25 अक्तूबर 2015

निरपंथी कोई बिरला जाना

कहावत है - काठ की हांडी अधिक देर नहीं चढती । कागज के फ़ूलों में खुशबू नहीं आती और शेर की खाल ओढ लेने से सियार शेर नहीं हो जाता । सनातन धर्म के हास होने में यह कहावतें सटीक हैं । इन कहावतों पर गौर करने पर पता लगता है । एक चीज इनमें कामन है - असली के रूप में अन्दर नकली ।
लेकिन कहावतें और भी हैं - सांच को आंच नहीं होती । हीरे को अपना मोल नहीं बताना होता । सत्य कभी छुपता नहीं ।
परन्तु बात और भी है - यहाँ खरबूजे को देखकर खरबूजा अधिक रंग बदलता है । जमाना भेङचाल से सदा प्रभावित रहा है । अक्सर हमारे बहुत से कार्य अकारण अज्ञात और उद्देश्यहीन होते हैं ।
परेशानी यह है कि - हम अपना ही कहा हुआ नहीं विचारते । हम कह क्या रहे हैं और कर क्या रहे हैं । हमारा लक्ष्य क्या है और जा किधर रहे हैं ?
**********
मुझे एक मजेदार बात याद आती है । किसी धार्मिक चैनल से मेरे लिये फ़ोन था । वह श्री महाराज जी की भागवत कथा या प्रवचन या जीवन्त प्रसारण के लिये आग्रह कर धीरे धीरे व्यवसायिक मोलतोल पर आ रहे थे । मैंने उसी दिन उन्हें गारंटी दी कि - यदि महाराज जी कभी भी प्रवचन करेंगे । तो उसका लाइव टेलीकास्ट आपके यहाँ से ही करायेंगे ।
दरअसल यह पुरानी बात अक्सर की और कल की नयी बात से जुङती है । हमारे यहाँ विभिन्न भगवत प्रेमियों के आग्रह पर साप्ताहिक सतसंग रविवार को बारह से चार होता है । जिसमें तरह तरह के महात्मा बारी बारी से अपना उपदेश करते हैं । सबसे अन्त में नियमानुसार श्री महाराज जी का होता है ।
जब पूर्व के महात्मा लोभ, लालच, आचरण, समाज सुधार जैसी बातों को आधार बनाकर उससे जीवन सफ़ल होना उद्देश्य पूर्ति होना मनुष्य की उत्कृष्टता सिद्ध होना पर बोल चुके होते हैं । तब गुरुदेव का उपदेश उनके लिये आघात पहुंचाने वाला होता है ( क्योंकि वह इन सब कार्यों भावनाओं का सम्बन्ध परमात्म प्राप्ति से जोङ रहे होते हैं )
वह यह - परमात्मा कहीं खोया नहीं है । जो उसे खोज रहे हो । परमात्मा कोई वस्तु नहीं । जो उसे प्राप्त कर लोगे । परमात्मा को प्राप्त करने का कोई साधन नहीं है - यह गुन साधन से नहिं होई । तुम्हरी कृपा पाय कोई कोई ।
परमात्मा को प्राप्त करने का कोई मार्ग भी नहीं है -
पंथा पंथी कहे जमाना । निरपंथी कोई बिरला जाना ।
सोई जानहि जाहि देयु जनाही । जानत तुमहि तुमहि हुय जाही ।
----------
ऐसी ही कुछ बातें ।
संकर ‘सहज स्वरूप’ संवारा । लागि समाधि अखंड अपारा ।
