30 मार्च 2012

जल्द ही समय परिवर्तन होने वाला है

राजीव जी ! नमस्कार ! सबसे पहले तो आपको धन्यवाद " सत्यकीखोज " एक बेहतर ब्लॉग के लिए । मैंने कल शाम आपसे मोबाइल पर बात करी थी । याद आया बीकानेर से । हाँ ! अब याद आ गया आपको ।
राजीव जी ! पिछले 3 दिनों में मैंने आपके इस ब्लॉग के वो सभी पोस्ट पढ़ लिए । जिनमें मुझे रूचि थी । वैसे तो सभी पोस्ट अपने आप में अच्छे हैं । मगर मुझे वो पोस्ट काफी अच्छे लगे । जिसमे आपने अपने गुरु जी के माध्यम से बताया है कि - इस धरा पर संक्रमण काल चल रहा है । और जल्द ही एक नया अभिर्भाव इस सृष्टि पर होने जा रहा है ।
हमारे पूज्य गुरुवर स्वामी...... जी  अवधूत महाराज ( 125 वर्षीय ) ( आपसे अनुरोध है कि इन स्वामी अवधूत का नाम आप अगर इस मेल को ब्लॉग में लिखते हो । तो इनका नाम ना लिखे ) भी संकेतो में यही बताते है कि - इस धरती पर काफी संत और सिद्ध है । जो इस धरती को मुख्यत भारत । जो कि अभी विभिन्न खंडो में विभाजित है । उसको पुन: आर्यावर्त । जो पुरातन काल में था । उसके निर्माण में
युगों से लगे हुए है ।
मगर कोई ना कोई व्यवधान उत्पन्न होता रहता है । मगर अब समय ज्यादा दूर नहीं है । और जल्द ही समय परिवर्तन होने वाला है ।
हमारे आस पास के लोगो को जब मैं इस बारें में चर्चा करता हूँ । तो वो हँसते हैं । और इसे केवल ख्याली पुलाव बतातें हैं । मगर मुझे पता है कि इस महान कार्य में कई लोग लगे हुए है । जो अनवरत अपने इस निस्वार्थ कार्य में लगे हुए है

। आपके गुरुदेव और आपको इस पुण्य कार्य में संलग्नता के लिए शत शत नमन !
आपका ही - दीपक कुमार जैन

26 मार्च 2012

मेरी सहायता कीजिये ।

Sri Rajeev ji, Maine aapka blog padha, mujhe bahut pasand aaya, main aapko apne baare mai batana chahta hu.... mai almora se hu, jo ki uttrakhand mai hai, is waqt mai mumbai mai kaam karta hu, mera law of karma mai bahut wishwaas hai, mai jitna koshish ho sake aapne karam ko sahi rakhna chahta hu, per meri life style aur mera kaam mujhe selfish hone mai majhboor karta hai, ek ko pakdo to dusra haath se nikal jaye, aab mujhe life bahut beimaani si lagti hai, mujhe khuch bhi galat kar ke paisa nahi kamana hai, per iss sheher mai paisa he sab kuch hai, mujhe kisi ko hurt nahi karna chahta hu, per main aaj kal bahut pareshaan hu,
mai bachpan se enlightened ko satya aur aapni zindgi ka laqshya bana ke chala hu.. per aab yeh sab mujhe bahut pareshaan karta hai, na mai aapna kaam theek se kar paata hu . na hee sadhna, mai kya karu ? MERI SAHAYATA KIJIYE
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pujniya baba rajeev ji - pranam
hum ko guru ki jaroorat hai . jo ki hum ko marg darshan karen . hum balaji, shri ram ki puja karte hain . hamari jivan men kai musibate hai . kuchh bhi najar nahi aata hai . kya kareन ? yadi aap hamari madad kar sakte hai . to karen . hamara janam time : 18.56pm / place : Bikaner rajasthan / date of birth : 10.08.1963  . aage aap jane . krupa reply jaroor dena.   aap ka bhagat - anil
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अभी एक नयी अलौकिक कहानी पर कार्य कर रहा हूँ । जिसके 16 part हो चुके हैं । अब क्योंकि कहानी समाप्ति की ओर है । आपके उत्तर शीघ्र ही दिये जायेंगे । और यथासंभव आपकी सहायता भी की जायेगी । बस अभी इतना ही कह सकता हूँ । ये कोई परेशानियाँ नहीं । इनको हल करना बहुत आसान है । बाकी  शीघ्रता होने पर आप श्री महाराज जी से सीधे फ़ोन पर बात कर सकते हैं ।  फ़ोन न . है - 96398 92934

21 मार्च 2012

किसी दूसरे गुरु के लेख पढना सही है ?

