30 दिसंबर 2011

असली भूत प्रेत फ़ोटो

Please find here with attached file of real ghost picture
अभी कुछ दिनों पहले मेरा  business के regarding himachal pardesh हिमाचल प्रदेश में UNA उना (Gagrate) में जाना हुआ । तो वहाँ के local citizen से मुझे एक किस्सा पता चला कि करीब एक साल पहले  5 लङके कहीं बाहर से touring करते हुये रात को  gagrate (गरगेट - इस स्थान का नाम मुझे सही समझ में नहीं आ रहा) पहुँचें और वहाँ के शमशान घाट के पास रुक कर photography करने लगे । अचानक उनमें से एक लङके को फ़ोटो खींचते हुये एक प्रेतनी दिखाई दी । बस वह लङका तो तभी बेहोश हो गया और बाकी लङके भी बेहोश हो गये
सुबह को सभी पाँचों लङके मरे हुये पाये गये । पुलिस कार्यवाही के बाद उनके पेरेंटस को उनका कैमरा मिला । तो उसमें से एक तस्वीर में वो प्रेतनी साफ़ नजर आ रही थी ।  (see attached pics)
ये घटना बिलकुल सत्य है । और अगर कोई चाहे तो खुद भी जाकर चेक कर सकता है ।
आपका - कुलदीप सिंह । चण्डीगढ ।
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आपका पिछला लेख `डर के पास रहने से डर खत्म हो जाता है' पढा मैंने । अब यकीन तो नहीं होता पर आप कहते हैं । तो ऐसा ही होगा । इस लेख में एक जगह आपने कहा कि - सूक्ष्म शरीर यानि आत्मा आपको दिखाई देते हैं । 
वैसे ही अन्यों को भी दिखाई देते है । इस लाइन को पढते हुए मुझे एक वाकया याद आ गया । जो मैं आपको बताता हूं । बात पिछले महीने की है । गोरखपुर के कुशीनगर के एन ब्लाक के तीन मंजिला भवन में आमिर रहता है । 
करवाचौथ के दिन दोपहर करीब तीन बजे रेलिंग के पास खडा होकर सीढी पर रखे साइकिल के ऊपर सीढी की वह फ़ोटो खींचने लगा । तभी तस्वीर में उभरी एक आकृति देखकर वह चौंक गया । साइकिल के ऊपर सीढी की जाली से सटी साडी पहने महिला की छाया फ़ोटो में नजर आई ।
कक्षा 8 में पढ़ने वाले अविनाश पुत्र नंदराज । व कक्षा 6 में पढ़ने वाले आदर्श पुत्र अनिल ने बताया कि रात में छत पर पायल की झंकार किसी महिला के रोने की आवाज उन्होंने सुनी है । महिलाओं ने भी इस बात की पुष्टि की । उसी मकान के छत से दस साल के भीतर तीन लोग गिर चुके हैं । पर उनको कोई नुकसान नहीं हुआ । अब इन सब बातों को जोडकर देखा जाए । तो मामला भूतनी का लगता है । जो भी हो । मैं आपको उसकी खींची तस्वीर इस मेल के साथ भेज रहा हूं । अब आप ही देख कर बताएं कि आखिर यह आकृति है किसकी । क्योंकि आपके अलावा इस विषय को ठीक से कोई समझ नहीं सकता ।
1 - हिमाचल प्रदेश में UNA उना (Gagrate) के शमशान में खींची गयी फ़ोटो । प्रेतनी का प्रकार - त्रियनका 
फ़ोटो पर राइट क्लिक करके save image as आप्शन द्वारा अपने कम्प्यूटर में copy करें । फ़िर windows picture and fax viewer द्वारा बङा करके zoom आप्शन द्वारा इसका सही परीक्षण करें ।

29 दिसंबर 2011

सत्यकीखोज को प्राप्त हुये चुङैल के 2 असली फ़ोटो

हिमाचल प्रदेश में UNA उना ( Gagrate ) के शमशान में खींची गयी फ़ोटो । प्रेतनी का प्रकार - त्रियनका 
फ़ोटोज पर राइट क्लिक करके save image as आप्शन द्वारा अपने कम्प्यूटर में copy करें । फ़िर windows picture and fax viewer द्वारा बङा करके zoom आप्शन द्वारा इसका सही परीक्षण करें ।




        zoom से बङा किया  गया फ़ोटो ।


गोरखपुर के कुशीनगर के एन ब्लाक से खींची गयी फ़ोटो । प्रेतनी का प्रकार - होमाशा
फ़ोटोज के विवरण अलग लेख में देखें ।

साक्षात्कार हो इसी जीवन में ऐसा मार्ग तुरंत बतलाओ

राजीव भाई को नमस्कार । नये साल के आगमन हेतु Advance में राजीव भाई और सभी पाठक भाई-बंधुओं को मेरी तरफ़ से नववर्ष की ढेरों शुभकामनाएं । शायद इस साल का मेरा ये आखिरी मेल है । इसलिये अपनी कलम से कुछ लिख कर भेज रहा हूँ । उम्मीद है । आपको जरूर पसंद आयेगा । राजीव जी आपको याद होगा । आपने अपने द्वैत जीवन के दिनों पर भी सीरीज लिखने की बात कही थी । जिसका मैं बेसब्री से इंतजार कर रहा हूँ । इस पर कब तक लिखने का विचार बनेगा । बताइएगा जरूर । पिछले दिनो अष्टावक्र गीता ध्वनि सीरीज के डाउनलोड लिंक बहुत ही महत्वपूर्ण कङी थी । सभी आत्मज्ञान इच्छुक साधकों और लोगों को इनसे बहुत लाभ मिलेगा । मैंने सभी पार्ट डाउनलोड कर लिये हैं । पर एक समस्या आ गई है । 52 पार्ट का डाउनलोड लिंक काम नहीं कर रहा है । इसको जल्द से जल्द ठीक कर दीजियेगा । राजीव जी ! गुरुत्व पर मैं आपको कुछ मैटर भेजना चाहता हूँ । आपको सिर्फ़ ये करना है । मेल से उसको कापी और पोस्ट करना है । आपकी लिखने की चिंता से मुक्ति । जैसे ही मुझे समय मिलेगा । मैं आपको इसका मैटर तैयार करके भेज दूंगा ।

कभी कभी मेरे दिल में ये खयाल आता है ।
कि वक्त बडा बलवान है, खुद को न रोक पाओगे ।
खामोशी लिये दिल के तरानों में, गम को कहां छुपाओगे ।
खो चुके हैं उस राह को हम, जिस पर चलना है खुद अकेले ।
कभी कभी मेरे दिल में ये खयाल आता है । 1

पास बैठे हो जब तुम, दूर जाने की बात, किया न करो ।
अपनों का अपनों से ही, अब दिल कहां मिला करते हैं ।
दर्द से भरे लब हैं ये, इन्हें न यूं, मिलाया करो ।
कि मुहब्बत में ये कम्बख्त दिल, कभी कभी बेइमान हुआ करते हैं ।
कभी कभी मेरे दिल में ये खयाल आता है । 2

क्या पाया क्या खोया, तुमने इस जीवन में ।
मोल तोल का भाव है, तू भी अब इसमें रमण ले ।
अकेले जाना है, पाना अभी बहुत कुछ है बाकी ।
जाग जाओ जीव, अब तो बस ढाई अक्षर को ही जप ले ।
कभी कभी मेरे दिल में ये खयाल आता है । 3

माटी मिले न तोल के, सोना मिले न बिन मोल के ।
ज्ञान से ही सब जग जाना, गुरू बिना कुछ न पाना ।
राजीव भाई से हुई जब सत्संग वार्ता, मिल गया वो सब ।
जो पाया न था अब तक, फ़िर भी गुरू बिना कुछ न पाया ।
कभी कभी मेरे दिल में ये खयाल आता है । 4

ठोकरों से है सब सीखा, हमने तो खुद ही इस जीवन को सींचा ।
पाई है मंजिल हमने तब, हर कोशिश पूरी हुई जब ।
साथ चलते जाना है, दूर रह कर अब कुछ न पाना है ।
आप ही बताओ राजीव ठाकुर, रेत के किस कण को ठहर जाना है ।
कभी कभी मेरे दिल में ये खयाल आता है । 5


जब फ़रमायश थी प्रेत कहानी, तो राजीव भाई ने दी जुबानी ।
भूत प्रेत की है ये माया, जाने कौन कहां से आया ।
पढी कहानी चढी जवानी, डायन कहानी बडी मस्तानी ।
बाबा ने सबको बतलाया, सेक्सी प्रेतनी का पाठ पढाया ।
कभी कभी मेरे दिल में ये खयाल आता है । 6

कभी समझ तो आता है, पर कुछ नजर नहीं आता है ।
अंतकाल की बात बताओ, पग-पग की अब ध्वनि सुनाओ ।
 साक्षात्कार हो इसी जीवन में , ऐसा मार्ग तुरंत बतलाओ ।
साथ चलो तुम सदा हमारे, छूट जाए अब बंधन सारे ।
कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है । 7

वाणी हो ऐसी निर्मल जिसमें, अष्टावक्र का ज्ञान घुला हो ।
सुन ले कोई अगर उसे तो, भेद सभी के समझ सके तो ।
हो जाए वो पार, खुल जाए सारे द्वार, मिट जाए सारे भार ।
होना हो अगर मुक्त मार्ग से, अष्टावक्र गीता ध्वनि ले जाए उसी द्वार पे ।
कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है । 8
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अष्टावक्र गीता आपको उपलव्ध कराना मेरी नजर में कितना महत्वपूर्ण है । राजू जी के इस मेल के बाद विधुत की मिनट मिनट पर आवाजाही के बीच ही मैंने लिंक ठीक से लगाया । और फ़िर चैक भी किया । अब लिंक सही काम कर रहा है ।
- बिजली कुछ ज्यादा ही तंग कर रही है । लेख बाद में जुङेगा ।

26 दिसंबर 2011

सम्मोहन आखिर क्या बला है ?


16 सम्मोहन शक्ति कैसे काम करती है ?
- सम्मोहन शक्ति का मूल मन्त्र है - त्राटक योग । और त्राटक का मूल मन्त्र है - एकाग्रता । अब जैसा कि हर चीज के ही दो रूप हो जाते हैं । एक सांसारिक रूप । और दूसरा वास्तविक और अलौकिक रूप । अब जैसे इंसान शरीर को ही लें । इसका सांसारिक स्थूल रूप । बाहरी आवरण । असलियत नहीं है । बल्कि हमारे आंतरिक व्यवहार की घट बढ का प्रतिविम्ब मात्र है । जबकि सूक्ष्म शरीर यानी अंतकरण में हर चीज असली है । उससे ऊपर की स्थिति प्राप्त न होने तक वह ही सदैव साथ रहता है । मरने के बाद । लाखों जन्म तक ।
आप बाह्य शरीर से अपने द्वारा बोले गये झूठ को पर्याप्त समय तक सच साबित कर सकते हो । पर अंतकरण उसे ज्यों का त्यों झूठ ही रिकार्ड करेगा । और आप भले ही अपनी झूठी तसल्ली के लिये दुनियाँ के सामने चिल्लाते रहो - ये बात ऐसे है ।
मगर अंतः शरीर उस सत्य के अनुसार ही क्रिया करके बाह्य शरीर और जीवन में अच्छा बुरा सटीक बदलाव लाना शुरू कर देगा । यहाँ केवल योग और योगियों की क्षमता है कि उसमें परिवर्तन कर सकें ।
इसलिये तमाम चीजों की तरह सम्मोहन के भी दो रूप हो जाते हैं । एक स्थूल यानी कामचलाऊ । और एक असली सटीक और पूर्ण विध्या । ध्यान रहे । असली सम्मोहन कोई मामूली चीज नहीं है । इसके भी जानकार बहुत कम हो पाते हैं । क्योंकि अच्छा योगी त्राटक पर ही नहीं रुक जाता । बल्कि उससे अगले अध्याय को सीखने लगता है ।


अब बात वहीं आ जाती है । ऐसी हर विधा द्वैत ज्ञान की कुण्डलिनी विधा के अंतर्गत ही आती है । और कुण्डलिनी अद्वैत में पूरी की पूरी लय होकर समा जाती है । यानी सरल शब्दों में कहा जाये । तो सम्मोहन विशेषज्ञ बनने के लिये भी कम से कम कुण्डलिनी ज्ञान चाहिये । या उसकी एक शाखा - त्राटक ।
लेकिन पहले बात इसके स्थूल यानी सांसारिक रूप की करते हैं । और आपको बङे सरल तरीके से समझाते हैं कि - सम्मोहन आखिर क्या बला है ?
एक प्रयोग करिये । एक 40 वाट का बल्ब अँधेरे स्थान में जलायें । अब इसे जलने दें । और 500 या 1000 वाट का बल्ब इसके पास ही जला दें । तो 40 वाट के बल्ब की रोशनी और प्रभाव एकदम फ़ीका हो गया ।
एक और प्रयोग करिये । पाँच छह लोगों में एक धनी और प्रभावशाली व्यक्ति बैठा हुआ है । सभी व्यर्थ ही उससे प्रभावित होते हैं । तभी उसी सभा में उससे  दस गुना धनी और प्रभावशाली व्यक्ति आ जाता है । तब पहले व्यक्ति का प्रभाव सम्मोहन स्वतः क्षीण हो जाता है । वास्तव में 40 वाट का बल्ब अब भी उतनी ही रोशनी दे रहा है । पहला व्यक्ति अब भी उतना ही धनी है । लेकिन अपने से बङी क्षमता वाले के आ जाने से प्रभावित हो गये । गौर करेंगे । तो दरअसल ये एक प्रकार का सम्मोहन प्रभाव ही हैं । नहीं तो कोई टाटा बिरला तुम्हें खीर खिलाने नहीं आता ।
जीवन में सम्मोहन का ये सटीक प्रयोग अत्यन्त छोटे दुधमुँहे बच्चों ( 1-2 साल )  पर आसानी से देखने को

