31 जनवरी 2017

खुदा गवाह

सितारों से आगे जहाँ और भी है ।  
पूजा-पाठ, इन दो शब्दों पर अर्थाभाव (इनका अर्थ ज्ञात न) होने से ‘सनातन धर्म’ जैसे जङ तक मुर्झा गया । लेकिन शायद ही किसी का हिन्दू समाज में अति प्रचलित इन दो विनाशक (बन गये) शब्दों पर ध्यान गया है ।
पूजा तमिल भाषा का शब्द है । इसके मूल अर्थ से क्या ध्वनित है ? खुद मुझे भी अभी नही पता ।
यह ‘शब्द’ कब और कैसे हमारे सभी ‘भक्ति’ शब्दों को हटाकर स्थापित हुआ, बेहद आश्चर्य और खोज का विषय है । क्योंकि आज भी इस शब्द की विभक्ति, भाव और अर्थ समझने में हम असमर्थ हैं ।
दूसरा शब्द पाठ है, जो पठन विषय, पठन लेख के लिये है ।  
अतः इन दोनों ‘पूजा पाठ’ का अर्थ आज सिर्फ़ भक्ति सम्बन्धी आर्त (आदि) शब्दों को उच्चारना और तत्सम्बन्धित कुछ क्रियाकलाप कर लेना भर रह गया ।
अध्ययन, मनन, चिन्तन, स्वाध्याय, फ़िर कृमशः यज्ञ, हवन, व्रत, ज्ञान, सिद्धि होना आदि के बारे में तो हमें दूर दूर तक नही पता । 
यज्ञ (यह जानना) हवन, हव्य, (अंतर) ज्योति, आराधना (सुरति चढ़ाना) उपासना (समीप आसन) व्रत (बरतना) उपवास (समीप होना) एकादशी (5 ज्ञान 5 कर्मेंदिय 1 मन का एकीकरण) स्तुति (भाव पूर्ण शब्द) वन्दना, आरती (आर्त या दुख निवारण हेतु कहे शब्द) प्रार्थना, मन्त्र, तन्त्र आदि भी ।
इसलिये भक्ति जैसे सनातन ‘सृष्टि विज्ञान’ और ‘स्वयंसत्ता’ को जानने का ज्ञान अधिकतर सिर्फ़ किसी प्रिय लग गये देव, इष्ट के चित्र, मूर्ति, मन्दिर आदि में अगरबत्ती जलाना, फ़ूल चढ़ाने भर तक सीमित होकर रह गया ।
यह तो हिन्दू और कुछ अन्य समुदायों की बात रही ।
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मुस्लिमों के नूर, रूह, कलमा (अंतर्धुनि, गैबी या आसमानी सदा) अजान, नमाज, रोजा, इबादत, बन्दगी, बन्दा, खुदा (खुद, स्वयं, मन) आदि आदि कुछ आम प्रचलित शब्दों को छोङकर अन्य के बारे में मुझे ज्ञात नही ।
लेकिन मुस्लिम समाज को भी काफ़ी निकट से देखने के अनुभव से मुझे ज्ञात है कि उनके भी मजहबी क्रियाकलाप सिर्फ़ बाहरी तौर पर अधिक हैं यानी बेचून (निराकार) ‘एकेश्वर’ का मुख्य सिद्धांत होते हुये भी उनका अल्लाह से ‘एकीकरण’ सिर्फ़ भावनात्मक है ज्ञानात्मक (यानी उसे जानना, महसूस करना) नही ।
और देखा जाये तो भारत की मुख्य समस्या ‘हिन्दू-मुस्लिम का वैचारिक धार्मिक अलगाव’ जो विकास को बाधित करने वाला और अन्य सभी समस्याओं का मूल है । इसी ‘नाजानकारी’ की वजह से है । जबकि ‘धर्मग्रन्थों’ में ऐसा कुछ विरोध नही है बल्कि एक ही बात कही है ।

~ यहाँ एक प्रमुख विरोधी तर्क के रूप में कुर’आन और मनुस्मृति आदि जैसे कुछ ग्रन्थों में, जो बाद में सामाजिक नियम, व्यवहार लगभग मनमाने ढंग और साजिश या स्वार्थवश जोङे लगते हैं, की बात कही जा सकती है ।
पर यदि विवेक से विचारा जाये तो इसका मूलभक्ति और मूलज्ञान से कुछ लेना देना नही ।
- हिन्दुओं में अच्छे सन्तों, योगियों तथा मुस्लिमों में नामी सूफ़ी फ़कीरों और ईसाई आदि अन्य समुदायों में भी समय समय पर महापुरुषों का होना इसका सबल प्रमाण है ।
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अतः इस लेख में खास उन ‘शब्दों’ और ‘मुकामों’ की वैज्ञानिक स्थिति और वर्णन है, जो मूल भक्ति और मूल ज्ञान से सम्बन्धित हैं । 
इनका अध्ययन कर गहरे विचार करने पर पूर्वाग्रह और धारणा बदल सकती है ।
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मनुष्य शरीर सृष्टि (के विराट माडल) का मूर्तरूप है । इसमें मौजूद सभी भाग सृष्टि का (symbloic) प्रतिनिधित्व करते हैं । इस शरीर रूपी यन्त्र को खास विधि से योग प्रविष्टि करने पर ‘योग अभ्यासक’ (शगल-शागिल) सभी आसमानों से सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं । 
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15 आसमान - राधास्वामी धाम, (कुल मालिक) परमपिता (फारसी में) ‘आसमान-ए-राधा स्वामी’
स्थान - 14वें चक्र से ठीक 2 उंगली ऊपर दिमाग वाला हिस्सा (जहाँ बाहर सर पर भवंरा रहता है)
हरपल हरदम ध्वनि - राधा स्वामी !
इसी स्थान से निम्न सृष्टि-रचना, ‘कुल-मालिक’ की मौज से अस्तित्व में आई ।
नीचे बताए सभी 14 आसमान इस आसमान के एक किनके के बराबर हैं ।
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14वां आसमान - ‘अगम देश’ (फारसी में) ‘आलम-ए-हस्तीहस्त’ 
स्थान - 12वें चक्र से ठीक 2 उंगली ऊपर दिमाग वाला हिस्सा ।  
आसमानी शब्द - गुप्त ।
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13वां आसमान - ‘अलख देश’ (फारसी में) ‘आलम-ए-हस्त’
स्थान - 12वें चक्र से ठीक 2 उंगली ऊपर दिमाग वाला हिस्सा ।
आसमानी शब्द - गुप्त । 
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12वां आसमान - ‘सत्तदेश’ (फारसी में) ‘आलम-ए-हुत’ यानि ‘आसमान-ए-हक’ 
स्थान - 11वें चक्र से ठीक 1 उंगली ऊपर दिमाग वाला हिस्सा ।
खुदा - ‘सत्तपुरुष’ (संतमत अनुसार)
हरदम ध्वनि - ‘सत्त..सत्त’ और ‘हक..हक’ 
उपलब्धि - गुरुनानक, मौलाना रुम, जगजीवन साहब, चरणदासजी, पलटू साहब ।
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नीचे बताए सभी आसमान (संतमत) महाकाल (फारसी में) ‘हैवान-ए-बुलंद’ ने पैदा किये 
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11वां आसमान - ‘भवंरगुफा’ (फारसी में) ‘आलम-ए-हुतलहूत’
स्थान - 10वें चक्र से ठीक 1 उंगली ऊपर दिमाग वाला हिस्सा
खुदा - ‘महाकाल’ यानी  ‘हैवान-ऐ-बुलंद’ !
हरदम ध्वनि - ‘सोंऽहं..सोंऽहं’ और ‘अनाहू-अनाहू’ 
उपलब्धि - सूरदास, रैदास जैसे महायोगी
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10वां आसमान - ‘महासुन्न’ (फारसी में) ‘आलम-ए-हाहुत’ 
स्थान - 9वें चक्र से ठीक 1 उंगली ऊपर दिमाग वाला हिस्सा 
शब्द - गुप्त । 
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9वां आसमान - ‘सुन्न’ [परब्रह्म पद] (फारसी फ़कीरों ने) ‘आलम-ऐ-लाहुत’
स्थान - 8वें चक्र से ठीक 1 उंगली ऊपर दिमाग वाला हिस्सा !
हरदम ध्वनि - ‘राँ..राँ’ 
‘रामलोक’ (रामायण में)  श्रीराम, श्रीकृष्ण अवतार स्थान, स्थिति !
श्रीमदभगवत गीता इसी स्थान से सम्बन्धित है । गीता में इस स्थान को ‘बैकुंठ’ कहा है ।
हिन्दू धर्मं में वर्णित सबसे ऊँचा और आखिरी आसमान !
हिन्दू धर्मं यही तक की जानकारी देता है ।
उपलब्धि - ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती, हजरत मंसूर, हाफिज शिराजी, हजरत सरमद
नीचे बताये सभी आसमानों का इसी आसमान के खुदा ने निर्माण किया है । 
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8वां आसमान - ‘ब्रह्मलोक’ या ‘त्रिकुटी’ (त्रिकोण) (मुस्लिम फ़कीरों ने) ‘मुसल लसी’ कहा । 
(मुसल-लसी यानी त्रिकोण)
मुसल-लसी मानने वालों को मुसलमान कहा जाता है । 
स्थान - 7वें चक्र से ठीक 1 उंगली ऊपर दिमाग वाला हिस्सा
हरदम ध्वनि - ‘ओं..ओं’ या ‘हु..हु’ 
वेद व्यास ने वेदों में ब्रह्मलोक यानि 8वें आसमान तक का जिक्र है और ‘ओउम-ॐ’ शब्द को ईश्वर ।
इसे ‘अर्श कुर्सी’ या ‘अर्श आजिम’ भी कहते हैं ।
कुर’आन में इस ‘हु-हु’ मंत्र को ‘अल्लाह’ (श्रेष्ठ) और ‘अकबर’ (महान) कहा है ।
‘ब्रह्मदेव’ [जिब्राइल] (मुस्लिम ग्रंथों में) ‘खुदा-ए-अजीम’ (अल्लाह-हु-अकबर)
ब्रह्मदेव की स्थिति हजार पंखुडियों वाले कमल के ऊपर होती है ।
यहीं से 5 तत्व - काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार (जिब्राइल) पैदा होते हैं । 
संतमत में इसे ‘कालदूत’ और कुर’आन में ‘पाँच फ़रिश्ते’ कहा है ।
इस्लाम में इसका वर्णन बेहद संक्षिप्त और पेचीदा शब्दों में है । इस्लाम यहीं तक है । 
उपलब्धि - कई महायोगी, धर्माचार्य, अवतार, पैगम्बर इस दुनिया में समय समय पर प्रगट हुये । सभी ने योग साधना के बल पर यह सिद्धि (स्थिति) प्राप्त की ।
उदाहरण
भारत में - वेदव्यास जी, परशुराम, लंकाधीश रावण, शिवजी, जैन मुनि ऋषभ देव ।
मध्य एशिया - पैगम्बर मुहम्मद साहब ।
नीचे बताये सभी आसमानों का इस आसमान के खुदा ने निर्माण किया है । 
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7वां आसमान - ‘सहस्त्रदल कँवल’ [स्वर्ग लोक, जन्नत] (मुस्लिम ग्रंथों में) ‘अर्श’
स्थान - 6ठें चक्र से ठीक 1 उंगली ऊपर दिमाग वाला हिस्सा
हरदम ध्वनि - ‘निरंजन-निरंजन’ 
वेदों में इसे चन्द्रलोक भी कहा है । रूहानी चाँद के दर्शन यहीं होते है ।
‘कुर’आन शरिया’ में मुहम्मद साहब ने इस आसमान को पार करने के जिक्र को ‘शक्क-उल-कमर’ (यानि चाँद को काट कर पार जाना) कहा है ।
नीचे के 6 आसमान असल में इस 7वें और अन्य बताये जाने वाले आसमानों यानी रुहानी लोकों की छायाएं हैं । इसीलिए ‘संतमत’ में उन्हें मुख्य आसमान नहीं माना जाता ।
7वें आसमान से ही आसमानों की गिनती की जाती है ।
नीचे बताये सभी आसमानों का निर्माण इसी आसमान के खुदा ने किया है ।
(एक बहु-प्रचलित कहावत ‘खुदा सातवें आसमान पर बैठा/रहता है’ ध्यान करें)
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6वां आसमान - ‘छठवां’ लोक’
स्थान - दोनों आँखों के बीच (जहाँ नाक का उदगम है) पौन इंच अन्दर से लेकर एक इंच अन्दर तक के हिस्से में ।
शरीर में (भ्रमर रूप जीवात्मा) रूह की बैठक इसी हिस्से में होती है और मृत्यु के वक्त रूह (चेतना) इसी चक्र पर सिमट जाने से शरीर की मृत्यु हो जाती है ।
ईसामसीह यहीं से आये थे । ईसाईयों का ‘क्रोस’ यही है ।
मुहम्मद साहब का ‘बुराक’ यहीं से शुरू होता है ।
इन 3 आसमानों (आसमान 4-5-6) और मानव शरीर में उनकी स्थिति, स्थान को ‘मुस्किम’ और फ़कीरों ने ‘आलम-ए-मलकुत’ कहा है ।
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5वां आसमान - वेदों में ‘पंचम लोक’ 
स्थान - शरीर में इसका प्रतिनिधि स्थान ‘कंठ’ यानि ‘गला’ है । 
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4 आसमान - वेदों में ‘चतुर्थ लोक’
स्थान - वो भाग जहाँ ‘ह्रदय’ होता है ।
इस स्थान पर चैतन्यता का समूह बनने पर पशु-पक्षी वगैरा जीवों की मृत्यु हो जाती है ।
बुद्ध और शिवजी का पशुपति अवतार यहीं से था ।
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नीचे बताये पहले 3 आसमानों को मुस्लिम संतो ने ‘आलम-ए-नासूत’ कहा । 
इस तरह गुदा चक्र, इंद्री चक्र और नाभि चक्र (यह) तीनों मानव शरीर में ‘आलम-ए-नासूत’ के भाग हैं ।
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3 आसमान - वेदों में ‘तीसरा लोक’
स्थान - वो हिस्सा जहाँ नाभि होती है (नाभि चक्र)
हिन्दू देवों में वर्णित ‘वराह देव’ का अवतार यहीं से हुआ ।
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2 आसमान - वेदों में ‘दूसरा लोक’
स्थान - गुदा चक्र से थोङा ऊपर वाला रीढ़ का हिस्सा (इंद्री चक्र) है ।
हिन्दू देवों में वर्णित ‘मच्छ देव’ का अवतार यहीं से हुआ ।
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1 आसमान - वेदों में ‘प्रथम लोक’ 
इस स्थान से ‘कच्छ देव’ का अवतार हुआ था और गणेशजी भी इसी आसमान यानि लोक के खुदा का रूप थे ।
(सभी वर्णन सूफ़ी/संतमत के अनुसार)
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इससे नीचे 7 लोक या आसमान या सुन्न (तुपक) पाताल रूप में 7 खंडों में हैं ।
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अब अन्त में कुछ माथापच्ची - ‘आसमान’ इस शब्द के अर्थ पर कभी गौर किया है ?
चलो संकेत देता हूँ = आस-मान !
अब तो आसान है न ?

