30 अक्तूबर 2013

अद्वैत ज्ञान पर आर्य अज्ञान का प्रलाप

स्वामी दयानंद की वेद भाष्य को देन -  भाग 14
वेद और अद्वैतवाद ।  डा. विवेक आर्य - स्वामी दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश के 11वें समुल्लास में अद्वैतवाद विचारधारा पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया है । अद्वैतवाद विचारधारा की नीव गौड़पादाचार्य ने 215 कारीकायों (श्लोकों) से की थी । इनके शिष्य गोविन्दाचार्य हुए और उनके शिष्य दक्षिण भारत में जन्मे शंकराचार्य हुए । जिन्होंने इन कारीकायों का भाष्य रचा था । यही विचार अद्वैतवाद के नाम से प्रसिद्ध हुआ था । शंकराचार्य अत्यंत प्रखर बुद्धि के अद्वितीय विद्वान थे । जिन्होंने भारत देश में फैल रहे नास्तिक, बुद्ध और जैन मत को शास्त्रार्थ में परास्त कर वैदिक धर्म की रक्षा की । उनके प्रचार से भारत में नास्तिक मत तो समाप्त हो गया । पर - मायावाद अर्थात अद्वैतवाद ? (यह क्या बला है - राजीव कुलश्रेष्ठ) की स्थापना हो गयी ।
अद्वैत मत क्या हैं ? स्वामी शंकराचार्य ब्रह्म के 2 रूप मानते हैं । 1 अविद्या उपाधि सहित है । जो जीव कहलाता है । और दूसरा सब प्रकार की उपाधियों

से रहित शुद्ध ब्रह्म है । अविद्या की अवस्था में ही उपास्य उपासक आदि सब व्यवहार हैं और जब जीव अविद्या से रहित होकर `अहम ब्रह्मास्मि' अर्थात - मैं ब्रह्म हूँ । इस अवस्था को पहुँच जाता है । तो जीव का जीवपन नष्ट हो जाता है ।
माया का स्वरुप - अद्वैत मत के अनुसार माया के सम्बन्ध से ही ब्रह्म जीव कहता है । यह माया रूप उपाधि अनादि काल ? से ही ब्रह्म को लगी हुई है । और इस अविद्या के कारण ही जीव अपने आपको ब्रह्म से भिन्न समझता है । शंकराचार्य के अनुसार - माया को परमेश्वर की शक्ति, त्रिगुणात्मिका, अनादि रूपा, अविद्या का नाम दिया है । इसे अनिर्वचनीय (जो कहीं न जा सके) माना है ।
जगत मिथ्या - अद्वैत मत के अनुसार जगत मिथ्या है । जिस प्रकार स्वपन झूठे होते हैं ? तथा अँधेरे में रस्सी को देखकर सांप का भ्रम होता है । उसी प्रकार इस भ्रान्ति, अविद्या, अज्ञान के कारण ही जीव इस मिथ्या संसार को सत्य मान रहा है । वास्तव में न कोई संसार की उत्पत्ति, न प्रलय, न कोई साधक, न कोई मुमुक्षु (मुक्ति) चाहने वाला है । केवल ब्रह्म ही सत्य है । और कुछ नहीं ।
अकर्ता तथा अभोक्ता - अद्वैत मत के अनुसार यह अंतरात्मा न कर्ता है । न भोक्ता है । न देखता है । न दिखाता है ? यह निष्क्रिय है ? सूर्य के प्रतिबिम्ब की भांति जीवों की क्रियाएं ? बुद्धि पर चिदाभास (चैतन्य) प्रतिबिम्ब छाया Reflection से हो रही हैं ।
द्वैतवाद के समर्थक वेद और उपनिषद - शंकर अपने शारीरिक भाष्य 1/1/3 में ऋग्वेद आदि को अपौरुष्य और सूर्य की भांति स्वत: प्रमाण माना है ? वेद संहिता को प्रमाण मानने के बावजूद शंकर ने वेदों में से 1 भी प्रमाण अद्वैतवाद की पुष्टि के लिए प्रस्तुत नहीं किया । जबकि वेदों में अनेक प्रमाण जीवात्मा और परमात्मा की 2 भिन्न चेतन सत्ताएँ घोषित करते हैं । जैसे -
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते I
तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वत्यनश्ननन्यो अभिचाकशीति । ऋग्वेद 1/164/20 
- 2 चेतन । ईश्वर और आत्मा । अनादि प्रकृति ? रुपी वृक्ष के साथ सम्बंधित हैं । इसमें 1 आत्मा अपने अपने कर्मों का फल भोग करती है । जबकि दूसरी परमात्मा किसी भी प्रकार के फलों का भोग न करता हुआ उसको देखता है ।
इसी मन्त्र का श्वेताश्वतर उपनिषद 4/6 में शंकर अर्थ करते हैं - परमेश्वर नित्य शुद्ध बुद्ध स्वभाव वाला सबको देखता है । यदि अद्वैतवाद की मानें । तो ईश्वर से भिन्न कोई और पदार्थ नहीं है । तो फिर ईश्वर किसे देख रहे है ?

ऋग्वेद 10/82/7 और यजुर्वेद 17/31 में भी आया है - हे जीवो ! तुम उस ब्रह्म को नहीं जानते । जिसने सारी प्रजा को उत्पन्न किया है । वह तुमसे भिन्न है । और तुम्हारे अंदर भी है ।
बृहद-अरण्यक उपनिषद के अंतर्यामी प्रकरण में लिखा है - जिस प्रकार परमात्मा - सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी आदि पदार्थों के भीतर व्यापक है और उनको नियम में रखता है । उसी प्रकार जीवात्मा के भीतर भी व्यापक है । और इस जीवात्मा से पृथक भी है ।
श्वेताश्वतर उपनिषद 4/5 में प्रकृति के लिए - अजा और परमात्मा और जीव के लिए 2 बार - अज: पद आया है

। इसमें परमेश्वर, आत्मा और प्रकृति तीनों को अनादि ? बताया गया है ।
कठो-उपनिषद 1/3/1 में आया है - इस शरीर में छाया अर्थात अज्ञान से युक्त शरीर और आतप अर्थात प्रकाशमय परमात्मा है । इस मंत्र में 2 भिन्न चेतन सत्ता का स्पष्ट प्रमाण है ?
अद्वैतवाद समालोचना - जगत मिथ्या - शंकर के दादा गुरु गौडपादाचार्य ने 2/32 (गौ. का.) में ब्रह्म सत्य है । और जगत मिथ्या है । यह सिद्धांत वेदादि शास्त्रों, प्रत्यक्ष प्रमाण और युक्तियों के विरुद्ध स्थापित किया है ।
यजुर्वेद 40/8 में लिखा है - इस जगत में परमात्मा ने यथार्थ पदार्थों का निर्माण किया । जो यथार्थ पदार्थ हैं । वह मिथ्या कभी हो नहीं सकता । इसलिए जगत मिथ्या कैसे हुआ ?
ऋग्वेद 10/180/3 में लिखा है - परमात्मा प्रलय के पश्चात पूर्ववत सृष्टि की रचना करते हैं । क्या परमात्मा मिथ्या प्रकृति की रचना करते हैं ? और क्या यह नियम अनादि काल से चलता आ रहा हैं ?
यजुर्वेद 40/9 में प्रकृति को असम्भूति अर्थात नित्य लिखा है फिर नित्य प्रकृति मिथ्या कैसे हो गयी ?
ऋग्वेद 1/4/14 में लिखा है - परमात्मा ने अपने से भिन्न सब संसार को रचा ।
छान्दोग्य उपनिषद 6/4/4 में लिखा है - इस सारी सृष्टि का मूल सत्य है । और सत्य पर ही सब आश्रित है ।

वैशेषिक दर्शन ने 6 पदार्थों के और न्याय दर्शन ने 16 पदार्थों के तत्व ज्ञान से मुक्ति लिखी है ? यदि यह जगत मिथ्या है । तो इन पदार्थों के तत्व ज्ञान से मुक्ति मिलना निरर्थक सिद्ध होता है ।
वेद और दर्शन, उपनिषद के प्रमाणों से स्पष्ट प्रमाणित होता है कि जगत कार्य क्षेत्र है और इसी में जीव अपने कर्म फल प्राप्ति के लिए ही देह धारण करके भिन्न योनियों में इस विश्व में आकर फल का उपभोग करता है । जब जगत ही मिथ्या है । तो जीना किसका और फल पाना किसका ? इसलिए धर्म शास्त्रों के प्रमाण से यह सिद्ध होता है कि जगत मिथ्या नहीं । अपितु यथार्थ है ।
माया की समीक्षा - अद्वैत मत के अनुसार जीव और ब्रह्म की भिन्नता का कारण माया है । जिसे अविद्या भी कहते हैं । जिस समय जीव से अविद्या दूर हो जाती है । उस समय वह ब्रह्म हो जाता है । हमारा प्रथम आक्षेप है - यदि अविद्या ब्रह्म का स्वाभाविक गुण Natural  है । तब तो अविद्या का नाश नहीं हो सकता । क्योंकि स्वाभाविक गुण सदा ही अपने आश्रित द्रव्य के आधार पर स्थिर रहता है । यदि यह अविद्या नेमैत्तिक Acquired  है । तो किस निमित्त से ब्रह्म का अविद्या से संपर्क हुआ । यदि कोई और निमित्त माना जाये । तो ब्रह्म के साथ उस निमित्त को भी नित्य मानना पड़ेगा और उसे नित्य मानने पर द्वैत सिद्ध होता है । फिट अद्वैतवाद नहीं रहता । दूसरे इस अविद्या का नाश वेदादि शास्त्रों के ज्ञान द्वारा होता है । तो फिर वह निरुपाधि ब्रह्म वेद ज्ञान को कैसे उत्पन्न करता है ?

अद्वैत मत के अनुसार - जीव की ब्रह्म से कोई भिन्न सत्ता नहीं है । ब्रह्म का जो आभास है । जिसे चिदाभास कहते हैं । अर्थात अंत:करण पर चैतन्य ब्रह्म के प्रतिबिम्ब के कारण जीव अपने आपको ब्रह्म होता हुआ भी जीव समझ रहा है । जिस प्रकार जल कुण्डों में सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है और जल के हिलने से सूर्य दिखाई देता है । इसी प्रकार शरीर में अंत:करण के ऊपर ब्रह्म का आभास (चिदाभास) पड़ता है । उसी के कारण ही जीव सब खेल करता है । 
इसकी समीक्षा यह है कि - निराकार और सर्व व्यापक का प्रतिबिम्ब नहीं होता । प्रतिबिम्ब साकार और दूर की वस्तु का होता है । इसलिए सूर्य का दृष्टान्त यहाँ ठीक नहीं बैठता ? सूर्य साकार है और जल के कुण्डों से दूर है । इसलिए भीतर और बाहर व्यापक निराकार ब्रह्म में यह दृष्टान्त नहीं घट सकता ।