मिलता है । जब वे अपने को देखने खिलाने वाले की अच्छी बुरी भावना से बनी नजर से शीघ्र प्रभावित हो जाते हैं । और उन्हें नजर लग जाती है । तब अक्सर उन्हें दस्त आदि होने लगते हैं । बुरी भावना से बनी नजर - पर खास ध्यान दें । बच्चा भावनात्मक स्तर पर अति कोमल है । और बेहद जटिल इंसान की कुटिल भावनायें अत्यन्त तीखी धार युक्त ।
और बच्चे का यही उदाहरण आजीवन चलता है । किसी सुन्दर स्त्री का सौन्दर्य । कलाकार की कला । विद्वान की विद्धता । किसी का उच्च पद । किसी की धनाढयता । किसी का शारीरिक बल आदि उससे निम्न स्तर वाले को सहज ही सम्मोहित करता है । वह चाहे अनचाहे उसके प्रभाव में आ ही जाता है । अब गौर करिये । सौन्दर्य । कला । विद्धता । पद । धन । बल इन सबका सम्बन्ध आंतरिकता से ही है । आंतरिक स्तर पर किसी गुण का मजबूत होना ।
इसी को किसी साधन साधना द्वारा विकसित करके । इस योग पर आंतरिकता पर पकङ हो जाना ही ज्ञान है । तब इसके विभिन्न तरीके और साधन हैं । त्राटक में किसी स्थिर बिन्दु । जलती लौ । जलते बल्ब । आकाश में तारे आदि जैसे माध्यमों पर एकाग्रता की जाती है । इस एकाग्रता की सबसे सफ़ल स्थिति है - आप उस स्थिर माध्यम को आगे पीछे गति देने में सफ़ल हो जायें । जापान में । मैंने टी वी शो में देखा है । बच्चे साधक तक एकाग्र दृष्टि से स्टील का चम्मच टेङा कर देते हैं ।
इसी आंतरिक एकाग्रता को सफ़लता से प्राप्त कर लेने के बाद इसकी प्राप्ति के % के अनुसार कार्य किया जा सकता है । ध्यान रहे । कोई शक्ति । कोई योग । कोई गुण । कोई प्रभाव अपने से नीचे वाले पर ही कार्य करेगा । कोई कुबेर किसी लखपति से कभी प्रभावित नहीं होगा ।

तब सम्मोहन शक्ति से विभिन्न कार्य होते हैं । आंतरिक स्तर से रोग ठीक करना । मानसिक विकार ठीक करना । रहस्य जानना आदि । गलत कार्यों में भी इच्छा अनुसार वैसा ही निर्देश दिया जाता है ।
अब इसके मूल तरीके मूल सिद्धांत पर बात करते हैं । किसी की चेतना को अपने अधिकार में लेकर प्रभाव में लेकर उसे इच्छा अनुसार गति देना । ध्यान रहे । आप एकाग्रता युक्त हैं । और अपनी तब सामर्थ्य अनुसार शक्ति युक्त भी हैं । जबकि माध्यम विचारों से बिखरा हुआ । और ऊर्जा क्षीण भी हैं । जैसे - शेर और मेमना । तब मेमने की विवशता है । शेर की मर्जी पर रहना ।
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पावर कट से लेख में व्यवधान । आगे जुङ सकता है ।

25 दिसंबर 2011

क्या हुक्म है मेरे आका

आज 25 dec 2011 के दैनिक जागरण के आगरा संस्करण में एक खबर लोगों ने मुझे दिखाई । जिसमें मुरादाबाद के सभी आई पी एस अफ़सर उनके निवास के लिये बने नये बंगले को अपना आवास बनाने के बजाय अंग्रेजों के जमाने के बने पुराने बंगले में ही रहते हैं । कारण है । उस जगह का भुतहा होना । और ये कारण भी अकारण नहीं है । नये बंगले के इतिहास के अनुसार कुछ अफ़सर इसमें रहे थे । उनमें हरेक के साथ कुछ न कुछ दुखद घटा । तब भय मानते हुये नव नियुक्त लोग उसमें रहने से बहाने करने लगे ।
प्रायः लोग अज्ञानतावश कहते हैं । आत्मज्ञान में भूत प्रेतों की मान्यता नहीं हैं । दरअसल ये बात ही गलत है । मान्यता तो पूरी पूरी है । पर महत्व नहीं है । देखिये कबीर स्पष्ट कहते हैं - दिवाने मन भजन बिना दुख पैहो । पहलो जन्म भूत को पैहो । तङप तङप कर रहयो ।
अभी कुछ ही दिनों पहले की बात है । श्री महाराज जी आगरा के समीप ही एक तीर्थनगरी से वापिस आये थे । और वहाँ एक आश्रम में रुके थे । वहाँ एक ऐसा ही किस्सा जानकारी में आया । एक आश्रम में नया नया महन्त नियुक्त हुआ था । नियुक्त होने के कुछ दिन बाद ही उसे अक्सर रात को भय लगने लगा । और फ़िर स्पष्ट छाया दिखने 


लगी । वह छाया इससे पूर्व महन्त की थी । उसने लगभग 1 लाख 30 हजार रुपये का गबन किया था । और वे रुपये आश्रम में ही एक स्थान पर जमीन में गाङ दिये थे । अकाल मृत्यु उपरान्त वह विभिन्न कारणों के चलते प्रेतयोनि को प्राप्त हुआ । और वह बहुत दुखी थी । उसने बताया - मेरा सिर बहुत भारी है । मुँह सुई के छेद जैसा छोटा । और गर्दन सींक के समान पतली । और इसके बाद मेरा पेट भी बहुत बङा और बाहर निकला हुआ है । पहले तो मुझे खाने को कुछ मिलता ही नहीं । और भूख बहुत लगती है । यदि कभी कुछ प्राप्त हो भी । तो मेरी गर्दन और मुँह की बनाबट से खाना मुश्किल हो जाता है ।
फ़िर उसी ने उपाय भी बताया - ये जो मेरा गबन किया हुआ धन है । इसको बाहर निकालो । इससे भण्डारा कथा आदि कराओ । तब मुझे राहत मिलेगी । ये बात बहुत कुछ कहती है । जहाँ हर तरफ़ मन्दिर । पूजा । आरती । भक्तिमय माहौल है । वहाँ भी भूत की उपस्थिति है ।

लगता है । आज का दिन भूत वार्ता का ही था । अभी ये बात ही थी कि मेरे पास एक आदमी आया । मैंने उससे कहा - तुमने अपनी जिन्दगी में भूत देखा है । या अनुभव किया हो । या कोई घटना तुम्हारी जानकारी में आयी हो ।
उसने कहा - खुद मेरे साथ ही घटी है । और बहुत बङी बात घटी  है ।
मुझे इस बात पर बहुत उत्सुकता हुयी । और खास उत्सुकता इसके लिये कि उस प्रेत बाधा का उपचार कैसे क्या और किसने किया ।
उसने बताया - 20-22 साल पहले की बात है । उसने ताजगंज के पास करौने नामक स्थान में खेत खरीदा था । और उसकी लङकी वहाँ अपने पशु चरा रही थी कि उसे अक्समात बिना किसी वजह के भय लगा । पर लङकी ने ये बात तब घर पर किसी को नहीं बतायी । इसके बाद यही बात मेरे साथ भी होने लगी । पर मेरी कुछ समझ में नहीं आया । तब उस बयार ने मुझे सपना दिया कि - जमीन में एक स्थान पर माल गङा है । उसे खोदो ।
मैंने बताये स्थान पर खोदा । तो पीतल के दो छोटे छोटे बर्तन से निकले । इसके बाद उसके अगले निर्देश पर और 


गहरा खोदा । तो फ़िर एक के बाद एक पीतल के पात्र निकले । लेकिन उनमें सोना चाँदी आदि कुछ भी नहीं था ।
बस इसी के साथ मुझ पर प्रेत आवेश हो गया । जो तीन साल से कुछ कम समय तक रहा । इस दौरान अनेक ओझा सोखा भगत आदि से उपचार कराया । पर कोई कामयाबी हासिल नहीं हुयी ।..मेरे अन्दर विचित्र आदतों का समावेश हो गया था । कई आदमियों की खुराक अकेले ही खा जाता । दो तीन आदमियों के बल से होने वाले काम अकेले ही कर लेता । एक कामचलाऊ ओझा जब मेरा इलाज करने आया । तो उसे गर्दन  से पकङ कर दीवाल से मार दिया । किसी का तंत्र मन्त्र कामयाब न हुआ । फ़िर खुद ही अचानक ख्याल आया । ये मामला जमीन से जुङा है । अतः जमीन बेचते ही कुछ समय बाद छाया उसे छोङ गयी । जैसे ही जमीन से उसका सम्पर्क खत्म हुआ । मैंने उसे बताया तो नहीं । पर ये जमीन से जुङे जिन्न का मामला था ।
प्रेत वायु में जिन्न एक अदभुत वायु होती है । शान्त । सहायक । और बेहद बलशाली । आमतौर पर ये प्रेत

समुदाय के होते हुये भी उनसे कुछ अलग से ही होते है । ऐसे बहुत से किस्से सुनने में आये हैं । जब जिन्न मनुष्य का कई स्तरों पर सहायक हुआ है । सरकारी कार्य कराने से लेकर भवन निर्माण । खेती आदि के कार्य चमत्कारिक तरीके से कराना इनकी खूबी है । ज्यादातर देखा गया है । जिन्न प्रभावित व्यक्ति अन्य प्रेत बाधा गृस्त की तरह उपदृव न करके शान्त रहता है । वह अपने में अमानवीय बल पाता है । और पत्नी या सम्बन्धी स्त्री से जबरदस्त संभोग करता है ।
शुरूआत में ये व्यक्ति एकाकी हो जाता है । मानों जबरदस्त खजाना मिल गया हो । और ये एक दृष्टि से सच भी होता है । इसलिये बहुधा लोग जिन्न साधना करते भी हैं । और अच्छा लाभ भी उठाते हैं ।
इसके बाद । इसका दूसरा पक्ष शुरू होता है । इंसान का शरीर सूखने लगता है । क्योंकि वह निरन्तर प्रेत आवेश में रहता है । फ़िर वह जिन्न की माँग को पूरा करने में असमर्थ हो जाता है । अन्य वायु की तरह जिन्न की तो

निश्चित खासियत है । ये पूरे घर के लोगों को आवेश में ले लेता है । और धीरे धीरे जीवन रस चूसता रहता है । किसी प्रकार का इलाज कराने पर यही दोस्त बहुत बङा दुश्मन भी हो जाता है । और घर के सदस्यों को एक एक कर मारना शुरू कर देता है । तब यह लाइलाज स्थिति में पहुँच जाता है । और तांत्रिकों की पहुँच से बाहर सा हो जाता है ।
ये जिन्न फ़िन्न मेरे बचपन के दोस्त हैं । वैसे न दोस्त हैं । न दुश्मन । मुझे इनसे कोई लेना देना कभी न रहा । लेकिन कोई आदमी हिदायत करता - यहाँ न जाना । वहाँ न बैठना । तो मैं जरूर बैठता । देखूँ क्या कर लेगा । अभी नौ साल पहले ( अद्वैत में आने के बाद भी ) ही मेरे कमरे में सात आठ प्रेत वायु घूमती रहती थी । और मैं आराम से अपनी दिनचर्या करता रहता । हद तो तब हो गयी । जब उनमें से कुछ मेरे पास मेरे बिस्तर पर रात को लेटने लगे । कुछ बेड ( तखत ) के नीचे घुसे रहते । फ़िर उचक उचक कर सिर निकाल कर देखते । हँसते ।

कोई बगल में लेट जाता । कोई हवा में अदृश्य छङी लटका कर घुमाता । मैं मन में कहता - करते रहो । मरो साले । बस इससे ज्यादा उनकी हिम्मत नहीं थी । एक दो बार बौखला जाते । तो रात में सोते सोते ही मुझे अर्थी के समान ( ज्यों के त्यों लेटी हुयी स्थिति में ही । मानों कोई लकङी हो ) दो तीन फ़ुट ऊँचा उठाते । फ़िर नीचे । फ़िर उठाते । फ़िर नीचे । फ़िर..। तब अचानक मेरी नींद खुल जाती । दरअसल उन्हें मेरे सोने से झुँझलाहट होती थी । वे चाहते थे । मैं जागूँ । तब मैं झुँझलाकर कहता - तुम्हारी  ऐसी तैसी मारूँ सालो । इस पर वे खिलखिलाकर हँसते । पर मैंने उन्हें रोका नहीं । बहुत प्रकार के मायावी उपदृव करते ।
वैसे तो भूतों से जुङी अनुभवजन्य बहुत सी बातें हैं । लेकिन एक बात अभी याद आ रही है । ये कोई दस साल से कुछ और पहले की बात है । मैं रात को

