23 सितंबर 2016

लोग दुख क्यों सहते हैं ?

जाग्रत (तुरियातीत, हंस) अवस्था में आप जगत में किसी के अधीन नही हो । यदि कोई अपनी ही इच्छाओं के अधीन है । तो ऐसी अवस्था में आप जगत में किसी और के अधीन नही । बाह्य अधीनता तो केवल भ्रम है । वास्तव में तो केवल हम अपने ही अधीन हैं । अतः अपनी स्वतन्त्रता का अनुभव करो और उसे प्राप्त करो । तुम्हें अपने को किसी देवता ईश मुहम्मद या कृष्ण अथवा संसार के किसी महात्मा के अधीन क्यों समझना चाहिये ?
तुम सबके सब स्वतन्त्र हो, मुक्त हो । मुक्ति के भाव को ग्रहण करते ही वह तुम्हें सुखी बना देगा । 

एक बार एशिया के एक राजा ने एक आदमी को अपराधी समझा । अपराधी इसलिये समझा कि उसने राजा को सलाम नही किया था । इस बूढ़े राजा को जब कोई सलाम न करता तो वह बहुत क्रोधित होता ।
उस अपराधी ने राजा से कहा - तू नही जानता, मैं कितना प्रतापी और कठोर शासक हूँ । तू इतना धृष्ट है । तुझे मालूम नही, मैं तुझे मार डालूँगा ।
उस मनुष्य ने उसके मुँह पर थूक दिया और इतनी कङी नजर से देखा कि राजा घबरा गया ।
फ़िर वह बोला - अरे मूर्ख पुतले ! यह तेरी शक्ति, तेरे अधिकार में नही कि तू मुझे मार सके । मैं आप अपना स्वामी हूँ । तेरा अपमान करना मेरी शक्ति में है । यह मेरे अधिकार में है कि मैं तेरे मुँह पर थूक दूँ । और यह भी मेरे अधिकार में है कि इस शरीर को सूली पर चढ़ा देखूँ । अपने शरीर का आप स्वामी हूँ । तेरा अधिकार छोटा (पीछे) है । मेरा अधिकार पहले (बङा) है । 
इस प्रकार महसूस करो, अनुभव करो कि सदा आप अपने स्वामी हो । निजात्मा की दृष्टि से सब चीजों को देखो । दूसरों की आँखों से नही । अपनी स्वतन्त्रता का अनुभव करो । अनुभव करो कि आप ईश्वरों के ईश्वर, स्वामियों के स्वामी हो । क्योंकि आप वही हो - तत्वमसि ।

लोग क्यों दुख सहते हैं ? वे दुख भोगते हैं । निज आत्मा की अज्ञानता के कारण, जिससे उनको अपना सत्य स्वरूप भूल जाता है । और जो कुछ दूसरे उनको कहते हैं । वही वे अपने को समझ लेते हैं । और यह दुख तब तक बराबर रहेगा । जब तक मनुष्य आत्मसाक्षात्कार नही कर लेता । जब तक यह अज्ञान दूर नही होता ।
अज्ञान ही अन्धकार है । यदि किसी अंधेरे घर में तुम जाओ । तो दीवार अथवा किसी चीज से अवश्य टकराओगे । अवश्य किसी प्रकार की चोट खा जाओगे । यह अनिवार्य है । इससे बच नही सकते ।
लेकिन यदि घर में सिर्फ़ दीपक जला दो । तो फ़िर तुम्हें परेशान होने की जरूरत नही । तुम घर के किसी भी हिस्से में बिना चोट खाये आराम से आ जा सकते हो ।
संसार की भी यही दशा है । यदि आप अपने दुखों का अन्त करना चाहते हो । तो आपको इसके लिये अपनी बाह्य परिस्थिति पर व अपने सामाजिक पद के समाधान व संघटन पर भरोसा नही करना चाहिये । बल्कि अंतरस्थिति सूर्य के विकास के उपाय पर भरोसा करना चाहिये । 
सब कोई मानो फ़र्नीचर को यहाँ से वहाँ हटाकर या सांसारिक पदार्थों को इधर से उधर करके, दृव्य इकठ्ठा करके या बङे महल बनवा कर या दूसरों की जमीन मोल लेकर दुख से पीछा छुङाना चाहते हैं ।
अपनी परिस्थिति के सुधारने व चीजों को इस तरह या उस तरह सजाने से आप कभी दुख से नही बच सकते । केवल अपने घर में दीपक जलाने से प्रकाश प्रकाशित करने से केवल अपने ह्रदय की कोठरी में ज्ञान का ज्ञान का प्रवेश करने से ही दुख छूट सकता है । हटाया जा सकता है और दूर किया जा सकता है । अंधकार दूर होने दो । फ़िर आपको कोई हानि नही पहुँचा सकता ।   

