दान महत्ता

सर्वप्रथम तो मैं यही स्पष्ट कर दूँ कि हम किसी से कोई दान आदि नही लेते और न ही किसी संस्था विशेष, व्यक्ति विशेष या (धर्म) गुरु विशेष को दान देने का ही आग्रह (और सिफ़ारिश) करते हैं । 
फ़िर भी इस पेज पर बेव डिजायनर की चूक से लिख गया Donate Us दरअसल ‘दान महत्ता’ शब्द होना चाहिये था । जो कि अवसर और डिजायनर का संयोग बनने पर ठीक किया जायेगा ।
फ़िर भी दान एक ऐसा सृष्टिगत कार्य है । जिसकी बेहद महत्ता है और जो बहु जीवन के पक्षों पर सूक्ष्म अवलोकन करने से स्वयं ही समझ में आ जाता है कि - दान क्या है और उसका क्या महत्व है ?
गांठी दाम न बांधहि । नहि नारी से नेह ।
कहि कबीर उन सन्तन की । हम चरनन की खेह ।
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सबसे पहली बात तो यही है कि कोई भी दान हम तभी कर सकते हैं । जबकि वैसा करने लायक हमारी स्थिति और वैसी ही धर्मार्थ भावना का संयोग बने । अन्यथा दान का हो पाना संभव ही नही ।
दान या पुण्यार्थ कार्यों में सिर्फ़ बङे मूल्यांकन वाले जैसे धन, जमीन, वस्तु, वस्त्रादि ही नहीं बल्कि प्यासे को पानी, भूखे को भोजन, नंगे को वस्त्र और जरूरत मन्द को शारीरिक, मानसिक मदद करना भी दान की ही श्रेणी में आता है ।
एक बात (या सूत्र) सदैव ध्यान में रखें कि परस्पर जीव पूरक सृष्टि में आप किसी के लिये ‘एक तिनका’ जैसा भी कुछ सहयोग या कोई कार्य नही कर सकते । क्योंकि कोई भी जो कुछ भी करेगा । वह अभी या भविष्य में सिर्फ़ ‘उसी के लिये’ होगा । 
कंचन दीया करन ने । द्रोपदी दीया चीर ।
जो दीया सो पाईया । ऐसे कहे कबीर ।

अतः जैसा कि मैंने कहा ‘परस्पर जीव पूरक सृष्टि’ में आप कुछ भी, कर भी तभी सकते हैं । जब सृष्टिकर्ता आपको इसका अवसर और साधन उपलब्ध करायेगा और ऐसा वह तभी करता है । जब इससे पूर्व के धन का आपने परमार्थिक सदुपयोग किया हो । अन्यथा अवसर बनेगा ही नही ।   
धर्म किये धन ना घटे । नदी ना घट्टै नीर ।
अपनी आँखों देखि ले । यों कथि कहहिं कबीर ।
सनातन आदि परम्परा से ही धर्मार्थ विषय का कहना है कि - एक रोटी के चार भाग किये जाने चाहिये । एक अतिथि के लिये, एक भिक्षुक के लिये, एक परिवार हेतु और शेष एक ग्रहस्वामी हेतु । ये नियम है । एक रोटी का अर्थ यहाँ एक दिन के उपार्जन से है । अतः सीधी सी बात है कि हमें 25% दान (भिक्षुक आदि) और 25% जागतिक व्यवहार (अतिथि आदि) हेतु करना चाहिये । भिक्षुक, जरूरत मन्द को किया हुआ ही आगे फ़लित होकर पुण्य फ़ल के रूप में प्राप्त होता है और अतिथि आदि को किया हुआ आगे के जागतिक व्यवहार में संस्कार बनकर लौटता है । 
सहज मिले तो दूध है । माँगि मिलै सौ पानि ।
कहैं कबीर वह रक्त है । जामे ऐंचातानि ।
यह वह दान हुआ जो हम सामान्य और निगुरा अवस्था में करते हैं ।
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गुरु धारण करने पर - अज्ञान से ज्ञान भूमि में आ जाने पर यानी निगुरा से सगुरा हो जाने की स्थिति में (यदि सच्चा गुरु मिल जाये) आप यदि समर्पित शिष्य की श्रेणी में आ जाते हैं । तो फ़िर जीवन के 4 पुरुषार्थों में से धर्म और मोक्ष की आपकी चिन्ता गुरु की हो जाती है । शेष दो पुरुषार्थ काम (नाओं पर नियन्त्रण) और अर्थ का संचालन, उपार्जन और निस्तारण आपके मुख्य कर्तव्य रह जाते हैं । मतलब अब आपको परलोक के लिये जप, तप, तीर्थ, वृत, दान आदि कुछ नहीं करना । बल्कि शास्त्र और धर्मग्रन्थ सम्मत उपार्जित का दसवां भाग 10% गुरु को स्थिति अनुसार अर्पित करते रहना है ।