आठ बजे से दस ग्यारह बजे तक एकान्त साधना करता था । मेरे आफ़िस के कमरे में प्लाई का दरवाजा लगी आलमारी का एक खाना था । जिसे खिसका कर बन्द कर देते थे । इसमें ताला लगा रहता था । इसमें एक काली कपङे की गुङिया । भोज पत्र । कुछ यन्त्र । और सामग्री जलाने का कटोरा आदि सामान था । मेरे घर में दो किरायेदार रहते थे ।
समस्या ये थी कि सामग्री जलाने से तेज खुशबू घर में फ़ैलती थी । इसी आलमारी के अन्दर बहुत धुँधला सा  जीरो वाट बल्ब मैं जलाता था । उसको भी गन्दा कर रखा था । लेकिन जैसा कि मैं कह चुका हूँ । मैं भूत प्रेत आदि की किसी साधना में कभी दिलचस्पी नहीं रखता था । मेरी एकाग्र साधना अलग ही थी ।
हमारे घर में एक लङकी थी । उसकी आयु 35 के लगभग थी । उसे मेरे इस एकान्त समय के क्रियाकलाप में बङी दिलचस्पी थी । जबकि मैंने चेताया भी था कि मैं त्राटक योग करता हूँ । इसलिये उस समय दूर रहा करो । डर लग

सकता है । कोई नुकसान भी हो सकता है । पर वही बात । बिना ठोकर लगे आदमी को अक्ल आती ही नहीं ।
एक रात की बात है

 । मैं एकाग्र हो गया था । मेरा सम्बन्ध अशरीरियों से जुङ गया । ये लङकी चुपचाप दरवाजे से सटी अन्दर देख रही थी । हालांकि अन्दर से दरबाजा लाक्ड था । और कमरे में अँधेरा था । फ़िर भी बहुत धूँधल प्रकाश में ये स्वाभाविक मानवीय उत्सुकता से मुझे देख रही थी । पर मुझे उस समय खास अन्दाजा नहीं हुआ । योग स्थिति में मेरे मुँह से फ़ूँ फ़ूँ जैसी तेज आवाज स्वतः निकल रही थी । स्वांस बहुत तीवृ गति से चल रही थी ।
अचानक ये लङकी डर गयी । और तेजी से अपने कमरे में पहुँची । और फ़िर बहुत जोर से गिगिया ( डर से अजीब सी चीख निकलना ) पङी । सब लोग इकठ्ठे हो गये । कुछ ही देर में मेरे दरबाजे पर दस्तक होने लगी । लेकिन उससे पहले ही मैंने लाइट जला दी । और आलमारी बन्द कर दी ।
मेरे पास जाते ही लङकी का भय काफ़ी कम हो गया । और वह सामान्य होने लगी । उसने बताया कि - जब वह

मेरे कमरे के गेट के पास से जा रही थी । उसे तेज सूँ सूँ की आवाज सुनाई दी । उसने उत्सुकता से झांक कर देखा । और कुछ देर देखती रही । तभी उसे अजीब सा भय लगा । उसके पास कोई सांस ले रहा था । फ़िर वह अपने कमरे में आकर लेट गयी ।
और तव उसने काले कपङे पहने एक बङी आकृति देखी । जो उसके पीछे पीछे ही चलती आ गयी । जिसकी आँखे चमकीली थी । और दांत निकले हुये थे । वह उसकी चारपायी के पास आकर खङी हो गयी । और खङी ही रही । तव वह गिगिया पङी ।
- क्या हुक्म मेरे आका । मैंने मन में कहा - आज इसने जिन्न देख ही लिया ।
- अरे पागल हो । फ़िर मैंने प्रत्यक्ष कहा - भूत प्रेत कुछ नहीं होते । सब मन का भृम है । आराम से सोओ ।
दरअसल अलौकिकता का कोई प्रयोग करते समय ऐसे अशरीरियों का आसपास आ जाना एक सामान्य बात है । शायद जिन्न ने घोस्ट माय दोस्त जैसा फ़र्ज निभाया हो । क्योंकि लङकी फ़ालतू में डिस्टर्ब कर रही थी । जो भी हो । फ़िर उस लङकी को कभी कोई न दिखा । न परेशानी हुयी । परेशानी और वो भी मेरे घर में - ऐसी की तैसी ।

23 दिसंबर 2011

भूखे भगवान

साधना के सोपान में तीन चरण होते हैं - विद्वता, सिद्धता, सरलता, 
थोड़े परिश्रम से विद्वान होना और सिद्धियाँ मिलना सरल है ।
परन्तु सरलता अभ्यास से न आएगी !
एक लड़का घर में पड़ा रहता था । बस खाना खाना और सोना उसका काम था, अतः काम न करने की वजह से घर वालों ने घर से निकाल दिया ।
निकल कर मंदिर से पहुँचा तो देखा पुजारी और उनके शिष्य मोटे तगड़े सेहत वाले थे ।
उसने सोचा - काफी खाने को मिलता होगा ।
पुजारी की शरण में जाकर कहा - मुझे भी शिष्य बना लीजिये ।
पुजारी ने बना लिया और तुलसी की माला पहना दी ।
और उससे कहा - दो टाइम दिन में पंगत रहती है खूब खाओ पियो । बाकी समय भजन करो ।
लड़के ने कहा - पंगत में चार बार खाना खा सकते हैं ?
उसकी भी मंजूरी हो गयी ! अब मज़े थे, खाना पीना और मस्त रहना । 
आखिर दुःख की घड़ी आ गयी ।
एकादशी वैष्णवों के व्रत का दिन था, भोजनालय में चूल्हे ठंडे, कोई हलचल नहीं थी ।
वह लड़का परेशान होकर गुरु के पास पहुंचा और भोजन के बारे में पूछा ।
गुरु बोला - आज तो कुछ न मिलेगा न बनेगा ।
वह बोला -  गुरुजी हम तो भूखे रह नही पाएंगे कुछ कीजिए ।
गुरु ने दया दिखाई और कहा - अनाज ले लो भण्डार से ।
दो सेर आटा, दाल इत्यादि दे दिया । 
और कहा - नदी किनारे जाओ वहीं बना लेना और प्रभु को भोग लगाकर बाकी प्रसाद रूप में ही खाना  ।
वह चला गया, भोजन बनाया । 
और भगवान को बुलाने लगा - राजा राम आइये भोजन को भोग लगाइये । 
लेकिन कोई नहीं आया तो परेशान हो गया । गुरु की आज्ञा थी भोग लगाकर ही खाना । 
फिर याद आया कि भगवान शायद मंदिर के छप्पन भोग का इंतज़ार कर रहे होंगे ।

अतः कुछ सोचकर हँसा और भगवान को पुकार कर बोला - छप्पन भोग तो क्या, आज मंदिर में जैसा मैंने बनाया है वैसा भी नही मिलेगा, मैं भी वहीं से भाग कर आया हूँ । चुपचाप जैसा मिल रहा है खा लो । मंदिर के चक्कर में भूखे रहोगे ।
इस सरल भाव से भगवान (राम) रीझ गये और सीता सहित प्रकट हो गये ।
उसने जब दो जनों को देखा तो कुछ परेशान हो गया कि - भोजन तो दो लोगों के लिये बनाया था और ये दो आ गए । बुलाया तो एक को था, चलो कोई बात नहीं मिलकर खा लेंगे, कम ही तो मिलेगा ।
वह भगवान से कहने लगा - अगली एकादशी को जल्दी आ जाना ।
अगली एकादशी को वह गुरु से बोला - वहां दो भगवान आते हैं अनाज कम हो गया था ।
गुरु हंसने लगे कि - इसे अनाज कम पड़ गया होगा तो बहाने लगा रहा है, कोई बात नहीं एक सेर और ले जाओ । 
उसने खाना बनाया और प्रभु को भोग लगाने की आवाज लगाई - सीता राम जी आइये, भोजन को भोग लगाइये । 
प्रभु प्रकट हुए । परन्तु अबकी बार राम, लक्ष्मण, सीता, तीनों आये थे । 
वह फ़िर परेशान हो गया कि - एक बुलाया दो आये, दो बुलाये तीन आ गये, हद हो गयी । 
अतः बोला - प्रभु ये अच्छी बात नहीं, चलो कोई बात नहीं गुजारा कर लेंगे, परन्तु बार बार ऐसा नहीं चलेगा, पिछली एकादशी कम में गुजारा किया अब भी वैसा ही, चलो गुजारा कर ही लिया ।
अगली एकादशी को गुरु से कहने लगा - वहाँ तीन तीन भगवान हो जाते हैं अनाज थोड़ा अधिक दीजिए ।
गुरु सोचने लगे कि - अन्न कहीं बेच तो नही रहा, देखते हैं ?
उसकी जरूरत के अनुसार अनाज भंडार से दे दिया ।
आज उसने अनाज बनाया, पकाया नहीं । वैसे ही रख दिया कि जितने आयेंगे, उसी हिसाब से पका लूँगा ।
और बोला - भगवान राम आईये, सीता, लक्ष्मण जी को भी साथ बुलाईये, मेरे भोजन को भोग लगाइये ।
भगवान पूरे राम दरबार सहित प्रकट हुए, राम, लक्ष्मण, सीता, भरत, शत्रुघ्न और साथ में हनुमान जी आदि आदि ।
वह घबरा गया - हे भगवान, तीन बुलाये, खुद तो आये ही और सारे रिश्तेदार साथ ले आये ।
हनुमान जी की तरफ देखते हुए बोला - वानर भी साथ ले आए, आज तो भोजन में कुछ न मिलेगा ।
भगवान को देखकर कहने लगा कि - आज अनाज ही है, खुद इन लोगों से पकवाओ और खाओ ।
भगवान मुस्कुराने लगे कि - आज भक्त की चलेगी ।
भरत, जानकी, लक्ष्मण, हनुमान जी रसोई बनाने लगे ।
ऐसा दृश्य देखकर समस्त सिद्ध, देवता आदि वहां भगवान की लीला देखने प्रकट हो गए ।
वो भक्त पेड़ के नीचे जाकर आँखे बंद करके सोचने लगा कि - आज इतने लोग आ गए हैं कुछ न बचेगा । 
तभी गुरु आ गये । पेड़ के नीचे आँखे बन्द किये चेले को देखा, फ़िर पास पड़े अनाज को !
उन्होंने पूछा - क्या हो रहा है ऐसे क्यों बैठे हो ?
शिष्य बोला - भगवान आये हैं अपने साथी भगवानों के साथ, और खाना बनाने में लगे हैं ।
गुरु को कहीं कोई न दिखा ।
उन्होंने कहा - कहाँ हैं भगवान ?
शिष्य सोचने लगा - एक तो आज कुछ खाने को न मिलेगा, ऊपर से गुरुजी को भगवान दिख भी नही रहे, सो अगली एकादशी को अनाज भी नही मिलेगा ।
उसने भगवान से कहा - आप गुरुजी को क्यों नहीं दिख रहे हो, वो सिद्ध हैं विद्वान हैं ।
भगवान ने मुस्कुरा कर कहा - कोई संशय नहीं कि आपके गुरु सिद्ध और विद्वान हैं परन्तु उनमें सरलता नहीं ।
उसने गुरु से कहा - भगवान कहते हैं आपमें सरलता नहीं, इसलिये आपको नही दिख रहे । 
गुरुजी भाव विह्ल होकर रोने लगे, वैरागी हो गए । 
तत्क्षण भगवान गुरु के सामने प्रकट हुए और शिष्य के साथ गुरु भी धन्य हुए ।
जीतना सरल है, हारना भी सरल है, प्रेम करना भी सरल है ।
कठिन है सरल होना !!

21 दिसंबर 2011

हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन दिल को बहलाने को गालिब ख्याल अच्छा है

प्रश्न - क्या हम इसी जीवन में उन रहस्य को जान सकते हैं । जिसे मनुष्य मरने के बाद जान पाता है ? इसमें भी मेरे कई भाव थे । जैसे 1  साधारणतया मनुष्य का अज्ञानवश गलत निर्णय लेना । और मत्यु के बाद सभी स्थिति का स्पष्ट होना  2 अलौकिक जगत के उन रहस्यों से जिन्हे जीवित मनुष्य खुली आंखों से नहीं देख पाता । पर होता हमारे सामने ही है । 3 ये प्रश्न मुख्यता उन लोगों के लिये था । जो इस मामले में बिलकुल भी नहीं जानते । आपसे कुछ और रहस्यों को जानने की इच्छा थी । जिन्हें सिर्फ़ आप ही जानते है । और आपने कुछ संभव ऐसा ही किया । 4 ये प्रश्न अपने अंदर बहुत से रहस्यों को घेरे हुए है । जितना इन्हें जाना जाए । उतना ही जिज्ञासा बढती जाती है । तो आशय ये बनता है कि आंखो के आगे से वो चश्मा ही हट जाये । जिन्हें साधारण आंख नहीं देख सकती । सब कुछ वैसा ही दिखाई दे । जो अभी दिखाई पडता है ।
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1  साधारणतया मनुष्य का अज्ञानवश गलत निर्णय लेना । और मत्यु के बाद सभी स्थिति का स्पष्ट होना । - बचपन से ही मैंने बहुत सी मौतों का अध्ययन किया है । जो भी मेरे सामने हुयी । लगभग उन सभी का । अब इसमें दो तरह की बात हो जाती है । जैसे एक साधारण इंसान संयोगवश बहुत से बीमार लोगों के पास रहने का अवसर पाता है । और एक डाक्टर भी अपनी जिन्दगी में तमाम बीमारों के करीब रहता है । पर दोनों के अनुभव में जमीन आसमान का अन्तर होता है ।  डाक्टर बीमार की असली और आंतरिक स्थिति को अधिकाधिक जानता है । और एक साधारण इंसान उसकी स्थिति बाह्य और सांसारिक ज्ञान के आधार पर जान पाता है । स्थिति एक ही है । पर देखना बहुत अलग है । बस दोनों के ज्ञान का फ़र्क है ।
इसलिये इस बात पर भी एक लम्बी चर्चा की जा सकती है । पर हम सामान्य पहलू को ही लेंगे । जीवन का अन्त 