24 जनवरी 2017

सोऽहम से ओऽहम में

सबके और सबसे गहन रहस्य को अपने में समाये गूढ़ लेख, जो उतर जाने पर ‘आदि’ में ले जाने में सक्षम है । इसलिये एक एक शब्द में गहरे उतरते हुये मर्म भेदने की कोशिश करें ।
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एक समय एक दैत्य वेदों को लेकर समुद्र की तह में चला गया ।
वेद शब्द के दो अर्थ हैं । मूल अर्थ है - ज्ञान, स्वर्ग का साम्राज्य । दूसरा अर्थ है हिन्दुओं का पवित्र धर्मग्रन्थ ।
जो राक्षस वेदों को समुद्रतल में लेकर गया, उसका नाम शंखासुर था । शब्द व्युत्पत्ति के अनुसार जिसका अर्थ ‘शंख का दैत्य’ या शंख में रहने वाला कीङा है । वेदों के उद्धार के लिये, ज्ञानकोषों को लौटा लाने के लिये ईश्वर ने मछली (मत्स्यावतार) का अवतार लिया । दैत्य से युद्ध कर उसका वध कर वेदों को संसार में लौटा लाये ।
लोग साधारणतया ऐसी कथाओं को पढ़ सुनकर अक्षरसः ग्रहण करते हैं । किन्तु इनमें एक गम्भीर गुह्य (छिपा हुआ) अर्थ है । कथा एक सामान्य सत्य को समझाने हेतु है ।
शंख में रहने वाले कीङे से वेदों को लौटा लाने हेतु ईश्वर ने मत्स्यावतार लिया और समुद्र की तह में दैत्य या कीङे से युद्ध कर उसका वध किया ।
इसका क्या मतलब है ?
मछली समुद्री जन्तु है और शंख में भी समुद्री प्राणी का वास होता है । ईश्वर ने, सर्व स्वरूप ने मछली के रूप में समुद्र के कीङे से संग्राम किया । कीङा शंख से निकाल बाहर किया और समुद्र की लहरों ने रिक्त शंख बहा कर किनारे लगा दिया । 
लोगों ने उसे उठाकर (फ़ूंका) बजाया । 
उससे गूंजती हुयी ध्वनि ॐ निकली । यह वेद है !
इस अर्थ में वेद, शंख, समुद्र तह से लाया गया ।
यह अक्षर ॐ सम्पूर्ण जगत के ज्ञान की इति श्री है । सकल वेद है । अपनी अल्पतं परिधि में घन व संक्षिप्त रूप से शंख में रखा ‘स्वर्ग का साम्राज्य’ है ।
अपने भीतर इन निधियों को पाने के लिये या स्वर्ग का साम्राज्य खोलने के लिये इस चाबी को काम में लाना होगा । ठीक तरह से उच्चारण होने पर यह मन्त्र जो प्रबल प्रभाव मनुष्य के चरित्र पर डालता है या दुनियां की सब निधियों को हमारे अधीन कर देने, भीतर का भेद खोलने का जो गुण इसमें है । उससे इंकार नही किया जा सकता ।
ॐ मन्त्र किसी विशेष भाषा का नही है । यह ‘संस्कृत’ का शब्द है ऐसा समझना भूल है । यह अक्षर तुम्हें अन्दर से प्राप्त है जो जन्म के साथ ही मिल जाता है ।
बच्चे की चीख ऊँ, ओं आं की ध्वनि से जो ॐ का विकृत रूप है, अनोखी समानता है ।