22 सितंबर 2016

जागो मोहन प्यारे

यदि इस रचना का सही लाभ प्राप्त करना है तो कृपया बेहद ध्यान से पढ़ें । इसी उद्देश्य के तहत इस रूपक के मूल आदि के बारे में सब कुछ गोपनीय रखा है ।
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आज प्रातः लगभग 2 बजे के निकट असंप्रज्ञात समाधि के कैलाश से बासंती वायु का झोंका आया था । वह हर्षजनक शुभ समाचार के रूप में कृष्ण मुहर के साथ गंगाजल से लिखकर रवाना किया गया । आज सांयकाल रिमझिम रिमझिम वर्षा हो रही थी । राम के शुद्ध सतोगुणी मन्दिर के आंगन में अग्निकुण्ड के चतुर्दिश नारायण मदनमोहन और तुलाराम बैठे नित्य नियमानुसार उच्च स्वर से अन्तःकरण से आंसू बहाते हुये यह वेदमन्त्र बारबार गा रहे हैं ।
तं त्वा भग प्रविशान स्वाहा । स मा भग प्रविश स्वाहा ।
तस्मिन सहस्र शाखे निभगाहं । त्वयि मृजे स्वाहा ।
- हे परमात्मा तू हमें अपने स्वरूप में प्रविष्ट हो जाने दे । तू हमारे रोम रोम में प्रविष्ट हो जा । दुख देने वाली भेद बुद्धि हजारों जोखिमों में डालती है । मैं तेरे स्वरूप में मलमल कर नहाता हूँ । और यह मैल धोकर उतारता हूँ ।
फ़िर ॐ ॐ की ध्वनि परमानन्द के स्वर में कुछ देर होती रही । अपने आप आँखें मिंच गयी और सब प्रणव में लीन । बहुत देर यह शान्ति की अवस्था रही । इसके बाद गीता - क्षर और अक्षर दोनों से मैं श्रेष्ठ हूँ ।
इस समय सब अपनी अपनी कुटिया में हैं । राम एकान्त बैठा है । पूर्णिमा की चाँदनी चटक रही है ।
यहाँ से बादलों के टुकङे, घर की फ़ुलवारी और सामना पर्वत ज्योत्सान में स्नान किये प्रतीत हो रहे हैं । गंगा का मधुर गायन कर्ण कुहरों में पवित्रता भर रहा है ।
गंगाजी क्या गा रही है ।
जाग मोहन जाग रेवल गयी ।
उठो जागो, खाओ माखन, फ़ेर डारों रई ।
रात भारी गयी सारी, भोर अब तो भई ।
चिङी पंछी बुलावत है, खेल उन से सही ।
- प्यारे मोहन जागो । अविद्या की नींद बहुत सोये । मैं बलिहार, अब बैठे हो जाओ । होशियार बनो । संसार रूपी गाय का मक्खन खा लो (अपने भीतर प्रविष्ट कर लो । अथवा यों कहो कि श्रुति (वेद) रूपी कामधेनु का मक्खन (महावाक्य) मुँह में डाल लो । यह शक्ति (सत) भरा श्वेत श्वेत (ज्ञान चित) मीठा मीठा (आनन्दस्वरूप) मक्खन (तत्व ज्ञान) चख लो । बङा बल आयेगा । शक्ति भर जायेगी ।
गोवर्धन (भारी कठिनाईयां) उठाना बांये हाथ का कर्तव्य नहीं, चटली उंगली का खेल हो जायेगा ।
हे दामोदर ! कमर की डोरियों रस्सियों (देश, काल, वस्तु, परिच्छेद) को तोङना कुछ बात ही न रहेगी ।
कालिय नाग के समस्त फ़णों (मन, अहंकार की समस्त वृतियां) को पैरों तले कुचलना सरल हो जायेगा । यह माखन (वेदान्त) सब अवयवों (कूल्हों) को पुष्ट और हड्डियों को लोहे के समान कठोर और मुखमंडल को दीप्तमान करने वाला है । फ़ुफ़्फ़ुसों (फ़ेफ़ङों) में बल भर देगा । जादू भरी बांसुरी बजाते बजाते कभी न थकोगे ।
वह देखो नन्हा कृष्ण जाग पङा ।
ऊँ ऊँ ऊँ ऊँ नही ऊँ ! ऊँ !! ऊँ !!!
मैया (सतगुण प्रवाह) ने बिसूरते हुये अधरों को तनिक माखन लगा दिया (सोऽहं) मुँह में आहुति पङ गयी (शिवोऽहं) पच पच करते हुये माखन खाने लगे (ब्रह्मास्मि)
मैया कुछ देर अपने हाथ से मक्खन खिलाकर अपने धंधे में लगती है ।
नयी सदी आरम्भ होती है । संकल्प की रई पङी है । काल (समय) का नेजा (रई की रस्सी) है । कभी इधर खिंच आता है (दिन) कभी उधर खिंच जाता है (रात) बिलोना आरम्भ हो गया । रढ़ रढ़ रढ़ आरम्भ हो गयी ।
ऐ माता ! अब इस कृष्ण को माखन की चाट लग गयी ।
छुटती नही ये जालिम मुँह को लगी हुयी ।
माखन भूख (अहंग्रह उपासना) घनेरी री मैया ! माखन भूख घनेरी ।
ऐ प्रकृति (दुन्या) यह माखन चोर तुझे कब चैन से बिलोने देगा । रई तोङेगा और नाम रूप की मटकी फ़ोङेगा ।
रात बीत चुकी । पौ फ़टने लगी । प्रकाश का प्रभात है । पक्षी कबूतर मयूर आदिक तो सब जाग पङे । कृष्ण अभी सोया ही पङा है । कुछ हर्ज नही । पक्षी आदि तो सदैव पहले ही जागा करते हैं ।
ऐ मोहन ! यह पक्षी जाग जाग कर तुझे जगाया चाहते हैं । कल की तरह (प्राचीनकाल अनुसार) अब भी तेरे हाथों दाना चावल तिल आदि खायेंगे ।  
ऐ प्रेम भरे बाल गोपाल, तेरे साथ खेलने को यह पक्षी जमा हो रहे हैं । तेरे मनो मोद के सब सामान तैयार हैं । उठ खङा हो जा ।
चिङिया चूं चूं कर रही है । कौये कां कां छेङ रहे हैं । मोर प्यां प्यां कूक रहे हैं (कोई किसी बाहरी कला के पीछे पङा है । कोई किसी शारीरिक सुख में अङा है । कोई स्थूल विज्ञान में उलझा है । यह सब इन्द्रियों तक पहुँचने वाली रागनियां जारी है)
हे भगवन ! ये सब केवल तेरे जगाने के समान है । नींद में भी विचित्र आनन्द था । पर अब तो खूब सो लिये । ताजह हो चुके । मचलते क्यों हो तुम भी गाओ ।
यह देखो तुम्हारी बांसुरी कौन चुरा ले गया ?
नही नही तुम्हारे ही पास है ।
अहा हा हा ! मोहन ने सूर्य के समान आँखे खोली । अधरों पर बांसुरी रखी और ह्रदय में समा जाने वाली आत्मिक ध्वनि वायु के पर्दे पर सवार हो चारो ओर गूंजने लगी । समस्त गोकुल (संसार) में फ़ैलने लगी । आकाश की खबर लाने लगी । जय जय जय !
अब चूं चूं प्यां प्यां कां कां किसको भाने की है ?  
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प्रश्न - रहस्य विधा के इस रूपक में - मोहन या कृष्ण = ?

20 सितंबर 2016

मजनूं - एक विशुद्ध प्रेम

कुछ ही पुराने समय में मजनूं नाम का एक मनुष्य हुआ है । इसकी प्रेम दीवानगी के चलते इसे ‘प्रेमियों का राजा’ कहकर पुकारा गया है । कहते हैं मजनूं के समान किसी ने प्रेम नही किया । लेकिन प्रेम मार्ग की कठिन असफ़लताओं और अति दुश्वारियों ने उसका मानसिक सन्तुलन ही बिगाङ दिया । वह विक्षिप्तों के समान ही उन्मत्त हो गया और अपनी प्रेमिका लैला की चाह में माता पिता, घर द्वार आदि त्याग कर वन वन भटकने लगा ।
वह खिले गुलाब के फ़ूल में लैला को देखता । दौङकर उसके पास जाता । और लैला जान कर बातें करता । वह सरु वृक्ष cypress को लैला समझ कर प्यार करने लगता । हिरन आदि में वह अपनी प्रेयसी की झलक देखता । और दीवाना होकर दौङ जाता । 
हर जगह हर क्षण उसे सिर्फ़ लैला ही नजर आती थी । अब वह पागलों के समान नहीं बल्कि पागल ही हो गया था और अपनी माशूका लैला के प्रति अपनी भाव अभिव्यक्त को शब्दों के माध्यम से कविताओं में उकेरता ।
कितना मुश्किल है मुहब्बत की कहानी लिखना ।
जैसे पानी पे पानी से पानी लिखना
मैले फ़टे चिथङे गन्दे वस्त्र, अस्त व्यस्त तन मन, सदा बेहाल अवस्था में रहने के कारण ही लोगों ने कैस को मजनूं का नाम दिया । जो उसकी प्रेमकहानी की भांति ही उसके मूल नाम से अधिक अमर हुआ ।
कहते हैं, लैला कोई बहुत आकर्षक और सुन्दर युवती नही थी । बल्कि वह काली थी । अतः राजा को जब मजनूं की अति दीवानगी के बारे में पता चला । तो उसने मजनूं को दरबार में बुलाया । और राज्य भर की कई चुनिंदा खूबसूरत आकर्षक कमनीय लङकियों को उसके सामने खङा कर दिया ।
और कहा - लैला में क्या है । देख ये लैला से कई गुना सुन्दर हैं । इनमें से जो अच्छी लगे । उसे ले ले ।
मजनूं ने उपेक्षा से उन्हें देखा और बोला - नहीं, इनमें लैला से बढ़कर कोई नहीं । लैला को देखने के लिये मजनूं की आँख ही चाहिये ।
इसी तरह वन बीहङों में भटकते हुये एक दिन मजनूं वन में गिर कर बेहोश हो गया । संयोगवश उसी समय उसका पिता उसे खोजते हुये वहाँ आ पहुँचा ।
उसने मजनूं को होश में लाकर उसे गोद में रख कर पूछा - बेटा, क्या तू मुझे पहचानता है ?
सुधबुध खोया मजनूं बेसुध सा ही उसे देखता रहा । लैला को छोङकर सब कुछ उसकी दृष्टि में शून्य था । कुछ और नजर ही नही आता था । उसका रोम रोम लैला लैला पुकारता था ।
उसके पिता ने उसे फ़िर से हल्का सा झिंझोङा और कहा - कैस, देख मैं तेरा पिता..मुझे पहचान ।
मजनूं जैसे कहीं अथाह गहराईयों में डूबा हुआ सा बोला - कौन पिता ?
मजनूं जब तक जीवित रहा । न तो लैला को देख सका । न मिल सका । 
(अरबी संस्कृति की यह ऐतिहासिक प्रेमकथा यहीं समाप्त नही होती । क्योंकि मृत्यु के बाद जीवन की धारणा सनातन है । इसलिये कवि लेखक साहित्यकार इससे आगे भी कल्पित करते हैं)
मरने के बाद जब मजनूं को खुदा के सामने लाया गया । तो खुदा बोला - अरे मूढ़ ! तूने एक भौतिक सांसारिक पदार्थ (लैला) को इतना प्यार क्यों किया । जितना प्रेम तूने अपनी प्रियतमा पर व्यर्थ किया । उसका कोटिअंश भी मुझे किया होता । तो मैं आज तुझे विहिश्त का फ़रिश्ता (स्वर्ग का देवता) बना देता ।
मजनूं घोर उपेक्षा से बोला - ऐ खुदा ! मैं तुझे इस (धृष्टता) के लिये क्षमा कर देता हूँ । पर यदि सचमुच ही तुझे मेरे इश्क की इतनी चाह थी । तो तू स्वयं लैला बन कर मेरे पास क्यों न आया ?यदि तू मेरी मुहब्बत का भूखा था । तो तुझे मेरी प्रेमिका, मेरे प्रेम का विषय बनना था ।
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चेतन और प्रकृति, स्त्री और पुरुष, बीज और भूमि, चाह और रंग, पद और अर्थ ये शब्दों से भिन्न होने पर भी अर्थ में एक ही हैं । लैला मजनूं की प्रेमगाथा क्या सिर्फ़ एक नारी देहासक्ति रखने वाले पुरुष मजनूं की वासना भर है । या इसमें (और ऐसी सभी बङी घटनाओं में) सृष्टि का कोई गहरा रहस्य छुपा हुआ है ?
मेरे अनुभव से निसन्देह गहरा रहस्य है । क्योंकि यह बात सिर्फ़ लैला मजनूं पर ही नही । किसी भी आबाल वृद्ध पर यह लैला मजनूं सिद्धांत स्थापित है । सम्बद्ध है । लेकिन इसकी परिणित आम विपरीत लिंगी दैहिक वासना नही है । बल्कि कुछ और ही है ।
गहरे..और गहरे..और गहरे..अथाह गहरे तल में इसका भेद रखा है ।
क्या आप खोज सकते हैं ?