जय गुरुदेव जी की । राजीव भैया सादर प्रणाम । गुरूजी से गुरु दीक्षा लेने के बाद उनके अनुसार तथा आपके मार्ग दर्शन के अनुसार ध्यान के मार्ग पर चलने की कोशिश कर रहे है । अभी हम सुचारू रूप से ध्यान कर नहीं पा रहे है । आगे का रास्ता तो बहुत लम्बा है । आशा करते है कि गुरूजी की उंगली पकड़ कर उसे प्राप्त कर लेंगे । आजकल आपका कोई नया लेख नहीं आ रहा है । मैं और मेरा दोस्त आजकल नए वेब लिंक देख रहे है । जो ओशो से सम्बन्धित है । कृपया ये बताये कि किसी दूसरे गुरु के लेख पढना सही है । या नहीं । हम जल्दी ही गुरूजी के आश्रम में कुछ दिन ( 8-10) आने का प्रोग्राम बना रहे हैं ।
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जैसा कि मैं बहुत पहले ही अपने पूर्व के कई लेखों में स्वीकार कर चुका था कि आत्म ज्ञान की हँस दीक्षा का जो उचित तरीका है । वह फ़िलहाल ( उस समय नहीं था ) हमारे पास नहीं है । जैसे कि आपकी दीक्षा भले ही सतसंगियों के घर में हुयी थी । पर वहाँ आसपास दूसरे घरों की लौकिक वासना तरंगों का जोर अधिक था । दीक्षा के लिये तप युक्त सिद्ध स्थान और उससे भी अच्छा कोई सिद्ध गुफ़ा या अंडर ग्राउण्ड कक्ष अधिक बेहतर होता है । 


अब कुछ महीनों से हमारी यह कमी दूर हो गयी । हमारा आश्रम दीक्षा के लिये एकदम उचित और अति पवित्र पावन स्थल है । जहाँ चहुँ ओर सात्विक तरंगे ही फ़ैली होती है । अगर आपकी दीक्षा मेरे घर या उस घर में जहाँ आपसे मुलाकात हुयी थी । होती । तब इनके % में उसी अनुपात में अंतर आ जाता । मेरे घर कम से कम 70% हमारी मुलाकात वाले घर में 30% और जहाँ आपकी हुयी थी । वहाँ बहुत हद 5% या 10% दीक्षा प्रभावी होती । आपको याद होगा । हमारी बातचीत के समय ही मैंने यह तथ्य स्पष्ट कर दिया था । इसके बाद जब आश्रम सुचारु रूप से चलने लगा । तब मैंने सूचना भी प्रकाशित की थी कि जिन दीक्षित लोगों की ध्यान में सही प्रविष्ट न हुयी हो । वह फ़िर से आकर ध्यान को improve कर सकते हैं । बस इससे ज्यादा  हम लोग कुछ नहीं कर सकते । कुछ पाना है । तो फ़िर श्रम और यात्रा करनी ही होगी । लेकिन जब भी आयें । श्री महाराज जी से पूर्व अनुमति लेकर ही आयें । जो कि वो आपको आश्रम पर ही मिल सकें । और आपका आना व्यर्थ न हो । ये अच्छा है । 8-10 दिन का समय निकाल कर आने से आपकी ध्यान में ठीक प्रविष्ट हो जायेगी ।
नेट से जुङे ऐसे लोगों की अभी दीक्षा हुयी है । और उन्हें अच्छा लाभ मिला । उनका अधिकतर का % 80 % तक

रहा । केवल होली पर आश्रम संस्थापक ( जिनकी 4-5 महीने पूर्व ही मृत्यु हुयी ) की गमी होने से आने जाने वालों की वजह से व्यवधान बना रहा । इधर U P में चुनाव की बहार थी । इसलिये ग्रामीण लोग राजनीतिक चर्चा के लिये भी इकठ्ठे हो जाते थे । वह झमेला अलग था । लेकिन अब ऐसा नहीं है । इसलिये रुके ध्यान वाले । या टुकङा टुकङा ध्यान वाले फ़िर से आ सकते हैं । अन्य लोग जो हमारे से जुङे नहीं है । यानी हमारे शिष्य नहीं है । वे भी आकर सहज योग ध्यान को  improve कर सकते हैं ।
आप ओशो या किसी भी अन्य छोटे बङे गुरु का साहित्य वाणी पढ सुन सकते हैं । उसमें कोई हर्ज नहीं । किसी भी सन्त वाणी से हमेशा लाभ ही होता है । हानि नहीं । और सन्त मत सिर्फ़ 1 परमात्मा की ही बात करता है । आप किसी दूसरे गुरु या साधु सन्त से विचार विमर्श भी कर सकते हैं । वह कुछ अनुभव करा सकें । तो वह भी कर सकते हैं । इस तरह की कोई रोक नहीं । और इसमें कुछ गलत नहीं । दरअसल इसी तरह आप सत्य को और भी अधिक स्पष्ट जानेंगे । और दूसरों और हम में क्या फ़र्क है । यह भी जान जायेंगे । ऐसी रोक टोक की बातें सिर्फ़ वही लोग करते हैं । जिनका ज्ञान नकली और मामूली होता है ।