ॐ लिखने का ठीक ढंग अ उ म है । संस्कृत व्याकरण नियमों के अनुसार अ और उ की सन्धि होकर साथ मिलाने पर ओ बन जाता है । गूंगा भी अ उ और म की आवाज निकाल सकता है ।
इस तरह ॐ अपने पूर्ण रूप में और खंडशः भी हरेक के द्वारा और स्वयं उसके द्वारा दुनियां में लाया जाता है । यह अत्यन्त प्राकृतिक शब्द है जो हरेक को सूझ सकता है ।
जब लोग बीमार पङते हैं या जब उन्हें मर्मभेदी पीङा होती है । तब उनके अन्तर से ओऽ ओह उमू आदि निकलते हैं जो ॐ का अपभ्रष्ट हैं ।
हिब्रू, अरबी, अंग्रेजी प्रार्थनाओं का अन्त ‘आमीन’ से होता है जिसका ॐ से अनोखा सादृश्य है । ग्रीक (यूनानी) वर्णमाला में अन्तिम अक्षर ‘औमेगा’ है जिससे ॐ की धुनि को प्रमुख स्थान प्राप्त होता है ।  
ॐ यह धुनि सुन्दर वृक्ष के तुल्य है जो रोगी मनुष्य को, जिसे प्रचण्ड सूर्य झुलसा रहा हो, शीतल छाया देता है । रोगियों को यह ध्वनि उच्चारण करने से आराम मिलता है । दुखी, माँदे को जब यह आराम पहुँचा सकती है तो क्या यह शान्ति, एकता देने वाली न होगी । यदि हम इसे ठीक से उच्चारें ?
हम इसे ‘प्रणव’ कहते हैं और उस वस्तु का वाचक समझते हैं जो जीवन में व्याप्त है या जो प्राण (या स्वांस) में संचार करती है । प्रत्येक प्राणी इस ध्वनि को स्वांस के साथ मिलाकर निकालता है । यदि तुम (नासिका द्वारा) इतनी जोर से सांस लो कि उसकी आवाज सुनाई पङे तो तुम देखोगे कि उस आवाज का यदि कोई परिस्फ़ुट शब्द स्थान ले सकता है तो वह ‘सोऽहम’ है । 
यह ध्वनि सबकी सांस में है । इसमें हम ‘सोऽहम’ पाते हैं ।
संस्कृत व्याकरण दुनियां के सभी व्याकरण से उन्नत है । उसने सब ध्वनियों और शब्दों का पूर्ण विश्लेषण किया है ।
म अक्षर व्यंजन है किन्तु अनुनासिक है । और सिद्ध किया कि ‘म’ व्यंजन की सीमा स्वर से सटी हुयी है । ओ और अ सब व्याकरण के अनुसार स्वर हैं । स और ह व्यंजन हैं । व्यंजन निकाल देने पर हमें ओ, अ, म या ओं मिलता है ।
स्वर स्वतन्त्र और व्यंजन परतन्त्र ध्वनियां हैं । व्यंजन अकेले या अपने सहारे नहीं टिक सकते ।
जैसे व्यंजन ‘क’ है । अंग्रेजी में K और संस्कृत में क् है अतः मूल ध्वनि में इ या ए सरीखा स्वर मिलाने पर उच्चारण योग्य होता है ।
विशेष - व्यंजन ही दुनियां में ‘नाम, रूप’ को स्पष्ट करते हैं । दुनियां के सभी नाम, रूप व्यंजनों के पराश्रित हैं । उनके पीछे यदि परम सत्यता न हो तो उनमें से एक भी अपने आप नही ठहर सकता । सब दृश्य, नाम और रूप मय है । जिनका उच्चारण ‘आधारभूत सत्य’ या सत्यता अथवा स्वर के बिना नही हो सकता ।  
फ़िर हम ‘उस सत्य’ को चाहे परमेश्वर कहें या न जानने योग्य तत्व या अन्य कुछ; पर आधारभूत सत्यता, पूर्ण सत, पूर्ण ज्ञान और पूर्ण आनन्द सिद्ध है । जिसके सूचक यथाकृम अ उ और म हैं ।
इस प्रकार सोऽहम में स और ह व्यंजन, दृश्य व्यापारों के नाम, रूप और आकृति के स्पष्ट करने का काम देते हैं और अन्तर्वर्ती ॐ मूलस्थ सत्यता दर्शाने व स्पष्ट करने का काम देता है ।
जैसे खांड से बने विभिन्न आकारी खिलौने आकृति, रूप, नाम भेद रखते हैं लेकिन है सब खांड (शक्कर) ही ।
जैसे समुद्र की लहरों के नाना रूप, नाम भेद है किन्तु है सब समुद्र (जल) ही ।
अतः संसार के सभी प्रथक विभाग ‘नाम और रूप’ के कारण हैं । यदि गहरे तह में जायें और सब नाम, रूप के अधिष्ठान स्वरूप तत्व की छानबीन करें तो देखेंगे कि - सबका आधार एक ही नित्य, निर्विकार, अव्यय तत्व है । वह तत्व अपना आधार ‘आप ही’ है । 
उस तत्व की तुलना स्वर ध्वनियों तथा नाम, रूप की तुलना व्यंजन ध्वनियों से करना ठीक होगा ।
इस प्रकार सोऽहम के स और ह जो नाम, रूप का काम देते हैं और पराश्रित है, छोङ देने पर असल रूप में एकाक्षर अ उ म, ॐ की प्राप्ति होती है । इस प्रकार से ॐ वह असलियत है जो प्रत्येक की सांस में संचार करती है और वैश्विक स्वांस है ।      
सम्पूर्ण भेद, सब विभागों, सम्पूर्ण प्रथकता के पीछे जो ‘शक्ति’ है । उसका वह अत्यन्त नैसर्गिक नाम है । सार-तत्व का अत्यन्त स्वाभाविक नाम है ।
मैक्समूलर और अन्य तत्वज्ञानियों ने सिद्ध किया; सम्पूर्ण विचार और भाषा का सिक्के के दोनों पहलुओं की भांति सम्बन्ध है । कोई एक, दूसरे के बिना नही है ।
विशेष - क्या किसी पदार्थ, मेज आदि को बिना विचार किये देख सकते हो ? 
किसी वस्तु को तदनुसार विचार किये बिना धारण कर सकते हो ?
‘धारण’ शब्द ही मानसिक विचार का सूचक है ।
विचार और भाषा एक ही है । बिना भाषा के सोचना असम्भव है । शब्दों का अर्थ के साथ वही सम्बन्ध है जो सवार का घोङे से । अर्थ रूपी सवार शब्दों के घोङे पर चढ़कर अंतःकरण में पहुँचता है ।
अति विशेष - दुनियां और विचार भी एक ही हैं । इसलिये भाषा और विचार एक प्रकार से अनन्य होने से, और विचार तथा संसार भी अनन्य होने से, शब्द और संसार एक दूसरे के कुटुम्बी हैं ।
विचार के बिना संसार में कुछ नही देख सकते ।
किसी पदार्थ को देखने का यत्न करो और अपने चित्त में उसकी धारणा न प्रवेश करने दो तो देखना सम्भव न होगा । वास्तव में काले तख्ते को देखने, मालूम करने का अर्थ है - काले तख्ते का विचार (ख्याल) करना ।
संसार के सभी पदार्थ तदरूप कल्पना के उत्तर (प्रतिरूप) हैं । बिना ख्याल के कुछ देखा नही जाता और बिना भाषा के ख्याल संभव नहीं ।
इस बात से इस वचन की कि -
प्रारम्भ में शब्द था, शब्द ईश्वर के साथ था और शब्द ईश्वर था । 
in the beginning there was word, the word was with GOD, and the WORD was GOD. की पुष्टि होती है ।
अतः हम एक ही शब्द या ध्वनि चाहते हैं जो समग्र संसार को प्रदर्शित करे । कोई शब्द जो शक्ति, सत्व, बल, नियामक तत्व, विश्व को धारण करने वाली वस्तु का प्रदर्शक बन सके ।
हमारे पास अ उ म है ।
अ - कंठ स्थानीय ध्वनि है, यह वाचिक इन्द्रियों के एक घेरे से आती है ।
उ - ध्वनियों की परिधि के ठीक बीच से, वाचिक स्थानों के मध्यस्थ तालु के निकट से निकलता है ।
म - ध्वनि वाचिक इन्द्रियों या भागों के अन्त या सिरे के ओष्ठ और नासिका से निकलती है ।
इस तरह -
अ - ध्वनि के परिधि के प्रारम्भ का प्रदर्शक ।
उ - मध्य का प्रदर्शक ।
म - अन्त का प्रदर्शक । यह सारे क्षेत्र को छाये है ।
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23 जनवरी 2017

