27 जुलाई 2016

राम चहो तो मरि रहो

झमाझम होती मूसलाधार बरसात में मुझे आज से 12-13 वर्ष पहले का ठीक यही जुलाई का महीना याद हो आया । जब मैं भदौरिया जी से मिला था । 
श्री श्याम सिंह भदौरिया (सन्तनाम) स्वयं आनन्द बेवाह आज इस दुनियां में नहीं है । 4-5 वर्ष पूर्व ही पिंजरा छोङकर किसी अज्ञात लोक को उङ गये । अज्ञात लोक इसलिये कह रहा हूँ । कबीर के समय से ही जितने भी परमात्म सम्पर्की सन्त घोषित हुये । किसी ने भी यहाँ से ‘घर’ खाली करने के बाद न तो कोई चिठ्ठी न फ़ोन न मैसेज किया कि - हम सकुशल पहुँच गये और जैसे ही मौका मिले तुम भी इस जगत जंजाल को छोङकर ‘सकुशल’ ही आ जाना ।
 यद्यपि अपने जीवनकाल में ये दूसरों को भी वहीं जाने को प्रेरित और उपदेश आदि करते रहे । जब दूसरों को रास्ता, लक्ष्य दिखाते रहे तो खुद की तो वहाँ जाने रहने की गारन्टी ही है ।
लेकिन ये दोषारोपङ सिर्फ़ कबीर पर नहीं कर सकते । क्योंकि उन्होंने तो जीते जी यहीं कह दिया था । इससे सम्बन्धित कहा तो बहुत कुछ है पर ज्ञानीजन इतने में ही समझ जायेंगे ।
लोकालोक अकास नहिं ? झूठे लोका लोक ।
कहें कबीर आस जिन बांधो । छांडो जी का सोक ।
चल ज्ञानी मैं चलिहो । यह कौतक जेहि देस ?
मेरे जिय एक अचंभा । पारब्रम्ह केहि भेस ?
रामनगर गुरुवा बसा ? माया नगर संसार ।
कहं कबीर यहि दो नगर ते । बिरले बचे ? विचार ।
निराकार निरगुन है करता । वाके रुप न रेख ।
तुम कैसे वही मिलिहौ ? समझावो करी विवेक ।
सुमरन सुरति की गम नहीं । बहुत बिकट वह पंथ ।
सुरति निरति तहवां नहीं पहुंचे ? अस कथि भाषत ग्रंथ ।
अतः आज मुझे भदौरिया जी, जो कि लगभग चार महीने तक मेरे हंसदीक्षा गुरु भी रहे, की याद आ गयी । उनकी खासियत थी कि बङे से बङे झूठ को भी एकदम चमचमाते पारदर्शी सच की भांति बोलते थे । उन्होंने मुझे हंसदीक्षा देते समय मुझसे ही कहा था कि - मैं सब झूठ बोलता हूँ फ़िर भी लोग विश्वास कर लेते हैं ।
स्वयं आनन्द बेवाह की स्वयं गुरु परम्परा शीर्ष से इस प्रकार थी ।

तोतापुरी जी (जो अद्वैतानन्द और रामकृष्ण परमहंस के गुरु थे) के शिष्य श्री अद्वैतानन्द (छपरा, बिहार वाले) अद्वैतानन्द के सर्वोच्च शिष्य श्री स्वरूपानन्द जी (टेरी, कोहाट निवासी) स्वरूपानन्द के शिष्य श्री अनिरुद्धदेव पोंडरी वाले (ये हंस महाराज के गुरु थे लेकिन बाद में इनसे अनबन होने पर हंस इनके ही गुरु स्वरूपानन्द के पास परमहंस दीक्षा हेतु गये) और इन्हीं अनिरुद्धदेव के शिष्य मेरे लेख के विषय स्वयं आनन्द बेवाह थे । 
इस प्रकार यह कृम यों बना ।
तोतापुरी > अद्वैतानन्द > स्वरूपानन्द > अनिरुद्धदेव > स्वयं आनन्द बेवाह ।
निकटतम सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार ही अनिरुद्धदेव ने सिर्फ़ हंसदीक्षा ही दी । उनका हंस जी से बिगाङ ही परमहंस दीक्षा के कारण हुआ । यद्यपि मेरी बुद्धि से यह अनिरुद्धदेव जी की खासी चूक ही थी । क्योंकि हंस जी ने परमहंस दीक्षा प्राप्त कर निज सन्तान रूप में चार चार सदगुरुओं को जन्म दिया जो अभी भी वर्तमान हैं और सभी फ़ले फ़ूले हैं ।
