29 सितंबर 2012

जन गण मन या अंग्रेज जार्ज पंचम की आरती


‘’ वन्दे मातरम ’’ बंकिम चंद्र चटर्जी ने लिखा था । उन्होने इस गीत को लिखा । लिखने के बाद 7 साल लगे । जब यह गीत लोगो के सामने आया । क्योंकि उन्होने जब इस गीत को लिखा । उसके बाद उन्होने 1 उपन्यास लिखा । जिसका नाम था ‘’ आनद मठ ’’ उसमे इस गीत को डाला । वो उपन्यास छपने मे 7 साल लगे । 1882 आनद मठ उपनास का हिस्सा बना - वन्दे मातरम । और उसके बाद जब लोगों ने इसको पढ़ा । तो इसका अर्थ पता चला कि - वन्दे मातरम क्या है ? आनद मठ उपन्यास बंकिम चंद्र चटर्जी ने लिखा था । अंग्रेजी सरकार के विरोध में । और उन राजा महाराजाओं के विरोध में । जो किसी भी संप्रदाय के हों । लेकिन अंग्रेजी सरकार को सहयोग करते थे । फिर उसमें उन्होंने बगावत की भूमिका लिखी कि - अब बगावत होनी चाहिये । विरोध होना चाहि्ये । ताकि इस अंग्रेजी 

सत्ता को हम पलट सकें । और इस तरह वन्दे मातरम को सार्वजनिक गान बनना चाहिये । ये उन्होंने घोषित किया ।
उनकी 1 बेटी हुआ करती थी । जिसका अपने पिता बंकिम चंद्र चटर्जी जी से इस बात पर बहुत मतभेद था । उनकी बेटी कहती थी - आपने यह वन्दे मातरम लिखा है । उसके ये शब्द बहुत क्लिष्ट हैं कि बोलने और सुनने वाले की ही समझ में नहीं आयेंगे । इसलिये गीत को आप इतना सरल बनाईये कि - बोलने और सुनने वाले की समझ में आ सकें ।
तब बंकिम चंद्र चटर्जी ने कहा - देखो । आज तुमको यह क्लिष्ट लग रहा हो । लेकिन मेरी बात याद रखना । 1 

दिन ये गीत हर नौजवान के होंठों पर होगा । और हर क्रांतिवीर की प्रेरणा बनेगा । और हम सब जानते हैं । इस घोषणा के 12 साल बाद बंकिम चंद्र चटर्जी का स्वर्गवास हो गया । बाद में उनकी बेटी और परिवार ने आंनद मठ पुस्तक जिसमें ये गीत था । उसका बड़े पैमाने पर प्रचार किया ।
वो पुस्तक पहले बंगला में बनी । बाद में उसका अनुवाद - कन्नड । मराठी । तेलगु । हिन्दी आदि बहुत
भाषा में छपा । उस पुस्तक ने क्रांतिकारियों में बहुत जोश भरने का काम किया । उस पुस्तक में क्या था कि - इस पूरी अंग्रेजी व्यवस्था का विरोध करे । क्योंकि यह विदेशी है । उसमें ऐसी बहुत सी जानकारियां थी । जिसको पढ़ कर लोग बहुत उबलते थे । और वो लोगों में जोश भरने का काम करती

थी । अंग्रेजी सरकार ने इस पुस्तक पर पाबंदी लगाई । कई बार इसको जलाया गया । लेकिन इसकी कोई न कोई 1 मूल प्रति बच ही जाती । और आगे बढ़ती रहती ।
1905 में अंग्रेज़ो की सरकार ने बंगाल का बंटवारा कर दिया । 1 अंग्रेज़ अधिकारी था । उसका नाम था - कर्ज़न ! उसने बंगाल को 2 हिस्सो मे बाँट दिया । 1 - पूर्वी बंगाल । 2 - पश्चिमी बंगाल । पूर्वी बंगाल था - मुसलमानो के लिये । पश्चिमी बगाल था - हिन्दुओं के लिए । हिन्दू और मूसलमान के आधार पर यह पहला बंटवारा था ।
तो भारत के कई लोग जो जानते थे कि - आगे क्या हो सकता है ? उन्होंने इस बंटवारे का विरोध किया । और बंग भंग के विरोध में 1 आंदोलन शुरू हुआ । और इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे ( लाला लाजपतराय ) जो उत्तर भारत में थे ( विपिन चंद्र पाल ) जो बंगाल और पूर्व भारत का नेतत्व करते थे । और लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक । जो पश्चिम भारत के बड़े नेता थे । इस तीनों नेताओं ने अंग्रेज़ों के बंगाल विभाजन का विरोध शुरू किया । इस आंदोलन का 1 हिस्सा था ( अंग्रेज़ो भारत छोड़ो )
( अंग्रेजी सरकार का असहयोग ) करो । ( अंग्रेजी कपड़े मत पहनो ) ( अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार करो )  और दूसरा हिस्सा था - पोजटिव.. कि - भारत में स्वदेशी का निर्माण करो । स्वदेशी पथ पर आगे बढ़ो ।
लोकमान्य तिलक ने अपने शब्दों में इसको स्वदेशी आंदोलन कहा । अंग्रेजी सरकार इसको बंग भंग विरोधी

आंदोलन कहती रही । लोकमान्य तिलक कहते थे - यह हमारा स्वदेशी आंदोलन है । और उस आंदोलन की ताकत इतनी बड़ी थी कि - यह तीनों नेता अंग्रेज़ो के खिलाफ जो बोल देते । उसे पूरे भारत के लोग अपना लेते । जैसे उन्होंने आर के ऐलान किया - अंग्रेजी कपड़े पहनना बंद करो । करोंड़ों भारत वासियों ने अंग्रेजी कपड़े पहनना बंद कर दिया । उधर उस समय भले हिंदुस्तानी कपड़ा मिलें । मोटा मिले । पतला मिले । वही पहनना है । फिर उन्होंने कहा - अंग्रेजी व्लेड का इस्तेमाल करना बन्द करो । तो भारत के हजारों नाईयों ने अंग्रेजी ब्लेड से दाड़ी बनाना बंद कर दिया । और इस तरह उस्तरा भारत में वापिस आया । फिर लोक मान्य तिलक ने कहा - अंग्रेजी चीनी खाना बंद करो । क्योंकि चीनी उस वक्त इंगलैंड से बन कर आती थी । भारत में गुड बनता था । तो हजारों लाखों हलवाइयों ने गुड डाल कर मिठाई बनाना शुरू कर दिया । फिर उन्होंने अपील लिया - अंग्रेजी कपड़े और अंग्रेजी साबुन से अपने घरों को मुक्त करो । तो हजारों लाखों धोबियों ने अंग्रेजी साबुन से कपड़े धोना मुक्त कर दिया । फिर उन्होंने पंडितों से कहा - तुम शादी करवाओ अगर । तो उन लोगों की मत करवाओ । जो अंग्रेजी वस्त्र पहनते हों । तो पंडितो ने सूट पेंट पहने टाई पहनने वालों का बहिष्कार कर दिया ।

इतने व्यापक स्तर पर ये आंदोलन फैला कि 5-6 साल में अंग्रेजी सरकार घबरा गयी । क्योंकि उनका माल बिकना बंद हो गया । ईस्ट इंडिया कंपनी का धंधा चौपट हो गया । तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने अंग्रेज़ सरकार पर दबाव डाला कि - हमारा तो धंधा ही चौपट हो गया । भारत में । हमारे पास कोई उपाय नहीं है । आप इन भारतवासियों की मांग को मंजूर करो । मांग क्या थी कि - यह जो बंटवारा किया है । बंगाल का हिन्दू मुस्लिम के आधार पर । इसको वापिस लो । हमें बंगाल के विभाजन संप्रदाय के आधार पर नहीं चाहिये ।
और आप जानते हैं । अंग्रेजी सरकार को झुकना पड़ा । और 1911 मे divison of bangal act वापिस लिया गया । इतनी बड़ी होती है । बहिष्कार की ताकत ।
तो लोक मान्य तिलक को समझ आ गया । अगर अंग्रेज़ो को झुकाना है । तो बहिष्कार ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है । यह 6 साल जो आंदोलन चला । इस आंदोलन का मूल मंत्र था - वन्दे मातरम । जितने क्रांतिकारी थे । लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक । लाला लाजपत राय । विपिन चंद्र पाल के साथ । उनकी संख्या 1 करोड़ 20 लाख से ज्यादा थी । वो हर कार्यकृम में वन्दे मातरम

गाते थे । कार्यकृम की शुरूआत में - वन्दे मातरम । कार्यकृम की समाप्ति पर - वन्दे मातरम ।
उसके बाद क्या हुआ ? अंग्रेज़ अपने आपको बंगाल से असुरक्षित महसूस करने लगे । क्योंकि बंगाल इस आंदोलन का मुख्य केंद्र था । 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था । 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजों के खिलाफ बंग भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुये । तो अंग्रेजों ने अपने आपको बचाने के लिये कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गये । और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया । पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुये थे । तो अंग्रेजों ने अपने इंगलैंड के राजा को भारत आमंत्रित किया । ताकि लोग शांत हो जायें । 
इंगलैंड का राजा जार्ज पंचम 1911 में भारत में आया । रवींद्र नाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि - तुम्हें 1 गीत जार्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही 

होगा । उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था । उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे । उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिवीजन के निदेशक Director रहे । उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था । और खुद रवीन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी । अंग्रेजों के लिये ।
रवीद्रनाथ टैगोर ने मन से । या बेमन से । जो गीत लिखा । उसके बोल हैं - जन गण मन अधिनायक जय । हे भारत भाग्य विधाता । इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जार्ज पंचम का गुणगान है । जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि - ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजों की खुशामद में लिखा गया था ।

इस राष्ट्र गान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है  - भारत के नागरिक । भारत की जनता । अपने मन से । आपको ( जार्ज पंचम को ) भारत का भाग्य विधाता समझती है । और मानती है । हे अधिनायक Super hero तुम्हीं भारत के भाग्य विधाता हो । तुम्हारी जय हो । जय हो । जय हो । तुम्हारे भारत आने से सभी
प्रान्त - पंजाब । सिंध । गुजरात । मराठा मतलब महाराष्ट्र । द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत । उत्कल मतलब उड़ीसा बंगाल आदि । और जितनी भी नदियां । जैसे - यमुना और गंगा । ये सभी हर्षित हैं । खुश हैं । प्रसन्न हैं । तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते हैं । और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते हैं । तुम्हारी ही हम गाथा गाते हैं । हे भारत के भाग्य विधाता ( सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो । जय हो । जय हो ।  में ये गीत गाया गया ।