सन्त डा. चतुर्भुज सहाय जी

डॉ. चतुर्भुज सहाय (Chaturbhuj Sahay) (1883 -1957) 
भारत के महान सन्त पुरुष, समर्थ गुरु थे जिन्होंने अपने गुरु परमसंत रामचंद्र जी महाराज के नाम पर मथुरा में रामाश्रम सत्संग, मथुरा की स्थापना की ।
आपका कहना था - ईश्वर एक शक्ति है, न उसका कोई नाम है न रूप । जिसने जो नाम रख लिया वही ठीक है । उसको प्राप्त करने के लिए गृहस्थी त्याग कर जंगल में भटकने की आवश्यकता नहीं, वह घर में रहने पर भी प्राप्त हो सकता है ।
डा. चतुर्भुज सहाय जी का जन्म विक्रम संवत - 1840, वर्ष 1883, शरद ऋतु में कार्तिक शुल्क पक्ष की चतुर्थी के दिन कुलश्रेष्ठ (कायस्थ) वंश में चमकरी ग्राम में हुआ था जो एटा प्रांत से जलेसर की सड़क पर 2 मील पर स्थित है ।  
आपके पिता श्रीयुत रामप्रसाद जी जाने-माने प्रतिष्ठित व्यक्ति थे । उनकी जमींदारी थी, घर सब प्रकार से संपन्न था । पिता धार्मिक विचार के थे तथा साधु महात्माओं का आदर करते थे । वे स्वयं सिद्ध पुरुष थे और अनेकों बातें सूर्य को देखकर बता दिया करते थे । घर पर आए दिन पूजा पाठ-कथा वार्ता हुआ करती और हर वर्ष किसी न किसी पुराण की कथा कहलाया करते थे । स्वयं भी विद्वान और संस्कृत के अच्छे ज्ञाता थे । ज्योतिष का बड़ा गहन अध्ययन किया था । कुछ पुस्तकें भी लिखीं जो हस्तलिखित रूप से आज भी मौजूद हैं ।
जब गुरुदेव गर्भ में थे तो माता ने संपूर्ण भागवत सुनी थी परन्तु वह इन्हें जन्म देने के 2-3 वर्ष बाद ही परलोक सिधार गईं । लालन-पालन का संपूर्ण भार पिताजी पर आया जिन्होंने सब प्रकार से उन्हें योग्य बनाने की पूरी चेष्टा की । घर के धार्मिक, सात्विक वातावरण तथा जन्म के संस्कारों की गहरी छाप गुरुदेव पर पड़ी । उन्हें बालकों के साथ खेलना, शोर मचाना अच्छा नहीं लगता था । बचपन में कथा, धार्मिक कहानी सुनने का बड़ा शौक था । जब कोई पंडित कथा कहते तो आप बैठकर ध्यान से सुनते । स्वभाव शांत और एकांतप्रिय था । सदैव बड़ों के पास बैठकर चुपचाप उनकी बातें सुनने में आनन्द लिया करते । इन सब बातों ने उनके भगवत प्रेम को उभारा और उन्हें चिंतनशील बना दिया ।
प्रारंभिक शिक्षा उर्दू, फारसी की हुई, साथ ही एक पंडित ने नागरी ज्ञान भी कराया । आगे चलकर अंगेजी का भी ज्ञान प्राप्त किया और थोड़े ही समय में विद्या उपार्जन कर ली । आपको घुड़सवारी का बड़ा शौक था । बड़े होने पर आयुर्वेदिक, इलैक्ट्रोपैथी तथा होम्योपैथी सीखी । 18 वर्ष की आयु में अपनी ननिहाल फतेहगढ़ चले आए और वहाँ कई वर्ष तक डाक्टरी की प्राइवेट प्रैक्टिस करते रहे ।
अध्यात्म विद्या का शौक प्रारंभ से ही था इसलिए फतेहगढ़ में गंगा किनारे रहने वाले साधु महात्माओं से प्रायः मिलते रहते । उनसे अनेक प्रकार के प्राणायाम, हठयोग आदि अनेक क्रियाओं को सीखा, अभ्यास किया परंतु संतुष्टि किसी से नहीं हुई, मन में अशांति, भविष्य की चिंता रहती थी वह इन उपायों से दूर नहीं हुई । मन किसी और ही वस्तु की खोज में था जो विद्वानों तथा साधु सन्यासियों से प्राप्त नहीं हुई ।
उस जमाने में आर्यसमाज एक अच्छी संस्था थी । मित्रों के आग्रह पर वे आर्यसमाज में दाखिल हो गए और देशसेवा के विचार से प्रचार कार्य बड़े उत्साह से किया । इसी समय आपने वेद, उपनिषदों, पुराणों आदि का अध्ययन किया और अपनी योग्यता तथा क्रियाशीलता के कारण फतेहगढ़ तथा आगरे में हाई सर्किल के मेम्बर भी रहे । परन्तु आगे चलकर वहां की अव्यवस्था को देखकर आपको ग्लानि हुई और वहां से विदा ली ।
आपको संगीत का बड़ा शौक था लेकिन आगे चलकर ब्रह्मविद्या का अमृतपान कर सारे रस फीके लगने लगे और संगीत अभ्यास से हाथ खींच लिया और मन की डोर किसी और के चरणों में अटका दी । संगीत को वे भगवान की प्राप्ति का सरल और शीघ्र फल देने वाला साधन मानते थे ।
आप कहा करते थे - संगीत जानने वालों को अपने भाव भगवान को संबोधन करके अत्यन्त विनम्र तथा मधुर भाव से एकांत में सुनाने चाहिए, इससे आशुतोष बड़ी जल्दी रीझते हैं । दुनियाँ वालों के लिए इस प्रतिभा को नष्ट करना बुद्धिमानी नहीं है । इसीलिए सत्संगों तथा भंडारों में वे संगीतज्ञों और गायकों से रात के 12-1 बजे तक मधुर भक्ति-भजन सुना करते और प्रेम विह्वल हो जाते थे । आंसुओं की माला बिखरने लगती । जिन भाइयों ने उस दृश्य को देखा था वे जानते हैं कि यह प्रत्यक्ष भासता था कि प्रभु उन मोतियों को बीनने संगीत की लहरों से खिंचे चले आ रहे हैं ।
आप गृहस्थ संत थे, आपका विवाह श्रीमती इंद्रा देवी (परम संत पूज्य जिया माँ) से हुआ । जिन्होंने आपके बाद आपके द्वारा स्थापित ‘रामाश्रम सत्संग मथुरा’ का अपने पूरे जीवनकाल संचालन किया और अपने मौन उपदेशों से आध्यात्मिक जिज्ञासुओं का मार्गदर्शन किया ।
आपकी दो पुत्रियां तीन पुत्र थे । बड़े पुत्र संत डॉक्टर बृजेन्द्र कुमार जी थे । आपने मेडिकल सुप्रीडेंटेंट के पद से अवकाश ग्रहण किया । दूसरे पुत्र संत हेमेंद्र कुमार जी थे तथा तृतीय पुत्र संत डॉक्टर नरेंद्र कुमार जी थे । तीनों ही पुत्रों ने आपको अपना गुरु मानकर अपना जीवन निर्वाह किया तथा सभी अध्यात्म विद्या के पूर्ण धनी थे और अपना सारा जीवन गुरुमिशन की निष्काम भाव से सेवा करते रहे । दोनों पुत्रियां संत श्रीमती श्रद्धा और संत श्रीमती सुधा कुलीन व आध्यात्मिक परिवार में विवाह के पश्चात भी मिशन की सेवा में जीवन पर्यन्त लगी रहीं ।
गुरुदर्शन
गुरुदेव को अपने गुरु (श्री मन्महात्मा रामचन्द्र जी महाराज, फतेहगढ़) के प्रथम दर्शन गुरुमाता के इलाज के सम्बन्ध में 1910-11 में हुए । उनके सरल स्वभाव और साधारण गृहस्थ वेश ने पहले तो उन्हें भ्रम में डाल दिया और कई महीने के मेलमिलाप से भी वे इस बात को न समझ पाए कि वह कोई अलौकिक महापुरुष हैं जिनकी आत्मा किसी ऊँचे स्थान की सैर करती हुई हर समय शांत और प्रसन्न रहती है । कुछ समय बाद फतेहगढ़ में प्लेग का प्रकोप हुआ और आप राजा तिर्वा की कोठी में आ गए ।
महात्माजी महाराज के अंदर ख्याल हुआ - यह अधिकारी व्यक्ति हैं, इन्हें ब्रह्मज्ञान देना चाहिए ।
एक दिन उनसे बोले - डाक्टर साहब ! प्लेग की वजह से बाल-बच्चे तो हम भी घर भेज रहे हैं, अगर आपके पास जगह हो तो हम भी वहीं आ जाएँ ।
आपने इसका स्वागत किया और दोनों एक साथ उस कोठी में रहने लगे । उनका कहना था कि अज्ञात रूप से उन्होंने मुझे अपनी ओर खींचा । महात्माजी महाराज को बड़ा सुरीला कंठ प्राप्त था और अच्छा गाते थे । एक दिन उन्होंने उन्हें गुनगुनाते हुए सुना ।
कहने लगे - आपको कंठ तो बड़ा सुरीला मिला है । किसी से इस विद्या (संगीत) को सीखा क्यों नहीं ।
महात्मा जी बोले - शौक तो हुआ पर बाद में ऐसी चीज़ मिल गई जिसने इस शौक को छुड़ा दिया और दूसरा ही चस्का लग गया ।
गुरुदेव के मन में कुरेद होने लगी - संगीत तो सब विद्याओं की विद्या है । जीवन में आनंद प्रदान करने वाला ज्ञान इससे बढ़कर कोई नहीं । हाँ, केवल ‘ब्रह्मविद्या’ ऐसी है जिसके आगे यह फीकी पङ जाती है ।
उधर से खिंचाव था ही इन्हें भी आकर्षण हुआ और वे पूछ बैठे - क्या आप अध्यात्म विद्या को जानते हैं ?
पर उस समय वे बात टाल गये ।
कुछ दिन बाद वे दोनों गंगा किनारे टहलने के लिए निकले । 
कहते हैं हर चीज़ का समय होता है, फकीरों की भी मौज होती है । 
महात्मा जी को मौज आ गई, अंदर का प्रेम तरंगें मार रहा था ।
आज उसका समय आ पहुँचा था, बोले - डाक्टर साहब मैं इस विद्या को जानता हूँ और आज मैं तुम्हें इसका सबक दूँगा ।
अप्रैल महीना था । बसंत वृक्ष, पल्लवों तथा लताओं के बहाने संगीत सुना रहा था । ऐसे आनंदमय प्राकृतिक दृश्यों के बीच गुरुदेव महात्मा जी के साथ नवखंडों के टीलों पर से गुजरते हुए बस्ती से लगभग दो मील बाहर निकल गए । आगे एक सुनसान जंगल पड़ा जहाँ मनुष्य देखने मात्र को नहीं था ।
दोनों आगे बढ़े देखा - किसी साधू की कुटिया है परन्तु साधू वहाँ नहीं है । ऐसा ज्ञात होता था कि वह उसे छोड़कर कहीं बाहर चला गया है । फूँस की उस झोंपड़ी के आगे कुछ जमीन लिपी हुई साफ पड़ी थी, चारों ओर के घने वृक्षों ने उसे सुरखित कर रखा था ।
वहीं महात्माजी ठहर गए और आप से बोले - आओ ! तुम्हें आनंददायिनी ब्रह्मविद्या का साधन बताएं ।
यह सन 1912 की बात है । कहा - आँखें बन्द करो और इस प्रकार ध्यान करो ।
ध्यान के दो-तीन मिनट बाद ही उन्हें शरीर का भान न रहा । ऐसा भान पड़ा कि वह फूल की तरह हल्के हो गए और ऊपर उठ रहे हैं । कोई अदभुत शक्ति ऊपर खींच रही है । 
कुछ देर बाद वह भी जाता रहा और उन्होंने अपने को उस स्थान पर पाया जिसे शास्त्रों में विज्ञानमय कोष की सम्प्रज्ञात समाधि का नाम दिया है । 
फिर बोले - बंद करो ।
उन्होंने आंख खोल दी । महात्मा जी कहने लगे - तुम्हारा आरम्भ हमने विज्ञानमय कोष से कराया है, नीचे के तीन स्थान, अन्नमय, प्राणमय व मनोमय में व्यर्थ ही समय नष्ट होता इसलिए उन्हें छुड़ा दिया और उनके ऊपर तुम्हें पहुँचा दिया है ।
उसी समय अनेक सिद्धियों और शक्तियों के उभारने की क्रियाएँ भी बतायीं । वायु में जड़ तक पहुँचने की सिद्धि को छोड़कर शेष सभी सिद्धियाँ बता डालीं । साथ ही उनसे काम न लेने का भी वचन लिया । इसी समय यह आशीर्वाद दिया कि इसी जन्म में तुम्हारी मुक्ति हो जायेगी ।
इसके पश्चात महात्मा जी ने कहा - इस साधन को रोजाना नियम से 15-20 मिनट करो । इससे तुम्हें वह हासिल होगा जो पचासों वर्षों के कठिन तप, परिश्रम से भी नसीब नहीं होता । दो दिन बाद ही तुम्हारे मन की दशा बदलने लगेगी, वह शांत, प्रसन्न रहने लगेगा, दुनियाँ की ओर से लगाव भी धीरे-धीरे कम होने लगेगा और फिर तुम्हारे अधिकार में आ जाएगा । यह सबसे ऊँचा और सरल योग है । शास्त्रों ने इसे ‘साम्ययोग’ और संतों ने ‘सहजयोग’ का नाम दिया है ।
विश्वास पूर्वक उस दिन से आपने साधन करना प्रारंभ कर दिया और सत्संग का लाभ उठाया ।
आप कहते थे - तीसरी साल जब मैं गुरुदेव के दर्शन को गया तो यह सोच रहा था कि मेरे साथी सब आगे निकल गये, मैं पीछे रह गया ।
महात्मा जी महाराज ने कहा - डाक्टर साहब, इस चारपाई पर लेट जाओ ।
मैं लेट गया । आप भोजन करने चले गये ।
उसी समय मुझे विराट स्वरूप का दर्शन हुआ, सम्पूर्ण विभूतियाँ तथा आत्मविद्या के गूढ़ रहस्यों का ज्ञान हुआ जो मुझ जैसे आदमी के लिए अलौकिक ही नहीं असम्भव था ।
महात्मा जी हँसते हुए आए और कहने लगे - डाक्टर साहब इसको सम्भल कर रखियेगा ।
इस प्रकार आपको सारा ज्ञान अपने गुरुदेव से प्राप्त हुआ । परन्तु आपने कितना त्याग किया, कितनी-कितनी कठिनाइयाँ सहीं, किस प्रकार गुरु सेवा की उनके जीवन चरित्र में पा सकोगे स्थानाभाव से यहाँ संक्षेप में यह बताने का प्रयास किया गया है ।

