31 अगस्त 2010

तुम प्रसिद्ध होना चाहते हो

भय हमेशा किसी इच्छा के आसपास पनपता है । तुम प्रसिद्ध होना चाहते हो । संसार के सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति होना चाहते हो । फिर भय शुरू होता है । अगर ऐसा न हो सका । तो क्या होगा ? भय लगता है । भय उस इच्छा का बाइ प्रोडक्ट है । तुम संसार के सबसे धनवान व्यक्ति बनना चाहते हो । सफलता न मिली । तो क्या होगा ? सो भीतर से तुम कंपने लगते हो । भय शुरू हो जाता है । तुम्हारी किसी स्त्री पर मालकियत है । तुम भयभीत होते हो कि हो सकता है । कल तुम्हारी उस पर मालकियत न रहे । वह किसी और के पास चली जाए । अगर वह जीवित है । तो वह जा सकती है । सिर्फ मुर्दा स्त्रियां कहीं नहीं जातीं । केवल 1 लाश पर ही मालकियत की जा सकती है । उसके साथ कोई भय नहीं है । वह हमेशा तुम्हारे पास रहेगी । ओशो
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बांस के कुंज में बैठो और चाय पियो ।
जैसे चीन के पुराने संत जीते थे वैसे निश्चिन्त जियो ।
देवता की राह हिंसा नहीं, अहिंसा की तरह है ।
वे इन्द्रियों से लड़ते नहीं, पुचकार कर उन्हें पास बुलाते हैं ।
देवता के पास पीपल की छाया होती है ।
वे छांह में इन्द्रियों को प्रेम से सुलाते हैं ।
लेकिन, प्रेत कहता है - जीवन से युद्ध करो ।
मारो, मारो, इन्द्रियों को मारो और अपने को शुद्ध करो ।
मैं कहता हूँ - बांस के कुंज में बैठो और चाय पियो ।
जैसे चीन के पुराने संत जीते थे वैसे निश्चिन्त जियो । ओशो ।
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गुरू हमेशा 1 मित्र होता है । लेकिन उसकी मित्रता में बिलकुल अलग सी सुगंध होती है । इसमें मित्रता कम मित्रत्व अधिक होता है । करुणा इसका आंतरिक हिस्सा होती है । वह तुम्हें प्रेम करता है । क्योंकि और कुछ वह कर नहीं सकता । वह अपने अनुभव तुम्हारे साथ बांटता है । क्योंकि वह देख पाता है कि तुम उसे खोज रहे हो । तुम उसके लिये प्यासे हो । वह अपने शुद्ध जल के झरने तुम्हारे लिये उपलब्ध करवाता है । वह आनंदित होता है । और अनुग्रहीत होता है । यदि तुम उसके प्रेम के । मित्रता के । सत्य के उपहार स्वीकार करते हो । ओशो
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मैँ चाहता हूँ । मेरा संन्यासी पूरा मनुष्य हो । अखंड मनुष्य हो । उसमेँ मरूस्थल जैसी शांति भी हो । सन्नाटा भी हो । विस्तार भी हो । बगिया जैसे फूल भी होँ । झरने भी होँ । कोयल भी बोलेँ । पपीहा भी पुकारे । वह अपने को भी जाने । और विराट को भी । कभी आँख बंद करके जाने । कभी आँख खोलकर जाने । क्योँ कि बाहर भी वही है । भीतर भी वही है । ध्यान से भीतर को जाने । प्रेम से बाहर को जाने ।
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वह सब जो तुम कर रहे हो । यदि उसमें प्रेम नहीं है । तो सब झूठा और बकवास है । लेकिन वह सब जो प्रेममय है । वह सब सत्य है । प्रेम की राह पर तुम जो कुछ करते हो । वह तुम्हारी चेतना को विकसित करता है । तुम्हें अधिक सत्य देता है । और अधिक सत्य बनाता है । हर चीज प्रेम के पीछे छिपी हुई होती है । क्योंकि प्रेम हर चीज की सुरक्षा कर सकता है । प्रेम इतना सुन्दर है कि कुरूप चीज भी इसके भीतर छिप सकती है । और सुन्दर होने का ढोंग कर सकती है ।
ओशो ।
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जैसे जैसे तुम्हारा होश बढ़ेगा । तुम्हें लगेगा । अपना कुछ भी नहीं है । अपने सिवाय अपना कुछ भी नहीं है । और आखिर में तुम पाओगे कि वह जो अपना है । वह भी अपना नहीं है । वह भी परमात्मा का है । तब प्रज्ञा समाधि तक भी तुम्हें अपना थोड़ा बोध रहेगा । सारी चीजों से संबंध छूट जाएगा । लेकिन स्वयं से संबंध बना रहेगा । प्रज्ञा में वह संबंध भी छूट जाता है । इसलिए बुद्ध ने कहा - आत्मा समाधि तक । उसके बाद - अनात्मा । आत्मा समाधि तक - कि तुम हो । फिर 1
ऐसी भी घड़ी आती है । जहां तुम भी नहीं हो । बूंद सागर में गिर गयी । जो भिक्षु अप्रमाद में रत है । वह आग की भांति छोटे मोटे बंधनों को जलाता हुआ बढ़ता है । जो भिक्षु अप्रमाद में रत है । अथवा प्रमाद में भय देखता है । उसका पतन होना संभव नहीं है । वह तो निर्वाण के समीप पहुंचा हुआ है । लेकिन ध्यान रखना - समीप । बुद्ध 1-1  शब्द के संबंध में बहुत बहुत हिसाब से बोलते हैं । अप्रमाद सिर्फ - समीप है । जब अप्रमाद भी छूट जाएगा । तब - निर्वाण । बेहोशी तो जाएगी ही । होश भी चला जाएगा । क्योंकि बेहोशी और होश दोनों 1 ही सिक्के के 2 पहलू हैं । पराया तो छूटेगा ही । स्वयं का होना भी छूट जाएगा । क्योंकि पराया और स्वयं दोनों ही 1 सिक्के के 2 पहलू हैं 1 तू तो मिटेगा ही । मैं भी मिट जाएगा । क्योंकि मैं और तू 1 ही चर्चा के 2 हिस्से हैं । 1 ही संवाद के 2 छोर हैं । लेकिन जो अप्रमाद में रत है । उसका कोई पतन नहीं होता । ऐसे ही जैसे दीया हाथ में हो । तो तुम टकराते नहीं । घर में अंधेरा हो । और तुम अंधेरे में चलो । तो कभी कुर्सी से । कभी मेज से । कभी दीवाल से टकराते हो । हाथ में दीया हो । फिर टकराना कैसा ? फिर तुम्हें राह दिखायी पड़ती है । असली सवाल राह का खोज लेना नहीं है । असली सवाल हाथ में दीए का होना है । इसलिए बुद्ध का आखिरी वचन । जो उन्होंने इस पृथ्वी पर अंतिम शब्द कहे । आनंद ने पूछा । हम क्या करेंगे ? तुम जाते हो । तुम्हारे रहते हम कुछ न कर पाए । दिन और रात हमने बेहोशी में गंवा दिए । तुम्हें सुना । और समझ न पाए । तुमने जगाया । और हम जागे नहीं । अब तुम जाते हो । अब हमारा क्या होगा ? बुद्ध ने कहा । इस बात को सूत्र की तरह याद रखना । क्योंकि मैं तुम्हारे काम नहीं पड़ सकता - अप्प दीपो भव । तुम अपने दीए बनो । क्योंकि वही काम पड़ सकता है । अप्रमाद यानी - अप्प दीपो भव । अपने दीए बनो । जागो । होश पूर्वक जीयो । संसार यही है । जो बेहोशी में जीता है । वह माया में । जो होश में जीता है । वह ब्रह्म में । जीने की शैली बदल जाती है । जीने की जगह थोड़े ही बदलती है । यही है सब । यही वृक्ष । यही पौधे । यही पक्षी । यही झरने । तुम बदल जाओगे । लेकिन जब दृष्टि बदल जाती है । तो सब सृष्टि बदल जाती है ।

हर स्‍थिति में उसके ही इशारे है

बेशर्त प्रेम - प्रेम सिर्फ प्रेम करता है । किसी को सुधारना नहीं चाहता । अगर तुमने चाहा कि दूसरा ऐसा व्यवहार करे । जैसा मैं चाहता हूं । बस तुमने प्रेम के जीवन में विष डालना शुरू कर दिया । और जैसे ही तुम यह चाहोगे । दूसरा भी अपेक्षाएं शुरू कर देगा । तब तुम एक दूसरे को सुधारने में लग गए । प्रेम किसी को सुधारता नहीं । यद्यपि प्रेम के माध्यम से आत्म क्रांति हो जाती है । लेकिन प्रेम किसी को सुधारने की चेष्टा नहीं करता । सुधार घटता है । सुधार अपने से होता है । जब तुम किसी को आपूर प्रेम करते हो । इतना प्रेम करते हो । जितना कि तुम्हारे प्राण कर सकते हैं । रत्ती भर बाकी नहीं रखते । तो क्या प्रेमी में इतनी समझ न आ सकेगी । तुम्हारे इतने प्रेम के बाद भी कि सिगरेट छोड़ दे ? इतनी समझ न आ सकेगी । इतने बड़े प्रेम के बाद ? तब तो प्रेम बहुत नपुंसक है । और प्रेम नपुंसक नहीं है । प्रेम से बड़ी कोई शक्ति नहीं है । तुम्हारा प्रेम ही छुड़ा देगा । लेकिन अपेक्षा मत करना । अपेक्षा की कि घाटी की तरफ तुम उतरने लगे । अपेक्षा की । और सुधारना चाहा कि बस मुसीबत हो गई । छोटे छोटे बच्चे तुम्हारे घर में पैदा होंगे । उनको तुम प्रेम करते हो । लेकिन प्रेम से ज्यादा उनकी सुधार की चिंता बनी रहती है । बस उसी सुधार में तुम्हारा प्रेम मर जाता है । कोई बच्चा अपने मां बाप को कभी माफ नहीं कर पाता । नाराजगी आखिर तक रहती है । पैर भी छू लेता है । क्योंकि उपचार है । छूना पड़ता है । लेकिन भीतर ? भीतर मां बाप दुश्मन ही मालूम होते रहते हैं । क्योंकि ऐसी छोटी छोटी चीजों पर उन्होंने बच्चे को सुधारने की कोशिश की । बच्चे को क्या समझ में आता है ? उसे समझ में आता है कि जैसा मैं हूं । वैसा प्रेम के योग्य नहीं । जैसा मैं हूं । उतना काफी नहीं । जैसा मैं हूं । उसको काटना पीटना, बनाना पड़ेगा । तब
प्रेम के योग्य हो पाऊंगा । बच्चे को इसमें निंदा का स्वर मालूम पड़ता है । निंदा का स्वर है । ध्यान रखना । प्रेम सिर्फ प्रेम करता है । किसी को सुधारना नहीं चाहता । और प्रेम बड़े सुधार पैदा करता है । प्रेम की छाया में बड़ी क्रांतियां घटती हैं । अगर मां बाप ने बच्चे को सच में प्रेम किया है । बस काफी है । बस काफी है । उतना प्रेम ही उसे सम्हालेगा । उतना प्रेम ही उसे गलत जाने से रोकेगा । उतना प्रेम ही, जब भी वह राह से नीचे उतरने लगेगा । मार्ग में बाधा बन जाएगा । याद आएगी मां की । पिता की । उनके प्रेम की । और उनके बेशर्त प्रेम की । बच्चे के पैर पीछे लौट आएंगे । ओशो
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आखिरी प्रश्न - प्राय: रोज ही मैत्रेय जी हमें सचेत करते हैं कि प्रवचन के बीच खांसने से भगवान को बाधा पहुंचती है । लेकिन कल के प्रवचन के दरम्यान कई गौरैए चिडिएं चीं चीं करती हुई आपके इर्द गिर्द मंडराती रहीं । और फिर उनमें से 1 आपके बाएं हाथ पर और दूसरी माइक पर बैठ गयी । और आश्चर्य कि उससे आपकी मुद्रा या प्रवचन प्रवाह में रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ा । और गौरैए भी ऐसे आयीं गयीं । जैसे किसी शाख पर आती जाती हों । और ऐसा लगा कि सब कुछ अपनी जगह स्वाभाविक रूप में स्थित है । यद्यपि हम श्रोतागण अवश्य चकित रह गए । इस पर थोड़ा प्रकाश डालने की अनुकंपा करें ।
- मैत्रेय जी को तुम्हें कहना पड़ता है । न खांसो । और तुमने 1 मजे की बात देखी । तुम उनकी मान भी लेते हो । और खांसते भी नहीं । तो खांसना करीब करीब झूठ है । और तुमने यह देखा । 1 आदमी खांसे । तो दूसरा खांसेगा । तीसरा खांसेगा । चौथा खांसेगा । 1 श्रृंखला पैदा होती है । और खांसने के पीछे कुछ कारण हैं । खांसने के पीछे खांसी शायद ही कारण होती है । 100 में 1 मौके पर । तब तो तुम रोक ही नहीं सकते । चाहे मैत्रेय जी लाख सिर मारें । तुम क्या करोगे ? कोई भी क्या करेगा ? लेकिन 99 मौकों पर तुम रोक पाते हो । जो तुम रोक पाते हो । वह झूठी है । पर झूठी खांसी क्यों आती है ? झूठी खासी इसलिए आती है कि तुम खाली बैठे हो । खाली बैठे तुम्हें बड़ी बेचैनी होती है । आदमी देखा । खाली बैठे बैठे सिगरेट पीने लगता है । खाली बैठे बैठे उसी अखबार को दुबारा पढने लगता है । खाली बैठे बैठे भूख लग आती है । जाकर फ्रिज खोलकर कुछ खाने लगता है । खाली नहीं बैठ सकते । खाली बैठना बड़ा कठिन है । कुछ न कुछ तुम करोगे । जब तुम कभी ध्यान के लिए बैठोगे थोड़ी देर को । तो तुम कहोगे - कहीं चींटी चढ़ने लगी । कहीं कोई चींटी नहीं है । देखो, चींटी नहीं चढ़ रही है । फिर कहीं पैर में खुजलाहट आ गयी । कहीं हाथ सुन्न हो गया । कहीं कान में कुछ चढ़ने लगा । कहीं भीतर कुछ होने लगा । हजार चीजें होने लगीं । ऐसे कुछ भी नहीं होता । ये हजार चीजें तुम्हारे मन की जो बेचैनी की आदत हैं । उसके कारण होती हैं । अब तुम यहां बैठे हो - डेढ़ घंटा । तुम कुछ न कर सकोगे । तो खासोगे । और 1 खांसा । तो दूसरे को अचानक लगेगा कि उसको भी खांसी आ रही है । मनुष्य करीब करीब अनुकरण से जीता है । डार्विन गलत नहीं है - आदमी बंदर की औलाद है । तुमने कभी देखा । रास्ते पर तुम चले जा रहे हो । और 1 आदमी पेशाबघर में चला गया । अचानक तुम्हें खयाल आया कि अरे, तुम्हें भी पेशाब लगी है । अभी देखो । मैंने अभी पेशाब शब्द कहा । तुममें से कई को लग गयी होगी । एकदम खयाल आ जाएगा । तुमने देखा । अगर कोई नीबू का नाम ले दे । तो जीभ पर लार आने लगती है । नाम से । आदमी ऐसा अनुकरण से भरा हुआ है । तो मैत्रेय जी तुम्हें रोकते हैं । मुझे कोई बाधा पड़ेगी । ऐसा नहीं है । लेकिन तुम शांत बैठे हो । तब भी तुम मुझे नहीं सुन पाते । और अगर तुम खांसा खांसी में उलझ गए । तब तो तुम बिलकुल ही नहीं समझ पाओगे । मुझे क्या बाधा पड़ेगी ? लेकिन राग जिस प्रयोजन से यहां बैठे हो । उसमें खलल पड़ जाएगा । तुम्हारा मन तो बड़े जल्दी ही डावांडोल हो जाता है । तुम्हें तो बड़ी छोटी छोटी बातों में विघ्न पड़ जाता है । तुम्हें तो निर्विघ्न रहना इतना कठिन है । इसलिए तुमसे कहते हैं । रह गयी गौरैए चिड़ियों की बात । तो वह कोई मैत्रेय जी की तो सुनेंगी नहीं । उनसे वह कितना ही कहें । उनकी जो मौज होगी । वैसा करेंगी । लेकिन चिड़िया माफ की जा सकती हैं । उनका यहां आ जाना भी सुखद है । उनका आना इसी बात की खबर देता है कि तुम शांत बैठे हो । उनका आना इसी बात की खबर देता है कि उन्हें रास्तारी चिंता नहीं । मूर्तिवत । वह तुम्हें यही समझती हैं कि बैठे हैं । संगमरमर की मूर्तियां । कोई अड़चन नहीं । वे यहां खेलकूद करके । शोरगुल मचाकर अपना चली जाती हैं । उनका यह कभी कभी आ जाना तुम्हारी शांति का प्रतीक है । सुंदर है । फिर तुम पूछते हो कि - हम चकित हुए ।  चकित होने का इसमें कुछ भी नहीं है । मेरे बोलने से गौरैया चिड़िया परेशान नहीं हो रही है । तो गौरैया चिड़िया के चीं ची करने से मुझे क्यों परेशान होना चाहिए । कम से कम इतना तो गौरव मुझे दोगे । जितना गौरैया चिड़िया को देते हो । मेरे हाथ पर बैठने में उसे कुछ अड़चन नहीं हो रही है । तो मुझे क्यों अड़चन होनी चाहिए ? वह बैठ भी इसीलिए सकी कि उसे प्रतीत हो रहा है कि अड़चन नहीं होगी ।  धीरे धीरे, जैसे जैसे तुम शांत होने लगोगे । तुम पाओगे । वे तुम्हारे सिर पर भी नगकर बैठने लगीं । हाथ पर आकर बैठने लगीं । जैसे जैसे उन्हें यह भरोसा आ शएगा कि यहाँ भलेमानुस बैठे हैं । इनसे कुछ भय का कारण नहीं है । तुमसे भय है । डर है कि तुम उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हो । उस भय के कारण वे दूर दूर हैं । जैसे जैसे तुम्हारी तरफ से निर्भय की तरंग उठने लगेगी । फिर दूर रहने का कोई कारण नहीं रह जाता । आदमी ने पशुओं को भयभीत करके दूर कर दिया है । और पशुओं को दूर करके 1 बड़ी महत्वपूर्ण बात खो दी । प्रकृति से संबंध खो दिया है । तुमसे तो वृक्ष भी डरते । जब तुम वृक्षों के पास जाते हो । अभी वैज्ञानिक इस पर काफी परिशोध करते हैं । उन्होंने यंत्र भी बना लिए हैं । वृक्षों में लगा देते हैं । और वृक्ष से खबर आने लगती है । जैसे कि तुमने कभी कार्डियोग्राम लिया हो । तो कागज पर ग्राफ बन जाता है कि हृदय की धड़कन कैसी है ? ऐसे ही वृक्ष के भीतर कैसी तरंग चल रही है । उसका ग्राफ बन जाता है । जैसे ही वृक्ष देखता है कि कोई आदमी आ रहा है । उसकी तरंग बदल जाती है । फिर आदमी आदमी से बदलती है । अगर वह देखता है कि लकड़ी काटने वाला कुल्हाड़ी लिए चला आ रहा है । अभी उसने काटी नहीं । अभी दूर ही है । तत्क्षण उसकी बेचैनी बढ़ जाती है । तरंगें बड़ी जोर की बनने लगती हैं । वह बहुत घबड़ाया हुआ हो जाता है । उसने देखा । माली आ रहा है  पानी लिए हुए । उसकी तरंगें बड़ी शात हो जाती हैं ।
कुछ आश्चर्य नहीं है कि संत फ्रांसिस की कहानिया सच ही रही हों । कुछ आश्चर्य नहीं है कि महावीर और बुद्ध के जीवन के उल्लेख सही ही रहे हों । अर्थ तो उनका स्पष्ट है कि महावीर के पास पशु पक्षी आकर बैठ जाते । सिंह भी आकर बैठ जाता । इतनी शांत है दशा कि सिंह को भी तरंग पकड़ लेती होगी । कि बुद्ध जिस जंगल से निकलते हैं । वहां सूखे वृक्ष हरे हो जाते हैं । इतने तरंगित हो जाते होंगे बुद्ध के आगमन से । तो कुछ भी चकित होने का कारण नहीं है । धीरे धीरे तुम्हारी तरंग जब ठहरती जाएगी । और जब हम यहां 1 वातावरण बनाने में सफल हो जाएंगे । जहां 1 भी आदमी से उन्हें भय न हो । तो तुम देखोगे । चकित होकर देखोगे कि जैसे तुम यहां बैठे हो । ऐसे ही बहुत सी चिड़िया भी, पक्षी भी आकर बैठ गए हैं । तुम्हारे कारण भय बना रहता । घबड़ाहट बनी रहती । हिंसा तुम्हारे भीतर है । तो उसकी तरंग है - चारों तरफ । उस तरंग के हट जाने पर 1 संबंध जुड़ता है - प्रकृति से । कहते हैं - संत फ्रांसिस से 1 आदमी पूछने आया । नदी के किनारे फ्रासिस खड़े थे । उस आदमी ने पूछा कि हमने सुना है कि पशु पक्षी भी आपकी बातें सुनने आते हैं । आपको इस संबंध में क्या कहना है ? फ्रासिस ने कहा - मैं क्या कहूं । यहां कोई पशु पक्षी है ? कोई है भाई यहां ? उन्होंने जोर से आवाज मारी । वहां कोई पशु पक्षी नहीं था । लेकिन मछलियों ने सिर ऊपर निकाला । पूरी नदी पर मछलियों ने सिर ऊपर कर लिया । उन्होंने कहा - इनसे पूछ लो । अब मैं क्या प्रमाण दूं । और उन्होंने कहा - इनसे पूछ लो ।
यह हो सकता है । क्योंकि सारा अस्तित्व 1 ही प्राण से आदोलित है । पशु पक्षी के भीतर भी हमारे जैसी ही आत्मा है । वृक्ष के भीतर भी हमारे जैसे ही आत्मा है । शरीर का भेद है । आत्मा का तो कोई भेद नहीं । वृक्ष ने वृक्ष का शरीर लिया है । पक्षी ने पक्षी का शरीर लिया है । तुमने आदमी का शरीर लिया है । यह फर्क ऊपर ऊपर है । यह वस्त्रों का भेद है । किसी ने लाल रंग के कपड़े पहने हैं । किसी ने नीले रंग के कपड़े पहने हैं । किसी ने सफेद कपड़े पहन रखे हैं । या कोई नग्न खड़ा है । किसी ने पूर्वीय ढंग के कपड़े पहने हैं । किसी ने पाश्चात्य ढंग के कपड़े पहने हैं । मगर यह कपड़ों का फर्क है । भीतर जो छिपा है । वह तो 1 ही है ।
बिजली के खंभे पर बैठी चिड़िया । ठिनक ठिनक गाती है ।
किस दिल से भरकर रखी है । कितनी करुणा भर लाती है ।
पंख फुदकते, चोंच मटकती । कूद कूद बल खाती है वह ।
जीने के जंतर मंतर । पागलनी सी समझाती है वह ।
ऊपर है आकाश उघाड़ा । नीचे धरती बिना ढंकी ।
और मध्य में तेरी महिमा । तारों से हर ओर टंकी ।
किसके महल झोपड़ी किसकी ? किसकी फूलन काटे किसके ?
आंख मूंद लेने पर यह । चलते दिखते सन्नाटे किसके ?
यह गिरधारी की कमरी सी । यह राधा के वलय बंद सी ।
यह प्रतिभा की सूझों वाले । रस भर आए अमर छंद सी ।
ऊंची नीची मैली उजली । यमुना की पागल हिलोर सी ।
गगन तलक उठ रही पवन के । बिना बंधे उन्मत्त जोर सी ।
चहक चहककर बहक बहककर । बोलों में झरते प्रणाम सी ।
गांवों में अधनंगे शिशु के । 2 हाथों के राम राम सी ।
पल पल पर वह खेल रही है । कितनी मस्‍ती भर लाती है ।
बिजली के खंभे पर बैठी चिड़िया । ठिनक ठिनक कर गाती है ।
सुनना सीखो । कान थोड़े साफ करो । आंखों के पर्दें हटाओ । तो तुम्‍हें हर जगह से प्रभु का संदेश ही सुनाई पड़ेगा । हर स्‍थिति में उसके ही इशारे है ।