शिष्यों की तेजी से बढती संख्या को देखकर गुरुदेव ने हंसदीक्षा ( जीव का ज्ञान स्वरूप या ज्ञान बोध ) के साथ साथ ‘समाधि दीक्षा’ भी साथ ही देना शुरू कर दिया । पहले समाधि दीक्षा पात्रता के अनुसार हंस ज्ञान के परिपक्व हो जाने पर कोई एक वर्ष बाद दी जाती थी । इससे अनोखा लाभ यह है कि ध्यान का सही अभ्यास न कर पाने वाला साधक समाधि दीक्षा हो जाने से सुगमता से ध्यान कर लेता है ।
नोट - हमारे जिन शिष्यों की हंस दीक्षा या परमहंस दीक्षा हो चुकी है । परन्तु समाधि दीक्षा नहीं हुयी । वो आश्रम से सम्पर्क करके शीघ्र दीक्षा ले लें ।
रामायण की इस चौपाई में शंकर जी जो ‘सहज स्वरूप’ संवारते हैं । इसी को समाधि दीक्षा में दिया जाता है । यह सिर्फ़ समर्थ गुरु के आदेश से क्रियाशील होती है । मेरे अनुमान से अभी हमारे यहाँ एक हजार से ऊपर समाधि साधक होंगे । ध्यान साधक कई हजार हैं ।
-------------
सनमुख होय जीव मोहि जबहीं । कोटि जन्म अघ नासों तबहीं ।
समाधि के विभिन्न चरणों में गिरते गिरते जब सभी असार गिर जाता है । तब सार शाश्वत आत्मा ( परमात्मा ) ही प्रकाशित होता है । यही वो क्षण है । जब सनमुख होने से करोङों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं ।
----------
जब हंसा परमहंस हुय जावे । पारबृह्म परमात्मा साफ़ साफ़ दिखलावे ।
परमहंस का ध्यान करना हंस और समाधि ज्ञान की तुलना में कुछ कठिन है । शुरूआत में आंखों से लेकर कपाल तक में एक तनाव और भारीपन सा हो जाता है । दूसरे यह वक्री दिशा ध्यान है । यानी आपका चेहरा जिस तरफ़ है । उससे कोई बीस डिग्री झुकाव पर बिना चेहरा मोङे ध्यान करना । जैसे नब्बे अंश पर आपका चेहरा एकदम सीधा है । तब सत्तर अंश पर ऊपर की तरफ़ ध्यान केन्द्रित करना । यहीं प्रथम मोक्ष द्वार है ।
लेकिन इस ध्यान को सरल करने में हंस अभ्यास और समाधि अभ्यास से सुगमता हो जाती है । क्योंकि इससे साधक में कृमशः सूक्ष्मता आती रहती है ।
----------
मम दरसन फ़ल परम अनूपा । जीव पाय जब सहज सरूपा ।
मेरे ( परमात्मा के ) दर्शन का फ़ल अनुपम है । जीव जब अपने सहज स्वरूप में स्थित हो जाता है । उसे सहज ही मेरा दर्शन हो जाता है ।
----------
सबसे ऊपर मैंने जो लिखा । वह हमारे यहाँ प्रचलित तमाम मंडलों से आने वालों के निराशाजनक अनुभवों पर है । जिसमें वाणी द्वारा एक या पांच छह नाम जपना, सिर से एक हाथ ऊपर ध्यान करना या गुरु द्वारा कहना - चिन्ता न करो मैं सबको सत्यलोक ले जाऊंगा..जैसी मिथ्या बातें हैं । 
मजे की बात यह है यह सब कबीर के नाम पर हो रहा है । लेकिन झूठ से लोगों को कब तक भरमाया जा सकता है । रोटी कहने से भूख और जल कहने से प्यास नहीं बुझती । शान्त आनन्दस्वरूप सच्चिदानन्द के दर्शन के बाद ही यह प्यास तृप्त होगी ।

