्रंगी ऋषि का यग्य चरु प्लस दशरथ की तीनों रानियाँ का वास्तव में नियोग था । जिसमें पावरफ़ुल योगी द्वारा  संकल्प शक्ति से स्त्री गर्भ में प्रतिष्ठित कर दिया जाता है । इसको असली नियोग कहते हैं । अधिक शक्ति वाले योगी को स्त्री शरीर की आवश्यकता और उसमें नौ माह तक बच्चे को पोषण देने की भी आवश्यकता नहीं होती । वह अदृश्य प्रकृति ( जो कहीं लन्दन में नहीं है । जहाँ आप बैठे हो । या कोई भी स्थान हो । उसके कण कण में ये चेतन तत्व और प्रकृति तत्व मौजूद हैं । जो आपस में निरंतर गति करते हुये संभोग सा कर रहे हैं । इसीलिये शास्त्रों में लिखा है । जड प्रकृति चेतन पुरुष से निरंतर संभोग कर रही है । ) से ही वह कार्य ले लेता है । जो स्त्री गर्भ में सम्पन्न होता है । यही श्रीकृष्ण जानते थे । यही वाल्मीकि जानते थे । यही रावण जानता था । यही मेघनाथ जानता था ।

12 जनवरी 2011

प्रेम सिद्ध नहीं होता


जीवन में जो भी श्रेष्ठ है । वह सिद्ध नहीं होता । इसलिए जो लोग सिद्ध करने में लगे हैं । उन्हें निकृष्ट से राजी होना पड़ेगा । वे श्रेष्ठ की यात्रा पर नहीं जा सकते । इसलिए नास्तिक निकृष्ट से राजी हो जाता है । श्रेष्ठ सिद्ध होता नहीं । जो सिद्ध होता नहीं । उसे वह मानता नहीं । जो सिद्ध हो सकता है । उसे वह मानता है । जो सिद्ध हो सकता है । वह स्थूल है । प्रेम सिद्ध नहीं होता । पत्थर सिद्ध हो जाता है । तुम पत्थर को इनकार करो । तो तुम्हारी खोपड़ी पर पत्थर मारा जा सकता है । पता चल जाएगा कि है या नहीं । लेकिन तुम प्रेमे को इनकार करो । तो तुम्हारी खोपड़ी पर प्रेम तो मारा नहीं जा सकता । उसकी तो कोई चोट न लगेगी ।
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अगर उपनिषद परम ज्ञानियों के वचन हैं । तो परम ज्ञानी बोले । नहीं तो उपनिषद लिखते कैसे ? अगर परम ज्ञानी बोलते नहीं हैं । तो उपनिषद जिन्होंने लिखे । वे परम ज्ञानी नहीं थे । साक्रेटीज कहता है कि - बोलता नहीं ज्ञानी । लेकिन यह तो कम से कम बोलना पड़ता है । इतना तो बोलना पड़ता है कि ज्ञानी मौन रहते हैं । यह कौन बोलता है ? यह कौन कहता है ? ये अपूर्व उपनिषद किसने लिखे हैं । और उपनिषद में लिखा है कि - जो बोलता । वह जानता नहीं । और जो जानता । वह बोलता नहीं । तो हम उपनिषद के ऋषियों के संबंध में क्या सोचेंगे ? ये जानते थे कि नहीं जानते थे ?