कबीर उसको ही सुरति कहते हैं

जैसे माला के मनकों में धागा अनुस्यूत होता है । मनके दिखाई पड़ते हैं । धागा दिखाई नहीं पड़ता । वह है - होश । कबीर उसको ही सुरति कहते हैं । और जिस व्यक्ति का होश सध जाए । फिर उसे कोई असहज काम नहीं करना पड़ता - उलटा सीधा । कबीर कहते हैं - न तो मैं नाक बंद करता । न आंख बंद करता । न उलटी सीधी सांस लेता । न प्राणायाम करता । न उलटा सिर पर खड़ा होता । न शीर्षासन करता । कुछ भी नहीं करता । सिर्फ होश को सम्हालकर रखता हूं । सिर्फ सुरति को बनाए रखता हूं । बस, सुरति का दीया भीतर जलता रहता है । और जीवन पवित्र हो जाता है । सुरति का दीया भीतर जलते जलते 1 ऐसी घड़ी आती है । जब निष्कंप हो जाता है । उस घड़ी का नाम है - समाधि । शुरू शुरू में सुरति का दीया कंपता है । पुरानी वासनाओं के झोंके आएंगे । पुरानी आदतों के झोंके आएंगे । पुराने संस्कार के झोंके आएंगे । बहुत बार दीया झुकेगा । कंपेगा । लौ कंपित होगी । जीवन भीतर चंचल रहेगा । भान कभी रहेगा । कभी छूटेगा । कभी होश सम्हलेगा । कभी नहीं भी सम्हलेगा । कभी गिरोगे । कभी उठोगे । शुरू में स्वाभाविक है । तो सुरति की 2 स्थितियां हैं । जब भीतर की चेतना कंपती रहती है । उस स्थिति का नाम है - ध्यान । और जब भीतर की चेतना अकंप हो जाती है । उस स्थिति का नाम है - समाधि ।  और कबीर कहते हैं - सहज ही सध जाती है । तुम व्यर्थ के उपद्रव क्यों कर रहे हो ? और यही मैं तुमसे भी कहता हूं । क्योंकि कबीर को भी सुनने वाले तुम ही थे । तुम ही हो । लेकिन तुम तरकीबें निकाल लेते हो । कबीर से बच जाते हो । बुद्ध से बच जाते हो । कृष्ण से बच जाते हो । तुम बचे चले जाते हो । बुद्ध ने जो स्त्री से बचने को कहा । वही तुम बुद्धों के साथ व्यवहार कर रहे हो । पहले तो बुद्ध दिखाई पड़े । तो बचकर निकल जाना । अगर मजबूरी आ जाए । और देखना ही पड़े । पास से निकलना पड़े । तो आंख झुकाकर निकल जाना । अगर फिर भी मजबूरी खड़ी हो जाए । और आंख भी न झुका पाओ । तो छूना मत । अगर छू भी लो । तो होश रखना कि - यह आदमी बुद्ध है । अछूत है । बीमारी है । यह तुम्हें मिटा डालेगा । इस भांति तुम चल रहे हो । इससे तुम चूकते गए हो । और जितना तुम चूकते हो । उतना ही तुम सोचते हो - कठिन होगा । कठिन होगा । तभी तो हम चूक रहे हैं । तुम चूक रहे हो - चालाकी से । सत्य कठिन नहीं है । तुम्हारी चालाकी बड़ी जटिल है - ओशो ।
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आप प्रेम के योग्य तभी होते हैं । जब आपको इसकी ज़रुरत नहीं रहती । जब आप अपने भीतर के आनंद में निमग्न हो जाते हैं । तो अस्तित्व आप पर प्रेम की तरह बरस जाता है । अस्तित्व दीनता को । भिखमंगे पन को पसंद नहीं करता । अस्तित्व सम्राट पैदा करता है । और सम्राटो को ही पसंद करता है । भीतर की संपदा हमे सम्राट बना देने को काफी से ज्यादा है ।
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जीवन तर्क नहीं है । जीवन प्रेम है ।  तर्क जटिल घटना है ।  प्रेम सरल है । प्रेम निर्दोष संवाद है ।  प्रेम जीवन के संगीत के अधिक करीब है - बजाय गणित के । क्योंकि गणित मन का है । और जीवन तुम्हारें हृदय की धड़कनों में धड़कता है -   ओशो
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स्वर्णिम बचपन - रजनीश का खडाऊं पहन कर स्कूल में आना चर्चा का विषय बन गया था । 1-2  बार टीचर ने भी टोका - रजनीश । यह आश्रम नहीं । स्कूल है । यहाँ खड़ाऊ पहनकर मत आया करो । यह स्कूल की मर्यादा के विरुद्ध है ।
रजनीश 2 टूक स्वर में बोला - मैं जानता हूँ कि आप कायदे कानून और नियमावली के बहुत पाबन्द हैं । क्या आप स्कूल नियमावली का वो क्लाज़ मुझे दिखा सकते हैं । जिसमें खडाऊं पहनकर स्कूल आने से मना किया हो । हैड मास्टर साहब मरे स्वर में बोले - जो लोग स्कूल के नियम बना रहे थे । उन्हें सपने में भी इस बात का गुमान न होगा कि कोई छात्र खडाऊं पहनकर भी स्कूल आ सकता है ।
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न तो मैं नाक बंद करता । न आंख बंद करता । न उलटी सीधी सांस लेता । न प्राणायाम करता । न उलटा सिर पर खड़ा होता । न शीर्षासन करता । कुछ भी नहीं करता । सिर्फ होश को सम्हालकर रखता हूं । सिर्फ सुरति को बनाए रखता हूं । बस, सुरति का दीया भीतर जलता रहता है । और जीवन पवित्र हो जाता है । सुरति का दीया भीतर जलते जलते 1 ऐसी घड़ी आती है । जब निष्कंप हो जाता है । उस घड़ी का नाम समाधि - कबीर ।
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आनन्द का अर्थ है - 1 परम मौन । और ऐसा मौन तभी संभव है । जब भीतर लयबद्धता हो । जब सारे बेमेल टुकड़ों का मेल हो जाये । वे 1 बन जायें । जब भीड़ न रहे । बल्कि केवल 1 ही हो । जब भीतर घर में कोई न हो । और तुम अकेले हो । तब तुम आनन्द से भर जाओगे । पर अभी तो हर एक तुम्हारे घर में है । तुम वहाँ हो नहीं । केवल मेहमान ही वहाँ है । मेजबान तो सदा ही अनुपस्थित है । और केवल मेजबान आनन्द मय हो सकता है ।

