31 अगस्त 2012

I really shame to be an Indian - stupid statement


अभी किन्हीं पंकज जी ने मुझे फ़ेसबुक पर संदेश किया - राजीव जी  ! secular india पूर्णतः भारत विरोधी पाकिस्तान का पेज है । फ़िर आपने इसे like क्यों किया हुआ है ?  वास्तव में मैंने इस बात पर गौर भी नहीं किया था । क्योंकि कभी कभार मैं उसके चित्रमय समाचार और उन पर लिखी व्यंग्य लाइन्स पर ही निगाह डालता था । पंकज के ध्यान दिलाने के बाद मैंने उसे विशेष तौर पर देखा । और पाया कि इस पेज का मूर्ख संचालक किस तरह भारत और खास हिन्दू धर्म के प्रति विष वमन करता रहता है । जैसे इसने सलमान खान का दो डाग्स के साथ  चित्र पर जोङा - एक था कुत्ता । मैंने - एक था टाइगर देखी नहीं । शायद उसी से उसे जलन हुयी हो । इसने गंगा पर स्नान करती कुछ अधेङ और वृद्ध अर्धनग्न औरतों का चित्र जोङा । और उस पर लिखा - एंजाय इण्डिया । इसने किसी वैश्या गली का चित्र जोङा । और उस पर अंग्रेजी में लिखा -  वैश्यावृति भारत का एक बङा उधोग ।
दरअसल अब ये मेरा धर्म और कर्म नहीं है कि - मैं ऐसे मूर्खों से उलझूँ । वरना मुसलमान ( आचार विचार 

सभ्यता संस्कृति ) और पाकिस्तान की धज्जियाँ उङाने में मुझे मामूली समय लगेगा । मुझे अच्छी तरह मालूम है । ऐसे सभी देश राष्ट्र और अधर्मी मलेच्छ माँसाहारियों का प्रभु सत्ता द्वारा समूल नाश होने वाला है । दरअसल अनजाने में ही वे अपने पाप का घङा तेजी से खुद भर रहे हैं । और ये मुँह तक पहुँच रहा है । ऐसा नहीं कि भारत और हिन्दू धर्म में बुराईयाँ नहीं हैं । पर आज भी तुलनात्मक रूप से - मुसलमान । सिख । ईसाई और विश्व के किसी भी अन्य धर्म से हिन्दू धर्म सर्वश्रेष्ठ है । क्योंकि इसका मूल ( जङें ) सनातन धर्म है । जबकि बाकी सारे धर्म उधार का सौदा है । मूल रहित । भानमती का कुनबा है । आज विश्व के जैसे हालात हैं । उसमें अपने मुख्य उद्देश्य से थोङा अलग हटकर मुझे ऐसे विषयों पर भी सक्रिय होना पङ  रहा है । मैंने कई बार इन्हीं ब्लाग्स में चैलेंज किया है कि यदि कोई समझता है कि - उसका धर्म । 

सभ्यता । संस्कृति । धर्म पुस्तक । और लोग.. हिन्दू धर्म ( जिसे आज कहने लगे । वास्तव में सनातन धर्म ) से 1% भी अच्छे हैं । तो वो अपने सबसे धुरंधर ज्ञानियों को बुलाकर सिर्फ़ अकेले मुझसे मुकाबला कर ले । और सबसे बङी बात । इससे पहले -  5 रुपये की श्रीमदभगवत गीता और सिर्फ़ 5 रुपये में ही फ़ुटपाथ पर सहज उपलब्ध किसी भी - कबीर वाणी पुस्तक की टक्कर के उपदेश और ज्ञान दिखाये । मैं सिखों से भी कहता हूँ । गुरु ग्रन्थ साहिब में से कबीर की वाणी निकाल दो । फ़िर उसमें ज्यादा कुछ नहीं बचेगा । और ग्रन्थ साहिब के एकमात्र ( असली ) ज्ञानी सिक्ख नानक कबीर के ही शिष्य थे ।
खैर..अब आप secular india नामक इस पेज पर प्रकाशित ताजा पोस्ट देखें । इसका हिन्दी अनुवाद भी जल्द उपलब्ध होगा ।
In my life in daily news I am hearing about bomb blast, train blast, attack ,fire on innocent people and many more incidents about terrorism.
Why it is happening ? The big question mark ? Why they don’t have any kind fear ?
Now you please check by urself that in last 10-15 yrs how many arrested terrorist has been hanged . I think maximum 4 or 5 but how many terrorist attack happen and how many has been arrested is really

difficult to count.
The main reason behind this is our country law, and our politicians as they don’t want to change it. They think if they changed it once then they will loose their vote bank and opposition will start questioning.
There is no more difference between ruling party and opposition both are together they are attending parties together and very soft to each other. But only on tv screen they are showing that they are totally different from each other.
So these bloody politician are not willing to change law of country against terrorism, now question is this how long we will keep on 

dying like dot and cat. Generally what use to happen terrorist are being arrested and case start in court.
Date per date more than 10 yrs then when decision comes , then again case has been filed in high court again 2 yrs, then same case use to go in supreme court again 2 -3 yrs, suppose if still the decision is negative from court then it use to go to the president of India and there it use to be pending pending and pending . see afzal khan case its big example for this.
Now the other political parties either ruling or opposition use to make pressure upon president as everybody knows president is only for name sake with no rights.
Every party want that president should forgive the terrorist so that they can gain the vote bank from his community.

What the hell this system is ? How come few people decide that what country wants ? How come this bloody corrupted politician can be bigger than supreme court ? I really shame to be an Indian . Don’t YOU ?
http://www.facebook.com/photo.php?fbid=278850535562564&set=a.129700907144195.25389.129565433824409&type=1&theater ( क्लिक करें )

30 अगस्त 2012

वे अब भगवान का पद छोड़ना चाहते हैं


सुबह सुबह जब ई मेल के साथ फ़ेसबुक पेज भी खोला । तो श्री कृष्ण मुरारी शर्मा ( राजस्थान ) ने श्री रवि रतलामी की साइट का ये लिंक मेरे वाल पर जोङा था । मैंने लिंक चैक किया । और किन्हीं श्री नरेन्द्र तोमर की ये लघुकथा देखी । जो वास्तव में व्यंग्य अन्दाज में लिखी गयी है । लेकिन मेरे हिसाब से एकदम वाहियात है । शर्मा जी का ये लिंक देने का कोई औचित्य मेरी समझ में नहीं आया । क्योंकि शर्मा जी BSNL राजस्थान से रिटायर्ड हैं । और जाहिर है । 65 के तो होंगे ही । दूसरे इस लिंक के साथ कोई कमेंट भी उन्होंने नहीं किया । जो कुछ उद्देश्य समझ आता । नरेन्द्र तोमर ( हिन्दू ) द्वारा लिखी ये कहानी हिन्दू समाज के बौद्धिक ( धार्मिक ) दिवालियापन का स्पष्ट संकेत करती है । हाँ इसी कहानी में ऐसे लालची भक्त और उनकी मूर्खतापूर्ण भावना उभर कर आती । और देव पात्रों द्वारा उनकी मूर्खता पर सटीक व्यंग्य होता । तो यही कहानी बेहद सार्थक हो सकती थी । मुझे इस सबसे कोई लेना देना नहीं था । मैं इस लिंक को सिर्फ़ देख कर ही छोङ सकता था । पर आज समाज क्या है ? उसकी सोच क्या है ? का जीवंत विवरण तब आपके सामने नहीं आ पाता । अतः आप नीचे ये कहानी पढें । और

जानें कि - आध्यात्मिकता के धरातल पर समाज किस तरह गुमराह हो चुका है ।
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नारद जी जब दरबार में पहुंचे । तो देखा बृह्मा । विष्णु । महेश तीनों सिर झुकाए चिंतित एवं उदास मुद्रा में बैठे हैं । नारायण नारायण कहने और अपनी वीणा के तार झनझनाने पर भी तीनों ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की । और न ही समाचार पूछे । कारण पूछने पर भी तीनों में से किसी ने भी उत्तर नहीं दिया ।
बहुत आग्रह करने पर विष्णु जी ने कहा कि - वे अब भगवान का पद छोड़ना चाहते हैं । शिवजी और बृह्मा जी ने अपना सिर हिला कर सहमति प्रकट की । नारद जी को महान आश्चर्य हुआ ।
- नारायण नारायण । नारद जी ने अपनी भृकुटि को किंचित ऊपर चढ़ा कर माथे पर बल डालते हुए कहा -  परंतु सृष्टि के निर्माता ? तीनों लोक के नियंता ? और पालनहार ? आप तीनों देव 

ऐसा विचार क्यों ला रहे हैं । अपने मन में ? प्रभु क्या मैं कारण जानने की घृष्टता कर सकता हूं ।
- अरे ऐसे पूछ रहे हो । मानों आपको कुछ पता ही न हो ? फिर भी यदि कहते हो । तो बताए देते हैं । देखिये । संक्षेप में बात यह है कि - इस युग में हम लोग अपने भक्तों से बेहद तंग आ चुके हैं । न दिन में चैन लेने देते हैं । न रात में ।  अब तो लक्ष्मी जी भी दुखी हो गईं हैं । कुछ समझ में नहीं आता कि क्या किया जाए ? इन भक्तों से छुटकारा कैसे मिले ?
- परंतु आखिर हुआ क्या ? आप तो युगों युगों से भक्तों की नैया पार लगाते आ रहे हैं ।  नारद जी ने फिर कुरेदा ।
इस पर भगवान शिव ने गहरी सांस भरते हुए कहा - पता नहीं । कब क्यों और किसने भगवान को भक्तों के बस

में कर दिया था ?? पहले तो सब कुछ ठीक ठाक चलता रहा । पर अब न जाने कैसे भक्त पैदा हो गए हैं । आकर तरह तरह के काम कराने के लिए हम पर दबाव डालते रहते हैं । जो हमें बिलकुल पसंद नहीं । पर कभी करने पड़ जाते हैं । हमारी आत्मा बड़ी दुखी होती है । और हमारी साख भी घटती है । क्या बताएं दुविधा में पड़ जाते हैं । काम करो । तो अपयश मिलता है । और न करो । तो भक्त बुरा मानते हैं ।
- भगवन ! आप तो पहेलियां सी बुझा रहे हैं । कुछ स्पष्ट बताईए न । देखिए इस युग में लोग तो आपका इतना आदर सम्मान करने लगे हैं । जगह जगह जहाँ जगह मिल पाती है । लोग भव्य मंदिर खड़ा कर देते हैं । आपकी मूर्तियों में मानों जान डाल देते हैं । उनको सचल बना देते हैं । लाखों करोड़ों के चढ़ावे चढ़ रहे हैं । आप तो महादेव हैं । अरे छोटे मोटे देवताओं तक के मंदिरों में अपार अभूतपूर्व भीड़ें हो रहीं हैं । सारा देश ईशमय हो रहा है । किंचित विचार तो कीजिए । आपका गुणगान करने । आपकी लीला बखान करने वाले प्रवचनों में कैसी बड़ी संख्या में लोग टूटते हैं । सब आपकी लीला है । अपरंपार है आपकी महिमा प्रभु ।
- बस भी करो नारद ! कोरा स्वार्थ है । भगवान शिव किंचित क्रोधित होकर बोले - आकंठ पाप में डूबे हैं । प्रवचन करने वाले । और सुनने वाले दोनों ही ।
- पर प्रभु हुआ क्या ? नारद जी ने अपनी चिर परिचित स्थाई मुस्कान के साथ पूछा ।