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सारे संतों ने कहा है कि श्रेष्ठ को जानना हो । तो श्रद्धा द्वार है । संदेह से तो श्रेष्ठ के द्वार बंद हो जाते हैं । जहाँ संदेह है । फिर तुमने तय कर लिया कि तुम क्षुद्र के जगत में ही जीओगे । तुमने विराट का द्वार बंद कर दिया ।
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तुम नदी के किनारे खड़े हो । नदी बह रही है । तुम प्यासे हो । तुम झुकों न । अंजुली न बनाओ । तो प्यासे के प्यासे रह जाओगे । नदी तुम्हारे ओंठों तक आने से रही । तुम्हें झुकना होगा । तुम्हें हाथ की अंजुली बनानी होगी । तुम्हें जल भरना होगा । तो नदी तुम्हारी तृप्ति करने को तैयार है ।
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बुद्ध ने कहा है - बुद्ध पुरुष इशारा करते हैं । चलना तो तुम्हें पड़ता है । पहुंचना तुम्हें पड़ता है । झेन फकीर कहते हैं - हम अंगुली बताते हैं चांद की तरफ । कृपा करके अंगुली मत पकड़ लेना । अंगुली में चाद नहीं है । लेकिन अंगुली चाद की तरफ इशारा तो कर सकती है । अंगुली में चांद नहीं है । जाना । लेकिन अंगुली इशारा कर सकती है । मगर आदमी बेईमान है । बड़ी तरकीबें हो सकती हैं ।
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जिस दिन आदमी बेसहारा हो जाता है । उसी दिन परमात्‍मा के सारे सहारे उसे उपलब्ध हो जाते हैं ।
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अगर लोग भले हों । तो करने में लाभ है । शायद जितने लोग आज विकृत हैं । उतने विकृत नहीं थे । इसलिए कि शायद 100 आदमी सुनते । तो एकाध लाल बुझक्कड़ हो जाता था । 99 को तो हिम्मत बढ़ती थी । 99 को तो लगता था । अगर इसको हो गया । तो हमें भी हो सकता है । अब हम लगें जोर से । अगर सारि पुत्र को हो गया । तो हमें क्यों न होगा ? 99 को तो इससे प्रेरणा मिलती थी । इसलिए घोषणा की । 99 को तो बल मिलता था । आश्वासन बढ़ता था । श्रद्धा बढ़ती थी कि हो सकता है ।
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ध्यान के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है । या जो भी मार्ग है । वे ध्यान के ही रूप हैं । प्रार्थना भी ध्यान है । पूजा भी । उपासना भी । योग भी - ध्यान है । सांख्य भी । ज्ञान भी - ध्यान है । भक्ति भी । कर्म भी - ध्यान है । संन्यास भी । ध्यान का अर्थ है - चित्त की मौन, निर्विकार, शुद्धावस्था । कैसे पाते हो इस अवस्था को ? यह महत्वपूर्ण नहीं है । बस पा लो । यही महत्वपूर्ण है । किस चिकित्सा पद्धति से स्वस्थ होते हो ? यह गौण है । बस स्वस्थ हो जाओ । यही महत्वपूर्ण है ।
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1 दुनिया में बड़ी सरल बात है । उसे खयाल में रखना । कोई आदमी कह रहा है - गुलाब का फूल बड़ा सुंदर है । इसे सिद्ध करना बहुत कठिन है कि गुलाब का फूल सुंदर है । कैसे सिद्ध करोगे ? तुम भी राजी हो जाते हो । यह बात दूसरी है । लेकिन अगर तुम कह दो कि नहीं । मैं राजी नहीं होता । प्रमाण दो कि गुलाब का फूल सुंदर क्यों है । क्यों सुंदर है ? किस कारण सुंदर है ? तो वह जो कह रहा था गुलाब का फूल सुंदर है । मुश्किल में पड़ जाएगा ।