क्योँकि मेरा ईश्वर प्रकृति मेँ ही छिपा है

नित उस सतगुरू, परमात्मा का धन्यवाद करें । क्योंकि तुम्हें 1 ने जीवन दिया है । तो दूसरे ने मुक्ति का मार्ग दिया है । मुक्त होने के लिये दोनों की परम आवश्कता है । सतगुरू के माध्यम से ही हम उस परमात्मा तक पहुँच कर मुक्त हो सकते हैं । और मुक्ति जीते जी ही होती है । मरने के बाद मुक्त होना संभव नही है । अर्थात कोई मुक्ति नही होती है । क्योंकि मुक्त तो स्वयं को ही होना पड़ता है । किसी के द्वारा कोई आज तक मुक्त नहीं हो सका है । और यदि कोई ऐसा कहता है । सब झूठ है । असत्य है ।  नाद ब्रह्म ध्यान योग धाम आश्रम इन्दौर
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अध्यात्म में प्रायः लोग बहुत वाद विवाद करते रहते हैं । क्योंकि वे किसी से सुनकर । कही से पढकर । पाये हुए उधार के ज्ञान के आधार पर वाद विवाद करते हैं । उन्हें वास्तविक अनुभव होता नहीं । क्योंकि जिसको भी अध्यात्म को, परमात्मा को जानने की ललक होती है । प्यास होती है । वे वाद विवाद में नहीं पड़ते । पर जिनकी प्यास कच्ची होती है । ज्ञान अधकचरा होता है । वे ही वाद विवाद में पड़ते हैं । ऐसे लोग अपने साथ साथ उन ज्ञानियों का समय भी बर्बाद करते हैं । और जो ज्ञान उनको उनसे मिल सकता था । जो जिज्ञासायें उनकी उनसे शांत हो सकती थीं । उनसे वे वंचित रह जाते हैं । अपना व उनका बहुमूल्य समय का नुकसान कर लेते हैं । नाद ब्रह्म ध्यान योग धाम आश्रम इन्दौर ।
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मन काम क्रोध मद लोभ मांहि है अटका ।
मम जीव आज लगि लाख योनि है भटका ।
अब आवागमन छुड़ाय नाथ मोहि तारो ।
अब कृपा करो श्रीराम नाथ दुख टारो । 
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आत्मा का अपने साथ बातचीत करना ही मनन है - प्लेटो ।
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फूल जब खिलते हैँ । तो मैँ जानता हूँ - ईश्वर खिला । और जब रात तारोँ से भर जाती है । तो मैँ जानता हूँ । ईश्वर ही अनंत अनंत तारोँ मेँ छितर गया है । मेरा ईश्वर 1 काव्य है । मेरा ईश्वर 1 संगीत है । तुम्हेँ अगर मेरे ईश्वर से परिचित होना है । तो प्रकृति के करीब आओ । क्योँकि मेरा ईश्वर प्रकृति मेँ ही छिपा है । प्रकृत्ति उसका घूंघट है । उठाओ घूंघट । और तुम मालिक को पाओगे । जहाँ भी घूंघट उठाओगे । उसी को पाओगे ।
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ध्यान के ये प्रयोग मस्तिष्क पर तनाव डालते हैं । क्या समाधि के लिए विश्राम उचित न होगा ? ओशो - बिलकुल उचित है । बिलकुल जरूरी है । असल में समाधि विश्राम में ही उपलब्ध होती है । लेकिन हममें से अधिक लोग विश्राम भूल ही गए हैं । हम सिर्फ तनाव ही जानते हैं । तो हमारे लिए विश्राम का 1 ही रास्ता है कि हम पूर्ण तनाव को उपलब्ध हो जाएं । जिसके आगे और तनाव संभव न हो । उस क्लाइमेक्स पर चले जाएं - टेंशन और तनाव की । जिसके आगे और तनने का उपाय न रहे । बस उसके बाद अचानक आप पाएंगे कि शिथिलता आ गई । और विश्राम उपलब्ध हुआ । अगर मैं इस मुट्ठी को बांधता चला जाऊं ।
बांधता चला जाऊं । जितनी मेरी ताकत है । तो 1 जगह मैं पाऊंगा कि मुट्ठी खुल गई । जहां मेरी ताकत पूरी हो जाएगी । वहीं मुट्ठी खुल जाएगी । समाधि तो विश्राम में ही उपलब्ध होगी । लेकिन विश्राम में जाने के लिए आपको पूरे तनाव से गुजरना पड़ेगा । तनाव हमारी आदत है । जैसे कि कोई आदमी रुक न सकता हो । तो उसे दौड़ाना पड़े । और वह दौड़ कर थक जाए । और फिर रुकने के सिवाय कोई उपाय न रहे । और वह रुक जाए । ठीक ऐसे ही । यह जो प्रयोग हैं । रिलैक्सेशन थ्रू
टेंशन हैं । यह जो प्रयोग है । यह तनाव के द्वारा विश्राम का प्रयोग है । सौ में से शायद एकाध आदमी इस स्थिति में है कि सीधा विश्राम में, सीधा रिलैक्सेशन में जा सके । 99 आदमी इस स्थिति में नहीं हैं । ये 99 आदमी इतने तनाव में हैं कि अगर ये विश्राम की भी कोशिश करेंगे । तो वह भी इनके लिए 1 तनाव ही होने वाली है ।  और कुछ नहीं होने वाला है । समझ लें कि 1 आदमी को रात में नींद  नहीं आ रही है । उसके पास 2 उपाय हैं । 1 तो वह नींद लाने की कोशिश करे । नींद लाने की कोशिश में क्या करेगा ? बिस्तर पर लेटे । आंख बंद करे । करवट बदले । लाइट बुझाए । यह करे । इस कोशिश से नींद शायद ही आए । क्योंकि नींद कोशिश से कभी नहीं आती । सब कोशिश नींद में बाधा बन जाती है । असल में नींद का मतलब यह है कि जब आप और कोई कोशिश करने में समर्थ नहीं रहे । तब नींद आती है । जब तक आप कोशिश कर सकते हैं । तब तक नींद नहीं आती । तो यह रास्ता नहीं होगा । अगर 1 आदमी को नींद नहीं आ रही । तो बेहतर है कि एक 4 मील का चक्कर लगा आए । दौड़ कर, तनाव पूरा दे दे । इतना थक जाए कि कोशिश करने के लायक भी उपाय न रहे । बिस्तर पर लेटे । तो करवट बदलने की भी इच्छा न रह जाए । तो नींद आ जाएगी । सीधे नींद लाना मुश्किल है । नींद के लाने का परोक्ष रास्ता है । इनडायरेक्ट । और वह है - थक जाना ।
तो ये जो ध्यान के पहले 3 चरण हैं । वे तनाव के हैं । और चौथा जो चरण है । वह विश्राम का है । इसलिए मैं कहता हूं कि जो 3 में पूरी तरह दौड़ेगा । और पूरी तरह थक जाएगा । वह चौथे को गहराई में
उपलब्ध होगा । जो 3 में कंजूसी कर जाएंगे । चौथे चरण में वे इतने थके नहीं होंगे कि विश्राम को उपलब्ध हो सकें । इसलिए 3 में अपने को पूरी तरह थका ही डालना है । ओशो 
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7 तलों में योग मनुष्य को बांटता है । 7 केंद्रों में । सप्त चक्रों में मनुष्य के व्यक्तित्व को बांटता है । इन सातों चक्रों पर अनंत ऊर्जा और शक्ति सोई हुई है । जैसे 1 कली में फूल बंद होता है । कली देखकर पता भी नहीं चलता कि इसके भीतर ऐसा फूल होगा । ऐसा कमल खिलेगा । इतने दलों वाला कमल प्रकट होगा । कली तो बंद होती है । अगर किसी ने सिर्फ कमल की कलियां ही देखी हों । और कभी फूल न देखा हो । तो वह कल्पना भी नहीं कर सकता कि यह कली और फूल बन सकती है ? हमारे पास जितने चक्र हैं । वे कलियों की तरह बंद हैं । अगर वे खिल जाएं पूरे । तो हमें पता भी नहीं कि उनके भीतर क्या क्या छिपा हो सकता है - कितनी सुगंध । कितना सौंदर्य । कितनी शक्ति । 1-1 चक्र के पास अनंत सौंदर्य । अनंत शक्ति छिपी है । वह लेकिन कलियां खिलें । तो प्रकट हो सकती है । न खिलें । तो प्रकट नहीं हो सकती । कभी आपने कमल की कलियों को खिलते देखा है ? कब खिलती हैं ? सूरज जब निकलता है । सुबह और रोशनी छा जाती है । तब रात के अंधेरे में बंद कलियां सुबह खिल जाती हैं सूरज के साथ । ठीक ऐसे ही जिस दिन हमारी चेतना का सूर्य 1-1 केंद्र पर प्रकट होता है । तो 1-1 केंद्र की कली खिलनी शुरू हो जाती है । भीतर भी हमारी चेतना का सूर्य है । उसके पहुंचने से । उसे हम ध्यान कहें । या और कोई नाम दें । इससे फर्क नहीं पड़ता । हमारे भीतर होश का 1 सूर्य है । उसका प्रकाश जिस केंद्र पर पड़ता है । उसकी कली खिल जाती है चटक कर । और फूल बन जाती है । और उसके फूल बनते ही हम पाते हैं कि अनंत शक्तियां हममें छिपी पड़ी थीं । वे प्रकट होनी शुरू हो गईं । ये जो 7 चक्र हैं । यह प्रत्येक चक्र खोला जा सकता है । और प्रत्येक चक्र की अपनी क्षमताएं हैं । और जब सातों खुल जाते हैं । तो व्यक्ति के द्वार दरवाजे । जिनकी मैं कल बात कर रहा था । वे अनंत के लिए खुल जाते हैं । व्यक्ति तब अनंत के साथ 1 हो जाता है । ओशो
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ओशो और नेहरु - जीवन में पहली बार मैं हैरान रह गया । क्योंकि मैं तो 1 राजनीतिज्ञ से मिलने गया था । और जिसे मैं मिला । वह राजनीतिज्ञ नहीं । वरन कवि था । जवाहर लाल राजनीतिज्ञ नहीं थे । अफसोस है कि वह अपने सपनों को साकार नहीं कर सके । किंतु चाहे कोई खेद प्रकट करे । चाहे कोई वाह वाह कहे । कवि सदा असफल ही रहता है । यहां तक कि अपनी कविता में भी वह असफल होता है । असफल होना ही उसकी नियति है । क्योंकि वह तारों को पाने की इच्छा करता है । वह क्षुद्र चीजों से संतुष्ट नहीं हो सकता । वह समूचे आकाश को अपने हाथों में लेना चाहता है । 1 क्षण के लिए हमने एक दूसरे की आंखों में देखा । आँख से आँख मिली । और हम दोनों हंस पड़े । और उनकी हंसी किसी बूढ़े आदमी की हंसी नहीं थी । वह 1 बच्चे की हंसी थी । वे अत्यंत सुदंर थे । और मैं जो कह रहा हूं । वही इसका तात्पर्य है । मैंने हजारों सुंदर लोगो को देखा है । किंतु बिना किसी झिझक के मैं यह कह सकता हूं कि वह उनमें से सबसे अधिक सुंदर थे । केवल शरीर ही सुंदर नहीं था उनका । अभी भी मैं विश्वास नहीं कर सकता कि 1 प्रधानमंत्री उस तरह से बातचीत कर सकते हैं । वे सिर्फ ध्यान से सुन रहे थे । और बीच बीच में प्रश्न पूछकर उस चर्चा को और आगे बढा रहे थे । ऐसा लग रहा था । जैसे वे चर्चा को सदा के लिए जारी रखना चाहते थे । कई बार प्रधानमंत्री के सैक्रेटरी ने दरवाजा खोल कर अंदर झांका । परंतु जवाहरलाल समझदार व्यक्ति थे । उन्होंने जानबूझ कर दरवाजे की ओर पीठ की हुई थी । सैक्रेटरी को केवल उनकी पीठ ही दिखाई पड़ती थी । परंतु उस समय जवाहरलाल को किसी की भी परवाह नहीं थी । उस समय तो वे केवल विपस्सना ध्यान के बारे में जानना चाहते थे । जवाहरलाल तो इतने हंसे कि उनकी आंखों में आंसू आ गए । सच्चे कवि का यही गुण है । साधारण कवि ऐसा नहीं होता । साधारण कवियों को तो आसानी से खरीदा जा सकता है । शायद पश्चिम में इनकी कीमत अधिक हो । अन्यथा 1 डालर में 1 दर्जन मिल जाते हैं । जवाहरलाल इस प्रकार के कवि नहीं थे । 1 डालर में 1 दर्जन । वे तो सच में उन दुर्लभ आत्माओं में से 1 थे । जिनको बुद्ध ने बोधिसत्व कहा है । मैं उन्हें बोधिसत्व कहूंगा । मुझे आश्चर्य था । और आज भी है कि वे प्रधानमंत्री कैसे बन गए ? भारत का यह प्रथम प्रधानमंत्री बाद के प्रधानमंत्रियों से बिलकुल ही अलग था । वे लोगों की भीड़ द्वारा निर्वाचित नहीं किए गए थे । वे निर्वाचित उम्मीदवार नहीं थे । उन्हें महात्मा गांधी ने चुना था । वे महात्मा गांधी की पंसद थे । और इस प्रकार 1 कवि प्रधानमंत्री बन गया । नहीं तो 1 कवि का प्रधानमंत्री बनना असंभव है । परंतु 1 प्रधानमंत्री का कवि बनना भी संभव है । जब वह पागल हो जाए । किंतु यह वही बात नहीं है ।  तो मैं ने सोचा था कि जवाहरलाल तो केवल राजनीति के बारे में ही बात करेंगे । किंतु वे तो चर्चा कर रहे थे - काव्य की और काव्यात्मक अनुभूति की । ओशो

Who is your Guru  ? questioned a spiritually inclined friend. 
- I am yet to know. I replied with all honesty.
- If that be so, shall I take you to mine, was his instant response.
All I could do was smile and thank his kind gesture of trying to introduce one more to his tribe, while adding, "The disciple is never so capable of finding the true Guru. It's the other way round; the Guru shall find the true disciple. When the flower blooms, the bees will come of it's own accord.
Be true to yourself and to the path; help will come, when it's needed the most.


I'm Nobody ! Who are you ?  Are you - Nobody - too ?
Then there's a pair of us !  Don't tell! they'd advertise - you know !
How dreary - to be - Somebody !
How public - like a Frog - 
To tell one's name - the livelong June -  To an admiring Bog!
Emily Dickinson

Emptiness -  You are so addicted and you have become so habituated that you cannot allow the cup to be empty even for a single moment. The moment you see emptiness anywhere you start filling it. You are so scared of emptiness, you are so afraid : emptiness appears like death. You will fill it with anything, but you will fill it.   Osho

सभी वस्तुएं भय पूर्ण हैं

भोगों में रोग का भय है । उच्च कुल में पतन का भय है । धन में राजा का । मान में दीनता का । बल में दुश्मन का । और शरीर में काल का भय है । इस प्रकार संसार में मनुष्यों के लिए सभी वस्तुएं भय पूर्ण हैं । भय से रहित तो केवल वैराग्य है - भर्तृहरि ।
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जैसे नेत्रहीन के लिए यह जगत - अंधकारमय । और नेत्रवान के लिए - प्रकाशमय है । वैसे ही अज्ञानी के लिए जगत - दुखदायक है । और ज्ञानी के लिए - आंनददायक - स्वामी रामतीर्थ ।
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राह को आसान बनाओ तो कोई बात बने ।
जिन्दगी हंस के बिताओ तो कोई बात बने ।
राह में फूल भी कांटे भी कलियां भी हैं ।
गले सबको लगाओ तो कोई बात बने ।
भागो नहीं जागो । अनमोल सूत्र है । जब भी प्रतिकूल परिस्थिति आती है । हम पलायन करने लगते हैं । जबकि वो स्थाई नहीं होती । हाँ उस वक्त यदि हम शांत चित्त होकर मात्र देखते रहें । तो उसको जाने में कोई देर नहीं लगती । परंतु मुश्किल है - शांत चित्त होना । ध्यान साधना की चर्चा अक्सर आध्यात्मिक जगत में की जाती रही है । हम समझते हैं । इसका मतलब है - भगवान के दर्शन करना । तो सोच लेते हैं । अभी तो जिम्मेदारी पूरी कर लें । दर्शन तो बुढ़ापे में कर लेंगे । वस्तुतः भगवान के दर्शन की जरूरत है ही नहीं । जरूरत तो है भगवान की व्यवस्था के दर्शन की । जिसमें द्वंद्ववाद है । हरेक के साथ विपरीत बंधा है । विपरीत हमको तकलीफ देता है । ध्यान साधना 1 ऐसा अभ्यास है । जिसके द्वारा हम विपरीत को सहजता से स्वीकार करने योग्य हो जाते है । सही अर्थों में तो ये अभ्यास बालपन में ही होना चाहिए । ताकि जीवन को जीने की कला आ जाए । परंतु ऐसा नहीं होता । फलस्वरूप सारा जीवन विपरीत के साथ लड़ने में निकल जाता है । और अंत में प्राण यही पुकारते चले जाते हैं ।
सभी निरर्थक रहे आज तक जितने गीत लिखे ।
और कहाँ तक मेरा तन अब मेरे मीत लिखे ।
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राजा की 3 सीखें - बहुत समय पहले की बात है । सुदूर दक्षिण में
किसी प्रतापी राजा का राज्य था । राजा के 3 पुत्र थे । 1 दिन राजा के मन में आया कि पुत्रों को को कुछ ऐसी शिक्षा दी जाये कि समय आने पर वो राजकाज सम्भाल सकें । इसी विचार के साथ राजा ने सभी पुत्रों को दरबार में बुलाया । और बोला - पुत्रों, हमारे राज्य में नाशपाती का कोई वृक्ष नहीं है । मैं चाहता हूँ । तुम सब 4-4 महीने के अंतराल पर इस वृक्ष की तलाश में जाओ । और पता लगाओ कि वो कैसा होता है ? राजा की आज्ञा पाकर तीनो पुत्र बारी बारी से गए । और वापस लौट आये । सभी पुत्रों के लौट आने पर राजा ने पुनः सभी को दरबार में बुलाया । और उस पेड़ के बारे में बताने को कहा । पहला पुत्र बोला - पिताजी वह पेड़ तो बिलकुल टेढ़ा मेढ़ा, और सूखा हुआ था ।
- नहीं नहीं । वो तो बिलकुल हरा भरा था । लेकिन शायद उसमे कुछ कमी थी । क्योंकि उस पर 1 भी फल नहीं लगा था । दूसरे पुत्र ने पहले को बीच में ही रोकते हुए कहा । फिर तीसरा पुत्र बोला - भैया, लगता है आप भी कोई गलत पेड़ देख आये । क्योंकि मैंने सचमुच नाशपाती का पेड़ देखा । वो बहुत ही शानदार था । और फलों से लदा पड़ा था । और तीनो पुत्र अपनी अपनी बात को लेकर आपस में विवाद करने लगे कि तभी राजा अपने सिंहासन से उठे । और बोले - पुत्रों, तुम्हे आपस में बहस करने की कोई आवश्यकता नहीं है । दरअसल तुम तीनों ही वृक्ष का सही वर्णन कर रहे हो । मैंने जानबूझ कर तुम्हे अलग अलग मौसम में वृक्ष खोजने भेजा था । और तुमने जो देखा । वो उस मौसम के अनुसार था । मैं चाहता हूँ कि इस अनुभव के आधार पर तुम 3 बातों को गाँठ बाँध लो । 1 - किसी चीज के बारे में सही और पूर्ण जानकारी चाहिए । तो तुम्हें उसे लम्बे समय तक देखना परखना चाहिए । फिर चाहे । वो कोई विषय हो । वस्तु हो । या फिर कोई व्यक्ति ही क्यों न हो । 2 - हर मौसम 1 सा नहीं होता । जिस प्रकार वृक्ष मौसम के अनुसार सूखता, हरा भरा या फलों से लदा रहता है । उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में भी उतार चढाव आते रहते हैं । अतः अगर तुम कभी भी बुरे दौर से गुजर रहे हो । तो अपनी हिम्मत और धैर्य बनाये रखो । समय अवश्य बदलता है । और 3  - अपनी बात को ही सही मानकर उस पर अड़े मत रहो । अपना दिमाग खोलो । और दूसरों के विचारों को भी जानो । यह संसार ज्ञान से भरा पड़ा है । चाहकर भी तुम अकेले सारा ज्ञान अर्जित नहीं कर सकते । इसलिए भ्रम की स्थिति में किसी ज्ञानी व्यक्ति से सलाह लेने में संकोच मत करो । 