जब वो इंगलैंड चला गया । तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया । जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना । तो वह बोला कि - इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंगलैंड में भी किसी ने नहीं की । वह बहुत खुश हुआ । उसने आदेश दिया कि - जिसने भी ये गीत उसके ( जार्ज पंचम के ) लिये लिखा है । उसे इंगलैंड बुलाया जाये । रवीन्द्र नाथ टैगोर इंगलैंड गये । जार्ज पंचम उस समय नोबेल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था । उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया । तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबेल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया । क्योंकि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टैगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था । टैगोर ने कहा  कि - आप मुझे नोबेल पुरस्कार देना

ही चाहते हैं । तो मैंने 1 गीतांजलि नामक रचना लिखी है । उस पर मुझे दे दो । लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो । और यही प्रचारित किया जाये क़ि - मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है । वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है । जार्ज पंचम मान गया । और रविन्द्र नाथ टैगोर को 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबेल पुरस्कार दिया गया ।
रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई - 1919 में । जब जलिया वाला कांड हुआ । और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा । और कहा क़ि - अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा । तो कब उतरेगा ? तुम अंग्रेजों के

इतने चाटुकार कैसे हो गये ? तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गये ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गये । और बहुत जोर से डांटा कि - अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुये हो । तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नींद खुली । इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया । और नोबेल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया ।
1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा । वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था । और 1919 के बाद । उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे । रविन्द्र नाथ  टैगोर के बहनोई - सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे । और ICS ऑफिसर थे । अपने बहनोई को उन्होंने 1 पत्र लिखा

था ( ये 1919 के बाद की घटना है )  इसमें उन्होंने लिखा है कि - ये गीत " जन गण मन " अंग्रेजों के द्वारा मुझ पर दबाव डालकर लिखवाया गया है । इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है । इस गीत को नहीं गाया जाये । तो अच्छा है ।लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि - इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखायें । क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ । लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये । तो सबको बता दें ।
7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद । इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया । और सारे देश को ये कहा क़ि - ये " जन गण मन " गीत न गाया जाये 

। 1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी । लेकिन वह 2 खेमों में बट गई । जिसमे 1 खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे । और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु के समर्थक थे । मतभेद था । सरकार बनाने को लेकर । 1 दल चाहते थे कि - स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार Coalition
Government बने । जबकि दूसरे दल वाले कहते थे कि - अंग्रेजों के साथ मिलकर सरकार बनाना । तो भारत के लोगों को धोखा देना है ।
इस मतभेद के कारण ।  1 नरम दल । और 1 गरम दल.. बन गया । गर्म दल के लोग हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे । और ( यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि - गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे । वो किसी तरफ नहीं थे । लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिये आदरणीय थे । क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे ) लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजों के साथ रहते थे । नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे । और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था । तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल 

वालों ने उस समय 1 हवा उड़ा दी कि - मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिये । क्योंकि इसमें बुत परस्ती ( मूर्ति पूजा ) है । और आप जानते हैं कि - मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी हैं । उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी । जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे । उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया । क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को ( उस समय तक ) भारतीय थे । मन । कर्म । और
वचन से अंग्रेज ही थे । उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया । और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया ।

जब भारत 1947 में स्वतंत्र हो गया । तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली । संविधान सभा की बहस चली । संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे । जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित - वन्दे मातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई बस 1 सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना । और उस 1 सांसद का नाम था - पंडित जवाहर लाल नेहरु । उनका तर्क था कि - वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुँचती है । इसलिए इसे नहीं गाना चाहिये ( दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं ।  अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी ) अब इस झगडे का फैसला कौन करे ?
तो वे पहुँचे गाँधी जी के पास । गाँधी जी ने कहा कि - जन गण मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ । और तुम ( नेहरु

) वन्दे मातरम के पक्ष में नहीं हो । तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये । तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया ।
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा । झंडा ऊँचा रहे हमारा ।
लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुये । नेहरु जी का तर्क था कि - झंडा गान आर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता । और जन गण मन आर्केस्ट्रा पर बज सकता है । उस समय बात नहीं बनी । तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा । और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया ।
और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया । जबकि इसके जो बोल हैं । उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते हैं ? और दूसरा पक्ष नाराज न हो । इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्र

गीत बना दिया गया । लेकिन कभी गाया नहीं गया । नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे । जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुँचे ।
मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे । जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया । जबकि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे । जन गण मन को इसलिये तरजीह दी गयी । क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था । और वन्दे मातरम इसलिए पीछे रह गया । क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था ।
बीबीसी BBC ने 1 सर्वे किया था । उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे । उनसे पुछा कि - आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है ? तो 99% लोगों ने कहा - वन्दे मातरम । बीबीसी के इस सर्वे से 1 बात और साफ़ हुई कि - दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्दे मातरम है । कई देश हैं । जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते हैं । लेकिन वो कहते है कि - इसमें जो लय है । उससे 1 जज्बा पैदा होता है । तो ये इतिहास है - वन्दे मातरम का । और जन गण मन का । अब ये आपको तय करना है कि - आपको क्या गाना है ?
रविन्द्र नाथ टैगोर द्वारा लिखित । उनका हस्ताक्षरित । इंगलिश में अनुवादित पत्र ।
must must must click here पूरी post नहीं पढ़ सकते । तो यहाँ click करें । link -
http://www.youtube.com/watch?v=DEfSXWhxI9A&feature=plcp

25 सितंबर 2012

जग चला चली का खेला

सुबह चार बजे न जाने कैसे दो क्षणों को उसकी आँख लग गई । तभी उसने सपना देखा । गुडिया उसका दरवाज़ा खटखटा रही है । जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला । गुडिया उससे लिपटकर बोली - लो ! अब हमेशा तुम्हारे पास ही रहने आ गई । रजनीश बिस्तर पर चौंक कर उठ बैठा । घड़ी देखी । सुबह के चार बजे थे । वह उठते ही सीधा गुडिया के घर की ओर चल दिया । नानी समझी नदी नहाने जा रहा है । डा0 शर्मा के घर से रोने की आवाज़ें आ रही थीं । गुडिया ने सचमुच चार बजे ही प्राण छोड़े थे । फिर वह गुड़िया का दाह संस्कार होने पर ही दोपहर 2 बजे घर लौटा । नानी को सब कुछ मालूम हो गया था । वह राजा को छाती से लगाकर काफी देर तक उसके बाल सहलाती रही । रजनीश ने धीमे धीमे कल रात गुड़िया की बातें, सुबह का सपना, सब कुछ अपनी नानी को बताया । नानी ने रेडियो खोल रक्खा था । और नूरजहाँ का गीत गूँज रहा था -
वो जो हममें तुममें करार था । तुम्हें याद हो कि न याद हो ।
वो कभी जो तुमसे प्यार था । तुम्हें याद हो कि न याद हो ।
रजनीश को यह गाना बहुत अच्छा लगा । नानी से आग्रह करके उसी शाम इसी रिकार्ड को सुनने के लिये ग्रामोफोन ख़रीदा । ग्रामोफ़ोन पर बार बार इसी रिकार्ड को सुनते हुये नानी ने टोका - राजा !यह रिकार्ड सुनते हुये तुझे अपनी गुड़िया की याद आ रही है । और मुझे तेरे नाना की । राजा एक साँस भरकर बोला - नानी तू बहुत हिम्मत वाली थी । नाना के मरते वक़्त भी तू रोई नहीं थी । पर कल शाम गुड़िया की बातें सुनकर मेरी आँखे नम हो गई थीं ।
नानी बोली - प्रेम करना तो ईश्वर से मिलना है । सही मानों में प्रेम ही परमात्मा है । प्रेम के लिये अपने को खोना होता है । जो प्रेम में हार ख़ुशी से स्वीकार कर लेता है । वही जीत जाता है ।
राजा बोला - शशि कहती थी कि वह फिर जन्म लेकर मिलेगी मुझसे । ओशो ।
कोई चला गया कोई जावे । कोई गठड़ी बांध सिधावे । 
कोई खड़ा तैयार अकेला । जग चला चली का खेला ।
अति हठ कर, मत मर बावरे । हठ से बात ना होये ।
ज्यों ज्यों भीजे कामरी । त्यों त्यों भारी होये ।
भूल भी ठीक की तरफ ले जाने का मार्ग है । इसलिए भूल करने से डरना नहीं चाहिये । नहीं तो कोई आदमी ठीक तक कभी पहुँचता नहीं । भूल करने से जो डरता है । वह भूल में ही रह जाता है । खूब दिल खोलकर भूल करनी चाहिये । एक ही बात ध्यान रखनी चहिये कि एक ही भूल दुबारा न हो । ओशो 

24 सितंबर 2012

सबसे पापी दुष्ट नीच कुकर्मी - सोहन गोदारा

राजीव जी ! वैसे तो मैं टीवी फ़ेमस बाबाओं को सुनता नहीं हूँ । और न इनमें मेरी कोई दिलचस्पी है । लेकिन श्री कृपालु जी महाराज को मैने कई बार सुना है । वो कहते हैं कि - परमात्मा या गुरू । ये दोनों 1 ही तत्व के 2 रूप हैं ।और जिसका गुरू या परमात्मा में पूर्ण श्रद्धा भाव और प्रेम होता है । वही सर्वोच्च भक्ति है । ज्ञान मार्ग से भगवत्त प्राप्ति नहीं हो सकती ? बङे बङे ज्ञानी जब आत्म ज्ञान कर लेते हैं । फिर बाद में वो परमात्मा की ही शरणागति करते हैं । उनके अनुसार - जो ध्यान में समाधि का सुख मिलता है । वो भी मायिक है । परमानन्द तो भगवत प्राप्ति से मिलता है । और भगवत प्राप्ति भगवान से प्रेम करने होती है । न कि ज्ञान मार्ग से । ज्ञान मार्ग से माया नि्वृति भी नहीं हो सकती ? कुछ बताना चाहें । तो बतायें । धन्यवाद । इस संसार का सबसे - पापी । दुष्ट । नीच । कुकर्मी - सोहन गोदारा ।
♥♥♥♥
बेङा गर्क हो ( गा ) इसका । कैसी झूठी झूठी बातें बनाकर गुरु बनता है । बेङा गर्क हो भी गया । उन