- अरे हुआ क्या पूछते हो ? कभी कभार की बात हो तो टाल भी जाये । अब तो यह रोज का सिर दर्द हो गया है । थोड़ा सोच कर फिर बोले - बहुत दिनों से 1 व्यक्ति पीछे पड़ा है । पुराना भक्त है । बचपन से ही हमारी सेवा कर रहा है । घर में हमारा विशाल मंदिर बनवाया है । उसमें हम सभी देवताओं की भव्य प्रतिमाओं को प्रतिष्ठित किया । और मानों कि हम पर पूरा भरोसा न हो । उसने अनेक नए देवी देवताओं की मूर्तियां भी लगा दी हैं । पहले ये सब हमारे निष्छल भक्त होते थे । अब उनकी भी पूजा करता है ।
- तो आपको ईर्ष्या क्यों हो रही है भगवन ? नारद जी ने फिर निशाना साधा ।

- अरे बात यह नहीं है । बात यह हैं कि कुछ महीने पहले उसने पहले बिजनेस में अपने 1 प्रतिद्वंदी की सरे आम हत्या कर दी । और जेल पंहुच गया । अपने वकील के जरिए पुलिस और निचली अदालत में रिश्वत देकर जमानत पर बाहर आ गया । तबसे मेरे पीछे पड़ा है । दिन रात मंदिर में पड़ा रहता है । कहता है कि नीचे तो मैने सबको पटा रखा है । पर मेरा वकील कहता है कि इसके आगे वे कुछ नहीं कर सकते । बस भगवान ही बचा सकते हैं । गवाहों को वे ही तोड़ सकते हैं । और ऊपर की अदालत का दिमाग को वे अर्थात आप ही पलट सकतें हैं । वह मामले से बरी होकर चुनाव लड़ना और मंत्री बनना चाहता है । भक्त पक्का है । बताओ क्या करूं ? आखिर मेरी भी तो रिपुटेशन है ।

इसके मैं पहले भी सही गलत काम करा चुका हूँ कि वे इसके बिज़नेस से जुड़े थे । पर यह तो घोर पाप है । वो भी सबके सामने दिन दहाड़े । अब उसने भगवती जागरण बिठा दिया है कि यदि मैं नहीं करूंगा । तो अपना काम वह पार्वती से करा लेगा । अजब दुविधा में हूं । अब तो मैं भक्तों से ही पीछा छुटाना चाहता हूँ ।
- अरे आप मना कर दीजिए । सिंपल । निर्णय तो लेने ही पड़ते है । अपनी वीणा के तार टनटनाते हुए नारद जी बोले ।
- अरे 1 मामला हो तब ना । यहाँ तो अब लाइन लगी है । पहले तो 2-4 पापी भक्त होते थे । क्षमा करके वैतरणी पार करा देते थे । अनंत काल तक स्वर्ग में पड़े रहते थे । किसी को कोई हानि पहंचाए बिना । हमें भी परेशानी नहीं होती थी । पर इनका क्या करें । इनको न तो मोक्ष चाहिए । और न स्वर्ग । ये तो पृथ्वी पर ही भोग विलास करते अजर अमर बने रहना चाहते है । अब मेरी उलझन देखो । मेरे अनन्य भक्तों में 1 डाक्टर है । अभी कुछ समय पहले तक वह नामी डाक्टर था । अब वह उतना ही बदनाम है । फुसला धमका कर वह गरीब

लोगों की किडनी चुरा कर अमीरों को बेच देता था । करोड़ो अरबों कमाए । अपने दुनिया भर में बने घरों और तथाकथित अस्पतालों में शानदार मंदिर बनवाए । धर्मार्थ संस्थांए स्थापित कीं । साधु संतों का आना जाना बना रहता था । पर होनी को कौन कब तक टाल सकता है । पकड़ा गया । अब जेल में पड़ा है । साल भर से । वहाँ कोई काम धंधा तो है नहीं । दिन भर पूजा पाठ करता रहता है । दूसरे देवी देवताओं से सिफारिश भी कराता रहता है । जेल में मौज मस्ती का प्रबंध तो हनमानजी ने करा दिया था । जेलर भी हनुमान जी का भक्त है । अब वह मेरे पीछे पड़ा है कि मैं कैसे ही उसे बरी करा दूँ । उसकी पहली पतिवृता पत्नी देश भर के मंदिरों मोटा चढ़ावा चढ़ाती फिरती है । मेरे दूसरे असरदार भक्तों से संपर्क कर दबाव बना रही है । मैं तो बहुत दुखी हो गया हूँ । इन भक्तों से ।
- नारायण नारायण । नारद जी ने किंचित व्यंग्य भाव से कहा - पर भगवन आप भी तो इन भक्तों का माल उड़ाते 

रहते हैं । 56 प्रकार के भोग । सोने चांदी के मुकुट । सिंहासन सहर्ष स्वीकार करते रहते है । यह कभी सोचते विचारते भी नहीं कि यह अकूत संपदा कहाँ से आती हैं इनके पास । जब पाप का माल डकारोगे । तो सिफारिशें तो करनी पड़ेंगी ।
कह कर अपनी वीणा के तार टनटना कर नारद जी नारायण नारायण कहते हुए वहाँ से विदा हो गए ।
रचनाकार - नरेंद्र तोमर की लघुकथा - भगवान और भक्त http://www.rachanakar.org/2012/08/blog-post_32.html#ixzz2559DTOI3 ( क्लिक करें )

नारद जी जब दरबार में पहुंचे - कौन सा दरबार था यह ? साधारण धार्मिक ज्ञान रखने वाला भी कुण्डलिनी चक्रों के आधार पर यह जानता है कि बृह्मा का लोक - लिंग योनि स्थान पर । यहीं इसका आफ़िस भी है । फ़िर इससे ( लाखों योजन ) ऊपर नाभि स्थल पर - विष्णु लोक । यहीं इसका कार्यालय । फ़िर इससे भी ( लाखों

योजन ) ऊपर ह्रदय स्थान पर - शंकर का लोक । यहीं इसका दफ़्तर ।
अल्प ज्ञानी आम स्तर के लोग इस तरह की सहज कल्पना कर लेते हैं कि टहलते हुये ये लोग एक दूसरे के यहाँ चाय पीने पहुँच जाते होंगे । डिनर पर इनवाइट करते होंगे । अब आप विचार करिये । प्रथ्वी के बेहद मामूली प्रशासन में एक डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट जैसा मामूली ओहदेदार यदि दूसरे डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के यहाँ भी जायेगा । तो उसे कागजों पर पूरा विवरण देना होगा । मतलब ये एक झमेले की तरह होता है । उनकी दिनचर्या अति सख्त रूप से व्यस्त होती है । फ़िर अगर ये ( किसी दरबार ? जैसे स्थान पर ) आपातकालीन मीटिंग मान भी ली जाये । तो ये ठीक वैसे ही होगा । जैसे किसी मामूली चोर पर निर्णय लेने के लिये प्रधानमंत्री ग्रहमंत्री रक्षामंत्री को गम्भीर फ़ैसला लेना पङ रहा हो । जबकि बेवकूफ़ भी जानते हैं कि जिला स्तर पर भी यदि बहुत बङा अपराधी ( बाहर से आ जाय ) हो । तो एक सुदृढ सक्षम सत्ता तंत्र है । और वह तुरन्त सक्रिय हो जाता है । यह मनुष्यों की बात है । फ़िर इनसे बहुत अधिक शक्तिशाली 3 मुख्य देवता ( तुच्छ मनुष्य क्रियाओं पर ) इस तरह चिंतित हों । तो सत्ता 1 दिन भी न चले । तेरी सत्ता के बिना हिले न पत्ता । खिले न एक हू फ़ूल । हे मंगल मूल ।  एक पत्ता नियम से बाहर नहीं हिल सकता ।
वे अब भगवान का पद छोड़ना चाहते हैं - इसके बाद कहाँ जायेंगे ? जब उन्हें खुद भी मालूम है कि निश्चय ही 84 लाख योनियों में गिरना होगा । वहाँ ऐसा कोई विधान नहीं कि पद छोङने के बाद रिटायरमेंट लेकर पेंशन । 

सरकारी कोठी । गाङी ( दिव्य विमान ) अन्य भत्ते मिलते रहेंगे । सत्ता इतनी सख्त है कि - कार्यकाल पूरा होते ही तुरन्त फ़ेंक देती है । फ़ालतू लोगों की कोई जगह नहीं । जाहिर है । बृह्मा विष्णु शंकर ऐसे मूर्ख नहीं हो सकते ।
सृष्टि के निर्माता ? तीनों लोक के नियंता ? और पालनहार - ये सृष्टि के निर्माता नहीं हैं । त्रिलोकी ( स्थान ) सृष्टि तो इनके पैदा होने से पहले ही हो चुकी थी । इन्होंने अष्टांगी से " सोहंग " जीव बीज लेकर । अन्य पदार्थ लेकर उसका ( यथोचित भूमि में ) अंकुरण भर किया । हाँ ( विभिन्न ) जीव सृष्टि इन्होंने ठीक इसी तरह बनाई । जैसे राज मजदूर ( ईंट सीमेंट आदि लेकर ) आपका मकान बनाते हैं । या कोई भी अन्य विधा का कारीगर संबन्धित सामग्री लेकर वस्तुओं का उत्पादन करता है ।
तीनों लोक के नियंता ये नहीं । इनके अम्मा बापू हैं । क्यों बच्चों को टेंशन में डाल देते हो आप लोग । ( एक तरह से ) पालनहार सिर्फ़ विष्णू है । लेकिन उसकी कोई खेती नहीं है । ध्यान रहे । विष्णु का स्थान आंतों के पास नाभि है । तो जो तैयार खाध पदार्थ ( आपके द्वारा खाया ) वहाँ जाता है । उसका सार रस निकाल कर शरीर को आपूर्ति करना उसका काम है । यही पालनहार कहा है । शायद आप जानते ही होंगे । विष्णु माने सत गुण होता है । और सत के बिना ( शरीर की ) सत्ता नहीं रहेगी । तो विष्णु जैसे गन्ने का रस निकाल कर - गुङ । खांङ । चीनी । मिश्री बनती है । वही उसका भी काम है । विभिन्न तरीकों से ( जीव की पाप पुण्य स्थिति अनुसार ) सत उत्पादन । और वितरण । संक्षिप्त में यही पालनहार का मतलब है ।
न दिन में चैन लेने देते हैं । न रात में - थोङा भी धार्मिक ( बृह्माण्डिय स्थिति ) ज्ञान रखने वाले जानते हैं कि