मेरे लिये वह जुलाई की ही एक काली रात थी । आसमान में घटायें अक्सर घिरी ही रहती थीं और जब तब कङकती बिजली के साथ पानी की धारायें जमीन की ओर लपकती थी । जिन्दा रहने हेतु मुझे निरन्तर मौत से जूझना पङ रहा था । अभी लेकिन एक बात थी कि मैं किस परेशानी से गुजर रहा हूँ ? यह मैंने घर या बाहर किसी को नहीं बताया था ।
आखिरकार उस रात जब मुझे लगा कि या तो मैं मर सकता हूँ या फ़िर मेरे शरीर की ऐसी अवस्था हो सकती है कि इससे अनजान लोगों द्वारा मृतक समझ लिया जाऊँ तब मैंने एक कापी में लिखा कि - यदि मेरे साथ ऐसी कोई अजीब घटना हो जाये तो विनोद के द्वारा (इन्हीं) भदौरिया जी से सम्पर्क किया जाये । क्योंकि फ़िलहाल मैं इनसे ही परिचित था ।
और वह कापी मैंने इस तरह मेज पर खुली रखी कि सबकी निगाह जाये ।
खैर..वह रात भारी कष्ट के बाद कट गयी  लेकिन दिन में बैचेनी बढ़ गयी और शाम होते होते तो चरम पर पहुँच गयी । तब मैंने अपने घर बताया और साथ ही स्वयं आनन्द जी के शिष्य जो मेरे परिचित थे, को भी बुला लिया । उस रात वह मेरे घर पर ही रहे ।
उस रात भी रात भर पानी बरसता रहा था । वह रात हम दोनों ने बैठे ही काटी । क्योंकि अकेले होते ही मेरे प्राण छूटने लगते थे । अतः हम बातें करते रहे ।
सुबह होते ही हम 16 किमी दूर भदौरिया जी के घर कार से पहुँच गये ।
कोई 15 दिन बाद ही भदौरिया जी ने मेरी परेशानी को लेकर अप्रत्यक्ष हार मान ली और अपने गुरु और गुरुभाई (दोनों) राजानन्द उर्फ़ गङबङानन्द के पास चलने की सलाह दी ।
(गुरुभाई के ही गुरु हो जाने की ये जानकारी मेरे लिये नयी सी ही थी)
- यद्यपि कबीर के समकालीन रैदास आदि लगभग 12 सन्त कबीर सहित रामानन्द के शिष्य थे परन्तु कबीर का विशेष ज्ञान देखकर रामानन्द ने इन्हें स्वयं कबीर के अधीन कर दिया था ।
लेकिन यह बात स्पष्ट नहीं है कि कबीर ने इन्हें अलग से गुरुदीक्षा दी या वे 12 सन्त कबीर को अपना गुरु मानते भी थे । किन्तु उनके द्वारा कबीर का आदर करने की बात तो निर्विवाद सिद्ध है । क्योंकि कबीर की योग्यता बहुत अधिक थी और चरम पर थी ।
- इसके बाद गुरु और गुरुभाई दोनों होने का मामला हंस जी का है । ये पहले अनिरुद्धदेव के शिष्य थे । बाद में परमहंस दीक्षा के लिये अनिरुद्धदेव के गुरु स्वरूपानन्द के शिष्य हो गये ।
- इसके बाद (आयु के आधार पर) भदौरिया जी उर्फ़ स्वयं आनन्द बेवाह पहले अनिरुद्धदेव के शिष्य थे फ़िर प्रभावित होकर और लालचवश (नीचे) ये अपने गुरुभाई (और अनिरुद्धदेव के शिष्य) राजानन्द उर्फ़ गङबङानन्द के परमहंस दीक्षित शिष्य हो गये ।
- इसके बाद वर्तमान के एक और सदगुरु श्री शिवानन्द जी (लेकिन शिवयोग, टीवी पर आने वाले नहीं) पहले अनिरुद्धदेव के (हंसदीक्षा) शिष्य थे और बाद में इन्हीं अनिरुद्ध के शिष्य राजानन्द  से परमहंस दीक्षित शिष्य हुये ।      
लेकिन यह बात, मुझे अभी अभी इंटरनेट से ही जान पङी । क्योंकि स्वयं (मेरे और) शिवानन्द जी (के मध्य सांकेतिक वार्ता) के अनुसार तो उनका कोई गुरु ही नहीं था और ओशो के मंगतराम बाबा की भांति उन्हें भी किसी गुमनाम से सन्त ‘ब्रह्मचारी जी’ का सहयोग सानिंध्य मिला था । जो अक्सर उनके घर जाते थे, बस ।
- और मजे की बात यह कि ठीक यही परम्परा मेरी होते होते रह गयी । क्योंकि मैं भी उस दिन राजानन्द उर्फ़ गङबङानन्द से दीक्षा लेने पहुँच ही गया था । 
लेकिन..?