समय आते ही कुछ हद तक पके कर्म रूप धारण कर लेते हैं । और इंसान को वे चित्रमय नजर आने लगते हैं । जब कभी विकट संकट की घङी । जैसे अपार दुख या दर्दनाक असाध्य बीमारी की पीङा में भी ऐसा कर्म बोध होता है । उदाहरण के लिये - कैकयी के कोपभवन में पङे दशरथ को राम बनवास के समय ही खास तौर पर अँधे माँ बाप के पुत्र श्रवण कुमार की हत्या का स्व बोध हुआ । जबकि उनकी मृत्यु नहीं हुयी थी । शर शय्या पर पङे भीष्म पितामह को उसी समय लगा कि - अवश्य ही ये कर्म फ़ल है । जबकि इससे पहले खास चिन्ता नहीं की । काया से जो पातक होई । बिन भुगते छूटे नहीं कोई ।
अब - मत्यु के बाद सभी स्थिति का स्पष्ट होना ।
नरक के परिणाम को प्राप्त जीवात्मा को छोङकर । मुझे नहीं लगता । औरों के सामने कोई खास स्थिति स्पष्ट होती है । भक्ति रहित । परोपकार रहित । पशुवत जीवन बिताने वालों के सामने तेजी से जीवन रील घूमती है । उनका प्राणान्त हो जाता है । वे ज्योति मैदान में जाते हैं । परिणाम अनुसार ही 84 के तीन चार पशु शरीर विकल्प रूप बनते हैं । और वे किसी शरीर में प्रवेश कर जाते हैं । ज्ञानी और स्वर्ग आदि स्थिति को प्राप्त जीवात्माओं को अपनी स्थिति का बोध पूर्व ही होने लगता है । उनके अन्दर शुभता पैदा हो जाती है । और मृत्यु भय उन्हें होता ही नहीं है । केवल नरक वाले अवश्य नरक में गिरने तक बहुत कुछ अनुभव करते हैं ।
बाकी जितनी भी सच्ची झूठी कहानियाँ झूठी मौत के बाद लौटे लोग सुनाते हैं । उनमें कोई सच्चाई नहीं है । जैसे स्वर्ग गये । वहाँ ये देखा । वो देखा आदि । इसमें विलक्षण रहस्य के तहत कुछ बातें अनूठी अवश्य होती हैं । जैसे कुछ खास अलौकिक आत्मायें अनेक कारणों से शरीर धरती हैं । और किसी घटना आदि में उनकी गवाही टायप होती है । कुछ विशेष कारणों से उनके साथ ऐसी  स्थिति बनती हैं । यही आत्मायें लौटकर वर्णन करती हैं - मैंने चमकीला प्रकाश देखा । उसमें कोई दिव्य पुरुष देखा । मैंने धर्मराज का दरबार देखा । वहाँ ऐसा हो रहा था । वैसा हो  रहा था । मैंने स्वर्ग देखा । मैं आसमान में उङती चली गयी ।
अब मैं आपको इनके मनोबैज्ञानिक रहस्य बताता हूँ - मेरी अभी कार्यरत झाङू पोंछा बर्तन आदि वाली बाई इतनी

पढी है कि अपनी उमृ - 80 और 3 के है गये । इस तरह बताती है । जाति से नाई है । ग्रामीण प्रष्ठभूमि से है । काफ़ी पहले से विधवा हो जाने पर काम कर रही है । इस वर्णन से आप समझ सकते हैं कि एकदम निरक्षर और अज्ञान जैसी स्थिति में है ।
वह दावा करती है कि - वह स्वर्ग वापिस होकर लौटी है । यानी एक बार उसकी गलती से मृत्यु हो गयी । और वह सीधी स्वर्ग गयी । और अभी भी वह इसका लाइव टेलीकास्ट करती है । एक एक बात स्पष्ट बताती है ।
मैंने झूठी मगर घोर उत्सुकता दिखाते हुये पूछा - कैसा था स्वर्ग । और वहाँ क्या क्या हुआ ?
काम वाली बाई - अरे बहुत अच्छा लला ( ये उसने ग्रामीण बोली में बताया । जिसको मैं खङी बोली में रूपान्तरित करके लिख रहा हूँ । ) गरम गरम पूङी । कचौङी । बालूशाही बन रही थी । सबको बँट रही थी ।..एक बहुत लम्बा चौङा आदमी निरे ( बहुत से ) कापी कागज लिये सबका मुकद्दर देख रहा था ।..मैंने कहा - अब मैं वापिस नहीं जाऊँगी । पर उसने कहा । नहीं..अभी तुम्हारा समय नहीं आया । फ़िर भी मैंने हठ पकङी । तो उसने मेरी कमर में लात मारी । जिससे मैं स्वर्ग से जमीन पर गिर गयी । ..और आज तक मेरी कमर में उस स्थान पर दर्द रहता है ।
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अब इसको मनोबैज्ञानिक नजरिये से देखिये । लगभग पशुवत जीवन गुजारने वाली घोर अज्ञानमय और बूङी औरत का झूठ बोलने में ये हाल है । त्रिया चरित्र न जाने कोय । खसम मार के सती होय । तो उनका क्या हाल होगा । जो इससे अच्छी स्थिति की सयानी हैं ।
कोई दस साल पहले मेरे मकान में एक गिरी पँथ का साधु परिवार रहता था । नट थे । आचरण भी सही था । तो

उस साधु की पत्नी का पक्का ख्याल था कि - उसे स्वर्ग की ही प्राप्ति होगी । और बाकी हमारे जैसे भक्ति रहित पापियों को घोर नरक ।
मैंने उससे भी पूछा था - स्वर्ग कैसा होता है ?
वह - उसमें सुन्दर सुन्दर कमरे होते हैं । मतलब सबको एक एक कमरा मिलता है । फ़ूलदार गमले होते हैं । हर कमरे में भगवान जी के सुन्दर चित्र लगे होते हैं । रोज पूजा आरती कथा भागवत आदि होती हैं ।
ये सबका अपना अपना स्वर्ग है । अपनी कल्पना का चित्र । अपनी इच्छा आकांक्षा का चित्र ।
अगर आप भारत के पिछङे गाँवों में भी जायें । और निरे अँगूठा टेक लोगों से बात करें । तो स्वर्ग यात्रा या अनुभव कर चुके बहुत लोग आपको मिल जायेंगे । और उनकी बातों को सुन रहे नये लोग आगे के लिये ये सफ़ेद झूठ सीख जायेंगे । हम विशिष्ट हैं । कुछ खास हैं । उपेक्षित लोगों में ये मनोग्रन्थि बहुत लोगों के अन्दर बन जाती हैं ।
सोचने वाली बात है । काम वाली बाई - गरम गरम पूङी । कचौङी । बालूशाही में स्वर्ग देखती है । वो इससे ज्यादा जानती नहीं । सोच नहीं पाती । इससे अधिक उसका बुद्धि विस्तार नहीं है । साधु की औरत निजी मकान की अतृप्त आकांक्षा से घिरी है । और पूजा का परिणाम स्वर्ग उसे पता हो गया । तो उसकी वैसी धारणा पक्की हो गयी ।
बहुत उदाहरण देना संभव नहीं । पर मैंने स्वर्ग आदि अलौकिक वर्णन के जो भी केस सुने । सब झूठे थे । सामान्य प्रेतक अनुभव बताने में भी 70% लोग झूठ बोलते हैं । पर प्रेतों के अनुभव बङी संख्या में सच भी होते हैं । ये भी सही है । क्योंकि प्रेत प्रथ्वी पर ही हैं । और हमारे आसपास ही होते हैं ।
हाँ जैसा कि कभी कभी विलक्षण घटनाओं में होता है । किसी भी कारणवश । कोई गम्भीर बीमारी । कोई घात । किसी स्थान विशेष पर । कोई भाव एकाग्र होकर गहन हो जाना । तब कुछ क्षणों के लिये ऐसे अनुभव हो जाते हैं । जब चेतना प्राण समूह के साथ एकत्र होकर अनजाने में किसी दुरूह दुर्गम अलौकिक दिव्य स्थान पर पहुँच जाती है । तो यह योग ही हो जाता है । योग में इसी को अभ्यास से योग बिज्ञान द्वारा करते हैं । साधिकार आते जाते हैं ।
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आंखो के आगे से वो चश्मा ही हट जाये । जिन्हें साधारण आंख नहीं देख सकती । सब कुछ वैसा ही दिखाई दे । जो अभी दिखाई पडता है ।

- देखिये यह कुछ अधिक कठिन बात नहीं हैं । पर कोई देखना ही नहीं चाहता । आँख पर काम क्रोध लोभ मोह आदि का चश्मा चढा हुआ है । इसलिये सत्य दिखाई नहीं पङता । इसको सामान्य जीवन में एक साधारण प्रयोग द्वारा भली भांति समझ सकते हैं ।
घर आदि कहीं भी किसी भी ऐसे स्थान को देखिये । जिसमें छोटी बङी कई चीजें पास पास पङी हों । उसको कुछ सेकेण्ड देखिये । और फ़िर उस स्थिति को बिना देखे बताईये । अब उसी स्थान का एक फ़ोटो खींच लें । उसने ज्यों का त्यों सब बयान कर दिया । यही योग दृष्टि है । कहावत है ना । दर्पण झूठ नहीं बोलता । आप किसी घटना का वीडियो शूट कर लें । और उसी घटना को अलग अलग प्रत्यक्षदर्शियों से पूछें । सबका वर्णन भिन्नता लिये होगा । लोग उसमें आदतानुसार अपना भाव मिला देंगे ।
1980 मेरी उमर 11 साल । हम एक छोटे से कस्बे में रहते थे । हवाई जहाज का वहाँ से कभी निकलना दुर्लभ घटना होती थी । महीनों में कभी एकाध बार भूला भटका आता । एक बार अक्समात ऐसा हुआ । एक हवाई जहाज बहुत नीचाई से गुजरा । बच्चे से लेकर बङे बूढे तक काफ़ी दूर उसके पीछे ( नीचे ) ऐसे भागे । जैसे लपक ही लेंगे । अब बौरों के गाँव में ऊँट आ गया था । सो तीन दिन चर्चा होती रही ।
किसी ने कहा - मेरे ऊपर किसी ने पानी फ़ेंका । किसी ने कहा - उसके ऊपर मूत्र गिरा । एक छोटे बच्चे ने तो कह दिया - मेरे ऊपर टट्टी गिरी । सबके साथ कुछ न कुछ हुआ था । 

राजीव बाबा उस समय भी जीनियस थे । कमबख्तों ने मेरे कहने के लिये कुछ बाकी ही न छोङा था । सब कह डाला । पर नहीं कहता । तो बेइज्जती थी । सो मैंने भी कहा - मेरे चाचा उसमें बैठे हुये थे । मैंने आवाज लगायी । तो उन्होंने देखा । बस रौब ( बच्चों में ) हो गया ।
ये बातें बच्चे ही नहीं कर रहे थे । बङे भी अपनी बुद्धि अनुसार शामिल थे । जाहिर है । उस समय की सोच इतनी ही थी कि हवाई जहाज में बैठे लोग मल मूत्र करते होंगे । तो वो नीचे ही गिरता होगा । इसलिये गिरा ।
जीवन को देखने समझने का हर आदमी का अलग अन्दाज है । और वह उसे अपनी भाव बुद्धि से देखता है । पर सत्य अलग ही है । और वह सिर्फ़ ज्ञान दृष्टि से नजर आता है ।

15 दिसंबर 2011

हर रहस्य उजागर नहीं किया जाता



अरे मेरे प्यारे राजा ! तू कभी मेरी गाली का बुरा मत मानना । मैं दिल से गाली नहीं देता । तेरे साथ थोङा हिल जुल लेता हूँ । तेरे गाल पर मेरी तरफ़ से प्यार भरी पप्पी । जैसे नसीरूद्दीन शाह विधा बालन के गाल पर लेता है ।
जो कहानी लिख रही है । उस कहानी में किसी भी पूजनीय देवी देवता आदि का मजाक मत उङाना । मैं द्वैत और अद्वैत दोनों का महत्व समझता हूँ । कार साइकिल से बेहतर है । लेकिन जहाँ कार न जा सके । वहाँ साइकिल से पहुँचा जा सकता है । नहीं तो पैदल ही यात्रा करनी पडती है । जैसे तमाम तन्त्र विध्या के स्वामी शंकर भगवान हैं । कृष्ण जी श्रेष्ठ योगेश्वर के रूप में अलग अहमियत रखते हैं । इस तरह सबकी अपनी अपनी जगह पूरी की पूरी अहमियत है । लेकिन हर आत्मा सतपुरुष का ही अंश है । सत्य पुरुष ही सबसे बडे हैं । ये भी 1 सत्य है । इसलिये सिक्के के दोनों पहलू देखने चाहिये । लेकिन ये जो ...ले छोटे मोटे ( एक जाति धर्म ) लोग हैं । जो काला इल्म । जादू टोना । टोटका या किसी नीच शक्तियों या भूत प्रेतों के बल पर लोगों का नुकसान करते हैं । अगर तुम्हारा मूड हुआ । तो इन ...लों की अच्छी तरह पोल जरुर खोल देना । क्योंकि ये साले हमारे प्राचीन भारतीय ऋषि मुनियों के पेशाब के बराबर भी नहीं हैं । बाकी रही बात । राजा मैंने तुम्हें कामेडी लेख तो भेजना था । लेकिन मैं तुम्हारे ब्लाग से अष्टावक्र गीता डाउनलोड कर रहा था । कभी कोई लिंक ठीक से डाउनलोड हो जाता था । कभी कोई प्राब्लम आ जाती थी । फ़िर उसे ध्यान से सुनना भी होता था । वैसे आजकल ठण्ड का मौसम है । शादियों का सीजन है । इसलिये अक्सर किसी न किसी पार्टी में जाना पङ जाता है । कालेज को अगले