पर सांच को आंच नहीं होती । सच्चाई छुप नहीं सकती झूठे उसूलों से । खुशबू आ नहीं सकती कागज के फ़ूलों से । हमें अच्छी तरह मालूम है । हमारे फ़ूल असली हैं । और महक रहे हैं । इसलिये हम जो भी कहते हैं । डंके की चोट पर कहते हैं । मैंने अब तो चैलेंज ही कर दिया - आप मेरा इस विश्व में सिर्फ़ कोई 1 विकल्प ही खोज कर दिखायें ।
- अभी पिछले कुछ दिनों से मैं एक बिलकुल अलग हटकर कहानी लिख रहा हूँ । जो बङी भी है । अतः नये लेखों का प्रकाशन नहीं हो पा रहा । पर कोई सूचना । या आवश्यक लेख का प्रकाशन कहानी के लिये कभी नहीं रुकेगा । बीच में ऐसी स्थिति बनने पर कहानी रोक कर उसका प्रकाशन होगा । मेरा एकमात्र उद्देश्य सार नाम और सहज योग का प्रचार करना मात्र है । उसके आगे कहानी जैसी तुच्छ वस्तु का कोई महत्व नहीं । कभी नहीं ।
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उत्तर लेख छपने के बाद प्रतिक्रिया मेल से - जय गुरुदेव जी की ! धन्यवाद । वैसे हम किसी और गुरु के लेख में नहीं जाना चाहते थे । पर आपके


अष्ट्रावक्र गीता के लिंकों के कुछ पार्ट पढने के बाद ही हमने ओशो को सर्च किया । इसमें हमारा किसी दूसरे रास्ते जाने को कोई मन नहीं है । क्योंकि जो अपने गुरु को नहीं समझ सकता । वो आगे तो क्या जाएगा  ? गुरु दीक्षा के बाद में मुझे जो लाभ हुआ है । ये बात मेरी आत्मा ही जानती है । आपसे बहुत मिलेगा । बहुत सी बाते करनी हैं । बहुत कुछ जानना है । लेकिन अभी मेरी परीक्षा चल रही है । ऑफिस से अभी इतना ( 8-10 दिन )  अवकाश भी नहीं मिल सकता । मैं अभी कुछ बिज़नेस डालने का भी प्रयास कर रहा हूँ । आशा है । गुरु जी की कृपा से इसमें सफल हो जाऊँगा । फिर जून में भूपेंद्र की परीक्षा है । तो हम आगे पीछे समय निकाल कर और गुरूजी से बात करके आयेगे । मैं अभी शारीरिक रूप से जयपुर में हूँ । लेकिन मन तो आश्रम में है । 