रानी रासमणि खुद ही शूद्र थी

श्री दत्तावाल ने कहा कि - श्री रामकृष्ण परमहंस ने कहा था कि अगले जन्म में मैं 1 हरिजन की कुटिया की सफाई करूंगा । क्या आचार्य रजनीश भी ऐसा कह सकते हैं ?
- मुझे पता नहीं कि श्री रामकृष्ण ने ऐसा कहा था । या नहीं । लेकिन दत्तावाल कहते हैं । तो माने लेता हूं कि कहा होगा । जरूर कहा होगा । 
अब सवाल यह है । क्या इस जन्म में रामकृष्ण को कोई हरिजन नहीं मिल रहा था । जो अगले जन्म में...! हरिजनों की कोई कमी है ? कोई हरिजनों की कुटियाओं की कमी है ? इस जन्म में तो काली मैया की पूजा कर रहे हैं । पत्थर की मूर्ति पूज रहे हैं । आरती उतार रहे हैं । घंटी बजा रहे हैं । जिंदगी भर वही करते रहे । और हरिजन की कुटिया की सफाई अगले जन्म में करेंगे । क्या चालबाजियां हैं ? कौन रोकता है अभी करने से ? और 1 ही कुटिया की सफाई करना है । सो कर ही दो न । अगले जन्म के लिए क्या टाल रहे हो ?  6-6 घंटे । 8-8 घंटे काली मैया की पूजा हो रही है । उन्हीं काली मैया की ? जिनके लिए बकरे काटे जा रहे हैं । खून बहाया जा रहा है । कलकत्ते की काली के सामने जितना खून बहा है । दुनियां के किसी मंदिर में कभी नहीं बहा । जितनी प्राणियों की हिंसा कलकत्ते की काली के लिए हुई है । उतनी दुनिया के किसी देवता के सामने नहीं हुई । मगर वही कटे हुए बकरों का मांस और खून प्रसाद रूप में वितरित होता है । प्रसाद की तो बड़ी महिमा है । ये डोंगरे जी महाराज क्या खाक प्रसाद बंटवाते हैं - लस्सी बूंदी । अरे यह कोई प्रसाद है ? असली प्रसाद बंटता है कलकत्ते की काली के मंदिर में ? यह रामकृष्ण परमहंस को कोई शूद्र नहीं मिल रहा था ? दूर तो नहीं था शूद्र । क्योंकि जिनके मंदिर में वे पुजारी का काम करते थे - रानी रासमणि । रानी रासमणि खुद ही शूद्र थी । उसका ही बनवाया हुआ मंदिर था । रामकृष्ण परमहंस 14 रुपए महीने की नौकरी पर वहीं तो पुजारी का काम करते थे । शूद्रों की कोई कमी थी । सच तो यह है कि - विवेकानंद खुद ही शूद्र हैं । कायस्थों की गिनती और कहां करोगे ? कायस्थों की गिनती व्यवस्था से शूद्रों में ही होगी । असल में कायस्थ शब्द ही शूद्र का पर्यायवाची है - काया में स्थित । आत्मस्थ हो । तो ब्राह्मण । और कायस्थ हो - तो शूद्र । और क्या चाहिए ? सीधा साफ हिसाब है । रामकृष्ण परमहंस अगले जन्म में सफाई करेंगे ? बड़ी गजब की बात कही । जिंदगी भर ये पत्थर की मूर्ति पूजते रहे । तो यहीं कर लेनी थी । एकाध कुटिया साफ कर लेते । इसके लिए अगले जन्म का क्यों उपद्रव लेना ? और वे मुझसे पूछते हैं - क्या आचार्य रजनीश ऐसा कर सकते हैं ? पहली तो बात - मैं अपनी कुटिया की सफाई नहीं करता । किसी ब्राह्मण की कुटिया की सफाई नहीं की । तो हरिजन की कुटिया की सफाई क्या खाक करूंगा ? अरे, अपनी अपनी कुटिया की सफाई करो । मैं जब विश्वविद्यालय में विद्यार्थी था । तो अपना बिस्तर दरवाजे के पास लगाए रखता था कि सीधा अपने बिस्तर में कूद जाता था । जिसमें कमरे की सफाई न करनी पड़े । कौन झंझट करे । अरे रोज सफाई करो । फिर कचरा इकट्ठा । फिर सफाई करो । फिर कचरा इकट्ठा । इधर भीतर की सफाई से फुर्सत नहीं है । बाहर की सफाई में कौन पड़े । और क्या फायदा ? क्या मिल जाने वाला है ? कचरा थोड़ा कम हुआ कि ज्यादा । कमरा ही है । और कोई अपना है ? अरे, आज यहां । कल वहां । होस्टल ही तो ठहरा । सरायघर है । तो मैं तो दरवाजे पर । बिलकुल दरवाजे पर अपने बिस्तर को लगाकर रखता था कि सीधा दरवाजे से कूद जाना बिस्तर में । और बिस्तर से कूद जाना बाहर । न देखना भीतर । न झंझट में पड़ना । मगर मेरे प्रोफेसरों को दया आती । मेरे आसपास के विद्यार्थियों को दया आती । मेरे साथ 2 लड़कियां पढ़ती थीं । उनको दया आती । वे मुझसे कहतीं कि हमें आज्ञा दो कि आपका आकर 1 दिन कमरा साफ कर दिया करें । सप्ताह में कम से कम 1 दिन । मैंने कहा - क्यों नाहक परेशान करना । तुम साफ करोगी । वह फिर धूल जम जाएगी । और मैं वहां जाता ही नहीं । उस स्थान में । जहां धूल जमी है । फायदा क्या है साफ करने का ? मगर फिर भी कोई न कोई आकर साफ करता । तुम्हारी मर्जी । तुम्हें सेवा करके अगर मोक्ष पाना है - पाओ । हम तो अपने बिस्तर पर मोक्ष में हैं । और अगले जन्म की तो बड़ी मुश्किल है । अगला जन्म मेरा होना नहीं । रामकृष्ण का होना होगा । तो वे करें अगले जन्म में । मेरा तो यह आखिरी जन्म है - दत्तावाल । अब आगे कोई मेरा जन्म नहीं है । तुम जानो । तुम्हारे रामकृष्ण जानें । उनका होगा आगे जन्म । 
यह तो दत्तावाल । अगर यह बात रामकृष्ण ने कही हो । तो यह सिद्ध कर रहे हैं कि रामकृष्ण अभी मुक्त नहीं हुए । क्योंकि मुक्ति के बाद कहां जन्म है ? मुक्ति के बाद कैसा जन्म है ? यह तो इसका अर्थ इतना हुआ कि अभी भी बंधे हैं । और यह भी 1 वासना ही रही कि 1 हरिजन की कुटिया साफ करनी है । अरे, इतनी छोटी सी वासना । कर करा लेते साफ । झंझट मिट जाती । अगले जन्म का उपद्रव खतम हो जाता । अब होंगे कहीं पैदा । कर रहे होंगे कोई हरिजन की कुटिया साफ । यह भी क्या पतन हुआ । इसी को कहते हैं - योगभ्रष्ट होना । कहां से कहां पहुंचे ? काली मैया की पूजा करते करते अब हरिजन की कुटिया साफ कर रहे हैं । मेरा तो कोई अगला जन्म नहीं है । मेरा तो काम पूरा हो चुका है । अब मुझे लौटना नहीं है । इसलिए कैसे वायदा करूं दत्तावाल, कि अगले जन्म में आकर हरिजन की कुटिया साफ करूंगा । और दूसरी बात यह है कि मैं तो ब्राह्मण और शूद्र का भेद मानता नहीं । जो मानते हों भेद । वे इन चिंताओं में पड़ें । मेरे लिए तो हरिजन शब्द का उपयोग करना शूद्र के लिए गलत है । हरिजन तो वह जो हरि को जाने । क्या पागलपन है । बिना ब्रह्म को जाने ब्राह्मण बने बैठे हैं लोग । और बिना हरि को जाने हरिजन बने बैठे हैं लोग । ब्रह्म को जाने सो ब्राह्मण । हरि को जाने सो हरिजन । 1 ही मतलब हुआ दोनों बातों का । चाहे हरि कहो । चाहे ब्रह्म कहो । मेरे लिए तो ये सारे लोग ही । जब तक ब्रह्म को नहीं जान लिए हैं । तब तक हरिजन नहीं हैं । ब्राह्मण नहीं हैं । शूद्र ही हैं । और इन्हीं की कुटियाएं तो साफ करने में लगा हूं । लेकिन कुटियाएं मेरे लिए भीतर हैं । बाहर नहीं । बाहर की कुटिया मैं क्या साफ करूं ? असली सफाई में लगा हूं । भीतर तुम्हारी आत्मा का स्नान हो जाए । उसको ही मैं ध्यान कहता हूं । भीतर तुम स्वच्छ हो जाओ । उसी को मैं स्वास्थ्य कहता हूं । भीतर तुम आनंदमग्न हो जाओ । उत्सव आ जाए । दीए ही दीए जल जाएं । फूल ही फूल खिल जाएं । तो तुमने जाना । तुमने जीया । तुमने पहचाना । उसको मैं संन्यास कहता हूं । उसी कार्य में लगा हुआ हूं ।  ओशो
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तुम वही दे सकते हो । जो तुम्हारे पास है । तुम शरीर का भोजन दे सकते हो । बुद्ध पुरुष वही दे सकते हैं । जो उनके पास है । वे आत्मा का भोजन दे सकते हैं । तुम जो देते हो । वह तो न कुछ है । बुद्ध पुरुष जो देते हैं । वह सब कुछ है । जो समझदार हैं । वे यह सौदा कर ही लेंगे । यह सौदा बड़ा सस्ता है । बुद्ध को । महावीर को लोग भोजन देते । तो भोजन के बाद वे 2 वचन उपदेश के कहते थे । तुमने कुछ दिया । उससे बहुत ज्यादा तुम्हें देते थे । तुमने जो दिया । उसका क्या मूल्य है ? कितना मूल्य है ? उन्होंने जो दिया । वह अमूल्य है । वे
2 पंक्तिया कभी किसी के जीवन के अंधेरे मार्ग पर रोशनी बन जातीं । वे 2 पंक्तियां कभी किसी के सूखे मरुस्थल जैसे हृदय में फूल बनकर खिल जातीं । वे 2 पंक्ति जहां गीतों का पैदा होना बंद हो गया था ।
वहां गीतों को जन्म देने लगतीं । उन थोड़े थोड़े उपदेशों ने लोगों का आमूल जीवन बदल डाला है । 