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भक्ति का अर्थ है - प्यार । जैसे कोई राजा सागर से पार होने के लिए पुल बांध देता है । जिससे प्रत्येक प्राणी सहज से ही पार हो जाता है । इसलिए भक्ति मार्ग ही सुगम और अच्छा है ।

10 जनवरी 2011

BECAUSE..NOW..ALL IS NOT WELL..?? पहला भाग ।


ये किन्हीं । पंडित धर्मप्रकाश शर्मा । जी का लिखा हुआ लेख है । और जिसका ब्लागर और अब शायद ईसाई धर्म अपना चुके RAKESH LAL जी जबरदस्त ( मगर असफ़ल रहने वाली व्यर्थ ) प्रचार करने की कोशिश कर रहें हैं । ये लेख मेरे ब्लाग पर कमेंट रूप में काफ़ी पहले पोस्ट हुआ था । पर तब मैं बहुत बिजी था । बाद में मैंने इस लेख को देखा और पाया कि इन दोनों सज्जनों का ये रवैया है कि..हम तो डूबे ही हैं सनम । तुम्हें भी ले डूबेंगे । इसी तरह की व्यर्थ और नापाक कोशिश । कुछ मुसलमान ब्लागरों द्वारा की जा रही हैं । जिसमें वे व्यर्थ ही इस्लाम को सर्वोच्च और कथित हिंदू धर्म ( जो वास्तव में सनातन धर्म हैं । ) को नीचा साबित करने की असफ़ल और उबाऊ चेष्टा कर रहें हैं । ये सिलसिला पिछले काफ़ी समय से चल रहा है । और इक्का दुक्का हिंदू ब्लागर्स को छोडकर किसी के पास इसका माकूल जबाब नहीं है । या उन्होंने देने की कोशिश नहीं की ?? उल्टे कुछ लोग इनके गलबहियां डालकर हांजी..हांजी करते नजर आये । तो देखिये । ये लेख किस तरह से भृम वाला है । और वास्तव में सत्यता क्या है ? इसका बिंदुवार विश्लेषण । अंग्रेजी शब्द P से लेख की बात है । और MY REACT..से मेरा दृष्टिकोण । पढिये । और विचार करिये । सच क्या है ???
RAKESH LAL । पोस्ट । श्री राजेश जी का संशय । पर ।
P..खोजयात्रा निरन्तर चल रही है ? लेकिन कब तक ? कब तक ? MY REACT..यहां शायद आपका मतलब है कि जिन्होंने ईसाई धर्म को मान लिया । उनकी खोज समाप्त हो गयी । वो परमात्मा को जानने लगे ?? )
P..ऐसी तिमिरगृस्त ( अंधेरे से जकडी ) स्थिति में भी युगान्तर पूर्व विस्तीर्ण ( फ़ैले ) आकाश के पूर्वी क्षितिज पर एक रजत रेखा ( चांदी जैसा चमकीला प्रकाश ) का दर्शन होता है । विश्व इतिहास साक्षी है कि लगभग 2000 वर्ष पूर्व । ऐसे समय जबकि सभी प्रमुख धार्मिक दर्शन अपने शिखर पर पहुंच चुके थे ?? यूनानी । सांख्य । वेदान्त । योग । यहूदी । जैन । बौद्ध । फारसी तथा अन्य सभी दर्शन ?? और उनका सूर्य ढलने भी लगा था ??
MY REACT..अपनी ही बात पर ध्यान दें । सभी धर्म अपने शिखर पर पहुंच चुके थे । इसका क्या मतलब हुआ ? यानी धार्मिक उत्थान अपने चरम पर था ।..और फ़िर उनका सूर्य ढलने भी लगा ?? शर्माजी । ध्यान दें । यह आपकी समझ वाली धरती का सूर्य नहीं हैं । जो आपकी समझ से कभी ऊंचा और कभी नीचा होता है ? अगर आप थोडी भी साइंस की नालेज रखते होंगे । तो सूर्य तो अपनी जगह ही है । केवल प्रथ्वी के घूमने आदि से आपको यह भृम होता है ।.. अब जिस तरह प्रथ्वी के घूमने से आप लोगों को लगता है कि सूर्य उदय हो गया । सूर्य अस्त हो गया । जबकि प्रथ्वी घूम गयी । उसी तरह धर्म का सूर्य न उदय होता है । न अस्त होता है । वो अपनी जगह लगातार चमक रहा है । हां सूर्य को ठीक से न देखने वाले कभी अन्धे हो जाते हैं । और कभी उनकी निगाह कमजोर हो जाती है । तब इसमें सूर्य का दोष नहीं है ?? या कुछ है ??