19 सितंबर 2016

पति..पत्नी का दर्पण

याज्ञवल्क्य के दो स्त्रियां थीं - मैत्रेयी और कात्यायनी । याज्ञवल्क्य बेहद धनी थे और भारत के धनी राजा के गुरु थे । एक समय आने पर अपना सभी धन सम्पत्ति दोनों स्त्रियों में बराबर बांटकर निर्जन एकान्त सेवन हेतु उनकी वनगमन की इच्छा हुयी ।
लेकिन मैत्रेयी ने धन सम्पत्ति लेने से इंकार कर दिया और कहा - यदि धन से अमरता प्राप्त हो सकती तो मेरे पति स्वयं उसका त्याग न करते ।
मैत्रेयी विदुषी महिला थी । उसने सोचा - मेरे पति जो भारतवर्ष के धनी इंसान हैं । इस दौलत को छोङकर विरक्तों का जीवन क्यों अपना रहे हैं ? कोई भी मनुष्य सुख सुविधाओं से परिपूर्ण जीवन को त्याग कर विरक्तों वाला असुविधाओं भरा जीवन तब तक ग्रहण नही करेगा ।
जब तक नये जीवन में पुराने के अपेक्षा अधिक सुख चैन और कुछ अतिरिक्त न हो । अतः अवश्य ही मेरे पति को इस जीवन से उस जीवन में अधिक सुख चैन नजर आता होगा ।

अतः उसने अपने पति से पूछा - क्या सांसारिक सम्पत्ति की अपेक्षा आध्यात्मिक सम्पत्ति में अधिक सुख है । अथवा फ़िर इसके विपरीत है ?
याज्ञवल्क्य बोले - अमीरों की जिन्दगी जो कुछ है सो है । परन्तु उसमें असली सुख, सच्चा आनन्द और वास्तविक स्वाधीनता नही है ।
मैत्रेयी ने कहा - वह कौन सी चीज है । जिसकी प्राप्ति मनुष्य को स्वतन्त्र बना देती है । जिसकी प्राप्ति मनुष्य को लौकिक लोभ और तृष्णा से मुक्त कर देती है । वह जीवन सुधा मुझे बताओ । मैं उसे चाहती हूँ ।
तब याज्ञवल्क्य की सभी सम्पत्ति कात्यायनी को मिल गयी । और मैत्रेयी को याज्ञवल्क्य की आध्यात्मिक सम्पत्ति प्राप्त हुयी ।
न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो ।
भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति ।
न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया । 
भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भव । 
वृहदारण्यक उपनिषद ।
- पति के प्रिय होने का कारण यह नही कि उसमें कुछ गुण हैं । या उसमें कोई विशेषता है । जो प्यार के योग्य है । उसके प्रिय होने का कारण कि वह स्त्री के दर्पण का काम देता है । जिस तरह हमें शीशे में अपना प्रतिबिम्ब दिखाई पङता है । उसी तरह पति रूपी दर्पण में स्त्री अपने आपको देखती है । और इसीलिये वह पति को प्यार करती है ।
- स्त्री पति को पति के लिये प्यार नही करती । बल्कि इसलिये कि पति में सच्चे तत्व, परमेश्वर, सच्चे परमात्मा के दर्शन होने चाहिये । 
यदि प्रेम के बदले प्रेम न मिलता । तो कोई किसी को प्रेम न करता । इससे सिद्ध है कि दूसरों में प्रतिबिम्बित हम केवल अपने आपको ही प्यार करते हैं । हम अपने सत्य आप (आत्मा) अंतरात्मा को  देखना चाहते हैं । और कभी किसी वस्तु को हम उसी के लिये प्यार नही करते ?

18 सितंबर 2016

एक दिन साहिब बेनु बजाई

विदेही ‘हंस’ से कृमशः ‘कैवल्य’ फ़िर एक छोटे दाल के गोल दाने बराबर ‘महाकारण’ उसके बाद अंगूठे के आधे पोरुवे के बराबर ‘कारण’ तथा इसके भी बाद अंगूठे के ही बराबर आकार और बनावट वाला ‘सूक्ष्म’ शरीर (जिसकी ही कारण वासनाओं/कल्पनाओं से स्थूल प्रकट हुआ है) तथा उसके उपरान्त प्रत्येक मनुष्य का (स्वयं के हाथ माप अनुसार) साढ़े तीन हाथ का यह ‘स्थूल’ शरीर ही वास्तव में ‘ब्रह्म से जीव’ तक की यात्रा है ।
इनके स्थान और उदय होने का कृम ठीक से समझ लेने पर तथा स्वांस की उत्पत्ति और फ़िर प्राण वायु में

मिलकर प्रसार को भलीभांति जान लेने पर निज स्वरूप आत्मा या परमात्मा को जानने का मार्ग या तरीका बेहद सरल हो जाता है । क्योंकि जिस कृम में जीव की विदेही हंस से देही स्थूल तक की यात्रा हुयी है । कृमशः ठीक इसके विपरीत कृम में चलने पर वह वापस फ़िर विदेही और आनन्ददायक, जन्म मरण रहित अवस्था में पहुँच जाता है ।
यदि आप चित्रों का सही अध्ययन कर लेते हैं । तो अब तक प्रकाशित चित्रों में इस गूढ़ रहस्य को बेहद आसान कर दिया गया है । शेष साहिब की कृपा पर भी निर्भर है ।
जेहि जानहि जाहि देयु जनाई । जानत तुमहि तुमही होइ जाई ।
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बस थोङा बुद्धि पर जोर दें । और अबूझ रहस्य पायें ।

दो सुर चलै सुभाव सेती । नाभी से उलटा आवता है ।
बीच इंगला पिंगला तीन नाङी । सुषमन से भोजन पावता है ।
पूरक करै कुम्भक करै । रेचक करै झरि जावता है ।
कायम कबीर का झूलना जी । दया भूल परे पछितावता है ।
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इससे भी ज्यादा सरलता से क्या बताया जा सकता है ? 

मुरसिद नैनों बीच नबी है ।
स्याह सफ़ेद तिलों बिच तारा । अविगत अलख रबी है ।
आँखी मद्धे पाँखी चमकै । पाँखी मद्धे द्वारा ।
तेहि द्वारे दुर्बीन लगावै । उतरै भौजल पारा ।
सुन्न सहर में बास हमारी । तहँ सरबंगी जावै ।
साहेब कबीर सदा के संगी । सब्द महल ले आवै ।
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कबीर साहिब का यह बेहद गूढ़ मगर मनोरंजक और एक अदभुत रहस्य कहने वाला पद मुझे बहुत पसन्द है । फ़िर भी इसे मैंने पहली बार प्रकाशित किया है । तो खोजिये इसमें क्या रहस्य है ?