गुरुदेव की आज्ञानुसार आपने इस ब्रह्मविद्या को फैलाने का संकल्प किया । आपकी हार्दिक इच्छा थी - इस अमूल्य ज्ञान को, जिसमें कुछ खर्च नहीं, अधिक परिश्रम नहीं, आज भी इस बाबू पार्टी में कैसे फैलाया जाय ।
सन 1923 ई. में आप एटा आए, यहाँ आपके पास कुछ जिज्ञासु आने लगे । महात्मा जी ने आपको आदेश दिया कि इस विद्या के प्रचार में जुट जाओ । जो चीज तुमको मिली उसका दूसरे भूले-भटकों में प्रचार करने से गुरु ऋण से मुक्ति मिल जायेगी ।
हृदय की महानता को गरीबी कुचल नहीं सकती, आर्थिक संकट उन्हे संकुचित नहीं बना सकता । उन दिव्यआत्माओं के अंदर तो विश्वप्रेम का अपार स्तोत्र होता ही है, हमारे गुरुदेव की भी वही दशा थी । वे जो कुछ करते ईश्वर परायण भाव से, ईश्वर की इच्छा से, ईश्वर के भरोसे पर ।
आप तन-मन-धन से इधर लग गये । प्रैक्टिस का काम ढीला पड़ गया । आमदनी भी कम हुई । इधर-उधर का आना-जाना हो गया, घर पर नित्य नये मेहमानों का आना आरम्भ हुआ, बड़ी कठिनाई का सामना पड़ा पर साहस नहीं छोड़ा, घर में काफी खर्च था किन्तु जिस प्रकार आप इधर लगे उसी प्रकार आपकी उदार हृदया-सहधर्मिर्णी (गुरु-माता) ने भी पूर्ण साथ दिया । आने वालों के सारे सत्कार का भार उन्हीं पर था । भोजन अपने हाथ से बना सबको खिलातीं, फिर घर का सारा कामकाज, बच्चों की देखभाल यानी सवेरे 4 बजे से रात्रि 12 बजे तक का सारा समय काम-धन्धा तथा सेवा में ही व्यतीत होता था इतना होने पर भी सदैव प्रसन्नचित्त रहती थीं । अपने गुरु कार्य संपादन में शारीरिक एवं आर्थिक कष्टों को झेलते हुए कभी मन मैला नहीं किया और नित्य नूतन साहस और उमंग के साथ उसको सर-अंजाम देते रहे । इसके अतिरिक्त सांसारिक कार्यक्षेत्र में भी चिकित्सा द्वारा अल्प आय जिसमे घर का खर्च चलाना भी मुमकिन नहीं था, उस पर भी गरीब और अनाथ रोगियों को मुफ्त दवा बांटते रहते थे ।
साधन मासिक पत्रिका का आरम्भ 
महात्माजी की आज्ञा से प्रथम भण्डारा एटा में सन 31 में बसंत-पंचमी के अवसर पर किया जिसमें महात्माजी महाराज आये और इसके बाद महात्माजी का सन 31 में देहावसान हो गया, अन्तिम समय आप उनके पास ही थे, 
उस समय आदेश हुआ - तुम हिम्मत बाँध कर प्रचार करो, भगवान मदद करेगा । जहाँ रोशनी होगी पतंगे अपने आप पहुँचेंगे ।
अतः आपने अगस्त सन 33 में जन्माष्टमी पर ‘साधन’ का प्रथम अंक प्रकाशित किया । सारा ज्ञान अध्ययन मात्र नहीं वरन आपके अनुभव में आ चुका था । आप उपनिषदें और शास्त्र देख ही चुके थे, योग वेदान्त के सारे ग्रन्थों का अवलोकन किया था अब यह सारा ज्ञान आपके अनुभव में ज्यों का त्यों आ गया ।
आप कहा करते थे - पुस्तकीय ज्ञान जब तक प्रत्यक्ष न कर लिया जाय अधूरा है । जो बिना पूर्ण गुरु के असम्भव है । इसके लिए आप दो साधन मुख्य बताते थे - एक सत्संग, दूसरा सेवा । सत्पुरुष का संग और उसकी सेवा की जाय तभी यह प्राप्त हो सकता है ।
आध्यात्मिक साहित्य और कृतियाँ
महात्माजी महाराज की आज्ञा थी कि इस विद्या को शास्त्र सम्मत बनाकर ऐसे साहित्य का भी सृजन किया जाये जिससे आजकल के जिज्ञासुओं को लाभ पहुंचे । इसी को ध्यान में रखते हुए आपने इस विद्या के सारे अनुभव जो आपको अपने गुरुदेव से प्राप्त हुए थे तथा उन अनुभवों का उपनिषदों, वेदों, गीता, रामायण और श्रीमद भगवद महापुराण से मिलान करके एक वृहद वांग्मय, परमार्थ के जिज्ञासुओं के लिए तैयार किया जो साधन प्रकाशन, मथुरा (भारत) द्वारा प्रकाशित है ।
ये रचनाएँ अत्यन्त सरल भाषा में लिखीं गई है जिससे सामान्य पढ़ा लिखा भी बड़ी आसानी से समझ सकता है । आपका मानना था, अब जमाना बदल रहा है, अतः सामान्य जिज्ञासुओं के लिए ऐसा साहित्य हो जो आसानी से ग्राह्य हो । अतः प्रचार के लिए आपने ‘साधन-पत्र’ के साथ-साथ और भी पुस्तकों का लिखना आरम्भ कर दिया । भक्तों के चरित्र आपको पहले से ही पसन्द थे । आदेशानुसार आप गुरु संदेश घर-घर पहुँचाने में तन मन धन से जुट गये । आपने ग्रन्थों की रचना भी शुरू कर दी । सन्त तुकाराम, श्री आमन देवी (दोनों भाग) श्री सहजोबाई की पुस्तकें आपने महात्मा जी महाराज के जीवनकाल में लिखकर प्रकाशित करायीं ।
जब भक्त शिरोमणि मीराबाई का चरित्र लिखने का संकल्प किया तो उनके जीवन के सम्बन्ध में लिखी हुई पुस्तकें पढ़ी किन्तु यह एकमत नहीं थीं । सोचा कि इनमें सही कौन सी है, इसकी खोज करनी चाहिए । इसके लिए आप मेड़ता गये वहाँ उनके मन्दिर में भगवान गिरधरलाल जी तथा मीरा के दर्शन किये । परन्तु कुछ ठीक पता नहीं लगा । फिर चित्तौड़ पहुँचे वहां महाराज के पुस्तकालय में हस्तलिखित राज्य-विभाग में मीरा का चरित्र पढ़ने को मिला । 
उसमें सब देखकर आप वापिस आए और एक रात बैठकर प्रार्थना की - माँ ! मैं तेरा सुन्दर चरित्र लिखने का संकल्प कर चुका हूँ परन्तु इन अलग-अलग विचारधाराओं को देख कुछ हिम्मत नहीं पड़ती । यदि आप कृपा करके मुझे अपना परिचय दें तो मैं लिख सकूँ । मैं आपका चरित्र लिखने योग्य तो नहीं हूँ परन्तु इससे बहुतों का कल्याण होगा इसीलिए आप कृपा करें और मुझे यह बतलायें कि कौन विचार सही है ।
रात्रि बीत गई सवेरे का समय हुआ, आप ध्यान में बैठे ही थे देखा कि माता मीरा सामने खड़ी हैं और लिखने के लिए आशीर्वाद दे रही हैं । 
आप कहते थे - यह लेखमाला ‘मीराबाई’ मैंने ठीक उसी प्रकार लिखी हैं, जैसे कोई बताता गया हो और मैं लिखता गया हूँ । 
यह पुस्तकें साधकों के लिए बड़ी अमूल्य हैं । साधन और पुस्तकों ने बड़ा काम किया । साधक दूर-दूर से आने लगे । लिखने की शैली डॉक्टर साहब की बड़ी सरल और सुगम थी । दर्शन शास्त्रों में भी उनकी गति अच्छी थी । कठिन से कठिन और गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों को सरलता से सम्मुख रख देना आपकी शैली थी । आप बड़े परिश्रम से जिज्ञासुओं के लाभार्थ यह साहित्य तैयार किया उनकी कुछ मुख्य पुस्तकों की सूची निम्नलिखित है -
1 साधना के अनुभव (सात खण्डों में प्रकाशित एवं सजिल्द)
2 आध्यात्मिक और शारीरिक ब्रह्मचर्य
3 योग फिलासफी और नवीन साधना
4 अलौकिक भक्तियोग
5 आध्यात्मिक विषय मीमांसा (भाग - 1 और 2)
6 श्री रामचंद्र जी महाराज (जीवनी तथा उपदेश)
भंडारों एवं सत्संग का प्रारम्भ 
जब साधन दूर-दूर जाने लगा तो अनेक लोग पढ़कर महाराज जी के पास आने लगे । सन 34 में जब कि महात्मा गाँधी का सत्याग्रह युद्ध चल रहा था आप भी बैठे नहीं थे आप कहते थे कि यह काम भी महात्मा जी के सत्याग्रह के लिए बड़ा सहायक है । भारत के जितने भी सन्त महात्मा हैं सब किसी न किसी रूप में उनको सहायता दे रहे हैं । बिहार में सत्संग का कार्य दिन प्रतिदिन बढ़ता गया ।
सन 35 में बाबू राजेश्वरी प्रसाद सिंह जो एक अच्छे जागीरदार थे इसी ‘साधन-पत्र’ को पढ़कर बिहार से पधारे । आप गया प्रान्त के अन्तर्गत पणडुई के रहने वाले थे । एटा आकर महाराज जी का दर्शन किया, भजन क्रिया सीखी । इनका हृदय बड़ा शुद्ध था, संस्कारी-पुरुष थे और तीन ही वर्ष में पूर्ण-ज्ञान प्राप्त कर लिया । फिर उन्होंने गुरुदेव की आज्ञा से बिहार में प्रचार किया । आज सारा बिहार इस आत्म-विद्या से ओत-प्रोत हो रहा है । गुरुदेव की कुछ ऐसी कृपा हुई कि आज यह सत्संग सारे बिहार, बंगाल में अच्छे पैमाने पर फैल गया और सैकड़ों स्त्री पुरूष आज अध्यात्म का लाभ उठा रहे हैं ।
उत्तर प्रदेश में पहले से ही प्रायः सभी शहरों में केन्द्र खुल गये थे । जयपुर के एक एडवोकेट बाबू साधोनरायन जी, वकील इलाहाबाद से लौट रहे थे, रेल में ही कोई महाशय ‘साधन’ पढ़ रहे थे आपने उनसे लिया और पढ़ा । 