मनुष्यों का 1 साल इन्द्र के 1 दिन के बराबर होता है । अन्य देव लोकों की उच्चता के आधार पर यह समय और भी बढता जाता है । काल । महाकाल । अपवर्ग आदि आदि ( TIME ZONE ) की समय स्थितियाँ अलग अलग हैं । इससे भी अलग मनुष्य जीवन को क्षणभंगुर या पानी का बुलबुला ( के समान आयु ) बताया गया है । आप जानते ही हैं । बुलबुला बनता हैं । उसे ठीक से देख भी नहीं पाते कि फ़ूट जाता है । ये पूरा कार्य एक अति  विशाल सशक्त ( और त्रुटि रहित ) तंत्र के द्वारा संचालित है । अतः इससे अधिक हास्यास्पद बात हो नहीं सकती कि - किन्हीं दो चार व्यक्तियों को लेकर ( उस )  सत्ता के प्रमुख ऐसा सोचें कि जब तक वह बात भी न समझ पायें । व्यक्ति ही समाप्त हो गया ।
अब तो लक्ष्मी जी भी दुखी हो गईं हैं - लक्ष्मी खुद कभी दुखी नहीं होती । बल्कि लोगों को दुखी करना उसका धर्म है । ये बेहद मायावी है । इसके खुश होने का भी मतलब है । जिस पर यह खुश हुयी । वह भारी संकट और तगङे झंझटों में फ़ँस गया । ताजा उदाहरण किसी मनमोहन नाम के आदमी का है । काला और कोयला इस नाम के पर्यायवाची बन गये । हो गया सिद्ध । इसके खुश होने से क्या होता है ?

आप तो युगों युगों से भक्तों की नैया पार लगाते आ रहे हैं - युगों युगों से भक्तों की नैया पार नहीं लगाते आ रहे । बल्कि मम्मी पापा ( की खातिर ) के लिये डुबाते आ रहे हैं । वो भी पूरी तरह से भरमा कर ।
भक्त पक्का है । बताओ क्या करूं - पक्का भक्त तो बहुत दूर । साधारण भक्त होने में इंसान को दस्त लग जाते हैं । वास्तव में तो लोग भक्त शब्द का मतलब तक नहीं जानते । भक्त होना मजाक नहीं । भक्त नरसी । भक्त सुदामा । ध्रुब । प्रहलाद आदि के उदाहरणों से धार्मिक इतिहास भरा पङा है ।
पहले तो दो चार पापी भक्त होते थे । क्षमा करके वैतरणी पार करा देते थे -  वैसे तो ( इस भाव में ) क्षमा शब्द ईश्वरीय संविधान में है ही नहीं । क्षमा की अलग अलग स्थितियाँ होती हैं । इसमें  व्यक्ति के कुल ( पूरे ) आचरण । कर्म । भावना आदि पर निष्कर्ष निकाला जाता है । और ये तो मनुष्यों में भी होता है । किसी सज्जन व्यक्ति से ( जान बूझ कर भी ) गलती हो जाये । तो संबन्धित लोग समझा बुझा कर मामला खत्म ( क्षमा ) कर देते हैं । कानून और जेल व्यवस्था का अर्थ ही जहाँ अपराधी को सजा देना भी है । वहीं इसका मुख्य उद्देश्य अपराध और अपराधियों को सुधारना होता है । आपने देखा नहीं । पुलिस थाने में चोर आदि को उल्टा लिटाकर उसके नितम्बों पर जिस रबङ पट्टे से मार लगाते हैं । उस पर पेंट आदि से लिखा होता है - समाज सुधारक । अब तुम सुधर जाओगे आदि आदि ।
अनंत काल तक स्वर्ग में पड़े रहते थे - स्वर्ग का प्रधानमंत्री इन्द्र । और खुद बृह्मा विष्णु शंकर । खुद इनका बाप काल पुरुष । खुद इनकी अम्मा अष्टांगी उर्फ़ महादेवी - अनंत काल तक ? सत्ता वाले नहीं हैं ।  फ़िर ये बेचारे कैसे किसी को अनंत काल का स्वर्ग दे सकते हैं ।
जेल में मौज मस्ती का प्रबंध तो हनुमानजी ने करा दिया था - इससे ज्यादा मूर्खता की बात ( ये कल्पना )

मैंने आज तक नहीं सुनी । हनुमान की गिनती श्रेष्ठ भक्तों में होती है । यदि आप हनुमान उपासना भी करते हैं । तो वह स्वयं हनुमान के जीवन व्यवहार जैसी ही कठिन है । वास्तव में हनुमान उपासना के सख्त नियम है । जो व्यक्ति स्वयं के लिये ही सख्त आचरण वाला है । वह दूसरों के लिये ऐसी मूर्खता क्यों करेगा ?
जब पाप का माल डकारोगे । तो सिफारिशें तो करनी पड़ेंगी - यदि विष्णु की पत्नी लक्ष्मी ही ( अपने बेंक का )  सिर्फ़ 1 रुपये का only one rupees चैक काट दे । तो ये प्रथ्वी पूरी चल सम्पदा सहित खरीदी जा सकती है । फ़िर सोचो । तुम कंगाल इंसान इन देवताओं को क्या दे सकते हो ? क्योंकि ये बजट आवंटन भी वही करती है ।
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पता नहीं । कब क्यों और किसने भगवान को भक्तों के बस में कर दिया था ??
आकर तरह तरह के काम कराने के लिए हम पर दबाव डालते रहते हैं । जो हमें बिलकुल पसंद नहीं । पर कभी करने पड़ जाते हैं ।
और न करो । तो भक्त बुरा मानते हैं -
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वही समय का रोना । आज का समय खत्म हुआ । अतः इन 3 बिन्दुओं पर विचार स्पष्ट नहीं हो पाया । फ़िर ये इतने महत्वपूर्ण भी नहीं हैं । साहेब ।

28 अगस्त 2012

मेरे रहस्यमय सपने - कुमार गौरव


राजीव भाई जी नमस्कार । आपसे पूछा गया प्रश्न - तभी आवाज आई - यही काल पुरुष है ? heading से ( क्लिक करें ) हूबहू यही सपना मेरे साथ भी होता है । last के 5 lines को छोङकर जिसमें आवाज आती है - यही काल पुरुष है ..कृपया जल्द ही समाधान कीजिये । आपके लेख की प्रतीक्षा है  - कुमार गौरव ।
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2012/05/blog-post_20.html ( सपना जानने हेतु क्लिक करें )
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स्वपनिल तिवारी के इस प्रश्न का उत्तर दिया जा चुका है । पर कहाँ ? ये मुझे पता नहीं । बस इतना पता है । 20 मई 2012 को यह प्रश्न छपा था । इसी के कुछ दिन बाद इसका उत्तर भी मई 2012 मही्ने में ही शायद - सत्यकीखोज ब्लाग में छप चुका है । दरअसल गलती मेरी भी है । ऐसे उत्तर छापते समय प्रश्न वाले लेख में मुझे उसका लिंक जोङ कर सूचित कर देना चाहिये । जो कि बहुत से कार्यों से जुङा होने के कारण मैं नहीं कर पाता । दूसरी बात यह भी है कि - एक बार मेरा ब्लाग पढना शुरू कर देने वाले  फ़िर धीरे धीरे पूरे ( सभी 10 ) ब्लाग ही पढते हैं । इसलिये उन्हें अपने उत्तर और तमाम नयी जानकारी मिल जाती है । इसी सोच के चलते मैं बहुत सी चीजें अनदेखी कर देता हूँ । चलिये । फ़िर एक बार स्वपन रहस्य पर बात करते हैं ।
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अभी कोई 20 साल पहले ही जब भारत में पाश्चात्य संस्कृति तेजी से फ़ैलना शुरू हुयी थी । बिज्ञान की चहुमुखी बल्कि बहुमुखी तरक्की से देश दुनियाँ हतप्रभ से थे । तंत्र मंत्र भूत प्रेत तो छोङो । भगवान के ही अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न सा लग गया था । बिज्ञान ही सब कुछ है । और एक दिन बिज्ञान हर चीज पर विजय प्राप्त कर लेगा । ऐसी पक्की धारणा बन गयी थी । लोग बिज्ञानी नशे में मदहोश थे ।
लेकिन सिर्फ़ 500 साल पहले । इसी प्रथ्वी पर गोरखनाथ जैसी हस्ती मौजूद थी । और तंत्र मंत्र का इतना प्रचण्ड बोलबाला था कि सात्विक भक्ति का %  नगण्य था । घर घर में तंत्र मंत्र घुसा हुआ था । और हैरतअंगेज बात यह थी कि औरतों की हिस्सेदारी इसमें बहुत ज्यादा थी । वैसे भी आप गौर करें । तो कितनी ही विकसित सभ्यता हो । औरत का टोना टोटका में बेहद रुझान होता ही है । फ़िर चाहे वह उच्च से उच्च पदासीन शिक्षित व्यक्ति की पत्नी हो । या फ़िर निरी घरेलू ग्रामीण औरत ।

लेकिन उस समय स्त्री पुरुष का जो रुझान तंत्र मंत्र के प्रति जागा । वह कोई अलौकिक बिज्ञान सीखने की चाह नहीं थी । बल्कि इस क्षेत्र में जाते ही " कामवासना का मुक्त भोग " की खुली छूट थी । जो तंत्र बिज्ञान की जरूरत के नाम पर लगभग मिथ्या प्रचारित कर दिया गया था । जैसा कुछ कुछ ओशो के - जोरबा टू बुद्धा और संभोग से समाधि का ( मगर उल्टा ) मनमाना अर्थ निकाल कर किया गया । अगर आप कल्पना नहीं कर सकते । तो उस समय देवकीनन्दन खत्री के उपन्यास चन्द्रकांता सन्तति और इसी नाम के सीरियल जैसा माहौल था । यह स्थिति तब थी । जब कबीर के ( औपचारिक ) गुरु वैष्णव सन्त रामानन्द उपस्थित थे । और उनका बहुत प्रभाव भी था । लेकिन इस क्षेत्र में गोरखनाथ का डंका बज रहा था । और ठीक उसी समय इस अज्ञान  तिमिर का समूल नाश करने के लिये सतपुरुष के प्रतिनिधि