सबका । जिन्होंने किताब को ही गुरु ( गृन्थ ) बना दिया । उनका भी । जिन्होंने कहा - इस आदमी के बाद कोई ज्ञानी या परमेश्वर पुत्र आयेगा ही नहीं । उनका भी । जिन्होंने कहा - किताब में लिखी आतें ( बातें ) ही आँख मूँद कर सत्य मान लो । और सामने घटती तमाम हकीकत से आँखें ही मूँद लो । लेकिन इनका खुद का बेङा गर्क हुआ । सो हुआ । इन्होंने तमाम आगे की पीङियों का भी बेङा गर्क कर दिया ।
कृपालु  सिर्फ़ अच्छा ( बल्कि बहुत अच्छा भी ) विद्वान है । पर कोई ( जरा भी ) आंतरिक ज्ञानी नहीं । इस बात पर मैं 100% हूँ । और ( इससे जुङे ) हर चैलेंज के लिये तैयार भी । क्योंकि हर बात के सत्य ( का )उदघाटित होने का समय आ गया ।
अब आईये । कृपालु पर कुछ बात करते हैं । 1984 ..का समय था । जब मैंने कृपालु के बारें में कुछ जाना । हमारे

घर में एक सरकारी शिक्षिका आती थीं । जो उन दिनों कृपालु के नये नये सम्पर्क में आयी थीं । उनके आने के 2 कारण थे । 1 - अपने नये परिवेश की वार्ता और ( उनके गुरु ) कृपालु की चर्चा करना । 2 - मेरे पास टेप रिकार्डर का होना । जिसमें वो कृपालु प्रवचन के आडियो टेप सुनती थीं । क्योंकि ( तब ) टेप रिकार्डर उनके पास नहीं था । 
ये हर अवकाश में मथुरा वृंदावन स्थित कृपालु आश्रम जाती थीं । और वहाँ से नयी नयी जानकारियाँ हमारे घर आकर ( हमें ) UPDATE करती थीं । ध्यान रहे । मेरी माँ भी इनके साथ ही सरकारी शिक्षिका थीं । जाहिर है । हमारा घर कृपालु मय होना ही था । पर मेरा हिसाब ही दूसरा था - एक तो करेला । दूसरे नीम भी चढा । इसलिये कोई रंग चढता ही न था ।
लगभग 1987 ...वे एक चन्दा रसीद बुक लेकर आयी थीं । जो उन्हें आश्रम से मिली थी । उनके अनुसार - आश्रम में कोई निर्माण कार्य हो रहा था । जिसके लिये प्रत्येक ( खास बनने  वाले ) शिष्य को उसके महत्व के अनुसार 10 000 और 50 000 का लक्ष्य दिया था । मतलब उतना करना ही था । आप समझ सकते हैं । 1987 का समय था । और लोग 10-20 रुपये चन्दा मुश्किल से देते थे । क्योंकि उन दिनों आम आदमी के लिये 10-20 रुपये काफ़ी होते थे । जाहिर है । लक्ष्य तगङा था । तमाम भागदौङ के बाद मुश्किल से 1 000 से भी कम रुपये एकत्र

हो पाये । तब उन्होंने शेष राशि अपने पास से दी । सोचिये । 50 000 लक्ष्य वाले का क्या हुआ होगा ?
विशेष - चन्दा माँगते समय ये लोग आश्रम से मिली एक चिकने रंगीन पेजों की चित्रमय पुस्तिका साथ रखते थे । और उसमें गोलोक और श्रीकृष्ण की प्रमुख सखियों की ( काल्पनिक ) फ़ोटो दिखाते थे कि - कैसे उन सबको ये सुन्दर गति मिली । और उनको ( चन्दा माँगने वालों को ) भी मिली समझो । और चन्दा दे दो । तो देने वाले को भी मिली समझो । इनकी बातों में ये भाव ( टोन ) भी होता था कि - कृपालु श्रीकृष्ण का प्रेमावतार है ।
वर्ष याद नहीं । पर कुछ और सालों बाद । इन्होंने अपना सरकारी फ़ंड बीमा आदि का पैसा निकाल कर आश्रम को दान कर दिया । कुछ और सालों के बाद । नौकरी के अतिरिक्त समय में गुरु के लिये धन जुटाना । और अपने लिये गुजारे लायक छोङ कर सभी आश्रम में दे देना । इसी बीच इन्होंने एक टीम बना ली । वो भी इसी काम में लग गयी ।
2008 इन्हें छोटे मोटे गुरु और प्रचारक की उपाधि मिल गयी । इनका मेरे लिये बहुत आग्रह था कि - मैं भी कृपालु का शिष्य बन जाऊँ । मैंने मन में सोचा - क्यों बेचारे की दुकान बन्द कराना चाहती हो । खैर..एक बार ये मेरे घर आयीं । और जैसे ठान कर आयीं कि - आज मुझे हरा कर ही छोङेंगी । बात शुरू हुयी । और मैंने कहा -

मैडम ! आप जो भी बोलती हैं । ये आत्म ज्ञान नहीं है । और आत्म ज्ञान ही सर्वोच्च है । आपके सुप्रीमो श्रीकृष्ण जैसे आत्म ज्ञान विभाग में पानी भरते हैं । और अजर अमर भी नहीं हैं । दरअसल जीवात्मा ( मनुष्य ) का लक्ष्य आत्म ज्ञान है । न कि आपके - ये श्रीकृष्ण ।
उनके अहम को बेहद चोट लगी । और उन्होंने आत्म ज्ञान का मतलब ( सिर्फ़ ) निराकार भक्ति से निकाला ।  और यों बोली - ऐसी भक्ति से क्या लाभ । जिसमें अपने आराध्य की सुन्दर मनोहर छवि का दर्शन भी न हो । क्योंकि वह तो निराकार ही है । उसका कोई आकार ही नहीं । तब हमारी प्रीति कैसे हो ? मैंने कहा - उसी निराकार से करोङों श्रीकृष्ण उत्पन्न होते हैं ।
खैर..10 मिनट बाद ही शास्त्रार्थ समाप्त हो गया । और वो भुनभुनाती हुयी बुरा सा मुँह बना कर चलीं गयीं । 1984 से 2008 यानी 24 साल । निम्न श्रेणी के प्रचारक की उपाधि । और साकार निराकार जैसे महत्वपूर्ण सूत्रों का भी अभी दूर दूर तक पता नहीं । खुद श्रीकृष्ण भी जिसकी बात करते हैं । इसी को कहते हैं - बेङा गर्क होना । क्या फ़ायदा हुआ ? इस समय बरबादी का ।
ये उदाहरण इसलिये कि - आप समझ सको । पढे लिखे ( बल्कि दूसरों को पढाने  वाले भी ) धर्म क्षेत्र में किस तरह बेवकूफ़ बनते हैं ? और ध्यान रहे । ये सिर्फ़ 1 इंसान की सच्ची कहानी है ।
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अब आईये । सोहन द्वारा उठाये गये बिन्दुओं पर वाया कृपालु बात करते हैं ।
परमात्मा या गुरू । ये दोनों 1 ही तत्व के 2 रूप हैं - ये बात एक भाव में सही है । पर सही ज्ञान के अभाव में । सही शब्दों का चयन न होने से । तमाम भ्रांतियों को पैदा कर देती है । और इसीलिये ( नकली गुरुओं की ) ये भेङ चाल पैदा हो जाती है । परमात्मा का मतलब ही है - अंतिम सत्य । यानी उसके आगे ( पूर्व ) कुछ रहा ही नहीं । क्योंकि कुछ था ही नहीं । आदि सृष्टि से भी पहले की आत्मा या सार तत्व की मूल स्थिति । आज सृष्टि होने के बाद  ( सिर्फ़ समझाने हेतु )  स्थिति शब्द का प्रयोग करना पङता है । वरना  वह कोई स्थिति नहीं है 

। क्योंकि स्थिति में बना बिगङी होती है । जबकि वह तो - है । है । और " है " कोई स्थिति नहीं कही जायेगी । क्योंकि वो जो है । वो अपरिवर्तनीय है । तब इस शाश्वत " है " को जानने वाले को ( शरीरधारी ) सदगुरु कहा जाता है । ये ( समय का ) सदगुरु सिर्फ़ 1 होता है । ध्यान रहे । इसमें और परमात्मा में कोई भेद नहीं होता । इसलिये 2 या अधिक सदगुरु होने पर फ़िर परमात्मा भी 2 या अधिक हो जायेंगे । अंतर ज्ञान के खोजियों द्वारा अपने लिखित अनुभवों में भी इस बात को स्पष्ट किया गया है कि - कोई भी ( जीव ) आत्मा वहाँ तक पहुँच कर वही हो जाता है । भेद मिट जाता है । क्योंकि वहाँ द्वैत है ही नहीं । 2 का सवाल ही नहीं ।
इस बात को जीवन व्यवहार के सरल उदाहरण से समझें । किसी भी शिष्य को पढाते पढाते शिक्षक ( या गुरु  ) अपना पूरा ज्ञान दे देता है । और अन्त में जब ज्ञान समाप्त हो जाता है । तब दोनों के बीच भेद ( रहस्य ) मिट गया । सारे प्रश्न खत्म हो गये । अब कुछ बताने को न रहा । और अब कुछ पूछने को भी न रहा । गौर से समझें । दोनों समान हो गये । 1 ही हो गये । अब अगर पूर्व के गुरु से कोई कुछ प्रश्न करे । तो वह कह सकता है - उससे पूछ लो । मैं और वह 1 ही बात है । अतः सार शब्द या

निःअक्षर ज्ञान के ( सद ) गुरु के लिये ही ऐसा कहा जा सकता है । लेकिन आजकल की भेङ चाल में सभी सदगुरु बने बैठे हैं । पर इन शेर की खाल ओङे सियारों की कलई उसी समय खुल जाती है । जब ये हुआ हुआ की आवाज निकालते हैं । अर्थात उपदेश ( उपदेश शब्द भी इनके लिये कहना ठीक नहीं । क्योंकि उपदेश का मतलब ही उप देश की बात करना होता है )  देते हैं । क्योंकि ये बनाबटी उपदेश होते हैं । अतः इनके अनुयाईयों को सुख शांति कुछ नसीब नहीं होता । हाँ गीत संगीत ढोल मजीरा से कुछ मनोरंजन हो जाता है । जिससे मानसिक ? आनन्द महसूस होता है । सोचने वाली बात है कि - जब तमाम साधु परमात्म ज्ञान की बात करते हैं ।  तब इन बीच की द्वैत उपाधियों स्थितियों के जिक्र का भी क्या मतलब ? आप गौर करें । तो ज्यादातर इन्हीं की चमचागीरी कर रहे हैं । मेरे किसी भी भाव में कभी इनका समर्थन देखा है ? अतः कृपालु क्या कहते हैं । क्या नहीं कहते ? एकदम महत्वहीन है । क्योंकि श्रीकृष्ण आधारित उनकी भक्ति खुद श्रीकृष्ण से