15 मार्च 2012

कोई तो 1 होगा । जो सबसे ऊपर होगा ।

जय श्री गुरुदेव की । राजीव जी ! इसके साथ साथ आपको सादर प्रणाम । मैं आपका सदा ही आभारी रहूँगा । क्योंकि आप यदि ब्लॉग न लिखते । तो मै न पढ़ पाता । न इतने सारे अध्यात्मिक गहराइयों  को जान  पाता । मेरे साथ साथ न जाने कितने लोगों को आपके ब्लॉग द्वारा लाभ मिल रहा है ।
मैं पेशे से चिकित्सक हूँ । मेरा जीवन शुरू से ही संघर्षमय रहा है । मेरे माता पिता जी ने बड़े कठिनाइयों से हम चार भाई और एक बहन की परवरिश  की । शिक्षा दिलाई । मेरे बड़े भाई कालीन का काम करते हैं । और छोटे दो भाइयों में एक सी ए की अंतिम वर्ष की पढाई कर रहे हैं । और सबसे छोटे प्रदीप घर पर पढाई के साथ माता पिता की देख रेख कर रहे हैं ।
मैं आपके ब्लॉग के सम्पर्क में 13 sept 2011 को एकाएक इन्टरनेट  पर फोटो सर्चिंग के दौरान एक फोटो के नीचे लिखे - ब्लैक विडो यानि काली विधवा का रहस्य । पढ़ कर आपके ब्लॉग तक पहुंचा । और ये कहानी पढ़ी । कहानी पढ़कर हमें लगा कि मैं जैसी सत्यता अंतर्जगत की जानना चाहता हूँ । बहुत कुछ इस कहानी में है । कुछ नई बातें पता चली । क्योंकि मै तंत्र मार्ग में 5 सालों से लगा हुआ था । लेकिन इतनी गहराइयों की बातें मुझे पता न थी ।
इसलिए इस कहानी का मुझ पर बड़ा फर्क पड़ा । मै इसके पहले कुछ हिन्दू  धर्म ग्रन्थों जैसे सुख सागर । प्रेम सागर । भागवत । देवी भागवत । रामचरित मानस । दुर्गा सप्तसती और तंत्र की कुछ गुप्त पुस्तकें । जैसे कुछ को पढ़ा था । और कई के बारे में सुना था । सब में अपने देवों को ही सुपर पावर बताया है । मैं इसको लेकर हमेशा शंका में था । जिस भी गुरु से पूछता । वो कहते । हमारे देव ही सबसे बड़े हैं । विश्वास करो । जरुर फल  मिलेगा । मै कहता - कोई तो 1 होगा । जो सबसे ऊपर होगा ।
कुछ गुरु लोग कहते । सब एक ही का रूप है । तो मै कहता । जब सब एक ही हैं । फ़िर अलग अलग रूपों में पूजा क्यों ? और बिरोधाभास क्यों ?
लेकिन मेरे प्रश्नों का समुचित उत्तर न मिल पाता । मैं ज्योतिष और तंत्र सम्बंधित अपनी जानकारी बढ़ाने हेतु  इन्टरनेट पर खोजता रहता कि एकाएक राजीव जी के ब्लॉग पर  ब्लैक विडो की कहानी मिली । मैंने सोचा कि कुछ बात सही मिली ।
लेकिन इसके दूसरे ही दिन कम्प्यूटर  में खराबी आ जाने के कारण सारे प्रोग्राम डिलीट हो गए । कम्प्यूटर बनने के बाद मैं दुबारा राजीव जी का ब्लॉग खोजने लगा । लेकिन पता भूल जाने के कारण  खोजते खोजते  15 दिन लग गए ।
जब दुबारा ब्लॉग मिला । तो एक एक करके राजीव जी के सारे लेखों को पढ़ा । बहुत ही अच्छी अच्छी बातें पता चली । रहस्यमय बातें पता चली । मुझे लगा कि मुझे अपनी मंजिल मिल गयी है । और फिर मैंने राजीव जी से फ़ोन पर बात की ।
राजीव जी ने हमारी बात गुरुदेव जी से कराई । गुरुदेव जी बहुत ही स्नेहशील है । मैंने अभी तक सभी लोगों से ज्ञान की सिर्फ बातें सुनी थी । लेकिन प्रक्टिकल करके कोई बताने वाला नहीं मिला । फिर मैंने निर्णय लिया कि हमें इस सनातन ज्ञान का दीक्षा लेकर प्रक्टिकल करना चाहिए ।
और मैंने गुरुदेव जी से बात की । दीक्षा लेने के लिए । उस समय काफी ठंडक पड़ रही थी । तो गुरुदेव जी ने थोडा और समय बीत जाने को कहा । ठंडक के कारण ।
होली के कुछ दिन पहले गुरुदेव जी ने आदेश दे दिए । और हमने अपने पूरे परिवार के साथ दीक्षा लेने की योजना बनायीं । इस साल हम होली पर घर न जाकर ( क्योंकि हम घर से दूर रहते हैं । और हर साल होली को जरुर घर जातें हैं । ) गुरुदेव जी के आश्रम पर चल दिए ।
आश्रम तक पहुंचने में कोई खास दिक्कत नहीं आयी । क्योंकि जाने के लिए वाराणसी से आगरा तक का आरक्षण कराया  था । आगरा से पहले टूंडला स्टेशन पर रुक कर वहां से गाड़ी से फिरोजाबाद आया । फिर वहां से फ़रिहा के लिए बस पकड़ी । उसी बस से कौरारी तक गए । वहां से नगला भादों आश्रम 2 किमी. था । वहां से कोई साधन नहीं था । तो हमने गुरुदेव जी को फ़ोन किया । तो उन्होंने तुरंत ही आश्रम पर रहने वाले पंची जी ( पंचम  ) को भेजा । और वो हमें बाइक पर आश्रम तक लिवा गए ।
पहली बार गुरुदेव जी का दर्शन हुआ । दर्शन पाकर मन बहुत ही हर्षित हुआ ।
क्योकि इतने उच्च कोटि के जानकार । अलौकिक विद्या के जानकार । और इतनी साधारण वेशभूषा । इतना साधारण रहन सहन ।
आश्रम पहुँच कर वहां का वातावरण काफी शांत । आसपास दूर दूर तक सिर्फ खेत झाड़ी नजर आ रही थी । यहाँ पर मोर बहुतायत की संख्यां में है । उनका वहां पर विचरण काफी अच्छा लगा । आसपास थोड़ी दूर  दूर कम आबादी वाला गाँव है । जहाँ के लोग आश्रम  पर गुरुदेव जी मिलने के लिए आतें रहते हैं । उन लोगों से भी हमारी परिचय हुआ । वे लोग भी सरल स्वाभाव के थे । सभी प्रेम पूर्वक बातें करते । सम्मान देते । अतः हम लोगों कोई दिक्कत नहीं थी ।
हंस दीक्षा के बारें में अभी ज्यादा नहीं बता सकता । क्योंकि उसका अनुभव अभी बहुत ज्यादा नहीं है । और अनुभव बताये भी नहीं जाते । पर हमने सत्य को देखा जाना । जो भी सत्य है । हमारे अन्दर ही है । न कि मन्दिर मस्जिद में । अभी अभी हमने गुरुदेव जी से दीक्षा ली है । इसके बारे में हमने ज्यादातर बातें राजीव जी से ही पता चली है । जो उन्होंने अपने ब्लॉग के माध्यम से सबके लिए सुलभ कराया है । लेकिन एक बात जरुर है कि - ज्ञान व दीक्षा के बारें में गुरुदेव जी का कहना है कि - ये प्रक्टिकल की बात है न कि सिर्फ मानने की । उनका कहना है - पहले जानो । फिर मानो । और ये ज्ञान जानने के लिए दीक्षा लेना जरुरी है । क्योंकि तभी आप उसके अधिकारी हो सकते हैं ।
दीक्षा के लिए बहुत कुछ करने की जरुरत नहीं है । जैसा कि राजीव जी ने अपने ब्लॉग में बताया था कि पांच फ़ूल से लेकर कुछ रुपयों तक में ये दीक्षा हो सकती है । हमसे पैसे का कोई भी बिलकुल मांग नहीं की गयी । और हम लोगो की थोड़े से ही खर्चे में दीक्षा हो गयी ।
राजीव जी आप हमारे मार्गदर्शक भी  है । और इस समय आप हमारे बड़े गुरु भाई भी बन गए । आप हमारा मार्गदर्शन करते रहें । यह मन की आवाज लिखने में जो कुछ त्रुटि हुयी हो । उसे क्षमा करने की कृपा करें । आपका -  डा.संजय केशरी । वाराणसी ।