एक दिन साहिब बेनु बजाई ।
सब गोपिन मिल धोखा खाई । कहैं जसुदा के कन्हाई ।
कोई जंगल कोई देवल बतावैं । कोई द्वारिका जाई ।
कोई अकास पाताल बतावैं । कोई गोकुल ठहराई ।
जल निर्मल परबाह थकित भै । पवन रहे ठहराई ।
सोरह बसुधा इकईस पुर लौं । सब मूर्छित होइ जाई ।
सात समुद्र जवै घहरानो । तैतीस कोटि अघानो ।
तीन लोक तीनों पुर थाके । इन्द्र उठो अकुलानो ।
दस औतार कृष्ण लौं थाका । कुरम बहुत सुख पाई ।
समुझि न परो वार पार लों । या धुन कहँ ते आई ।
सेसनाग औ राजा वासुक । वराह मुर्छित होइ आई ।
देव निरंजन आद्या माया । इन दुनहिन सिर नाई ।
कहें कबीर सतलोक के पूरूष । सब्द केर सरनाई ।
अमी अंक ते कुहुक निकारी । सकल सृष्टि पर छाई ।

14 सितंबर 2016

6 प्रकार के शरीर - स्थूल (1)

मैंने कई बार इसे दोहराया है कि आत्मा और परमात्मा (आत्मज्ञान) के बारे में सही, सटीक, प्रमाणिक और आरपार की जानकारी सरल शब्दों में चाहते हैं । तो फ़िर कबीर साहब के अतिरिक्त दूसरा विकल्प ही नही है । इस विषय पर उपलब्ध ज्यादातर वाणियां सिर्फ़ कबीर ज्ञान के आधार पर अपने शब्दों में बदल कर लिखी गयी हैं । जो कि थोङे भी गहन अध्ययनकर्ता को आसानी से गोचर होती है । अतः यदि वाकई ‘सत्यज्ञान की तलाश और प्राप्ति की चाह’ है । तो कबीर के बीजक साखी सबद रमैनी आदि के पदों का गहन अध्ययन करें ।
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मैंने प्रत्यक्ष और टीवी आदि माध्यमों में देखा है कि गुरु सदगुरु आदि उपाधि धारी भी बङे भाव के साथ इस तरफ़ मुङे जीव को स्पष्ट जानकारी नहीं देते । या कहिये स्वयं ही नहीं जानते । अतः जीव अपनी शिक्षा, मूलभूत जानकारी, परिवेश, संस्कार और धर्मभीरुता के चलते ज्ञान के बजाय और भी अधिक अज्ञान शिकंजे में जकङ जाता है । 
यद्यपि यह ज्ञान एक पूर्ण गुरु बिना लगभग असंभव ही है । परन्तु पिछले 20 वर्ष से अधिक समय से जिस रफ़्तार से सतगुरु अवतरित हुये । और जीवों का इस दिशा में तीवृ रुझान हुआ । उस दृष्टिकोण से कोई ज्ञान प्रकाश या लोगों के जीवन में सुख शान्ति सदाशयता देखने में नही आती ।
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मेरा प्रयास है । मुख्य और तकनीकी तथा आंतरिक स्थानों और स्थिति की सचित्र जानकारी सारगर्भित शब्दों में आम और जिज्ञासुओं को उपलब्ध करा सकूं । मैं इसको और भी सरल स्पष्ट करने हेतु विस्त्रत अर्थ व्याख्या कर सकता हूँ । परन्तु ध्यान रखिये - उधार का ज्ञान काम नही आता । अतः आपको खोजने समझने की मेहनत करनी ही होगी ।
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एक जीव को स्वतः पद । बुद्धि भ्रांति सो काल ।
काल होइ यह काल रचि । ता में भये बिहाल ।
बीहाले को मतो जो । देउ सकल बतलाय ।
जाते पारख प्रौढ़ लहि । जीव नष्ट नहि जाय ।
करि अनुमान जो शून्यभो । सूझै कतहूँ नाहि ।
आपु आप बिसरो जबै । तन विज्ञान कहि ताहि ।
ज्ञान भयो जाग्यो जबै । करि आपन अनुमान । 
प्रतिबिंबित झाईं लखै । साक्षी रूप बखान ।
साक्षी होय प्रकाश भो । महाकारण त्यहि नाम ।
मसुर प्रमाण सो बिंब भो । नील वरण घन श्याम ।
बढ़यो बिंब अध पर्व भो । शून्याकार स्वरूप ।
ताको कारण कहत हैं । महा अंधियारी कूप ।
कारण सों आकार भो । श्वेत अंगुष्ठ प्रमान ।
वेद शास्त्र सब कहत हैं । सूक्षम रूप बखान ।
सूक्ष्म रूप ते कर्म भो । कर्महि ते यह अस्थूल । 
परा जीव या रहट में । सहे घनेरी शूल । 
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संतौ षट प्रकार की देही ।
स्थूल सूक्ष्म कारण महँकारण केवल हंस कि लेही ।
साढ़े तीन हाथ परमाना । देह स्थूल बखानी । 
राता वर्ण बैखरी वाचा । जाग्रत अवस्था जानी । (राता = लाल)
रजोगुणी ओंकार मात्रुका । त्रिकुटी है अस्थाना ।
मुक्तिश्लोक प्रथम पद गायत्री । ब्रह्मा वेद बखाना ।
प्रथ्वी तत्व खेचरी मुद्रा । मग पपील घट कासा । 
क्षए निर्णय बङवाग्नि दशेंद्री । देव चर्तुदश वासा । 
और अहै ऋग्वेद बतायू । अर्द्ध शुन्नि संचारा ।
सत्यलोक विषय का अभिमानी । विषयानंद हंकारा ।
आदि अन्त औ मध्य शब्द । या लखै कोई बुधिवारा । 
कहै कबीर सुनो हो संतो । इति स्थूल शरीरा । 

6 प्रकार के शरीर - सूक्ष्म (महा) कारण (2)

6 प्रकार के शरीर - कैवल्य हंस (3) (क्लिक करें)

6 प्रकार के शरीर - सूक्ष्म (महा) कारण (2)

यद्यपि शरीर वर्णन का यह कृम उल्टा है । क्योंकि सीधा कृम - हंस>कैवल्य>महाकारण>कारण>सूक्ष्म>स्थूल.. यह है । परन्तु ज्यादातर हम स्थूल से ही अधिक परिचित होते हैं । फ़िर कोई कोई सूक्ष्म से, कारण शरीर तो आमतौर पर सामान्य लोग जानते ही नहीं । अतः शरीर वर्णन का कृम ‘हंस’ के बजाय ‘स्थूल’ से किया है ।
सूक्ष्म देह हम सभी के लिये एकदम अपरिचित नही है । स्वपन अवस्था और उसके अनुभव सूक्ष्म देह के ही होते हैं ।
यहाँ एक उल्लेखनीय बात ये भी है कि कबीरपंथियों का वेदों की बुराई करना और वेद समर्थकों द्वारा कबीर आदि सन्तों को महत्व न देना । वह भ्रांति इस 6 शरीर प्रकार विवरण से दूर हो जाती है । बस बात इतनी है कि ऐसे लोग इस ज्ञान को ठीक से समझने का प्रयत्न करें ।
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संतौ सुक्षम देह प्रमाना ।
सूक्षम देह अंगुष्ठ बराबर । स्वपन अवस्था जाना ।
श्वेत वर्ण ओंकार मात्रुका । सतोगुण विष्णु देवा । 
ऊर्ध्व सुन्न औ यजुर्वेद है । कंठ स्थान अहेवा । 
मुक्ति सामीप लोक बैकुंठ । पालन किरिया राखी । (सामीप्य मुक्ति)
मार्ग विहंग भूचरी मुद्रा । अक्षर निर्णय भाखी ।
आव तत्व को हं हंकारा । मंदाअग्नी कहिये । 
पंच प्राण द्वितीया पद गायत्री । मध्यम वाणी लहिये । 
शब्द स्पर्श रूप रस गंध । मन बुद्धि चित हंकारा ।
कहै कबीर सुनो भाई संतो । यह तन सूक्षम सारा ।
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संतौ कारण देह सरेखा ।
आधा पर्व प्रमाण तमोगुण । कारा वर्ण परेखा ।
मध्य शून्य मकार मात्रुका । ह्रदया सो अस्थाना । 
महदाकाश चाचरी मुद्रा । इच्छा शक्ती जाना । 
उदरा अग्नि सुषुप्ति अवस्था । निर्णय कंठ स्थानी ।
कपि मारग तृतीय पद गायत्री । अहै प्राज्ञ अभिमानी ।
सामवेद पश्यन्ती वाचा । मुक्त स्वरूप बखानी ।
तेज तत्व अद्वैतानन्द । अहंकार निरबानी । 
अहैं विशुद्ध महातम जामें । तामें कछु न समाई ।
कारण देह इती सम्पूरण । कहै कबीर बुझाई ।
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संतौ महाकारण तन जाना ।
नील वरण औ ईश्वर देवा । है मसूर परमाना ।
नाभि स्थान विकार मात्रुका । चिदाकाश परवानी । 
मारग मीन अगोचर मुद्रा । वेद अथर्वन जानी । 
ज्वाला कल चतुर्थ पद गायत्री । आदि शक्ति ततु बाऊ ।
आश्रय लोक विदेहानन्द । मुक्ति साजोजि बताऊ । (सायुज्य मुक्ति)
नृणै प्रकाशिक तुरी अवस्था । मत्यज्ञात्मतु अभिमानी ।
शीव अहंकार महाकारण तन । इहो कबीर बखानी ।