ही मेल नहीं खाती । ध्यान रहे । श्रीकृष्ण योगेश्वर थे । और राम और श्रीकृष्ण दोनों नियमित योग करते थे । इनके आध्यात्म गुरु दुर्वासा ( श्रीकृष्ण ) और वशिष्ठ ( राम ) पूर्णतः योग और तपः शक्तियों के लिये प्रसिद्ध हैं ।
जिसका गुरू या परमात्मा में पूर्ण श्रद्धा भाव और प्रेम होता है । वही सर्वोच्च भक्ति है - आपको 1 बन्द गाङी दे दी जाये । जिसका गेट भी आप खोल न सको । उस कार का कोई किसी तरह का लाभ भी न हो । और आपसे कहा जाये - इससे आराम से सफ़र कर सकते हैं । ये मीलों का रास्ता कुछ ही समय में तय करा देती है । अतः इससे पूर्ण श्रद्धा और प्रेम भाव रखो । बोलो रख पाओगे ? एक हवाई जहाज आसमान में उङता हुआ आप देखते हो । लाखों करोङों लोग देखते हैं । लेकिन वैश्विक % आधार पर बैठते सिर्फ़ हजारों ही हैं । आपको मालूम भी है । इसमें ( समर्थ धनी ) इंसान ही बैठे होंगे । आप भी कभी बैठ सको । ये ( खोखली ) इच्छा भी होती होगी । पर साथ ही आपको अपनी स्थिति ? भी पता है । अब सोचिये । आप जानते हैं 

कि - वायुयान अन्य वाहनों के तुलनात्मक श्रेष्ठ वाहन है । महँगा और उच्च स्थिति वाला है । अतः कोई कहे - इस साइकिल और बाइक का झंझट छोङो । वायुयान से प्रेम करो । बोलो कर पाओगे ? मतलब । पूर्ण श्रद्धा और प्रेम भाव । ज्ञान और भक्ति ( जुङाव ) से प्राप्त हुयी स्थिति । और आंतरिक परिवर्तन से स्वतः ही हो जाता है । बाकी अज्ञान या अंध भक्ति में ( सिर्फ़ मानने से ) वह नकली और बनाबटी प्रेम ही होगा । जो कभी भी टूट जायेगा । हाँ खुद के अज्ञान के बा्बजूद । हम पूर्व ( ज्ञानियों के )  सिद्ध अनुभव से उस " एकमात्र मनुष्य जीवन के लक्ष्य " से उसी प्रकार पूर्ण श्रद्धा भाव और प्रेम रख सकते हैं । जैसे - पढाई । व्यापार । कलाओं आदि से शुरूआत में रखते हैं । जबकि तब हमें पता नहीं होता कि - हम सफ़ल होंगे भी या नहीं । लेकिन इन बङे लक्ष्यों 

से ( जुङने से ) फ़ायदा ये होता है कि - हम अपनी सामर्थ्य अनुसार जो भी ( ज्ञान ) स्तर % प्राप्त कर लेते हैं । वह निरे अज्ञान और मूढता की तुलना में बहुत श्रेष्ठ ही होता है ।
ज्ञान मार्ग से भगवत्त प्राप्ति नहीं हो सकती - फ़िर कृपालु ! जो आप प्रवचन करते हो । वह क्या है ? उसकी फ़िर आवश्यकता ही क्या है ? आपको जो जगदगुरु की उपाधि दी है । वह क्या मजीरे बजाने के लिये मिली है ? या राधे राधे करने के लिये मिली । ये अनेक चेले चेली वर्षों से राधे राधे कर रहे हैं । इनको भी  दिलवा दो ।आपके अनुसार श्रीकृष्ण ही सर्वोच्च हैं । ( ज्ञान के बिना ) ये क्या सपना आया था ? और सपना भी आया । तो वो भी ज्ञान रूप ही हो गया । आपकी इंटरनेट पर साइट है । TV पर चैनल हैं । किताबें हैं । आडियो वीडियो हैं । बिना ज्ञान के इंसान कैसे इसको समझेगा । कैसे उपयोग करेगा ? उदाहरण के लिये कोई भी अहिन्दी भाषी आपको ( प्रवचन करते । गाते ) देखकर सिर्फ़ यही  सोचेगा - गेरुआ वस्त्र पहने ये ओल्ड मैन पता नहीं क्या एंजाय सा कर रहा है । क्यों ? क्योंकि उसे ज्ञान नहीं । आप क्या बोल रहे हो ? उसका अर्थ भाव विषय आदि क्या है । क्योंकि वह आपकी बोली नहीं समझता ।
जो ध्यान में समाधि का सुख मिलता है । वो भी मायिक है । परमानन्द तो भगवत प्राप्ति से मिलता है - जिसने ध्यान की ABCD भी न जानी हो । वह बेचारा इसके अलावा कह भी क्या सकता है ? फ़िर भगवान ध्यान स्थिति के बिना मिलेगा भी कैसे । मान लो कोई राम लीला छाप भगवान । उसी तरह की वेशभूषा में अचानक मनुष्य रूप प्रकट होकर कहे - 

मैं भगवान हूँ । मान लोगे ? बेचारे भगवान को खुद को भगवान सिद्ध करने में पसीना आ जायेगा । आप बोलोगे - जाओ भाई ! जाकर रामलीला में एक्टिंग करो । हम ही पागल बनाने को रह गये थे । फ़िर ये भगवत प्राप्ति क्या है ? और किस तरह से होगी ?
इच्छा काया इच्छा माया इच्छा जगत बनाया । इच्छा पार जो विचरत उनका पार न पाया । ध्यान रहे । ये सृष्टि माया परदे पर निर्मित है । गोलोक भी माया में है । श्रीकृष्ण का साकार रूप भी निर्मित ही है । भगवान भी माया के दायरे में ( योग ) माया का पुतला भर है । असली और निर्माण रहित सिर्फ़ सार तत्व या आत्मा ही है । अतः श्रीकृष्ण को देख जान भी लिया । तो ( एक दृष्टि से ) वह भी माया है । और निर्विकल्प समाधि में माया है ही नहीं । कोई राम श्रीकृष्ण भी नहीं । वहाँ चेतन और उसकी चेतना से होता खेल है । फ़िर चाहे । उसमें कोई श्रीकृष्ण राम बना खेल रहा हो । या फ़िर रावण या कंस । अतः  ध्यान = ध्या - न । भागना बन्द । ठहराव । खुद में ठहर जाना । और खुद में ठहरने का मतलब । आत्मा में स्थित हो जाना । फ़िर हमें क्या आवश्यकता । किसी श्रीकृष्ण की तरफ़ भागें । भागें मतलब ध्या । दौङना । 
और भगवत प्राप्ति भगवान से प्रेम करने होती है । न कि ज्ञान मार्ग से - मेरी तो आज तक यही समझ में नहीं आया कि - भगवान आखिर ( आप लोग ) कहते किससे हो ? द्वैत या अद्वैत के हँस ज्ञान ( पूर्ण कर चुके ) स्तर 


वाले ही अपनी योग्यता अनुसार भगवान बनते हैं । भगवान के समतुल्य होते हैं । बहुत से इस पोस्ट को नहीं भी लेते । और दूसरे अन्य विकल्पों में से चुनते हैं । तो जब वो खुद ही ये क ख ग घ पढकर भगवान बने । ( आपके इन ) भगवान को प्राप्त हुये ? तो आप केवल ( झूठा ) प्रेम करने से कैसे प्राप्त हो जाओगे ? सोनिया मनमोहन सिंह से खूब प्रेम करो । रोज उनकी फ़ोटो को धूपबत्ती प्रसाद आदि दो । देखें । तुम प्रधानमंत्री बन जाओ । चलो गैस सिलेंडर ही सस्ता ( पूर्व कीमत में ) करा लो । डीजल आदि के दाम कम करा लो । भइय़ा ! आजकल भगवान बाजी में भी बङे बङे घोटाले हो रहे हैं ।
ज्ञान मार्ग से माया नि्वृति भी नहीं हो सकती - इसका इसी ब्लाग पर एक जीता जागता प्रत्यक्ष प्रमाण देता हूँ । मेरे द्वारा बताने पर " अनुराग सागर " पढकर कल्लू पठान और अष्टांगी

माया भाभी की मायावी पोल कितनों के ही सामने खुल गयी । अभी तक आप लोग इन्हें क्या क्या नहीं जानते थे ? अब ये 2 मियाँ बीबी और इनके 3 बच्चे । इनकी असलियत खुल गयी कि नहीं ? तो ये माया निवृति कैसे हुयी ? सिर्फ़ ज्ञान से ना ? जब एक किताब के शब्दों से ही माया की माया का सच सामने आ गया । तो फ़िर ज्ञान के प्रयोगात्मक पहलू कितने विचित्र विलक्षण अनुपम अवर्णनीय होंगे । इसकी कल्पना मुश्किल है । ये सिर्फ़ ज्ञान युक्त व्यवहार से ही जाना जा सकता है । अनुभूत किया जा सकता है ।

22 सितंबर 2012

ये बात कुछ हजम नहीं हुई


राजीव जी ! जहाँ तक मुझे याद है । आपने एक लेख में मेरे बारे में लिखा था कि - आपकी तो दीक्षा हुई ही नहीं । और आपने ये भी लिखा था कि - आप तो शिष्य हो ही नहीं । शायद आपको याद आ गया होगा । और आप बार बार मुझे अपने मंडल का भी बताते हो - अपने लेखों में । हालांकि मैंने दीक्षा आपसे नहीं । आपके गुरूदेव से ली थी । फिर आप किस आधार पर ? ये कहते हो कि - मैं शिष्य हूँ । नही । या मेरी दीक्षा नहीं हुई । और अगर कहते हो । तो महाराज ! मुझे तो फिर कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं । क्योंकि आपने ही बहुत कुछ कह दिया । अगर मेरी बात आपको बुरी लगे । तो प्लीज माफ कर देना जी ।
राजीव जी ! कुछ महापुरूषों की वाणियाँ बागड़ी में पे्श हैं -
1 फकीरी के जोवै घर दूर । जीवत मरणो पड़ै जरूर । 
यानी फकीरी का घर दूर है । क्या देखता है । जिंदा मरना पङता है । और तू तो बन कर बैठा है । मैं हूँ । जहाँ 