अज्ञान में व्यर्थ के कुतूहल होते हैं

भगवान ! मैं प्रश्नों से भरा हूं । आप उत्तरों से । क्या मैं आशा करूं कि आप मेरी सारी जिज्ञासाओं का समाधान कर देंगे ? यदि आप आश्वासन दें । तो मैं संन्यास तक लेने को तैयार हूं ।
- भाईदास भाई ! भाई कैसी बहकी बहकी बातें कर रहे हो - संन्यास तक । जैसे कि कोई कहे कि जहर तक पीने को तैयार हूं । ऐसी झंझट में न पड़ो । अच्छे भले आदमी । चंगे आए । चंगे ही जाओ । क्या बिगड़ना है ? और तुमसे किसने कहा कि - मैं उत्तरों से भरा हूं । हां, प्रश्नों से खाली हो गया हूं । तुम प्रश्नों से भरे हो । मैं प्रश्नों से खाली हूं । उत्तरों से मैं भरा हूं । इस भ्रांति में न रहो । मैं कोई पंडित नहीं हूं । हां, तुम्हें भी प्रश्नों से खाली होना हो । तो मुझसे जुड़ सकते हो । वही संन्यास है । प्रश्नों के उत्तर नहीं होते । सदगुरु प्रश्नों के उत्तर नहीं देता है । प्रश्नों को तोड़ता है । तुम जरा गौर तो करो कि मैं तुम्हारे जो प्रश्नों के उत्तर देता हूं । वे उत्तर हैं ? कि इधर से लंगड़ी मारी । उधर से 1 दचका दिया । इधर खोपड़ी पर लट्ठ मारा । 1 हुद्दा आगे से । 1 पीछे से । इसको तुम उत्तर कहते हो ? उत्तर होते हैं - शास्त्रों में । यहां तो कुटाई पिटाई हो जाती है ।  और तुम कह रहे हो कि - आप मेरी जिज्ञासाओं का समाधान कर देंगे । यदि आप आश्वासन दें । गारंटी चाहते हो ? 1 ही बात की गारंटी दे सकता हूं कि तुम्हारे प्रश्नों को नष्ट कर दूंगा । 1-1 प्रश्न को उखाड़कर फेंक दूंगा । और उत्तर बाहर से नहीं आते । जब सारे प्रश्न गिर जाते हैं । तो तुम्हारे भीतर ही उत्तरों का उत्तर । समाधानों का समाधान । इसीलिए तो हम उस अवस्था को समाधि कहते हैं । क्योंकि वह समाधानों का समाधान है । उत्तर नहीं है । जिंदगी कोई स्कूल की परीक्षा नहीं है कि प्रश्न पूछे । और उत्तर दे दिए । लेकिन आदतें हमारी खराब हैं । सड़ी गली आदतें हैं । दकियानूसी आदतें हैं ।
गुलाम रूहों के कारवां में । जरस की आवाज भी नहीं है ।
उठो, तमद्दुन के पासबानो । तुम्हारे आकाओं की जमीं से ।
उबल चुके जिंदगी के चश्मे । निशान सिजदों के अब जबीं से ।
मिटाओ, देखो छुपा न ले वो । लहू टपकता है आस्तीं से ।
गुलाम रूहों के कारवां में । नफस की आवाज भी नहीं है । 
उठो, मुहब्बत के पासबानो । ये कोहरो-सहरा, ये दश्तो-दरिया ।
तुम्हारे अजदाद गा चुके हैं । यहां पे वो आतिशीं तराना ।
जो गर्मिए-बज्म था, मगर अब । गुजर गया उसको इक जमाना ।
समंदे-अय्याम बर्क-पा है । उठो कि तारीख हर वरक पर ।
तुम्हारा शुभ नाम ढूंढती है । न देंगे आवाज उसके शह पर ।
जो वक्त उड़ता चला गया है । जमीन आंखों से मत कुरेदो ।
न मिल सकेंगी वो हड्डियां जो । जमीं का तारीक गहरा सीना ।
निगल चुका है--नया करीना । सिखाओ पामाल जिंदगी को ।
उठो, मजारों के पासबानो । चलो न गर्माओ जिंदगी को ।
ये ढेर सूने पड़े हैं, इन पर । कहीं से दो फूल ही चढ़ाओ ।
गुलाम रूहों के कारवां में । जरस की आवाज भी नहीं है ।
यह देश क्या है - एक गुलाम रूहों का कारवां हो गया है । 
जिसमें कोई जीवन की घंटियां भी नहीं बजतीं ।
गुलाम रूहों के कारवां में । जरस की आवाज भी नहीं है ।
गुलाम रूहों के कारवां में । नफस की आवाज भी नहीं है ।
घड़ियाल तो क्या बजेंगे । यहां सांस की आवाज तक खो गई है ।
उठो, तमद्दुन के पासबानो । हे संस्कृति के पागलो ।
उठो, मुहब्बत के पासबानो । बहुत हो चुकीं प्रेम की बातें, अब उठो ।
उठो, मजारों के पासबानो । पूज चुके कब्रों को बहुत ।
उठो अब थोड़े जिंदगी को जीओ । ये ढेर सूने पड़े हैं, इन पर ।
कहीं से दो फूल ही चढ़ाओ ।
भाईदास भाई, तुम कहते हो कि प्रश्नों से भरे हो । तुम्हारे प्रश्न तुम्हारे ही प्रश्न होंगे न । और अज्ञान में क्या प्रश्न हो सकते हैं ? और ज्ञान में तो प्रश्न होंगे ही क्यों ? अज्ञान में व्यर्थ के कुतूहल होते हैं । या चालबाजियां होती हैं । या धोखा होता है । या पाखंड होता है । तुम्हारे प्रश्नों में तुम्हारी ही छाप होगी न । तुम्हारे प्रश्न तुम्हारे ही प्रतिबिंब होंगे न । तुम्हारे प्रश्न आखिर तुम्हारे भीतर ही से तो आएंगे । अब बबूल में कोई गुलाब के फूल तो न लगेंगे । अब बबूल के कांटों को मैं बैठा रहूं । तोड़ता रहूं । इससे भी क्या होगा ? नए कांटे उगते रहेंगे । इसलिए मैं तो जड़ मूल से तुम्हें मिटा दूंगा । भाईदास भाई, अगर तैयारी हो बिलकुल मिटने की । तो संन्यासी हो जाओ । आश्वासन 1 देता हूं कि मिटाऊंगा । बिलकुल मिटा दूंगा । जड़ों से उखाडूंगा । कहीं कुछ शेष न रहेगा तुम्हारा तुममें । और जब तुम्हारा तुम में कुछ भी शेष न रहेगा । तो पा जाओगे तुम सभी समस्याओं का समाधान ।
दादा चूहड़मल फूहड़मल बीमार थे । डाक्टर के यहां गए । डाक्टर ने सब जांचा परखा । और 2 दवा की गोली देकर कहा - 1 सुबह 1 शाम खाना । बस 1 ही दिन में बिलकुल चंगे नजर आओगे ।
दादा घबराकर बोले - क्या बोले बरी डाक्टर, नंगे नजर आओगे ।
डाक्टर ने कहा कि - नहीं नहीं, मैंने कहा । चंगे हो जाओगे । यानी मेरी दवा इतनी बढ़िया है कि 1 ही दिन में बिलकुल ठीक हो जाओगे ।
दादा बोले - अच्छा अच्छा, यह बात है । बरी यह तो बताओ कि दवा काहे के साथ खानी है ?
जवाब मिला - चाय या दूध के साथ खाईएगा । दादा को संतोष न हुआ - बरी डाक्टर हमको तो 1 बात बोल दो - या चाय । या दूध । हमको दोहरी बातें ठीक नहीं लगतीं ।
डाक्टर ने कहा - अच्छा तो दूध के साथ गोली लीजिएगा ।
दादा ने पूछा - दूध गाय का । या भैंस का ?
डाक्टर ने कहा - माफ करिए । मुझे और भी मरीज देखने हैं । अब आप ही अकेले तो नहीं कि आप से ही थोड़े ही सिर मारता रहूं । आपको जो दूध मिल जाए । उसी के साथ ले लेना । उसमें कोई फर्क नहीं पड़ता । दादा बोले - बरी डाक्टर, गुस्सा क्यों होते हो ? हम आज पहली बार ही ऐलोपैथी का इलाज करवा रहे हैं । इसलिए सब बातें क्लियर क्लियर जानना चाहते हैं । न हमारे घर गाय है । न भैंस । बकरियां हैं । यदि बकरी के दूध के साथ गोली खा लूं । तो कोई नुकसान तो नहीं है न ?
उत्तर मिला - नहीं ।
मगर दादा की जिज्ञासा अभी समाप्त न हुई - बरी, 1 बार और बताओ न । दूध गर्म चाहिए । या ठंडा ?
डाक्टर ने पिंड छुड़ाने के लिहाज से कह दिया - कुनकुना ।
दादा बोले - ठीक । दूध गिलास में पीना कि कटोरी में ?
डाक्टर को गुस्सा आ गया - साईं ! अब घर भी जाइए न । आपको कुछ और काम नहीं है क्या ?
दादा बोले - काम क्यों नहीं है । पर जब हमने आपको पूरी फीस दी है । तो बदले में हमें भी पूरी पूरी जानकारी तो दीजिए । बताईए कि दूध खड़े खड़े पीना है कि बैठकर पीना है ?
डाक्टर ने अपना माथा ठोंक लिया - साईं ! आप यह लीजिए अपनी फीस वापस । 10 का नोट पकड़ाते हुए उसने कहा - खुदा के वास्ते अब मेरा पीछा छोड़िए ।
दादा बोले - लेकिन बरी तुम तो नाराज होते हो । हम तो सीधा सादा आदमी है । कभी ऐलोपैथी का इलाज नहीं करवाया । इसलिए पूछता है कि दूध खुद अपने हाथ से पीना है । या मेरे मुन्ने की अम्मा यदि पिला दे । तो कोई नुकसान है ?
डाक्टर को भी हंसी आ गई । बोला - साईं, तुम तो बड़ा जानदार आदमी है । जा अब अपने घर । और मुन्ने की अम्मा के हाथ से दूध पी ।
दादा ने कहा - अच्छा तो जाता हूं बरी डाक्टर । मगर 1 बात तो बताओ कि घर तक पैदल जाऊं । या रिक्शे में बैठकर ?
डाक्टर ने कहा - रिक्शे में जाओ । इस बुखार में पैदल चलना ठीक नहीं । दादा डाक्टर से राम राम बरी साईं कहकर चल दिए । डाक्टर ने संतोष की सांस ली । लेकिन आश्चर्य की बात तो तब घटी । जब आधा घंटे बाद दादा लौट आए । और बोले - बरी डाक्टर, तुम कैसा इंसान है ? हमको यह नहीं बताया कि कौन सी गोली सुबह खानी है । और कौन सी शाम को खानी है । हमारा मुन्ने की अम्मा ने हमको बहुत डांटा ।
डाक्टर ने संयम साधकर कहा - यह सुबह खाईए । और यह शाम को ।
दादा बोले - तुम्हारी भूल के कारण हमको वापस आना पड़ा बरी । हमको फिर से घर जाने के लिए 10 रुपए रिक्शा का भाड़ा दो । वर्ना हम कैसे जाएंगे ?
डाक्टर ने आधा मिनट गंभीरता से सोचा । और चुपचाप 10 का नोट दादा के हाथ में थमा दिया । इसी में ज्यादा भलाई थी । दादा मुस्काते बाहर आए । और वेटिंग रूम में बैठी अपनी बीबी को आंख मारकर बोले कि - लोग कहते हैं कि " जाको राखे साईयां । मार सके न कोय ' ऐसा कहने वाले निरे मूर्ख हैं । गधे हैं । उनको कहना चाहिए - जाको लूटे साईयां । बचा सके न कोय । बीबी हंसती हुई उठी । और बोली - तो फिर आज कौन से पिक्चर चला जाए मुन्ने के पापा ? इस डाक्टर से आज कितने रुपए वसूल करे ? अरे, बरी बोलो न ।
तुम्हारी जिज्ञासाएं । भाईदास भाई, किसी काम न आएंगी । यहां तो जिज्ञासाएं तोड़नी हैं । यहां तो प्रश्न गिराने हैं । उत्तर मेरे पास कोई नहीं है । उत्तरों का उत्तर है । और वह तुम्हारे भीतर है । उसे खोजने का रास्ता बता सकता हूं । ओशो
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परिभाषाओं को तुम साधना मत समझना । अनेक लोग परिभाषाओं को साधना मान लेते हैं । परिभाषाएं तो केवल इंगित हैं । इशारे हैं । किसी बात को कहने के ढंग हैं । और कहना पड़ता है उल्टी तरफ से । क्योंकि उल्टे से तुम परिचित हो । आनंद को हम बुद्धों की तरफ से तो कह नहीं सकते । क्योंकि उसके लिए फिर कोई भाषा नहीं है । बुद्धों की कोई भाषा नहीं है । वहां तो मौन भाषा है । आनंद को कहना हो । तो अबुद्धों की तरफ से कहना पड़ेगा । अबुद्धों को आनंद का कोई पता नहीं है । अड़चन समझो । बुद्धों के पास कोई भाषा नहीं है । आनंद का अनुभव है । अबुद्धों के पास भाषा है । आनंद का कोई अनुभव नहीं है । 
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प्रत्येक देही अस्तित्व के दो पहलू होते हैं । एक सामान्य और दूसरा किसी भी ज्ञान से युक्त या संयुक्त । जैसे किसी पढोसी डाक्टर आदि को सशरीर रोज देखो । और उसको उसके ज्ञान के स्तर पर जानते हो । तो यह देखना और ही होता है । इसी से श्रद्धा नफ़रत आदर आदि भावों का सृजन होता है । गुरु या अंतर के साधकों, ज्ञानियों का एक प्रकाशित आंतरिक रूप अलग होता है । उसी को देखना असली देखना होता है ।

पूरे शरीर को ऊर्जा से स्पंदित हो जाने दो

प्रार्थना ध्यान - अच्छा हो कि यह प्रार्थना ध्यान आप रात में करो । कमरे में अंधकार कर लें । और ध्यान खत्म होने के तुरंत बाद सो जाओ । या सुबह भी इसे किया जा सकता है । परंतु उसके बाद 15 मिनट का विश्राम जरूर करना चाहिए । वह विश्राम अनिवार्य है । अन्यथा तुम्हें लगेगा कि तुम नशे में हो । तंद्रा में हो । उर्जा में यह निमज्जन ही प्रार्थना ध्यान है । यह प्रार्थना तुम्हें बदल डालती है । और जब तुम बदलते हो । तो पूरा अस्तित्व भी बदल जाता है । दोनों हाथ ऊपर की और उठा लो । हथेलियां खुली हुई हों । सिर सीधा उठा हुआ रहे । अनुभव करो कि आस्तित्व तुममें प्रवाहित हो रहा है । जैसे ही ऊर्जा तुम्हारी बाँहों से होकर नीचे बहेगी । तुम्हें हलके हलके कंपन का अनुभव होगा । तुम हवा में कंपते हुए पत्ते की भांति हो जाओ । उस कंपन को होने दो । उसका सहयोग करो । फिर पूरे शरीर को ऊर्जा से स्पंदित हो जाने दो । और जो होता हो । उसे होने दो । अब पृथ्वी के साथ प्रवाहित होने का अनुभव करो । पृथ्वी और स्वर्ग । ऊपर और नीचे । यन और याँग । पुरूष और स्त्री । तुम बहो । तुम घुलो । तुम स्वयं को पूरी तरह छोड़ दो । तुम नहीं हो । तुम 1 हो जाओ । निमज्जित हो जाओ । 2 या 3 मिनट बाद । या जब भी तुम पूरी तरह भरे हुए अनुभव करो । तब तुम धरती की और झुक जाओ । और हथेलियों और माथे से उसे स्पर्श करो । तुम तो बस वाहन बन जाओ कि दिव्य ऊर्जा का पृथ्वी की ऊर्जा से मिलन हो सके । इन दोनों चरणों को 6 बार और दोहराओ । ताकि सभी चक्र खुल सकें । इन्हें अधिक बार किया जा सकता है । लेकिन कम करोगे । तो बेचैन अनुभव करोगे । और सो नहीं पाओगे । प्रार्थना की उस भाव दशा में ही सोओ । बस सो जाओ । और ऊर्जा बनी रहेगी । नींद में उतरते उतरते भी तुम उस ऊर्जा के साथ बहते रहोगे । यह गहन रूप से सहयोगी होगी । क्योंकि फिर ऊर्जा तुम्हें सारी रात घेरे रहेगी । और भीतर कार्य करती रहेगी । सुबह होते होते तुम इतने ज्यादा ताजे । इतने ज्यादा प्राणवान अनुभव करोगे । जितना तुमने पहले कभी भी अनुभव नहीं किया था । 1 नई सजीवता । 1 नया जीवन तुममें प्रवेश करने लगेगा । और पूरे दिन तुम 1 नई ऊर्जा से भरे अनुभव करोगे । 1 नई तरंग होगी । ह्रदय में 1 नया गीत और पैरों में 1 नया नृत्य होगा । ओशो
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प्रेम मुक्ति है - अहंकार और प्रेम में क्या संबंध हो सकता है ? प्रेम तो अहंकार का विसर्जन है । जब भी किसी के प्रति प्रेम उगमता है । तो उसके प्रति हम अपना अहंकार छोड़ देते हैं । हम उसके प्रति अपने को समर्पित कर देते हैं । फिर वह प्रेम साधारण जगत का हो । या भगवान के प्रति हो । मौलिक प्रक्रिया तो 1 ही है । जिस स्त्री को तुमने प्रेम किया । या जिस पुरुष को तुमने प्रेम किया । उस प्रेम में तुम्हें परित्याग क्या करना पड़ता है ? प्रेम मांगता क्या है ? प्रेम 1 ही चीज मांगता है कि मैं को समर्पित करो । और जब भी कोई पुरुष या स्त्री एक दूसरे के प्रति अपने को समर्पित कर देते हैं । तो उनके जीवन में बड़ी हरियाली के फूल खिलते हैं । बड़ी सुवास उठती है । मगर यह बहुत मुश्किल से होता है । क्योंकि आखिर पुरुष, पुरुष है । और स्त्री, स्त्री है । दोनों के लिए अपने मैं को । अपने अहंकार को छोड़कर स्वयं को समर्पित करना कठिन कार्य है । और कभी यह समर्पण जीवंत हो भी जाए । तो वह क्षणभंगुर ही होता है । उस क्षण में थोड़ी सी झलक मिलती है - रस की । मन थोड़ा सा मुग्ध हो जाता है । थोड़े प्राण आनंदित भी हो जाते हैं । मगर कुछ क्षणों के लिए । और फिर वही अंधेरी रात । इसलिए प्रेम में थोड़ा सुख भी । और बहुत ज्यादा दुख है । जिन्होंने प्रेम को जाना । उन्होंने सुख जाना ही नहीं । उन्होंने प्रेम में सुख से भी ज्यादा गहन दु:ख जाना । इसीलिए तो बहुत से लोग प्रेम में पड़ते ही नहीं । छोटे सुख से तो वे वंचित रह रहते हैं । मगर बड़े गहन दु:ख से भी बच जाते हैं । इसीलिए तो कई लोग सदियों सदियों तक जंगल में भाग गये हैं । संसार का क्या अर्थ होता है ? जहाँ प्रेम होने की संभावना हो । जहाँ प्रेम का अवसर हो । जहाँ दूसरा मौजूद हो । जहाँ न जाने कब किसी से मन मिल जाये । और न जाने कब किसी से राग जुड़ जाये । भाग जाओ । सदियों सदियों से साधु संत जंगलों में भागते रहे हैं । पहाड़ों में भागते रहे हैं । किससे भाग रहे हैं ? वे कहते हैं - संसार से भाग रहे हैं । मगर ऐसा होता नहीं । उनके मनोविज्ञान को समझो । वे संसार से नहीं । प्रेम से भाग रहे होते हैं । संसार प्रेम का ही दूसरा नाम हैं । लेकिन भागे हुए ये लोग बहुत अधिक अहंकारी होते हैं । इसीलिए तुम साधु संतों में जितना अहंकार देखोगे । वैसा अहंकार और कहीं नहीं दिखेगा । क्योंकि प्रेम जो मिटा सकता था उनके अहंकार को । उस प्रेम को तो वे छोड़कर चले गये । अब तो बीमारी ही रही । औषधि रही नहीं । मैं ऐसे सन्यास का समर्थक हूँ । जो प्रेम से भागता नहीं । वरन प्रेम के सत्य में जागता है । ऐसा सन्यास । जो प्रेम को शाश्वत सच्चाई की तरह स्वीकार करता है । जो संसार से । प्रेम से नहीं । बल्कि अहंकार से भागता है । अहंकार को त्यागता है । क्योंकि दु:ख प्रेम से नहीं आता । प्रेम से ही सुख आता है । भले ही क्षणभंगुर ही सही । मगर प्रेम चला जाता है । तो फिर अहंकार सिर उठाता है । इसीलिए मेरा सन्यास भिन्न है । जो तोड़ता नहीं । बल्कि सबसे जोड़ता है - ओशो ।
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निर्जरा - कर्म मल का झड़ जाना - आपके और आपके बच्चे के बीच तो भौतिक जगत फैला हुआ है । यह विचार किसी गहरे अर्थों में भौतिक ही होना चाहिए । अन्यथा इस भौतिक माध्यम को पार न कर पाएगा ।
यह जानकर आपको हैरानी होगी कि महावीर ने कर्म तक को भौतिक कहा है । फिजिकल कहा है । मैटीरियल कहा है । जब आप क्रोध करते हैं । और किसी की हत्या कर देते हैं । तो आपने 1 कर्म किया - क्रोध का । और हत्या करने का । महावीर कहते हैं - यह भी सूक्ष्म अणुओं में आपमें चिपक जाता है । कर्म मल बन जाता है । यह भी मैटीरियल है । यह भी कोई इम्मैटीरियल चीज नहीं है । यह भी मैटर की तरह पकड़ लेता है आपको । और इसलिए महावीर निर्जरा जिसको कहते हैं । वे निर्जरा कहते हैं । इस कर्म मल से जिस दिन छुटकारा हो जाए । यह सारा का सारा जो कर्म अणु आपके चारों तरफ जुड़ गए हैं । ये गिर जाएं । जिस दिन ये गिर जाएंगे । उस दिन आप शुद्धतम शेष रह जाएंगे । वह निर्जरा होगी । निर्जरा का मतलब है - कर्म के अणुओं का झड़ जाना । कर्म भी..जब आप क्रोध करते हैं । तब आप 1 कर्म कर रहे हैं । वह क्रोध भी आणविक होकर ही आपके साथ चलता है । इसलिए जब आपका यह शरीर गिर जाता है । तब भी उसको गिरने की जरूरत नहीं होती । वह दूसरे जन्म में भी आपके साथ खड़ा हो जाता है । क्योंकि वह अति सूक्ष्म है । तो मेंटल बॉडी जो है । मनस शरीर जो है । वह एस्ट्रल बॉडी का सूक्ष्मतम हिस्सा है । और इसलिए इन चारों में कहीं भी कोई खाली जगह नहीं है । ये सब एक दूसरे के सूक्ष्म होते गए हिस्से हैं । मेंटल बॉडी पर काफी काम हुआ है । क्योंकि अलग से मनस शास्त्र उस पर काम कर रहा है । और विशेषकर पैरा साइकोलाजी उस पर अलग से काम कर रही है । परा मनोविज्ञान अलग से काम कर रहा है । और मन के इतने अदभुत खयाल विज्ञान की पकड़ में आ गए हैं । धर्म की पकड़ में तो बहुत समय से थे । विज्ञान की पकड़ में भी बहुत सी बातें साफ हो गई हैं । ओशो