सप्ताह से छुट्टियाँ है । इस हफ़्ते लङकियों के पेपर खत्म हो जायेंगे । इसलिये किसी न किसी कारण वश मैं तुम्हें कामेडी लेख नहीं भेज सका । लेकिन मौका मिलते ही चौका लगाने की कोशिश करुँगा । तुम 1 जरुरी काम और कर दो । ये काम तुम कल तक या परसों तक कर दो । ये बात मेरे दिल में पिछले कुछ दिन से थी । मैंने आजकल अक्सर देखा है कि औरते ..तड उभार रही हैं । और मर्द ..न्ड निकाल कर घूम रहे हैं । सा.. ऐसे बेफ़िकर है । जैसे आगे बहार आने वाली है । तुम 2012 से रिलेटिड आखिरी लेख लिखो । आखिरी चेतावनी की तरह । मैंने अक्सर देखा है कि लोग 2012 की बात पर विश्वास नहीं कर रहे । सब ...ले प्लानिंग बना रहे है । अब आगे ये कर देना । या वो कर देना है । मैं ये भी समझता हूँ कि हर रहस्य उजागर नहीं किया जाता । लेकिन मैं सिर्फ़ मोटी मोटी जानकारी 1 आखिरी चेतावनी के तहत छपवाना चाहता हूँ । जैसे तुम्हारे ही किसी लेख में 7 जनवरी 2012 से खतरे का जिकर आया था । फ़िर 12 दिसम्बर 2012 यानि 12.12.12 को भी खतरा । 2017 तक या 2020 तक पूरी कारवायी हो जायेगी । नव निर्माण कैसा होगा । कब से सतयुग शुरु होगा  वगैरह वगैरह । तुम कल तक या परसो तक 2012 के शुरु से लेकर पूरी खण्ड प्रलय के खत्म होने तक । और उसके बाद की स्थिति पर 1 बडा सा आखिरी लेख जल्दी लिखो । ये लेख तुम कहानी छ्पने से पहले ही लिख दो । क्योंकि 2011 खत्म होने मे तकरीबन आधा महीना ही रह गया है । अन्त मे फ़िर से कहूँगा कि तुम कभी मेरी गाली का बुरा मत मानना । तू तो मेरा राजा बेटा है । मैं तेरा अंकल भी हूँ । तेरे दूसरे गाल पर भी पप्पी. पुच्च ....पुच्च ।
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विनोद त्रिपाठी नाम का अर्थ - ये संयोग ही है । अद्वैत ज्ञान में मेरा प्रवेश जिस एकमात्र व्यक्ति के साथ हुआ ।

उनका नाम प्रोफ़ेसर विनोद दीक्षित ही है । उच्च कुल । शिक्षित परिवार । और धनाढय वर्ग से आये दीक्षित डिग्री कालेज में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं । इसके अतिरिक्त भी विनोद नाम के कई व्यक्ति मेरी जिन्दगी में करीबी रहे । यथा नाम तथा गुण । प्रायः लोग इस बात को नहीं जानते कि व्यक्ति का नाम किसी पण्डित या घर के सदस्य द्वारा यूँ ही नहीं रख दिया जाता । साधारणतया रखे गये नाम के पीछे पदार्थ और गुण स्वभाव आदि का बहुत बङा बिज्ञान छुपा होता है । यदि विनोद त्रिपाठी  नाम की जगह अर्जुन सिंह नाम बदल कर रख दिया जाये । तो जन्म संस्कार के 50% और इस नाम के 50% गुण प्रभाव  इसी नाम के व्यक्तित्व में समय के साथ साथ घुलने लगेंगे । क्योंकि अक्षर धातु पुकारने और व्यवहार के साथ साथ क्रियात्मक बदलाव शुरू कर देगी । इसलिये विनोद शब्द विनोदी यानी हँसी मजाक का प्रतिनिधित्व करता है । और त्रिपाठी के स्थूल अर्थ में न जाकर गूढता की बात करें । तो ये तीन गुणों - सत रज तम का इशारा करता है । क्योंकि समस्त जीवन के यही तीन पाठ हैं । यानी तीन गुणों का समान % मौजूद होना । इसलिये मुझे विनोद त्रिपाठी या अन्य किसी से भी कभी कोई परेशानी महसूस नहीं होती । गीता कहती है - गुण गुणों में बरत रहें हैं । और हर मनुष्य स्वभाव अनुसार उपकरण मात्र हैं । हरेक इंसान अपनी भूमिका निभा रहा है । आप यदि एक ही नाम के कई व्यक्तियों को कुछ करीब से जानते हों । तो अध्ययन करना । उनमें कुछ मूल बातें समान होंगी ।
कहानी - जैसा कि मैंने पहले भी स्पष्ट किया । प्रेत कथा लिखते समय पता नहीं क्यों बहुत सी बाधायें आती हैं । 2 dec से 11 dec 2011 तक छत पर एक कमरे का निर्माण हुआ । इसी भारी शोरगुल के बीच मैंने जैसे तैसे समय मिलने पर कहानी लिखी । जो अभी तक 8 भाग लगभग लिख गयी । इसके बाद मुझे अष्टावक्र महागीता के 26 भाग एक साथ प्राप्त हुये । अब बात ये थी कि मुझसे कभी कभी धोखे में मेल डिलीट हो जाती है । इसलिये महत्वपूर्ण मेल मैं प्रथम डाउनलोड कर लेता हूँ । तो मेरे समय के अनुसार 26 part डाउनलोड करने में पूरा डेढ दिन का समय लग गया । फ़िर मैंने सोचा कि कहानी तो लिखती रहेगी । ये बहुत महत्वपूर्ण है । सर्दियों में पाठक आराम से इसको डाउनलोड करके सुनेंगे । तो उन्हें कहानी की तुलना लाख गुना लाभ होगा । क्योंकि इसमें हँसी मजाक सेक्स धार्मिक पाखण्ड आदि दुनियाँ के सभी विष्यों पर विस्त्रत चर्चा है । मैं यह भी कहना चाहूँगा कि जो लोग दान पुण्य आदि परमार्थ कार्यों के इच्छुक रहते हो । वे इस महागीता की दो CD राइट करा लें । क्योंकि सबके पास कम्प्यूटर नहीं होता । जबकि CD अधिकांश लोगों के पास है । दूसरे अधिकतर कम्प्यूटर की ध्वनि क्षमता अधिक नहीं होती । और इन mp3 फ़ाइल्स में आवाज अधिक नहीं है । तब CD द्वारा उच्च ध्वनि पर इसको सपरिवार सुनने का आध्यामिक लाभ लें । दूसरे दो ब्लेंक CD की कीमत लगभग 15 रु है । अगर आप किन्ही बुजुर्ग धार्मिक प्रवृति और हठी प्रवृति के लोगों को भी इसे दान कर देंगे । तो निश्चय ही उनमें आंतरिक आध्यात्मिक बदलाव होगा । और आध्यात्म उन्मुख करना सबसे बङा पुण्य है । अब कहानी की बात

पर आते हैं । महागीता के डेढ दिन डाउनलोड में । और अगले 2 दिन अपलोड और पोस्ट करने में । अभी फ़ुरसत हुआ ही था कि शिकायत मिली । डाउनलोड करने में दिक्कत आ रही है । तब सभी लिंको की डायरेक्ट डाउनलोड लिंक पोस्ट तैयार करने । पोस्ट करने । में पूरा एक दिन लगा । तब बात बनी । यानी बीच के साढे चार दिन व्यय हुये ।
थोङी टेंशन कम हुयी कि मुझे उपलब्ध समय में बिजली रानी आँख मिचौली खेलने लगी । स्थानीय कटौती और लखनऊ से कटौती । अँधेरा कहानी के वक्त की तरह अखबार में खबर आने लगी - बिजली कटौती से हुआ आगरा बेहाल आदि । और इसके बाद त्रिपाठी जी की इस लेख की सलाह । ये थे । आज तक । अब तक के समाचार । तो देखते रहिये । कल तक । सबसे तेज । आज तक । किसी भी पूजनीय देवी देवता आदि का मजाक - अद्वैत का मुख्य सिद्धांत यही है कि - वही एक आत्मा सबके अन्दर विराजमान है । और दूसरा कोई है ही नहीं । फ़िर किसका और कैसा मजाक बनाना । वास्तविक मजाक झूठी आस्थाओं का है । गलत परम्पराओं रिवाजों का है । ये सब तो अलौकिक दिव्य सत्ता के अंग हैं । एक दिन सन्त समागम में बात हो रही थी कि बहुत से लोग सूर्य को ही भगवान मान लेते हैं । जबकि सूर्य एक देवता है । शरीर में दाँयी आँख सूर्य की प्रतीक स्थिति है । और बाँयी आँख चन्द्र की । अब 12 महीने के नियुक्त सूर्य पुरुष भी 12 ही हैं ।

उनके 12 अलग अलग नाम हैं । सूर्य के रथ में 6-7 अन्य सहयोगी देव अप्सरा यक्ष आदि एक महीना डयूटी करते हैं । फ़िर नये आ जाते हैं । ऐसे खेल है । अब कोई सूर्य को भगवान मान लें । तो कितनी बङी अज्ञानता है । तब मजाक सूर्य का नहीं । अज्ञान स्थिति का है । इसी कृम में काली देवी पर बलि चढाने की अज्ञानता की बात चल गयी । तब सन्तों ने कहा - यदि कोई देवी - जीव हत्या । रक्त पिपासु और निर्दय भाव है । तब वह देवी किस दृष्टिकोण से हुयी । यह तो राक्षसी  प्रवृति है । सोचने वाली बात है । आज तक काली देवी ने किसी से कहा - मुझे बलि दो । ये सब इंसान की मनगढंत सोच ही है । रामकृष्ण परमहँस काली के उच्च स्थिति भक्त थे । उन्होंने कितनी बलि दी । या देवी ने उनसे माँगी । खैर..अभी समय कम है । और भी स्पष्ट बात फ़िर कभी ।
अष्टावक्र गीता डाउनलोड - मेरी आप सभी को सलाह है । इसे डाउनलोड अवश्य करें । ये रहस्य है । निश्चय ही आप इसे सुनकर चौंक जायेंगे ।
2012 के शुरु से लेकर पूरी खण्ड प्रलय के खत्म होने तक - नबम्बर माह के कुछ पहले से ही मेरी अजीब ध्यान स्थिति है । अन्दर जाते ही सन्नाटा भांय भांय सांय सांय सी मिलती है । गुरुदेव पहले ही संकेत कर रहे थे । खराब समय आ रहा है । भजन ध्यान भक्ति करो । फ़िर भी मैंने इस सांय सांय के बारे में पूछा । तो उन्होंने कहा - ये सरकार भंग हो जाने के समान है । इसलिये ऐसा लगता है । जहाँ तक खण्ड प्रलय की बात है । उल्टी गिनती पूरी हो चुकी । अब प्रकूति देवी के ऊपर निर्भर है कि वह किस तरह अपने काम को अंजाम देंगी । क्योंकि यह व्यवस्था पूरी तरह इसी के अधीन है ।


फ़िर भी इस प्रलय के बारे में तमाम शास्त्र पुराण धार्मिक ग्रन्थ भविष्यवक्ता एकमत हैं कि इसका निश्चित समय यही है । प्रकृति की ये जिम्मेदारी है कि वह अपनी व्यवस्था को चौकस करे । किस तरह । ये उसका अपना मामला है ।
हाँ जून में जब मैं सन्त समाज में बैठा था । तब कई बार ये संकेत हुये कि - सतयुग आने में सिर्फ़ 50 वर्ष हैं । यानी 50 वर्ष में सभी व्यवस्था नयी हो जायेगी । सब कुछ नये सिरे से । नयी तरह से । लेकिन ध्यान रहे । फ़िर भी ये पूर्ण प्रलय नहीं है । खण्ड प्रलय ही है । अतः प्राप्त संकेतों के अनुसार 2017 तक सभी खेल टुकङों में निबटकर पूरा हो जायेगा । क्योंकि इस स्थिति में विस्थापन और स्थापन दोनों का सही समायोजन भी करना होता है । जिस time zone काल मण्डल से यह सब विध्वंस निर्माण का कार्य होगा । यहाँ के 50 वर्ष वहाँ का 1 दिन भी नहीं है । जाहिर है । कितना भी तेज गति से कार्य हो । कुछ तो समय उन्हें भी लगता है । और कु्छ कम अधिक आगे पीछे होने की भी संभावना हर जगह होती है । फ़िर भी 2017 के बाद के हालात कुछ ऐसे ही होंगें । जैसे हिरोशिमा नागासाकी पर बम गिराने के बाद हुये थे । कोई थोङी भी दूर दृष्टि से देखें । तो नयी व्यवस्था इंसानी स्तर पर संभलने में 33 साल कुछ अधिक नहीं हैं ।
एक महत्वपूर्ण बात - जो मैंने कही । वो धीरे धीरे प्रमाणित हो ही रही है कि ज्वालामुखी जैसी स्थिति से होगी प्रलय । और समुद्र में होगा परिवर्तन । पिछले दिनों कई खबरें इस तरह की आ चुकी हैं कि समुद्र में आंतरिक हलचल गतिविधियाँ जोरों पर हैं । और समुद्र के अन्दर ज्वालामुखी ऊपर उठने की खबरें भी आयीं । कुछ स्थान पर पेट्रोलियम पदार्थ बिलकुल सतह पर आ गये । कहानी पूर्ण हो जाने पर इस पर फ़िर बात होगी । बस इतना समझिये कि किसी ऊँची पहाङी पर टिका विशाल पत्थर किसी कंकङ के सहारे टिका हो । जैसे ही कंकङ डांवाडोल हुआ । प्रलय लीला शुरू । पूर्व कथनों के अनुसार विनाश सिर्फ़ प्रकूति की विनाश लीला से ही नहीं होगा । बल्कि आपदा से फ़ैली महामारी आदि की भी  बहुत संभावना है । देखिये क्या होता है ?