पर मैं है । वहाँ पर तू नही है । मैं यानी अहंकार । तू यानी परमात्मा । एक म्यान में दो तलवारें नही आ सकती । 
2 दमङा गो लोभी । बाता सूं राजी कोनी होवै । 
यानी जिसको कुछ रूपयों की जरूरत है । वो बातों से कैसै खुश हो जाये ? उसके तो कोई पाँच दस जेब में डाले । तब संतुष्ट हो ।
3 कोई विधार्थी दसवीं क्लास में दाखिला लेने के लिये किसी स्कूल में गया । तो गुरूजी ने उसे क्लास में
बैठाया । और सलेट पर ( क ) लिख कर दिया । लो कर लो बात । ये भी कोई बात हुई । वो मैट्रिक का विधार्थी है । और उसको ( क ) सिखाया जा रहा है । हा हा हा । ई बात कुछ हजम नहीं हुई । फिर उसी विधार्थी को

कहा जाता है कि - तुम ( क ) सीखने के लायक नहीं हो । माशा अल्लाह ! ये तो हद हो गयी ।
राजीव जी ! आप किसी अशोक भाई से मेरी तुलना कर रहे हैं । क्योंकि वो शायद मुझसे ज्यादा पढा लिखा है । और शब्दों को माला मे पिरोकर लिखना उसे बखुबी आता है । और वो मुझे आता नहीं है । आप किसी एक सवाल के जवाब से तो मुझे संतुष्ट कीजिये । मेरी - इच्छा । अभिलाषा । कामना । चाहत क्या है ? आपके ब्लाग पर लिखी हुई बातें ही । हरे मालिक तेरी शरण । सोहन गोधरा । टिब्बी । हनुमान गढ । राजस्थान ।
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जैसा कि एक आम मानवीय स्वभाव होता है । या बैज्ञानिक दृष्टिकोण से कहें । तो उसके सोचने विचारने की क्षमता सीमित होती है । तब वह प्रत्येक चीज व्यक्ति व्यक्तित्व का आंकलन अपने अनुसार ही करता है । इसलिये मुझे ( ऐसा पता होने से )

कुछ भी अस्वाभाविक नहीं लगता । ऐसे में जो लोग (  और शिष्य ) हमसे सूचना सम्पर्क के स्तर पर निरंतर जुङे होते हैं । उन्हें इस तरह की कोई परेशानी महसूस नहीं होती । क्योंकि एक तरह से वो UPDATE होते रहते हैं । और उन्हें पता होता है । ऐसा  है । तो क्यों ? वैसा है । तो क्यों ? लेकिन परिस्थितियों वश जो लोग इस धारा से अलग हो जाते हैं । उनमें तरह तरह की आशंकाओं अङचनों का जन्म हो जाना स्वाभाविक है । इसी के एक और पहलू में । जिनकी सोच विकसित है । और दुनियावी अनुभवों से परिपक्व है । वे धीर गम्भीर व्यक्तियों की तरह पिछले व्यवहार के आधार पर निर्णय कर लेते हैं कि - कुछ खास नहीं । सामयिक व्यस्तता से व्यवस्था सामान्य से भी गङबङा ही जाती है ।
कुछ कुछ ऐसा ही है । उपरोक्त के अनुसार ही 12 july 2012 से मेरी व्यस्तता हद से ज्यादा ही हो गयी है ।

जो हमारे सहयोगी शिष्य और निरंतर सम्पर्क में रहे शिष्यों को पता है । इसलिये ब्लाग पर प्रश्नों के उत्तर या लेखों का भी सही कृम में प्रकाशन नहीं हो पा रहा । इसके भी अतिरिक्त मैं कह चुका हूँ । बल्कि सिद्ध कर चुका हूँ कि - 1 सतनाम ( अद्वैत ) और कुण्डलिनी  ( द्वैत ) के अलावा सभी भक्ति " भाव पूजा " मात्र ही है । इसका बहुत थोङा सा ही लाभ होता है । सर्वोच्च भक्ति अद्वैत ज्ञान की नाम भक्ति ही है । 2 कबीर की वाणी से कोई भी वाणी ऊपर जाना तो दूर । उसकी टक्कर भी नहीं ले सकती । कबीर वाणी के बाद सभी संतों की वाणियां ऐसी हैं । जैसे चाय बनाने के बाद । छन्नी में बचे हुये चाय पत्ती अदरक का  पुनः इस्तेमाल करते हुये चाय बनायी जाये । और उसमें हल्का फ़ुल्का रंग स्वाद आ जाये । 

एकदम धोबन । इससे अधिक कोई वाणी दमदार हो । तो मुझे बतायें । और ध्यान रहे । ये धोबन भी कबीर के बचे खाली निष्प्रयोज्य पात्र के धोने से ही आया है । वरना उस मूल के बिना " इतना " भी रंग रस न आता । 3 जब तक कबीर वाणी " अनुराग सागर " नहीं पढोगे । तब तक असलियत कभी पता नहीं चलेगी । 4 सबसे मुख्य बात । इतनी सभी जानकारी समझ में बैठ जाने के बाद भी । जब तक समय के सदगुरु की शरण नहीं मिल जाती । तब तक कोई ( खास ) फ़ायदा नहीं हुआ । 5 इसके बाद शिष्यता का निर्माण ..सार सार को गहि रहे । थोथा देय उङाय । आरम्भ हो जाता है । यह एक लम्बी प्रक्रिया है । जो शिष्य की पात्रता के अनुसार कुछ जन्म तक चलती है ।
मेरे प्रचार का मुख्य उद्देश्य इन्हीं बिन्दुओं को बिलकुल 100% तक किसी भी जिज्ञासु को समझाना भर है । जो लगभग पूरा हो चुका है ।

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आपकी तो दीक्षा हुई ही नहीं - दीक्षा का मतलब देखना दिखाना या अंतर में प्रविष्ट होना है । दीक्षा के लिये वास्तव में सिद्ध स्थान की बहुत बङी आवश्यकता होती है । किसी भी घर आदि

स्थान में की गयी दीक्षा में ( किसी किसी ) दीक्षित होने वाले व्यक्ति को स्थानीय वासना तरंगे प्रभावित करती हैं । क्योंकि अभी उसके अन्दर भी यही सब होता है । अतः वे अतिरिक्त तरंगे और उससे जुङ जाती हैं । किसी भी सन्त की तपःस्थली पर सात्विक तरंगों का जोर होता है । अतः वासना तरंगे नष्ट हो जाती हैं । अतः ऐसे  स्थान पर पूर्ण दीक्षा होती है । आज से 8 महीने पहले तक हमारे पास ऐसी व्यवस्था नहीं थी । अतः मैं पहले ही स्पष्ट कह देता था कि - आप ( अगर पूर्ण दीक्षा न हो पाये तो ) नामदान 

लेकर घर पर अभ्यास करें । और अभ्यास में निपुण हो जायें । बाद में आश्रम शुरू होते ही कोई 7-8 दिन का समय निकाल कर आना । तब ध्यान में प्रविष्ट करा दी जायेगी । और इसमें पूर्व में किये सुमरन से बहुत लाभ होगा । प्रभु कृपा से आज ऐसा हो  रहा है । इसीलिये मैंने लिखा था कि - आपकी तो ( सही से ) दीक्षा हुई ही नहीं ।
और आपने ये भी लिखा था कि आप तो शिष्य हो ही नहीं । और आप बार बार मुझे अपने मंडल का भी बताते हो - शिष्यता का मतलब ? सिर्फ़ स्कूल में नाम लिखाना भर नहीं होता । स्कूल भी जाना होता है । पाठय पुस्तकें ( आध्यात्म चिंतन मनन अध्ययन ) पढना भी होता है । स्कूल की फ़ीस भी भरनी होती है । जिसको यहाँ तन मन धन से गुरु की सेवा करना कहा गया है । समर्पण की शिक्षा दी गयी है । हमारे तमाम शिष्य दूर दूर से आते हैं । कई बार आ चुके हैं । आप कितनी बार आये ? आपने शिष्यता के स्तर पर क्या किया ? सन्त 

मत में कभी - शिष्य कैसा होता है ? अध्ययन करें । धर्मदास ने कबीर के लिये सब कुछ लुटा दिया । और अन्त में सिर्फ़ 1 सुराही और हाथ का पंखा लिये उनके सामने पहुँचे । कबीर  ने कहा - आईये आधे शिष्य ।  धर्मदास ने हैरानी से पूछा - अभी भी आधा कैसे ?  कबीर बोले - अभी भी तेरा मन इस सुराही पंखे में अटका हुआ है । सच्चे शिष्यों की कहानी पढोगे । तो थर थर कांप जाओगे । क्योंकि यदि वही ज्ञान । वही गुरु । वही प्राप्ति चाहते हो । तो शिष्य भी वही बनना होगा ।
जहाँ तक मंडल का बताने का सवाल है । ऐसा हमारे यहाँ से नामदान होने के कारण हैं । ये कोई दुनियांदारी वाली बातें नहीं हैं कि - ये नहीं । तो वो