02 अक्तूबर 2015

अस्तित्व

अक्टूबर के प्रारम्भ के साथ ही हल्की हल्की सर्दी की दस्तक शुरू हो गयी । यह मिश्रित है । शाम से रात 11 तक कुछ गर्मी कुछ उमस सी रहती है । इसके बाद जैसे सर्दी शरीर से लिपटना शुरू हो जाती है । ठीक ऊपर घूमता सीलिंग पंखा जैसे इसमें चार चाँद लगाता हो । 
रात का सताया हुआ योगी कुनमुनाता हुआ अधमरा सा होने वाली नयी सुबह की प्रतीक्षा करता है । जो अगले 12 घन्टे उसे राहत देगी । और फ़िर वही 12 घन्टे की काली रात । दुखिया दास कबीर जागे और रोवे ।
वैसे अपवाद को छोङकर कसौटी शिष्य का कोई भी क्षण सुखमय नहीं होता - सेवक धर्म कठोरा । अहर्निश तपती रेगिस्तानी यात्रा में जैसे छांव फ़ल फ़ूल पत्ती की कोई आस नहीं । अपना कुछ नहीं । सपना भी कुछ नहीं । जीना भी नहीं । मरना भी नहीं ।
खिङकी से बाहर शान्त खङे आम्र वृक्षों को देखकर अक्सर सोचता हूँ - शायद ऐसे ही चला जाऊंगा । कहीं अज्ञात में..जहाँ मुझसे पहले इसी पथ के पथिक गये हैं । और मेरे साथ मेरा जाना हुआ भी ।
शब्द स्पंदित होने लगे । धीरे धीरे वायु संकुचन हुआ । एक अज्ञात स्फ़ुरणा किसी प्रबल प्रवाह वाली जलधार सी अलक्ष्य फ़ूटने लगी । शब्द बहने लगे । बनने लगे । बिगङने लगे । कोई तारतम्य नहीं । कोई व्याकरण नहीं । कोई ज्ञान विज्ञान नहीं । कोई कृम नहीं । कोई अर्थ नहीं । सब बेतरतीब ।
चट्टानी पत्थरों से टकराती अनियंत्रित पहाङी जलधार..कलकल..हलहल..चलचल..गलगल..क्या है इनका स्वर..क्या है इनका आशय..क्या है इनका बोध, कौन जानता है ? शायद ये खुद भी नहीं ।
इस अदम्य अलक्ष्य प्रवाह में वासना वायु के बने अस्तित्व लेते बुलबुले उछल रहे हैं । गिर रहे हैं । टूट रहे हैं । और किसी जिद में फ़िर बारबार बन रहे हैं ।
फ़िर सरस हुये शब्द जैसे आकार लेने लगे । विचारों के पंख फ़ङफ़ङाने लगे । मन पक्षी कल्पित खुले आकाश में उङ गये । एक सुन्दर सृष्टि विस्तार लेने लगी । जन्म मृत्यु, सुख दुख, उजाले अंधेरे से आँख मिचौली सी खेलती वैचारिक सृष्टि ।
लेकिन प्रवाह निर्लेप था । कर्ता उद्देश्यहीन था । अकर्ता था । अवैचारिक था । कुछ उदासीन सा । कुछ उदासीन सा..क्योंकि उदासीन भी न था । उमंग न थी तो उदासी भी क्या ?
मैं यही सोचता हूँ । मेरा अस्तित्व ? निर्लेप कर्ता से हुयी जीव सृष्टि में मेरा क्या अस्तित्व । क्या गति । क्या होना । क्या न होना ।
कभी अदभुत सा कभी चिङचिङापन सा जो महसूस होता है कभी । कभी सुखद सा कभी दुखद सा जो अनुभूत होता है कभी । वही मैं हूँ - सोहंग । अलग मैं हूँ - ओहंग । खोजी मैं हूँ - कोहंग । खोज मैं हूँ - निःहंग । अलग भी । एक भी । एकोह्म द्वितीयोनास्ति । एकोह्म बहुष्यामि ।
एक मैं हूँ । अनेक मैं हूँ । सब कुछ मैं हूँ । कुछ नहीं मैं हूँ । जाग्रत मैं हूँ । सोया मैं हूँ । चैतन्य मैं हूँ । निष्क्रिय मैं हूँ । तुरीया मैं हूँ । तुरीयातीत भी मैं हूँ - हुं..हुं..हुं । अंततः निशब्द मैं हूँ । जिसे कहना शब्द से पङता है ।
आश्रम दिन की गतिविधियों से क्रियाशील हो उठा है । साधु सन्तों स्थानीय लोगों आगन्तुक की चहल पहल जारी है । पर जैसे मैं इस सबसे अछूता हूँ । और पदार्थ अपदार्थ प्रतिपदार्थ में विचरता हूँ । वायु से उङते रंगों की रंगीन फ़ुहारें सी । शब्दों को उछालते फ़ुरणा । एक निर्वाध शून्य । और उसमें होता विछोभ । उठता उछाह । जो कभी मुझे होने कभी न होने का मिश्रित अहसास देता है ।

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Follow by Email