अज्ञान में ही मैंने जाना - भगवत्ता को

यह बात सच है । इसे मैं स्वीकार करता हूं । मैं अज्ञानी हूं । क्योंकि मैं तो उपनिषद के इस सूत्र को मानता हूं कि ज्ञानी महा अंधकार में भटक जाते हैं । सुकरात ने तो कम से कम इतना कहा कि मैं इतना ही जानता हूं कि मैं कुछ भी नहीं जानता । मगर इतना तो कहा कि मैं इतना ही जानता हूं । मैं मानता हूं कि इतनी ही कमी रह गई । मैं तुमसे कहता हूं । मैं इतना भी नहीं जानता कि मैं कुछ भी नहीं जानता हूं । परम अज्ञानी हूं । महा अज्ञानी हूं । छोटा मोटा काम ही मैं नहीं करता । जब काम ही करना हो । तो बड़ा । अज्ञान भी क्या ? महा अज्ञान । मुझे कुछ भी नहीं मालूम । कबीरदास ने तो कहा कि मसि कागद छुओ नहीं । उन्होंने तो छुआ भी नहीं था । मैंने छुआ जरूर । लेकिन फिर भी तुमसे कहता हूं कि मसि कागद छुओ नहीं । अरे नहीं छुआ । यह कोई बड़ी बात हुई ? छूकर और नहीं छुआ । यह कुछ बात हुई । चले पानी में । और भीगे भी नहीं । यह कुछ बात हुई । कबीर दास तो चले ही नहीं । किनारे पर ही बैठे रहे । कहा भी है उन्होंने कि - जिन खोजा तिन पाइयां । गहरे पानी पैठ । मैं बौरी खोजन गई । रही किनारे बैठ । तुम किनारे बैठोगे महाराज । तो फिर कैसे खोजोगे ? मैंने डुबकी भी मारी । और गीला भी नहीं हुआ । तो कहता हूं कि मसि कागद छुओ नहीं । बिलकुल अज्ञानी हूं । मगर परमात्मा को जानने में अज्ञान बाधा ही कब रहा ? बाधा खड़ी होती है - ज्ञान से ।
कबीर कहते हैं - लिखा लिखी की है नहीं । देखा देखी बात ।
लिखा लिखी की नहीं है । इसलिए ज्ञान क्या करेगा ? देखा देखी बात । देखने की बात है । तो यह तो मैं स्वीकार करता हूं कि मैं अज्ञानी हूं । और अज्ञान में ही मैंने जाना - भगवत्ता को । अज्ञान का अर्थ है । मैंने सारे ज्ञान को इनकार कर दिया । सारे ज्ञान को झाड़ कर अलग कर दिया । और जब सारे ज्ञान से छुटकारा हो गया । तो जो शेष बच रहता है । वही भगवत्ता है । वही दिव्यता है । ओशो ।
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ओशो दर्शन - ओशो ने प्रचलित धर्मों की व्याख्या की । तथा प्यार, ध्यान और खुशी को जीवन के प्रमुख मूल्य माना । ओशो कहते हैं कि - धार्मिक व्यक्ति की पुरानी धारणा यह रही है कि वह जीवन विरोधी है । वह इस साधारण जीवन की निंदा करता है । वह इसे क्षुद्र, तुच्छ, माया कहता है । वह इसका तिरस्कार करता है । मैं यहां हूं । जीवन के प्रति तुम्हारी संवेदना व प्रेम को जगाने के लिये ।
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मैं बिलकुल नई धार्मिक चेतना की शुरुआत हूं । कृपया मुझे अतीत के साथ न जोड़ें । यह तो स्मरण करने के योग्य भी नहीं है । यह मनुष्य जाति के लिये बड़े भाग्य की बात होगी । यदि हम अतीत का संपूर्ण इतिहास जला दें । अतीत को पूरी तरह से मिटा दें । और मनुष्य को निर्भार कर 1 नई शुरुआत दें । उसे फिर आदम और हव्वा बना दें । ताकि वह प्रारंभ से शुरुआत कर सके । 1 नया मनुष्य । 1 नई सभ्यता । 1 नई संस्कृति ।
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1 ताऊ रोज़ बैंक जाया करता था । कभी 2 लाख तो कभी 3 लाख और ऐसी बड़ी बड़ी रकम जमा किया करता था । बैंक का मैनेजर उसे हमेशा संशय की दृष्टि से देखता था । उसे समझ नहीं आता था कि यह ताऊ रोज़ इतना पैसा कहाँ से लाता है । अंत में 1 दिन उसने उस व्यक्ति को बुलाया । और कहा - ताऊ ! तुम रोज़ इतना पैसा कहाँ से लाते हो । आखिर क्या काम करते हो तुम ? 
ताऊ ने कहा - भाई ! मेरा तो बस 1 ही काम है । मैं शर्त लगाता हूँ । और जीतता हूँ ।
मैनेजर को यक़ीन नहीं हुआ । तो उसने कहा - ऐसा कैसे हो सकता है कि आदमी रोज़ कोई शर्त जीते ? 
ताऊ ने कहा - चलिए मैं आपके साथ 1 शर्त लगाता हूँ कि आपके नितंब पर 1 फोड़ा है । अब शर्त यह है कि कल सुबह मैं अपने साथ 2 आदमियों को लाऊँगा । और आपको अपनी पैंट उतार कर उन्हें अपने कूल्हे दिखाने होंगे । यदि आपके नितंब पर फोड़ा होगा । तो आप मुझे 10 लाख दे दीजिएगा । और अगर नहीं हुआ । तो मैं आपको 10 लाख दे दूँगा । बताईए मंज़ूर है ?
मैनेजर जानता था कि उसके कूल्हों पर फोड़ा नहीं है । इसलिए उसे शर्त जीतने की पूरी उम्मीद थी । लिहाज़ा वह तैयार हो गया । अगली सुबह ताऊ 2 व्यक्तियों के साथ बैंक आया । उन्हें देखते ही मैनेजर की बाँछें खिल गईं । और वह उन्हें झटपट अपने केबिन में ले आया । इसके बाद मैनेजर ने उनके सामने अपनी पैंट उतार दी । और ताऊ से कहा - देखो मेरे कूल्हों पर कोई फोड़ा नहीं है । तुम शर्त हार गए । अब निकालो 10 लाख रुपए ।
ताऊ के साथ आए दोनों व्यक्ति यह दृश्य देख बेहोश हो चुके थे । ताऊ ने हँसते हुए मैनेजर को 10 लाख रुपयों से भरा बैग थमा दिया । और ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा ।
मैनेजर को कुछ समझ नहीं आया । तो उसने पूछा - तुम तो शर्त हार गए । फिर क्यों इतना हँसे जा रहे हो ? 
ताऊ ने कहा - तुम्हें पता है । ये दोनों आदमी इसलिए बेहोश हो गए । क्योंकि मैंने इनसे 40 लाख रूपयों की शर्त लगाई थी कि बैंक का मैनेजर तुम्हारे सामने पैंट उतारेगा । इसलिए अगर मैंने तुम्हें 10 लाख दे भी दिए । तो क्या फ़र्क पड़ता है । 30 तो फिर भी बचे न ।
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1 दिन किसी ने पूछा - कोई अपना तुम्हे छोड़ के चला जाये । तो यूं क्या करोगे ? हमने कहा - अपने कभी छोड़ के नहीं जाते । और जो चले जायें । वो अपने नही ।
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ज़रूरी काम है लेकिन । रोज़ाना भूल जाता हूँ ।
मुझे तुमसे मोहब्बत है । बताना भूल जाता हूँ ।
तेरी गलियों में फिरना ही । मुझे अच्छा सा लगता है ।
मैं रास्ता याद रखता हूँ । ठिकाना भूल जाता हूँ ।
बस इतनी बात पर मैं । लोगों को अच्छा नहीं लगता ।
मैं नेकी कर तो देता हूँ । जताना भूल जाता हूँ ।
शरारत ले के आखों में । वो तेरा देखना तौबा ।
मैं नज़रों पे जमी नज़रें । झुकाना भूल जाता हूँ ।
मोहब्बत कब हुई कैसे हुई । सब याद है मुझको ।
मगर फिर भी मोहब्बत को । भुलाना भूल जाता हूँ ।
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पश्चिम से हमने चुम्बन लिया । पश्चिम से हमने समलैंगिकता ली । लिव इन रिलेशनशिप लिया । कम कपड़ों वाली नंगी पुंगी लड़कियाँ भी पाईं । नाबालिग कन्याओं के गर्भपात भी बस दहलीज़ पर खड़े ही हैं ।
लेकिन ? हमने पश्चिम से अनुशासन नहीं लिया । समय की पाबन्दी नहीं ली । राष्ट्र के दुश्मनों को मार गिराने की प्रतिबद्धता नहीं सीखी । अपने देश के नागरिकों के लाभ के लिये " किसी भी हद " तक जाने की जीवटता नहीं सीखी । लानत है हम पर । दूसरों को दोष क्या दें ?
Rajendra Swami
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1 बार हसबेंड के मोबाइल पर मैसेज आया - सारी सर ! मैंने आपकी WIFE   का उपयोग किया है । दिन रात उपयोग किया है । ख़ास करके जब जब आप घर पर नहीं होते थे । मैं कबूल करता हूँ कि जितना उपयोग मैंने किया होगा । शायद आपने भी नहीं किया होगा । लेकिन 
अब मैं मेरी गलती के लिए बहुत शर्मिन्दा हूँ । हो सके तो मुझे माफ़ कर देना ।
ये पढ़कर हसबेंड ने अपनी रिवाल्वर निकाली । और अपनी पत्नी को शूट कर दिया । फिर उसी नंबर से मैसेज आया - सारी सर ! स्पेलिंग मिस्टेक हो गई थी WI FI क़े बदले WIFE   टाइप हो गया था ।