सही । सत्ता के नियम अनुसार सच्चा नाम अपना काम करता है । यदि उपदेशी शिष्य इस जन्म में नहीं पढ पाता । तो अगले जन्म उसे यह पढाई पूरी करनी होगी । क्योंकि इस ज्ञान की शुरूआत हमारे यहाँ से हुयी । पंजीकरण हमारे यहाँ है । इसलिये राजी से कु राजी से मंडल के नियम अनुसार चलना होगा । मंडल केवल तभी बदल सकता है । जब नियम अनुसार इससे बङे मंडल में पंजीकरण हो जाये । और मुझे अच्छी तरह मालूम है । इस समय हमारे मंडल से बङा मंडल पूरे विश्व में कोई नहीं है । अतः अगले जन्म में भी अभी के अधूरे साधक हमारे ही साधुओं द्वारा आगे बढाये जायेंगे । इसलिये मैं कहता हूँ - हमारे मंदल के शिष्य ।
हालांकि मैंने दीक्षा आपसे नहीं । आपके गुरूदेव से ली थी - मैं जहाँ भी ऐसा लिखता हूँ । कुछ इस तरह से लिखता हूँ - हमारे ( मंडल के ) शिष्य...अतः इससे कहीं साबित नहीं होता कि - मैं आप लोगों को अपना शिष्य कहता हूँ । फ़िर भी अपने आपसे पूछो - इस अदभुत ज्ञान तक तुम्हें कौन लाया ? तुम्हारी जिज्ञासा सन्तुष्टि किससे हुयी ? सदगुरु से तुम्हें किसने मिलाया । अब भी तुम मार्गदर्शन किससे पाते हो ? क्या तुम मुझे कोई फ़ीस देते हो ? या मैं तुम्हारा कर्जदार हूँ ? या तुम मुझे कुछ देकर भूल गये हो  ? या तुम्हारा कोई अहसान है मुझ पर ? कभी तुमने सोचा कि - यदि श्री महाराज जी तुम्हारे गुरु हैं । फ़िर शुरू से लेकर अब तक तुम मेरे पास क्या कर रहे हो ? यहाँ लेख पढते । बात समझ में आयी । तो महाराज जी से मिलते । याद है । मुझसे कितनी लम्बी टयूशन पढ चुके हो तुम लोग । पढ रहे हो । कभी सोचा । मुझसे तुम्हारा क्या लेना देना है ? किस आधार पर तुम मुझसे सबाल जबाब करते हो ? किस आधार पर प्रश्न पूछने का हक रखते हो ? अपने गिरहबान में झांक कर देखो ।
फिर आप किस आधार पर ? ये कहते हो कि - मैं शिष्य हूँ । नही । या मेरी दीक्षा नहीं हुई - मुझे उम्मीद है । अब हर बात का उत्तर मिल गया होगा । 


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क्यों हैं - गणेश चतुर्थी का चन्द्रमा दोषी ?
वैसे कहानी बहुत बङी और उलझी हुयी भी है । पर  इसका मुख्य कारण जानते हैं । द्वापर युग में सत्रजित

नाम के राजा के पास एक मणि थी । इससे दिन जैसा प्रकाश होता था । किसी अवसर पर श्रीकृष्ण ने उससे ये मणि माँगी । लेकिन राजा ने मना कर दिया । बाद में राजा का भाई मणि लेकर शिकार खेलने गया । जहाँ शेर ने उसे खा लिया । क्योंकि श्रीकृष्ण ने मणि माँगी थी । अतः राजा ने अपनी औरत को बात बतायी कि - श्रीकृष्ण ने मणि के लिये उसके भाई को मार डाला । औरत से औरतों आदि में बात फ़ैलती हुयी श्रीकृष्ण तक पहुँची । इसलिये उन्होंने सोचा - ये तो उन पर कलंक लग गया । ये कलंक इसी गणेश ( तीज ) चतुर्थी के समय लगा था । और क्योंकि श्रीकृष्ण चन्द्रवंशी भी थे 

। इसलिये धर्म परम्परा आदि अनुसार इस तिथि के चन्द्रमा को दोष पूर्ण मान लिया गया । क्योंकि ये घटनाकृम रात का था । बीच में अन्य घटनाकृमों के बाद ये मणि जाम्बवान ( त्रेता युग वाले ) के हाथ लग गयी । श्रीकृष्ण अपना कलंक छुङाने हेतु इसकी खोजबीन करते हुये जाम्बवान के पास पहुँचे । जहाँ जाम्बवान से  28 दिन उनका घनघोर युद्ध हुआ । और बाद में जाम्बवान ने उनको मणि सौंप दी । तथा जाम्बवान की पुत्री जाम्बवंती से श्रीकृष्ण का विवाह हुआ । फ़िर ये मणि श्रीकृष्ण ने लाकर राजा सत्रजित को दे दी । और कलंक छुङाया । इस मणि की आधुनिक अस्पष्ट खोजों में इसे अभी का विश्व प्रसिद्ध " कोहिनूर " हीरा भी माना जाता  है । जो कभी भारत के पास था । और आज ब्रिटेन के पास है । इस मणि की खासियत 

( द्वापर से अब तक ) ये रही कि - जिसके पास ये रही । उसका सुख चैन इसने छीन लिया । कोहिनूर की भी यही कहानी है । इसलिये और भी शोधकर्ता विश्वास करते हैं । 
श्रीकृष्ण चन्दवंशी थे । उनके चित्र में पूर्ण चन्द्रमा उनके पूर्ण होने का प्रतीक है । शंकर के भाल पर अर्ध चन्द्र आधा ( योगत्व ) होने का प्रतीक है ।

21 सितंबर 2012

बाबा जय गुरुदेव - असली परिचय


संजय ने मुझसे फ़ोन पर कहा - बनारस में जय गुरुदेव बाबा का बहुत प्रभाव है । क्योंकि पहले यहाँ बाबा जय गुरुदेव ने एक विशाल यज्ञ कराया था ।  लेकिन महाराज जी ! यहाँ बाबा जय गुरुदेव के बारे में अज्ञानतावश बहुत सी भ्रामक बातों का भी प्रचलन है । खासतौर से उनके जीवन परिचय के बारे में । इसलिये मेरा आपसे आग्रह है कि - सत्य क्या है ? बताने की कृपा करें ।
संजय ने ही मुझे नेट से बाबा जय गुरुदेव की साइट का लिंक वगैरह भेजा । और लेख की कापी भी । जो आप पहले पढ चुके हैं । अब आईये । बाबा जय गुरुदेव के जीवन परिचय के बारे में बात करते हैं ।
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बाबा जय गुरुदेव का एक छोटे से गाँव कुबेरपुरा ( भांवत पुल के पास ) जिला मैनपुरी में जन्म हुआ । इनके पिता साधारण किसान थे । इनके पिता का ( इनकी ) छोटी आयु में ही निधन  हो गया । तब इनकी माँ  ग्राम खतौरा ( भरथना के पास ) जिला इटावा चली गयी । और इनकी माँ ने दूसरी शादी कर ली । ये पहले बाप से अकेले ही पुत्र हुये । दूसरे बाप से कई ( पुत्र ) संतानें हुयीं । उसी खतौरा गाँव में भी इनका मथुरा की तरह भव्य आश्रम बना है ।
मुझे नहीं पता । बाबा जय गुरुदेव के जीवन के बारे में लोग क्या जानते हैं । और उनके प्रचारक उनके जीवन के बारे में क्या बताते हैं । पर जिस क्षेत्र ( स्थान ) के बाबा जय गुरुदेव हैं ( अब थे ) । वहाँ के निवासियों से ही हमारा 

व्यक्तिगत परिचय है । और क्षेत्र भी घूमा जाना पहचाना है । अतः उन्हीं लोगों के अनुसार - बाबा जय गुरुदेव घर की निर्धनता की वजह से काम की तलाश में गाजियाबाद आये । और फ़िर
गाजियाबाद की 1 फ़ैक्टरी में काम करने लगे । फ़ैक्टरी का निसंतान सेठ उन्हें अपना लङका मानने लगा था । फ़िर एक दिन बाबा जय गुरुदेव उसका एक झोला भरकर रुपया लेकर भाग आये । लेकिन भागने से पहले ही स्टेशन पर पकङ लिये गये । क्योंकि सेठ उन्हें अपना लङका मानता था । सो उसने बाबा को क्षमा कर दिया । यह सोचकर - लङकों से गलती हो ही जाती है । उसी सेठ के यहाँ दूसरा लङका काम करता था । इसी लङके का भाई राधास्वामी मत से दीक्षा प्राप्त था । उसी से बातचीत से प्रभावित होकर जय गुरुदेव उसके भाई के पास पहुँचें । और फ़िर उसके भाई से " राधास्वामी " मत की दीक्षा ली । और बाद में जैसा कि अक्सर ( सही ज्ञान न पाये ) संत करते हैं । और राधास्वामी में तो ये खास प्रथा है । उस मत ( ज्ञान ) में अपनी मिलावट कर दी ।
दोबारा उसी सेठ से काफ़ी रुपया लेकर ये 3 लोग मथुरा आ गये । एक वृद्धा । एक आदमी । बाबा । मथुरा में इन लोगों ने कई बार झोंपङी रखी । जिसे लोगों ने फ़ेंक दिया । लेकिन फ़िर धीरे धीरे स्थापित हो गये । फ़िर आश्रम बनाया । बाद में सरकारी जमीन पर कब्जा भी किया । इन्होंने एक बार सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी खङे कर

चुनाव भी लङे । जिसमें हरेक प्रत्याशी की जमानत तक जब्त हो गयी । इन्होंने शादी नहीं की । ये कहना एकदम गलत होगा । इनकी शादी हुयी ही नहीं । ये कहना अधिक उचित है ।
- इसके बाद की बातें लगभग हरेक को पता ही हैं ।
विशेष - ये प्रमाणिक जानकारी है । जिसको इस जानकारी पर संशय हो । वह ऊपर लिखे स्थानों पर जाकर पता कर सकता है । ध्यान दें । ऐसी जानकारी जन्म भूमि वाले लोगों से बेहतर कोई नहीं बता सकता । और वहाँ आवश्यक नहीं कि - सभी लोग " उन्हें " सन्त मानते हों । वो आपको " वे बातें " बङी रुचि से बताते हैं । जिनका आमतौर पर ( दुनियां के ) लोगों को दूर दूर तक पता नहीं होता ।
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बहुत समय पहले की बात है  । एक बड़ा सा तालाब था । उसमें सैकड़ों मेंढक रहते थे । तालाब में कोई राजा नहीं था । सच मानों । तो सभी राजा थे । दिन पर दिन अनुशासन हीनता बढ़ती जाती

थी । और स्थिति को नियंत्रण में करने वाला कोई नहीं था । उसे ठीक करने का कोई यंत्र तंत्र मंत्र दिखाई नहीं देता था । नई पीढ़ी उत्तरदायित्व हीन थी । जो थोड़े बहुत होशियार मेंढक निकलते थे । वे पढ़ लिखकर अपना तालाब सुधारने की बजाय दूसरे तालाबों में चैन से जा बसते थे ।
हार कर कुछ बूढ़े मेंढकों ने घनी तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर लिया । और उनसे आग्रह किया कि - तालाब के लिये कोई राजा भेज दें । जिससे उनके तालाब में सुख चैन स्थापित हो सके । शिव जी ने प्रसन्न होकर " नंदी " को उनकी देखभाल के लिये भेज दिया । नंदी तालाब के किनारे इधर उधर घूमता । पहरेदारी करता । लेकिन न वह उनकी भाषा समझता था । न उनकी 

