22 दिसंबर 2015

पारस पत्थर की खोज

sir i want to talk to u about paras stone. i need it's information for humanity sake. pleasee sir help me. ( ईमेल द्वारा )
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ये सत्य है कि मुझे सुरति शब्द योग या आत्मज्ञान के बजाय..सोना बनाने की विधि, पारस पत्थर, आयुर्वेदिक उपचार, भूत प्रेत बाधाओं, कोई सिद्धि करने हेतु तथा सबसे अन्त में सट्टे का नम्बर जानने हेतु तुलनात्मक सर्वोच्च ‘सुरति शब्द योग’ अधिक फ़ोन आते हैं । जबकि मेरे लेखन का सही अध्ययन करने वालों को पता होगा । इनमें से मेरी किसी में कोई दिलचस्पी नही है ।
फ़िर भी हम जो जानते हैं । वह जनहितार्थ दूसरे को साझा करते हैं । यही समाज का चलन है ।
- सर्वप्रथम यह जानिये कि मेरे पास न तो पारस पत्थर है और न मैंने इसे देखा है । और किसी की खोज के आधार पर जानकारी देने स्पष्ट करने के अतिरिक्त मैं और कोई सहायता नहीं कर सकता ।
- आगे मैं जो लिख रहा हूँ । यह जानकारी किसी ग्रन्थ या सुने हुये के आधार पर न होकर मेरे स्रोतों पर आधारित है ।
- अभी का नहीं पता, पर भूतकाल में यह पत्थर कुछ लोगों के पास था । जिनमें राजा परमाल के पास निश्चित था । परमाल के पास सोना भी काफ़ी था । उसके किले में दरवाजों चौखटों आदि में ही काफ़ी सोना था । प्रसिद्ध ऐतहासिक प्रथ्वीराज युद्ध और बाद में सब खास के मारे जाने के बाद ये पत्थर समुद्र में फ़िकवा दिया गया । जिसे खोजने की अंग्रेजों ने बहुत कोशिश की । पर नहीं मिला । 
- सबसे पहले यह जानिये कि पत्थर शब्द से रेतकणों से बने आम पत्थर का आभास अधिक होता है । लेकिन हीरे को भी मूल भाव में पत्थर ही कहा जाता है । और पारस पत्थर या पारसमणि एक हीरा पत्थर ही होता है । न कि कोई आम पत्थर जैसा ।
- यह एक खरबूजे जैसा बङा भी हो सकता है । और मध्यम आलू या बेर जैसा भी । पर छोटे की सम्भावना अधिक रहती है ।
- इसकी कोई उमृ और क्षमता नहीं होती । कितना भी लोहा लगाते रहो । यह काम करेगा ।
- यह पहाङी और तराई क्षेत्रों में अधिक हो सकता है । मेरे अनुमान के अनुसार ये नेपाल के तराई क्षेत्र में हो सकता है । ( यद्यपि मैंने नेपाल और उसका तराई कभी नहीं देखा )
- जैसा कि बहुत स्थानों पर लिखा है कि यह किसी भी वस्तु को सोना बना सकता है । यह सही नहीं है । यह सिर्फ़ शुद्ध जंगरहित ‘लोहे’ को ही स्वर्ण में बदलता है ।
- इसकी सबसे बङी पहचान इसका स्व प्रकाशित होना है । बहुत से सर्प इसको प्राप्त कर लेते हैं । फ़िर अंधेरे में इसका प्रयोग करते हैं । लेकिन यह उनके मस्तक आदि में नहीं होता । बल्कि मुंह में दबाकर चलते हैं । इसीलिये नागमणि जैसे शब्दों और कहानियों का चलन हुआ ।
अतः इसको खोजने में पथरीले स्थान और अंधेरा ही प्रमुख है । क्योंकि इसकी रोशनी दिखेगी । जो इसके दबे या खुले होने पर कम ज्यादा हो सकती है ।
- कुछ चिङियां भी ऐसा प्रकाशी पत्थर घोंसलें में ले आती हैं । पर वह हो भी सकता है और नहीं भी ।
- पहाङी क्षेत्रों में इसके जानकार कुछ लोग अक्सर पशुओं के खुरों में लोहा लगवा देते हैं । और जब कभी विचरते हुये उनका खुर इससे स्पर्श हो जाता है । तो वे सोने के हो जाते हैं । फ़िर वे सोना अलग कर लेते है । ऐसा कई बार हुआ है ।
- पारस पत्थर को खोजने का यह भी एक सरल तरीका है । अपने जूतों और हाथ में ऐसी छङ जिसके निचले हिस्से पर लोहा हो । लेकर खोजना ।
- अनेक रहस्यमय प्रकृति के क्रियाकलापों में से एक यह भी प्रकृति निर्मित प्राकृतिक वस्तु है । और किसी भी काल में पारस पत्थर प्रथ्वी पर हजारों और लाखों भी हो सकते हैं । गौर करें । हम कौन सा हर चीज से लोहे को स्पर्श कराकर परीक्षण करते हैं । बहुत संभव है ये अनेक लोगों ने अनायास उठाकर ढेले की भांति उछाल दिया हो ।
- यह कहीं भी हो सकता है । आपके पुराने घर से लेकर किसी सुनसान टापू या समुद्र आदि के पास भी ।
- सबसे मजे की बात, पौराणिक स्यमंतक मणि यानी आधुनिक कोहिनूर हीरा भी पारसमणि हो सकता है ।
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पारस पत्थर के बारे में इंटरनेट से प्राप्त कुछ तथ्य ।