12 दिसंबर 2011

135 घण्टे में दुर्लभ मोक्ष सहज ही प्राप्त करें


धार्मिक ग्रन्थों के तमाम मनीषियों के विचार अनुसार आत्मज्ञान की ओर उन्मुख करने वाले सार ज्ञान के 3 महाग्रन्थ - श्रीमदभगवत गीता । अष्टावक्र महागीता ।  और सन्त ज्ञानेश्वर जी की ज्ञानेश्वरी गीता सर्वश्रेष्ठ हैं । हमारे कुछ पाठकों को अष्टावक्र महागीता डाउनलोड करने में दिक्कत आ रही थी । सो उनकी सुविधा हेतु सभी लिंक एक ही स्थान पर उपलब्ध हैं । इनको क्लिक करके आप लिंक साइट पर पहुँच सकते हैं । और डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके डाउनलोड कर सकते हैं । ये पूरे 135 घण्टे का प्रवचन लगभग 1 GB साइज का है ।
और ये आपके दिमाग से जन्म जन्मांतरों से जमी धार्मिक धूल को साफ़ कर देगा । आपको बहुत सी भ्रान्तियाँ । और बहुत सी चीजों की असलियत मालूम पङ जायेगी । जिनके बारे में अब तक आप यही सोचते रहे कि - आखिर सच क्या है ? जो लोग बिना परखे सीधे डाउनलोड नहीं करना चाहते । वे इन्हीं लिंक द्वारा डाउनलोड से पूर्व सुन भी सकते हैं । मेरी अपनी राय में जो इस सिर्फ़ 135 घण्टे का प्रवचन भी नहीं सुन पाते । वह बहुत बङा अभागे ही हैं । आप थोङे से प्रयास से एक महान पुण्य कार्य भी कर सकते हैं । इस 1 GB की अष्टावक्र महागीता को पेन ड्राइव या मेमोरी चिप में डाउनलोड करके अपने परिचितों । बुजुर्गों । धार्मिक प्रवृति की महिलाओं । 


आत्मज्ञान के इच्छुक जिज्ञासुओं को वितरित कर उन्हें उद्धार मार्ग हेतु प्रेरित कर सकते हैं । याद रखिये । सभी तरह के पूजा पाठ । वृत । उपवास । यज्ञ । हवन । तीर्थ । धर्म । दान । मन्दिर । मस्जिद । चर्च । गुरुद्वारा । पुण्य से बङा इसका पुण्य फ़ल होता है । यदि आपके द्वारा प्रेरित जीव स्व उद्धार की तरफ़ चल पङे । और अधिक कुशल होने पर अन्य को भी प्रेरित करें । बस इतना ही कहना है - अर्जी हमारी । मर्जी तुम्हारी ।
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मुझे मेरी मस्ती कहाँ ले के आयी । जहाँ मेरे अपने सिवा कुछ नहीं हैं । क्लिक करें ।
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10 दिसंबर 2011

इसे योग में हवा में उड़ना कहते हैं

जवान रहना है । तो मौन हो जाओ ? आइंस्‍टीन की क्रांतिकारी खोज ।
अल्‍बर्ट आइंस्टीन ने खोज की । और निश्‍चित ही यह सही होगी । क्‍योंकि अंतरिक्ष के बारे में इस व्‍यक्‍ति ने बहुत कठोर परिश्रम किया था । उसकी खोज बहुत गजब की है । उसने स्‍वयं ने कई महीनों तक इस खोज को अपने मन में रखी । और विज्ञान जगत को इसकी सूचना नहीं दी । क्‍योंकि उसे भय था कि कोई उस पर विश्‍वास नहीं करेगा ।
जवान रहना है । तो मौन हो जाओ ? ओशो । जवान रहना है । तो मौन हो जाओ ? आइंस्‍टीन की क्रांतिकारी खोज । खोज ऐसी थी कि लोग सोचेंगे कि वह पागल हो गया है । परंतु खोज इतनी महत्‍वपूर्ण थी कि उसने अपनी बदनामी की कीमत पर जग जाहिर करने का तय किया । खोज यह थी कि - गुरुत्वाकर्षण के बाहर तुम्‍हारी उम्र बढ़नी रूक जाती है । यदि आदमी दूर के किसी ग्रह पर जाए । और उसे वहां तक पहुंचने में 30 साल लगे । और फिर 30 साल में नीचे आये । और जब उसने पृथ्‍वी को छोड़ा था । उसकी उम्र 30 साल थी । तब यदि तुम सोचो कि जब वह पुन: आए । तब वह 90 साल का होगा । तो तुम गलत हो । वह अब भी 30 साल का ही होगा । उसके सभी दोस्‍त और संगी साथी कब्र में जा चुके होंगे । शायद 1 या 2 अब भी जिंदा हो । परंतु उनका 1 पैर कब्र में होगा । परंतु वह उतना ही जवान होगा । जितना तब था । जब उसने जमीन को छोड़ा था । जिस क्षण तुम गुरुत्वाकर्षण के बाहर जाते हो । उम्र की प्रक्रिया रूक जाती है । उम्र बढ़ रही है । तुम्‍हारे शरीर पर 1 निश्‍चित दबाव के कारण । जमीन लगातार तुम्‍हें खींच रही है । और तुम इस खिंचाव से लड़ रहे हो । तुम्‍हारी ऊर्जा इस खींच रही है । और तुम इस खिंचाव से लड़ रहे हो । तुम्‍हारी ऊर्जा इस खिंचाव से बाधित होती है । व्‍यय होती है । परंतु 1 बार जब तुम इस जमीन के गुरुत्वाकर्षण से बाहर हो जाते हो । तुम वैसे ही बने रहते हो - जैसे हो । तुम अपने सम सामयिक लोगों को नहीं पाओगे । तुम वह फैशन नहीं पाओगे । जो तुमने छोड़ी थी । तुम पाओगे कि 60 साल बीत गये । परंतु गुरुत्वाकर्षण के बाहर होने की अनुभूति ध्‍यान में भी पाई जा सकती है - ऐसा होता है । और यह कई लोगों को भटका देती है । अपनी बंद आँखो के साथ जब तुम पूरी तरह से मौन हो । तुम गुरुत्वाकर्षण के बाहर हो । परंतु मात्र तुम्‍हारा मौन गुरुत्वाकर्षण के बाहर है । तुम्‍हारा शरीर नहीं । परंतु उस क्षण में जब तुम अपने मौन से एकाकार होते हो । तुम महसूस करते हो कि - तुम ऊपर उठ रहे हो । इसे योग में " हवा में उड़ना " कहते हैं । और बिना आंखे खोले तुम्‍हें लगेगा कि यह मात्र लगता ही नहीं । बल्‍कि तुम्‍हारा शरीर मौन गुरुत्वाकर्षण के बाहर है - यह सच्‍चा अनुभव है । परंतु अभी भी तुम शरीर के साथ एकाकार हो । तुम महसूस करते हो कि तुम्‍हारा शरीर उठ रहा है । यदि तुम आँख खोलोगे । तो पाओगे कि तुम उसी आसन में जमीन पर बैठे हो । ओशो
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भीतर के प्रकाश को जानो - सत्य के संबंध में विवाद सुनता हूं । तो आश्चर्य होता है । निश्चय ही जो विवाद में हैं । वे अज्ञान में होंगे । क्योंकि ज्ञान तो निर्विवाद है । ज्ञान का कोई पक्ष नहीं है । सभी पक्ष अज्ञान के हैं । ज्ञान तो निष्पक्ष है । फिर जो विवाद ग्रस्त विचारधाराओं और पक्षपातों में पड़ जाते हैं । वे स्वयं अपने ही हाथों सत्य के और स्वयं के बीच दीवारें खड़ी कर लेते हैं । मेरी सलाह है - विचारों को छोड़ो । निर्विचार हो रहो । पक्षों को छोड़ो । और निष्पक्ष हो जाओ । क्योंकि इसी भांति वह प्रकाश उपलब्ध होता है । जो कि सत्य को उदघाटित करता है । 1 अंधकार पूर्ण गृह में 1 बिलकुल नए और अपरिचित जानवर को लाया गया । उसे देखने को बहुत से लोग उस अंधेरे में जा रहे थे । चूंकि घने अंधकार के कारण आंखों से देखना संभव न था । इसलिए प्रत्येक उसे हाथों से स्पर्श करके ही देख रहा था । 1 व्यक्ति ने कहा - राजमहल के खंभों की भांति है - यह जानवर । दूसरे ने कहा - नहीं । 1 बड़े पंखे की भांति हैं । तीसरे ने कुछ कहा और । चौथे ने कुछ और । वहां जितने व्यक्ति थे । उतने ही मत भी हो गये । उनमें तीव्र विवाद और विरोध हो गया । सत्य तो 1 था । लेकिन मत अनेक थे । उस अंधकार में 1 हाथी बंधा हुआ था । प्रत्येक ने उसके जिस अंग को स्पर्श किया । उसे ही वह सत्य मान रहा था । काश ! उनमें से प्रत्येक के हाथ में 1-1 दिया रहा होता । तो न कोई विवाद पैदा होता । न कोई विरोध ही । उनकी कठिनाई क्या थी ? प्रकाश का अभाव ही उनकी कठिनाई थी । वही कठिनाई हम सबकी भी है । जीवन सत्य को समाधि के प्रकाश में ही जाना जा सकता है । जो विचार से उसका स्पर्श करते हें । वे निर्विवाद सत्य को नहीं । मात्र विवादग्रस्त मतों को ही उपलब्ध हो पाते है । सत्य को जानना है । तो सिद्धांतों को नहीं । प्रकाश को खोजना आवश्यक है । प्रश्न विचारों का नहीं । प्रकाश का ही है । और प्रकाश प्रत्येक के भीतर है । जो व्यक्ति विचारों की आंधियों से स्वयं को मुक्त कर लेता है । वह उस चिन्मय ज्योति को पा लेता है । जो कि सदा सदा से उसके भीतर ही जल रही है ।
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ईश्वरत्व है । ईश्वर नहीं है । भगवत्ता है । भगवान नहीं । ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है । ईश्वर शब्द से व्यक्ति की भ्रांति पैदा होती है । ईश्वरत्व है । ईश्वर नहीं । भगवत्ता है । भगवान नहीं । यह सारा जगत दिव्यता से परिपूरित है । इसका कण कण रोआं रोआं 1 अपूर्व ऊर्जा से आपूरित है । लेकिन कोई व्यक्ति नहीं है । जो संसार को चला रहा हो । हमारी ईश्वर की धारणा बहुत बचकानी है । हम ईश्वर को व्यक्ति की भांति देख पाते हैं । और तभी अड़चनें शुरू हो जाती हैं । जैसे ही ईश्वर को व्यक्ति माना कि धर्म पूजा पाठ बन जाता है । ध्यान नहीं । पूजा पाठ । क्रिया कांड । यज्ञ हवन । और ऐसा होते ही धर्म थोथा हो जाता है । किसकी पूजा ? किसका पाठ ? आकाश की तरफ जब तुम हाथ उठाते हो । आंखें उठाते हो । तो वहां कोई भी नहीं है । तुम्हारी प्रार्थनाओं का कोई उत्तर नहीं आएगा । तुम ही हो भगवान । और तुम ही हो भक्त । तुम ही हो पूजा । पुजारी । पूज्य । और जब तक तुम्हें यह बात स्मरण न आ जाए । तब तक तुम भटकते ही रहोगे । इसलिए बुद्ध न तो परमात्मा की बात करते हैं । न प्रार्थना की बात करते हैं । बुद्ध केवल ध्यान की बात करते हैं ।
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मन के विचरने का नाम अविद्या है । जब मन का आत्मा की ओर विचरना होता है । तब अविद्या नष्ट हो जाती है । जैसे राजा के आगे मन्त्री और सिपाही कार्य करते हैं । वैसे ही मन के आगे इन्द्रियाँ कार्य करती हैं । ! बाह्य के विषय पदार्थों की भावना छोड़कर तुम भीतर आत्मा की भावना करो । तब आत्मपद को प्राप्त होगे । जिन पुरुषों ने अन्तःकरण में आत्मा की भावना का यत्न किया है । वे शान्ति को प्राप्त हुए हैं । जो पदार्थ आदि में नहीं होता । वह अन्त में भी नहीं रहता । इससे जो कुछ लगता हैं । वह सब ब्रह्म सत्ता है । उससे कुछ भिन्न नही है । वह कल्पना मात्र है । हमारा निर्विकार आदि अन्त से रहित ब्रह्म तत्त्व है । हम क्यों शोक करते हैं ? अपना पुरुषार्थ करके संसार की भोग वासना को मूल से उखाड़ो । और आत्म पद का अभ्यास करो । तो दृश्य भ्रम मिट जावे ।