11 मार्च 2012

सहारे के लिए कोई मंत्र दो

आधारहीन, शाश्‍वत, निश्‍चल आकाश में प्रविष्‍ट होओ । इस विधि में आकाश के स्‍पेस के 3 गुण दिए गए हैं ।
1 आधारहीन - आकाश में कोई आधार नहीं हो सकता ।
2 शाश्‍वत - वह कभी समाप्‍त नहीं हो सकता ।
3 निश्‍चल - वह सदा ध्‍वनि रहित व मौन रहता है ।
इस आकाश में प्रवेश करो । वह तुम्‍हारे भीतर ही है । लेकिन मन सदा आधार खोजता है । मेरे पास लोग आते है । और मैं उनसे कहता हूं - आंखें बंद करके मौन बैठो । और कुछ भी मत करो । और वे कहते है - हमें कोई अवलंबन दो । सहारा दो । सहारे के लिए कोई मंत्र दो । क्‍योंकि हम खाली बैठ नहीं सकते हैं । खाली बैठना कठिन है । यदि मैं उन्‍हें कहता हूं कि - मैं तुम्‍हें मंत्र दे दूं । तो ठीक है । तब वह बहुत खुश होते हैं । वे उसे दोहराते रहते हैं । तब सरल है । आधार के रहते तुम कभी रिक्‍त नहीं हो सकते । यही कारण है कि वह सरल है । कुछ न कुछ होना चाहिए । तुम्‍हारे पास करने के लिए कुछ न कुछ होना चाहिए । करते रहने से कर्ता बना रहता है । करते रहने से तुम भरे रहते हो । चाहे तुम ओंकार से भरे हो । ओम से भरे हो । राम से भरे हो । जीसस से । आवमारिया से । किसी भी चीज से । किसी भी चीज से भरे हो । लेकिन तुम भरे हो । तब तुम ठीक रहते हो । मन खालीपन का विरोध करता है । वह सदा किसी चीज से भरा रहना चाहता है । क्‍योंकि जब तक वह भरा है । तब तक चल सकता है । यदि वह रिक्‍त हुआ । तो समाप्‍त हो जाएगा । रिक्‍तता में तुम अ-मन को उपलब्‍ध हो जाओगे । वही कारण है कि मन आधार की खोज करता है । यदि तुम अंतर आकाश, इनर स्‍पेस में प्रवेश करना चाहते हो । तो आधार मत खोजो । सब सहारे - मंत्र, परमात्‍मा, शास्‍त्र । जो भी तुम्‍हें सहारा देता है । वह सब छोड़ दो । यदि तुम्‍हें लगे कि किसी चीज से तुम्‍हें सहारा मिल रहा है । तो उसे छोड़ दो । और भीतर आ जाओ । आधारहीन । यह भयपूर्ण होगा । तुम भयभीत हो जाओगे । तुम वहां जा रहे हो । जहां तुम पूरी तरह खो सकते हो । हो सकता है । तुम वापस ही न आओ । क्‍योंकि वहां सब सहारे खो जाएंगे । किनारे से तुम्‍हारा संपर्क छूट जाएगा । और नदी तुम्‍हें कहां ले जाएगी । किसी को पता नहीं । तुम्‍हारा आधार खो सकता है । तुम 1 अनंत खाई में गिर सकते हो । इसलिए तुम्‍हें भय पकड़ता है । और तुम आधार खोजने लगते हो । चाहे वह झूठा ही आधार क्‍यों न हो । तुम्‍हें उससे राहत मिलती है । झूठा आधार भी मदद देता है । क्‍योंकि मन को कोई अंतर नहीं पड़ता कि आधार झूठा है । या सच्‍चा है । कोई आधार होना चाहिए । 1 बार 1 व्‍यक्‍ति मेरे पास आया । वह ऐसे घर में रहना था । जहां उसे लगता था कि - भूत प्रेत है । और वह बहुत चिंतित था । चिंता के कारण उसका भ्रम बढ़ने लगा । चिंता से वह बीमार पड़ गया । कमजोर हो गया । उसकी पत्‍नी ने कहा - यदि तुम इस घर से जरा रुके । तो मैं तो रहीं हूं । उसके बच्‍चों को 1 संबंधी के घर भेजना पडा । वह आदमी मेरे पास आया । और बोला - अब तो बहुत मुश्‍किल हो गयी है । मैं उन्‍हें साफ साफ देखता हूं । रात वे चलते है । पूरा घर भूतों से भरा हुआ है । आप मेरी मदद करें । तो मैंने उसे अपना 1 चित्र दिया । और कहा - इसे ले जाओ । अब उन भूतों से मैं निपट लूंगा । तुम बस आराम करो । और सो जाओ । तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है । उनसे मैं निपट लूंगा । उन्‍हें मैं देख लूंगा । अब यह मेरा काम है । और तुम बीच में मत आना । अब तुम्‍हें चिंता नहीं करनी है । वह अगले ही दिन आया । और बोला - बड़ी राहत मिली । मैं चैन से सोया । आपने तो चमत्‍कार कर दिया । और मैंने कुछ भी नहीं किया था । बस 1 आधार दिया । आधार से मन भर जाता है । वह खाली न रहा । वहां कोई उसके साथ था । सामान्‍य जीवन में तुम कई झूठे सहारों को पकड़े रहते हो । पर वे मदद करते हैं । और जब तक तुम स्‍वयं शक्‍तिशाली न हो जाओ । तुम्‍हें उनकी जरूरत रहेगी । इसीलिए मैं कहता हूं कि यह परम विधि है - कोई आधार नहीं ।