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- आज से 831 साल पहले दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी चंद्रावल को पाने और पारस पत्थर व नौलखा हार लूटने के इरादे से चंदेल शासक राजा परमाल देव के राज्य महोबा पर चढ़ाई की थी ।
किवदन्तियां - कहते हैं कि यह पहाड़ों पर कहीं होता है । पहाड़ी चरवाहे बकरियों के खुरों में लोहे के नाल ठोक देते हैं । वे कभी पारस के ऊपर होकर निकल जाती हैं । तो लोहे के नाल सोने के हो जाते हैं । 
- सुअरिया का दूध यदि ईंटों पर पड़ जाय । तो वह सोने की हो जाती हैं । 
- विज्ञान खोजियों को अभी तक इस प्रकार की किसी वस्तु का संसार भर में पता नहीं लगा है । जिसे छूने से लोहा सोना हो जाता हो ।
- कुछ अलकेमिस्टस के अनुसार ये पत्थर चंद्रमा या किसी दूसरे गृह पर बना था । जो धरती पर गिरा था ।
- कुछ को लगता है कि ये किसी अंडे के भीतर सही मटेरियल मिलने पर बनता है ।
दुनिया के अधिकांश धर्म संप्रदायों - हिंदू, बौद्ध और ईसाई धर्म में भी इसके बारे में लिखा गया है । ये पत्थर कैसा नजर आता है ? इस बारे में भी अलग अलग जानकारी मिलती है । किसी में इसे लाल, जामुनी किसी में पारदर्शी बताया गया है ।
- तीमंगढ़ किले से जहाँ किले के पास स्थित सागर झील में मौजूद पारस पत्थर के स्पर्श से कोई भी चीज सोने की हो सकती है । जोधपुर के तीमंगढ़ किला, मसलपुर उप तहसील के अन्दर आने वाले करौली के पास स्थित है । 1100 ई में बने इस किले को नष्ट करवा के यदुवंशी राजा तीमंपल द्वारा 1244 ई में इस किले का निर्माण कराया गया ।
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पारस पत्थर पारे का ठोस रूप होता है । जो प्रकृति में गंधक के साथ मिलकर उच्चदाब और उच्चताप की परिस्थितियों में बनता है । उसी उच्चदाब और उच्चताप की परिस्थितियों में तेलिया कंद पारे को ठोस रूप में बदलने में सहायक होता है ।
2Hg+ S = Hg2S ( -2e ) ( सोना )
आयुर्वेद के हिसाब से पारा शिव और गंधक पार्वती का रूप है । उसी तर्ज पर पारा
( hg, 80 ) + गंधक ( sulphar ) -> उत्प्रेरक ( तेलिया कंद )
तेलिया कंद
Hg + S => gold
उत्प्ररेक
पारे को गंधक के तेल में घोटकर उसमें तेलिया कंद मिलाकर बंद crucible में गरम करते हैं । इस क्रिया में पारे का 1 अणु गंधक खा जाता है । गंधक पारे में अपना पीला रंग देता है । तेलिया कंद पारे को उड़ने नहीं देता । तथा पारा मजबूर होकर ठोस रूप में बदल जाता है । और वो सोना बन जाता है ।
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तेलिया कंद - एक चमत्कारिक पौधा है । जिसका पहला गुण परिपक्वता की स्थिति में जहरीले से जहरीले सांप से काटे हुए इंसान का जीवन बचा सकता है । दूसरा ये पारे को सोने में बदल सकता है । इसके पौधे के आसपास की जमीन का क्षेत्र तेलिय हो जाता है । तथा उस क्षेत्र में आने वाले छोटे मोटे कीड़े मकोड़े उसके तैलीय असर से मर जाते हैं ।
तेलिया कंद का पौधा 12 वर्ष उपरांत अपने गुण दिखाता है । तेलिया कंद male और female 2 प्रकार का होता है । इसके चमत्कारी गुण सिर्फ male में ही होते है । इसके male कंद में सुई चुभोने पर इसके तेजाबी असर से वो गलकर नीचे गिर जाती है । पहचान स्वरुप जबकि female जड़ी बूटी में ऐसा नहीं होता ।
इसका कंद शलजम जैसा रंग आकृति का तथा पौधा सर्पगंधा से मिलती जुलती पत्ती जैसा होता है ।  पौधा वर्षा ऋतु में फूटता है । वर्षा ऋतु के बाद ख़त्म हो जाता है । इसका कंद जमीन में ही सुरक्षित रह जाता है । इस तरह से हर मौसम में ऐसा 12 वर्षों तक लगातार होने के बाद इसमें चमत्कारिक गुण आते हैं । 
ये बूटी भारत के कई जंगलों में पायी जाती है । 1982 तक भीलों का डेरा mount abu में बालू भील से देश के सभी क्षेत्र के लोग ये बूटी खरीद के ले जाते थे । बालू भील का देहांत हो चुका है । तथा उसके बच्चे इसकी अधिक जानकारी नहीं रखते ।
इस बूटी का चमत्कार करते हुए अंतिम बार बूंदी में बाबा गंगादास के आश्रम 1982 में देखा गया था । आज भी देश में लोग खासकर कालबेलिये और साधू इसके चमत्कारिक गुण का उपयोग करते हैं । तेलिया कंद की जगह देश में अन्य चमत्कारिक बूटियां भी काम में ली जाती हैं । जैसे रुद्रबंती, अंकोल का तेल, तीन धार की हादजोद आदि ।