02 दिसंबर 2011

हंसी सदा ही युवा ताजी होती है

जीवन को विधायक आरोहण दो - जीवन से अंधकार हटाना व्यर्थ है । क्योंकि अंधकार हटाया नहीं जा सकता । जो यह जानते हैं । वे अंधकार को नहीं हटाते । वरन प्रकाश को जलाते हैं । 1 प्राचीन लोककथा है । उस समय की । जब मनुष्य के पास प्रकाश नहीं था । अग्नि नहीं थी । रात्रि तब बहुत कठोर थी । लोगों ने अंधकार को दूर करने के बहुत उपाय सोचे । पर कोई भी कारगर नहीं हुआ । किसी ने कहा - मंत्र पढ़ो । तो मंत्र पढ़े गये । और किसी ने सुझाया कि - प्रार्थना करो । तो कोरे आकाश की ओर हाथ उठाकर प्रार्थनाएं की गई । पर अंधकार न गया । सो न गया । किसी युवा चिंतक और आविष्कारक ने अंतत: कहा - हम अंधकार को टोकरियों में भर भरकर गड्ढों में डाल दें । ऐसा करने से धीरे धीरे अंधकार क्षीण होगा । और फिर उसका अंत भी आ सकता है ।
यह बात बहुत युक्ति पूर्ण मालूम हुई । और लोग रात रात भर अंधेरे को टोकरियों में भर भरकर गड्ढों में डालते । पर जब देखते तो पाते कि वहां तो कुछ भी नहीं है । ऐसा करते करते लोग बहुत ऊब गये । लेकिन अंधकार को फेंकने ने 1 प्रथा का रूप ले लिया था । और हर व्यक्ति प्रति रात्रि कम से कम 1 टोकरी अंधेरा तो जरूर ही फेंक आता था । फिर, कभी ऐसा हुआ कि 1 युवक किसी अप्सरा के प्रेम में पड़ गया । और उसका विवाह उस अप्सरा से हुआ । पहली ही रात बहू से घर के बढ़े सयानों ने अंधेरे की 1 टोकरी घाटी में फेंक आने को कहा । वह अप्सरा यह सुन बहुत हंसने लगी । उसने किसी सफेद पदार्थ की बत्ती बनाई । 1 मिट्टी के कटोरे में घी रखा । और फिर किन्हीं 2 पत्थरों को टकराया । लोग चकित देखते रहे । आग पैदा हो गई थी । दीया जल रहा था । और अंधेरा दूर हो गया था । उस दिन से फिर लोगों ने अंधेरा फेंकना छोड़ दिया । क्योंकि वे दिया जलाना सीख गये थे । लेकिन जीवन के संबंध में हममें से अधिक अभी भी दीया जलाना नहीं जानते हैं । और अंधकार से लड़ने में ही उस अवसर को गंवा देते हैं । जो कि अलौकिक प्रकाश में परिणित हो सकता है । प्रभु को पाने की आकांक्षा से भरो । तो पाप अपने से छूट जाते हैं । और पापों से ही लड़ते रहते हैं । वे उनमें ही और गहरे धंसते जाते हैं । जीवन को विधायक आरोहण दो । निषेधात्मक पलायन नहीं । सफलता का स्वर्ण सूत्र यही है ।
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डाइनेमिक मेडिटेशन के दूसरे चरण में रेचन करना 1 पागलपन प्रतीत होता है । इस संबंध में 1 ध्यानी का प्रश्न - यदि घर पर इसे हम जारी रखेंगे । चिल्लाएं । या नाचें । या हंसें । तो आसपास के लोग पागल समझने लगेंगे । 
- आसपास के लोग अभी भी पागल ही समझते हैं एक दूसरे को । कहते न होंगे । यह दूसरी बात है । यह पूरी जमीन करीब करीब मैड हाउस है । पागलखाना है । अपने को छोड़कर बाकी सभी लोगों को लोग पागल समझते 

ही हैं । लेकिन अगर आपने हिम्मत दिखाई । और इस प्रयोग को किया । तो आपके पागल होने की संभावना रोज रोज कम होती चली जाएगी । जो पागलपन को भीतर इकट्ठा करता है । वह कभी पागल हो सकता है । जो पागलपन को उलीच देता है । वह कभी पागल नहीं हो सकता । फिर 1-2 दिन । 4 दिन । उत्सुकता लेंगे । 4 दिन बाद उत्सुकता कोई लेने को तैयार नहीं है । कोई आदमी दूसरे में इतना उत्सुक नहीं है कि बहुत ज्यादा देर उत्सुकता ले । और आपके 24 घंटे के व्यवहार में जो परिवर्तन पड़ेगा । वह भी दिखाई पड़ेगा । आपका रोना  चीखना ही दिखाई नहीं पड़ेगा । आप जब क्रोध में होते हैं । तब कभी आपने सोचा कि लोग पागल नहीं समझेंगे ? तब आप नहीं सोचते कभी कि लोग पागल समझेंगे कि नहीं समझेंगे । क्योंकि आप पागल होते ही हैं । लेकिन अगर यह ध्यान का प्रयोग चला । तो आपके 24 घंटे के जीवन में रूपांतरण हो जाएगा । आपका व्यवहार बदलेगा । ज्यादा शांत होंगे । ज्यादा मौन होंगे । ज्यादा प्रेम पूर्ण । ज्यादा करुणा पूर्ण होंगे । वह भी लोगों को दिखाई पड़ेगा । इसलिए घबड़ाएं न । 4 दिन उन्हें पागल समझने दें । 4 दिन के बाद । 8 दिन के बाद । 15 दिन के बाद । आपसे पूछने वाले हैं वही लोग कि - यह आपको जो फर्क हो रहा है । क्या हमें भी हो सकता है ? घबड़ा गए पब्लिक ओपिनियन से । लोग क्या कहते हैं ? तब तो बहुत गहरे नहीं जाया जा सकता । हिम्मत करें । और लोग पागल समझते हैं । या बुद्धिमान समझते हैं । इससे कितना अंतर पड़ता है ? असली सवाल यह है कि - आप पागल हैं । या नहीं ? असली सवाल यह नहीं है कि - लोग क्या समझते हैं । अपनी तरफ ध्यान दें कि आपकी क्या हालत है । वह हालत पागल की है । या नहीं है ? उस हालत को छिपाने से कुछ न होगा । उस हालत को मिटाने की जरूरत है । फिर यह जो रोना चीखना, हंसना, नाचना है । यह धीरे धीरे शांत होता जाएगा । जैसे जैसे पागलपन बाहर फिंक जाएगा । वैसे वैसे शांत हो जाएगा । 3 सप्ताह से लेकर 3 महीना - कम से कम । 3 सप्ताह, ज्यादा से ज्यादा 3 महीना चल सकता है । जितनी तीव्रता से निकालिएगा । उतनी जल्दी चुक जाएगा । प्रत्येक व्यक्ति को थोड़ा अलग अलग समय लगेगा । क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के संगृहीत पागलपन की मात्रा अलग अलग है । लेकिन जितनी जोर से उलीच देंगे । उतनी जल्दी फिंक जाएगा बाहर । और आप शांत हो जाएंगे । जैसे जैसे शांत होने लगेंगे । आप चाहेंगे भी । तो चीख न सकेंगे । नाच न सकेंगे । रो न सकेंगे । हंस न सकेंगे । मात्र चाहने से कुछ हो नहीं सकता । भीतर चीज चाहिए निकलने को । और जैसे जैसे गहराई बढ़ेगी । वैसे वैसे पहला स्टेप रह जाएगा । और चौथा स्टेप रह जाएगा । दूसरा पहले गिर जाएगा । फिर धीरे धीरे पूछने का भी मन नहीं होगा । पूछना भी बाधा मालूम पड़ेगी कि - मैं कौन हूं । तीसरा स्टेप भी गिर जाएगा । बाद में पहला स्टेप भी मिनट 2 मिनट का रह जाएगा । श्वास ली नहीं कि आप सीधे चौथे स्टेप में चले जाएंगे । अंततः जितनी गहराई पूरी हो जाएगी । उतना 2 मिनट के लिए पहला स्टेप रह जाएगा । और सीधा चौथा स्टेप आ जाएगा । पूरे 40-50 मिनट आप चौथी अवस्था में ही रह पाएंगे । लेकिन आप अपनी तरफ से अगर चौथी अवस्था लाने की कोशिश किए । तो वह कभी नहीं आएगी । इन 2 और तीसरे स्टेप से गुजरना ही पड़ेगा । इनके गिर जाने पर वह अपने से आ जाती है ।
ஜ۩۞۩ஜ ॐॐॐ आत्मा ॐॐॐ ஜ۩۞۩ஜ 
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ऐसे हंसो कि तुम्हारा पूरा जीवन 1 हंसी बन जाये । इस भांति जियो कि पूरा जीवन 1 मुस्कुराहट बन जाये । इस भांति जियो कि आसपास के लोगों की जिंदगी में मुस्कुराहट फैल जाये । इस भांति जियो कि सारी जिंदगी 1 हंसी के खिलते हुए फूलों की कतार हो जाये । ओशो
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मैंने 3 फकीरों के बारे में सुना है । उनके नाम का कोई उल्लेख नहीं । क्योंकि उन्होंने कभी किसी को अपना नाम नहीं बताया । उन्होंने कभी किसी बात का जवाब नहीं दिया । इसलिए चीन में उन्हें बस " 3 हंसते फकीरों " के नाम से ही जाना जाता है । वे 1 ही काम करते थे । वे किसी गांव में प्रवेश करते । बाजार में खड़े हो जाते । और हंसना शुरु कर देते । अचानक लोग सजग हो जाते । और वे अपने पूरे प्राणों से हंसते । फिर दूसरे लोग प्रभावित हो जाते । और 1 भीड़ जमा हो जाती । और उनको देखने भर से ही पूरी भीड़ भी हंसने लगती । यह क्या हो रहा है ? फिर पूरा शहर सम्मिलित हो जाता । और वे फकीर किसी दूसरे शहर को चल देते । उन्हें बहुत प्रेम किया जाता था । उनका यही एकमात्र उपदेश था । यही 1 संदेश था कि - हंसों । और वे कुछ सिखाते नहीं थे । बस परिस्थिति पैदा कर देते थे । फिर ऐसा हुआ कि वे देश भर में प्रसिद्ध हो गए - 3 हंसते फकीर । पूरा चीन उनको प्रेम करता था । उनका सम्मान करता था । किसी ने भी इस तरह से शिक्षा नहीं दी कि - जीवन 1 हंसी होना चाहिए । और अन्यथा कुछ भी नहीं । और वे किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं हंस रहे थे । लेकिन बस हंस रहे थे । जैसे कि वे ब्रह्मंडीय मजाक को समझा गये हों । 1 शब्द भी बिना बोले । उन्होंने पूरे चीन भर में बहुत आनंद फैलाया । लोग उनके नाम पूछते । लेकिन वे बस हंस देते । तो यही उनका नाम हो गया - 3 हंसते फकीर । फिर वे वृद्ध हुए । और किसी गांव में, उनमें से 1 फकीर मर गया । पूरा गांव अपेक्षा करता था । बहुत अपेक्षा से भर गया था । क्योंकि अब तो कम से कम उन्हें रोना ही चाहिए । जबकि उनमें से 1 फकीर मर गया है । यह देखने जैसा होगा । क्योंकि इन लोगों के रोने की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था । पूरा गांव जमा हो गया । 2 फकीर तीसरे फकीर की लाश के पास खड़े थे । और दिल खोलकर हंस रहे थे । तो गांव वालों ने पूछा - कम से कम यह तो समझाएं । तो पहली बार वे बोले । और उन्होंने कहा - हम इसलिए हंस रहे हैं कि - यह आदमी जीत गया । हम हमेशा ही सोचते थे कि कौन पहले मरेगा । और इस आदमी ने हमें हरा दिया । हम अपनी पराजय पर और उसकी जीत पर हंस रहे हैं । और फिर वह इतने वर्ष हमारे साथ रहा । और हम 1 साथ हंसे । और हमने एक दूसरे के साथ का । मौजूदगी का । आनंद लिया । उसे अंतिम विदा देने का कोई और उपाय नहीं हो सकता । हम हंस भर सकते है । पूरा गांव दुखी था । लेकिन जब मृत फकीर की देह को चिता पर रखा गया । तो पूरे गांव को पता चला कि यही दोनों नहीं हंस रहे थे । तीसरा । जो मर गया था । वह हंस रहा था । क्योंकि वह तीसरा व्यक्ति जो मर गया था । उसने अपने साथियों को कहा था - मेरे कपड़े मत बदलना । ऐसा रिवाज था कि जब कोई व्यक्ति मर जाता । तो वे उसके कपड़े बदलते । और उसके शरीर को नहलाते । तो उसने कह रखा था - मुझे नहलाना मत । क्योंकि मैं कभी भी गंदा नहीं रहा । मेरे जीवन में इतनी हंसी थी कि कोई भी अशुद्धता मेरे पास जमा नहीं हो सकती । मेरे पास भी नहीं फटक सकती । मैंने कोई धूल इकट्ठी नहीं की । हंसी सदा ही युवा ताजी होती है । तो मुझे नहलाना मत । और न ही मेरे कपड़े बदलना । तो बस उसे सम्मान प्रकट करने के लिए । उन्होंने उसके कपड़े नहीं बदले । और जब शरीर को चिता पर रखा गया । तो अचानक उन्हें पता चला कि - उसने अपने कपड़ो के नीचे बहुत सी चीजें छिपा ली थीं । और वे सभी चीजें शुरू हो गई - चीनी आतिशबाजी । तो पूरा गांव हंसा । और वे 2 फकीर बोले - बदमाश । तू मर गया । लेकिन तूने दोबारा हमें हरा दिया । तेरी हंसी ही अंतिम रही । जब इस ब्रह्यांड का पूरा मजाक समझ लिया जाता है । तो 1 ब्रह्यांडीय हंसी उठती है । वह उच्चतम है । केवल कोई बुद्ध ही उस भांति हंस सकता है । वे 3 फकीर निश्चित ही बुद्ध रहे होंगे । ओशो