6 प्रकार के शरीर - कैवल्य हंस (3) (क्लिक करें)

6 प्रकार के शरीर - कैवल्य हंस (3)

मुझे लगता है कि ‘6 शरीर प्रकार’ की यह कबीरवाणी और इसके साथ प्रकाशित चित्रों का आपने सजगता और गम्भीरता से अध्ययन किया है । तो कोई कारण नहीं कि आप आदि सृष्टि, हंस से जीव होना और अज्ञानता के कारण कर्मचक्र (रहट डोरी) में फ़ंसकर घोर कष्ट उठाना आदि स्थितियों को सरलता से न समझ सके हों ।
जब आप इतना जान लेते हैं । तो फ़िर इस सबको तल पर जानने और अन्दर प्रविष्टि हेतु एक सक्षम मार्गदर्शक, गुरु से मिलने भर की आवश्यकता शेष रह जाती है । जो यदि पहुँचा हुआ है । तो फ़िर आत्मा से परमात्मा, जीव से ब्रह्म की यात्रा तुलनात्मक रूप से आसान ही है ।
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संतौ केवल देह बखाना ।
केवल सकल देह का साक्षी । भमर गुफ़ा अस्थाना ।
निराकाश औ लोक निराश्रय । निर्णय ज्ञान बसेखा । 
सूक्ष्म वेद है उनमुन मुद्रा । उनमुन वाणी लेखा ।
ब्रह्मानन्द कही हंकारा । ब्रह्मज्ञान को माना ।
पूरण बोध अवस्था कहिये । ज्योति स्वरूपी नाना ।
पुण्य गिरी अरु चारु मात्रुका । निरंजन अभिमानी । 
परमारथ पंचम पद गायत्री । परामुक्ति पहिचानी ।
सदाशीव औ मारग सिखा है । लहै सन्त मत धीरा ।
कालेतीत कला सम्पूरण । केवल कहै कबीरा ।
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संतौ सुनो हंस तन ब्याना ।
अवरण वरण रूप नहि रेखा । ज्ञान रहित विज्ञाना ।    
नहि उपजै नहि बिनसै कबहू । नहि आवै नहि जाही ।
इच्छ अनिच्छ न दृष्ट अदृष्टी । नहि बाहर नहि माही ।
मैं तू रहित न करता भोगता । नही मान अपमाना ।
नही ब्रह्म जीव न माया । ज्यों का त्यों वह जाना ।
मन बुद्धि गुन इन्द्रिय नहि जाना । अलख अकह निर्बाना ।
अकल अनीह अनादि अभेदा । निगम नीत फ़िर नाना ।
तत्व रहित रवि चन्द्र न तारा । नहि देवी नहि देवा ।
स्वयं सिद्धि परकाशक सोई । नहि स्वामी नहि सेवा ।
हंस देह विज्ञान भाव यह । सकल बासना त्यागे ।
नहि आगे नहि पाछे कोई । निज प्रकाश में पागे ।
निज प्रकाश में आप अपनपौ । भूलि भये विज्ञानी ।
उनमत बाल पिशाच मूक जङ । दशा पाँच यह लानी ।
खोये आप अपुनपौ सरबस । निज स्वरूप नहि जाने ।
फ़िरि केवल महाकारण कारण । सूक्षम स्थूल समाने ।
स्थूल सूक्ष्म कारण महाकारण । केवल पुनि विज्ञाना ।
भये नष्ट ये हेरफ़ेर में । कतौं नही कल्याना ।
कहे कबीर सुनो हो संतौ । खोज करो गुरु ऐसा ।
ज्यहि ते आप अपुनपौ जानो । मेटो खटका रैसा ।

10 सितंबर 2016

ध्यान बिन्दु

सुरति शब्द योग या सहज योग करने वाले ऋषियों मुनियों के लिये तथा सृष्टि रहस्य विज्ञान और आत्मज्ञान विज्ञान के शोधार्थियों, साधकों के लिये ध्यान यात्रा में घटने वाली प्रमुख वृतियों, सुर्तियों और घटनाओं, पढ़ाव आदि में ऐसी जानकारी युक्त विवरण न सिर्फ़ उन्हें सम्हलने की प्रेरणा देते हैं । बल्कि निरन्तर आगे बढ़ने को प्रोत्साहित भी करते हैं । अतः कबीर साहब की ‘भेदवानी’ शीर्षक के तहत यह सचित्र जानकारी ऐसे ही ध्यानार्थियों हेतु अधिकाधिक सरल तरीके से उपलब्ध कराने का हमारा तुच्छ प्रयास भर ही है । बाकी इससे किसको क्या लाभ मिला ? यह उस बन्दे और उसकी बन्दगी तथा साहेब कृपा पर निर्भर है ।
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इस विवरण का कृम नीचे से ऊपर की ओर है । अर्थात जब आप कंठ पर संयम करेंगे । तो प्रथम आद्या का स्थान और उसकी वर्तमान स्थिति और भूमिका से अनुभूत होंगे । अतः सही रूप में जानने/समझने/परखने हेतु नीचे से ऊपर की ओर पढ़ें ।