लीला सन्त कबीर प्रकट हुये ।
आप यकीन करें । तो प्रथ्वी पर अभी दूसरे रूप में ठीक इसी तरह का माहौल है । प्रथ्वी पर एक से एक दिग्गज शक्तियाँ अप्रत्यक्ष रूप में मौजूद हैं । और उनकी गतिविधियाँ तेजी पर हैं । कैसे इसका उदाहरण देखिये ।
- आप देख रहे होंगे । प्रथ्वी पर इस समय सौन्दर्य और यौवन की बहार सी आयी हुयी है । अप्सराओं से भरपूर स्वर्ग जैसे धरती पर ही उतर आया हो । कामभावना कामवासना का जैसा संचार इस समय है । वैसा कम ही समय में होता है । सवाल ये है । इससे पहले क्या सुन्दर सौष्ठव  स्त्री पुरुष ( इस % पर ) नहीं होते थे ।
- दूसरा जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है । आप TV रियल्टी शो आदि में देखते होंगे - नृत्य । संगीत । अभिनय । ज्ञान । बिज्ञान । मनोरंजन । तमाम बाह्य आंतरिक कलाओं अद्वितीय अमानवीय

क्षमताओं का जैसा विस्फ़ोट सा ( इस % पर ) हुआ है । वैसा उसी समय होता है । जब नुमायश उठने वाली हो । और एक लूट सी मची हो । तमाम चीजें जैसे सरल सहज हो गयी हों ।
- एक और ध्यान दें । तो अभी हर चीज चरम पर है - आस्तिकता । नास्तिकता ।  धर्म । अधर्म । ज्ञान । अज्ञान । देवत्व । असुरत्व । शिष्टता । फ़ूहङता । पाप । पुण्य । और निश्चय ही ये मानवीय नहीं है । वरन बाह्य आवेशित हैं ।
- जैसे कुछ समय पहले सोवियत रूस टूटा था । और अव्यवस्था का बोलबाला था । एक प्याज टमाटर ब्रेड स्लाइस जैसी कीमत पर लङकी सेक्स करने देती थी । लूटमार सी मची हुयी थी ।

वही स्थिति आज प्रथ्वी की है । क्योंकि 11-11-2011 को इस प्रथ्वी और इसके जीवों (  सिर्फ़ मनुष्य ) का लेखा जोखा सरकारी स्तर पर समाप्त हो चुका है । और वैसी ही लूट अभी भी मची हुयी है । नया कार्यकाल । नयी व्यवस्था तक ऐसी ही अराजकता होती रहेगी । जिसको देखकर एक ही धारणा बनेगी - सब चलता है ।
- संक्षेप में । आप मौजूदा परिदृश्य को देखें । तो सभी कुछ अमानवीय सा है ।
और कुमार गौरव के इस प्रश्न का बहुत कुछ सम्बन्ध भी इसी बात से है । मेरे पास पिछले कुछ ही दिनों में तमाम केस ऐसे आये । जिनका सम्बन्ध अलौकिक घटनाओं व्यक्तियों से था । कोई भूत प्रेत से प्रभावित था । कोई तंत्र मंत्र से प्रभावित था । कोई अजीव घटनाओं का शिकार था । तो कोई समझ ही नहीं पा रहा था - जो अजीवोगरीब हो रहा है । उसका क्या मतलब है ? और उसके 

लिये क्या करूँ । और आप देखें । तो इन सभी का उत्तर इसी बात में है कि - जो हो रहा है । वह मानवीय नहीं है । और समझ से बाहर है । यानी ऐसी शक्तियाँ जीवों ( मनुष्यों ) को अपने अपने शिकंजे में ले रही हैं । क्योंकि अभी कोई सत्ता ( विधिवत ) कार्य नहीं कर रही । और किसी की कोई सुनवाई नहीं है । अतः वे लोग ही ठीक ठाक है । जो स्वयं ( आध्यात्म स्तर पर ) मजबूत हैं । या मजबूत लोगों के साथ पहले से जुङे हुये हैं । हालांकि ऐसा नहीं है कि ये तवाही सिर्फ़ इसी समय हुयी हो । पहले भी होती रही है । पर होती कुछ कुछ ऐसी ही स्थितियों में है ।
अतः कुमार गौरव ( और ऐसे अनुभवों से जुङे लोगों ) के  इस प्रश्न के लिये प्रथ्वी के माहौल में फ़ैली वे ( अच्छी 

बुरी । सात्विक तामसिक ) योग तरंगे जिम्मेदार हैं । जो मनुष्य को प्रयत्क्ष अप्रत्यक्ष उन दिमागी हिस्सों में ले जा रही है । जो आम स्थिति में बन्द होते हैं । और अपवाद स्वरूप पहले दुर्लभ से मामलों में ( अधिकतम 5 % ) देखने को मिलते थे । पर ये % इस समय बहुत बढा हुआ है । इसीलिये आपको हर चीज जैसे चरम पर नजर आ रही है । सबसे बङी बात कालदूतों की पूरी सेना ही इस समय सक्रिय है । और एक तरह से प्रभावी भी है ।
ऐसे स्वपनों का कारण हमारे तीसरे " कारण शरीर " से संबन्धित हैं । शरीर की चित्रा नाङी में ये दृश्य फ़ाइलें भरी होती हैं । ..जारी

- समय बहुत तेजी से भागता है । कई लेख आधे छूट गये । इनको अब पूरा करने की कोशिश करूँगा । और कोशिश रहेगी । लेख पूरा करके ही पोस्ट करूँ ।

27 अगस्त 2012

जोरबा टू बुद्धा - ओशो


ओशो को मत को लेकर लोगों के मन में अलग अलग धारणा बनी हुई  है । ओशो ने अपनी विचारधारा को नाम दिया था - जोरबा टू बुद्धा । जोरबा का अर्थ होता है । एक भोग विलास में पूरी तरह से डूबा हुआ व्यक्ति । और बुद्धा का अर्थ निर्वाण पाया हुआ । परन्तु लोगों ने जोरबा का चरित्र का याद रख लिया । और बुद्धा को सब भूल गए । नौबत यहाँ तक आ गयी । अगर आप ओशो आश्रम जायेंगे । तो सबसे पहले आपको HIV test करवाना पड़ेगा । यदि आपका HIV negative है । तो आपको ओशो आश्रम में प्रवेश मिल सकता है । लोग अधिकतर ओशो के विचार सामने रख देते हैं । .. आपकी नज़र में ओशो क्या हैं ? चन्द्रमोहन जैन ।
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मुझे नहीं लगता कि मैं सीमित शब्दों में ओशो या किसी भी आत्म ज्ञानी के बारे में कोई बात पूर्ण रूप से कह सकता हूँ । सब धरती कागद करूँ । लेखनी सब वनराय । सात समुद्र की मसि करूँ । गुरु गुन लिखा ना जाय । काम मिलावे राम कूं ।  जे कोई जाणै राखि । कबीर बिचारा क्या कहै ।  जाकि सुखदेव बोले साख ।
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किसी कारण वश यहाँ तक लिखने के बाद अभी आगे लिख नहीं पाया था कि दीपक जी का सार्थक उद्देश्य पूर्ण सुझाव युक्त मेल प्राप्त हुआ । वास्तव में दीपक ने बेहद समझदारी की बात लिखी । पुस्तकीय आधार पर बहस के बजाय जिज्ञासुओं को सार सार पता चले । तो 

उसके बहुत लाभ हो सकते हैं । बाकी पुस्तकों से तो पुस्तकालय भरे हुये हैं । और उनमें मत भिन्नता विभिन्नता के इतने उदाहरण हैं कि पूरे मानव जीवन में निष्कर्ष निकाल पाना ( कि अंतिम सच क्या है ? ) कठिन ही है । जो कि आम आदमी के बस की बात भी नहीं होती । इसीलिये शोधकर्ताओं बैज्ञानिकों के नवीनतम शोध से संसार विभिन्न क्षेत्रों में विकास मार्ग पर गतिशील हुआ है । अतः वाकई में दीपक की भावना की गहराई समझी जाये । तो वह बहुत ऊँची बात है । इसलिये आज इसी आधार पर बात करूँगा ।
वास्तव में जब भी मैं आपका कोई मेल ( शंका ) पढ रहा होता हूँ । उसी समय वह विषय साथ के साथ मेरे सामने पूर्ण स्पष्ट हो जाता है । जैसे आप किसी भी चीज के बारे में ठोस और पूर्ण जानकारी रखते हैं । तो उसके किसी भी बिन्दु पर जिक्र होते ही आपको वह सब कुछ प्रत्यक्ष हो उठता है । जैसे अनुभवी डाक्टर नब्ज देखते ही रोग समझ जाता है । कोई अनुभवी मैकेनिक किसी यंत्र की खराबी समझ जाता है । ठीक ऐसा ही मेरे साथ होता है । और इसके ( लोगों की अलौकिक समस्या पर आधारित ) कुछ उदाहरण भी लेख रूप में सामने आ चुके हैं ।
देखिये । जैसा कि मैं कहता रहा हूँ कि आम लोगों की नजर में यह - चमत्कार । पहुँचा हुआ ।  सिद्ध ( जिनकी ध्वनि या भाव अर्थ ही सच्चाई से अलग हो गया है ) आदि आदि ज्ञान या व्यक्ति कहा जाता है । पर मुझे इन शब्दों से ही नफ़रत है । मैं इसको - भक्ति बिज्ञान । अलौकिक बिज्ञान ।

आध्यात्म बिज्ञान जैसे नामों से पुकारना पसन्द करता हूँ । तब यह आम व्यक्ति का हो जाता है । जो भी यह अध्ययन करेगा । वह इस बिज्ञान से जुङे असंख्य लाभ उठायेगा ।
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अब जैसे कि चन्द्रमोहन जी ने प्रश्न किया - आपकी नज़र में ओशो क्या हैं ? यहाँ मेरे सामने थोङी सी उलझन हो गयी । दीपक के भाव अनुसार कोई उलझन नहीं । पर इस भाव में ( मेरे लिये ) कुछ थी । क्योंकि मेरे पास 2 नजर हैं ।  एक बाहय सच को देखने वाली - 2 eye । एक आंतरिक सच को देखने वाली 3rd eye ..तब चलिये । दोनों का ही इस्तेमाल करते हैं । आप ध्यान दें । तो ओशो के अनुयायी भृमित से हैं । वे सिक्खों की तरह सिर्फ़ - 1 ओंकार ॐ सतनाम.. का गीत गा रहे हैं । जबकि ॐकार कोई सतनाम नहीं है । सिर्फ़ बीज मंत्र है । क्योंकि इसी से शरीर बना है । अतः अधिकतर कुण्डलिनी तंत्र मंत्र योग आदि में आवश्यकता अनुसार इसका प्रयोग होता है । जैसा कि ओशो धारा वाले सहज योग या राज योग के नाम से अपना ज्ञान प्रचारित करते हैं । उसमें ॐ का कोई महत्व ही नहीं । 
धार्मिक चैनल पर आने वाले ओशो के 3-3 सदगुरु ? ( त्रिवरि ) किताबें देख देख कर प्रवचन करते हैं ।
अब सवाल ये है कि - ओशो अपने जीवन में कोई अच्छा शिष्य क्यों नहीं बना पाये । जो उनकी विरासत को