बुद्ध मृत्‍यु शय्या पर थे । और आनंद ने उनसे पूछा - आप हमें छोड़कर जा रहे है । अब हम क्‍या करेंगें ? हम कैसे उपलब्‍ध होंगे ? जब आप ही चले जाएंगे । तो हम जन्‍मों जन्‍मों के अंधकार में भटकते रहेंगे । हमारा मार्गदर्शन करने के लिए कोई भी नहीं रहेगा । प्रकाश तो विदा हो रहा है । तो बुद्ध ने कहा - तुम्‍हारे लिए यह अच्‍छा रहेगा । जब मैं नहीं रहूंगा । तो तुम अपना प्रकाश स्‍वयं बनोगे । अकेले चलो । कोई सहारा मत खोजों । क्‍योंकि सहारा ही अंतिम बाधा है । और ऐसा ही हुआ । आनंद संबुद्ध नहीं हुआ था । 40 वर्ष से वह बुद्ध के साथ था । वह निकटतम शिष्‍य था । बुद्ध की छाया की भांति था । उनके साथ चलता था । उनके साथ रहता था । उनका बुद्ध के साथ सबसे लंबा संबंध था । 40 वर्ष तक बुद्ध की करूणा उस पर बरसती रही थी । लेकिन कुछ भी नहीं हुआ । आनंद सदा की भांति अज्ञानी ही रहा । और जिस दिन बुद्ध ने शरीर छोड़ा । उसके दूसरे ही दिन आनंद संबुद्ध हो गया - दूसरे ही दिन । वह आधार ही बाधा था । जब बुद्ध न रहे । तो आनंद कोई आधार न खोज सका । यह कठिन है । यदि तुम किसी बुद्ध के साथ रहो । वह बुद्ध चला जाए । तो कोई भी तुम्‍हें सहारा नहीं दे सकता । अब कोई भी ऐसा न रहेगा । जिसे तुम पकड़ सकोगे । जिसने किसी बुद्ध को पकड़ लिया । वह संसार में किसी और को न पकड़ पायेगा । यह पूरा संसार खाली होगा । 1 बार तुमने किसी बुद्ध के प्रेम और करूणा को जान लिया हो । तो कोई प्रेम, कोई करूणा उसकी तुलना नहीं कर सकती । 1 बार तुमने उसका स्‍वाद ले लिया । तो और कुछ भी स्‍वाद लेने जैसा न रहा । तो 40 वर्ष में पहली बार आनंद अकेला हुआ । किसी भी सहारे को खोजने का कोई उपाय नहीं था । उसने परम सहारे को जाना था । अब छोटे छोटे सहारे किसी काम के नहीं । दूसरे ही दिन वह संबुद्ध हो गया । वह निश्‍चित ही आधारहीन, शाश्‍वत निश्‍चल अंतर आकाश में प्रवेश कर गया होगा । तो स्‍मरण रखो । कोई सहारा खोजने का प्रयास मत करो । आधारहीन ही जानो । यदि इस विधि को कहने का प्रयास कर रहे हो । तो आधारहीन हो जाओ । यही कृष्‍ण मूर्ति सिखा रहा है - आधारहीन हो जाओ । किसी गुरु को मत पकड़ो । किसी शास्‍त्र को मत पकड़ो । किसी भी चीज को मत पकड़ो । सब गुरु यही करते रहे है । हर गुरू का सारा प्रयास ही यह होता है  कि पहले वह तुम्‍हें अपनी और आकर्षित करे । ताकि तुम उससे जुड़ने लगो । और जब तुम उससे जुड़ने लगते हो । जब तुम उसके निकट और घनिष्ठ होने लगते हो । तब वह जानता है कि पकड़ छुड़ाना होगा । और अब तुम किसी और को नहीं पकड़ सकते । यह बात ही खत्म हो गई । तुम किसी और के पास नहीं जा सकते । यह बात असंभव हो गई । तब वह पकड़ को काट डालता है । और अचानक तुम आधारहीन हो जाते हो । शुरू शुरू में तो बड़ा दुःख होगा । तुम रोओगे । और चिल्‍लाओगे । और चीखोगे । और तुम्हें लगेगा कि - सब कुछ खो गया । तुम दुःख की गहनत्म गहराइयों में गिर जाओगे । लेकिन वहां से व्‍यक्‍ति उठता है - अकेला और आधारहीन ।
आधारहीन, शाश्‍वत, निश्‍चल आकाश में प्रविष्‍ट होओ । उस आकाश को न कोई आदि है । न कोई अंत । और वह आकाश पूर्णत: शांत है । वहां कुछ भी नहीं है - कोई आवाज भी नहीं । कोई आवाज भी नहीं । कोई बुलबुला तक नहीं । सब कुछ निश्‍चल है । वह बिंदु तुम्‍हारे ही भीतर है । किसी भी क्षण तुम उससे प्रवेश कर सकते हो । यदि तुममें आधारहीन होने का साहस है । तो इसी क्षण तुम उसमें प्रवेश कर सकते हो । द्वार सुला है । निमंत्रण सबके लिए है । लेकिन साहस चाहिए - अकेले होने का । रिक्‍त होने का । मिट जाने का । और मरने का । और यदि तुम अपने भीतर आकाश में मिट जाओ । तो तुम ऐसे जीवन को पा लोगे । जो कभी नहीं मरता । तुम अमृत को उपलब्‍ध हो जाओगे । ओशो 