P..मानवता आत्मिक क्षितिज पर बुझी जा रही थी ?? MY REACT..आप लोग इतनी सालों से मानवता को जलाने की कोशिश कर रहे हो । क्या हुआ ?? थोडा धुंआ वुंआ निकला या नहीं ?? पहले आप अपने समुदाय में जो मानने वाले हैं । उन्हीं को हर तरह से सुखी करके दिखाईये ?? फ़िर आपको यीशु की फ़िल्मी पब्लिसिटी नहीं करनी होगी । हरेक कोई वैसे ही ईसाई मत को अपना लेगा । जिस तरह कट्टर इस्लामी विचारधारा ( जिसके अनुसार टीवी । सिनेमा । आधुनिक वस्त्र । और उर्दू और कुरआन के अलावा । कोई भाषा न पढना । न दूसरे धर्म के विचार जानना । आदि । ) के बाबजूद आज तमाम शिक्षित और खुले दिमाग मुसलमानों ने अपने ही धर्म के नियमों को ध्वस्त कर दिया । और सुख सुविधा वाली इन चीजों को अन्य लोगों की तरह अपना लिया । तमाम तरह की पोंगापंथी पर ( जो वास्तव में धर्म की नहीं हैं । बल्कि ढोंगियों द्वारा बनाई गयी है । ) आज पढे लिखे हिंदुओं ने जोरदार लात मार दी ।..आप यहां के लोगों को बाइबिल पढा रहे हो । खुद बडी संख्या में ऐसे ईसाई लोग हैं । जो ईसामसीह से जुडी तमाम बातों को बेबुनियाद मानते हैं । आपके भ्रामक प्रचार से अगर लोगों का भला हो सकता है । तो पहले विश्व के तमाम ईसाई परिवारों को आदर्श और विश्व में सर्वोच्च बनाकर दिखाईये ।
P..तब परमेश्वर पिता ने स्वयं को प्रभु यीशू ख्रीष्ट में देहधारी करके पूर्णवतार लिया ??
MY REACT..खुद ईसामसीह अपने आपको परमेश्वर का पुत्र कहते थे । और आप कह रहे हो । स्वय़ं परमेश्वर ने ही पूर्ण अवतार ?? लिया । यदि ऐसा होता । तो ईसामसीह कभी अपने आपको परमेश्वर पुत्र नहीं कहते । और पंडित जी । लगता है । आपने ईसामसीह के जिक्र के अलावा । बाकी हिंदू धर्मगृन्थों के अन्य मैटर को न तो पढा । और न ही उसे जानने समझने की कोशिश ही की ? बडा थू..थू वाली बात है , ये कि एक पंडित पूर्ण अवतार ?? का मतलब नहीं समझता । धार्मिक इतिहास में पूर्ण अवतार ?? सिर्फ़ और सिर्फ़ भगवान श्रीकृष्ण का ही हुआ है । उसी क्रम का । और उसी महा आत्मा का अगला अवतार । राम अवतार भी तो पूर्ण अवतार नहीं था ? ईसामसीह सिर्फ़ एक ठीक और औसत स्तर के संत थे । और इसी स्तर के मुहम्मद साहब थे । लेकिन ये लोग भारत के संतो की तुलना में इतने पापुलर क्यों हुये ?? इसका एक जबाब हिंदुस्तानी कहावत के अनुसार है । अंधों में काना राजा ।..भारत में अध्यात्म और आत्मिक ग्यान के संतो के नाम पर इतनी लम्बी लिस्ट बन जायेगी । कि दस गृन्थ तो संत डायरेक्टरी से ही बन जायेंगे । इसलिये जहां लाखों होते हैं । वहां उनका विशेष महत्व नहीं होता । और जहां पर अनोखी बात कहने वाला कोई एक ही होता है । वो भगवान बन ही जाता है । ईसामसीह और मुहम्मद साहब की यही कहानी है । मैं आगरा के ताजमहल का उदाहरण देता हूं । प्रतिदिन स्पेशली इसको देश विदेश से देखने लोग आते हैं । लेकिन किसी आगरावासी के लिये ये एकदम बेमजा है ( उनकी तुलना में बता रहा हूं । ) । सच कोई मेहमान आकर । बेहद उत्सुकता से कहता है । वाह ताज । देखने चलो । मेरे साथ आज । तब आगरावासी मन में सोचता है । कहां यार । पद्दी ( फ़ालतू की भागदौड ) कराने आ गया ?? ताज का क्या देखने जाना ? रोज निकलते बैठते उसको वहीं खडा देख देखकर बोर हो गये । हां ये पेरिस घूमने चला जाय । तो इसको देखने में कुछ मजा भी आय ?? तो यही बात है । अन्य देशों में । अन्य धर्मों में । बेहद गिने चुने संत हुये । पर भारत में तो संतो ( अच्छे की भी । ) भरमार रही है । यहां में एक बात बता दूं । पिछले दो सौ साल में ही भारत में इतने उच्च लेवल के संत हुये हैं कि बृह्मा । विष्णु । महेश जैसे भी उन्हें झुककर प्रणाम करते हैं । पांच सौ साल पहले तो तीन लोक से परे पहुंच वाले चौथे और सतलोक के संतो की भरमार थी । इस भारत भूमि पर । जिसमें कबीर । रैदास । मीरा मन्डली आदि प्रमुख थे ।
P..वह इसलिये प्रकट हुआ । ताकि मानव जाति के कर्मदण्ड तथा मृत्युबन्धन को उठाकर क्रूस की यज्ञस्थली पर अपने बलिदान के द्वारा स्वयं भोग ले ?