संभाल सकता । ओशो के ( अभी के ) समस्त ध्यान शिविर स्कूलों की प्रयोगशाला के समान हैं । जिनमें किताबों की थ्यौरी के आधार पर ध्यान अभ्यास किये जाते हैं । शरीर गुरु जो अंतर गुरु से मिलाता है । वह असली विषय ? ही उनके पास नहीं है । वास्तव में ओशो पूर्ण गुरु थे । पर सतगुरु हरगिज नहीं । उन्होंने जहाँ तक की बात की । वह पूर्ण और स्पष्ट थी । कोई बनाबटी पन नहीं । लेकिन कहीं कुछ ऐसा था कि वे अपने किसी भी शिष्य को उस सच तक भी ? नहीं जोङ पाये । जहाँ कम से कम वे खुद थे । ऐसा क्यों ? ये दरअसल बहुत गूढ विषय है । इसमें गुरु का प्रकार । उसकी ज्ञान परम्परा । अनुशासन । और सबसे बङी बात सत्ता से अधिकार मिलना । ये मूल चीजें ओशो के पास नहीं थी । यदि आप देखें । तो वे अपने व्याख्यानों में इनकी जरूरत ही नहीं समझते । क्योंकि उनके पास थी ही नहीं । दूसरे जो मैंने स्पष्ट 

देखा । ओशो किसी भी ध्यानी - नानक । ईसा । महावीर । कबीर । बुद्ध । मुहम्मद । यहाँ तक कि जे. कृष्णामूर्ति ( जो मेरे हिसाब से पूरा पागल था ) आदि आदि को एक ही भाव में तौल देते हैं । ये बिलकुल हास्यास्पद है । इनमें ईसा और मुहम्मद सिर्फ़ पैगम्बर थे । उनके पास सिर्फ़ उतनी ही ताकत थी । जो उस समय कार्य हेतु उन्हें दी गयी । बाकी इनका (  टिके न रहने के कारण ) अपने जीवन काल में ही पतन हो गया । अतः जो भी ऊल जुलूल बातें इनके बारे में प्रचलित हैं । वे निराधार ही हैं । बुद्ध के अपेक्षा महावीर का क्रिया योग बहुत धीरे धीरे वाला था । और एकदम बोरिंग । कबीर ने प्रत्येक स्थिति की सहज योग अनुसार बात की । लेकिन अंतिम सत्य वह भी नहीं है । पर कबीर ने इसको स्पष्ट कर दिया है ।

विशेष - समयाभाव से आज लेख पूरा नहीं हुआ । पूरा लेख पढने के बाद ही कोई राय बनायें । अभी बहुत कुछ अस्पष्ट है ।

26 अगस्त 2012

दूसरों की कमी निकालने के बजाय ज्ञान प्रकाश फ़ैलाना ही उचित


राजीव जी नमस्कार ! मै और अन्य अनेकों लोग आपके ब्लाग को बडे विश्वास व श्रद्धा से पढते हैं ।
आपसे एक विनती है कि आपसे पुछे गये प्रश्नो का उत्तर आप स्वयं ही दिया कीजिये । क्योकि आप स्वयं उस अवस्था में हैं । जहाँ आप स्वयं अन्दर जाकर सत्य व असत्य का पता लगा सकते हैं । जहाँ आप उन प्रश्नों ( जिनका उत्तर स्वयं अन्दर जाकर ही मिल सकता है ) के उत्तर स्वयं अन्दर जाकर खोजकर निकाल सकते है । जबकि अन्य सिर्फ़ अपनी बुद्धि से उत्पन्न विचारो को प्रकट या व्यक्त कर सकते है । जिनका आधार अधिकतर बाहरी ज्ञान ( नेट सर्फ़िंग । अज्ञान । या काल के दूतों द्वारा लिखी भ्रामक किताबें । अपरिपक्व मानसिक सोच । अज्ञान लोगों से आध्यात्मिक ज्ञान चर्चा से प्राप्त अज्ञान आदि-2 ) होता है । और जो हो सकता है कि ये आधार भृमित करने के लिये काल के द्वारा ही निर्मित हो । या दिया गया हो । हो सकता है कि कभी-2 आप भी समय के अभाव में बाहरी या अन्य स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर उत्तर दे देते हों । किन्तु उसका नुकसान जिज्ञासुओं को ही होता है ।
अतः आपसे विनमृ निवेदन है कि आप स्वय ही अन्दर जाकर उन प्रश्नों का उत्तर या समाधान खोजकर निकालें । तभी सत्य को लिखें । न कि बाहरी जानकारी के आधार पर । जैसे कि अन्य सन्तों । पन्थों । गुरुओं आदि की सत्यता को परखने के लिये

आप स्वयं अन्दर जाकर उनकी लोकों तक पहुंच । उनकी शक्ति । उनके आध्यात्मिक स्तर । वे किस मंडल तक पहुँचे हुये हैं इत्यादि-2 सवालो के जवाब स्वयं खोजकर ही लिखें ।
किन्तु मेरे विचार से दुसरे सन्तों । पन्थों । गुरुओं आदि की कमियों को निकालने की अपेक्षा अपने ज्ञान के प्रकाश को फ़ैलाना ज्यादा उचित है । ताकि जिज्ञासु इंसान स्वयं ही पतंगे की तरह इस रोशनी की तरफ़ भागा आये । और आपसे जुड जाये । जैसा कि कबीर साहब ने कहा है -
कबीरा खडा बाजार में । सबकी मांगे खैर । ना काहु से दोस्ती । ना काहु से बैर ।
एक बात और कहना चाहुँगा कि - मैं स्वयं भी राधास्वामी मत से जुडा हुआ हुँ । पंजाब जो कि सन्त मत के गुरुओं की भूमि है । वहाँ आज गुरुवाणी के सही अर्थ को कोई नहीं जानता है । इसीलिए जब वहाँ किसी पूर्ण सन्त ने गुरुवाणी का सही अर्थ बताया । उन्हें सच्चे नाम से जोडने की कोशिश की । तो वहाँ के कुछ अज्ञानी लोगों ने जो स्वयं को सच्चा सिख समझते थे । और समझते हैं । ने उनका विरोध करना शुरु कर दिया । जिसके लिये उन्होने कई हथकन्डे अपनाये । उनके बारे में भ्रामक व दूषित अफ़वाहें उडाई । तथ्यों को तोड मरोड कर पेश किया जाने लगा । 

जुलियन जोन्सन बाबा सावन सिंह जी से दीक्षा प्राप्त थे । उनकी जिस किताब का आपके यहाँ जिक्र आया है - who killed path of the masters उसका असली नाम - path of the masters है । और उनकी लिखी ये किताब सच्चे जिज्ञासुओं के लिये किसी ग्रंथ से कम नहीं है । आप स्वयं इस किताब को पढ कर देखिए ।
और जैसा कि आपके ब्लाग पर जिक्र किया गया है । उसमें ऐसा कुछ नहीं लिखा है । ये सब जानबुझ कर तथ्यों को छिपाकर दुष्प्रचार किया गया है । इसीलिए मैं आपसे फ़िर निवेदन करता हुँ कि सत्य को स्वयं अन्दर जाकर जानने की कोशिश कीजिये । ताकि किसी की आधी अधूरी व गलत जानकारी के आधार पर ही सत्य व असत्य को प्रमाणित न किया जा सके । जिससे किसी की भावनाओं को ठेस न पहुँचे ।

मैं स्वयं आप पर बहुत भरोसा व विश्वास करता हुँ । और ये उम्मीद करता हुँ कि आप सभी जिज्ञासुओं के प्रश्नों का उत्तर स्वयं अन्दर जाकर उनके समाधानों व उत्तरों को जान व खोजकर ही बतायेगे ।
अगर मुझसे कोई गलत या अशिष्ट लिखा गया हो । तो मुझे मुर्ख । अज्ञानी समझ कर माफ़ कर देना ।
मैंने अगर किसी की भावना या अहं को ठेस पहुचाया हो । तो इसके लिये मै क्षमा प्रार्थी हुँ । दीपक ।
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धन्यवाद दीपक जी ! हम शीघ्र बात करेंगे ।

25 अगस्त 2012

सोऽहम सोहंग या हंऽसो ?