सत्त लोक (शंखों कोस ऊँचा)
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निर्वाण पद (सत्त पुरुष)
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बन्दीछोङ सतगुरु 
(अदल कबीर गद्दी) (5 शंख ऊँचाई) (16 सुतों के दीप)
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4 चकरी - धुन ।       8 चकरी - अनुरोध
3 चकरी - मुनिकर । 7 चकरी - बिनोद ।
2 चकरी - अगाध ।   6 चकरी - विलास
1 चकरी -  समाध ।  5 चकरी - रास ।  
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_/\_सत्य नगर_/\_
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7 सत्त सुन्न । सत भंडार (निःतत रचना)
6 सार सुन्न । सार भंडार 7 सत्त सुन्न । सत भंडार (निःतत रचना) 
5 अलील सुन्न । सतपुरुष (बन्दीवान)
4 अजोख सुन्न । शुद्ध ब्रह्म (आद्या का सृष्टि बीज लाना)
3 महासुन्न । महाकाल (आद्या को खाया)
2 सकल सुन्न । माया, निरंजन (अमर कोट की नकल) 
1 अभय सुन्न । आद्या
(बेहद के 7 सुन्न, ऊँचाई 7 शंख) (3 सुन्न तक काल क्षेत्र । फ़िर सत्त क्षेत्र )  
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तू सूरत नैन निहार । यह अंड के पारा है ।
तू हिरदै सोच विचार । यह देस हमारा है ।
पहिले ध्यान गुरन का धारो । सुरति निरति मन पवन चितारो ।
सुहेलना* धुन में नाम उचारो । तब सतगुरु लहो दीदारा है । (सहज)
सतगुरु दरस होइ जब भाई । वे दें तुमको नाम चिताई ।
सुरत सब्द दोउ भेद बताई । तब देखे अंड के पारा है ।
सतगुरु कृपा दृष्टि पहिचाना । अंड सिखर बेहद मैदाना ।
सहज दास तहँ रोपा थाना । जो अग्रदीप सरदारा है ।
सात सुन्न बेहद के माहीं । सात संख तिन की ऊंचाई ।
तीन सुन्न लों काल कहाई । आगे सत्त पसारा है ।
पिरथम अभय सुन्न है भाई । कन्या निकल यहाँ बाहर आई ।
जोग संतायन* पूछो वाही । मम दारा* वह भरतारा है । (कबीर, स्त्री)
दूजे सकल सुन्न कर गाई । माया सहित निरंजन राई ।
अमर कोट कै नकल बनाई । जिन अंड मधि रच्यो पसारा है ।
तीजे है महसुन्न सुखाली । महाकाल यहँ कन्या ग्रासी ।
जोग संतायन आये अविनासी । जिन गलनख छेद निकारा है ।
चौथे सुन्न अजोख कहाई । सुद्ध ब्रह्म पुरुष ध्यान समाई ।
आद्या यहँ बीजा ले आई । देखो दृष्टि पसारा है ।
पंचम सुन्न अलेल कहाई । तहँ अदली बन्दीवान रहाई ।
जिनका सतगुरु न्याव चुकाई । जहँ गादी अदली सारा है ।
षष्ठे सार सुन्न कहलाई । सार भंडार याही के माही ।
नीचे रचना जाहि रचाई । जा का सकल पसारा है ।
सतवें सत्त सुन्न कहलाई । सत भंडार याही के माही ।
निःतत रचना ताहि रचाई । जो सबहिन तें न्यारा है ।
सत सुन्न ऊपर सत की नगरी । बाट विहंगम बांकी डगरी ।
सो पहुंचे चाले बिन पग री । ऐसा खेल अपारा है ।
पहली चकरी समाध कहाई । जिन हंसन सतगुरु मति पाई ।
वेद भर्म सब दियो उङाई । तिरगुन तजि भये न्यारा है ।
दूजी चकरी अगाध कहाई । जिन सतगुरु संग द्रोह कराई ।
पीछे आनि गहे सरनाई । सो यहँ आन पधारा है ।
तीजी चकरी मुनिकर नामा । जिन मुनियन सतगुरु मति जाना ।
सो मुनियन यहँ आइ रहाना । करम भरम तजि डारा है ।
चौथी चकरी धुनि है भाई । जिन हंसन धुनि ध्यान लगाई ।
धुनि संग पहुँचे हमरे पाहीं । यह धुनि सबद मंझारा है ।
पंचम चकरी रास जो भाखी । अलमीना है तहँ मधि झांकी ।
लीला कोट अनंत वहाँ की । जहँ रास विलास अपारा है ।
षष्टम चकरी विलास कहाई । जिन सतगुरु संग प्रीति निबाही ।
छुटते देंह जगह यह पाई । फ़िर नहि भव अवतारा है ।
सतवीं चकरी बिनोद कहानो । कोटिन बंस गुरन तहँ जानो ।
कलि में बोध किया ज्यों भानो । अंधकार खोया ज्यों उजियारा है ।
अठवीं चकरी अनुरोध बखाना । तहाँ जुलहदी ताना ताना ।
जा का नाम कबीर बखाना । जो सब सन्तन सिर धारा है ।
ऐसी ऐसी सहस करोङी । ऊपर तले रची ज्यों पौङी* । (सीङी)
गादी अदली रही सिर मौरी । जहँ सतगुरु बन्दीछोरा है ।
अनुरोधी के ऊपर भाई । पद निर्बान के नीचे ताही ।
पाँच संख है याहि ऊँचाई । जहँ अदभुत ठाठ पसारा है ।
सोलह सुत हित दीप रचाई । सब सुत रहैं तासु के माहीं ।
गादी अदल कबीर यहाँ ही । जो सबहिन में सरदारा है ।
पद निरबान है अनंत अपारा । नूतन सूरत लोक सुधारा ।
सत्त पुरुष नूतन तन धारा । जो सतगुरु सन्तन सारा है ।
आगे सत्त लोक है भाई । संखन कोस तासु ऊँचाई ।
हीरा पन्ना लाल जङाई । जहँ अदभुत खेल अपारा है ।
बाग बगीचे खिली फ़ुलवारी । अमृत नहरें होहिं रही जारी ।
हंसा केलि करत तहँ भारी । जहँ अनहद घुरै अपारा है ।
ता मधि अधर सिंघासन गाजै । पुरुष सब्द तहाँ अधिक विराजै ।
कोटिन सूर रोम एक लाजे । ऐसा पुरुष दीदारा है ।  

जोरबा और बुद्धा

कबीर की ‘भेदवानियां’ आमतौर पर सामान्य लोगों के लिये उतनी उपयोगी नहीं होती । जितनी आत्मज्ञान के खोजी शोधियों के लिये होती हैं । फ़िर भी जनसामान्य का इस विषय में प्रवेश तो हो ही जाता है । लेकिन इस दिशा में कुछ न कुछ मंजिल तय कर चुके और ठहराव पर नया मार्ग खोजते  लोगों के लिये ऐसी वाणियां गूढ़ दुर्लभ संकेतों के समान होती हैं । अतः ऐसी वाणियों की एकदम खुले और सरल शब्दों में व्याख्या या स्पष्ट अर्थ हित के स्थान पर अहितकारी होती है । क्योंकि सबसे बङी बात फ़िर सैद्धांतिक पुष्टता, वैचारिक घटन और नीर क्षीर विघटन नही हो पाता । जो कि किसी भी सिद्ध ज्ञान की अनिवार्यता और आवश्यकता है । अतः उपरोक्त दृष्टिकोण के चलते ‘भेदवानी’ का अर्थ नही किया है । वैसे मुझे लगता है - यह बहुत कठिन भी नही है ।   
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चला जब लोक को । सोक सब त्यागिया । हँस को रूप सतगुरु बनाई ।
भ्रंग ज्यों कीटि को पलटि भ्रंगै किया । आप सम रंग द्वै लै उङाई ।
छोङि नासूत मलकूत को पहुँचिया । विस्नु की ठाकुरी दीख जाई ।
इन्द्र कुबेर रंभा जहाँ नृत करें । देव तैंतीस कोटिक रहाई ।
छोङि बैकुंठ को हंस आगे चला । सून्य में जोति जगमग जगाई ।
जोति परकास में निरखि निःतत्व को । आप निर्भय भया भय मिटाई ।
अलख निर्गुन जेही वेद अस्तुति करै । तीनहूं देव को है पिताई । 
भगवान तिन के परे सेत मूरत धरे । भग की आनि तिनको रहाई ।
चार मोकाम पर खंड सोरह कहे । अंड को छोर ह्यां तैं रहाई ।
अंड के परे स्थान आचिंत को । निरखिया हंस जब उहाँ जाई ।














सहस औ द्वादसौ रूह है संग में । करत किलोल अनहद बजाई ।
तासु के बदन की कौन महिमा कहौं । भासती देह अति नूर छाई ।
महल कंचन बने मनी ता में जङे । बैठ तहँ कलश अखंड छाजे ।
अचिंत के परे अस्थान सोहंग का । हंस छत्तीस तहवाँ विराजे ।
नूर का महल औ नूर की भूमि है । तहाँ आनन्द सौं दुंद भाजे ।
करत किलोल बहु भांति से संग इक । हंस सोहंग के जो समाजे ।
हंस जब जात षट चक्र को वेधि  के । सात मोकाम में नजर फ़ेरा ।
परे सोहंग के सुरति इच्छा कही । सहस बावन जहाँ हंस हेरा ।
रूप की रासि तें रूप उन को बनो । नाहिं उपमाहिं दूजी निबेरा ।
सुर्त से भेंट के सब्द की टेक चढ़ि । देखि मोकाम अंकुर केरा ।
सून्य के बीच में विमल बैठक तहाँ । सहज अस्थान है गैब केरा ।
नवो मोकाम यह हंस जब पहुंचिया । पलक बिलंब ह्वां कियो डेरा ।
तहाँ से डोरमिक* तार ज्यों लागिया । ताहि चढ़ि हंस गौ दै दरेरा । (मकङी)
भये आनन्द सो फ़न्द सब छोङिया । पहुँचिया जहाँ सतलोक मेरा ।
हंसिनी हंस सब गाइ बजाइ के । साजि के कलस वोहि लेन आये ।
जुगन जुग बीछुरे मिले तुम आइ के । प्रेम करें अंग सों अंग लाये ।
पुरुस ने दरस जब दीन्हिवा हंस को । तपनि बहु जन्म की तब नसाये ।
पलटि के रूप जब एक सो कीन्हिया । मनहुं तब भानु षोङस उगाये ।   
पुहुप के दीप पीयू्ष भोजन करै । सब्द की देह जब हंस पाई ।
पुष्प के सेहरा हंस औ हंसिनी । सच्चिदानन्द सिर छत्र लाई ।
दिपै बहु दामिनी दमक बहु भांति की । जहाँ घन सब्द की घुमङ लाई ।
लगे जहाँ बरसने गरज घन घोर के । उठत तहँ सब्द धुनि अति सुहाई ।
सुनै सोइ हँस तहँ जुत्थ के जुत्थ ह्वैं । एक ही नूर एक रंग रागे ।
करत विहार मन भावनी मुक्ति भे । कर्म और भर्म सब दूरि भागे ।
रंग औ भूप कोइ परख आवै नही । करत किलोल बहु भांति पागे ।
काम औ क्रोध मद लोभ अभिमान सब । छाङि पाखंड सत सब्द लागे ।
पुरुष के बदन की कौन महिमा कहौं । जगत में उभय कछु नाहि पाई ।
चन्द औ सूर गन जोति लागै नही । एकहू नख का परकास भाई ।
पान परवान जिन बंस का पाइया । पहुँचिया पुरुष के लोक जाई ।
कहैं कबीर यह भांति सो पाई हौ । सत्त की राह सो प्रगट गाई ।  