MY REACT..और ये याद लगभग तीन अरब वर्ष पहले बनी प्रथ्वी पर उसे सिर्फ़ 2000 साल पहले ही आयी । इससे पहले वो सो रहा था , क्या ?? 2000 साल पहले ही आदमी परेशान था । कर्मदण्ड और मृत्यु बन्धन झेल रहा था ।..और शायद आज भी नहीं झेल रहा ? न उसे कोई परेशानी है ?? इसीलिये तो ईसामसीह यहां से निश्चिंत होकर चले गये । मुहम्मद साहब चले गये । BECAUSE NOW ALL IS WELL..?? आंखो का मोतियाबिंद ठीक करवाओ । जाने कितने संत जीवों को चेताने पहले आ चुके हैं । कितने आने वाले हैं । कितने आते रहेंगे ?? बेहद..बेहद..तुम्हारी कल्पना से बेहद बडा मंत्रिमंडल है उसका ? अगर सोचने में अक्ल लगायी होती । तो इतना छोटा मंत्रिमंडल तो भारतीय प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी का भी नहीं है । जिसमें काम का और योग्य आदमी एक दो ही हो । फ़िर वो तो परमात्मा का मंत्रालय है ?? हा हा हा ।..अब दूसरी बात । कर्म करो तुम । और कर्मदन्ड भोगे भगवान । ( तब ये कर्मदन्ड देने वाला कौन है ? किसका बनाया नियम है ये ?? ) मरने का जीव भाव पालो तुम । और मरे भगवान ? ठेका ले रखा है । उसने तुम्हारा । पाप कर लो..। फ़िर कनफ़ेस कर लो । मजा करने का अच्छा फ़ार्मूला खोजा आपने । ये तो हद कर दी आपने ?? अरे वो ऐसे ढंग से । और वो भी अदृश्य लाठी से ऐसे मारता है कि सब अक्ल ठिकाने आ जायेगी ? वो अपने नियम में रत्ती भर रियायत बर्दाश्त नहीं करता ।..तभी उसके डर के मारे चांद । सूरज । तारे । प्रकृति आदि नियम से बिना नागा किये अपना काम कर रहे हैं । और बिना आधार के लटके हुये हैं । सिर ऊपर उठाकर अभी देखो । इस टाइम भी लटके हैं..बेचारे ?
P.. उसने ऋग्वेद के त्राता तथा । पितृतमः पितृगा । सारे पिताओं से भी श्रेष्ठ त्राणदाता परमपिता के सम्बोधन को स्वयं मानव देह मे अवतरण लेकर हमारे लिये नियुक्त पापजन्य मृत्यु को सहते हुए पूरा किया ?? MY REACT..ओह । ओह माय गाड । तभी मैं सोचूं कि ईसामसीह के मरने के बाद । आज तक धरती पर कोई मरा क्यों नहीं ? आज पता चला । सबके बदले । अकेले ईसामसीह पहले ही मर चुके थे । अब इसका नाम भी मृत्युलोक से बदलकर अमरलोक और रख दो आप ।..और आपका बस चले तो ऐसा कर भी दोगे आप ??..परम स्वतंत्र न सिर पर कोई । भावहि मनहि करहु तुम सोई । तुलसी बाबा ने आपके लिये ही लिखा था । आज पता चला ??