Appreciable paragraph, hereby I want know, among soham, sohang and hansh ,which is right and appropriate word, as such a lot of gurus says that soham word is a natural and spiritual word, while you and followers of sant Ravidas ji says word sohang is right,true and natural. Please explain in detail.
हिन्दी अनुवाद - आपके द्वारा सराहनीय लेख, मैं ये जानना चाहता हूँ कि - सोऽहं, सोहंग और हंसो में से कौन सा मन्त्र ठीक है, उचित है । बहुत से गुरु कहते हैं कि - सोऽहं शब्द प्राकृतिक और आध्यात्मिक है । जबकि आप और रविदास जी के शिष्य या अनुयायी कहते हैं कि - सोहंग ही ठीक, सच्चा और प्राकृतिक है । कृपया विस्तार से बताएं ।
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सोहम या सोहंग या हँसो - वास्तव में सही शब्द (या भाव या क्रिया या धुन) सोऽहंग ही है लेकिन मजे की बात यह है कि यह बहुत ही रहस्यपूर्ण है और अदभुत भी है । एक तरह से पूरा खेल ही इसी से हो रहा है । सोऽहंग वृति से ही मन का निर्माण हुआ है । आत्मा में जब विचार स्थिति बनती है । और ‘अहम’ स्वरूप का आकार बनता है । तब वह कहता है - सोऽहंग । जिसको सरलता से समझाने के लिये शास्त्रों में कहा गया है - सोऽहम । वही मैं हूँ । या स्वयँ । 
यहाँ विचार करने योग्य बात है कि - जब वही है और वह है ही । तब ये कहने की कोई आवश्यकता ही नहीं कि - वही मैं हूँ । सोऽहंग । इसलिये जब यह आत्मा शान्त मौन निर्विचार स्थिति में होता है । तब यह पूर्ण मुक्त और (जिसे कहते हैं) परमात्मा ही है लेकिन जैसे ही यह कोई मनः सृष्टि करता है । ये सोहं वृति हो जाता है । सोऽहंग ॐ (ओऽहंग) से बङी स्थिति है और बहुत ऊँची स्थिति भी है । भले ही यह काल के दायरे में आती है ।
ओऽहंग से काया बनी । सोऽहंग से मन होय । 
ओऽहम सोऽहम से परे । बूझे बिरला कोय । 
आत्मा ने पहले मन (अंतःकरण) का निर्माण किया । ये ही सूक्ष्म शरीर है । इसका स्थूल आवरण ॐ बाह्य स्थूल शरीर है । सोऽहंग से बना ये मन सोऽहंग (के निर्वाणी जाप) से ही खत्म हो जाता है । तब मन माया से परे का सच दिखता है ।
इसलिये कहा है -
सोऽहंग सोऽहंग जपना छोङ । मनुआ सुरत शब्द से जोङ । 
अब क्योंकि सोऽहं सोऽहम या सोऽहंग शब्द प्रचलन में आ गये हैं । इसलिये इनको एक तरह से मान्यता सी मिल गयी है । जैसा तमाम अन्य शब्दों के साथ होता है । जिनका कोई भाषाई वजूद नहीं होता । पर वे धङल्ले से बोलचाल की अशुद्धता या स्पष्टता या स्थानीय लहजे से प्रचलित हो जाते हैं । वही मूल सोऽहंग के साथ हुआ है ।
लेकिन ये बङा सरल है कि कुछ ही देर में इसका स्वतः सरल परीक्षण हो सकता है । विश्व का कोई भी किसी जाति धर्म का व्यक्ति गहरी सांस लेता हुआ प्रति 4 सेकेंड में प्रथम 2 सोऽऽ और अगले 2 सेकेंड हंऽऽग सुनता हुआ आराम से परीक्षण कर सकता है । जो सांस या दमा के रोगी होते हैं । उनकी तेज स्वांस में तो ये साफ़ साफ़ बहुत तेज और स्पष्ट सुनायी देता है । 
लेकिन ध्यान रहे । ये निर्वाणी है और मुँह से कभी - सोंऽहग सोऽहंग नहीं जपा जाता । जैसा कि मैंने एक धार्मिक TV कार्यकृम में (शायद जैन प्रचारक साध्वी द्वारा) इतनी जोर से कहते सुना । जैसे साइकिल में पम्प से हवा डाली जा रही हो ।
इसको अजपा कहा जाता है । जिसका मतलब ही यह है कि ये स्वयं हो रहा है । इसको जपना नहीं है । सिर्फ़ इस पर ध्यान देना है । लेकिन बिना सच्ची दीक्षा प्राप्त व्यक्ति को इसके ध्यान से कोई फ़ायदा नहीं होगा । क्योंकि इसको जागृत किया जाता है । वह समय के सच्चे (गुरु या) सदगुरु द्वारा ही संभव है ।
लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है । आप अभिमानी किस्म के हैं । गुरु का आपकी नजर में कोई महत्व नहीं है और आप निगुरा ही ध्यान करते हैं । तब यही (यदि क्रोधित हो जाये) हठयोग कहलाता है । जिसके दो ही परिणाम मैंने अब तक देखें है - गम्भीर किस्म का पागलपन और फ़िर मौत ।
संयोग की बात है । मैं स्वयं कट्टर हठयोगी रहा और इन दोनों परिणामों से (6 महीने तक) गुजरा हूँ ।
स्वांस में होता ये धुनात्मक नाम ही हमारा असली नाम है और सिर्फ़ इसी से हम वापस अपने उस घर (सचखण्ड या सतलोक) तक पहुँच सकते हैं । जहाँ से जन्म जन्म से बिछु्ङे हुये हैं । एक तरह से जिस तरह पहले राजा और अन्य लोग अपने छोटे बच्चे के गले में नाम पता परिचय का लाकेट पहनाते थे । ये परमात्मा ने सभी मनुष्यों के गले में डाला हुआ है । 
आज meditation जिसको लोग पढे लिखों की भाषा में breathing कहते हैं । उससे जो शान्ति सकून सा महसूस करते हैं । उसका मुख्य कारण यही है कि आप तब अपने में क्षणिक रूप से स्थित हो जाते हैं और ये हर कोई जानता है । आप लंदन पेरिस कहीं भी घूम आओ । असली शान्ति सुख अपने घर आकर ही मिलता है । पशु पक्षी भी आखिर शाम को अपने घरोंदे में लौटते हैं ।
और भी कई उदाहरण सोऽहंग को सिद्ध करते हैं । बुद्ध को जब बहुत दिन तक ज्ञान नहीं हुआ और वे चिल्ला ही उठे - अब क्या करूँ..ज्ञान के लिये मर जाऊँ क्या ? 
तब आकाशवाणी (वास्तव में अंतरवाणी) हुयी - हे साधक ! अपने शरीर के माध्यम पर ध्यान कर । बुद्ध सोचने लगे कि शरीर का माध्यम क्या है ? 
क्योंकि बुद्ध बुद्धिमान थे । अतः बहुत जल्द समझ गये । शरीर का माध्यम सिर्फ़ स्वांस ही है । क्योंकि इसके होने से ही शरीर की सत्ता कायम है । फ़िर वे भी meditation करने लगे । आप स्वयं देखो - नाम, काम, दाम, राम, चाम आदि आदि कोई भी क्रिया (जिससे भी आप उस समय जुङे हों) हो । स्वांस में ही लयात्मक बदलाव होगा । बहुत आसान प्रयोग है ।
- पर ये हंऽसो क्या है ?
ये 5 तत्वों से बना 5 फ़ुट 5 इंच का शरीर बङा कमाल का है । सोऽहंग यानी मन ऐसी हार्ड डिस्क है । जो दोनों तल (surface) पर काम करता है । यही बात शरीर की भी है । सोऽहंग यानी जीव अवस्था । जो किसी भी सामान्य मनुष्य की है ही । उसमें कुछ भी जोङना घटाना नहीं है । वह तो पहले से ही है । इसमें मन रूपी ये सपाट प्लेट नीचे की तरफ़  (सिर से पैरों की तरफ़) क्रियाशील होती है और शरीर के चक्रों में स्थित सभी कमल भी नीचे की तरफ़ (सिर से पैरों की तरफ़) और बन्द अवस्था में होते हैं । कुण्डलिनी भी जो सर्पिणी आकार की है और कूल्हे रीढ के जोङ के पास सुप्त अवस्था में नीचे को मुँह घुसाये बैठी है । मुख्य स्थितियों के साथ ये जीव और सोऽहंग स्थिति है ।
अब क्योंकि मन रूपी प्लेट पर 8 खाने बने हुये हैं । जिनके भाव और कार्य इस प्रकार के हैं - काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद (घमण्ड) मत्सर (जलन या ईर्ष्या) ज्ञान, वैराग । 
इनमें पूर्व के 6 से आप परिचित हैं हीं । ज्ञान वैराग का खुलासा मैं कर देता हूँ । इन पूर्व 6 भावों से ऊब कर जब कोई शान्ति चाहता है । उसे वैराग स्थिति कहते हैं । तब यह ज्ञान की तलाश में भागता है और अपनी स्थिति भाव अनुसार ज्ञान यात्रा करता है । क्योंकि चक्रों के कमल बन्द हैं । इसलिये दिव्यता का कोई अनुभव नहीं होता । क्योंकि कुण्डलिनी सोई है । इसलिये अल्प (जीव) शक्ति ही खुद में पाते हैं ।
लेकिन जैसे ही कोई सच्चा (गुरु या) सदगुरु आपके स्वांस में गूँजते इस नाम को जागृत कर देता है । प्रकाशित कर देता है । तब ये तीनों ही बदल कर क्रियाशील हो उठते हैं । सोऽहंग मन पलट कर हँऽसो हो जाता है । जन्म जन्म से सोई सर्पिणी कुण्डलिनी जाग उठती है । शरीर चक्रों के कमल सीधे होकर ऊपर की तरफ़ (पैरों से सिर की तरफ़) मुँह करके खिल जाते हैं ।
अब पहले मन की बात करें । इसके सभी 8 भाव विपरीत होकर दया, क्षमा, प्रेम, भक्ति, आदि आदि काम, क्रोध से विपरीत होकर सदगुणों में खुद बदल जाते हैं । कुण्डलिनी दिव्य शक्ति का संचार करती है और चक्र कमल खुलने से वहाँ की दिव्यता प्रकाश और अन्य दिव्य लाभ साधक को होने लगते हैं ।
इसलिये सामान्य अवस्था (बिना हँसदीक्षा) में इस सोऽहंग जीव को काग वृति (कौआ स्वभाव) कहा गया है । यह मलिन वासनाओं में सुख पाता है । हँऽसों की तुलना में विष्ठा इसका भोजन है । लेकिन हँसदीक्षा होने पर यह सत्य को जानने लगता है और अमीरस (अमृत) इसका भोजन है । तब यह सार सार को गहता हुआ सुख पाता हुआ कृमशः (साधक की स्थिति अनुसार) पारबृह्म की ओर उङता है और अपनी मेहनत लगन भक्ति अनुसार सचखण्ड पहुँचकर भक्ति अनुसार स्थान प्राप्त करता है । यही हँऽसो स्थिति है । साहेब ।
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- मैंने अपने अनुसार अधिकाधिक बताने की कोशिश की । फ़िर भी किसी बिन्दु पर अस्पष्टता लगने पर फ़िर से पूछ सकते हैं ।

23 अगस्त 2012

आपकी नज़र में ओशो क्या हैं -


नमस्कार उमेश और अशोक भाई ! सबसे पहले तो मैं राजीव भाई का धन्यवाद देना चाहूँगा । उन्होंने आत्म चर्चा का यह ब्लाग चलाया हुआ है । मैं आपके ब्लाग से कुछ ही दिन पहले जुड़ा । कुछ गूगल में सर्च कर रहा था । तभी राधा स्वामी वाला टोपिक पढ़ा । अशोक भाई ! आप तो मेरा मतलब गलत समझ गए । पहली बात तो मेरे पास कोई सुई ही नहीं है । जो कहीं अटकेगी । देखिये । मैंने कहा था कि - यह सवाल गलत है । न कि जवाब । मैंने कहा कि आप यह सवाल अगर किसी राधा स्वामी मत के पुस्तक में लिखा तो बताइए । अगर यह सवाल ही गलत है । तो जवाब कैसे सही हो सकते हैं । अगर मान लीजिये । आपसे कोई कहे कि - पृथ्वी तिकोनी क्यों है । और आप उसका जवाब देना शुरु कर देंगे कि इस वजह से पृथ्वी तिकोनी है । तो आप ही बतायें । क्या जवाब सही होगा actually राधा स्वामी मत की बुराई की इन्टरनेट में बहुत भरमार है । मतलब कि अगर आप राधा स्वामी मत के बारे में गूगल में सर्च करोगे । तो आपको हजारों sites मिल जायेंगी । जिसमें राधा स्वामी मत reality मिलेगी । उदाहरण के तौर पर वंशवाद । सम्पति । काल पूजा ..आदि । और राजीव जी ! आप यह जान कर हैरान होंगे । आधे से ज्यादा सिर्फ अफवाहें हैं । मैंने राधा स्वामी मत पर बहुत ही

research किया है । मुझे यह तो नहीं पता कि राधा स्वामी मत में कितनी सच्चाई है । परन्तु यह पता है कि राधा स्वामी मत के लिए लोगों की अलग अलग धारणा बनी हुई है ।
जैसे ओशो को मत को लेकर लोगों के मन में अलग अलग धारणा बनी हुई  है । ओशो ने अपनी विचारधारा को नाम दिया था - जोरबा टू बुद्धा । जोरबा का अर्थ होता है । एक भोग विलास में पूरी तरह से डूबा हुआ व्यक्ति । और बुद्धा का अर्थ निर्वाण पाया हुआ । परन्तु लोगों ने जोरबा का चरित्र का याद रख लिया । और बुद्धा को सब भूल गए । नौबत यहाँ तक आ गयी । अगर आप ओशो आश्रम जायेंगे । तो सबसे पहले आपको HIV test करवाना पड़ेगा । यदि आपका HIV negative है । तो आपको ओशो आश्रम में प्रवेश मिल सकता है ।
खैर यह सब छोड़िये । हम अपने टोपिक पर आते हैं । यहाँ अगर ब्लॉग पर राधा स्वामी मत का खंडन करना है । तो सही बात पर करिये । गलत बात पर नहीं । राजीव जी ! आपने लिखा कि राधा स्वामी मत वाले पंचनामा को जपते है