अद्वैत मत के अनुसार - भ्रान्ति होने के कारण हम ब्रह्म होते हुए भी अपने आपको जीव मान रहे हैं और यह भ्रम बुद्धि को होता है । आत्मा को नहीं । इसकी समीक्षा यह है कि - बुद्धि जड़ वस्तु है और सुख दुःख आदि का अनुभव चेतन यानी आत्मा को होता है । जड़ को नहीं । जिस प्रकार नेत्र के देखने से कोई नहीं कहता कि - नेत्र देखते हैं । सब यही अनुभव देखने वाला तो भीतर चेतन आत्मा है । नेत्र आदि तो उसके साधन भर हैं ।
ऋग्वेद 1/164/20 तथा मुण्डक उपनिषद 3/1/1 में लिखा है  - यह जीव ही सुख दुःख का भोक्ता है । कठ उपनिषद 1/1/3 में लिखा है - शरीर, इन्द्रिय और मन के साथ युक्त होकर यह आत्मा सुख दुःख का उपभोग करता है ।
प्रश्न उपनिषद 4/9 में लिखा है - यह आत्मा ही देखता, सुनता, सूंघता और मनन करता है । इन प्रमाणों से स्पष्ट सिद्ध होता है - मायावादियों का यह विचार कि सांसारिक खेल बुद्धि करती है । आत्मा नहीं । सर्वथा निर्मूल है ।
अद्वैत मत के कारण हानियां - प्राचीन वैदिक इतिहास को पढने से पता चलता है कि आर्य लोग चरित्र में ऊँचे, ज्ञान में निपुण, युद्ध विद्या में कुशल होते थे । उनमें बुद्धि, वीरता और निर्भयता कूट कूट कर भरी होती थी । दुष्टों के नाश और सज्जनों की रक्षा के लिए वे सदा तत्पर रहते थे । 
ऋग्वेद 10/28/4 में लिखा है - वीर पुरुष नदियों के बहाव को उल्टा देते हैं  और घास खाने वाले जीवों से सिंह को भी मार डालते हैं । वैदिक काल में आर्य, शास्त्र और शस्त्र दोनों में निपुण होते थे और परमेश्वर के अलावा किसी से भय नहीं खाते थे । इस प्रकार की शक्ति रखने वाले आर्यों का स्वार्थी, दब्बू, भयभीत और निरुत्साही जाति में परिवर्तन कैसे हो गया ? 
इसका कारण भारत में फैले 3 अवैदिक मत हैं - जैन, बौद्ध और वेदांत । जैन और बौद्ध मत के प्रभाव से छदम अहिंसा का प्रपंच आर्य हिन्दू जाति में घुस गया । जिससे वे शक्तिहीन होकर कमजोर हो गए और वेदांत के प्रभाव के कारण आर्य जाति में संसार से उदासीनता, झूठा वैराग्य और अकर्मण्यता आदि ने जन्म ले लिया । हम उदाहरण देकर अपने कथन को सिद्ध करते हैं ।
- सिंध का राजा दाहिर वीर राजा था । पर उसके राज्य में बौद्धों का वर्चस्व था । जब मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर हमला किया । तो बौद्धों ने सोचा कि - युद्ध करना अहिंसा नहीं हिंसा है । इसलिए राजा का साथ नहीं दिया । जिससे राजा दाहिर हार गया । अपने देश की दुश्मनों से रक्षा करने के क्षात्र धर्म का पालन करना हिंसा नहीं कहलाती (ref. History of India by C.B.Vaidya)
नालंदा विश्वविद्यालय शिक्षा के लिए विश्व प्रसिद्ध था । यहाँ बौद्ध मत का प्रचार था । 1197 में खिलजी ने केवल 200 सैनिकों के साथ यहाँ हमला किया । हजारों की संख्या में सिर मुंढे हुए `अहिंसा परमों धर्म' के मंत्र का जाप करते हुए गाजर मूली की तरह कट गए । पर किसी भी बौद्ध भिक्षु ने उनका विरोध नहीं किया । इसके बाद खिलजी ने विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को आग लगाकर लाखों पुस्तकों के भंडार का नाश कर दिया (रेफ - History of India by Elliot)
इसी प्रकार गुजरात में सोमनाथ मंदिर पर जब मुहम्मद गजनी ने हमला किया । तो हजारों की संख्या में उपस्थित पुजारियों और राजपूत सैनिकों ने झूठी अहिंसा, झूठी दया, झूठी शांति और मिथ्या वैराग्य का लबादा पहन लिया । जिससे न केवल मंदिर का नाश हुआ । बल्कि इतिहास में हमेशा हमेशा के लिए हिन्दुओं पर कायर का धब्बा लग गया ।
वेद में वीरों को क्षात्र धर्म का पालन करते हुए आज्ञा है - हे मनुष्यो ! आगे बढो । विजयी बनो । ईश्वर तुम्हारी भलाई करेगा । तुम्हारी भुजाएं लम्बी हों । जिन्हें कोई रोक न सके - ऋग्वेद 10/103/13
अथर्ववेद 6/6/2 में लिखा है - जो दुष्ट हमें सताता है । तुम वज्र यानि शस्त्रों से उसके मुख को तोड़ दो ।
यजुर्वेद में लिखा है - राक्षस और लुटेरों को जला दो - यजुर्वेद 1/7
इन प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि जब तक हिन्दू जाति वेदों की आज्ञा का पालन करती रही । वीर योद्धा की भांति विश्व पर राज्य करती रही । जब उसने वेदों का मार्ग छोड़कर अद्वैत मत के जगत को मिथ्या समझ कर अकर्मण्यता का विचार अपनाया । अथवा जैन और बौद्ध धर्म के छदम अहिंसा को माना । तब तब दुश्मनों से मार खायी ।
- सभी आक्षेपों पर खंडन सहित स्पष्टीकरण शीघ्र ही । शीर्षक में आर्य शब्द का आशय वर्तमान `आर्य सोच' से है न कि प्राचीन आर्यों से - राजीव कुलश्रेष्ठ । 

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http://fractalenlightenment.com/15116/life/the-effect-of-negative-emotions-on-our-health

You get peace of mind not by thinking about it or imagining it, but by quietening and relaxing the restless mind. Your nature is absolute peace. You are not the mind. Silence your mind through concentration and meditation, and you will discover the peace of the Spirit that you are, and have always been. Remez Sasson
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Every storm runs, runs out of rain. Just like every dark night turns into day. Every heartache will fade away. Just like every storm runs, runs out of rain. © Alex Howitt 
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Marianne Williamson says eloquently what I sought to capture in this morning's blog. We are okay. . .sufficient for what life asks of us. And when we know our own light & combine it with the light of others, together we are sufficient for what the world needs. May we know this, experience it as we sit for just a moment- for one breath- in stillness with our eyes closed, aware of the light, the heat, the fire at the centre of being.
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29 अक्तूबर 2013

मैं पाप बेचती हूँ पाप

1 प्रबोध कथा है । 1 युवक ने किसी साधु से पूछा था - मोक्ष की विधि क्या है ? उस साधु ने कहा - तुम्हें बांधा किसने है ? वह युवक 1 क्षण रुका । फिर बोला - बांधा किसी ने भी नहीं है । तब उस साधु ने पूछा - फिर मुक्ति क्यों खोजते हो ?
- मुक्ति क्यों खोजते हो ? यही कल मैंने भी 1 व्यक्ति से पूछा है । यही प्रत्येक को अपने से पूछना है । बंधन है कहाँ ? जो है । उसके प्रति जागो । जो है । उसको बदलने की फिक्र छोड़ो । आदर्श के पीछे मत दौड़ो । जो भविष्य में है । वह नहीं । जो वर्तमान है । वही तुम हो । और वर्तमान में कोई बंधन नहीं है । वर्तमान के प्रति जागते ही बंधन नहीं पाये जाते हैं ।
आकांक्षा - कुछ होने और कुछ पाने की आकांक्षा ही बंधन है । वही तनाव है । वही दौड़ है । वही संसार है । यही आकांक्षा मोक्ष का निर्माण करती है । मोक्ष पाने के मूल में वही है । और बंधन मूल में हो । तो परिणाम में मोक्ष कैसे हो सकता है ? मोक्ष की शुरुआत 

मुक्त होने से करनी होती है । वह अंत नहीं । वही प्रारंभ है । मोक्ष पाना नहीं है । वरन दर्शन करना है कि मैं मोक्ष में ही खड़ा हूँ । मैं मुक्त हूँ । यह बोध शांत जाग्रत चेतना में सहज ही उपलब्ध हो जाता है । प्रत्येक मुक्त है । केवल इस सत्य के प्रति जागना मात्र है । मैं जैसे ही दौड़ छोड़ता हूँ । कुछ होने की दौड़ जैसे ही जाती है कि मैं हो आता हूँ । और " हो आना " पूरे अर्थो में हो आना ही मुक्ति है । तथाकथित धार्मिक इस " हो आने " को नहीं पाता है । क्योंकि वह दौड़ में है - मोक्ष पाने की । आत्मा को पाने की । ईश्वर को पाने की । और जो दौड़ में है । चाहे उस दौड़ का रूप कुछ भी क्यों न हो । वह अपने में नहीं है । धार्मिक होना आस्था की बात नहीं । किसी प्रयास की बात नहीं । किसी क्रिया की बात नहीं । धार्मिक होना तो । अपने में होने की बात है । और यह मुक्ति 1 क्षण मात्र में आ सकती है । यह सत्य के प्रति सजग होते ही । जागते ही कि बंधन दौड़ में है । आकांक्षा में है ।

आदर्श में है । अंधेरा गिर जाता है । और जो दिखता है । उसमें बंधन पाये ही नहीं जाते हैं । सत्य 1 क्षण में क्रांति कर देता है ।
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ये एक जिज्ञासु शिष्य से मेरी बातचीत है । आप लिंक पर सुन सकते हैं । पिछली बार ये फ़ाइल्स अपलोड साइट ने हटा दिये थे । अबकी बार इन्हें यू टयूब पर डाला गया है । राजीव कुलश्रेष्ठ  
http://www.youtube.com/playlist?list=PLd8a1JnbafW-i29DaBK_wrZnpDzEzGFIH


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ईश्वर है ? हमें ज्ञात नहीं । आत्मा है ? हमें ज्ञात नहीं । मृत्यु के बाद जीवन है ? हमें ज्ञात नहीं । जीवन में कोई अर्थ है ? हमें ज्ञात नहीं ।
- हमें ज्ञात नहीं । यह आज का पूरा जीवन दर्शन है । इन तीनों शब्दों में हमारा पूरा ज्ञान समा जाता है । पर के

संबंध में । पदार्थ के संबंध में । जानने की हमारी दौड़ का अंत नहीं है । पर " स्व " के चैतन्य के संबंध में हम प्रतिदिन अंधेरे में डूबते जाते हैं ।
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कल्कि अवतार के बारे में बङे ही हास्यास्पद तरीके से अभी के तमाम धर्म गुरु और यहाँ तक मुसलमान मुहम्मद को और शायद कहीं कहीं ईसाई भी ईसामसीह को कल्कि अवतार घुमा फ़िराकर घोषित करते हैं । जो सब एकदम मिथ्या है । शास्त्र के अनुसार कल्कि अवतार शंभल ग्राम में विष्णुयश नामक ब्राह्मण के घर पुत्र रूप में होगा । मेरी जानकारी के अनुसार अभी इसमें दस हजार वर्ष से अधिक का समय है । राजीव कुलश्रेष्ठ 
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nothing is everything and everything is nothing, 
in between of these to there is something
What is that ? Can anyone explain this ?
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जो ( ये ) कुछ नहीं है । वही सब कुछ है । ( ये ) जो सब कुछ है । वो कुछ नहीं है । और जो कुछ आपको अनुभव में आता है । वो इसी " कुछ नहीं और सब कुछ " के मध्य ही है । राजीव कुलश्रेष्ठ
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इसी को फ़क्कङ सन्तों ने इस तरह कहा है -
चाह मिटी चिन्ता मिटी मनुआ बेपरवाह ।
जा को कछू न चाहिये सो ही शहंशाह ।
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तू अजर अनामी वीर भय किसकी खाता ।
तेरे ऊपर कोई न दाता ।
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हद टपे सो मानवा बेहद टपे सो पीर ।
हद बेहद दोनों टपे उसका नाम फ़कीर ।
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सबहि सयाने एक मत पहुँचे का मत एक ।
बीच में जो रहे तिन के मते अनेक ।
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The process of refinement of a soul is very long , its traits are not developed in just a single lifetime.The traits are acquired and accumulated from previous lifetimes which results in the overall personality of a person. our present personality is only a continuation of the previous one but the process of refinement is always going on. This means that a person who is soft spoken and a team working till the end of his/her present life time will not drastically transform to an arrogant, dominant person. He will carry the same traits from his/her previous lifetime.The process of refinement follows the following path:
soul - consciousness
consciousness - mind
mind - Three Gunas (satva, rajas and tamas)
gunas - sanskara
http://en.wikipedia.org/wiki/Sanskara
sanskara - karma (deeds)
karm - sanskara
also sanskara results in determining the nature of  person. and the nature determines the new acts (deeds) of that person.
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आप में भी राम है । और हम में भी राम है । आप भी राम हैं । में भी राम हूँ । राम किसी को भी बड़ा छोटा नहीं 

बनाता है । एक समानता का संदेश है । अर्थात जो आप हैं । वही हम सब हैं ।
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We are not humans having a spiritual experience, but rather spiritual beings having a human experience.
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we think were made of stuff but in fact we're really a form of energy ? ( E=mc2 ) ?
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कोहम > सोहम > ओहम 
Who am i ? > Mind > Body
अब क्या बचा ? राजीव कुलश्रेष्ठ 
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http://revolutionarynewphilosophy.com/2013/09/11/atheistic-pride-and-prejudice
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भारतीय जड़ी बूटी, औषधियों का सम्पूर्ण विवरण चित्रों के साथ इलेक्ट्रोनिक बुक ( ई-बुक ) रूप में
http://prakriti-farms.org/downloads/MedicinalAndAromaticPlants.chm
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1 बार घूमते घूमते कालीदास बाजार गये । वहाँ 1 महिला बैठी मिली । उसके पास 1 मटका था । और कुछ प्यालियाँ पड़ी थी । कालीदास ने उस महिला से पूछा - क्या बेच रही हो ? महिला ने जवाब दिया -महाराज ! मैं पाप बेचती हूँ । कालिदास ने आश्चर्यचकित होकर पूछा - पाप और मटके में ? महिला बोली - हाँ ! महाराज ! मटके में पाप है । कालिदास - कौन सा पाप है ? महिला - 8 पाप इस मटके में हैं । मैं चिल्लाकर कहती हूँ कि मैं पाप बेचती हूँ पाप । और लोग पैसे देकर पाप ले जाते है ।  अब महाकवि कालीदास को और आश्चर्य हुआ - पैसे देकर लोग पाप ले जाते है ? महिला - हाँ ! महाराज ! पैसे से खरीदकर लोग पाप ले जाते है । कालिदास - इस मटके में 8 पाप कौन कौन से है ? 
महिला - क्रोध, बुद्धिनाश, यश का नाश, स्त्री एवं बच्चों के साथ
अत्याचार और अन्याय, चोरी, असत्य आदि दुराचार, पुण्य का नाश, और स्वास्थ्य का नाश । ऐसे 8 प्रकार के पाप इस घड़े में है । कालीदास को कौतुहल हुआ कि यह तो बड़ी विचित्र बात है । किसी भी शास्त्र में नहीं आया है कि मटके में 8 प्रकार के पाप होते हैं । वे बोले -  आखिरकार इसमें क्या है ? महिला - महाराज ! इसमें शराब है शराब ।
कालीदास महिला की कुशलता पर प्रसन्न होकर बोले - तुझे धन्यवाद है । शराब में 8 प्रकार के पाप हैं । यह तू जानती है । और - मैं पाप बेचती हूँ । ऐसा कहकर बेचती है । फिर भी लोग ले जाते हैं ।  धिक्कार है ऐसे लोगों को । Indresh Tiwari 