P..मोक्षदाता । प्रभु यीशू ख्राष्टः । निष्कलंक पूर्णवतार ?? MY REACT..पहले आप मुझे ये बताओ । मोक्ष क्या होता है ? कैसे होता है ? और आप यीशु या मुहम्मद को मोक्षदाता किस आधार पर कहते हो ? 2..प्रभु शब्द की क्या परिभाषा है । प्रभु है कौन ? आप क्या जानते हैं प्रभु के वारे में ?? 3..पूर्ण अवतार छोडो..? अंश अवतार के बारे में तक नहीं मालूम होगा आपको । कि अवतार क्या बला होती है ??
P..हमारे भारत देश आर्यावृत का । जनजन और कणकण अपने सृजनहार जीवित परमेश्वर का भूखा
प्यासा है ??
MY REACT..और विश्व के बाकी देश परमेश्वर को खा पीकर ऐसे त्रप्त हो गये कि उन्हें खट्टी डकारें आ रहीं हैं । तभी विदेशियों को गैस और ऐसीडिटी की समस्या ज्यादा होती है ??
P..वैदिक प्रार्थनायें तथा उपनिषदों की ऋचाएं । उसी पुरुषोत्तम पतित पावन को पुकारती रही है ??
MY REACT..किसे ? ईसामसीह को ? या मुहम्मद साहब को ? आप ईसामसीह को बताते हो ? मुसलमान घुमाकर मुहम्मद साहब को बताते हैं ।..हिंदूओं को बडा कनफ़्यूज कर दिया आप दोनों ने.. कि वे अपनी गौरवशाली सनातन परम्परा छोडकर इसलाम अपनायें..या क्रिश्चियन बन जांय ? पहले आप लोग आपस में ठीक फ़ैसला कर लो । तब मूढमति हिंदुओं को जो बनाओगे । बन ही जायेंगे ।..OH GOD..इस ख्याल को ख्यालीपुलाव भी तो नहीं कह सकता । दरअसल पुलाव की भी कोई इज्जत होती है यार ??
P..पृथ्वी पर छाये संकटो को मिटाने हेतु बहुतेरे महापुरुष । भविष्यवक्ता । सन्त । महन्त । या राजा महाराजा जन्मे । MY REACT..पर आज तक संकट मिटा कोई नहीं पाया । यूपी में एक कहावत है ।..कोई कितनी ही कोशिश कर ले । पर ये दुनियां न पहले कभी सुधरी थी । न आगे सुधरेगी ?? या सुधार दोगे । आप लोग ?? दूसरी कहावत है..पंचो का फ़ैसला सिर माथे । पर परनाला वहीं गिरेगा । ( अब इसका मतलब आप खुद निकाल लो ? )
P..लेकिन पाप के अमिट मृत्युदंश से छुटकारा दिलाकर । पूरा पूरा उद्धार देने वाले निष्कलंक पूर्णवतार प्रेमी परमेश्वर की इस धरती के हर कोने में प्रतीक्षा थी ?? MY REACT..ओह यस..तभी उन प्रतीक्षारत लोगों ने न सिर्फ़ आपके परमेश्वर ईसामसीह की खटिया खडी कर दी । और बाद में उन्हें क्रूस पर भी लटका दिया ।..दस बारह साथियों के साथ बडी मुश्किल से खुद को बचा पाये ।.. भगवान जी । परमेश्वर जी । ईसामसीह जी ।
P..तब अन्धकार मे डूबी एक रात के आंचल से भोर का सितारा उदय हुआ । MY REACT..अच्छा और आजकल भोर का सितारा दिन के आंचल से निकलता है ? मेरी निगाह वाकई कमजोर हो गयी । चश्मा टेस्ट कराना होगा । भाई अब ??