चिंताहरण आश्रम

ऊमरि तरु बिसाल तव माया । फल बृह्मांड अनेक निकाया ।
                                    जीव चराचर जंतु समाना । भीतर बसहि न जानहिं आना ।
ते फल भच्छक कठिन कराला । तव भय डरत सदा सोउ काला ।
जद्यपि बृह्म अखंड अनंता । अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता 
कहहु ज्ञान बिराग अरु माया । कहहु सो भगति करहु जेहि दाया ।
ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ । जातें होइ चरन रति सोक मोह भृम जाइ 
मैं अरु मोर तोर तै माया । जेहि बस कीन्हे जीव निकाया ।
गो गोचर जहँ लग मन जाई । सो सब माया जानहु भाई ।
तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ । बिद्या अपर अबिद्या दोऊ ।
एक दुष्ट अतिसय दुख रूपा । जा बस जीव परा भव कूपा ।
एक रचइ जग गुन बस जाके । प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताके ।
ज्ञान मान जहँ एकउ नाहीं । देख बृह्म समान सब माही ।
कहिअ तात सो परम बिरागी । तृन सम सिद्धि तीन गुन त्यागी ।
माया ईस न आपु कहु जान कहिअ सो जीव । बंध मोच्छ प्रद सर्ब पर माया प्रेरक सीव ।
धर्म ते बिरति जोग ते ग्याना । ज्ञान मोच्छ प्रद बेद बखाना ।
जाते बेगि द्रवउ मैं भाई । सो मम भगति भगत सुखदाई ।
डा. संजय  । डा. संजय की पत्नी । डा. संजय की बेटी । डा. संजय का बेटा
            सो सुतंत्र अवलंब न आना । तेहि आधीन ज्ञान बिज्ञाना । ???
        भगति तात अनुपम सुखमूला । मिलइ जो संत होइ अनुकूला ।
भगति कि साधन कहउ बखानी । सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी ।
काम आदि मद दंभ न जाके । तात निरंतर बस मैं ताके ।
बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहि निकाम । तिन्ह के हृदय कमल महु करउ सदा बिश्राम ।
एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा । तब मम धर्म उपज अनुरागा ।
सेवक सुख चह मान भिखारी । ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी ।
लोभी जसु चह चार गुमानी । नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी ।
                                                                  डा. संजय
डा. संजय चिंताहरण आश्रम से दीक्षा प्राप्ति के बाद लौटकर । इसका विवरण अलग से लेख में प्रकाशित होगा । आपका बहुत बहुत आभार संजय जी ।