28 अक्तूबर 2013

मनोरंजन नहीं मनोमंजन करो

Sat sat naman rajeev ji. I was eagerly waiting for ur next blog. You wrote after five days. I was little disappointed but when i came to knw the reason u have written i salute you for this. Magar kya karu apki blog padhane ka nasha kuchh aisa hai ki itna intezar to mai apni aane wali saanso ( breath ) ka bhi nahi karta. Thnx for the blog. Pls write smthng daily at least two lines like " thought of the day ". Jai gurudev ji . Vivek kumar
- शायद दो बातें हैं । जो मुझे अक्सर लेखन उदासीनता की ओर ले जाती हैं । कबीर ने बङे चिन्तित भाव में लगभग खीजकर कहा - स्वांसा खाली जात है तीन लोक का मोल । और.. झूठे सुख से सुखी है मानत है मन मोद । जगत चबैना काल का कछु मुख में कछु गोद ।
अतः क्या लिखूँ ? जो लिखा । उसको आप कितना समझ पाये ? और मैं सिर्फ़ सैद्धांतिक समझाने के प्रति भी नहीं कह रहा । मैं आपको आपकी करोङों जन्मों से खोयी पहचान तुरत दिलाने को तत्पर हूँ । मैं आपको ( जन्म मरण से ) मुक्त देश का वासी बनाने को तत्पर हूँ । क्योंकि अब सिर्फ़ यही मेरा कार्य है । क्या यह छोटी बात है ? क्या संसार के किसी कार्य किसी उपलब्धि से इसकी समानता हो सकती है ? और इसके लिये मैं नियुक्त हूँ । अधिकारी हूँ ।
पर क्योंकि यह 50-50 के प्रभु सत्ता नियमानुसार ही किया जाता है । यानी 50% जिज्ञासा लगन इच्छा आदि 

घटकों की पहल उप-स्थित के लिये जीव की होनी चाहिये । तब 50% मार्गदर्शक उसकी और चलता है । यह चुम्बक और लोहे के सिद्धांत जैसा ही है । क्या अति दुर्लभ आत्मज्ञान सिर्फ़ बौद्धिक भूख या मनो-रंजन की वस्तु है ? नहीं । मनोरंजन की बजाय मनो-मंजन आवश्यक है । और ये पूर्ण क्रियात्मक है । तब मैं ऐसे पात्रों का विशेष चयन करता हूँ । जो मनो-मंजन की दिशा में प्रयत्नशील हैं । और तब इधर मेरी उदासीनता युक्त निष्क्रियता सी हो जाती है । क्योंकि तुलनात्मक क्रिया के ( सिर्फ़ ) विचारोत्तेजना टाइम वेस्ट मनी वेस्ट जैसा ही है । फ़िर यह तो अक्षय धन है । जो ( मृत्यु के बाद भी ) हमेशा काम आता है । तब क्या सार्थक है ?
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रहस्य की परत दर परत खोलने जानने के इच्छुक अनेकों प्रश्नों पर मेरे उत्तर यहाँ भी लगातार पढ सकते हैं । कृपया निम्न फ़ेसबुक लिंकों पर ज्वाइन करें ।
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अगर आध्यात्म या अलौकिक विज्ञान के अनुसार बात की जाये । तो ये 9 द्वार हमारे शरीर के आँखों से नीचे पिंड

भाग में स्थित हैं । क्योंकि मायावश हम अज्ञान से इसी शरीर से मोहित हुये इसी शरीर को सत्य मानते हैं । अतः - जहाँ आशा वहाँ वासा । जैसी मति वैसी गति । अन्त मता सो गता.. सिद्धांत अनुसार हमारी गति पशुवत ही होती है । क्योंकि शरीर ही सत्य नहीं है । यह सिद्ध है । पर हम जीवन अन्त तक शरीर से पशु की भांति मोहित रहते हैं । इसलिये अन्तिम गति भी पशुवत ही होगी ।
तब मृत्यु समय दोनों कानों ( में किसी एक ) से जीवात्मा निकलने पर विभिन्न प्रकार की प्रेत योनि होगी । क्योंकि प्रेतत्व शब्द ध्वनि आधारित है । दोनों आँखों ( में किसी एक ) से जीवात्मा निकलने पर प्रकाश प्रेमी विभिन्न कीट पतंगे होगें । क्योंकि कीट पतंगे प्रकाश आकर्षण वाले हैं । दोनों नासिका छिद्रों में किसी एक से प्राण तजने पर वायुचर जीव पक्षी आदि । क्योंकि नासिका छिद्र से वायु ही बाहर होती है । मुँह से विभिन्न प्रकार के पशु । क्योंकि यह सिर्फ़ उदर पूर्ति और 

स्वाद का माध्यम अधिक है । लिंग या योनि छिद्र से तदनुसार ही विभिन्न जल जीव । और गुदा मार्ग से तदनुसार ही विभिन्न नरकगामी होगा । अतः सिर्फ़ दसवां द्वार ही आगे मनुष्य शरीर या मोक्ष मार्ग देता है । राजीव कुलश्रेष्ठ
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When energy moves through the body - it is sex, when energy moves through the soul - it is kundalini
Kundalini and Multi-Dimensional Consciousness
- ऐसा व्यर्थ प्रलाप सिर्फ़ पाश्चात्य व्यक्ति या पाश्चात्य सोच वाले ही कर सकते हैं । क्योंकि मूल रूप से शरीर या आत्मा से उठी उर्जा या चेतना का स्रोत सिर्फ़ आत्मा की चेतना ही है । क्योंकि ये लोग संभवतः सत रज तम तीन गुणों के बारे में नहीं जानते । इसलिये ऐसा कहते हैं । कोई भी उर्जा सिर्फ़ सत गुण से ही प्रवाहित होती है । फ़िर उस उर्जा को हम अपनी इच्छा या कामना अनुसार - कामवासना, भक्ति, उद्धार, मोक्ष आदि आदि अनगिनत कामना बहावों से जोङ सकते हैं । राजीव कुलश्रेष्ठ 
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An 81-year-old woman believes that a ghost healed her of an illness and she even has a photo to prove it. Woman claims a ghost healed her and she even has proof .by John Albrecht, Jr.
www.examiner.com/user/5107871/3571611/subscribe?destination=node/66941236

27 अक्तूबर 2013

मुझे सत्यकीखोज से प्यार है..लेकिन

हालांकि मेरी सम्पूर्ण शिक्षा स्कूल के पीछे ही हुयी है । फ़िर भी मुख्य मु्ख्य तौर पर मैं जानता हूँ कि - सबसे बङी शक्ति गुरुत्व है । इसीलिये स्थूल रूप में देहधारी गुरु का स्थान सबसे उच्च है । इसके बाद चुम्बकत्व है । इसको स्थूल रूप में कृष्ण ( कर्षण शक्ति ) रूप से दर्शाया जाता है । इसके बाद गतित्व है । इसको स्थूल रूप में राम ( चेतना या रमत्व ) रूप में दर्शाया जाता है । इसके बाद देवत्व है । जिसको स्थूल रूप में विभिन्न योगत्व ( योग क्रियायें ) की स्थितियों उपाधियों द्वारा दर्शाया जाता है । इसके बाद सबसे नीचे जीवत्व है । जिसे स्थूल रूप में मनुष्य और विभिन्न 84 लाख योनियों के रूप में जाना जाता है । सामान्य जीवधारियों के लिये यही जीवत्व दृश्य और ज्ञात है । क्या आप भौतिक विज्ञान या आध्यात्म विज्ञान में इस कृमवद्ध श्रंखला के अतिरिक्त कुछ और बता सकते हैं । क्योंकि कुछ और है ही नहीं । और इन सबसे निर्लेप निर्विकार आत्मा ( परमात्मा ) से यह .. गुरुत्व - चुम्बकत्व - गतित्व - देवत्व - जीवत्व..सब कुछ उसकी मूल प्रकृति में समाहित है । सोचिये ! अगर मैं बाकायदा स्कूल में पढता । तो क्या होता ?
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सत्यकीखोज से मुझे प्यार है । क्योंकि मुझे वैश्विक स्तर पर इसी मंच से अच्छे लोग मिलें । और मैं बहुत कुछ यहीं से देना भी चाहता हूँ । पर मैंने हमेशा कहा - एक

जीवन बचाना, उसमें उमंगे पैदा करना, उसे जीवन्त धाराओं की तरफ़ मोङना । और हो सके तो उद्धार पर चला देना । तुलनात्मक इसके बहुत अच्छा है कि मैं विद्वता पूर्ण दस लेख लिखूँ । एक जीव को चेताने का पुण्य फ़ल भी सृष्टि के किसी भी अन्य पुण्य कर्म फ़ल से बहुत अधिक है । ऐसे ही जीवन्त उदाहरणों में से ये एक है । ये विदेशी लङकी अकेलेपन की गहन निराशा अवसाद में अभी परसों ही आत्महत्या जैसा विचार बना चुकी थी । आप पढकर देखें ।
Today I come here to express a deep desire to end my life ? I have done everything to end the pain associated with what happened! It has left me to feel unworthy of ever finding love, trust, and as much as I try to move forward what seems to have happened has held me captive to feeling I have lost myself. I know what a 

special women, lady, mother, I am but seems my dream of finding love has deserted me, left me disillusioned that it will never be found ? So that alone makes me feel there is not much to look forward too ? So what's the use ?? I hate having nothing to look forward too ?

फ़िर उसी दिन उसका मुझसे संवाद हुआ । संवाद आदि ( उसके ) व्यक्तिगत होने के कारण नहीं रख रहा । और अब इसके विचार देखें । इसने बङे आशा पूर्ण कई मैसेज अपने फ़ेसबुक वाल पर पोस्ट किये हैं ।

I wonder when being alone will feel like the norm for me. I have this intimate feeling that the man of my dreams is not for this life ? I feel this life is simply for learning about myself so my next life will bring me all my hopes and dreams!! Or my dream man!!!
और यही वो मुख्य कारण है कि मैं आजकल यहाँ अनुपस्थित सा ही हूँ । आप क्या सोचते हैं । लेख लिखने या

किसी को बचाने आशान्वित करने, दोनों में से क्या मत्वपूर्ण है ।
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किसी भी घटना, कोई भाव विशेष, कोई मर्मघाती बात, पूर्व जन्म के संस्कार, पूर्व जन्म की यात्रा ये सब व्यक्ति ( जीवात्मा ) का 50% खुद का सृजन योगदान होता है । शेष 50% ईश्वरीय व्यवस्था या तन्त्र करता है । जैसे भोजन ( 50% ) तो आप करते हैं । पर शरीर में उसके विभिन्न रस सार या मल ( 50% ) आदि क्रियायें शरीर तन्त्र करता है । अतः यदि विलक्षण जीवन यात्रा को सिर्फ़ इसी जीवन के नजरिये से न देखें । बल्कि अनन्त से देखें । तो इसमें आश्चर्य या चमत्कार जैसा कुछ नहीं । मैंने इसका वृत चित्र बहुत पहले देखा है । पर हम लोगों को सामान्य अध्ययन सामान्य नजरिये के बजाय हर चीज को रहस्यमय अन्दाज में देखने की आदत सी बन गयी है । राजीव कुलश्रेष्ठ
http://fractalenlightenment.com/943/enlightening-video/buddha-boy-with-divine-powers
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ब्रह्मा कुमारी मानते हैं - भारत में श्रीनगर से लेकर कन्याकुमारी तक । और बंगाल से लेकर बम्बई तक । इसी 

रूप की प्रतिमा मिलती है । जिसका न कोई मुख है । न कान हैं । न चरण हैं । न देह है । कहीं इसे विश्वनाथ, कही अमरनाथ, कही मुक्तेश्वर, और कही पापकटेश्वर भी कहते हैं । ये सब नाम सिद्ध करते हैं कि ये परमात्मा के रूप की ही प्रतिमायें हैं । साप्ताहिक पाठयक्रम पृ 42 ।
चिंतन - जब आप लोग कहते हो कि - परमात्मा निराकार है । और ज्योति बिंदु है । तो उसके रूप की प्रतिमायें कैसे हो सकती हैं ? आपने तो प्रतिमायें बताकर स्वयं के सिद्धांत का ही खंडन कर दिया | शिवलिंग के पीछे की पौराणिक कथा शायद आपको मालूम नहीं है । वह लिंग है । लिंग के न तो मुख, न कान, न चरण और न देह होता है । ब्रह्मा कुमारी और कुमारों एक बार शिव पुराण पढ़ना चाहिये । आप मानते हैं कि गीता का ज्ञान परमात्मा ने दिया । तो उसने उसमें तो ऐसा कहीं नहीं लिखा कि ये जो सारे लिंग हैं । ये मेरा ही रूप हैं । फिर आपने कैसे और किस आधार पर इन्हें परमात्मा का रूप बता दिया ? हमने 

ये विश्वनाथ, अमरनाथ सुना । पर यह पाप कटेश्वर ? नहीं सुना । क्या आप बता सकते हैं कि यह शिवलिंग भारत में कहाँ स्थित है ? जो निराकार है । ज्योति बिंदु है । उसकी जड़ प्रतिमा बन कैसे सकती है । इस पर भी प्रकाश डालें ? यह तो आपके सिद्धांत के विपरीत सिद्धांत है । आप तो लोगों को भ्रमित कर रहे हैं । एक और तो कहते हैं - निराकार है । ज्योति बिंदु है । और दूसरी और रूप वाला बना देते हो ।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=419325818190422&set=at.373857562737248.1073741826.373845669405104.1222773232&type=1&theater
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दोस्तो ! मेरे घर में तो गौ माता के गोबर से मैंने जो छोटा गोबर गैस प्लांट बनाया है । उससे चूल्हा जलता है । आप में से कितने भाईयों के घर पर शरू हो गया है । ये है - मेरा गोबर गैस प्लांट । जिसमें मैं आज सुबह गोबर को फीडिंग करता हुआ । और एक फोटो में गैस को ट्रेक्टर के बड़े टायर में स्टोर कर रखी है । और एक फोटो में चूल्हे से अग्नि जल रही है । अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें ।
मुकेश कुमार - 0 92159 59500