यह इसके बहुत दिनों से जिज्ञासु थे, अध्यात्म विद्या के बड़े खोजी थे । पढ़ते ही तबियत फड़क गई, सोचा - ऐसे सन्त का दर्शन करना चाहिए और राजस्थान जैसी मरू-भूमि को इस गंगा से हरा-भरा बनाना चाहिए । घर आए, पत्र लिखा और जयपुर पधारने की प्रार्थना की । 
उत्तर में आपने लिखा - मैं साधू नहीं हूँ ग्रहस्थ हूँ, आप पहले हमारे यहाँ आइये फिर में आपके यहाँ आ सकूँगा ।
बस फिर क्या था वह एटा पहुँचे और कुछ समय उपरान्त आप भी जयपुर पधारे । इस प्रकार वकील साहब ने आनन्दरूपी गंगा को लाने का प्रयास भागीरथ बनकर किया जिससे आज सारा राजस्थान इस ज्ञानगंगा से आनन्द उठा रहा है । इसके बाद हर साल आप जयपुर आने लगे, भंडारा प्रारम्भ हुआ । राजस्थान में सैंकड़ों छोटे बड़े लोग सत्संग का लाभ उठाने लगे । भण्डारे में भी सारे भारतवर्ष से सहस्रों की संख्या में लोग आने लगे । दूसरी साल का भण्डारा बसन्त पंचमी के बजाय बड़े दिन की छुट्टी में कर दिया जो 1950 तक एटा में होता रहा ।
एटा से मथुरा प्रस्थान
जब सत्संग अधिक बढ़ा - दूर-दूर के जिज्ञासु एटा आने लगे तो तो एटा में रेल के न होने से आने जाने वाले सत्संगियों को कठिनाई होती थी । प्राइवेट लारियां थीं, उस समय सरकारी बसें भी नहीं थीं । लोगों को अनेक कष्ट होने लगे, रातों-रात पड़ा रहना पड़ता था । कई बार ऐसा हुआ कि बिहार के बहुत से सत्संगी शिकोहाबाद से सवारी न मिलने के कारण अपने बिस्तर सर पर लादे हुए एटा पहुँचे आपका हृदय पिघल आया और इरादा किया कि यहाँ से दूसरी जगह चलना चाहिए जहाँ लोगों के आने जाने और ठहरने आदि की ठीक व्यवस्था हो ।
प्रथम जयपुर का इरादा किया लेकिन इधर के जिज्ञासुओं ने प्रार्थना की - महाराज जयपुर दूर है हम गरीब आदमी कैसे दर्शन को पहुँच सकेंगे ।
आप फिर सोचने लगे और विचार में मथुरा उपयुक्त जान पड़ा । बस मथुरा आना निश्चय हो गया और सन 1951 के अक्टूबर में आप मथुरा आ गए । यहां पर तो बात ही और हुई और चार-पाँच ही वर्ष में अनगिनत प्रेमीजन मथुरा आने लगे । जिज्ञासुओं को ऐसा प्रतीत होने लगा भगवान कृष्ण फिर अपने जन्म स्थान में गीता उपदेश देने के लिए पधारे हैं । यहाँ भण्डारा बड़े दिन से हटाकर शिवरात्रि पर रखा गया । यह भंडारा तो केन्द्र का होता ही था अब कई जगह भण्डारे होने लगे; प्रचार का काम वायु वेग की भाँति बढ़ने लगा यहाँ तक कि सन 1956 में कलकत्ते का बुलावा आया और हावड़ा भण्डारा करके आठ दिन परमहंस देव जी के आश्रम दक्षिणेश्वर ठहरे ।
वहाँ उन्होंने कहा - मुझे यहाँ बड़ी शान्ति मिली है, परमहंस जी का दर्शन हुआ है और एक दिन तो करीब दस घण्टे की समाधि में रहे ।
उस समय जितने प्रेमी साथ थे सबकी अजीब दशा थी एक अदभुत खिंचाव था जो वर्णन नहीं किया जा सकता ।
व्यक्तित्व
सहनशक्ति, गम्भीरता के आप अवतार थे, सदैव हँसते हुए शान्त रहते थे । उनके अन्दर का भेद कोई पूरा नहीं जान पाया । विद्या के तो भण्डार थे । किसी ने जो कुछ पूछा वही सरलता से समझाकर बतलाया । उनका सारा काम अभ्यासी का अभिमान दूर करना, जब कभी देखते कि इसे अभिमान आया तत्काल ही उसे चेता दिया । जहाँ देखा कोई गलती किसी से हुई कभी हँस कर, कभी डाँटकर बता देते । अभिमान को वह तुरन्त पहचान लेते ।
वह कहते भी थे - गुरु का कार्य और कुछ नहीं केवल शिष्य को अभिमान से बचाये रखना है । आप अभिमान की बात कभी सीधी, कभी दूसरों पर उतार के कह देते थे । 
आप कहते थे - शिष्य को चाहिए कि वह हमेशा गुरु को साथ लेकर बोले, कभी गुरु को मत भूलो । गुरु ही वह शक्ति है जो तुम्हारे द्वारा अपना ज्ञान दूसरों को देती है । यदि तुमको इस पर अपना अभिमान है तो वह गलत है । दूसरों पर इसका प्रभाव नहीं पड़ेगा । सत्संग तो कोई और ही कराता है । मैंने आज तक कभी भूलकर भी नहीं विचारा कि सत्संग मैं कराता हूँ । 
आपका ज्ञान अपार था, आप जब किसी जटिल विषय को समझाते तो इतनी सरलता से समझाते कि गंभीर होते हुए भी समझ में आ जाता था । किसी भी विषय पर घण्टों बोल सकते थे । कभी कोई शंका उठ खड़ी होती तो बिना कहे निवारण कर देते । प्रायः सभी को जब कुछ पूछना हुआ मगर पूछ न सके तो स्वयं ही ऐसी बातें छेड़ देते कि वह बात हल हो जाती । जिसने एक दफा भी सोहबत उठाई हमेशा के लिए आपका मौतक़िद हो गया ।
शक्ति होने पर भी शक्ति का प्रयोग न करने का, बड़े महात्माओं के अनुरूप लक्षण, हमने डॉक्टर चतुर्भुज सहाय जी में देखा । उनकी उपस्थिति में मैं एक विचित्र शांति का अनुभव करता था और मेरी शंकाएं केवल उनके समुख बैठने मात्र से तत्काल दूर हो जाती थीं । प्रेमियों से घिरे रहना उन्हें सदैव अच्छा लगता था, चाहे फिर विश्राम न कर सकने के कारण बीमार ही क्यों न पड़ जाएँ । उनके हृदय में अपने पराये का भाव उत्पन्न न होता । वे उच्च गृहस्थ धर्म के महान आदर्श थे । अर्थाभाव की चिंता उन्हे छू तक न गई थी - मैंने उन्हे कभी चिंतित देखा ही नहीं ।
अध्यात्म तत्व के अति गूढ़ विषय पर तभी बोलते थे जब समाज समझदार हो और श्रोता विद्वान तथा अनुभवी हों । मैंने एक बार प्रयाग में समाधियों के ऊपर अपना प्रवचन सुना उसमें आपने पंच कोषों की सभी समाधियाँ बड़े अच्छे प्रकार से कहीं और खूब समझ में आ गईं । लेकिन कुछ समय बाद फिर भूल गया । 
एक बार बड़ी प्रसन्न मुद्रा में थे, आप बोले - पंडित लोग समाधियों को बड़ा कठिन समझते हैं । उनमें कोई ऐसी बात नहीं है । हमारे सत्संग में तो यह रोज आया करती हैं । आओ आज तुम्हें समाधियों के भेद समझायें ।
मैं बड़ा प्रसन्न हुआ समझ गया कि मेरी प्रार्थना स्वीकार हो गई ।
फिर बोले - कागज पेंसिल लेकर लिख लो जिससे फिर भूल न जाओ ।
वह हमने लिखीं । अन्नमय कोष की समाधि से लेकर आनन्दमय कोष की सहज समाधि तक जिसे गीता में धर्म मेघ समाधि बतलाया गया है बड़े सुन्दर ढंग से समझाईं और सविकल्प तथा सविचार बड़े अच्छे ढंग से बतलाया । यह वर्णन योग-शास्त्र और कहीं-कहीं उपनिषदों में भी आया है परन्तु बिना अनुभवशील गुरु के समझाए ठीक समझ में आता नहीं । वह तो उसके साथ-साथ अनुभव भी कराते जाते थे । कई बार सत्संग में आई हुई अवस्था की बता देते कि आप लोग इस समय इस अवस्था में हैं ।
उनका ज्ञान अपार था । सब जानते हुये भी कभी किसी से कुछ कहते नहीं थे । सामने बैठने में डर लगता था कि अपने मन के बुरे भाव इनके सामने आऐंगे तो क्या कहेंगे । परन्तु इतनी गम्भीरता था कि अभी यह नहीं कहा कि तुम में यह दोष है । खाने पीने वाले पास आते, पढ़े-लिखे सदाचारी भी पास आते किन्तु कभी किसी के चरित्र पर कुछ कहना नहीं । बस यही कहते, भगवान का ध्यान करो और हमारे बताए हुए साधन को इसी तरह करो जैसे बताया जाय, यह सारे दोष तो स्वतः ही दूर हो जाऐंगे । वह जादू क्या जो सर चढ़कर न बोले ।
इस प्रकार के अनेक साधन जो जिसके लिये उचित होता बता के साधन में लगा देते थे । इसीलिए हम धर्म वाला मनुष्य उनको अपना ही समझ साधना में जुट जाता था, उनकी साधना किसी सम्प्रदाय के लिए नहीं थी मानव समाज के लिए थी ।
क्योंकि जब सब मनुष्य एक ही हैं तो उनके धर्म भी दो नहीं हो सकते । इसीलिए हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, जैन आदि सभी सम्प्रदाय वालों ने उनकी शिक्षा को अपनाया । इस अंधेरे युग में वह पढ़े-लिखे लोग जो ईश्वर को मानते ही नहीं थे, धर्म के नाम की खिल्ली उड़ाते थे, सदमार्ग में लग गए और एक नवीन प्रकाश पा कृतकृत्य हो गये ।
ramashram.com 