15 अगस्त 2010

प्रेम का असफल होना अनिवार्य


प्रश्न - क्या इस जगत में प्रेम का असफल होना अनिवार्य ही है ? इस जगत का प्रेम तो, चैतन्य कीर्ति, असफल होगा ही । उसकी असफलता से ही उस जगत का प्रेम जन्मेगा । बीज तो टूटेगा ही । तभी तो वृक्ष का जन्म होगा । अंडा तो फूटेगा ही । तभी तो पक्षी पंख पसारेगा । और उड़ेगा । इस जगत का प्रेम तो बीज है । पत्नी का प्रेम । पति का प्रेम । भाई का । बहन का । पिता का । मां का । इस जगत के सारे प्रेम बस प्रेम की शिक्षण शाला हैं । यहां से प्रेम का सूत्र सीख लो । लेकिन यहां का प्रेम सफल होने वाला नहीं है । टूटेगा ही । टूटना ही चाहिए । वही सौभाग्य है । और जब इस जगत का प्रेम टूट जाएगा । और इस जगत का प्रेम तुमने मुक्त कर लिया । इस जगत के विषय से तुम बाहर हो गए । तो वही प्रेम परमात्मा की तरफ बहना शुरू होता है । वही प्रेम भक्ति बनता है । वही प्रेम प्रार्थना बनता है ।
हमारी इच्छा होती है कि कभी टूटे न ।
कभी तिलिस्म न टूटे मेरी उम्मीदों का ।
मेरी नजर पे यही परदा ए शराब रहे ।
हम तो चाहते ही यही हैं कि यह परदा पड़ा रहे । टूटे न । यह जादू न टूटे । लेकिन यह जादू टूटेगा ही । क्योंकि यह जादू है । सत्य नहीं है । कितनी देर चलाओगे ? जितनी देर चलाओगे । उतना ही पछताओगे । जितनी जल्दी टूट जाए । उतना सौभाग्य है । क्योंकि यहां से आंखें मुक्त हों । तो आंखें आकाश की तरफ उठें । बाहर से मुक्त हों । तो भीतर की तरफ जाएं ।
हद्दे तलब में गम की कड़ी धूप ही मिली ।
जुल्फों की छांव चाह रहे थे किसी से हम ।
यहां कोई जुल्फों की छांव नहीं मिलती । यहां तो कड़ी धूप ही मिलती है । यहां तो तुम जिसको प्रेम करोगे । उसी से दुख पाओगे । यहां प्रेमी दुखी ही होता है । सुख के सपने देखता है । जितने सपने देखता है । उतने ही बुरी तरह सपने टूटते हैं । इसीलिए तो बहुत से लोगों ने तय कर लिया है कि सपने ही न देखेंगे । प्रेम का सपना न देखेंगे । विवाह कर लेंगे । न रहेगा सपना । न टूटेगा कभी । इसीलिए तो लोग विवाह पर राजी हो गए । समझदार लोगों ने प्रेम को हटा दिया । उन्होंने विवाह के लिए राजी कर लिया लोगों को । लेकिन विवाह का खतरा है 1 । सपना नहीं टूटेगा । यही खतरा है । सपना टूटना ही चाहिए । सपना होना चाहिए । और टूटना चाहिए । बड़ा सपना देखो । डरो मत । मगर टूटेगा । यह याद रखो । रूमानी सपने देखो । मगर टूटेंगे । यह याद रखो । यहां जुल्फों की छांव मिलती ही नहीं । यहां हर जुल्फ की छांव में धूप मिलती है । कड़ी धूप मिलती है । दागे दिल से भी रोशनी न मिली । यह दिया भी जला के देख लिया । जलाओ दीया । जलाना उचित है । इसलिए मैं प्रेम के खिलाफ नहीं हूं । और इसलिए मेरी बातें तुम्हें बड़ी बेबूझ मालूम पड़ती हैं । तुम्हारे तथाकथित संतों ने तुमसे कहा है - प्रेम के विपरीत हो जाओ । मैं प्रेम के विपरीत नहीं हूं । मैं कहता हूं - प्रेम करो । देखो । जानो । जलो । हालांकि प्रेम का सपना टूटेगा । और अगर ठीक से तोड़ना हो सपना । तो ठीक से उसमें जाना जरूरी है । भोग में उतरोगे । तो ही योग का जन्म होगा । राग में जलोगे । तो विराग की सुगंध उठेगी । जो राग में नहीं जला । वह विराग से वंचित रह जाएगा । और जिसने भोग की पीड़ा नहीं जानी । वह योग का रस कैसे पीएगा ? इसलिए मेरी बातें तुम्हें बहुत बार उलटी मालूम पड़ती हैं । मैं कहता हूं - अगर योगी बनना है । तो भोगी बनने से डरना मत । भोग ही लेना । उसी भोग के विषाद में से तो योग का सूत्रपात है । जब तुम देखोगे । देखोगे । देखोगे । दुख पाओगे । जलोगे । तड़फोगे । जब सब तरह से देखोगे ।
दागे दिल से भी रोशनी न मिली । यह दिया भी जला के देख लिया ।
जब रोशनी मिलेगी नहीं । अंधेरा बना ही रहेगा । बना ही रहेगा । 1 दिन तुम सोचोगे कि मैं जो दीया जला रहा हूं । वह दीया । जलने वाला दीया नहीं है । तब मैं तलाश करूं उस दीये की । जो जलता है । और वह दीया सदा से जल रहा है । जरा लौटोगे पीछे । और उसे जलता हुआ पाओगे । वह दीया तुम हो ।
बुझ गए आरजू के सब चिराग । 1 अंधेरा है 4 सू बाकी ।
और जब वासना के सब चिराग बुझ जाएंगे । तो निश्चित गहन अंधकार में पड़ोगे । उसी गहन अंधकार में से तलाश पैदा होती है । आदमी टटोलना शुरू करता है ।  इसलिए डरो मत । कच्चे मत प्रार्थना में उतरना । अन्यथा तुम्हारी प्रार्थना भी कच्ची रह जाएगी । प्रार्थना का गुण धर्म तुम्हारे अनुभव पर निर्भर होता है । जिसने संसार को ठीक से देख लिया । और कांटों में चुभ गया है । और ज़ार ज़ार हो गया है । और घाव घाव हो गया है । और जिसने सब तरफ से अनुभव कर लिया । और अपने अनुभव से जान लिया कि - संसार असार है । शास्त्रों में लिखा है - इसलिए नहीं । कोई ज्ञानी ने कहा है - इसलिए नहीं । नानक कबीर ने दोहराया है । इसलिए नहीं । अपने अनुभव से गवाह हो गया कि - हां, संसार असार है - बस । इसी क्षण में क्रांति घटती है । संन्यास का जन्म होता है ।
कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए ।
कहीं पे शाम सिरहाने लगाके बैठ गए ।
खड़े हुए थे अलावों की आंच लेने को ।
सब अपनी अपनी हथेली जला के बैठ गए ।
दुकानदार तो मेले में लुट गए यारो ।
तमाशबीन दुकानें लगा के बैठ गए ।
ये सोच कर कि दरख्तों में छांव होती है ।
यहां बबूल के साए में आ के बैठ गए ।
इस संसार को तुम बबूल का वृक्ष पाओगे । देर अबेर यह अनुभव आएगा ही ।
ये सोच कर कि दरख्तों में छांव होती है ।
यहां बबूल के साए में आ के बैठ गए ।
लेकिन तुम्हारे अनुभव से ही यह बात उठनी चाहिए । उधार अनुभव काम नहीं आएगा । उधार ज्ञान कूड़ा कर्कट है । उसे जितनी जल्दी फेंक दो । उतना बेहतर । अपना थोड़ा सा ज्ञान पर्याप्त है । 1 कण भी अपने ज्ञान का पर्याप्त है - रोशनी के लिए । और शास्त्रों का बोझ जरा भी काम नहीं आता । शास्त्रों से बचो । शास्त्र को हटाओ । जीवन को जीओ । यह जीवन सपना है । यह टूटेगा । इसके टूटने में ही हित है । इसके टूटने में सौभाग्य है । वरदान है । क्योंकि यह सपना टूटे । तो परमात्मा से मिलन हो । यह विराग जगे संसार से । तो परमात्मा से राग जगे । 2 तरह के लोग हैं । जिनका संसार से राग है । उनका परमात्मा से विराग होता है । क्योंकि राग और विराग 1 ही सिक्के के 2 पहलू हैं । जिन्होंने संसार की तरफ मुंह कर लिया । परमात्मा की तरफ पीठ हो गई । संसार के सम्मुख हो गए । परमात्मा से विमुख हो गए । ओशो
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चेतना की पूरी अलग ही गुणवत्ता है । जो न ही सोचने से आती है । न ठीक । न गलत से । बस - नहीं सोचने की दशा । तुम बस देखते हो ।
तुम बस होश पूर्ण होते हो । लेकिन तुम सोचते नहीं । और यदि कोई विचार आता है । वे आते हैं । क्योंकि विचार तुम्हारे नहीं हैं । वे बस
हवा में तैर रहे हैं । यहां चारों तरफ विचार तैर रहे हैं । विचारों का क्षेत्र तैयार हो गया है । ऐसे ही जैसे कि यहां हवा है । तुम्हारे चारों तरफ पर विचार हैं । और ये स्वतः घुसते चले जाते हैं । यह तभी रुकते हैं । जब तुम अधिक से अधिक होश से भरते हो । इसमें कुछ ऐसा है । यदि तुम अधिक होश से भरते हो । विचार विलीन हो जाते हैं । वे पिघल जाते हैं । क्योंकि होश की ऊर्जा विचारों से अधिक बड़ी है । होश विचारों के लिए आग की तरह है । यह ऐसे ही है । जैसे कि तुम घर में दीपक जलाओ । और अंधेरा प्रवेश नहीं कर सकता । तुम प्रकाश को बंद कर दो । चारों तरफ से अंधेरा प्रवेश कर जाता है । बगैर 1 मिनट लिए । 1 क्षण
भी लिए । वह वहां होता है । जब घर में प्रकाश जलता है । अंधेरा प्रवेश नहीं कर सकता । विचार अंधेरे की तरह होते हैं । वे तब ही प्रवेश करते हैं । जब भीतर प्रकाश न हो । होश आग है । तुम अधिक होश से भरते हो । कम से कम विचार प्रवेश करते हैं । यदि तुम अपने होश से पूरे
एकीकृत हो जाते हो । विचार तुम्हारे में प्रवेश नहीं करते । तुम अभेद्य दुर्ग हो गए । कुछ भी प्रवेश नहीं कर सकता । ऐसा नहीं है कि तुम बंद हो गए । याद रखना । तुम पूरी तरह से खुले हो । पर तुम्हारी ऊर्जा दुर्ग बन जाती है । और जब कोई विचार तुम्हारे में प्रवेश नहीं कर सकता । वे आएंगे । और तुम्हारे पास से गुजर जाएंगे । तुम उन्हें आते देखोगे । और बस । जब वे तुम्हारे करीब आएंगे । वे मुड़ जाएंगे । तब तुम किसी तरफ मुड़ सकते हो । तब तुम नर्क में भी चले जाओ । तुम्हें कुछ भी छू
नहीं सकता । बुद्धत्व का यही अर्थ है । ओशो ।
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तुम शून्य बनो । पूर्ण अपने से आएगा - लोग पूर्ण की तलाश में निकल जाते हैं । इसकी फिक्र बिना किए कि - हम अभी शून्य नहीं हैं । और जिंदगी को ऐसा बांटो भी मत कि यह साधु है । वह असाधु है । यह सुंदर । वह असुंदर । यह सत्य । वह झूठ । जिंदगी तो 1 है । कौन साधु । कौन असाधु । कौन सुंदर । कौन असुंदर ? जिन्होंने जाना है । उन्होंने सर्वांग को सुंदर पाया है । जिन्होंने जाना है । उन्होंने सारे अस्तित्व को परमात्मामय पाया है । उन्होंने राम में तो देखा ही है । रावण में भी देखा है । रावण को जलाना बंद करो । रावण को जलाने में तुम बस इसकी ही घोषणा कर रहे हो कि हम परमात्मा के भी खास खास ढंग चुनेंगे । हम चुनाव करेंगे । परमात्मा ऐसा होगा । तो चुनेंगे । वैसा होगा । तो नहीं चुनेंगे । गोरा होगा । तो चुनेंगे । काला होगा । तो नहीं चुनेंगे । सुंदर होगा । तो चुनेंगे । असुंदर होगा । तो नहीं चुनेंगे । 
परमात्मा सभी में व्याप्त है । बुरे से बुरे में भी उतना ही है । जितना भले से भले में है । जिस दिन तुम्हें शुभ और अशुभ में । जीवन में और मृत्यु में । रोशनी में और अंधेरे में । सफलता में और विफलता में । सुख में और दुःख में । सबमें 1 का ही अनुभव होने लगेगा । ऐसी जब तुम्हारी पात्रता होगी । तभी तुम कह पाओगे - परमात्मा है । उसके पहले नहीं । ओशो ।
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स्वास्थ्य - स्वास्थ्य 1 शारीरिक घटना ही नहीं है । यह मात्र इसका 1 आयाम है । और वह भी ऊपरी आयाम । क्योंकि मौलिक रूप से देह तो मरण धर्मा है । स्वस्थ या अस्वस्थ । यह क्षणभंगुर है ।  वास्तविक स्वास्थ्य को तो कहीं तुम्हारे भीतर घटित होना है । तुम्हारी अंतरात्मा में । तुम्हारी चेतना में । क्योंकि चेतना का कभी जन्म नहीं होता । मृत्यु नहीं होती । यह शाश्वत है । चेतना में स्वस्थ होने का अर्थ है । प्रथम - जागरूक होना । द्वितीय - लयबद्ध होना । त्रितीय - आनंदित होना । और चतुर्थ - करुणावान होना । यदि यह 4 बातें पूरी हो जाती हैं । तो व्यक्ति भीतर से स्वस्थ हुआ । और सन्यास इन चारों बातों को पूरा कर सकता है । यह तुम्हें और अधिक जागरूक करता है । क्योंकि सभी ध्यान विधियां तरीके हैं । तुम्हें और अधिक जागरूक करने के । यह पद्धतियां हैं । तुम्हें आध्यात्मिक निद्रा से बाहर लाने के लिये । और नृत्य, गायन, उत्सव तुम्हें अधिक लयबद्ध बना सकते हैं । 1 क्षण आता है । जब नर्तक खो जाता है । और केवल नृत्य शेष बचता है । उस विशिष्ट अंतराल में व्यक्ति लयबद्धता का अनुभव करता है । जब गायक पूर्णत: खो जाता है । और केवल गीत शेष बचता है । जब कोई केन्द्र कार्य नहीं कर रहा होता । और केवल गीत शेष रह जाता है । जब कोई केन्द्र मैं की भांति कार्य नहीं कर रहा होता । मैं पूर्णत: अनुपस्थित होता है । और तुम 1 प्रवाह में होते हो । तो वह बहती चेतना लय बद्धता होती है । जागरूक और लयबद्ध होना संभावना पैदा करता है - आनंद घटित होने की । आनद का अर्थ है - परम सुख । अकथनीय । कोई भी शब्द इसके बारे में कुछ कहने के समर्थ नहीं । और जब व्यक्ति आनद को उपलब्ध हो गया है । जब व्यक्ति ने परम सुख के शिखर को छू लिया हो । तो करुणा 1 परिणाम के रूप में आती है । जब तुम्हें वह आनंद उपलब्ध हो जाता है । तो तुम उसे बांटना चाहते हो । तुम बांटे बिना नहीं रह सकते । बांटना अपरिहार्य है । यह होने का तर्क युक्त परिणाम है । यह छलकने लगता है । तुम्हें कुछ करना नहीं पड़ता । यह स्वय ही घटने लगता है । यह 4 स्वास्थ्य के 4 स्तंभ हैं । इन्हें प्राप्त कर लें । यह हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है । हमें सिर्फ इसे प्राप्त करना है । ओशो