14 दिसंबर 2015

20% सत्य और 80% असत्य

अगर आप बेहोशी की नींद में नही हैं तो सिर्फ़ शास्त्र ही नही राजनीति, समाज आदि जगत व्यवहार में प्रचलित 80-90% व्याप्त असत्य का अक्सर ही आभास होगा । दरअसल 20% सत्य में 80% असत्य का निरन्तर घुलनशील मिश्रण का नाम ही सृष्टि है । सृष्टि ! जगत नहीं लिखा मैंने । क्योंकि जगत सिर्फ़ सृष्टि खंड का आभास देता है ।
अतः यदि 20% सत्य और 80% असत्य को जाना जाये । महसूस किया जाये । तो बहुत से आधारहीन प्रश्न बचते ही नही हैं । और ये अनावश्यक प्रश्न ही बाधक बने हुये हैं । बंधन हैं । जन्म मरण, पाप पुण्य, सुख दुख, ज्ञान माया भी हैं ।
लेकिन मेरा विषय बिन्दु अध्यात्म है और अध्यात्म का स्पष्ट हो जाना ही सृष्टि रहस्य का मूल है - एकहि साधै सब सधै ।
वर्तमान उपलब्ध सतसाहित्य तथ्यों को लेकर असत्य से भरपूर तो है ही । उसमें पतनकारी सामग्री भी समाहित है । यह बात वैश्विक है ।
ऐसे सत्य असत्य के मिश्रण के पीछे कई प्राकृतिक कारण स्व स्फ़ूर्त होते हैं । जो गलत लगते हुये भी पूर्णतया सही हैं । असत्य में रहना ही परिवर्तनशील सृष्टि है । और जाग्रत होकर शोधन से सत्य का प्रकट होना शाश्वत चैतन्यता है । यही खेल मात्र है ।
उपजा ग्यान बचन तब बोला । नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला ।
अतः ऐसे में असत्य में से सत्य का शोधन करने का एक सरल सा सूत्र है । उन तथ्यों, विवरणों में से सिर्फ़ विज्ञान और क्रियात्मक व्यवहार अलग कर परस्पर अन्य सभी को मिलाकर शोधित किया जाये ।
भारतीय हिन्दू समाज में भी प्रमुख राम, कृष्ण, विष्णु, हनुमान, शंकर, दुर्गा शक्ति आदि को लेकर बहुत सी मिथ्या धारणायें अधिक प्रचलित हैं । ऐसा ही अद्वैत भक्ति या निर्गुण निराकार शाखा में प्रमुख कबीर नानक जी आदि को लेकर हुआ है । ऐसा ही भारत से कोई सम्बन्ध न होते हुये भी दो प्रमुख यीशु और मुहम्मद के प्रति तथ्यों को लेकर चलन है ।