अगर अतिश्योक्ति न लगे तो  उन दिनों मेरे प्राण ही नहीं छूटने लगते थे बल्कि यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही बिलकुल मेरे इर्द गिर्द ऐसे घूम रहा था । जैसे यशोदा द्वारा कृष्ण के मिट्टी खाने की जांचने पर उन्हें श्रीकृष्ण के मुख में घूमता नजर आ रहा था और मैं इसी को रोकना चाहता था । क्योंकि यही मेरा जीवन रस निरन्तर चूस रहा था ।
मरता क्या न करता, मैं घरवालों, भदौरिया जी और अपने उसी परिचित के साथ अपने घर से 25 किमी दूर एक गांव में स्थिति राजानन्द जी के आश्रम पर पहुँचा । ध्यान रहे उस समय मेरी हालत बेहद खराब थी ।
- राधेश्याम ! मुझे किसी वृद्ध की एक मोटी भारी और ग्रामीण अन्दाज लिये छत से आवाज सुनाई दी - को आओ ए ?
- कोऊ ना महाराज । किसी व्यक्ति ने प्रतिउत्तर दिया - कोऊ गाङी में आओ ए ।
शाम के लगभग छह बज चुके थे । हम सभी छत पर पहुँच गये । जहाँ राजानन्द जी का शयन और निवास दोनों थे ।
मैंने देखा कि गांव के किनारे स्थिति लगभग एक बीघा के आधी जगह में निर्मित वह बिलकुल गोदामनुमा मकान था । जिसके सबसे उपरली छत पर सोलर यूनिट से नीचे की छत पर टेबल फ़ैन लगाये मच्छरदानी में तख्त पर स्थानीय सदगुरु श्री राजानन्द जी लेटे हुये थे और आते जाते शिष्य और स्थानीय जन उन्हें तखत के पास ही लम्बलेट होने के लिये बिछी दरी पर लम्बलेट होकर दण्डवत कर रहे थे । 
हमारे साथ गये उनके गुरुभाई और शिष्य भदौरिया जी ने कुछ मेरी हालत और परेशानी बताते हुये कहा - महाराज जी, दीच्छा के लयें आये एं ।
- कछु लाये ऊ एं फ़ूल पतउआ । स्थानीय सदगुरु बोले - कि खाली खाली दीच्छा के लें आय गये ?