आवश्यकतायें । अलबत्ता उसके खुर से कुचलकर अक्सर कोई न कोई मेंढक मर जाता । समस्या दूर होने की बजाय । और बढ़ गई थी । पहले तो केवल झगड़े झंझट होते थे । लेकिन अब तो मौतें भी होने लगीं ।
फिर से कुछ बूढ़े मेंढकों ने तपस्या से शिव को प्रसन्न किया । और राजा को बदल देने की प्रार्थना की । शिव जी ने उनकी बात का सम्मान करते हुए नंदी को वापस बुला लिया । और अपने गले के सर्प को राजा बनाकर भेज दिया । फिर क्या था । वह पहरेदारी करते समय एक दो मेंढक चट कर जाता । मेंढक उसके भोजन जो थे । मेंढक बुरी तरह से परेशानी में घिर गए थे ।
फिर से मेंढकों ने घबराकर अपनी तपस्या से भोले शंकर को प्रसन्न किया । शिव भी थे तो भोले बाबा ही । सो जल्दी से प्रकट हो गए । मेंढकों ने कहा - आपका भेजा हुआ कोई भी राजा हमारे तालाब में व्यवस्था नहीं बना पाया । समझ में नहीं आता कि - हमारे कष्ट कैसे दूर होंगे ? कोई यंत्र या मंत्र काम नहीं करता । आप ही बतायें । हम 

क्या करें ?
इस बार शिव जी जरा गंभीर हो गये । थोड़ा रुक कर बोले - यंत्र मंत्र छोड़ो । और स्व तंत्र स्थापित करो । मैं तुम्हें यही शिक्षा देना चाहता था । तुम्हें क्या चाहिये ? और तुम्हारे लिये क्या उपयोगी है ? वह केवल तुम्हीं अच्छी तरह समझ सकते हो । किसी भी तंत्र में बाहर से भेजा गया । कोई भी विदेशी शासन । या नियम । चाहे वह कितना ही अच्छा क्यों न हो । तुम्हारे लिये अच्छा नहीं हो सकता । इसलिये अपना स्वाभिमान जागृत करो । संगठित बनो । अपना तंत्र बनाओ । और उसे लागू करो । अपनी आवश्यकतायें समझो । गलतियों से सीखो । माँगने से सब कुछ प्राप्त नहीं होता । अपने परिश्रम का मूल्य समझो । और समझदारी से अपना तंत्र विकसित करो । मालूम नहीं । फिर से उस तालाब में शांति स्थापित हो सकी या नहीं । लेकिन इस कथा से भारत वासी भी बहुत कुछ सीख सकते हैं ।
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- हम कांग्रेस को इसलिये समर्थन देंगें कि - हिन्दुओं की भी हमदर्द भाजपा सत्ता में न आ जाये । हम दूसरे धर्मों को बचाने के लिये इस देश और हिन्दुओं की बलि दे देगें ।

पिछले कई दिनों से सारी पार्टियां जो कांग्रेस को समर्थन कर रही हैं । वो लगातार एक ही बात कह रहीं हैं कि - कांग्रेस बेईमान है । कांग्रेस भृष्ट है । पर हम कांग्रेस को इसलिये समर्थन देते रहेंगें । क्योंकि भाजपा सांप्रदायिक है । और वो कहीं सत्ता में न आ जाये ।
इसका साफ साफ मतलब ये निकलता है कि - भले ही देश लूट लिया जाये । बर्बाद हो जाये । गुलाम हो जाये । पर हम कांग्रेस को देश को लूटते रहने देंगें । इस डर से कि - कहीं भाजपा जो हिन्दु हितों की भी रक्षक है । वो कहीं सत्ता में न आ जाये । यानी कि भले ही हिन्दु पुन: गुलाम हो जायें । लूट जायें । पर हम दूसरे धर्मों के लोगों को बचाने के लिये हिन्दुओं को बर्बाद कर देगें । हिन्दुस्तान की धरती जिस पर हिन्दुओं का पहला हक होना चाहिये । उनकी

कुर्बानी दे देगें । पर भाजपा को सत्ता में नहीं आने देंगें ।
और हिन्दुओं की दुश्मन और भृष्ट सरकार को समर्थन देते रहेंगें । पर अब हिन्दु जाग चुका है । वो अब भले ही भाजपा सत्ता में न आने दी जाये । हिन्दुओं के दुश्मनों को सबक सिखा के रहेगा । देश से बाहर जाने का रास्ता दिखा कर रहेगा । जय हिन्द ।
http://www.facebook.com/photo.php?fbid=268612389924641&set=a.255618307890716.56717.255606557891891&type=1&theater
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The things that happen to us are trying to have a conversation, to make us stop or turn around .The things that matter are waiting ..for us to drop down after the first conversation has relaxed our will Then they will shine their light without warning like a doctor into the back of our eyes and ask - How long have you avoided rest ? If we answer truthfully, they will introduce us to beauty who after a time will make us cry and throw our judgments into the sea  - Mark Nepo

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जय श्री गुरुदेव महाराज की ! कृपया जैन धर्मं के ऊपर ( बारे में भी ) कुछ प्रकाश डालें । कुछ लोग हमारे यहाँ जैन धर्मं वाले हैं । उन लोगों को समझाने ( शास्त्रार्थ ) हेतु कुछ मूल बातों को जानना जरुरी है । इसकी उत्पत्ति - कब । कहाँ । कैसे हुई ? हिन्दू धर्मं से इसका क्या सम्बन्ध है ? कृपया मार्गदर्शन करें । संजय केशरी । 

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भूल सुधार - बाद में जोङा गया । 
आदरणीय महाराज जी सादर चरण स्पर्श  ! मैंने जो जय गुरुदेव जी के जेल जाने के बारे में बताया था । वो समय उनके राजनैतिक भविष्यवाणी को लेकर था । आपातकाल के आसपास की ये बात है । ये गुरुदेव जी ( बाबा जय गुरुदेव ) राजनैतिक महत्वाकांक्षा के तहत सत्ता के बिपरीत राजनैतिक भविष्य वाणी करते थे । जिसके कारण इनको जेल जाना पड़ा था । ये खबर मैंने उनके मृत्यु के दुसरे दिन पेपर में पढ़ा था ।  
आपके पोस्ट में हमारी गलती की वजह से गलत छप गयी है । हम क्षमा चाहते हैं । अगर आपको उचित लगे । तो hilight किया हुआ पोस्ट हटाने की कृपा करें । संजय ।  

20 सितंबर 2012

तब फ़िर क्या पा सकते हैं हम ?


श्री सदगुरु महाराज की जय । सादर चरण स्पर्श महाराज । सभी प्रिय ब्लाग बंधुओं को मेरा नमस्कार । बहुत समय हुआ । ब्लॉग पर मेरी और से कुछ प्रेषित नहीं हुआ । बहुत बार मन में आया कि कुछ लिखूँ । पर हर बार यही सोच कर रह गया कि - अगर समंदर में 2 बूँद पानी डाल भी दें । तो क्या फर्क पड़ेगा । और देखा जाय । तो वो 2 बूँद भी उसी समुन्दर से मिली । या फिर दिन के उजाले में दीये के जलाने जैसा । और दीये की ज्योति भी उस प्रकाश पुंज सूर्य से प्रज्वलित हुई हो ।
सच्चा मार्ग और ज्ञान किसी व्यक्ति के जीवन में कितना प्रभाव डाल सकता है । इसकी कल्पना भी इस ज्ञान और मार्ग से वंचित लोग नहीं कर सकते । ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि - ऐसा मेरे साथ हो रहा है । एक साधारण से बहुत निम्न स्तर का व्यक्ति मैं जब इसका पूर्ण लाभ उठा रहा हूँ । तब बाकियों के लिए मैं इसे सुनहरा अवसर मानता हूँ । अपनी युवावस्था में नौकरी में अपने से उच्च पद व्यक्तियों से किस प्रकार बात करनी है । इस बात की भी जानकारी नहीं थी । और इसी वजह से उनसे बहुत 

जरूरी बात होने पर भी संपर्क नहीं करना । शायद आज भी आप लोगों में से किसी के साथ ऐसा होता हो । परन्तु इस मार्ग से जुड़ने के मात्र 4-5 महीनो में जो मेरे जीवन में परिवर्तन आये हैं । उन्हें मुझसे जुड़े लोग प्रत्यक्ष ही अनुभव भी करते हैं । और इसकी वजह भी पूछते हैं । परन्तु मेरे पास इस बात का कोई उत्तर नहीं है । सिवाय इसके कि - मैं एक सच्चे ज्ञान मार्ग से जुड़ा । पूछने पर पता चला कि - प्रकृति नियमों के आधार पर अपना कार्य कर रही है । और सगुरों के लिए कुछ ख़ास नियम होते हैं । परन्तु पालन उनका भी उतना ही आवश्यक है । और इसमें कोई छूट नहीं । 1 वह भी समय था । जब मैं परिस्थियों से डर कर 

भाग खड़ा हुआ था । और आज स्थिति ये है कि - किसी भी परिस्थिति के हरेक पहलु की वजह और जानकारियां स्वतः ही उपलब्ध हो जाती हैं । जो चीजे कभी बहुत प्रभावित करती थी । आज उनके लिए कोई स्थान नहीं है । कुछ चीजें जिनको पाने को लालायित रहते थे । आज बिना प्रयास के मिल रही हैं । तब भी कोई आश्चर्य नहीं । पहले अपनी बात को किस प्रकार प्रस्तुत करना है । नहीं जानता था ( प्रश्न कैसे करना है ) और आज गुरु कृपा से उत्तर भी मालूम है ।
जीवन का कोई भी ऐसा पहलू नहीं है । जो इससे अछूता हो । जैसे - बौद्धिक । आध्यात्मिक । भौतिक । आर्थिक । और सामाजिक । इन सब पर इसका प्रभाव साफ़ साफ़ दिख रहा है । आप में से बहुत से लोग किसी न