22 अक्तूबर 2013

हमारी आत्मा का कमल - अहं कमल

बृह्माण्डीय द्रोह - पौराणिक काल से ही ऋषियों ने अपने शिष्यों को यह उपदेश दिया कि वे स्वयं को जानें । और पूछें - मैं कौन हूँ ? मनुष्य के लिए आत्मावलोकन करना संभव है । क्योंकि वह आत्म जागरुक है । हम यह जानते हैं कि हमारा अस्तित्व है । और हम अपने जीवन में परिवर्तन कर सकते हैं । यह चेतना ही हमें जानवरों से अलग करती है । जानवर स्वप्न ( अन्तःप्रेरणा से संचालित ) जैसी अवस्था में रहते हैं । कुछ जानवरों की प्रजाति जो कि मनुष्यों के समीप में रहती है । उनमें भी मन का निर्माण हो जाता है । पर पदार्थ, पेड़ और अधिकतर जानवरों में मन जागृत नहीं रहता है । मन के जागृत होने से ही मनुष्य ( की चेतना ) 1 वृति ( अन्तःप्रेरणा ) से विकसित होकर व्यक्ति ( अपने आपको व्यक्त कर सकने वाला ) बनता है । वह फिर और विकसित होकर 1 व्यक्ति से व्यक्तित्व ( गुण दोष आदि ) में बदलता है । और वहाँ से आत्मीय चेतना ( सत्व गुण तथा गुणातीत ) में विकसित होता है । मनुष्य के अस्तित्व का मूल ( रहस्य ) खुलता है । किसी श्रेष्ठ चेतना की उपस्थिति में । 

जिसने मनुष्य को मन रुपी अग्नि दी । युगों से मनुष्य की चेतना को खोलने के लिए यह श्रेष्ट चेतना अपना प्रकाश भेज रही है । इस चेतन प्रकाश रुपी फूल को " अहं कमल " भी कहते हैं । हमारी आत्मा का कमल ।
बहुत सी किंवदंतियाँ, पौराणिक कथाएं और रूपक सम्बन्धी वर्णन हैं । जो कि मन की जाग्रति को समझाते है (  बाइबल में ) स्वर्ग से निष्कासित देवदूत की कहानी का गूढ़ अर्थ वह कुंजी है । जिससे मनुष्य की चेतना को समझा जा सकता है । पूर्वी सभ्यताओं में कुमारों और अग्निश्वत्ताओं का वर्णन किया है । सौर्य देवदूत के रूप में यह भी इसी जाग्रति से सबंधित वर्णन करते हैं । यह हमारी सूक्ष्म समझ पर निर्भर करता है कि हम कहाँ तक इन शिक्षाओं को समझ सकते हैं । यूनानी पुराणों में प्रोमिथियास की कथा, जो कि रचनाकार भगवान से अग्नि चुराकर

मनुष्यों को दे आया था । बहुत कुछ कुमारों के द्वारा चेतना को जागृत करने की कथा से मिलती है ।
बृह्मा के द्वारा सृष्टि की रचना के समय 4 मानस पुत्रों, कुमारों को उत्पन्न किया गया था । इनमें 1 पाचवें कुमार, नारद, भी जुड़ गए । जो कि लोगों के शिक्षक थे । ये कुमार पूर्व कृत सृष्टि के दोष रहित प्राणी थे । ये सृष्टि के आदि में दूसरों की, विशेष रूप से मनुष्यों की, सहायता करने के लिए आये । न कि कुछ नया सीखने । इनका मन शुद्ध था । इसलिए इन्हें 5 वर्ष के शिशुओं अथवा 16 वर्ष के चिरयुवा कुमारों के रूप में दर्शाया जाता है । पुराणों में विवरण है कि बृह्मा ने कुमारों को अपने साथ सृष्टि की रचना करने में सहयोग करने को कहा । लेकिन कुमार जानते थे कि उनका कोई अन्य प्रयोजन है ? इसलिए उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया । इससे बृह्मा क्रोधित हो गए । और उन्होंने कुमारों को श्राप दे दिया कि उनका पतन हो जाये । और वे धरती पर 

गिर जाएँ । कुमारों की अवज्ञा करने के कारण इन्हें बृह्मांडीय विद्रोही भी कहा जाता है । उनके अवज्ञा करने का 1 प्रयोजन था । जो कि बृह्मा भी नहीं जानते थे । कुमारों ने कहा - जिस रूप में हमें भेजा जा रहा है । वह अभी हमारे अनुकूल नहीं है । उन्होंने अपनी ( प्राण रुपी ) अग्नि को नीचे गति करने के तथा उत्पत्ति के लिए प्राणियों को प्रोत्साहित करने से मना कर दिया । इसीलिए उन्हें अग्निश्वत्ता, जिन्होंने अपनी उत्पत्ति करने की अग्नि को बुझा दिया, भी कहा जाता है । उनकी लौ हमेशा ऊपर की और ही निर्देशित रहती है । अपने उदगम की और । इसीलिए इनका विवरण निर्दोष युवाओं के जैसे किया जाता है । क्योंकि इच्छाएं इनके अक्षत मन को मलीन नहीं कर पातीं । यद्यपि ये विशिष्ट लोक के दोष रहित प्राणी थे । तथापि इन्होंने स्थूल सृष्टि में गिरने का विरोध नहीं किया । क्योंकि ये यही चाहते थे ।
मन की जाग्रति - इसलिए 1.8 करोड़ वर्ष पूर्व, ये दिव्य प्राणी मनुष्य के तीसरे वंश के दो तिहाई समय निकल जाने पर धरत पर उतरे । ये मनुष्य जाति को आत्म जागरूक होने में सहयोग करना चाहते थे । जिससे मनुष्य के मन का विकास हो । और वह धीरे धीरे उत्थान करे । तब तक मनुष्य अर्ध चेतन अवस्था में था । तब तक मनुष्य की आत्मा बुद्धि और स्थूल सृष्टि में कोई सम्बन्ध नहीं था । पशु रुपी मनुष्य में तब आत्म जागरूकता नहीं थी । क्योंकि तब उनमे मन जागृत नहीं था । सृष्टि की रचना करने वाली सत्ता 1 वर्ग इसके पक्ष में नहीं था कि मनुष्य को मानस क्षमता प्रदान की जाये । 

क्योंकि यह बच्चे के हाथ में धारदार वस्तु देने के जैसे था । लेकिन विद्रोही ( कुमार ) चाहते थे कि पशु रुपी मनुष्य अनुभव से धीरे धीरे आत्म जागरूक होना सीखे । कुमारों ने अपने प्रकाश से अविकसित मनुष्य के अन्दर " मैं हूँ " के प्रकाश को जागृत कर दिया । ज्योति के सम्राट कुमारों की इस प्रेरणा के अभाव में पशु रुपी मनुष्य कभी जागृत न हो पाता । इसलिए हम जो हैं । वह कुमारों के कारण बने हैं । याने आत्म जागरूक चिंतनशील मनुष्य ।
मन के जागृत होने से ही हमें स्वतंत्र इच्छा करने की शक्ति मिली । जिसे हम अच्छे और बुरे के लिए प्रयोग कर सकते हैं । कुमार हमें 1 सम्भावना देना चाहते थे कि हम मननशील होकर धीरे धीरे प्रकाश की और बढ़ें । लेकिन मात्र कुछ ही लोग प्रकाश के पथ पर बढे । अधिकतर लोगों ने मन की शक्ति का प्रयोग सांसारिक अभिलाषाओं की पूर्ति करने के लिए किया । ऐसे में कुमारों की मनुष्य को दी गयी इस प्रेरणा को बुरा समझा जा सकता है । लेकिन वास्तविक दुर्भावना मात्र बहुत ही छोटे समूह के लोगों में हुयी । बहुत से लोग जिन्हें हम बुरा समझते हैं । वे वास्तव में अज्ञानी हैं ।
बाइबिल जेनेसिस में कहा गया है कि मनुष्य को सर्प ने प्रलोभित किया । यह सर्प भी ज्योति के सम्राट का 1 प्रतीक है । मनुष्य ने ज्ञान का फल खा लिया । अच्छे और बुरे में अंतर करने का फल । और उन्होंने देखा कि वो वस्त्रहीन हैं । उनमे शर्म प्रकट हो गयी । क्योंकि वो अपनी जाग्रति की स्थिति से नीचे आ चुके थे । और अब 

स्थूल रूप में थे । रक्त, मांस और चर्म के शरीर में । आध्यात्मिक लोकों से उनका संपर्क अंधकारमय हो गया । और मनुष्य अपने अज्ञान में किये गए कर्मो का फल बनाने लगा । जिससे संघर्ष और कष्ट हुआ । और मनुष्य स्थूल सृष्टि में ही फँस गया । इन अनुभवों से मनुष्य सीखने लगा । और बहुत तीव्र गति से उन्नति करने लगा ।
उपस्थिति का प्रकाश - कुमार इस गृह पर हमारी सहायता करने के लिए हैं । यद्यपि वो जीवन में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करते । और न ही हमें ये बताते हैं कि हमें क्या करना चाहिए । और क्या नहीं करना चाहिए । यहाँ पर 1 सृष्टि का नियम कार्य करता है । जिसके अनुसार विकास बाहरी सहायता से तब तक संभव नहीं है । जब तक अंदरूनी लालसा न हो । कुमार लगातार ही हमें अपनी उपस्थिति का प्रकाश देते रहते हैं । जो कि हमें आत्मा के प्रकाश के रूप में अनुभव होता है । यह प्रकाश स्वयं हस्तक्षेप नहीं करता । लेकिन यह हमारी सहायता करता है । विषय वस्तु को स्पष्ट रूप से समझने में । उनकी उपस्थिति में चुम्बकीय प्रेरणा है । जिससे वस्तुयें उच्च व्यवस्था को प्राप्त होती हैं । इस प्रकार से