09 सितंबर 2016

मेरी पत्नी विधवा हो गयी

एक गांव में एक आधा पागल इंसान रहता था । गांव के कुछ आदमियों ने उस पागल के माध्यम से मजाक उत्सव मनाने का विचार किया । उन्होंने उस पागल को शराब पिला दी । और उसके बाद उस पागल के प्रिय मित्र को उसके पास सिखाकर भेज दिया ।
पागल का मित्र उसके पास जाते ही जोर जोर से रोने लगा ।
और बेहद सहानुभूति से उससे बोला - भाई, अभी अभी तेरे घर से आ रहा हूँ । बङे दुख की बात है । तेरी स्त्री विधवा हो गयी ।
इस पर वह पागल भी ‘मेरी औरत विधवा हो गयी’ कह कहकर जोर जोर से रोने लगा ।
अन्त में मजाक खूब हो जाने पर किसी ने पागल से पूछा - भाई, तुम क्यों रोते हो ?
पागल बोला - मेरी पत्नी विधवा हो गयी है । इसलिये रो रहा हूँ ।
वह बोला - यह कैसे हो सकता है । तुम जीते जागते हो और कह रहे हो कि मेरी स्त्री विधवा हो गयी । जब तक (उसके पति) तुम नही मरते । वह विधवा कैसे हो सकती है ? तुम मरे नहीं और तुम ही अपनी औरत के विधवा होने का शोक कर रहे हो । यह बङी अजीब बात है न ?
पागल बोला - तुम्हारी बात ठीक है । पर हमारे इस सबसे विश्वासी मित्र ने बताया है और अभी अभी ये मेरे घर से ही आ रहा है । इसकी बात गलत कैसे हो सकती है ? ये अपनी आँखों से उसे विधवा देख कर आया है ।
तुम तो कहते हो, सच मेरे भाई ।
पर घर से आया है, मोत्वर नाई ।
(यह दृष्टांत क्या कहता है ?)

03 सितंबर 2016

आँखें खुली या बन्द हों

परसों मैंने फ़ेसबुक पर इसी चित्र के साथ यह गूढ़ार्थ साखी पोस्ट की ।
शिवानन्द मौरो लरिका । अरु हैगो बाप ।
दोऊ जामैं एक संग । दोऊ आपहि आप ।
बादि कोई थिति नहि । और नाहि लोइ ।
बेटा नहि बाप कोइ । झगरौ न होइ ।
लरिका = पुत्र
(इसका अर्थ इस चित्र में भी छिपा है । वैसे पद भी सरल है)
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तब कुछ अन्य कमेंटस के साथ किन्ही ‘अनीता नेगी’ का निम्न कमेंट पोस्ट पर हुआ ।
Aadrniya..pranam
Kripya meri ek shanka ka nivaran kiziyega. Jab main khuli aakhon se dhyan karti hu. Bilkul aisi hi aakriti dhikhti hai. Jo gol gol ghumti bhi hai. Kripya bataiyega ye aakriti ka kya arth hai.? Aapki ati kripa rahegi
मेरा उत्तर -
ऐसी ही या इस तरह की मिलती जुलती रंगीन आकृति आपकी ध्यान में पहुंच और अचेतन कारण (वासना) पर निर्भर करती है । अतः यह स्थूल या सूक्ष्म (शरीर) से लेकर कारण और फ़िर सूक्ष्म प्रकृति के ‘कारण’ की भी हो सकती है ।
- लेकिन अगर यह गोल घूमती या कोई अन्य आन्दोलित क्रियात्मक है । तो यह अच्छा संकेत हैं । क्योंकि यह ध्यान उर्जा (चेतना) के सबल होने का लक्षण हैं ।

- वस्तुतः यह बहुत ठीक भी नहीं । क्योंकि आपके ध्यान से उत्पन्न उर्जा आगे मार्ग या दिशा न होने के कारण एक दायरे या कुछ बङे दायरे में अटक रहती है ।
- खुली आँखों का अपलक ध्यान सरल सुगम हो जाता है । इससे थिरता होनी आसान रहती है ।
- क्योंकि आपने सिर्फ़ थोङा ही विवरण दिया । उससे इतना ही बताया जा सकता है ।
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पुनः प्रति प्रतिक्रिया के रूप में अनीता नेगी की जिज्ञासा - 
Dhyanwad. Ye aakriti Bilkul inhi do rango ki.. Gahre andhere men khuli aankhon se dhyan par dikhti hai.. us ke pahle white aur sunhare... Bindu kan ekaththa hote hain. jo badlon ki tarah hote hain. Phir.. Ye sab galaxy ki jaise ghumte hai... Uske bad.. Chahe Aankhen band karo Ya Khuli. Koi fark nahi padta.. Dono hi dasha men ye ek saman dikhte hai.
Manyvar. Kripya Marg darshan Diziyega.
मेरा उत्तर -
यद्यपि यह कुछ हास्यास्पद सा लगता है । जबकि बङे बङे यौगिक उपलब्धियों के सहज दावे करने वाले बङे बङे मंडल, महामंडल विद कमंडल और बङे बङे ऋषी मूनी विद चिलम एण्ड धूनी अभी वर्तमान में इस धराधाम पर अवतरित हैं ।