किसी परेशानी के हल के लिए भटकते होंगे । और यहाँ जुड़े होंगे । और मरता क्या न करता । वाली स्थिति में इसे मानने पर मजबूर होंगे । परन्तु यदि उसी सच्चे भाव से 4-5 माह भी जुड़े रहे । तो शायद स्थितियां और भी बेहतर बनें । और आपके सब दुखों का मूल कारण ही आपको समझ आ जाय । सत्य को केवल पाना । या जानना ही कठिन है । परन्तु यदि 1 बार उससे जुड़ाव हो जाय । तब सब कुछ शीशे की तरह साफ़ हो जाता है । कहीं किसी प्रकार का संदेह नहीं रहता । कोई प्रश्न बाकी नहीं रहता । आज धर्म अपने विकृत रूप में है । और इसमें आस्था रखने वाले को बिलकुल विपरीत दिशा में प्रशस्त करता है । जिसकी बहुत सी वजह हैं । और मैं उन पर कोई विचार नहीं रखूँगा । परन्तु इतना जरूर है कि - उस सत्य सनातनता का अंश आज भी बाकी है । और हमेशा रहेगा । जो इन भटके हुओं में से कुछ को चुनकर सही राह दिखाता है ।
यहाँ जुड़ने के पश्चात मैंने केवल अपने आपको जाना कि - मै कौन हूँ ? और इस स्व के परिचय के बाद से आगे का रास्ता बहुत सरल हो गया है । दुनिया पोथियों और ग्रंथों के पीछे पागल है । और इसके लिए खून खराबे तक से कोई गुरेज़ नहीं रखते । लेकिन खुद क्या हैं ? इसका कोई भान नहीं । मेरे कई मित्र रात रात भर बैठे अध्यात्म विषय पर नेट पर खोज करते रहते हैं ( कभी मैं भी उनमे से 1 था ) और यह नहीं जानते कि - जो बोझ प्रति रात्रि वह उपलब्ध

ज्ञान के रूप में अर्जित कर रहे हैं । कल यदि उसे अपने से दूर करना पड़े । तब कितना कष्ट होगा ? रह रह कर - विधियां । मुद्राएं । स्थितियां । और दुसरे के अनुभव खुद में खोजेंगे । और संभव है कि - उनके साथ ऐसा न हो । क्योंकि वे दूसरों की खोज अपने रूप में देखना चाहेंगे । और सब अपने अपने संस्कारों में बंधे हैं । तो अनुभवों की समानता की कोई बात ही नहीं ।
यदि सभी बाहरी भौतिक वस्तुओं को छोड़ कर । ये जानने की कोशिश करें कि - मुझमे मेरा भान करने वाला मैं कौन हूँ ? और मै कहने वाला साधन कौन है ? या तुममें तुम्हारी तू कौन है ? इसका ज्ञान होते ही सब कुछ जाना हुआ हो जायेगा । बाहर किसको क्या मिला ? मोती भी सीप में बंद सागर की तलहटी पर ही मिलते हैं । बाहर तो केवल - उछला नमकीन पानी मात्र । जो है । भीतर है । आवश्यकता है । तो कुशल गोताखोर की । और हम पैर भीगने के डर से ही किनारे पर ही खड़े रह जाते हैं । तब क्या पा सकते हैं हम ? आपका निकृष्ट अति निकृष्ट दास - अशोक दिल्ली ।

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राजीव जी ! गणेश चतुर्थी का क्या महत्व है ? कहते हैं । इस दिन चन्द्र दर्शन नहीं करना चाहिये । क्योंकि कलंक लगता है । भगवान श्रीकृष्ण को भी कलंक लगा था । इस बारे में कुछ बताईये । धन्यवाद । सोहन  गोधरा । टिब्बी । हनुमान गढ । राजस्थान ।
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विशेष - उपरोक्त दोनों पत्रों ( मेल ) के लेखक हमारे ( मंडल के ) शिष्य हैं । सोहन गोधरा (  राजस्थान ) 1 वर्ष से अधिक समय से जुङे हैं । और अशोक ( दिल्ली  ) को अभी सिर्फ़ 5 महीने ( लगभग ) हुये हैं । ये दोनों मेल मैंने ज्यों के त्यों प्रकाशित किये हैं । समर्पण । शिष्यता की पात्रता । श्रद्धा भाव । और ज्ञान को ग्रहण करना । शिष्य के - ये गुण उसमें क्या 

परिवर्तन करते हैं ? उसे क्या देते हैं ? कल ही प्राप्त  इन पत्रों से आसानी से समझा जा सकता है । इन दोनों 

पत्रों के भाव भाषा आदि आदि में कितना ( जमीन आसमान का ) अन्तर है ? कोई साधारण व्यक्ति भी आसानी से समझ सकता है ।
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A Speechless Message With Deep Feelings - Both Are Quiet But Have Hundreds Of Things Running In The Mind . Both Are Missing Each-other Badly But Want The
Other One To Initiate The Conversation. Both Want To Be With Each- other, To Fight, To Argue, To Show Love, But Would Pretend That They Are Fine Without Each-other. Both Want To Meet Each-other, But Will Not 

Say Anything And Wait Silently They Would Send Each-other Silly Msgs But Would Not Tell That - Stupid..I am Missing U .This Is Love...Sometimes We Miss Out On Most Lovable Moments
Just Because We Want The Other One To Take The First Step. Showing Love Might Improve The Situation But Showing Ego Definitely Ruins It ♥♥ By Piyuesh

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When we honestly ask ourselves which person in our lives means the most us, we often find that it is those who, instead of giving much advice, solutions, or cures, have chosen rather to share our pain and touch our wounds with a gentle and tender hand… The friend who can be silent with us in a moment of despair or confusion, who can stay with us in an hour of grief and bereavement, who can tolerate not knowing, not curing, not healing and face with us the reality of our powerlessness, that is a friend who cares - Henri Nouwen
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USB CELL AA USB Rechargeable Battery - Introducing a revolutionary new
rechargeable battery - the USB CELL by Moixa Energy. This NiMH AA cell can be used like a normal battery and can be recharged simply by plugging into a USB port. If you thought rechargeable batteries were a good green idea, the USB CELL rechargeable battery will blow your mind. It’s a pair of AA rechargeable Ni-MH batteries, but you don’t have to recharge them with cumbersome AC charger. Just a PC or only an

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क्यों दुनियाँ ने ये रस्म बनायी है । करके इतना बङा कहते हैं - जा बेटी ! तू परायी है ।
पहले दिन से ही उसको ये पाठ पढाया जाता है । सजा के लाल जोङे में दुल्हन बनाया जाता है ।

छुङा देती है बेटी से बाबुल का ये घर । क्यों दुनियां ने ये जालिम रस्म बनायी है ?
करके इतना बङा कहते हैं - जा बेटी ! तू परायी है ।
रोते हैं खुद फ़िर उसको भी बहुत रुलाते हैं । अपने हाथों से दरबाजे तक छोङ आते हैं ।
हर दिन याद करते हैं बहुत याद आते हैं । इस  रस्म ने क्यों बेटी से ही की बेवफ़ाई है ।
करके इतना बङा कहते हैं - जा बेटी ! तू परायी है ।
साथ बेटी के फ़िर बहुत दहेज भी जायेगा । शायद फ़िर भी न बोझ ये सर से उतर पायेगा ।
रोयेगी माँ जाते देख बाबुल न संभल पायेगा । देख जुदाई बेटी को क्यों इस रस्म ने सजा सुनायी है ?
करके इतना बङा कहते हैं - जा बेटी ! तू परायी है । By Piyuesh
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I still recall the times I've been through . Confused and I didn't know what to do…
I was lost in the dark..With my lonely, broken heart..I was astray..Then you came along..You took my hand and eased my mind . When I almost gave up...you gave me hope..When things went wrong you made them right..You were always there to lend a helping hand .You made me strong as the 

days went on..You've made my days so bright .You made me live again..Now look at me, a different me..Back on my feet again..Now I'm not afraid to face the world..Cause you taught me how to be strong..You made me live again - Janet Basco
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I’ve learned that no matter what happens, or how bad it seems today, life does go on, and it will be better tomorrow .I’ve learned that you can tell a lot about a person by the way he/she handles these three things: a rainy day, lost luggage, and tangled Christmas tree lights . I’ve learned that regardless of your relationship with your parents, you’ll miss them when they’re gone from your life . I’ve learned that making a “ living ” is not the same thing as making a “life . I’ve learned that life sometimes gives you a second chance . I’ve learned that you shouldn’t go through life with a catcher’s mitt on both hands; you need to be able to throw something back . I’ve learned that whenever I decide something with an open heart, I 

usually make the right decision . I’ve learned that even when I have pains, I don’t have to be one . I’ve learned that every day you should reach out and touch someone .People love a warm hug, or just a friendly pat on the back . I’ve learned that I still have a lot to learn .I’ve learned that people will forget what you said, people will forget what you did, but people will never forget how you made them feel .- Maya Angelou
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रसोई भण्डार घर में चावल को सालों साल - कीटाणु मुक्त । साफ़ । उजले । एवं पौष्टिकता से ( यथावत ) भरपूर बनाये रखने के लिये कुछ सरल घरेलू उपाय - घर में अनाज का भंडारण हम सभी करते हैं । इनमें गेहूँ और दालों को तो आसानी से सहेज लिए जाता है । लेकिन चावलों को कीड़ों के 

प्रकोप से बचा पाना प्रायः मुश्किल होता है । निम्नलिखित उपायों को अपना कर चावल को भी काफी समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है ।
1 चावल के बीच बीच में खड़े नमक की डल्लियाँ या पिसे नमक की छोटी छोटी पोटलियाँ डाल कर रखने से चावल साल भर खराब नहीं होते हैं ।
2 चावल में नीम या मैथी की सूखी पत्तियाँ मिलाकर भी रखा जा सकता है ।

3 यदि ठण्ड के मौसम में चावल को रात भर के लिए ओस में रख कर सुबह छानकर डिब्बे में भर कर रख लिया जाये । तो इसके बाद न तो चावल खराब होंगे । और न ही उनमें कभी कीड़े लगेंगे ।
4 चावल को अरंडी के तेल में चुपड़ कर रखने से चावल सालों साल खराब नहीं होते हैं । 
5 खाने वाले चूने की थोडा सी मात्रा चावल में अच्छी तरह मिलाकर बंद डिब्बे में भरकर रखने से चावल खराब नहीं होते हैं ।
6 हल्दी पाऊडर की छोटी छोटी पोटलियाँ बनाकर चावलों के बीच बीच में रखने से भी चावल खराब नहीं होते हैं । 
7 करेले के सूखे छिलके चावल में मिलाकर रखने से चावल में कीड़े नहीं लगते हैं ।
8 बरसात के दिनों में चावल के डिब्बे में थोड़े स्याही सोखता पेपर रखने से बरसात के मौसम में चावल सीलते नहीं हैं ।
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My name is Zobira,I believe that this likeness that I came knocking at the door of your heart, that you open for me to enter . I will be very grateful if we can establish this relationship. I will be stopping so far till I hear from you,Is me , Zobira

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