अब यहाँ मूल की बात की जाये । तो धर्मग्रन्थ सम्मत भी अद्वैत ज्ञान ही मूल है । जिसमें कबीर, नानक आदि सन्त आते हैं । साकार द्वैत फ़िर इसका सृष्टि विस्तार है । जिसमें राम, कृष्ण आदि देवी देव आते हैं । बाइबल कुरआन जैसी पुस्तक धर्म आधारित सिर्फ़ गुण सूत्र है । जो बेहद सीमित और प्रारम्भिक सी चर्चा करते हैं ।
इसमें भी ध्यान रखना होगा । मैं मूल वाणियों की बात कह रहा हूँ । अभी प्रचलित मिलावटी और लगभग नकली की नहीं । और गुण शब्द को विशेष ध्यान में रखना । क्योंकि तमो गुण द्वैत, अद्वैत और किसी भी धर्म पदार्थ का एक अभिन्न अंग है । सिर्फ़ देवत्व ही धर्म नही है । दानव भी एक धर्म है । और मनुष्य सृष्टि में यह बृह्मा का ही एक वंश है । लेकिन खास अद्वैत और तम का सम्बन्ध विशेष विचारणीय है । जो एकदम अटपटा भी है । पर अनिवार्य है । क्योंकि सत और रज तो आदि, मध्य में सहज स्वीकार हैं ।
चाहे वो विषय राम, कृष्ण आदि के बारे में हो या कबीर नानक के, सही सहज और सरल सत्य के बजाय भ्रामक अधिक है ।
राम का जन्म आदि कुछ घटनायें, कबीर और नानक का जन्म आदि घटनायें सहज से अधिक चमत्कारिक बनाकर पेश की गयीं । उनके सन्देश निर्देश को कुछ का कुछ मान लिया गया । वो भी उनके कट्टर अनुयायियों द्वारा ।
अगर अंतरज्ञानियों में से कोई या कुछ गोरखनाथ को मछन्दर नाथ का पुत्र बतायें । तो कोई मानने सुनने को तैयार नहीं होगा । हनुमान का सुग्रीव के साथ पर्वत पर आने से पूर्व विवाहित जीवन था । पत्नी हनुमान जी के पर्वत पर जाने के बाद में अपने सम्बन्धियों के पास चली गयीं । मुश्किल है स्वीकारना । मछली द्वारा मानव पुत्र स्वीकृत है । पर वास्तविक सत्य नहीं । कबीर समाधिस्थ ऋषि और हिमालय गयी कुंवारी के गर्भ से उत्पन्न थे । इसको स्वीकारना कठिन है । पर आकाश से सीधा सरोवर कमल पर प्रकट हुये । यह सहज स्वीकार्य है । क्योंकि हमें सिर्फ़ चमत्कारी अस्तित्व पसन्द आते हैं ।
यद्यपि उन्हीं कबीर साहब ने कहा था कि - हाजिर की हुज्जत गये की तलाशी, का जमाने का पुराना चलन है ।
अतः हम एक चमत्कारिक मगर गढी हुयी छवि से सम्मोहित होकर सत्य से दूर हो गये । हम उन्हें तो मानते हैं । पर उनकी ही वाणी आदर्श और चलन को नहीं मानते ।
हाँ, मानते हैं मगर अपनी सुविधा और शर्तों पर और यह हरगिज सत्य नही है ।
पौराणिक कथायें, वेद की ऋचायें और उपनिषद के सूत्रों को पढने रटने मात्र से किसी चमत्कार या किसी चमत्कारिक पुरान पुरुष की या किसी दुर्लभ या अन्तिम प्राप्ति की अपेक्षा रखते हैं । तो यह सिर्फ़ मृग मरीचिका भर ही है । क्योंकि सत्य को पाने हेतु सत्य भेदन करना होगा ।

13 दिसंबर 2015

जङ और चेतन

जो इन 3 चित्रों को गहरायी से समझ लेगा । वह परमहंस ज्ञान या जङ चेतन की संयुक्तता और प्रथकता को भी समझ लेगा ।
हरा नारियल - जीव की सर्वाधिक प्रारम्भिक अवस्था है । जिसमें वह निर्मल निर्दोष है ।
कठोर कवच सहित नारियल - लेकिन अभी अधकच्चा हो । यह जीव की घोर अज्ञान अवस्था है ।
कवच से प्रथक हुआ नारियल - पूर्णत मुक्त और ज्ञान अवस्था है ।
( यद्यपि इसका कवच से पूर्णतया अलग गोले का चित्र होना चाहिये । पर वह उपलब्ध नहीं हो सका । इसलिये इसे कवच से अलग मानकर चलें । )