कुमार हमारे विचारो को व्यवस्थित करते हैं । जिससे हम अपने जीवन को और अच्छे से व्यवस्थित कर सकें । और अपने आपको प्रकाश से संरेखित कर सकें । जिससे हमें और अधिक प्रेरणा प्राप्त हो ।
कुमारों का प्रकाश विशेष रूप से प्रातःकाल में उपलब्ध रहता है । जब अन्धकार प्रकाश के रूप में परिवर्तित हो रहा होता है । महीने में 1 बार वो हमें अधिक मात्र में दर्शन देते हैं । दूज के चंद्रमा के 24 घंटे तक । वे हमें वार्षिक भी मिलते हैं - मकर महीने में । जिसे कुंवार का महीना भी कहा जाता है । अगर हम उदय के समय का प्रयोग अपनी आत्मा, हमारे अन्दर के सौर्य देवदूत, को संरेखित करने के लिए करते हैं । तब हम कुवारों से प्राप्त प्रकाश को अधिक मात्र में अवशोषित कर सकते हैं ।
5 कुंवार - कुंवार सृष्टि के हर तल पर और उसके पार के अध्यात्मिक पदक्रम के अग्रिणी हैं । इसलिए ये पदक्रम में सर्वोच्च और सबसे पुराने हैं । उनके लिए जो नाम दिए गए हैं । वह हैं - सनक, सनंदन, सनत कुमार, सनत सुजात ।
प्रथम कुंवार - सनक, पारलौकिक को लौकिक से जोड़ने का मार्ग बनाते हैं । अपने इस उत्कृष्ट पहलू के लिए उन्हें सनातन भी कहा गया है । सनातन प्रकाश का शुद्धतम अस्तित्व । हमारे भीतर इनका निवास सहस्त्रार चक्र में है । ये हमारी जागरूकता के अभाव की उस स्थिति के समान हैं । जब हम सोते हैं ।
द्वित्तीय कुमार हैं - सनंदन । जो सूर्य तल और शुद्ध चेतना, आत्मा, से सम्बन्ध रखते हैं । हमारे अन्दर इनकी स्थिति आज्ञा चक्र में हैं ।
जिस कुमार को हम सबसे अच्छे से जानते हैं । वह है - सनत कुमार । ये हमारे ग्रह की चेतन सत्ता है । और इसीलिए यहाँ के सम्राट हैं । ये चिंतन के बौद्धिक तल का और प्रेम से भरे हुए हृदय चक्र में मन का प्रतिनिधित्व करते हैं । इन्हें शिक्षकों का शिक्षक और सम्राटों के सम्राट माना जाता है ।
चौथे कुमार हैं - सनत सुजात । ये उच्च मन, चित्त, का प्रतिनिधित्व करते हैं । ये सनत कुमार के निचले प्रतिरूप हैं । हमारे भीतर इनका निवास नाभि चक्र के ऊपर और शरीर के निचले भाग में है ।
साधारणतः चारों कुमार पूर्णतः शांत रहते हैं । मात्र तीसरे और चौथे कुमार ने ही लोगों को विशेष समय में शिक्षा दी है । सनत कुमार ने सम्राट पृथु को शिष्यत्व के मार्ग की शिक्षा दी थी । 5000 वर्ष पूर्व सनत सुजात ने कृष्ण के आने की तैयारी में सहयोग किया था । तथा दृष्टिहीन राजा धृतराष्ट्र को मृत्यु और अमृत्व के रहस्य बताये थे । उन्होंने कहा - मृत्यु चेतना के बीच का अंतराल है । उस समय सनत कुमार कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्मे थे ।
1 अन्य प्रणाली के अनुसार - सनत कुमार तीसरे कुमार हैं । और वो कर्म के तल पर राज करते हैं । जबकि तीसरे कुमार मन पर राज करते हैं । पांचवे कुमार, नारद, सर्वश्रेष्ठ शिक्षक और संदेशवाहक हैं । जो कि सुगमता से सृष्टि के सातों तलों में विचरण करते रहते हैं । ये वह प्रज्ञा शक्ति है । जो हमें वस्तुओं की तुलना करने की क्षमता प्रदान करती है । इसीलिए इन्हें झगडा कराने वाला भी कहा जाता है । इनके आशीर्वाद से ही हममें जानने की लालसा उत्पन्न होती है । कुमारों की सुरक्षा और प्रकाश से हम सुरक्षित रूप से ऊर्ध्वगति करते हैं ।
सिद्ध - पौराणिक ज्ञान हमें बताता है कि पहले के समय में हमारी धरती मात्र आधी ही थी । जिसका 1 ही ध्रुव हुआ करता था । उस समय धरती एक स्थूल न होकर सूक्ष्म रूप में थी । जिसका उत्तरी ध्रुव सूर्य की ओर उन्मुख था । दक्षिणी ध्रुव अभी बना नहीं था । और न ही पृथ्वी का कोई स्थूल भौतिक रूप था । बाद में पृथ्वी सघन हुई । वह थाल रूप से बदल कर गोलाकार हुई । दक्षिणी ध्रुव बना । और पहले से ही अस्तित्व मे रहा उत्तरी ध्रुव अपनी स्थिति से 90 अंश खिसक गया । धरती का वह क्षेत्र जो उस समय का उत्तरी ध्रुव था । और सूर्य की ओर उन्मुख था । वह अब हिमालय है । वर्तमान उत्तरी ध्रुव अब ध्रुव तारे की ओर इंगित करता है । मानव जाति के प्रारम्भिक 2 वंश तब भी स्वर्ग में ही रहे । और उनका रूप सूक्ष्म ( आकाशीय तत्व प्रधान ) था । उनमें तब मन नहीं था । पर तब भी वे सूक्ष्म आकाश में स्वप्नावस्था जैसी स्थिति में अस्तित्व में थे । उस समय मात्र 10 राशियाँ थीं । कन्या और वृश्चिक मिलकर 1 चिन्ह बनाते थे । तुला, जो कि 1 प्रतीक है । सघन भौतिक अभिव्यक्ति का । तब अस्तित्व में नहीं था । मानव जाति का तीसरा वंश भौतिक शरीर के साथ अवतरित होने लगा । और तुला राशि का प्राकट्य हुआ । तीसरे वंश के मध्य समय में लिंग ( स्त्री पुरुष ) विलग हुये ।
उस समय 1 विशिष्ट इच्छा और तेज का समूह, सिद्ध, शुक्र गृह से धरती पर आया । धरती और उसके वासियों के क्रमिक विकास मे सहायता करने के लिए । यह समूह सनत कुमार के नेतृत्व में था । जो कि शुक्र गृह से नीचे आए थे । शुक्र को धरती की बड़ी बहन कहा जाता है । वह हमारे गृह की श्रेष्ठ आकाशीय ( तेज वाहक तत्व ) प्रतिरूप है । बाद में इस समूह के कुछ लोग वापस शुक्र गृह चले गए । लेकिन कुछ यहीं रह गए । उनमें से 1 सनत कुमार भी थे । वर्तमान समय में हमारे गृह पर मात्र 24 सिद्ध ही हैं । सिद्ध का अर्थ ऐसे लोगों से है । जो पारंगत हैं । जिनका शरीर उत्तम, तेज रूपी है ।
अवश्य ही समय समय पर शुक्र से बुद्धिजीवी हमारे ग्रह पर हमें आवश्यक प्रेरणा देने आते रहते हैं । गुरु एक्कीरला कृष्णमाचार्य कभी कभी लोगों को मध्य रात्रि मे उठा दिया करते थे । और उन्हें अपने साथ ध्यान में बैठने के लिए कहते थे । ध्यान 2-3 घंटे का हुआ करता था । पूर्ण शांति में । 1 सुबह जब उनसे पूछा गया । तब उन्होंने अपने साथियों को बताया - कुछ महान जीव हमारे ग्रह पर उतर रहे हैं । चंद्रमा की किरणों के माध्यम से । वे शुक्र गृह के वासी हैं । वे मानव जाति के उत्थान में साथ देने तथा हमारी दिव्य योजना में हमारी सहायता करने के लिए आ रहे हैं । अनुयाई उनका पूरे सम्मान के साथ स्वागत कर रहे हैं । मैं तुम्हें चुनता हूँ । जागृत करने के लिए । क्योंकि मैं नहीं चाहता कि ऐसे विशिष्ट समय में तुम सब सोते रहो ।
ग्रहीय सत्ता - सनत कुमार को इस धरती का सर्वश्रेष्ठ जीव ( अस्तित्व ) और सबसे प्राचीन माना जाता है । इसीलिए उन्हें धरती का सम्राट भी कहा जाता है । उन्हें " मूक प्रेक्षक " तथा " विश्व का राजा " भी कहा जाता है । सनत कुमार आद्यरूप हैं । धरती पर स्वर्गीय मनुष्य की छवि की भांति । बाइबल मे उन्हें " दिनों का प्राचीन " कहा गया है । " प्राचीनों में से एक " सीधा प्रतिबिंब है - पृथ्वी की जीवन्त सत्ता का । यह (  प्राचीनों में से 1 ) सनत कुमार को ठीक उसी प्रकार से प्रयोग में लेता है । जिस प्रकार से आत्मा 1 व्यक्तित्व को प्रयोग में लेती है । वह ( प्राचीनों में से 1 ) सनत कूमार के रूप में अवतरित होता है । इसलिए सनत कुमार वह सम्बद्ध शक्ति है । जो इस ग्रह पर सभी क्रमिक विकास के बीच में रहती है । स्वांस लेती है । और कार्य करती है । यह सत्ता अपनी आभा में और अपने प्रेरक चुम्बकत्व के आवरण में सभी को साथ रखती है । जिससे सभी 1 सम्बद्ध शक्ति से साथ काम करें । इस सत्ता में हम रहते हैं । चलते हैं । और इसी में हमारा अस्तित्व है । और कोई भी । कोई भी इसकी आभा के पार नहीं जा सकता ।
सनत कुमार ने सर्वश्रेष्ठ पद की प्रतिष्ठा को ठुकरा दिया । मानव जाति का विकास करने के लिए । यह 1 ऐसा कृत्य है । जो कि उस मानव पर कृपा समान है । जिसे नहीं पता कि कैसे जीवन जीना है । कैसे आत्म साक्षात्कार करना है ? और दिव्य के पड़ावों पर कैसे चढ़ना हैं । सनत कुमार और उनका सहयोगी दल मनुष्यों को मार्ग दिखाता है । उन्हें सर्वोच्च शिक्षक माना जाता है । जो कि ऊंचे लोकों के द्वार हमेशा खोले रखते हैं । ये उन द्वारों पर खड़े रहते हैं । पर स्वयं उन द्वारों से जाने से मना करते हैं । जिससे कि ये अन्यों की सहायता कर सकें । उस स्तर तक पहुँचने के लिए । इसलिए वे एक मात्र दीक्षक हैं । हमारे संस्कारों के आचार्य ।
शम्भाला और चिंतामणि - सनत कुमार का धरती पर उतरना 1 महान बलिदान समझा जाता है । जिसे उन्होंने अपने परमात्मा से प्रेम के कारण बिना किसी स्वार्थ के किया । वो इतने शुद्ध और विशिष्ट हैं कि वो स्थूल भौतिक तल पर नहीं उतर सकते । लेकिन वो उससे ऊपर के सूक्ष्म स्तर पर आकर रुके । जो कि पृथ्वी को घेरे हुए है । वो 1 ऐसे स्थान पर रहते हैं । जो मंगोलिया में गोबी रेगिस्तान के पास सूक्ष्म आकाशीय तल पर है । जिसका नाम है - शम्भाला । यह स्थान साधारण व्यक्तियों के लिए अदृश्य है । पर यह उन्हें दिखता है । जिन्हें सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त है । वहाँ से ये गुरुओं के श्वेत स्थान की अध्यक्षता करते हैं । और अपने हाथ में अंदरूनी सत्ता का शासन थामे रहते हैं । वे इस ग्रह पर मनुष्यों और देवताओं के विकास को देखते हैं ।
सनत कुमार चिंतामणि ( जो कि आकाशीय उत्पत्ति का पारस पत्थर है ) की रक्षा करने वाली आत्मा हैं । हम सनत कुमार और शम्भाला में विद्यमान शक्ति का विचार कर सकते हैं । अपनी आँखे बंद करके । आज्ञा चक्र से जुड़कर । गोबी रेगिस्तान के विषय में सोचें । और उसमें छुपे अदृश्य आश्रम के विषय में । आश्रम में ही सनत कुमार हैं । और सनत कुमार के ही मस्तक पर चिंतामणि रत्न शोभित है । कभी इसे अनुक्रम को दे दिया जाता है । पर सामान्यतः यह शम्भाला में ही रहता है । यह शीश के केंद्र में स्थिति सहस्त्र कमल दल के रत्न के समान है - ओम मणि पद्मे हूँ । सामान्य रूप से फिर भी यह रत्न मनुष्य में निष्क्रिय रहता है । ऐसा कहा जाता है कि - गंगा, सूक्ष्म आकाशीय शक्तियों का बहाव, चिंतामणि के ग्रह में स्थित रहती है । और वही से यह बृह्मांडीय अवस्था से धरती पर उतरती है । चिंतामणि पृथ्वी पर अस्तित्व की शुद्धतम अवस्था है । चेतना का प्रकाशमान रत्न । हमारे मस्तक से परे । वहाँ से ये हीरे रुपी चेतना हमारे मस्तक में प्रवेश करती है । और अगर हमें इसका अनुभव हो जाता है । तब हम " योजना " को समझ जाते हैं ।  यह चेतना जैसे जैसे नीचे उतरती है । वैसे वैसे ही यह और स्थूल सांसारिक होती चली जाती है । और शुद्ध चेतना लुप्त हो जाती है \
शम्भाला इस गृह पर संश्लेषण का केंद्र है । एकता का केंद्र । जिसे अनुक्रम कहा जाता है । महान गुरुओं और प्रवीणों के साथ । मानव जाति अनेकता का प्रतिनिधित्व करती है । धीरे धीरे यह एकता की और बढ़ना सीख रही है - आत्मा की ओर । हमारे अन्दर जो सहस्त्र कमल दल है । वही संश्लेषण का आधार है । उसका संस्कृत नाम संश्लेषण का मंत्र है - सहस्रार ।
हम पुस्तकों से नाम तो जान सकते हैं । पर आवश्यक यह है कि हम उस जानकारी का प्रयोगात्मक अनुभव करें । जिससे वह हमारे लिए वास्तविकता बने । अन्यथा हम बड़ी सरलता से इस भ्रम में आ जायेंगे कि हमने सनत कुमार या अन्य किसी महान चेनता के साथ के साथ संपर्क किया । अगर हमने संपर्क किया है । तब हम कुछ कहेंगे नहीं । हम सनत कुमार से मात्र तभी संपर्क कर सकते हैं । जब हम सहस्रार में रह रहे हों । ऐसा कहा जाता है कि जब हम सातवें तल के प्रथम उपतल पर हों । तब हम स्वामी के चरण छू सकते हैं । अन्यथा हम मात्र उनकी पूजा और आवाहन ही करते रहेंगे ।

18 अक्तूबर 2013

what will happen in the coming 4 month

For the past 3-4 months whenever I thought about writing something I had a feeling that it’s all worthless now. But I had conversations with our disciples on this subject. Actually, I had this eerie feeling, like the one before a storm. Today, this widely discussed comet was perceived by me almost two months ago, and it is evident from my writings as well. I never wanted to share these facts. But I became uncomfortable from the inside and decided to share with you as per my memory.

There was a Greek deity in ancient Rome named Nicolas who wanted to rule the world. But he was beheaded by deceit. This Nicolas is ruling America for the past three generations. The same forces are ruling India for the past seven generations. And the most discussed woman of India is his dowager. The third floor of a castle on an unknown Island is the center from where the entire actions are planned and governed. The demonic nature prevalent in today’s world is a result of vindictive spirit. Kindly don’t observe and relate the above facts directly to the people in power today but keep in mind that that forces like these uses human medium to work indirectly in a subtle manner. This brings us to the conclusion that America and India are still ruled by the same force.

Probably the earth will be divided into four regions for a war like situation. The northern region, the western region, the southern region, and America.  This means that the eastern region will be away from all this, which one? I don’t know.

Starting form tomorrow the rotation of the earth’s core will decrease gradually and finally come to a halt. I don’t know much regarding this but as far as I know this rotation gives the earth its magnetic field which protects us from the solar radiations. Whatever, all I know is this rotation will come to a halt.

I won’t be able to explain some things because of rules but because of some reason there will be an extreme amount of energy produced in the sea which will create a waterfall (Cyclone?, High tides?). The results for which can be guessed by anyone.

Kenya, Armenia, Azerbaijan, Tiruvat, Namibia among the specially affected regions.

Four major epidemics will spread planet wide. These are: Cholera, hepatitis B, Disease due to blood contamination, and dengue.

These events are powered by mars and Saturn as these planets support war and epidemics. And the upcoming comet has crossed mars very closely. According to our knowledge this comet is actually a great-demon who is sent upon earth and it has landed here in its non physical form.

MAHA RAAHU has also arrived and will take half the earth in its possession. In fact this has already been done.