अबै परों भिंड ते दुय जने कार लै के आय । बीस हजार की गड्डी फ़ेंक दयी । दीच्छा का बातन में होत ए ।
भदौरिया ने तुरन्त साथ ले गये केले और अनार उन्हें भेंट किये । 
और जल्दी से बोले - महाराज आप जो बतइयें । दओ जैये ।  
महाराज 93-95 आयु के बीच झूला झूल रहे थे  और उस वक्त तक सांध्यकालीन भोजन ग्रहण कर चुके थे । अतः शायद लेटने की इच्छा हो रही थी । सो वे भदौरिया जी के ‘महाराज आप जो (पैसा) बतइयें’ कहने पर सन्तुष्ट होकर लेट गये ।
चलते समय भदौरिया जी ने कहा था कि - बङा दुर्लभ सतसंग सुनाते हैं ? तुम्हें भी सुनवायेंगे । अतः उसी को याद कर वे बोले - महाराज बङी दूर तें आये एं । कछू दो चार बातें सुनाइ देते ।
- एं । सदगुरु बोले - हियन संजा (शाम) को दुय बोतलें (ग्लूकोज की) चङि गयीं । उनै सतसंग की परी ए ।
कहकर वह करवटिआये होकर लेट गये । भदौरिया मुँह मसोस कर चुप रह गये ।
लेकिन इसी बीच में एक छोटा बच्चा टार्च लेकर सबसे ऊपरी छत पर चढ़ गया । उसने टार्च जलाकर उसकी रोशनी नीचे फ़ेंकी  जो संयोगवश सीधा सदगुर के चेहरे पर पङी । बच्चे ने टार्च तुरन्त ही बन्द भी कर ली ।
- राधेश्याम ! स्थानीय सदगुरु एकदम चौंक कर डरते हुये बोले - ज लाट कैसी हती (चमकी) ?
- कछू नायं महाराज जी । वह बोला - बच्चटा ने बाटरी मिलकाई ती ?
महाराज सांयकालीन सभा समापन कर आराम हेतु मच्छरदानी + सोलर फ़ैन से अटैच्ड थे और हम सभी खुले खेतों में बने भवन की उसी खुली छत पर जमीन पर लेटे हुये मच्छरों के ताबङतोङ आक्रमण को सह रहे थे । हालांकि चलने से पूर्व भदौरिया जी ने कहा था - वहाँ सब इंतजाम है ?
सदगुरु महाराज श्री राजानन्द जी की सभी लीलाओं का पूर्ण वर्णन किया जाये तो महान यादगार ग्रन्थ बन सकता है लेकिन वह सब आवश्यक नही है । बस  स्मृति के कुछ क्षण उकेरना भर है । 
आपको राजानन्द जी के साथ लिखा उपनाम गङबङानन्द शायद हैरान कर रहा होगा लेकिन ये नाम खुद उन्हें उनके शिष्यों और स्थानीय लोगों ने ही दिया था । दरअसल राजानन्द किसी को भी जिस काम बनने हेतु आशीर्वाद देते । वह बनने के बजाय और ज्यादा बिगङ जाता अतः लोगों ने उनका नामकरण गङबङानन्द कर दिया ।
भदौरिया को वहाँ बनी स्थिति और खास राजानन्द के व्यवहार से अन्दर ही अन्दर दुख हुआ पर प्रत्यक्ष वह कुछ कह न सके ।
जैसा कि मैंने कहा, सन्तों की रहस्यमयी लीलायें सही रूपों में इक्का दुक्का ही जान पाता है ।
सन्तन की महिमा रघुराई । बहु विधि वेद पुरानन गाई ।
जैसे कि बाबा नीमकरोरी के उतर जाने से रेल असल में कैसे न चली ? ये वास्तविक बात सिर्फ़ उसमें शामिल या कुछेक गिने चुनों को ही पता है ? सबको नहीं ।
अब क्योंकि मैं बात भदौरिया जी के साथ जुङी अपनी स्मृति को लेकर कर रहा था अतः जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है -
प्रभावित होकर और लालचवश (नीचे) ये अपने गुरुभाई (और अनिरुद्धदेव के शिष्य) राजानन्द उर्फ़ गङबङानन्द के परमहंस दीक्षित शिष्य हो गये ।
बाबा नीमकरोरी की अचल रेल की भांति ही सदगुरु राजानन्द को जब वे किसी यात्रा के मध्य रात्रि में खेतों में स्थिति एक झोंपङे टायप में एक अनजान व्यक्ति के साथ लेटे थे (यह व्यक्ति पिछले तीन चार दिन से राजानन्द के पीछे था) झोंपङी में उजाले हेतु एक ग्रामीण दिया जल रहा था ।