। और आपकी विचारधारा के अनुसार वो सब काल के हैं । मैं इस बारे थोडा विस्तार से लिखूंगा । अभी थोड़ी समय की पाबन्दी है । और राजीव जी और अशोक जी और उमेश भाई से यह जानना चाहता हुँ कि - आपकी नज़र में ओशो क्या हैं ? लोग अधिकतर ओशो के विचार सामने रख देते हैं । इस ब्लाग में मुझे ऐसा लगता है कि ओशो को सबसे perfect गुरु माना जाता है । और अशोक भाई बा्की आगे ज़ल्दी ही लिखूंगा । आपका छोटा भाई - CM 
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वो सवाल Mr H. Thorne Crosbyne राधा स्वामी पंथ की तीन किताबों को पढ़ कर पूछे थे - अशोक । 

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राजीव जी ! आज बहुत दिनों बाद मेल कर रहा हूँ । राजीव जी हमारे यहाँ टिब्बी में मेरा एक परिचित है । जो को आमंत्रित किया है । वो कहते हैं कि कबीर का जो असली ज्ञान है । वो सिर्फ उनके पास है । और किसी के पास नहीं । इसके बारे में आप क्या कहते हैं । आखिर सच्चाई क्या है ? राजीव जी  ये निर्णय ही नहीं कर पा रहा हूँ । जिस तरह किसा ...( आधा लिखा मेल ) सोहन गोधरा । राजस्थान ।
जगत गुरू रामपाल जी का शिष्य है । वो कहता है कि - रामपाल जी ने अध्यात्म चर्चा के लिए पूरे विश्व के संतो
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रामपाल की सच्चाई क्या है - रामपाल के बारे में कोई भी बात करना मुझे समय की बरबादी से ज्यादा कुछ नहीं लगता । रामपाल के यहाँ जो भीङ है । वह अधिंकाश अशिक्षित और

ग्रामीण लोगों की है । खुद रामपाल भी अशिक्षित से अधिक नहीं है । बाकी शास्त्र पुराणों में तोङ मरोङ कर ऐसी बातें निकाल लेना कोई बङी बात नहीं है । जबकि वे पूर्णतः आधारहीन हों । मुझे हैरानी है । रामपाल और मधु परमहँस ( साहिब बन्दगी ) दोनों जोर शोर से कबीर की बात करते हैं । जबकि कबीर से इनका कोई लेना देना नहीं हैं । रामपाल तो लोगों ने बताया कि - कई कई वाणी नाम ? सतनाम के नाम पर देता है । और मधु परमहँस - सतगुरु सतनाम ..मंत्र देते हैं । ये दोनों ही " सोहंग " को गलत बताते हैं । जबकि कबीर ने इसी से शुरूआत बतायी है । और ये पूर्णतः निर्वाणी है । तथा स्वांस में प्रति 4 सेकेंड 2 सोऽऽ 2 हंऽऽ इस तरह हो रहा है । विश्व का कोई भी व्यक्ति - हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई यहूदी पारसी इसका तुरन्त परीक्षण कर सकता है । अतं इसमें सन्देह जैसी कोई बात ही नहीं है । इन दोनों का जो दीक्षा देने का तरीका है । वह भी हँस ज्ञान वाला नहीं है । मधु परमहँस को सामान्य धर्म शिक्षक और रामपाल को अनपढ धार्मिक शिक्षक से 

अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता । रही बात । उसके चैलेन्ज आदि की । थोङा इन्तजार करें । सभी नकली और झूठे लोग खुद पतन रूपी गढ्ढे में गिरने वाले हैं । कितने ही पाखण्डी गिर चुके । वह आप देख ही चुके । फ़िर भी कबीर या आत्म ज्ञान के सोहंग या निर्वाणी मंत्र का कोई खण्डन करता है । तो मुझे उसका चैलेंन्ज स्वीकार है । मुझे हर उस धार्मिक गुरु का चैलेंज स्वीकार है । जो खुद को इस समय सतगुरु कह रहा है । बशर्ते यह चैलेंज बङे स्तर पर हो । बाकी इनका इलाज सत्ता खुद ही कर रही है । इसलिये मुझे इनमें कोई कैसी भी दिलचस्पी नहीं है ।
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अगर यह सवाल ही गलत है । तो जवाब कैसे सही हो सकते हैं - मैं इस बात से सहमत हूँ कि किसी पर आरोप प्रत्यारोप करने से पहले ठीक से बात को 

समझ लेना चाहिये । लेकिन शायद आज लोगों के पास इतना समय ही नहीं कि बात को ठीक से समझ सकें । फ़िर इस ब्लाग में तो खास ऐसा है कि एक लेख की बात दूसरे या तीसरे लेख में भी हो रही होती है । इसलिये ऐसे में भृम की स्थिति बन सकती है । लेकिन उमेश जैसे लोग जो इस ब्लाग के मूल उद्देश्य और नब्ज से परिचित हैं । वे जानते हैं - ये सामाजिक धार्मिक ज्वलंत विचारों और क्रांति का खुला मंच है । अतः हम अपनी अपनी बात रखते हैं । और उस पर बहस या विचार करते हैं । इसलिये आपका कहना भी सही है कि - सवाल ही गलत हैं । लेकिन आप गौर करें । तो सवाल गलत नहीं थे ? राधा स्वामी की प्रचार पुस्तकें पढकर Mr H. Thorne Crosbyne के मन में आया कि - कोई 5 नाम ( राधा स्वामी पंचनामा ) या 1 व्यक्ति ( चरन सिंह ) ही आत्मिक ऊँचाई पर ले जाने में ( इस समय ) सक्षम है ? और ओशो ने कई दृष्टिकोण से इसका सटीक उत्तर दिया । किसी भी धार्मिक संस्थान में छोटे बङे अनेक स्तर पर प्रचार सामग्री प्रकाशित की जाती है ।  और अक्सर प्रचारक लोग इस तरह के आधारहीन तथ्य जोङ देते हैं । अतः मेरे विचार से आप राधास्वामी या चरन सिंह के बजाय सिर्फ़ प्रश्न भाव से ओशो के उत्तर देखें । तो वो एकदम सटीक हैं । फ़िर भी आपके दृष्टिकोण का हमें इंतजार रहेगा । क्योंकि वह कुछ अलग सत्य लिये भी हो सकता है । इसलिये कोई दुराग्रह रखना भी मेरा स्वभाव नहीं है ।
राधा स्वामी मत का खंडन करना है । तो सही बात पर करिये - बिलकुल चन्द्रमोहन जी ! मैं आपसे सहमत हूँ । 

मैं सिर्फ़ राधास्वामी ही नहीं । बल्कि ओशो ( के वर्तमान । ओशो के समय नहीं ) रामपाल ( की बकबास ) मधु परमहँस ( का बङबोला पन ) जैसे तमाम लोगों का खंडन करता हूँ कि - वे सफ़ेद झूठ बोल रहे हैं । पहली बात तो इनका आत्म ज्ञान से कोई वास्ता ही नहीं । ये सदियों से स्थापित थ्योरी के एकदम विपरीत बोल रहे हैं । और प्रयोगात्मक ज्ञान से तो इनका दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है । जबकि वही असली होता है । मैंने संक्षेप में कई बार स्पष्ट किया है - जो भी व्यक्ति सांस में स्वतः होते निर्वाणी और धुनात्मक नाम के अतिरिक्त कोई भी अन्य नाम ( दीक्षा ) देता है । और अंतर में अधिकतम 3 महीने तक दिव्य प्रकाश नहीं कर पाता । निसंदेह वो व्यक्ति ( गुरु कहना तो बहुत गलत होगा ना ) पूरा धूर्त है । बस इसकी शर्त 1 ही है । शिष्य ने निर्धारित समय तक सही योग ध्यान सुमरन किया हो ।
इस ब्लाग में मुझे ऐसा लगता है कि ओशो को सबसे perfect गुरु माना जाता है - शायद आप ऐसा इसलिये कह रहे हैं । क्योंकि आप अभी इस ब्लाग

से नये नये जुङे हैं । और हमारे मुक्त विचारों से  पूर्णतयाः परिचित नहीं हो पाये । इस ब्लाग में ओशो को तो बहुत दूर कबीर रामकृष्ण जैसों को ( अब व्यक्तिगत तौर पर ) कोई महत्व नहीं दिया जाता । आत्म ज्ञान का अटल सूत्र है - सिर्फ़ समय का सदगुर ही महत्वपूर्ण है । बाकी सन्तों की वाणियाँ शिक्षायें उपदेश आदि तमाम लोगों को आत्म ज्ञान हेतु प्रेरित करते हैं । मार्ग दिखाते हैं । लेकिन भारत मुर्दा पूजकों का देश है । खुद कबीर ने कहा है - हाजिर की हुज्जत । गये की तलाशी । कबीर । ओशो । नानक । रैदास । तबरेज ।  ईसा । मुहम्मद । मीरा । मंसूर आदि आदि आत्म ज्ञानियों को हर तरह से परेशान करने में तत्कालिक लोगों ने कोई कसर नहीं छोङी । और आज ये सभी पूज्य हैं । पर - अब पछताय होत का जब चिङिया चुग गयी खेत । मेरा आशय है । किसी भी सन्त या आत्म ज्ञानी का तभी तक महत्व है । जब तक वह सशरीर है । फ़िर ( बाद में ) उसकी शिक्षायें लोगों