Considering the near apocalyptic situation of the present the earth is divided into two hemispheres.The northern and the southern hemisphere. Out of these; all the coastal countries of the southern hemisphere will be affected. This affect will reach its extent up to Myanmar.

The water joints of Andaman and Nicobar islands will break. This means two big water stream that combined at some point in time near these island will be separated again. The effects of which can be guessed by you.

The fact that attracted me the most was, the changes for new civilization will be governed supernaturally rather than naturally. This can be explained as: the remaining people on earth will forget what happened to the earth and in what condition it was in prior to the incident. The estimated age of earth, the age of civilization etc are known to us only on the basis of our memory. The collective human consciousness in interconnected together in a similar manner to that of a computer network, the control to which is in the hands of an administrator. If the administrator decides to create a new connection or execute a new program he can very well do so destroying the old network or program in the process. That is the exact reason why human is considered merely a puppet in spiritualism.

उमा दारु जोषित की नाई । सबै नचावत राम गुसाईं ।

There have been significant changes in the position of earth like the axis shift etc. In fact the earth is made to float in water. (This is a spiritual matter and can never be understood on the basis of science) The reasons you look at, as per the rules of physics are governed under the law and order of spiritualism. For instance an event occurring due to some reason at any given time based on certain mathematics in the natural world can be describes as a role change in the spiritual world and the sudden change of equation reverts back according to the natural laws. All this gets unnoticed in the physical world. This means whatever is operation at a subtle level is unnoticed by human understanding.  But is you know the difference between the physical and the subtle then everything occurs according to the rules of the subtle.

This new age will have no place for beings with disabilities whether it is in the body of a human or an animal. This means all these will come to an end.

The initiation for a new civilization and Dharma in India has begun. This new age will have only one global civilization and that will be Sanatana Dharma if the Hindus consider their religion as the Sanatana Dharma then they are totally wrong.

Considering India only, I can Say that India will be surrounded by flames but the other points regarding this are still unclear.

Explosion in Manipur.

Fire in Imphal.

Rewa in Madhya Pradesh and Madhya Pradesh itself will be highly affected; Satpura and Kehar will lie in the specially affected zones.

North-western part of Gujarat will face drought. Rest regions will face fire, plague. This affect of this plague will spread up to Uttar Pradesh as well.

The core of the earth will come to a stop.

Smoke from nuclear reactor.

The rise of new civilization from 9th October 2013.

Destruction from a huge rocket. Nature and Technology devastated.

Heavy snowfall in Atlanta.

Destruction in Myanmar.

Huge loss in Rewa, Madhya Pradesh due to famine, clouds and fire.

Heavy waterfall in Uruguay.

The above mentioned rulers for the past three and seven generations in America and India respectively will be the final from their dynasty.

Disjunction of water in Andaman.

Waterfall (Cyclone, High tides?) in Nicaragua. Not sure but the entire place will not be destroyed.

This is certain that the earth will suffer major changes in its physical appearance during this duration i.e. the places for land and the sea will have to be remapped.

The eastern region of Kenya (Tiruvat) will suffer from atomic explosion.

High probability of a huge explosion on 13th august.

Comet ISON is actually the great-devil whose tail is broken and he has landed upon earth, MAHA RAAHU mentioned earlier is probably going to help him in this destruction.

Portugal will suffer from destruction by water.

Huge flames will rise up from the Ocean, exact reason unknown but the oil carrying ships creates a probability or a new oil source can emerge from the ocean.

Huge destruction by a meteorite.

The wind direction in the southern hemisphere will reverse. This is the most important fact. If you do a scientific analysis on this the results will be devastating.

Sri Lanka will be destroyed. Only a small island will be in the vicinity of India.

India will be surrounded by flames. Half of the population will be destroyed. Huge waterfall (Cyclone?) in southern hemisphere.

The shadow of the MAHA RAAHU will cover half of the earth dividing it into two parts (not physically).

Madhya Pradesh will suffer from drought, Clouds and devastation from fire.

Note: There is more important fact that will be added to this post later. You are in no way forced to believe these points to be the truth they are solely given to stimulate your thinking. We do our work with a sense of duty.   

15 अक्तूबर 2013

धर्म और सम्प्रदाय में क्या अन्तर है

क्या होता है - धर्म ? और क्या अन्तर है - धर्म और सम्प्रदाय में ? धर्म " धृ " धातु से निष्पन्न है । जिसका सरल अर्थ - धारण करना है । अर्थात जिनसे लोक, परलोक, स्वास्थ्य, समाज, आदि का धारण होता है । वे सभी धर्म के अन्तर्गत समाहित होते हैं । इसीलिये धर्म या धार्मिक मूल्यों के अन्तर्गत शिष्टाचार के मापदण्ड, नैतिक नियम, लौकिक नियम, शरीर के प्रति धर्म, समाज के प्रति धर्म, अन्य प्राणियों के प्रति धर्म यहाँ तक कि पेड़ पौधे आदि वनस्पति जगत के प्रति भी धर्म के रूप में नियमों की वृहद व्याख्यायें मिलती हैं । धर्म इस शब्द की आयु ऋग्वेद से लेकर आज तक लगभग 4 000 वर्षों की है । प्रथमतः ऋग्वेद में इसका दर्शन 1 नवजात शिशु के समान होता है । जो अस्तित्व में आने के लिये हाथ पैर फैलाता जान पड़ता है । वहाँ यह " ऋत " के रूप में दृष्टिगत होता है । जो सृष्टि के अखण्ड देश काल व्यापी नियमों हेतु प्रयुक्त हुआ । वैदिक मन्त्रों का वर्गीकरण 4 संहिताओं में करने वाले वेद व्यास के अनुसार प्रकृति के साथ साथ व्यक्ति, राष्ट्र एवं लोक परलोक सबको धारण 

करने का शाश्वत नियम धर्म है । 
धारणाद्धर्म इत्याहुधर्मों धारयते प्रजाः । यतस्याद्धारण संयुक्तं स धर्म इति निश्चयः। 1
वैदिक ऋषियों से लेकर वेद व्यास जैसे महाभारतकार एवं चाणक्य जैसे कूटनीतिज्ञ भी मानव की उन्नति एवं समाज की सम्यक गति का कारण धर्म को ही मानते हैं । धर्म शब्द धृ धातु ( ध ×ा धारणे ) से बना है । जिसका तात्पर्य है - धारण करना । आलम्बन देना । पालन करना । धर्म सम्पूर्ण जगत को धारण करता है । सबका पालन पोषण करता है । और सबको अवलम्बन देता है । इसलिये सम्पूर्ण जगत एकमात्र धर्म के ही बल पर सुस्थिर है । धृ धातु से बने धर्म का अर्थ वृष भी है - वर्षति अभीष्टान कामान इति वृषः । 3 अर्थात प्राणियों की

सुख शान्ति के लिए उनके अभिलाषित पदार्थों की जो वृष्टि करे । तो दूसरी ओर धर्म का नाम पुण्य भी है - पुनाति इति पुण्यम । यानी जो प्राणियों के मन बुद्धि इन्द्रियों एवं कर्म को पवित्र कर दे । मनु के अनुसार धर्म के 10 लक्षण है ।
धृतिक्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिनिन्द्रिय निग्रहः । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम । 4 भारतीय मनीषियों की मान्यता रही है कि यह संसार नैतिक नियमों के अधीन है । और जीवन मनुष्य को नैतिक चुनाव का ही अवसर प्रदान करता है । शायद इसीलिए उन्होंने धर्म अथवा नैतिकता को अर्थशास्त्र का मूल आधार घोषित किया था । किन्तु इसका यह मंतव्य कतई नहीं है कि वे मनुष्य के जीवन में अर्थ के महत्व को स्वीकार ही नहीं करते थे । वे जिस बात पर जोर देते थे । वह यह है कि 

अर्थ ( धन ) का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान होते हुए भी यह जीवन का साधन है । साध्य नहीं । यह जीवन का 1 भाग है । संपूर्ण जीवन नहीं । यह 4 पुरुषार्थों में से केवल 1 पुरुषार्थ है । अत: वे अर्थ के उचित समन्वय पर जोर देते थे । किन्तु यदि कभी अर्थशास्त्र के नियमों एवं धर्मशास्त्र के नियमों में विरोध उत्पन्न हो जाए । तो नि:संकोच रूप से धर्मशास्त्र के नियमों को ही प्राथमिकता देनी चाहिए । इस संबंध में कौटिल्य, याज्ञवल्क्य, नारद आदि ने स्पष्ट रूप से घोषणा की थी कि - अर्थशास्त्रास्तु बलवद्धर्मशास्त्रामिति स्थिति:  ( कौटिल्य । नारद 39, याज्ञ 11.21) । यही कारण था कि भारतीय चिंतन में अर्थ को धर्म की तुलना में द्वितीय स्थान दिया गया था । 4 पुरुषार्थों के क्रम में धर्म के बाद ही अर्थ का स्थान इस बात का प्रमाण है । महाभारत के शांति पर्व में नकुल व सहदेव ने धन और धर्म के बीच बहुत ही सुन्दर समन्वय का प्रतिपादन करते हुए कहा है कि - धर्म युक्त धन और धन युक्त धर्म ही संसार में अच्छे परिणाम ला सकता है । इस प्रकार भारतीय चिंतक एडम स्मिथ की तरह अर्थशास्त्र को केवल " धन का विज्ञान " स्वीकार नहीं करते । हिन्दू चिंतन के अनुसार अर्थशास्त्र को धर्मशास्त्र के नियमों व मर्यादाओं के प्रकाश में ही काम करना चाहिए । जब कभी भी इस नियम का उल्लंघन हुआ । तब समाज को कष्ट उठाने पड़े । यहाँ 1 बात जो विशेष रूप से ध्यान देने की है । वह यह है कि प्राचीन भारतीय मनीषियों ने अपने विचारों को व्यावहारिक रूप देने के लिए उस समय की सामाजिक संरचना में ऐसी संस्थाओं एवं व्यवस्थाओं का विकास किया । जिनके माध्यम से नैतिक मूल्यों एवं सामाजिक आदर्शों के अनुरूप व्यवहार

करना । व्यक्ति की रोजमर्रा की दिनचर्या का अभिन्न अंग बन जाए । इस दृष्टि से हम 4 पुरुषार्थों की कल्पना, वर्णाश्रम व्यवस्था, संयुक्त परिवार प्रणाली, शिक्षा की गुरुकुल प्रणाली, पंच महायज्ञ व अन्य विभिन्न प्रकार के यज्ञ, दान, दक्षिणा, इष्टापूर्त, सर्व व्यापक बृह्म की अवधारणा, पुनर्जन्म, कर्मफल, प्रकृति के प्रति जननी भाव, दया, परोपकार, परहित एवं त्याग जैसे गुणों को महत्व, स्नेह, सहयोग, शुचिता, सात्विकता, सहभागिता एवं सर्व कल्याण की भावना पर जोर आदि भारतीय जीवन की विषेषताओं को देख सकते हैं । इस प्रकार प्राचीन चिंतन हमें उन सामाजिक नैतिक मूल्यों की याद दिलाता है । जिनके आधार पर युगानुकूल नवीन सामाजिक आर्थिक संरचना 