रात को जब वे सोने लगे तो उस व्यक्ति ने राजानन्द से कहा - अरे, जि दिया तो बन्द कद्दे ।
राजानन्द बोले - हमसे कात, सो खुदई काये न कद्देओ ।
वह व्यक्ति बोला - ठीक ए, फ़िर हमई कद्देत एं ।    
फ़िर उस अनजान व्यक्ति ने Hollywood के Fantastic Four के नायक की भांति 15-20 फ़ुट लम्बा हाथ बनाकर या बढ़ाकर लेटे लेटे ही दिया बुझा दिया । राजानन्द चौंक गये ।
जाहिर है, इस विद्या से अपरिचित कोई भी व्यक्ति एकदम चौंककर लालच और प्रभाव से उस व्यक्ति से सब कुछ जानना चाहेगा ।
(बीच की कथा गुप्त)
खैर..ये अज्ञात और रहस्यमय व्यक्ति ही राजानन्द का परमहंस दीक्षा गुरु बना और स्वयं राजानन्द जी के अनुसार सीधा सतलोक से सिर्फ़ उन्हें ही दीक्षा देने आया था और हर 12 साल उपरान्त 3 बार मिलने आया ।
लेकिन सदगुरु राजानन्द जी उससे हाथ लम्बाना तो दूर उंगली लम्बाना भी नहीं सीख पाये या सीख गये हों  तो वो दिया उसी ढाई फ़ुट के हाथ से ही बुझाते थे । हालांकि स्थूलकायता और वृद्धावस्था के चलते उन्हें इस लम्बे हाथ की जरूरत भी थी ।
दूसरा कमाल सदगुरु राजानन्द जी का यह था कि वह एक सिद्ध मन्त्र द्वारा धूप में खङे कर आसमान तक दिखायी जाने वाली छाया ‘धूपक विराट रूप’ दिखाते थे और वास्तव में सिर्फ़ इस छाया द्वारा ही अनेक ग्रामीण स्तरीय मानसिकता धारी उनके शिष्य बने थे । इसी बात और उस लम्बा हाथ कहानी से भदौरिया जी प्रभावित हुये थे और गुरुभाई को गुरु बना लिया ।
न सिर्फ़ गुरु बना लिया बल्कि यह ‘धूपक विराट रूप’ दिखाने की कला भी सीख ली और इसी
धूपक विराट रूपी आत्मज्ञान को वह भी वितरित करते हुये कबीर परम्परा को आगे बढ़ाने लगे ।
(किसी भी चटक धूप वाले दिन 12 बजे के लगभग धूप में खङे होकर 10-15 मिनट तक अपनी परछाईं में गर्दन वाले स्थान पर निरन्तर देखने के बाद यकायक आसमान की तरफ़ देखेंगे । तो ‘बनी एकाग्रता’ के अनुसार आसमान तक अपनी ही छाया नजर आयेगी)
मच्छरों के आक्रामक हमलों और स्थानीय कीटों से जूझने के बाद भी रात आखिर कट ही गयी । मेरी परेशानी ज्यों की त्यों थी बल्कि कष्ट भरी रात से और ज्यादा बढ़ गयी थी । 
अल सुबह सदगुरु शौचादि से निवृत होकर जब गुरुकुल कांगङी चाय का सुङका मार रहे थे  तब भदौरिया जी ने पुनः मेरी परेशानी और सभी बात उनके सामने रखी । तथा बताया कि स्वयं उनके (भदौरिया जी के) द्वारा मेरी हंसदीक्षा 15 दिन पहले हो चुकी है और आप (राजानन्द जी) यदि इनकी परमहंस दीक्षा कर दें तो शायद आराम हो जाये ।
राजानन्द जी ने अपनी बोली में कहा - हंसदीक्षा के बाद परमहंस दीक्षा के लिये कम से कम एक साल का अन्तर तो जरूरी है ।
ये सभी डायरेक्ट ब्राडकास्टिंग मेरे साथ गये लोग मिनट मिनट पर ही कर रहे थे अतः सुबह के समय ही मैंने अपने सिर की तरफ़ ऊपर दस फ़ुट फ़ासले पर बैठे सदगुरु को उच्च स्वर में वही परम्परागत पचासों गालियां दीं । बुरा भला कहा । यद्यपि वहाँ आश्रम के अन्य लोग भी थे ।
फ़िर दस बजे के करीब कार द्वारा वापस घर के लिये रवाना हो गये ।
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