को मानसिक रूप से तैयार करती हैं । और पात्रता आ जाने पर समय के सदगुरु से उसकी भेंट हो जाती हई । आदि सृष्टि से यही नियम है । मैं यह बात पूरी  ठसक से इसलिये कहता हूँ । क्योंकि एकदम नीचे से लेकर ऊपर तक मेरे पास पूरा प्रयोगात्मक ज्ञान ( विधि ) है । और प्रमाण रूप में भारत के कई शहरों में हमारे साधक मौजूद हैं । जो निरंतर ध्यान प्रगति कर रहे हैं ।
आपकी नज़र में ओशो क्या हैं - 
शेष उत्तर शीघ्र ही

21 अगस्त 2012

प्रेत प्रभावित परिवार


पिछले दिन कुछ अजीव से रहे । और अभी भी अजीव ही हैं । जैसे मैं हूँ । जैसे मैं नहीं हूँ । एक धुँधली यादों सा सब कुछ बचा रह गया है । वृद्धावस्था में शारीरिक रूप से निष्क्रिय लोग जैसे खुद उदासीन हो उठते हैं । ये मरजीवा योग है । जीते जी मरना । इसीलिये मैंने कहा - वृद्धावस्था में जैसे सिर्फ़ सुखद मौत का इंतजार होता है । लेकिन ये स्थिति सिर्फ़ मन की है । मुझे ( बेमन से ही सही ) अभी भी काम करना होता है । और  पूरी ऊर्जा से काम करने होते हैं । पर जैसे बेमन से । क्योंकि मैं इन तमाम योग क्रियाओं से बुरी तरह ऊब चुका हूँ । वही तमाम उच्च निम्न लोकों का जरूरी गैर जरूरी भृमण । वही आदेशित किये गये जीव के संस्कारों का निबटारा । वही सब कुछ । कोई भी ऊब जायेगा । यदि एक लम्बेऽऽ समय तक ऐसा हो ।
14 aug 2012

- महाराज जी ! मुझे आपसे कुछ बात करना है । हमारा एक शिष्य मुझसे  फ़ोन पर कहता है - बात कुछ लम्बी है । इसलिये थोङा देर तक बात करनी होगी । ..हमारे एक रिश्तेदार हैं । पिछले समय से उनके यहाँ कुछ अजीव स्थितियाँ हैं । वे तीन भाई हैं । जिनमें दो भाई कुछ महीनों के अन्तराल में आत्महत्या कर चुके हैं । उनके घर में एक औरत ने भी आत्महत्या कर ली है । इसलिये वे सभी भयभीत हैं । कोई कहता है । घर में बरम देव का स्थान है । कोई कुछ कहता है । कई तरह के उपचार करा चुके हैं । अब किसी के बताने पर ईसाई प्रार्थना शिविर में भाग ले रहे हैं । उन्हें 21 बार प्रार्थना हेतु बुलाया गया है । और कहा गया है कि यदि 21 बार प्रार्थना में सम्मिलित नहीं हुये । तो प्रेत सबको मार डालेगा । घर के बाकी लोग भी अजीव से सम्मोहन का शिकार है ..आदि आदि । गुरूजी ये सब क्या है ? क्या ये बात वाकई सच है ? वे लोग बहुत डरे हुये हैं ।
दया बिन सन्त कसाई । दया करी तो आफ़त आई । मैं अपने अनुभव से समझ गया । सत्ता ने कार्य भेज दिया ।

- हाँ ये सच है । मैं फ़ोन पर कहता हूँ - प्रायः अन्य मामलों की तरह माँस मदिरा का प्रयोग करने वाले परिवार ऐसे दोषों से अक्सर पीङित हो जाते हैं । और इसकी शुरूआत बहुत पहले से हो चुकी होती है । लेकिन इन प्रेत आवेशों के प्रभावी परिणाम आने जब शुरू होते है । तब इंसान को होश आता है । पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है । अतः उनका शक एकदम सही है । आगे भी  ये सिलसिला चलता रहेगा । अभी जिक्र किये व्यक्ति 20% प्रभावित हैं । इसलिये कुछ सामान्य सा लग रहा है  ।
- तो उस प्रार्थना से कुछ नहीं होगा ?
-  हाँ क्यों नहीं होगा । लोगों की ईसाई शिविरों की ओर आस्था बढेगी कि यहाँ ऐसे ऐसे लोग ठीक हो जाते हैं ? क्योंकि बाद में कोई दुर्घटना होने पर वह भीङ ( ईसाई शिविरि की ) देखने नहीं आती कि क्या हुआ । न ही कोई फ़ादर

आदि बताता है कि - यीशु ने प्रार्थना नहीं सुनी । और कोई फ़ायदा नहीं हुआ ।
यह बात जब मुझे बताई जा रही थी । प्रभावित परिवार हमारे शिष्य के घर ही था । लेकिन मेरी उनसे कोई बात नहीं हुयी ।
- वे लोग चले गये हैं । कुछ देर बाद फ़िर फ़ोन आता है - अब आप स्पष्ट बतायें क्या होगा ?
- कोई भी मरने वाला । मैं स्पष्ट ही कहता हूँ - यदि अकाल मौत मरता है । तो भले ही वह घर का ही हो । दुश्मन हो जाता है । या दूसरे भाव में । वह चाहता है कि इनको भी अपने पास बुला लूँ । क्योंकि अकाल मौत होने से उसकी तरंगे और घर के सदस्यों के भाव अभी भी आपस में जुङे रहते हैं । इसलिये प्रेत योनि प्राप्त रूह का काम आसान हो जाता है । इसके .. ( आगे पूछने पर ) दो ही उपाय है । अच्छे तांत्रिक द्वारा प्रेत वायु का समूल उपचार । लेकिन यदि घर के लोगों का भय नहीं निकला । वे अपनी भावनायें नहीं हटा पाये । तो प्रेत फ़िर जुङ सकते हैं । और दूसरा सतनाम भक्ति । इससे तो दैवीय बाधायें भी हाथ

जोङ कर थर थर कांपती हैं । फ़िर प्रेत किस खेत की मूली हैं । ये हमेशा के लिये उपचार हो जायेगा । अब ये उन पर निर्भर है कि वे क्या तय करते हैं ।
- प्रणाम महाराज जी ! कुछ देर बाद उन्हीं रिश्तेदार का फ़ोन आता है - वो जो आपकी बात हुयी थी .. महाराज जी हम लोग बहुत डरे हुये हैं । आपकी शरण में आये हैं । हमारे लिये कुछ करें । हम जल्द से जल्द नाम उपदेश ले लेंगे । पर तब तक आप हमारी रक्षा करें । ..और वो जो हम ईसाई प्रार्थना शिविर में जाते हैं । उसमें जायें । या ना जायें ?
- ठीक है । मैं बिना कुछ सोचे ही तुरन्त कहता हूँ - तुम कोई चिन्ता मत करो । कोई तुम्हारे पास भी नहीं फ़टकेगा । पर यह अस्थायी होगा । स्थायी समाधान के लिये आपको नामदान लेना होगा । जहन्नुम में जाने दो । प्रार्थना आरती पूजा सूजा को ।
भले ही मत विश्वास करना । पर मैं खिङकी से बाहर देखता हुआ कहता हूँ - ऐ फ़ूट लो तीनों । अभी कुछ दिनों तक डिस्टर्ब नहीं करोगे ।  ( यह मौन भाव होता है । न कि वाणी आदेश )


इसके बाद प्रभावित व्यक्ति की पत्नी भी मुझसे बात करती हैं - गुरूजी वास्तव में तो हमें भी ईसाईओं की उस प्रार्थना बगैरह में कुछ विश्वास नहीं है । पर मरता क्या न करता वाली बात है । वह हम बेमन से ही करते हैं । ऊपर से उन्होंने धमकी भी दी कि प्रार्थना नहीं करायी । तो ये हो जायेगा । वो हो जायेगा । बताईयें हमें क्या करना चाहिये । हम लोग डरें हुये हैं ।
- तुम्हें कुछ नहीं करना चाहिये । मैंने कहा - और झाङू मारों ईसाईओं को । और उनकी प्रार्थना को भी ।
कोई भी कल्पना कर सकता है कि ऐसी समस्या जिसका कोई ठोस समाधान न हो । और बात मृत्यु के परिणाम

तक हो । तो प्रभावित लोग कितना भयभीत होंगे । मैं उनसे कहता हूँ - तुम डरो मत । कोई बङी बात नहीं है ।
इसके कुछ ही देर बाद फ़िर हमारे शिष्य का फ़ोन आता है - गुरूजी वो लोग अब बहुत खुश हैं । उनके मन का जैसे अन्दर से ही डर निकल गया है । वो कह रहे थे । पहले जो अजीव सा डर हर वक्त रहता था । अब बिलकुल नहीं लग रहा । लग रहा है । जैसे कोई बात थी ही नहीं ।
लेकिन अभी भी एक बात थी ? दूसरे ही दिन फ़िर उन लोगों का हल्की घबराहट के साथ फ़ोन आता है - गुरूजी गोरबा ( पैर ) में बहुत तेज अजीब सा दर्द है । फ़िर से घबराहट हो रही है ।
- तुम चिन्ता मत करो । मैंने कहा - वह कुछ ही देर में खुद ठीक हो जायेगा ।
आखिर जाते जाते कोई ना कोई खीझ तो हर बन्दा निकालता ही है । सो वह भी निकाल रहा था । कितना अजीव है ये इंसान भी । सही वक्त में जैसे नशे में रहता है । उसे अपना हर काम सही लगता है । चाहे खुद अपनी ही

अंतर आत्मा से वह उसे गलत लग रहा हो । सुख में सुमरन ना किया दुख में करता याद । कह कबीर उस दास की कौन सुने फ़रियाद ।
19 aug 2012 चिंताहरण आश्रम ।
प्रभावित परिवार में पत्नी को दीक्षा के बाद अनुभव होता है । या स्पष्ट दिखता है । उसके परिवार के मृत तीनों लोग । दो आदमी एक औरत । एक अंधेरी सी गुफ़ा के पास खङे हैं । वे उसकी तरफ़ से मुँह फ़ेर लेते हैं । और निराश आगे चले जाते हैं ।
- एक महीने तक । श्री महा्राज जी कहते हैं - खूब मन लगा कर इस नाम का सुमरन कर लो । फ़िर कोई भूत 

प्रेत कभी नहीं सतायेगा ।
इतनी सरल सतनाम भक्ति के प्रेतक उपचार में कई बार तुरन्त प्रभाव मेरे सामने आये हैं । मैं कई बातें सोचता हूँ । इन्हें कितनी बङी प्राप्ति हुयी । शायद इन्हें भी पता न हो । डर से ही सही । ये सतनाम का सुमरन करेंगे । और धीरे धीरे आनन्द को प्राप्त होते जायेंगे । अनजाने में ही असली भक्ति और हमेशा के लिये मनुष्य जन्म की पात्रता भी मिल गयी ।
- इसमें कई बातें जिनका उल्लेख उचित नहीं था । और पात्र स्थान के नाम मैंने नहीं लिखे ।


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