21 जनवरी 2017

क्या तू हिरन है ?

प्रयत्न का त्याग करना ही मंजिल का पल्ला प्राप्त करना है । अर्थात लाभ (सुख आदि) की इच्छा ही बैचेन करती है । जब यह (मिलने की कामना) इच्छा दूर हो जाती है । तब ‘साक्षात्कार’ की प्राप्ति होती है । तू उस प्रयत्न से अपने मार्ग को उल्टा दूर क्यों करता है ।
दूरदर्शिता मनुष्य को अंधा बना देती है जैसे कि घर में सोया हुआ घर से अंधा होता है ।
the wordling seeks pleasures fattening himself
like a caged fowl.
but the real saints flies upto the sun like
the wild crane. 
the fowl in the coop has food but will soon
be boiled in the pot.
no provisions are given to the wild crane, but
the heavens and earth are his,
संसारी (संसार में आसक्त) सांसारिक प्रमोद-आनन्द ढ़ूंढ़ता है । और पिंजरे में बन्द कुक्कुट (मुर्गे) की भांति अपने को मोटा ताजा करता है किन्तु सच्चा सन्त-महात्मा जंगली सारस या कुलंग की भांति सूर्य की ओर ऊँचा उङता है ।
कैप्शन जोड़ें

उस पिंजरे के पक्षी (मनुष्य) को यद्यपि भोजन तो खूब मिलता रहता है किन्तु वह जल्द हांडी में उबाला जायेगा । जबकि सारस (आजाद पक्षी) को (उसकी तरह) भोजन आदि सरलता से तो नही मिलता । किन्तु आकाश और धरती दोनों का वह मालिक है । जहाँ चाहता है, स्वतन्त्रता से घूमता फ़िरता है ।
जो कुछ संसार में है, वह स्वतन्त्र मनुष्यों के लिये निषिद्ध है । आकाश के नीचे हमारा सामान ‘चित्त की शांति’ है ।
एक रंगीला (फ़क्कङ) महात्मा गंगा के किनारे बैठा था, साथ में पाँच मनुष्य और थे । अचानक गंगा की लहरों ने ठंडे जल से सबके कपङे तर-बतर कर दिये । पानी के थपेङो ने सबको वहाँ से उठा दिया । वह लोग कपङे भीगने और सर्दी लगने से बङबङाने लगे । आह-ओह करने लगे ।
पर महात्मा वैसा का वैसा अपने पत्थर पर डटा रहा । 
आनन्द से मुस्करा रहा और गा रहा - मेरी प्यारी गंगा, मेरी जान गंगा..आदि ।
जिनको तुम भयानक घटनायें और भयंकर चोटें अनुमान किये बैठे हो । वह वास्तव में ‘प्यारी गंगा, तुम्हारी जान गंगा’ की ही रस-भरी लहरें हैं । यदि हैं, तो तुम्हारे प्रियतम आत्मदेव की ही करतूते हैं । परमात्मा की ही द्योतक हैं ।
शिकायत कैसी ?
सबकी सब डरावनी बातें और प्राणनाशक घटनायें रूप और आकार तो विष का लिये हैं मगर बने मिसरी के हैं ।
मिसरी की तूंबी रची, रंग रूपता मांहि ।
खान लग्यो जब भर्म तज, सो तब कङवी नांहि ।

स्वपन अवस्था में यह पुरुष वस्तुतः ‘आप ही आप’ तो होता है किन्तु बात यह है कि - इधर अपने ‘व्यष्टि रूप’ से अपने आपको फ़कीर, अमीर, विद्यार्थी, मन्त्री, राजा आदि आदि देखता है ।
उधर अपने ही ‘समष्टि रूप’ से सिंह, बाघ, नगर, नदी, स्त्री, वन आदि उत्पन्न कर लेता है ।
जिनको उस समय के काल्पनिक ‘अपने-आप से’ प्रथक समझता है ।
जाग्रत दृष्टि से देखें तो स्वपन में जिसको ‘यह’ अपना स्वीकार करता है । वह भी इसका ख्याल है और जिनको अपने से प्रथक मानकर (उनसे) भय करता है भयभीत हो जाता है । वह भी उसी की सृष्टि है ।
आप ही भेङ है आप ही भेङिया है । आप ही पैर आप ही कांटा है । ठीक यही दशा जाग्रत अवस्था में है ।
मेरे ही अपना आप जिज्ञासु !
जिसको तू जाग्रत अवस्था समझ बैठा है । है वास्तव में वह भी स्वपन ! यद्यपि अधिक समय (नाप) का है । वास्तविक दृष्टि से व्यक्तित्व (जीव) तेरी माया का व्यष्टि रूप है । और ‘सारा संसार’ तेरी ही माया का समष्टि रूप है ।
बागे जहाँ के गुल हैं, या खार हैं तो हम हैं ।
गर यार हैं तो हम हैं, अगयार हैं तो हम हैं ।
दरियाये-मार्फ़त के देखा, तो हम हैं साहिल ।
गर वार हैं तो हम हैं, वर पार हैं तो हम हैं ।
वाबस्ता है हमीं से, गर जब्र है वगर कद्र ।
मजबूर हैं तो हम हैं, मुख्तार हैं तो हम हैं ।
मेरा ही हुस्न जग में, हरचन्द मौजजन है ।
तिस पर भी तेरे तिश्नाएं-दीदार हैं तो हम हैं ।
और जब यह बात है कि जिससे सामना पङे, वह तेरे ही स्वरूप हैं तेरा ही प्रकाश हैं ।
फ़ैला के दामे-उल्फ़त, घिरते घिराते हम हैं ।
गर सैद हैं तो हम हैं, सैयाद हैं तो हम हैं ।
अपना ही देखते हैं, हम बन्दोबस्त यारो ।
गर दाद हैं तो हम हैं, फ़रियाद हैं तो हम हैं ।
फ़िर अप्रसन्नता और चिढ़चिढ़ेपन का क्या अर्थ ?
कुछ लाये न थे, कि खो गये हम ।
थे आप ही एक, सो गये हम ।
जूँ आइना जिसपे, याँ नजर की ।
साथ अपने, दो चार हो गये हम ।
एक चित्र में, एक शिकारी तीर कमान हाथ में लिये ताक लगाये खङा है । छायादार वृक्ष के नीचे हरे हरे लम्बे घास में हरी हरी पत्तियों और पीले रंग के नरम नरम जंगली फ़ूलों के बीच हिरन की चमकती हुयी आँख देखकर उसका निशाना कर रहा है ।
निर्दयी ! आन की आन में बेचारे हिरन को मार लेगा ।
ऐ अस्थिर (क्षणभंगुर) जीवन वाले मृग !
मत घबरा, मत डर, परवाह न कर, जाग तो सही ! तू है कौन ? क्या तू हिरन है ?
नहीं ! हिरन तो तुझे ‘हिरन कहने वाले’ की बुद्धि में होगा । तू तो कागज है कागज !
और अपने स्वरूप (कागज) की दृष्टि से तू ही शिकारी है । तू ही तीर है । तू ही प्राणनाशक सूफ़ार (तीर का मुँह) है ।
तुझे किसका भय, कैसी भीत ? कहाँ का खटका, काहे का शोक ?
बिगङे तब जब होय कुछ, बिगङन वाली शय ।
अकाल अछेद्य अभंग को, कौन शख्स का भय ।
कौन शख्स का भय, बुद्धि यह जिसने पाई ?
तिसके ढिंग दिलगीरी, नही कदाचित आई ।
हे महराज मनुष्य ! व्याकुल होना तेरे गौरव के विपरीत है । तू अपने शरीर और नाम के तल पर तो दृष्टि डाल । अपने सच्चे अपने-आपको तो जान ! जिससे तू डरता है वह तू ही है । जिससे भयभीत होता है वह तू ही है ।
यदि बाह्य दृष्टि से तू अत्याचार किये जाने योग्य और तुच्छ है, तो अंतर्दृष्टि से तेजोमय, प्रतापवान, महाराजाधिराज भी तू ही है । अग्नि अपने ताप से स्वतः नही घबराया करती । सब तेरे ही प्रकाश हैं । उनसे मत डर, निधङक हो जा । 

20 जनवरी 2017

ओशो की चूक

ज्ञान और ध्यान की अनेकानेक स्थितियों के सटीक, मौलिक, स्वयंभू वर्णन की बात की जाये तो मेरे अनुभव में सिर्फ़ एक ही नाम आता है - कबीर !
वो भी अति संक्षिप्त रूप से एक या अधिकतम दो दोहों में, यदि संयुक्त रूप से तीन दोहे बनें, तो गौर कर लेना, तीसरे दोहे की भिन्न स्थिति है जो दोहरी रिश्तेदारी की भांति पूर्व के दूसरे दोहे से जुङ रही होगी ।
अतः निर्विवाद आज भी शिखर पर कबीर ही हैं और उनसे ज्ञात पूर्वकाल तक और इस लेख को लिखने तक ऐसा दूसरा हुआ ही नहीं ।
कबीर का घर शिखर पर, जहाँ सिलहली गैल ।
पपीलिका ठहरे नहीं, खलकन लादे बैल ।
शेष इस परंपरा में आने वाले नाम (तुलनात्मक कबीर) या तो बहुत क्षीण मौलिकता वाले हैं या फ़िर (नकल) छाप लेखन वाले; इस शब्द का अर्थ गहरे समझना, किसी पूर्वलिखित विषय के आधार पर उस विषय को अपने ‘भावशब्द’ दे देना भर !
उदाहरण के लिये जैसे राम, कृष्ण के जीवन चरित्र आधार पर अनेक कथानक लिखे गये ।  
यह इस तरह भी सिद्ध हो जाता है कि आप कोई भी वाणी लें, वह कबीर ने अवश्य कही है और यह ठीक नही लगता कि कबीर ने किसी की छाप ली हो । क्योंकि मैंने पहले ही ऊपर कह दिया कि कबीर को अभी तक कोई छू भी नही सका । यदि आपकी निगाह (और मेरी नाजानकारी) में ऐसा कोई हो तो ‘वाणी’ सहित अवगत कराने की कृपा करें ।