लेकिन मेरे लम्बे साधुई जीवन में ऐसी जिज्ञासा और सत्य सरल वचन लेकर आने वाले हजारों में से महज दो चार साधक ही आये । जिनके वचन निर्दोष और यथा उपलब्धि के तल से उत्पन्न थे ।
अनीता की इस जिज्ञासा को पूर्ण सार्वजनिक रूपेण प्रस्तुत करने का कारण था - उनको ध्यान अवस्था में खुली और बन्द आँखों से समान दृश्यात्मक अनुभूतियां । जिसको सन्तों की भाषा में अन्दर बाहर एक होना कहा जाता है ।
इससे पूर्व सिर्फ़ एक विधवा और अधेङ आयु स्त्री ने ऐसा अनुभव मुझसे कहा । उनको अनीता से थोङा अधिक खुली आँखों से ‘कारण संस्कार’ या ‘मायिक विघ्न’ दिखते थे । सरल शब्दों में अलौकिक या सूक्ष्म पदार्थ, अस्तित्व आदि खुली आँखों से सहज ही दिखना ।
वैसे इससे भी बङी बङी असत्य उपलब्धियां गिनाने वाले भी मिले । पर वे महज मिथ्यावादी ही थे ।
अब अनीता की 2nd जिज्ञासा (ऊपर रोमन में) पर बात - ये आकृति बिलकुल इन्हीं दो रंगों (पोस्ट का चित्र देखें) की है । गहरे अंधेरे में खुली आँखों से ध्यान पर दिखती है । उसके पहले सफ़ेद और सुनहरे बिन्दु कण इकठ्ठा होते हैं । जो बादलों की तरह होते हैं । फ़िर ये सब गेलेक्सी के जैसे घूमते हैं । उसके बाद, चाहे आँखें बन्द करो या खुली । कोई फ़र्क नहीं पङता । दोनों ही दशा में ये एक समान दिखते हैं ।
समाधान - आकाशीय विद्युत जैसे चमकीले सफ़ेद के अतिरिक्त सभी सात रंग त्रिगुण अंतःकरण में ध्यान के समय जुङी या पूर्व की किन्तु उस समय प्रभावी वासना से दिखते हैं । जैसे क्लाइडोस्कोप या प्रिज्म सिर्फ़ धूप (प्रकाश) के सौजन्य से सप्तरंग की झिलमिल या बहुकला दृश्यों का निर्माण करते हैं ।
- वास्तव में यह सिद्ध त्राटक की लगभग 50% एकाग्रता है । जिसके कारण अंधेरे पटल की आवश्यकता होती है । पूर्ण सिद्धता में अंधेरा भी आवश्यक नहीं होता ।
- पूर्व में सफ़ेद और सुनहरे बिन्दु का एकत्रीकरण होना, ध्यान का केन्द्रबिन्दुत होना और फ़िर एकाग्र हो जाने से है । इनका बादल रूप विचारों के अन्तर्द्वन्दीय संयोजन को दर्शाता है । अर्थात अभी अन्तःकरण निशंक नही है (क्योंकि आपको आगे क्या कैसे, जैसा कुछ ज्ञात नही, यही बादलों की छाया बनती है)
- अब आपकी इस नयी घटना के प्रति तीवृ जिज्ञासा और लौ से उत्पन्न हुयी ध्यान उर्जा उत्पन्न दृश्य पदार्थों को बल देती है । और दृश्य या पदार्थ (गेलेक्सी घूमने के समान) गतिशील हो उठता है । क्योंकि सुरति आगे कहाँ कैसे जाये ? इसके बारे में गुरु, मार्ग और बोध नही है ।
- क्योंकि यह लगभग सिद्ध त्राटक और क्रियायोग के जैसा मिश्रण हो जाता है । अतः यह मस्तिष्क की शून्य स्थिति (शून्य ध्यान) को उत्पन्न करता है । अतः आखें खुली या बन्द (क्योंकि मूल में तो आँख 1 ही है) दोनों स्थिति में समान दिखता है ।
निराकरण - वास्तव में आपके पास साधारण अष्टांग योग से आगे का गुरु नही है । जब गुरु मिल जायेगा । तो सुरति सिर्फ़ गुण+उर्जा के दायरे से निकलकर (गुरु अनुसार) लक्ष्य या अनन्त की ओर जाने लगेगी ।

2 घन्टे = 50 वर्ष

फ़ेसबुक पर नरेश आर्य की पोस्ट -
रैवतक राजा की पुत्री का नाम रेवती था । वह सामान्य कद के पुरुषों से बहुत लंबी थी  । राजा उसके विवाह योग्य वर खोजकर थक गये । और चिंतित रहने लगे । थक हारकर वो योगबल के द्वारा पुत्री को लेकर ब्रह्मलोक गए । राजा जब वहां पहुंचे । तब गन्धर्वों का गायन समारोह चल रहा था । राजा ने गायन समाप्त होने की प्रतीक्षा की ।
गायन समाप्ति के उपरांत ब्रह्मदेव ने राजा को देखा । और पूछा - कहो, कैसे आना हुआ ?
राजा ने कहा - मेरी पुत्री के लिए किसी वर को आपने बनाया अथवा नहीं ?
ब्रह्मा जोर से हंसे । और बोले - जब तुम आये । तब तक तो नहीं । पर जिस कालावधि में तुमने यहाँ गन्धर्वगान सुना । उतनी ही अवधि में पृथ्वी पर 27 चतुर्युग बीत चुके हैं । और 28 वां द्वापर समाप्त होने वाला है । अब तुम वहां जाओ । और कृष्ण के बड़े भाई बलराम से इसका विवाह कर दो । अच्छा हुआ कि तुम रेवती को अपने साथ लाए । जिससे इसकी आयु नहीं बढ़ी ।
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मेरी प्रतिक्रिया - 

कथा का वैज्ञानिक संदर्भ - अपनी आरिजनलिटी को लेकर सत्य और ठोस है । लेकिन लोग असली बात समझे नहीं ।
- दरअसल रेवती ने बलराम को पति रूप में पाने को घोर तपस्या की । सम्बन्धित इष्ट तप पूर्ण होने पर अभीष्ट वरदान के लिये बोला । रेवती ने बलराम को मांगा । उस इष्ट ने (संभवत) कई हजार वर्ष बाद बलराम के किसी संस्करण से विवाह हेतु वरदान दिया । रेवती बिफ़र
गयी । बोली - या तो वर वापिस लो । अन्यथा अभी विवाह हो । फ़िर किसने देखा है ?
वर वापिस होने से वर मर्यादा भंग हो सकती थी ।
- तब उपाय के रूप में प्रथ्वी का तत्कालिक कालमान + वरदान समय का कालमान
- फ़िर किसी वृहद समय क्षेत्र का कालमान - वरदान समय का कालमान = रेवती को वर प्राप्ति को दिया कालमान ।
मामला ऐसे था ।
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संकर सहज सरूप संभारा । लागि समाधि अखंड अपारा
बीते संबत सहस सतासी । तजी समाधि संभु अबिनासी ।
रामचरित मानस (बालकाण्ड)
अब पार्वती (या शायद सती) समाधि लगने से तजने तक उनके पास ही बैठी हैं । और बहुत अधिक दो-तीन दिन की ही बात रही होगी । लेकिन जिस zone में शंकर गये और जितनी देर समाधिस्थ रहे । वह प्रथ्वी के समय मान अनुसार (87) सतासी हजार वर्ष के बराबर था ।
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-ऐसे ही कालमान में एक रोटी सिकने की अवधि में अर्जुन ने पूरा जीवन जिया ।

- एक राजा का प्रथ्वी के 2 घन्टे में लगभग 50 वर्ष का जीवन मिट (समाप्त)  किया गया । 
- राम जन्मोत्सव और लंका से अयोध्या वापिसी पर 1 माह का 1 दिन रहा ।
- अभी कलियुग में स्वामी रामतीर्थ ने 3 घन्टे के लिये सृष्टि रोक दी थी ।
ये उदाहरण तो सामान्य और प्रसिद्ध उदाहरणों में से हैं । 
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नरेश आर्य - कलियुग में स्वामी रामतीर्थ ने 3 घन्टे के लिये सृष्टि रोक दी थी ।
..कृपया विस्तार से बताये स्वामीजी !
उत्तर - किसी विदेश यात्रा के दौरान एक राजा और रामतीर्थ दोनों जलपोत पर थे । तब किसी प्रसंग में रामतीर्थ ने राजा का उपहास करते हुये कहा - वो काहे का राजा । असली शहंशाह मैं हूँ ।
राजा को साधारण वस्त्र और सन्यासी वेश रामतीर्थ की बात सुनकर आश्चर्य हुआ । पर वह व्यंग्य से बोला - आप कहाँ के शहंशाह हैं ?
इस पर रामतीर्थ ने कहा - समस्त सृष्टि का । यह सूर्य चाँद तारे आदि मेरी सत्ता में ही तो हैं ।
राजा के पुनः प्रति व्यंग्य पर रामतीर्थ ने ‘सुन्नमंडल’ से ध्यान एकाग्र कर समस्त ग्रह आदि को ठहरने का आदेश दिया । और सृष्टि रुक गयी ।
यह स्पष्ट पता नहीं । पर शायद वह व्यक्ति राम का शिष्य भी हुआ था ।
रामतीर्थ जब चर्च प्रभावित देशों में गये । तो उनके वाणी प्रभाव से लोग बोले - ईसा आ गये । ईसा आ गये ।
तब भी उन्होंने कहा था - मैं ईसा नहीं ईसा का बाप हूँ ।
इसकी पुष्टिगत वैज्ञानिक विवेचना थोङे विस्तार की मांग करती है । पर यह घटना 100% सत्य है । स्वामी रामतीर्थ के हिमालयीन प्रवास के दौरान शेर बाघ जैसे हिंसक जानवर उनके पैर चाटते थे । और पास बैठे रहते थे ।
हिंसक जानवर वाली बात बुद्ध के साथ भी थी । इसी को अरिहन्त पद कहते हैं । कम से कम मेरे निश्चय मत से रामतीर्थ के चमत्कारिक जीवन की सभी घटनायें सत्य हैं । 
पर उनका रहस्य text में समझाना कुछ असंभव सा है । क्योंकि एक अनजानी बात ढ़ेरों प्रश्न उत्पन्न कर देती है ।

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