की जानी चाहिए । इसके अनुसार - संग्रह की बजाय त्याग । स्वार्थ की बजाय सेवा । शोषण की बजाय पोषण । संघर्ष की बजाय सहयोग । घृणा की बजाय स्नेह । संपत्ति पर पूर्ण निजी या सरकारी स्वामित्व की बजाय ईश्वर स्वामित्व - इस नयी अर्थ रचना के आधार सूत्र हो सकते हैं । धार्मिकता एवं साम्प्रदायिकता का अन्तर - आईये सबसे गरमागरम विषय के सबसे जलते शब्द " धर्म " को उठाते हैं । पता नहीं हमारे महान देश भारतवर्ष के तथाकथित महान प्रबुद्ध लोग धर्म शब्द से इतना डरते क्यों हैं ? मैं तो यही समझ पाया हूँ कि देश के अधिकांश महान प्रबुद्ध लोगों ने धर्म के बारे में अंग्रेजी भाषा के " रिलीजन " के माध्यम से ही जाना है । न कि धर्म को धर्म के माध्यम से । यही कारण है कि वे धर्म को " सम्प्रदाय " के पर्यायवाची के रूप में ही जानते हैं । जबकि सम्प्रदाय धर्म का 1 उपपाद तो हो सकता है । पर मुख्य धर्म रूप नही । धर्म प्राकृतिक सनातन एवं शाश्वत तथा स्व प्रस्फुटित ( या स्व स्फूर्त ) होता है । इसे कोई प्रतिपादित एवं संस्थापित नही करता है । जबकि सम्प्रदाय किसी द्वारा प्रतिपादित तथा संस्थापित किया जाता है । आखिर धर्म ही क्यों ? संस्कृत व्याकरण के नियम " निरुक्ति " के अनुसार धर्म शब्द की व्युत्पत्ति " धृ " धातु से हुयी है । निरुक्ति के अनुसार जिसका अर्थ है - धारण करना ( मेरे अनुसार धारित या धारणीय है । अथवा धारण करने योग्य होता है ) । क्योंकि पृथ्वी हमें धारण करती है । और इसी कारण से इसे धरणी कहते हैं । अतः स्पष्ट है - धर्म का अर्थ भी धारण करना ही होगा । इसे इस प्रकार समझें " धृ + मम = धर्म '' धारण करना है । तो हमें धर्म के रूप में क्या धारण करना है ? आपको धारण करना है - अपने कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व या' फ़रायज़ और जिम्मेदारियां या ड्यूटीज एंड रेसपोंसबिलटीज ( लायेबिलटीज ) धार्मिक व्यक्ति सदैव 1 अच्छा सामाजिक नागरिक होता है । क्योंकि वह धर्म भीरु होता है । और 1 धर्म भीरु व्यक्ति सदैव सामाजिक व्यवस्था के प्रति भी भीरु अर्थात प्रतिबद्ध ही होगा । परन्तु 1 सम्प्रदायिक व्यक्ति रूढ़वादी होने के कारण केवल अपने सम्प्रदाय के प्रति ही प्रतिबद्ध होता है । इसलिए मेरी दृष्टि में धार्मिक होना । सम्प्रदायिक होने की अपेक्षा 1 अच्छी बात है । अभी तक मैंने 2 ही तथ्य कहे हैं - धर्म प्राकृतिक होता ही  । जबकि सम्प्रदाय संस्थापित एवं प्रतिपादित होता है । 2 सम्प्रदायिक होने की अपेक्षा धार्मिक होना ही उचित होगा । भारत के परिपेक्ष में संप्रदाय के अलावा 1 शब्द ' पंथ ' भी प्रयोग में आता है । पंथ शब्द का अर्थ - पथ/राह/रास्ता/दिशा होता है । सम्प्रदाय एवं पंथ दोनों का भाव व उद्देश्य 1 ही होता है । परन्तु पन्थ में मुझे सम्प्रदाय की अपेक्षा गतिशीलता अनुभव होती है । मैं शब्दों के हेर फेर से फ़िर से दोहरा रहा हूँ - धर्मों को कोई उत्पन्न नही करता । वे प्राकृतिक हैं । उनकी स्थापना स्वयं प्रकृति करती है । जबकि सम्प्रदाय के द्वारा हममें से ही कोई महा मानव आगे आकर कुछ नियम निर्धारित करता है । यहाँ तक कि पूजा पद्धति भी उसमें आ जाती है । हर युग में कोई युग दृष्टा महा मानव पीर औलिया रब्बी मसीहा या पैगम्बर के रूप में सामने आता है । अथवा दूसरे शब्दों में कहें । तो प्रकृति द्वारा चुना जाता है । जो देश क्षेत्र एवं युग काल विशेष की परिस्थियों की आवश्यकताओं के परिपेक्ष्य में मानव समाज के समुदायों को उन्ही के हित में आपस में बांधे रखने के लिए एवं सामाजिक व्यवस्था को व्यवस्थित रखते हुए चलाने के लिए । जीवन के हर व्यवहारिक क्षेत्र के प्रत्येक सन्दर्भों में समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए । समाज व एक दूसरों के प्रति कुछ उत्तर दायित्व एवं कर्तव्य निर्धारित करता है । उनके परिपालन के लिए कुछ नियम प्रतिपादित करता है । और समान रूप से एक दूसरे के प्रति प्रतिबद्धता के समान नियमों को स्वीकार करने एवं उनका परिपालन करने वाले समुदाय को ही एक '' सम्प्रदाय '' कह सकते हैं । सम्प्रदाय के निर्धारित नियम व सिद्धांत किसी न किसी रूप में लिपि बद्ध या वचन बद्ध होते हैं । देश काल एवं समाज की चाहे कैसी भी कितनी ही बाध्यकारी परिस्थितियाँ क्यों न हों । उन नियमों में कोई भी परिवर्तन या संशोधन अमान्य होता है । यहाँ पर ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि जो नियम देश युग काल के सापेक्ष निर्धारित किए गए थे । वे यदि परिस्थितयों युग काल के बदलने के साथ साथ नई परिस्थितियों एवं युग काल के परिपेक्ष्य में यदि संशोधित तथा परिवर्तित नही किए जाते । तो वह रूढ़वादिता को जन्म देते हैं । और रूढ़वादिता के गर्भ से ही साम्प्रदायिकता जन्म लेती है । जय श्री राम । साभार - चक्रपाणि त्रिपाठी ।
https://www.facebook.com/babloo.tripathi

11 अक्तूबर 2013

क्या करूँ ? मैं भटकी हुई सी हूँ

मैंने ब्लाग शुरू करते समय ही इस बात का जिक्र किया था कि आज विश्व में जिस कदर योग ध्यान लोकप्रिय है । और लोग मनमाने तरीके से योग अभ्यास कर रहे हैं । करवा रहे हैं । वह उन्हें शुरूआती लाभ आकर्षण के बाद मौत के मुँह में ले जायेगा । हमें ऐसे ही लोगों से निरन्तर मिलना होता रहता है । ऐसे ही एक विदेशी महिला का सन्देश ।
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- मेरी कुण्डलिनी जागृत हो रही है । इसके बारे में कोई सुझाव ? मैं इसका क्या करूँ ? मैं भटकी हुई सी हूँ ।
- निश्चित ही इसकी शुरूआती अवस्था में हूँ । मुझे इसका बहाव 24 घंटे महसूस होता है । मैं हर तरह की उर्जाओं को पकडती हूँ । और मुझे अलग अलग चीजें दिखाई देती हैं । 1 सुबह मैं उठकर अपने चक्रों को पढ़ रही थी । यह मेरे लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं । पर इसकी आदत डालनी पड़ती है । यह बहुत रोमांचक है । और कभी कभी बहुत तनाव पूर्ण हो जाता है । मुझे मेरे स्पिरिट गाइड ( Spirit Guide ) से भी निर्देश मिलते रहते हैं ।
- अभी वह ( कुंडलिनी ) मुझसे आराम करने और अपने शरीर को स्वस्थ रखने को कह रही है ।
- मैं विशेष रूप से 1 व्यक्ति से जुडी हुई हूँ । जिससे मैं प्रेम करती हूँ । मैं उसके उर्जा में आये परिवर्तन को जान लेती हूँ । भले ही वह दूसरे प्रदेश में क्यों न हो । यदि मैं बीमार होती हूँ । तो वह जान जाता है । और यदि वह बीमार पड़ता है । तो मैं जान जाती हूँ । मुझे नहीं लगता कि उसकी

भी कुण्डलिनी सक्रिय है । परन्तु मैं विशेष रूप से इसी व्यक्ति से ही क्यों जुड़ी हुई हूँ ?
- मेरी कुण्डलिनी रीढ़ पर बढ़ती 1 गर्मी के सामान महसूस होती है । इसके चलते मुझे कभी कभी पीठ से सम्बंधित समस्या भी हो जाती हैं । यह मेरे पीठ के निचले हिस्से से शुरू हुयी थी । और अभी यह मध्य तक जा पहुंची है । 1 सतगुरु खोजने के मामले में मैं अनिच्छुक हूँ । जहाँ तक मुझे पता है । कुण्डलिनी का अनुभव हर 1 के लिए अलग होता है । मुझे ऐसे लोगों के बारे में पहले ही चेतावनी दे दी गयी है । जो मुझे इस्तेमाल कर सकते हैं । झूठे या फिर पागल भी हो सकते हैं । इसीलिए मैं गुरु के बारे में निश्चित तौर पर कुछ कह नहीं सकती । परन्तु मैं इस विषय के प्रति खुले विचार रखती हूँ । Mayra Coria Luna
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आपकी कुण्डलिनी निश्चय ही जाग्रत हो रही है । बल्कि हो चुकी है । रीढ के सबसे निचले हिस्से में नितम्बों की

तरफ़ यदि आपको हल्का सा गुनगुना गर्म एक तरल पदार्थ या घना वाष्प सा ऊपर उठता महसूस होता है । ये कुण्डलिनी के जाग्रत होकर कृमश ऊपर चलने की ही पहचान है । इसकी सक्रियता के समय शरीर में किसी तनी हुयी स्प्रिंग जैसा तनाव महसूस होता है । अगर ये चक्रीय ध्यान विधि से या किसी मन्त्र तन्त्र या कङे ध्यान अभ्यास से जाग्रत की जाये । तो ये एक तरह का हठ योग हो जाता है । जबकि एक समर्थ गुरु का हम पर हाथ न हो । और उसका मार्गदर्शन भी न हो । क्योंकि कुण्डलिनी जाग्रत होना और तीसरी आँख खुलना इन दोनों का साथ है । अतः आपको अदृश्य चीजें दिखने लगी । यह कोई आश्चर्य नहीं है । हाँ यह रोमांचक ही होता है । पर उसी तरह खतरनाक भी । जैसे आपने कभी प्लेन न उङाया हो । और यकायक कुछ समय के लिये वह आपकी छेङखानी से हठात ही उङ गया हो । लेकिन आपको उसका कोई नियन्त्रण न ज्ञात हो । तब वह प्लेन दुर्घटना ग्रस्त ही होगा । क्योंकि इसमें सामान्य मनुष्य के तुलना में एक अदभुत और बङी मात्रा में ऊर्जा पैदा होती है । अतः इसमें कामुक भावों की प्रधानता और इच्छा तीवृ होती है । लेकिन इससे बहुत दूर रहना चाहिये । क्योंकि यहाँ दुष्ट शक्तियां आपकी शक्ति क्षीण कर आपको भटका कर मार भी डालती हैं । हाँ ! कुण्डलिनी जागरण की अवस्था में यदि हम किसी व्यक्ति या स्थान या पदार्थ से भी जुङे हैं । तो उसके रहस्य हमें पता होने लगते हैं । आप सतगुरु खोजो । या न खोजो । पर क्या आपकी समस्या का हल आपके या किसी के पास है । तब आप क्या करेंगी ? मैं कोई दबाव नहीं दूँगा । पर यह अच्छा होने के बजाय एक गम्भीर स्थिति है । जिससे आप निश्चय खतरे में हैं । हो सकता है । आपको ये अनोखा लग रहा हो । पर हमारे लिये ऐसे व्यक्तियों से मिलना आम बात ही है । क्योंकि दुनियां में गलत और भृमित सिद्धांत रहित तरीके से ध्यान अभ्यास आदि क्रियाओं का प्रचलन बहुत अधिक हो गया है । अतः आप तेजी से खतरे की तरफ़ जा रही हैं । कृपया आप पूर्व समय निश्चित कर चैट पर बात को ठीक से समझ लें । मैं इतना ही कर सकता हूँ । और गम्भीर स्थिति से बचने हेतु आपको भारत में हमारे यहाँ आना ही होगा ।
https://www.facebook.com/fromquarkstoquasars

लिख गयी है महाविनाश की रूपरेखा

ऊपर के इन सभी तथ्यों का स्रोत मेरे द्वारा है । मेरे ख्याल से यह अधिक विश्वसनीय है ।
- चंद्रमा अपनी कक्षा से दूर चला गया है । 63 अंश । 1 मील ।
- पापुआ, निकरागुआ में जल वृष्टि होगी ।
- निकरागुआ में निकोलस का गढ़ है ।  - चिली और जर्मनी में तबाही । 
- सूरज का 1 हिस्सा टूटेगा । जैसे कोई सेब या तरबूज का 1 हिस्सा नोच लेता है । 
- चन्द्रमा लगातार दूर जा रहा है ।- 2 चंद्रमा पृथ्वी की तरफ आ रहे हैं ।
- परामंडल में 2 अज्ञात ग्रहों की कङी टक्कर होगी ।  ग्रहों की टक्कर से भीषण मात्र में विकिरण फैलेगा ।
- ISON धूमकेतु के अगल बगल घूमने वाले 2 हिस्से उस महादैत्य की टुकड़ी ( सेना ) है । http://truthfrequencyradio.com/video-chinese-space-radar-shows-ison-with-two-objects-incoming/
- प्रलय के अंतिम 3 दिनों के शेष होने पर होगा विस्फोट ।
- सूर्य आधा पूर्ववत स्थिति में ( गर्म ) है । और आधा ठंडा हो गया है ।

- सिलीगुड़ी में बारूद का फैलाव ।  - अमेज़न में बढेगा जलस्तर ।
- लिख गयी है महाविनाश की रूपरेखा । काल ने 3 पन्ने लिख लिए हैं । 5 पन्ने कुल लिखने हैं । चौथा भी लगभग पूर्ण ।  
- सूर्य छिन्न भिन्न हो गया है । - सूर्य में 2 दल काम करते थे । जिनमें से केवल 1 अस्थायी रूप से कार्य कर रहा है । वह भी चला जाएगा ।
- अगले कुछ महीनों में नए सूर्य की नियुक्ति होगी ।
- एटलांटा में भूमिगत प्रस्तर ( पत्थर ) खंड आंदोलित होंगे ।
- न्यूगिनी में जल भराव । - वेनेजुएला में आतंरिक भूकंप । राष्ट्रीय आपदा । - न्यू मेक्सिको की खाङी में जल भराव । 
- .399 की रिक्टर स्केल पर सूक्ष्म जहरीली गैस फैलकर वातावरण को विषाक्त करेगी ।
विशेष - इसका क्या मतलब है । मैं इस पर आपकी जानकारी चाहता हूँ । क्योंकि यही सबसे खास और अहम है । मैं इस पर विस्त्रत खुलासा शीघ्र करूँगा ।
- 10 करोड़ नरक में । - 10 लाख स्वर्ग में । - 70 लाख धरती पर मनुष्य रूप में । - बचे हुए शेष जीव जंतु रूप में ।