अनमांगा उत्तम कहा । मध्यम माँगि जो लेय ।
कहैं कबीर निकृष्टि सो । पर घर धरना देय ।
गुरु को ये धन क्यों, इसका क्या उपयोग और क्या प्राप्ति - इस पर दरअसल बहुत विस्तार से लिखना होगा । परन्तु संक्षेप में, यह धन गुरु स्थान, खानपान की व्यवस्था और स्थान सम्बन्धी अन्य परमार्थिक कार्यों में व्यय होता है । फ़िर भी आप ये न समझें कि आप इस व्यवस्था में कुछ सहयोग कर रहे हैं । मैंने पहले ही कह दिया है - एक बात (या सूत्र) सदैव ध्यान में रखें कि परस्पर जीव पूरक सृष्टि में आप किसी के लिये ‘एक तिनका’ जैसा भी कुछ सहयोग या कोई कार्य नही कर सकते । 
प्रीति रीति सब अर्थ की । परमारथ की नहिं ।
कहैं कबीर परमारथी । बिरला कोई कलि माहिं ।
गुरु द्वारा दान नियोजन का अर्थ है । आपने एक स्थायी सुखद सुदृढ़ भविष्य के लिये निवेश किया है । लेकिन रहस्य की बात यह है कि आपका द्वारा किया सभी दान सिर्फ़ खाते में जमा नही होता । बल्कि शुरूआती बहुत सा दृव्य आपके काल ऋण को उतारने में ही व्यय हो जाता है । इस बात को थोङा गहराई से समझें । 
खाय पकाय लुटाय के । करि ले अपना काम ।
चलती बिरिया रे नरा । संग न चले छदाम ।
क्योंकि मैंने स्वयं बहुत से लोगों का आया हुआ दान बरबाद और निष्प्रयोज्य व्यय होते देखा है । अक्सर यह 80% तक भी हो जाता है । एकदम शुद्ध सात्विक प्रकृति और लगभग धर्मात्मा की श्रेणी में आने वाले लोगों का भी 20 से 35% तक यूँ ही नष्ट हो जाते देखा है । यहाँ पर ‘चोरी का माल मोरी में’ और ‘मेहनत की कमाई, सकै ना लुटाई’ वाली कहावत पर ध्यान दें ।
परमारथ पाको रतन । कबहुँ न दीजै पीठ ।
स्वारथ सेमल फूल है । कली अपूठी पीठ ।
ऐसा नही कि आप एक संकल्प कर लें कि ये हो जाने पर या इतना हो जाने पर आप दान धर्म की शुरूआत करेंगे । 99 का खेल ऐसा कभी करने ही नही देता । घोर गरीबी होने पर भी आप किसी अभीष्ट की प्राप्ति हेतु उसे बेहद संकुचित स्थिति में 1-2 पैसा करके जोङते हैं और दैव अनुकूल होने पर अभीष्ट पाते हैं । यही दान धर्म का भी मर्म है ।
सत ही में सत बाटई । रोटी में ते टूक ।
कहै कबीर ता दास को । कबहुँ न आवै चूक ।
और ये भी नही कि आप एक निश्चित आयु तय कर लें कि 30 या 40 या 50 वर्ष पर या फ़लाना कार्य पूरा हो जाने पर ही कोई धर्मादि कार्य शुरू करेंगे । क्योंकि जीवन का कोई पता नही । जैसे ही जन्म हुआ । काल घात लगाकर बैठ गया ।
सुमिरन करहु राम का । काल गहे है केस ।
ना जाने कब मारि है । क्या घर क्या परदेस ।
और एक बार कूच का बिगुल बज गया । फ़िर 2 स्वांसों की भी मोहलत नही मिलती । याद करें, सिकन्दर ने 1 दिन के जीवन के लिये आधी सम्पत्ति का प्रस्ताव रखा था । लेकिन उसके चिकित्सकों ने कहा - पूरी भी देने पर 5 मिनट भी देना हमारे लिये संभव नही ।
देह खेह होय जागती । कौन कहेगा देह ।
निश्चय कर उपकार ही । जीवन का फल येह ।
अतः जैसा कि किसी भी गैर लाभकारी संस्था के साथ हमेशा ही होता है कि वह धर्मार्थ और सामाजिक हितार्थ दानकर्ताओं के सहयोग से ही चलती है । विश्व के अनेकानेक लोग किसी सच्ची और ईमानदार संस्था को परमार्थ और परोपकार के उद्देश्य से अपना बहुमूल्य धन दान करना चाहते हैं । अतः यदि आप दान करने के इच्छुक हैं । तो पूर्ण विवेक, पूर्ण भावना, निष्काम भाव से स्व इच्छा, स्व विवेक से जहाँ भी आपकी भावना बने । अंतरात्मा की आवाज उठे । वहाँ आगामी समय और आगामी जन्मों हेतु श्रद्धा सामर्थ्य अनुसार कुछ न कुछ दान अवश्य करें ।
सत साहेब !
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