चिंताहरण आश्रम से

राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा । हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा ।
बिद्या बिनु बिबेक उपजाए । श्रम फल पढ़े किए अरु पाए ।
नवनि नीच कै अति दुखदाई । जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई ।
भयदायक खल कै प्रिय बानी । जिमि अकाल के कुसुम भवानी ।
निगम नेति सिव ध्यान न पावा । माया मृग पाछे सो धावा ।
भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई । सपनेहु संकट परइ कि सोई ।
इमि कुपंथ पग देत खगेसा । रह न तेज बुधि बल लेसा ।
कोमल चित अति दीनदयाला । कारन बिनु रघुनाथ कृपाला ।
सुनहु उमा ते लोग अभागी । हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी ।
जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि । महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि ।
पानि जोरि आगे भइ ठाढ़ी । प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी ।
केहि बिधि अस्तुति करौ तुम्हारी । अधम जाति मैं जड़मति भारी ।
अधम ते अधम अधम अति नारी । तिन्ह मह मैं मतिमंद अघारी ।
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता । मानउ एक भगति कर नाता ।
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई । धन बल परिजन गुन चतुराई ।
भगति हीन नर सोहइ कैसा । बिनु जल बारिद देखिअ जैसा ।
नवधा भगति कहउ तोहि पाही । सावधान सुनु धरु मन माही । ?
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा । दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ।
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान ।   चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान ।
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा । पंचम भजन सो बेद प्रकासा ।
छठ दम सील बिरति बहु करमा । निरत निरंतर सज्जन धरमा ।
सातव सम मोहि मय जग देखा । मोते संत अधिक करि लेखा ।
आठव जथा लाभ संतोषा । सपनेहु नहिं देखइ पर दोषा ।
नवम सरल सब सन छल हीना । मम भरोस हिय हरष न दीना ।
नव महु एकउ जिन्ह के होई । नारि पुरुष सचराचर कोई ।
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे । सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरे ।
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई । तो कहु आजु सुलभ भइ सोई ।
मम दरसन फल परम अनूपा । जीव पाव निज सहज सरूपा । ?
डा. संजय चिंताहरण आश्रम से दीक्षा प्राप्ति के बाद लौटकर । इसका विवरण अलग से लेख में प्रकाशित होगा । आपका बहुत बहुत आभार संजय जी ।

डा. संजय चिंताहरण आश्रम से दीक्षा प्राप्ति के बाद

तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ । मुनि बिज्ञान धाम मन करहि निमिष महु छोभ ।
लोभ के इच्छा दंभ बल काम के केवल नारि ।  क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहि बिचारि ।
गुनातीत सचराचर स्वामी । राम उमा सब अंतरजामी ।
उमा कहउ मैं अनुभव अपना । सत हरि भजनु जगत सब सपना ।
क्रोध मनोज लोभ मद माया ।  छूटहि सकल राम की दाया ।
सो नर इंद्रजाल नहि भूला । जा पर होइ सो नट अनुकूला ।
जद्यपि प्रभु के नाम अनेका । श्रुति कह अधिक एक ते एका ।
राम सकल नामन्ह ते अधिका । होउ नाथ अघ खग गन बधिका ।
सुनु मुनि तोहि कहउ सहरोसा । भजहि जे मोहि तजि सकल भरोसा ।
करउ सदा तिन्ह कै रखवारी । जिमि बालक राखइ महतारी ।
मोरे प्रौढ़ तनय सम ज्ञानी । बालक सुत सम दास अमानी ।
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह के धारि । तिन्ह मह अति दारुन दुखद माया रूपी नारि । ?
काम क्रोध मद मत्सर भेका । इन्हहि हरष प्रद बरषा एका ।
अवगुन मूल सूल प्रद प्रमदा सब दुख खानि । ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जिय जानि ।
सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊ । जिन्ह ते मैं उन्ह के बस रहऊ ।
षट बिकार जित अनघ अकामा । अचल अकिंचन सुचि सुखधामा ।
सावधान मानद मदहीना । धीर धर्म गति परम प्रबीना ।
                             निज गुन श्रवन सुनत सकुचाही । पर गुन सुनत अधिक हरषाही ।
बिरति बिबेक बिनय बिज्ञाना । बोध जथारथ बेद पुराना ।
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते । कहि न सकहि सारद श्रुति तेते । ?
बंदउ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरि । महा मोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर ।
बंदउ गुरु पद पदुम परागा । सुरुचि सुबास सरस अनुरागा । 
श्री गुर पद नख मनि गन जोती । सुमिरत दिव्य दृष्टि हिय होती । 
उघरहिं बिमल बिलोचन हिय के । मिटहिं दोष दुख भव रजनी के । 
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन । नयन अमिय दृग दोष बिभंजन । 
साधु चरित शुभ चरित कपासू । निरस बिसद गुनमय फल जासू । 
मुद मंगलमय संत समाजू । जो जग जंगम तीरथराजू । 
डा. संजय चिंताहरण आश्रम से दीक्षा प्राप्ति के बाद लौटकर । इसका विवरण अलग से लेख में प्रकाशित होगा । आपका बहुत बहुत आभार संजय जी ।

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