- 10 अरब होगी नयी दुनियां में ( मनुष्य नहीं । सिर्फ़ पशु पक्षी आदि ) जीव जन्तुओं की कुल आबादी ।
- 10 करोङ नयी वनस्पतियां देखने को मिलेंगी ।
- पूरे विश्व में 10 नयी मुद्राओं का चलन होगा ।
- अग्निमांध ज्वर । हड्डी तोङ ज्वर का कहर होगा । इसमें हड्डियों के सिरे फट ( चटक ) जाते हैं । और शरीर के अन्दर खून रिसकर फैलता है । यह अकल्पनीय महामारी होगी । यह हर तीसरे व्यक्ति को होगी ।
- ऐल्प्स पर्वत श्रंखला ध्वस्त ।
- सेन डिएगो में भीषण बर्फ़बारी । सेन डियेगो का जमीनी ( आंतरिक हिस्सा ढह जायेगा । या कहिये ढह गया ।
- सूर्य अपनी धुरी से पलटकर 300 डिग्री नीचे आ जाएगा । इसमें नीचे का हिस्सा गर्म । और ऊपर का हिस्सा ठंडा होगा ।
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यहाँ से सभी विवरण नेट का है । जिसका मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं ।
- और अब खोजिये उस निकोलस को । जो इस खेल का असली नायक  सारी खलनायक है । इस बारे में मैं स्पष्ट करने की कोशिश कर रहा हूँ ।
http://en.wikipedia.org/wiki/Nicolaus_of_Damascus
दमस्कस का निकोलस 1 ग्रीक इतिहासकार और दार्शनिक था । जो कि ऑगस्टस के समय मे रोम साम्राज्य मे हुआ । उसका यह नाम उसके जन्म स्थली दमस्कस के नाम पर पड़ा । निकोलस का जन्म लगभग 64 ई॰पू॰ मे हुआ । यह हेरोद महान का करीबी मित्र था । जिसके साथ वह लम्बे समय तक रहा । यह एंटनी और महारानी क्लेओपात्रा के बच्चों का अध्यापक भी रहा । सोफ्रोनियस के अनुसार । निकोलस, हेरोद अरचेलौस के साथ रोम गया । इसने बहुत से लोगों की जीवनी, और इतिहास पर बहुत सी पुस्तकें लिखीं । जिसमें वैश्विक इतिहास की 144 पुस्तकें भी हैं ।
http://en.wikipedia.org/wiki/Saint_Nicholas
संत निकोलस ( जन्म 15 मार्च 270 मृत्यु 6 दिसम्बर 343) को मायरा के निकोलस भी कहा जाता है । ये एक चौथी शताब्दी के एतिहासिक संत और लूसिया में मायरा ( डेमरे, आधुनिक समय का तुर्की ) के पादरी थे । क्योंकि इनके साथ बहुत से चमत्कार जुड़े हुये हैं । इसलिए इन्हे निकोलस द वंडर वर्कर ( Nicholas the wonder-worker ) के नाम से जाना जाता है । ये लोगों को गुप्त रूप से तोहफे भेंट करने के  लिए प्रतिष्ठित थे । जैसे कि अगर कोई इनके लिए जूते छोड़कर जाता । तो ये उनके अंदर सिक्के डाल देते । इस प्रकार से ये आधुनिक समय के सांता क्लाउस के लिए आदर्श रहे ।
http://en.wikipedia.org/wiki/Adolfo_Nicol%C3%A1s
http://www.vaticancrimes.us/2013/03/francis-first-jesuit-pope-facts-you.html
http://warningilluminati.wordpress.com/the-most-powerful-man-in-the-world-the-black-pope/
एडोल्फो निकोलस । जिसे " द ब्लैक पोप " के नाम से जाना जाता है । वर्तमान समय का सर्व शक्तिशाली व्यक्ति है । जिसके नीचे आधुनिक समय की सभी सर्वोच्च संस्थाएं कार्य करती हैं । चाहे वह सयुंक्त राष्ट्र हो । अरब राष्ट्र हो । कोई गुप्त सरकारी संस्था हो । अमेरिका की कोई भी सुरक्षा रक्षा आदि से संबन्धित संस्था हो । ईसाई धार्मिक संस्था हो । या ईसाई पोप ही क्यों न हो । सभी संस्थान इसी ब्लैक पोप के आदेश से ही कार्य करते हैं । इसी ब्लैक पोप को ही सभी प्रकार के षडयंत्रो का सूत्रधार माना जाता है । और इल्लुमिनाटी, जेसूइट्स ऑर्डर आदि षड्यंत्र कारी समूह इसी के आदेश से काम करते हैं ।
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इसी संभावित प्रलय को लेकर कुछ लोगों के द्वारा देखे गए स्वप्न ।
http://www.godlikeproductions.com/forum1/message2356682/pg1
मेरे पिता की मृत्यु 5 माह पूर्व हो गयी थी । पिछली 2 रातों से वह 1 चेतावनी के साथ मेरे सपनो में आते है ।  पहला सपना - मेरे पिता मुझे और मेरे भाई को 1 गाँव के ढाबे पर ले गए । हम वहाँ 1 बूथ में बैठे थे । तभी मेरे पिता आगे की ओर झुक कर बोले - देखो ! मैं तुम दोनों को यह बताना चाहता हूँ कि मैं तुम दोनों पर अपनी नजर रखे हूँ । इसके अलावा अमुक महीने ( महीना अस्पष्ट ) की 24 तारीख को विश्वव्यापी विनाश और युद्ध होगा । तो तुम दोनों अपने परिवार के साथ ही रहना । क्योंकि तुम लोग उस घटना में बच जाओगे ।  
इसके अगली रात सोने से पूर्व मैंने अपने पिता को याद किया । और कहा कि कल आपने जो महीना और घटनाएं मुझे बताई थी । मैं उसे भूल गया हूँ । क्या आज आप दोबारा मेरे सपनों में आकर अपना सन्देश दोहराएंगे ? इसके बाद मैं सोने चला गया । उस रात मुझे फिर से 1 सपना आया । इस बार मैं अपने पिता और माता दोनों के साथ कार से जा रहा था । कार को मेरी माँ चला रहीं थी । और मैं उनके बगल में बैठा हुआ था । 

मेरे पिता पिछली सीट पर बैठे थे । मैंने पीछे मुड़कर अपने पिता से पूछा - तो आप अपना सन्देश दोहराएंगे ? वह मौन रहे । मेरी सिफारिश बेकार रही । ऐसा सोचकर मैं आगे देखने लगा । और तभी मैंने देखा कि समुद्र में किसी लहर की तरह जमीन उठकर हमारी ओर बढ़ी चली आ रही है । जैसे ही वह लहर हमारी कार के पास पहुँची । तो वह हमारी कार को नीचे से उठाती हुई पीछे निकल गई । ठीक वैसे ही जैसे कि कोई समुद्री लहर छोटी नाव के साथ करती है । ऐसी लहरें 1 के बाद 1 आती रहीं । तब मैंने अपने पिता से कहा - यह ज्यादा खतरनाक नहीं लगता । इन छोटी लहरों से कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा कि तभी 1 बड़ी लहर उठी । न्यूयार्क की सबसे बड़ी इमारत जितनी बड़ी । या फिर उससे भी बड़ी । वह किसी बड़ी दीवार की तरह हमारे सामने थी । और उसके साथ था मलबा । भीषण मलबा । जिसमे कई गाड़ियाँ और दूसरी छोटी इमारतें और कई लोग थे । वह लहर सीधा हमारी ओर बढ़ी आ रही थी । और तभी मेरे पिता ने आसपास देखा । और यह सुनिश्चित किया कि कोई सुन तो नहीं रहा है । जैसे वह मुझसे कोई निषिद्ध बात बोलने जा रहे हो । फिर मेरे कान के पास आकर के बोले - इस साल क्रिसमस नहीं होगा । यह कहकर वह अपनी सीट पर चले गए ।
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इसी के नीचे 1 अन्य व्यक्ति की टिप्पणी - 3 रात पहले मुझे भी कुछ ऐसा ही सपना आया था । और यह घटना अमेरिका में हुई थी । ( मैं ऑस्ट्रेलिया का निवासी हूँ । ऐसे में मुझे अमेरिका से सम्बंधित स्वप्न आना काफी अस्वाभाविक हो जाता है । ) इस घटना की जानकारी मुझे मेरी माँ ने दी थी । जो कि 10 साल पहले मर चुकी हैं । मुझे कल रात 1 सपना आया था कि 1 विशालकाय परग्रही द्वारा धरती नष्ट हो रही थी । जो कि शुरुआत में सोता हुआ सा प्रतीत हो रहा था । परन्तु जैसे ही वह हिलता । तो धरती पर भीषण भूकंप आते । मुझे ऐसा आभास भी हुआ कि जल्द ही यह परग्रही में विस्फोट हो जाएगा । इस सपने से मुझे " पसिफ़िक रिम " पिक्चर की याद आ गयी ।
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1 अन्य दूरदृष्टा द्वारा अनुभव की गयी कुछ भविष्य की घटनायें ।
USA के East Coast का सुनामी से विनाश
http://www.godlikeproductions.com/forum1/message2327543/pg1
तारीख 21 अक्टूबर 2013 । 7 करोड़ लोगों की मृत्यु । 2.7 करोड़ घायल या विस्थापित । 2.75 लाख लोग घटना के फलस्वरूप खाना पानी के अभाव में, लूट और दंगों में मारे जायेंगे ।
प्रभावित क्षेत्र - न्यूयार्क । वाशिंगटन डी.सी । बोस्टन । फ़िलेडैल्फ़िया । नोरफ्लोक । विल्मिंगटन । चार्ल्सटन । जैक्सनविल । ऑर्लैंडो । मियामी । 1.5 मील ऊँची सुनामी टेकटोनिक प्लेट्स के पुनः व्यवस्थित होने के कारण धरती पर 35-70 मील तक अन्दर आ जायेंगी ।
नदियाँ बाढ़ के निशान से 20 फ़ुट ऊपर ।
मिसिसिप्पी नदी अपने स्टार से 30 फ़ुट ऊपर ।
अटलांटिक महासागर के तल का 1 हिस्सा उभर कर ऊपर आ जायेगा । जिसके कारण जहाजों के मलबे और नए जमीनी टुकड़े का पटाक्षेप होगा ।
सरकारी और जलसेना के कई 100 जहाज़ अटलांटिक महासागर में पलट जायेंगे । और उनके दल खो जायेंगे ।
नयी तटरेखा और नए भूभागों के कारण अटलांटिक महासागर को नक़्शे पर फिर से चित्रित करना होगा ।
इस सभी की शुरुआत अमेरिका के पूर्वी तट पर 9.6 तीव्रता के 1 भूकंप से होगी । जिससे कि भू-स्खलन प्रारंभ हो जाएगा ।
परिवर्तन से 6 मिनट पूर्व लहरें तटों की तरफ बढेंगी । और 6 मिनट बाद जा टकराएंगी ।
21 मिनट बाद जब लहरों का अन्त होगा । तो अमेरिका का अधिकांश पूर्वी तट और कोई भी तटीय इलाका जो कि समुद्र स्तर से 50 या कम फीट की ऊंचाई पर है । पूर्ण रूप से जलमग्न हो जायेंगे ।
शहरों की इमारतें तिनकों की भांति टूट जायेंगी ।
ठीक 36 घंटों बाद नदियों में बाढ़ अपने शिखर पर होगी ।
सुरक्षित इलाका - मिसिसिप्पी नदी से 100 मील पश्चिम की ओर ।
क्यूबा, बहमास और केरेबियाई टापुओं की श्रृंखला 10 मिनट के भीतर समाप्त हो जायेगी ।
मेक्सिको के हिस्से भी प्रभावित होंगे ।
कनाडा का पूर्वी तट भी भीषण रूप से प्रभावित ।
वर्तमान समय की ये बहुत बड़ी त्रासदी होगी । अटलांटिस की घटना के समतुल्य ।
मुझे अच्छे लोगों को बुरी खबर देने से घृणा है । 
सूर्य अपने चुंबकीय ध्रुव पलटेगा ।
http://www.space.com/22271-sun-magnetic-field-flip.html
सूर्य के ऊपर क्षेत्र ( उत्तरी ध्रुव ) पर भीमकाय छेद ( ठंडा स्थान देखा गया )
http://www.space.com/22059-sun-hole-photo-nasa-video.html
कुछ और जानकारी यहाँ भी है ।
https://www.facebook.com/groups/supremebliss/168520930010111/?notif_t=group_comment

तेजी से बढ़ रहा है चक्रवाती तूफान फैलिन, आंध्र-ओडिशा में अलर्ट जारी http://www.jagran.com/news/national-cyclone-phailin-andhra-pradesh-and-odisha-fears-about-supercyclone-10789289.html
इसी विषय पर तीनों लिंक्स -
अगले चार महीनों में क्या होने वाला है
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2013/10/blog-post_9.html
लिख गयी है महाविनाश की रूपरेखा
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2013/10/blog-post_11.html
महाविनाश की उलटी गिनती शुरू 
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2013/11/blog-post_22.html
ऐसा ही एक और संदर्भ -
एडगर केसी ने अपने जीवन में बहुत सी बातें कहीं । वो तंद्रा की अवस्था में यह सब बताते थे । इसलिए उन्हें sleeping prophet कहा जाता है । उन्होंने लगभग हर विषय पर बोला । उदाहरण के लिए बीमारी के इलाज बताए । लेकिन समस्या यह है कि उनके बताए उपायों में प्रयोग होने वाली वस्तुएं या तो धरती पर से समाप्त हो गईं । या आने वाले समय में खोजी जाएंगी । इस कारण कई मरीजों की इलाज पता लगने के बावजूद मृत्यु हो जाती थी । केसी द्वारा बोली गई बातें श्रृंखलाबद्ध रूप में संकलित हैं । और इन पर अध्ययन के लिए यह सोसाइटी कार्य कर रही है ।
http://www.edgarcayce.org/edgar-cayce1.html 

एडगर केसी " अनेक महल " 8
http://panchjanya.com/arch/2005/6/12/File16.htm

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