01 दिसंबर 2011

जब हजारों बिच्छुओं के एक साथ डंक मारने के समान भयानक पीङा होती है

क्या हम इसी जीवन में उन रहस्य को जान सकते हैं । जिसे मनुष्य मरने के बाद जान पाता है ?
( लेख - डर के पास रहने से डर खत्म हो जाता है । और - काफ़ी समय से मैं आपके लेख पढता आ रहा हूँ । )
- बङी हैरानी सी होती है । जब कोई ऐसी विरोधाभासी बात कहता है । सबसे बङी बात जिस लेख को पढने के बाद - डर के पास रहने से डर खत्म हो जाता है । आपने उसके जिक्र सहित मेल लिखा । और - काफ़ी समय से मैं आपके लेख पढता आ रहा हूँ । जैसी बात भी कही । तब यकायक तो मेरी समझ में नहीं आता कि किस तरह से और क्या उत्तर दूँ । जिससे प्रश्नकर्ता की जिज्ञासा समाधान होने के साथ साथ संतुष्टि भी हो । क्योंकि - डर के पास रहने से डर खत्म हो जाता है । ये पूरा लेख ही इस प्रश्न का उत्तर ही है । चलिये । वह बात भी छोङ दें । तो मेरे समस्त लेखन की एक समग्र ध्वनि ही " जीवन के पार " की ही बात  करती है । ऐसी स्थिति में बङी अङचन सी लगती है कि - अब क्या उत्तर दूँ ? खैर..आपके प्रश्न का एक भाव अवश्य बनता है । साधारण स्थिति में । यानी विशेष कोई ज्ञानयुक्त हुये बिना ।

लेकिन यहाँ भी हैरानी फ़िर से होती है । आप खुद ही एक रहस्यमय सुगन्ध का अनुभव करते हैं । और एक बच्चे  द्वारा ली गयी किसी प्रेतात्मा की तस्वीर भी भेजते  हैं । इसके साथ ही आप खुद ही पूर्व जन्म की बहुत सी घटनाओं का संकलन करके भेजते हैं । तो मेरे ख्याल में 50% उत्तर तो स्वयँ आपने ही दे दिया ।
फ़िर भी आपका प्रश्न मुझे अतीत के उस खण्ड में ले गया । जब मौत और शमशानों के साथ ही मेरी उठक बैठक थी । मैं उस समय एक छोटे से क्षेत्र में था । और एक पोखर के पास बैठा था । यहाँ दूर दूर तक खेत बंजर जमीन और निर्जनता थी । पोखर के पास ही एक सीधी लाइन में पाँच पुराने आम के बङे वृक्ष थे । इस स्थान पर महीने में ( या शायद 15 दिन में ) एक बार पशु मेला का आयोजन होता था । जिसके लिये एक मध्यम आकार का मैदान था । इस मैदान से ही लगा हुआ दक्षिण दिशा में एक लम्बा दङा (  कच्चा रास्ता ) था । और इस दङे के बाद  400 वर्ग गज भूमि में एक हिन्दू शमशान था । इसके बाद 6 खेत थे । और उसके बाद मेरा लम्बा चौङा विधालय । उसके बाद स्थानीय पुलिस थाना ।
खैर..ये पूरा क्षेत्र ही मेरे जीवन में प्रभावी रहा । अतः इसके विषय में आगे लिखूँगा । मुख्य बात ये थी । जिस स्थान पर मैं बैठा या बैठता था । उसके प्रति मुझे एक खास आकर्षण था । वहाँ ये बात आम प्रचलित थी कि इसी

दङे के अंतिम छोर पर 7 किमी पीछे स्थिति छोटे से गाँव से कुछ ही आगे बीच में कहीं से । और आगे जाकर लगभग 8 किमी दूरी पर । ये 15 किमी का दङा जहाँ समाप्त होता था । अक्सर भूत प्रेतों की सवारी निकलती थी । जिसे लोग बारात । जुलूस । यात्रा आदि बहुत से नाम देते थे । ये यात्रा अक्सर  सुनसान दोपहर या फ़िर अँधेरे में गुजरती थी । प्रेतों की हँसती खिलखिलाती टोली गाती बजाती हुयी निकलती थी । अब मजे की बात यही थी कि यह शार्टकट ही मेरे स्कूल का रास्ता था । और मेरे लिये चप्पा चप्पा परिचित । आगे हुआ ये कि एक दिन एक आदमी ने मुझ बिना मूँछ वाले छोटे से आदमी को देखकर कहा  - बेटा ! इस स्थान पर तुम अक्सर आते तो हो । पर ऐसा कभी दिखे । तो कोई टोका टाकी मत करना । कहीं छिपकर बिलकुल सांस रोके देखते रहना । और जब यात्रा गुजर जाये । तब शान्ति से निकलकर अपने गंतव्य पर जाना । और यथासंभव इस रास्ते का उपयोग मत किया करो ।
अनजाने में बङी गलती हुयी उससे । भूली हुयी नानी को ननिहाल की न सिर्फ़ याद दिला दी । बल्कि ठीक ठीक

पता भी बता दिया । घोस्ट माय दोस्त । अब वह जगह भी मेरे बैठने का स्थान बन गयी । कभी कभी चितायें भी जलती । और मैं उनको जलते हुये देखता ।
पर इस स्थान पर बैठने का एक अलग अनुभव भी था । अक्सर गर्दन या सिर के किसी हिस्से में ठण्डी फ़ुरफ़ुराहट । ( प्रेत के समीप होने का यह अहसास भी होता है । इसमें ठीक ऐसा लगता है कि कोई गर्दन के पास नाक लगाये स्वांस छोङ रहा है । अन्तर इतना होता है । जीवित व्यक्ति की स्वांस में हल्की गर्माहट होती है । और ये सामान्य हवा । बाकी अहसास लगभग समान होता है । खास पहचान यही है कि ये गर्दन से नीचे महसूस नहीं होगा । )
मुश्किल ये थी कि उस समय मैं प्रेत वायु के इस रूप से परिचित नहीं था । बाकी शरीर के रोंगटे आदि खङे होना आदि पहचान से भी उस समय मैं अनभिज्ञ था । और भासित छाया मुझे दिखे भी । तो होगा कुछ । जैसी बात थी । उस वक्त भूत प्रेत की छवि मेरे लिये नर कंकाल वाली थी । और वास्तविक भूत मुझे बस छाया शरीर ही लगते । भाव ये कि मुझे समझ ही नही थी कि ये भूत हैं । इससे भी बङी मुश्किल ये थी कि किसी को बताऊँ । तो वो एक ही बात कहता था - चल झूठा । जीवन की अज्ञात भूमि में वैराग का बीजारोपण ।

और अलौकिकता की शायद शुरूआत हो चुकी थी ।
तब कुछ साल बाद । ऐसे ही एक स्थान पर वृक्ष के नीचे बैठा था । सिर्फ़ दस फ़ुट दूर चिता जलने से बने 4 काले स्थान थे । एक आदमी मेरे पास आया । किसी अन्तिम संस्कार से आया था । उसी का प्रभाव था । गमछे से पसीना पोंछता हुआ बोला - क्या जीवन है । इंसान का भी । कोई कह सकता है । मरने के बाद इंसान का क्या होता है । और वह कहाँ जाता है ?
- बिलकुल । मैंने साधारण भाव से कहा - इन सब बातों के उत्तर हैं । और बहुत पास हैं । यहीं हैं । जानना भी बहुत आसान है ।
वह हक्का बक्का रह गया । उसने मेरी तरफ़ ऐसे देखा । जैसे मैं पूरा पागल होऊँ ।
- और । जीवन के पार देखने का दरबाजा वह है । मैंने चिता स्थान की तरफ़ इशारा किया - बस ठीक उस स्थान पर बैठो । और मौज आने पर लेटो भी । सच बङी शान्ति महसूस होगी । बिना प्रयास वैराग फ़लीभूत होगा । बहुत से उत्तर भी मिलेंगे । सच कहता हूँ । इससे सुन्दर जगह दूसरी नहीं । इंसान के पूरे जीवन का अन्तिम निचोङ । अटल सत्य । 2 गज जमीन ।
उसने गौर से मुझे देखा । और बोला - तुम बैठ सकते हो । जो ऐसा कहते हो ।
मैं बैठ क्या सकता था । बैठता ही था । लेटता भी था । अतः मौखिक उत्तर देना निरी मूर्खता ही थी ।
- सच । मैंने वहीं से कहा -  आओ । तुम्हें एक नयी दृष्टि जागृत होगी । जीते जी मरने का अनुभव । जा मरिवे में जग डरे । मेरे मन आनन्द । मरने से ही पाईये पूरा परमानन्द ।
जाहिर है । वह मेरे समान पागल नहीं था । बिना एक भी पल गंवाये । वह तुरन्त वहाँ से रफ़ूचक्कर  हो गया ।

शायद मेरी बातों और हरकत से उसे मेरे इंसान होने पर संदेह हो गया था ।
तो ये थी वो सब बात  । जो आपके इस प्रश्न से मुझे अतीत में ले गयी । सच कहूँ । यादों में जाना बङा सुखद लगा । अब आपके प्रश्न पर बात करते हैं । दरअसल मैं इस प्रश्न की भावना को ही नहीं समझ पाया कि आपका आशय क्या है ?.. जिसे मनुष्य मरने के बाद जान पाता है ?
- मनुष्य मरने के बाद क्या जानता है ? मूलतः मरने का समय आते ही उसके कुछ लक्षण 1 महीना या 15 दिन पूर्व प्रकट होने लगते हैं । आँखों में पीलापन छाना । गंदलापन और भूरे से डोरे बनना । माथे पर मूल रेखाओं के अतिरिक्त महीन रेखाओं का एक जाल सा नजर आना । आँखों में ही मुर्दनी छाना । जीवन की गतिविधियों से अजीव सी उलझन महसूस करना । अजीव से स्वपन देखना । प्रत्यक्ष या स्वपन में काली छाया देखना । कोई नग्न स्त्री देखना । जो आलिंगन हेतु बाँहे फ़ैलाकर बुलाये ।
ये कुछ पूर्व लक्षण हुये । अब आ जाईये । द एण्ड पर । सामान्यतः तीन दिन पूर्व मृतक को अहसास होने लगना कि - अब कूच का वक्त आ गया । अक्सर घर वालों से उदासीनता होकर । शान्त और अनमनस्यकता आ जाना । अधिकतर को इसी समय में आंतरिक जगत के भी कूछ विभिन्न अनुभव होते हैं । पर एक अजीव सा ताला उसकी जबान पर लग जाता है । वह चाहे भी तो नहीं बता सकता । इसके बाद । मृत्यु का समय बिलकुल करीब

आ गया । अब 4 चक्रों का टूटना लय होना शुरू हुआ । जिसके बारे में विस्तार से मैं अपने लेख - साधारण स्थिति का मृत्यु ज्ञान..में लिख ही चुका हूँ ।
इन चक्रों के टूटने में आदमी को बेहद पीङा का अनुभव होता है । क्योंकि वह मोहवश इनसे बुरी तरह जकङा हुआ होता है । इस स्थिति में मृतक को हजारों जहरीले बिच्छुओं के एक साथ ही डंक मारने के समान भयानक पीङा होती है । ध्यान रहे । वह न रो पायेगा । न बता पायेगा । पर इस पीङा की अभिव्यक्ति उसके चेहरे से होती है । कोई कोई इस स्थिति में कुछ शान्त नजर आता है । पर अन्दर ऐसा ही होता है । ये अदभुत विधि अपनाने का कारण ही यह है कि - आसपास के लोग फ़ालतू हंगामा न करें । अधिक भयभीत न हों । ये बात शास्त्र और अनुभव दोनों से कह रहा हूँ । इस तरह चार चक्र टूटने के बीच ही सबसे खतरनाक समय आता है । चक्र भी टूट रहे हैं । और काल अपनी भूख शान्त करने के लिये जीव का आहार करने हेतु जबङे में दबा लेता है ।  और चबाता है । ये ठीक वो समय है । जब मरने वाले को बेहोशी या मूर्छा आ जाती है । जगत चबैना काल का कछू मुख में कछू गोद । झूठे सुख से सुखी है मानत है मन मोद । यही वो लगभग स्थिति है । जब संसारी लोगों के लिये इंसान मर जाता है । और व्यवहारिक रूप से सच भी है । ह्रदय की धङकन । प्राण का चलना बन्द हो जाता है । पर इंसान मरता नहीं है । लगभग आधा घन्टे काल उसका आहार करने के बाद जीव को छोङ देता है । और तब वो गति अनुसार स्थितियाँ बनती हैं । जो मेरे लेख - साधारण स्थिति का मृत्यु ज्ञान.. में पूर्व ही वर्णित हो चुकी हैं ।
तो मेरे अनुसार तो आदमी मृत्यु के समय या बाद इतना ही जान पाता है । हाँ ये हो सकता है कि आपका आशय उन अनुभवों से हो । जो मैंने मृत्यु के आसपास होने वाले आंतरिक अनुभव बताये हैं । इसमें तब वाकई कुछ अलग स्थितियाँ बनती हैं । जब आदमी को किसी विशेष प्रयोजन से मृत्यु सम स्थिति से गुजरना होता है । या यमदूतों की गलती से उसे मृत्यु का बुलावा आ जाता है । और तब कुछ लोग विचित्र अलौकिक अनुभवों के साथ वापिस आकर बताते हैं । क्या होता है । इनका सच । अगले लेख में ।
वास्तव में ये भाव मैं पहले ही समझ गया था । और इन्हीं के विवरण हेतु ये लेख भी लिखा था । पर संयोगवश प्रवाह दूसरी तरफ़ हो गया । और मूल बात शुरू भी नहीं हुयी । अतः यों मानिये । समस्त चर्चा ही अगली बार ।
आप सबके अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम

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