P..स्वयं अनादि और अनन्त परमेश्वर ने ?? प्रथम और अन्तिम बार ?? पाप में जकड़ी ?? असहाय मानवता ?? के प्रति प्रेम में विवश होकर पूर्णवतार लिया ?? जिसकी प्रतीक्षा प्रकृति एवं प्राणीमात्र को थी ?? MY REACT.. बडा अन्यायी है । भाई । आपका ये परमेश्वर । उस समय आ गया । अभी ईसाई चिल्ला रहे हैं । मुसलमान । हिंदू । सिख । ALL TO ALL सब परेशान हैं । रो रहे हैं । चिल्ला रहे हैं । अभी नहीं आता ? अब प्रेम नहीं करता । वो किसी को ।..और बताओ । आप कह रहे हो । प्रथम और अन्तिम बार ?? आपने तो FUL STOP ही लगा दिया । भगवान जी के नीचे आने पर ??..वैसे मैं आपको एक बात बता दूं कि थोडे समय बाद एक कल्कि भगवान जी । उडीसा के शंभल गांव में आने वाले हैं ??..आप तर्क दे सकते हो कि उडीसा का शम्भल गांव कहां और कौन सा है ?? मैं आपसे एक प्रश्न करता हूं । आप मुझे बताओ । अभी बम्बई कहां है ? मद्रास कहां है ?..स्व काशीराम की प्यारी धर्मबहन । और अब पूरे भारत की बहनजी ने जो शहर के शहर नाम के स्तर पर गायब कर दिये । वे सब कहां है ?? जैसे बूढी बम्बई की जगह नयी हसीना मुम्बई आ गयी । चेन्नई आ गया ।..माधुरी दीक्षित की जगह..कटरीना आ गयी । राजकपूर आदि की जगह अक्षय कुमार आ गये । वैसे ही समय आने पर ये शंभल भी आ जायेगा । बस कल्कि भगवान और शंभल दोनों के पासपोर्ट वीजा आदि डाक्यूमेंट पर भगवान के आफ़िस में कार्य चल रहा है । इसलिये जब तक उनका हवाई जहाज । मृत्युलोक हवाई अड्डे । पर लेन्ड करे । तब तक इंतजार करिये ।
P..वैदिक ग्रन्थों का उपास्य । वाग वै बृह्म । अर्थात वचन ही परमेश्वर है । ( बृहदारण्यक उपनिषद । 1 । 3 । 29 । 4 । 1 2 ) । शब्दाक्षरं परमबृह्म । अर्थात शब्द ही अविनाशी परमबृह्म है । ( बृह्मबिन्दु उपनिषद । 16 ) । समस्त बृह्मांड की रचना करने । तथा संचालित करने वाला । परमप्रधान नायक । ( ऋगवेद 10 125 ) पापग्रस्त मानव मात्र को त्राण देने निष्पाप देह मे धरा पर आ गया । MY REACT..शब्दाक्षरं परमबृह्म । अर्थात शब्द ही अविनाशी परमबृह्म है । ये जो आपने वेदों से..शब्दाक्षरं ..वाली बात लिखी है । इसका एक आना भर भी अगर आपको सही मतलब पता होता । तो आपका जीवन ही सफ़ल हो जाता । वो भी एक जीवन नहीं हमेशा के लिये आने वाले सभी जीवन ही सही हो जाते ।..मेरे ब्लाग और पूरी बातचीत इसी..शब्दाक्षरं परमबृह्म । की बात करते हैं । इसी को सुरति ( यानी एकमन होकर ) और तुम्हारे इसी शब्दाक्षरं परमबृह्म । से मिलाने की साधना या पूजा का नाम ही सुरति शब्द साधना है । आप लोग तो हमारी ही बिरादरी के निकले भाई । अभी तक हम आपको गैर बिरादरी समझ रहे थे । इसीलिये शायद किसी ने कहा है । हिंदू । मुस्लिम । सिख । ईसाई । आपस में सब भाई भाई । CONTI..

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