उपरोक्त के बाद मेरा दूसरा पसन्दीदा व्यक्तित्व है - ओशो !
लेकिन (ज्यादातर) सिर्फ़ एक टीकाकार, व्याख्याकार के रूप में, क्योंकि (आप गौर करना) ओशो ने मौलिक न के बराबर ही कहा, और अपने सुलझे, गम्भीर, दार्शनिक अंतःकरण द्वारा अधिकतर गूढ़ विषयों को स्पष्ट भर किया ।
परन्तु दर्शन की इतनी सटीक, बारीक और विस्त्रत व्याख्या करने वाला कम से कम मेरी नजर में तो दूसरा अभी तक नहीं है । अब यहाँ फ़िर वाक्य को ‘समग्र’ भाव में समझने की आवश्यकता है । मतलब कबीर के छोटी से छोटी और असंख्य स्थितियों के यथार्थ वर्णन की भांति ही ओशो ने जीवन, ध्यान, (मन परत आदि की) आंतरिकता आदि अनेकानेक स्थितियों पर (अन्य के तुलनात्मक) जितने और जैसे गहरे अर्थ दिये । उसका दूसरा उदाहरण मेरे लिये नही है ।
लेकिन ?
लेकिन मेरा मत है कि ओशो कबीर का ‘तलीय दर्शन’ नही कर सके । 
और कबीर संदर्भ, प्रसंगों में इसके कई उदाहरण कई बार मेरे सामने आये । 
परन्तु ओशो की जिस बङी चूक को बताने के लिये मैंने यह लिखा, वह ओशो जैसे व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर बङी ‘अजीब’ ही लगती है । और वह कबीर के ही एक पद और बेहद सामान्य ज्ञान को लेकर है ।
देखिये - इस पद,
अवधू जोगी जग थैं न्यारा ।
मुद्रा निरति सुरति करि सींगी । नाद न खंडै धारा ।
के आधार पर ओशो ने जो लम्बी व्याख्या की । इसमें आगे बीच में एक पंक्ति है ।
सहंस इकीस छह सै धागा । निहचल नाकै पोवै ।
(और ओशो ने इसका अर्थ निम्न किया)
(मैंने उपरोक्त से असम्बन्धित वाक्य हटा दिये हैं जो बीच बीच में बोलना अक्सर ओशो का स्वभाव था)
ओशो - इक्कीस हजार छह सौ नाड़ियां है शरीर में ? कैसे योगियों ने जाना । यह एक अनूठा रहस्य है । क्योंकि अब विज्ञान है । हां इतनी ही नाड़ियां हैं । और योगियों के पास विज्ञान की कोई भी सुविधा न थी । कोई प्रयोगशाला न थी । जांचने के लिए कोई एक्स-रे की मशीन न थी । सिर्फ भीतर की दृष्टि थी । पर वह एक्स-रे से गहरी जाती मालूम पड़ती है । उन्होंने बाहर से किसी की लाश को रख कर नहीं काटा था । कोई डिस्सेक्शन । कोई विच्छेद करके नहीं पहचाना था कि इतनी नाड़ियां है । उन्होंने भीतर अपनी ही आंख बंद करके । उर्जा जब उनके तृतीय नेत्र में पहुंच गई थी । और जब भीतर परम प्रकाश प्रकट हुआ था । उस प्रकाश में ही उन्होंने गिनती की थी । उस प्रकाश में ही उन्होंने भीतर से देखा था ।
इक्कीस हजार छह सौ नाड़ियां हैं । अभी सब अलग अलग हैं । अभी तुम ऐसे हो जैसे मनकों का ढेर । अभी तुम्हारे मनके माला नहीं बने । किसी ने धागा नहीं पिरोया । अभी तुम मनकों का ढेर हो । धागा भी रखा है । मनके भी रखे हैं । माला नहीं हैं ।
तुम्हारी इक्कीस हजार छह सौ नाड़ियां अभी माला के धागे नहीं बनी । माला नहीं बनी । क्योंकि किसी ने धागा नहीं पिरोया है । वह धागा क्या है ? उस धागे का नाम ही सुरति है । जिस दिन तुम सारी नाड़ियों को बोधपूर्वक देख लोगे । सहंस छह सै धागा । निहचल नाकै पोवै । और जिसकी मुद्रा हो गई निरति की । और जिसका वाद्य बज गया सुरति का । वह धागे से पिरो देता है सारी नाड़ियों को । वह अखंड एक हो जाता है । उसके भीतर एक का जन्म होता है ।
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अब गौर करें ‘इक्कीस हजार छह सौ नाड़ियां’ कितनी बार दोहराया है यानी असावधानी, बेख्याली में नहीं निकला, बल्कि पक्के तौर पर कहा ।
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जबकि मनुष्य के शरीर मे 72000 नाङियां है और ‘इक्कीस हजार छह सौ’ 24 घन्टे में आने वाली सांसों की गिनती है ।
इसका सही अर्थ यह है -  
सहंस इकीस छह सै धागा । निहचल नाकै पोवै ।
- (दिन रात चौबीसो घन्टे) हर स्वांस स्थिर हो जाओ ।
और (पूरे पद अनुसार) उस ‘केन्द्र विशेष’ पर केन्द्रित हो जाओ ?
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वैसे ओशो ने इस पूरे पद का ही स्तरहीन अर्थ किया है । पर वह बात उतनी गम्भीर नही है । लेकिन नाङियों वाली बात तो ‘सामान्य ज्ञान’ के अन्तर्गत है । इसलिये उल्लेखनीय है ।
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ओशो ने कबीर की बहुत प्रशंसा की और बहुत कुछ बोला भी ।
पर ?
गुरुता, शिष्यता, मुक्तभोग वर्जना, धन, संपत्ति स्त्रीगत सम्बन्ध (लेकिन सिर्फ़ ‘काम सम्बन्ध’ ही नहीं अन्य भी) आदि ज्ञान और शिष्यता के बेहद खास अंगों पर बेहद विरोधाभास है ।
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ओशो का यह पूरा प्रवचन आप निम्न या सर्च द्वारा अन्य स्थानों पर भी देख सकते हैं ।
https://oshoganga.blogspot.in/2014/11/6_19.html

09 जनवरी 2017

चौथा उत्तर

यह पूरा लेख अत्यन्त गहरे भाव वाला है । जो इसमें कहा है वो इसमें है ! इसलिये एक-एक शब्द अति सावधानी से पढ़ें ।
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सूफ़ी बोध कथायें साधारण भाव वाली नहीं होती और कभी कभी तो सीधे (मोक्ष) द्वार पर ले जाकर खङा करने वाली होती हैं ।
ठीक से समझना, द्वार पर ! द्वार के अन्दर नहीं, बल्कि देहरी पर भी नहीं, क्योंकि देहरी सिर्फ़ वो हलचल है जो कथा का मर्म पैठ जाने से हुयी ।
और हलचल इसका द्योतक है कि - अन्दर कुछ टूटा ।
और जब टूटा तो धुंधला धुंधला सा दरवाजा नजर आया । अब आगे बहुत सावधानी रखनी है क्योंकि एक तो अपनी टूटन को लेकर सहज रहना और दूसरे दरवाजा ओझल न हो जाये, इस पर भी तब तक केन्द्रित रहना है । जब तक दरवाजे के अन्दर प्रविष्ट न हो जाये ।
और जब एक बार प्रविष्टि हो जाती है फ़िर तुम्हारे करने के लिये कुछ (खास) नही रह जाता । क्योंकि फ़िर सब कुछ स्वतः स्फ़ूर्त है, प्राकृतिक है ।
लेकिन दरवाजे के पार जाना कठिन ही नहीं, बल्कि अति कठिन है ।
_/\_
एक गांव में एक फ़कीर आया । उस गांव के लोगों ने उसे बोलने के लिये आमन्त्रित किया ।
फ़कीर खुशी खुशी राजी हो गया ।
लेकिन जब बहुत से गांव वाले इकठ्ठे हो गये और जब वह मंच पर बैठा ।
उसने कहा - भाईयों, जो मैं बोलने को हूँ । जिस सम्बन्ध में बोलूंगा, क्या तुम्हें उसके बारे में पता है वह क्या है ?

बहुत से लोगों ने एक साथ कहा - नहीं, हमें कुछ पता नहीं ।
फ़कीर तुरन्त मंच से नीचे उतर आया ।
और बोला - फ़िर मैं ऐसे अज्ञानियों के बीच बोलना पसन्द नही करूंगा । जो कुछ नही जानते, जो कुछ नही जानते उस विषय के सम्बन्ध में, जिस पर बोलना है । उनके साथ कहाँ से बात शुरू की जाये ? इसलिये मैं बात ही शुरू नही करूंगा ।  
फ़िर वह उतरा और चला गया ।
सभी लोग हैरान रह गये ।
दूसरे दिन उन्होंने फ़िर फ़कीर से प्रार्थना की - आप चलिये बोलने ।
फ़कीर राजी हो गया ।
और मंच पर बैठकर उसने फ़िर पूछा - मैं जिस सम्बन्ध में बोलने को हूँ, क्या तुम्हें उसके बारे में पता है वह क्या है ?
सभी लोगों ने एक साथ कहा - हाँ पता है ।
क्योंकि पिछली बार ‘ना’ करने की भूल कर चुके थे और वह नही बोला था ।
फ़कीर ने कहा - तब फ़िर मैं नहीं बोलूंगा । क्योंकि जब तुम्हें पता ही है फ़िर बोलने का कोई प्रयोजन नहीं । जब तुम्हें ज्ञात है तो ज्ञानियों के बीच बोलना फ़िजूल है । 
वह मंच से उतरा और चला गया ।
तब गांव के लोगों ने उससे बुलवाने के लिये विचार किया । विचार किया, उसके प्रश्न पर ‘हाँ’ और ‘ना’ दोनों बेकार गयी ।
अगले दिन तीसरी बार फ़िर उन्होंने फ़कीर को राजी किया और कहा - चलें और हमें उपदेश दें ।
वह सहर्ष तैयार हो गया ।
वह मंच पर आकर बैठा और उसने पूछा - मित्रो, क्या तुम्हें पता है मैं क्या बोलने वाला हूँ ?
उन लोगों ने कहा - कुछ को पता है कुछ को नही पता ।
फ़कीर ने कहा - तब जिनको पता है, वो उनको बता दें जिनको नही पता है । मेरा क्या काम है ।
वह फ़िर उतरा और वापिस चला गया ।
चौथी बार गांव वालों की हिम्मत नही हुयी कि उसे बोलने के लिये आमन्त्रित करें । क्योंकि उनके पास तीन ही उत्तर थे । जो अब समाप्त हो गये थे और व्यर्थ हो गये थे ।
और चौथा उत्तर उनके पास नही था ।

08 जनवरी 2017

परमात्मा, सृष्टि और मोक्ष रहस्य

एक तरह से यह असाधारण और दुर्लभ चित्र है । लेकिन यदि कुण्डलिनी या सुरति-शब्द योग सिद्धांतों का अध्ययन किया है तो फ़िर यह उत्तम ‘खेल चित्र’ है । इस चित्र के मूल और समय को लेकर कोई ठोस प्रमाण नही है । कुछ लोग इसे सन्त ज्ञानेश्वर (ज्ञानेश्वरी-गीता के व्याख्याकार) का बताते हैं और कुछ और भी अधिक पुरातन ।
जो भी हो, असली बात तो ‘चित्र रहस्य’ और उसके प्रभाव, उपयोग की है ।
पासा पकड़ा प्रेम का । सारी किया सरीर ।
सतगुर दावा बताइया । खेलै दास कबीर ।
पहले मैंने सोचा कि इसकी सरल और स्पष्ट व्याख्या कर दूँ फ़िर यह अन्याय सा लगा । क्योंकि एक तो यह खेल विधि पर आधारित है । दूसरे इसको गौर से समझने पर अत्यधिक लाभ होगा ।
लेकिन फ़िर भी संकेत के तौर पर यह (लगभग) पूर्ण चित्र है । न सिर्फ़ पूर्ण बल्कि एक-एक भाग और सहायक चित्र आदि कुछ भी व्यर्थ या सजाबट के तौर पर नही है और अपने ही स्थान पर है ।
पूरा चित्र गौर से देख लेने पर भी हो सकता है । आप इसका सर्वोच्च रहस्य जो इसमें एकदम स्पष्ट और साफ़ है, शायद ही समझ पायें ।
फ़िर भी एक और संकेत के तौर पर यह चित्र ‘परमात्मा, सृष्टि और मोक्ष’ को पूर्णरूपेण बताता है ।
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दूसरा (नीचे वाला) चित्र लगभग इसकी नकल है जो मेरे विचार से अधूरा और त्रुटियुक्त भी है । लेकिन तुलना के लिये ठीक है ।
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तो इस चित्र का ‘रहस्य सुलझाने के लिये’ चित्र पर क्लिक करके फ़ोटो के पूर्ण चमक युक्त हो जाने पर सेव करें । और बेहद गौर से एक-एक चीज को समझें ।
चौपड़ खेल होत घट भीतर, जन्म का पासा डारा । 
दमदम की कोइ खबरि न जाने, कोइ कै न सकै निरुवारा । 
चौपड़ि माँडी चौहटै । अरध उरध बाजार ।
कहै कबीरा राम जन । खेलौ संत विचार ।

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