ईश्वर अंश जीव अविनाशी । चेतन अमल सहज सुखराशी ।
जङ चेतन ग्रन्थि परि गयी । जद्यपि मृषा छूटत कठिनई ।
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आपने अक्सर सनातन धर्म की विभिन्न पूजा पद्धतियों में नारियल का प्रयोग होते देखा होगा । लेकिन इसके पीछे क्या कारण है ? यह शायद ज्ञात नहीं होगा । ये तीन चित्र आत्मा के जीव सृष्टि के प्रतीक और फ़िर कृमशः धर्म अर्थ काम का प्रतिनिधित्व करते हुये मोक्ष के प्रतीक है ।
परमहंस ज्ञान की गुप्त पद्धति में तो नारियल मुख्य ही है । आपने कभी गौर किया है । कठोर कवच को तोङकर 

नारियल निकालना एक तरह से कष्टदायक ही है । लेकिन कवच से अलग हुआ नारियल यहाँ मुक्त जीव है और जटिलता से जुङा कवच अज्ञान है । दोनों के अलग होने में जो श्रम, कठिनाईयां, कष्ट आदि आये । वही साधना और भक्ति है ।
तो गहरायी से समझिये इस बन्धन और मुक्ति के सूत्र को ।
इसकी स्पष्ट व्याख्या इसलिये नहीं की । क्योंकि फ़िर उससे अपेक्षित लाभ नहीं होगा ।

09 दिसंबर 2015

शिकरा बाज

शिकरा बाज या लग्गङ ग्रामीण भाषा में एक शिकारी स्वभाव के पक्षी नाम है । जो वास्तव में "शिकारी बाज" का अपभ्रंश हो सकता है । आमतौर पर यह पक्षी कबूतरों, चूहों और छोटी चिङियों को अपना शिकार बनाता है । यह बाज से आकार में लगभग आधा और एक बङे उल्लू के समान होता है । तथा कुछ कुछ उसी जैसा दिखता भी है । मैंने इसे कई बार देखा है । 
यदि आप अपने आसपास की प्राकृतिक घटनाओं पर भी सावधान नजर रखते हैं । तो आपने कभी न कभी इसे देखा होगा । पेङों पर बैठी चिङियों का झुण्ड इसके आकृमण के समय तेजी से चहचहाता इधर से उधर उङता है ।
पशु पक्षी जगत के अन्य तमाम रहस्यों की भांति शिकरा बाज का भी एक अनोखा रहस्य पुराने लोगों द्वारा सुनने में आता है ।
पूर्व समय में कुछ लोग शिकरा बाज का घोंसला खोजते थे । और देखते थे कि उसमें छोटे बच्चे हैं या नहीं । बच्चे होने पर वे किसी एक बच्चे के पैर में लोहे की जंजीर बांध देते थे । शिकरा बाज जब बच्चे को जंजीर में बंधा 

देखता था । तो वह किसी ( अज्ञात ) पेङ पौधे आदि की लकङी लाता था । और उसके स्पर्श से वह जंजीर काट देता था । बाद में वह लकङी और जंजीर वह लोग उठा लाते थे । 
फ़िर उस लकङी के स्पर्श से लोहा कट जाता था ।
वास्तव में ऐसी कई जङी बूटियां हैं । जो अनोखे कार्य करती हैं । वनवासी ऋषियों मुनियों को इनमें से बहुतों के बारे में जानकारी थी । पर विलक्षण कार्य वाली वस्तुओं के नाम और उपयोग आदि जानकारी को उन्होंने दुरुपयोग के भय से उजागर नहीं किया ।
इनमें से कई का सम्बन्ध प्राचीन दिव्यताओं से भी है । जो इनकी शक्ति से भी जुङा है ।
हुआ हुआ करने वाला साधारण सियार, पूज्य और उपयोगी होने के बाद भी मानव मल को खा लेने वाली गाय, प्रथ्वी को स्पर्श करते समय हमेशा पैर में लकङी दबाये हारिल पक्षी ( ताकि प्रथ्वी का स्पर्श न हो, अलल पक्षी, शार्दूल, गुणकारी शक्तिशाली पौधा तुलसी, केतकी, केवङा आदि, इन सबका सम्बन्ध प्राचीन दिव्य विभूतियों के शाप या स्थिति च्युत घटनाओं से हैं ।
84 लाख योनियों में अधिकांश देहधारी इसी के चलते शरीर आकार, रंग, खानपान और रहनी को लेकर विवश हैं । बाद में उनके कर्मफ़ल के आधार पर इस देह के भी सुख या कष्ट अलग से होते हैं ।

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