11 अगस्त 2010

हो महाप्रलय तो भी न मरे

ये माया तेरी अजब निराली है ।
है अजर अमर तू निराकार । परमेश्वर सबसे परे ।
बिन पैर चले । बिन कान सुने । बिन हाथ अनेकों काम करे ।
जो भक्त करे प्रभु ध्यान तेरा । हो महाप्रलय तो भी न मरे ।
तू हाकिम सारी दुनिया का । तेरा हुक्म न कोई टाल सके ।
जो दीन हीन तेरी शरन परे । वो भव से पल में पार तरे ।
हे कृपानिधान इस बगिया का । तू ही माली है ।
ये माया तेरी अजब निराली है ।
क्या अदभुत मानुस देह रची । माया का संग दिया कैसे ।
तेरा नाम रूप सब में झलका । फ़िर सबसे अलग रहा कैसे ।
कासी काबे में मिला नहीं । तो पता बता दे हम कैसे ।
जब हमको दरसन दिया नहीं । तो बता पकड ले पग कैसे ।
ये खेल निराला है भगवन । तेरी शान निराली है ।
ये माया तेरी अजब निराली है ।
सूरज से चमके पदार्थ जो । तेरी चमक निराली कहीं नहीं ।
पत्ते पत्ते की कतरन न्यारी । तेरे हाथ कतरनी कहीं नहीं
वारिस से भरे हैं जन जंगल । आकाश में सागर कहीं नहीं ।
तू माया योग बरताव करे । बिन कृपा रियायत कहीं नहीं ।
चींटी से लेकर कुंजर तक की करता रखवाली है ।
ये माया तेरी अजब निराली है ।
तेरे किसी पेड को फ़ल लगते । तेरे किसी पेड को लगे फ़ली ।
कही हाय हाय कहीं वाय वाय । कहीं खुशी अनेकों भरी पडी ।
किसी के घर में नौबत बाज रही । किसी के घर में अंखिया नीर भरी ।
किस तरह करूं गुणगान तेरा । धन धन तेरी ये कारीगरी ।
कहीं अधेरा किसी के घर में । कही रोज दिवाली है ।
ये माया तेरी अजब निराली है ।
कोई चले नहीं बिन मोटर के । कोई नंगे पांव भाग रहा ।
कहीं ढेर लगे हैं नोटो के । कोई कर्ज किसी से मांग रहा ।
कोई सुख की निंदिया सोय रहा । कोई पडा फ़िकर में जाग रहा ।
कोई धर्म से मुखडा मोड रहा । कोई भक्ति राग अलाप रहा ।
महलों की चाहत कोई करे । कोई बनी हवेली छोड रहा ।
कहीं हैं गोरी किसी की काया । किसी की काली है ।
ये माया तेरी अजब निराली है ।
तू जाने किस विधि गर्भ रखे । फ़िर हो क्रीडा बालकपन की ।
जब आया बुडापा ग्यान हुआ । जुगती एक दिन बिगड गयी ।
कोई पैसे को मोहताज फ़िरे । कहीं हो बरसा नित धन की ।
कोई कामिनी संग खेल रहा । कोई रो रो खाक करे तन की ।
कोई भटक भटक कर उमर गंवा दे । कोई मौज उडावे जीवन की ।
कहीं पानी बिना अकाल पडे । कहीं बरसा होय झमाझम सी ।
कहीं भूमि पडी ऊसर बंजर । और कहीं हरियाली है ।
ये माया तेरी अजब निराली है ।
कोई शहंशाह तूने बना दिया । कोई भिक्षा मांगे घर घर से ।
कोई बना दिया तूने महाबली । कोई दिना गुजारे डर डर के ।
कोई हुकम चलाये लाखों पे । कोई जीता सेवा कर कर के ।
कोई मौज करे कोई पेट भरे । कोई बोझा ढोता घर घर के ।
कोई गुजर करे है छप्पर में । कहीं महल खडे संगमरमर के ।
कोई देख किसी को मगन हुआ । कोई मिला खाक में जल जल के ।
तेरी कृपा से खिलती । हर बाग की डाली है ।
ये माया तेरी अजब निराली है ।
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आयुर्वेद के अनुसार मैथी 1 बहुगुणी औषधि के रूप में प्रयोग की जा सकती है । .भारतीय रसोईघर की यह 1 महत्वपूर्ण हरी सब्जी है । प्राचीनकाल से ही इसके स्वास्थ्यवर्धक गुणों के कारण इसे सब्जी और औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है । मैथी की सब्जी तीखी, कडवी और उष्ण प्रकृति की होती है । इसमें प्रोटीन, कैल्शियम, पोटेशियम, सोडियम, फास्फोरस, कार्बोहाइड्रेट, आयरन और विटामिन C प्रचुर मात्रा में होते हैं । ये सब ही शरीर के लिए आवश्यक पौष्टिक तत्व हैं । यह कब्ज, गैस, बदहजमी, उलटी, गठिया, बवासीर, अपच, उच्च रक्तचाप, साइटिका जैसी बीमारियों को दूर करने में सहायक है । यह ह्रदय रोगियों के लिए भी लाभकारी है । मैथी के सूखे पत्ते, जिन्हें कसूरी मैथी भी कहते हैं का प्रयोग कई व्यंजनों को सुगन्धित बनाने में होता है । मैथी के बीज भी 1 बहुमूल्य औषधि के समान हैं । ये भूख को बढ़ाते हैं । एवं संक्रामक रोगों से रक्षा करते हैं । इनको खाने से पसीना आता है । जिससे शरीर के विजातीय तत्व बाहर निकलते हैं । इससे सांस एवं शरीर की दुर्गन्ध से भी छुटकारा मिलता है । आधुनिक शोध के अनुसार यह अल्सर में भी लाभकारी है । मैथी से बने लड्डू 1 अच्छा टानिक है । जो प्रसूति के बाद खिलाये जाते हैं । शरीर की सारी व्याधियों को दूर कर यह शरीर में बच्चे के लिए दूध की मात्र बढाती है । डायबिटीज में मैथी के दानों का पावडर बहुत लाभकारी होता है । इसमें अमीनो एसिड होते हैं । जो कि इंसुलिन निर्माण में सहायक होता है । ये थकान, कमर दर्द और बदन दर्द में लाभदायक है । इसकी पत्तियों का लेप बालों एवं चहरे के कई विकारों को दूर कर उसे कांतिमय बनाता है ।
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शतावरी - 100 रोगों को हरने वाली शतावरी । आज हम आपको 1 झाड़ीनुमा लता के बारे में बताते हैं । जिसमें फूल मंजरियों में 1 से 2 इंच लम्बे 1 या गुच्छे में लगे होते हैं । और फल मटर के समान पकने पर लाल रंग के होते हैं । नाम है - शतावरी । आपने विभिन्न आयुर्वेदिक औषधियों में इसके प्रयोग को अवश्य ही जाना होगा । अगर नहीं । तो हम आपको बताते हैं । इसके प्रयोग को । आयुर्वेद के आचार्यों के अनुसार - शतावर पुराने से पुराने रोगी के शरीर को रोगों से लड़ने क़ी क्षमता प्रदान करता है । इसे शुक्रजनन, शीतल, मधुर एवं दिव्य रसायन माना गया है । महर्षि चरक ने भी शतावर को बल्य और वयः स्थापक ( चिरयौवन को बरकार रखने वाला ) माना है । आधुनिक शोध भी शतावरी क़ी जड़ को हृदय रोगों में प्रभावी मान चुके हैं । अब हम आपको शतावरी के कुछ आयुर्वेदिक योग क़ी जानकारी देंगे । जिनका औषधीय प्रयोग चिकित्सक के निर्देशन में करना अत्यंत लाभकारी होगा । - यदि आप नींद न आने क़ी समस्या से परेशान हैं । तो बस शतावरी क़ी जड़ को खीर के रूप में पका लें । और थोड़ा गाय का घी डालें । इससे आप तनाव से मुक्त होकर अच्छी नींद ले पायेंगे ।
- शतावरी क़ी ताज़ी जड़ को यव ( जौ ) कूट करें । इसका स्वरस निकालें । और इसमें बराबर मात्रा में तिल का तेल मिलाकर पका लें । हो गया मालिश का तेल तैयार । इसे माइग्रेन जैसे सिरदर्द में लगायें । और लाभ देखें ।
- यदि रोगी खांसते खांसते परेशान हो । तो शतावरी चूर्ण 1.5 ग्राम वासा के पत्ते का स्वरस 2.5 मिली मिश्री के साथ लें । और लाभ देखें ।
- प्रसूता स्त्रियों में दूध न आने क़ी समस्या होने पर शतावरी का चूर्ण 5 ग्राम गाय के दूध के साथ देने से लाभ मिलता है ।
- यदि पुरुष यौन शिथिलता से परेशान हो । तो शतावरी पाक या केवल इसके चूर्ण को दूध के साथ लेने से लाभ मिलता है ।
- यदि रोगी को मूत्र या मूत्रवह संस्थान से सम्बंधित विकृति हो । तो शतावरी को गोखरू के साथ लेने से लाभ मिलता है ।
- शतावरी के पत्तियों का कल्क बनाकर घाव पर लगाने से भी घाव भर जाता है ।
- यदि रोगी स्वप्न दोष से पीड़ित हो । तो शतावरी मूल का चूर्ण 2.5 ग्राम मिश्री 2.5 ग्राम को 1 साथ मिलाकर । 5 ग्राम क़ी मात्रा में रोगी को सुबह शाम गाय के दूध के साथ देने से प्रमेह, प्रीमेच्युर इजेकुलेशन ( स्वप्न दोष ) में लाभ मिलता है ।
- गाँव के लोग इसकी जड़ का प्रयोग गाय या भैंसों को खिलाते हैं । तो उनकी दूध न आने क़ी समस्या में लाभ मिलता पाया गया है । अतः इसके ऐसे ही प्रभाव प्रसूता स्त्रियों में भी देखे गए हैं ।
- शतावरी के जड के चूर्ण को 5 से 10 ग्राम क़ी मात्रा में दूध से नियमित से सेवन करने से धातु वृद्धि होती है ।
- वातज ज्वर में शतावरी के रस एवं गिलोय के रस का प्रयोग या इनके क्वाथ का सेवन ज्वर ( बुखार ) से मुक्ति प्रदान करता है ।
- शतावरी के रस को शहद के साथ लेने से जलन, दर्द एवं अन्य पित्त से सम्बंधित बीमारियों में लाभ मिलता है ।
शतावरी हिमतिक्ता स्वादीगुर्वीरसायनीसुस्निग्ध शुक्रलाबल्यास्तन्य मेदो । ग्निपुष्टिदा चक्षु स्यागत पित्रास्य,गुल्मातिसारशोथजित । उद्धत किया है । तो शतावरी 1 बुद्धि वर्धक, अग्नि वर्धक, शुक्र दौर्बल्य को दूर करने वाली स्तन्य जनक औषधि है ।
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सामान्यत: दालचीनी मसालों के रूप में काम मे ली जाती है । लेकिन यह पेट रोग, इंफ्यूएंजा, टाइफाइड, टीबी और कैंसर जैसे रोगों में उपयोगी पाई गई है । दालचीनी का तेल बनता है । दालचीनी, साबुन, दांतों के मंजन, पेस्ट, चाकलेट, सुगंध व उत्तेजक के रूप में काम में आती है । चाय, काफी में दालचीनी डालकर पीने से स्वादिष्ट हो जाती है । तथा जुकाम भी ठीक हो जाता है । आज हम आपको बताने जा रहे हैं दालचीनी के कुछ घरेलू प्रयोग जो बहुत उपयोगी हैं ।
- दालचीनी का तेल दर्द, घावों और सूजन को नष्ट करता है ।
- दालचीनी को तिल के तेल, पानी, शहद में मिलाकर उपयोग करना चाहिए । दर्द वाले स्थान पर मालिश करने के बाद इसे रात भर रहने देते है । मालिश अगर दिन में करें । तो 2-3 घंटे के बाद धोएं ।
- दालचीनी त्वचा को निखारती है । तथा खुजली के रोग को दूर करती है ।
- दालचीनी सेहत के लिए लाभकारी है । यह पाचक रसों के स्त्राव को भी उत्तेजित करती है । दांतों की समस्याओं को दूर करने में भी यह उपयोगी है ।
- रात को सोते समय नियमित रूप से 1 चुटकी दालचीनी पाउडर शहद के साथ मिलाकर लेने से मानसिक तनाव में राहत मिलती है । और स्मरण शक्ति बढ़ती है ।
- दालचीनी का नियमित प्रयोग मौसमी बीमारियों को दूर रखता है ।
- ठंडी हवा से होने वाले सिर दर्द से राहत पाने के लिए दालचीनी के पाउडर को पानी में मिलाकर पेस्ट बनाकर माथे पर लगाएं ।
- दालचीनी पाउडर में नीबू का रस मिलाकर लगाने से मुंहासे व ब्लैक हैडस दूर होते हैं ।
- दालचीनी, डायरिया व जी मिचलाने में भी औषधि के रूप में काम में लाई जाती है ।
- मुंह से बदबू आने पर दालचीनी का छोटा टुकड़ा चूसें । यह 1 अच्छी माउथ फ्रेशनर भी है ।
- दालचीनी में एंटी एजिंग तत्त्व उपस्थित होते हैं । एक नीबू के रस में 2 बड़े चम्मच जैतून का तेल, 1 कप चीनी, आधा कप दूध, 2 चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाकर 5 मिनट के लिए शरीर पर लगाएं । इसके बाद नहा लें । त्वचा खिल उठेगी ।
- दालचीनी पाउडर की 3 ग्राम मात्रा सुबह शाम पानी के साथ लेने पर दस्त बंद हो जाते हैं ।
- आर्थराइटिस का दर्द दूर भगाने में शहद और दालचीनी का मिश्रण बड़ा कारगर है ।
- गंजेपन या बालों के गिरने की समस्या बेहद आम है । इससे छुटकारा पाने के लिए गरम जैतून के तेल में 1 चम्मच शहद और 1 चम्मच दालचीनी पाउडर का पेस्ट बनाएं । इसे सिर में लगाए । और 15 मिनट बाद धो लें ।
- 1 चम्मच दालचीनी पाउडर और 5 चम्मच शहद मिलाकर बनाए गए पेस्ट को दांत के दर्द वाली जगह पर लगाने से फौरन राहत मिलती है ।
- सर्दी जुकाम हो । तो 1 चम्मच शहद में 1 चौथाई चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाकर दिन में 3 बार खाएं । पुराने कफ और सर्दी में भी राहत मिलेगी ।
- पेट का दर्द शहद के साथ दालचीनी पाउडर लेने पर पेट के दर्द से राहत मिलती है । 
- खाली पेट रोजाना सुबह 1 कप गरम पानी में शहद और दालचीनी पाउडर मिलाकर पीने से फैट कम होता है । इससे मोटे से मोटा व्यक्ति भी दुबला हो जाता है ।

10 अगस्त 2010

वह मनुष्य निश्चय ही नारकीय जीव है

अपने हित अहित का विचार न करते हुये जो नित्य ही कुपथ पर जा रहा है । जिसका उद्देश्य लक्ष्य केवल पेट भरना ही है । वह मनुष्य निश्चय ही नारकीय जीव है । निद्रा । भय । मैथुन । आहार की इच्छा सभी प्राणियों में समान रूप से होती है । इसमें ज्ञानी को मनुष्य और अज्ञानी को पशु माना गया है । मूर्ख व्यक्ति प्रातकाल मल मूत्र । दोपहर में भूख प्यास । रात में मैथुन और नींद से ग्रस्त और पीडित रहते हैं । ये बडे दुख की बात है कि इसी अज्ञान से मोहित होकर प्राणी अपने शरीर धन और स्त्री आदि में अनुरक्त होकर जन्म लेते हैं । और मर जाते हैं । अतः व्यक्ति को इस तरह की आसक्ति का निश्चय ही त्याग करना चाहिये । यदि आसक्ति छोडने में कठिनाई महसूस हो रही हो । तो महापुरुषों के साथ अपनी आसक्ति जोड देनी चाहिये । क्योंकि आसक्ति रूपी रोग का इलाज ज्ञानियों के पास ही होता है । सतसंग और विवेक ये दो मनुष्य के मल रहित । स्वस्थ नेत्र हैं । जिसके पास ये दो नेत्र नहीं हैं । वह मनुष्य निश्चय ही अन्धा है । इसलिये वो कुमार्ग रूपी गड्डे में गिरता है । तो आश्चर्य किस बात का हो । अपने अपने धर्म को । अपनी जाति को मानने वाले । दूसरे के धर्म को नहीं जानते । किन्तु वे दम्भ के वशीभूत हो जांय । तो अपना ही नाश करते हैं । वृत पूजा में लगे हुये प्रयास करने वाले कुछ लोगों से भी क्या होगा । क्योंकि वे भी अपने आत्मतत्व को जाने बिना एक प्रचारक की तरह बनकर देश विदेश का विचरण ही तो करते हैं । नाम मात्र से स्वयं में संतुष्ट कर्म कान्डों में लगे हुये मनुष्य । मन्त्रोच्चार होम आदि से युक्त याज्ञिक क्रियाओं से भ्रमित हो गये हैं । और प्रभु की माया से मोहित होकर मूर्ख लोग शरीर को सुखा देने वाले एक भक्त तथा उपवास आदि से । व्यर्थ के नियमों से अपने पुण्य रूप फ़ल और अज्ञात दुर्लभ प्राप्ति की कामना ही करते हैं । जो महज झूठ हैं । शरीर को ताडना देने से क्या ज्ञान प्राप्त हो सकता है ? इस अज्ञान से क्या मुक्ति प्राप्त हो सकती है ?
क्या बांबी को पीटने से जहरीला नाग मर जायेगा ? जटायें बडा लेने वाले । मृग आदि की खाल पहनकर वेश बना लेने वाले जो दम्भी ज्ञानियों की भांति इस संसार में विचरण करते हैं । और लोगों को भ्रमित करते हैं । तमाम तरह के लौकिक सुख ( संसारी की तरह ) में स्वयं जिनकी आसक्ति है । और । मैं ब्रह्म को जानता हूं । ऐसा कहने वाले कर्म तथा ब्रह्म । इन दोनों से ही भृष्ट हो चुके दम्भी और ढोंगी का त्याग करने में क्षण भर भी नहीं सोचना चाहिये । घर और समाज को वन के समान मानकर जो साधु गधे और अन्य पशुओं की भांति निर्वस्त्र और लज्जा रहित होकर घूमते रहते हैं । क्या वे विरक्त होते हैं । हरगिज नही होते । यदि मिट्टी । भस्म तथा धूल का लेप करने से कोई मनुष्य मुक्त हो सकता है । तो क्या मिट्टी और भस्म में ही हमेशा रहने वाला कुत्ता क्यों नहीं मुक्त होगा ? वनवासी । तपसी । घास । फ़ूस पत्ता । तथा जल का ही सेवन करते हैं । तो क्या इन्हीं के समान वन में रहने वाले चूहे । हिरन । सियार आदि जीव जन्तु भी तपस्वी हो सकते हैं ? जन्म से लेकर मृत्यु तक गंगा आदि पवित्र नदियों मे ही रहने वाले मेढक । मछली आदि जलचर जीव क्या योगी हो सकते हैं ? कबूतर । शिलाहार । चातक पक्षी कभी भी प्रथ्वी का जल नही पीते । तो क्या उनका वृती होना सम्भव है ? इसलिये ये नित्य आदि कर्म लोक रंजन के कारक ही हैं । मोक्ष का कारण तो एकमात्र तत्व ज्ञान और आत्म ज्ञान ही है । वास्तविक मुक्ति उसी से सम्भव है ।

तत्व ज्ञानी की शरण में जाओ

षट दर्शन रूपी महा कुंए में पशु के समान गिरे हुये मनुष्य डंडे से नियन्त्रित पशु की भांति परमार्थ क्या होता है । इसको नहीं जानते हैं ? वेद पुराण आदि शास्त्रों के महासमुद्र में इधर उधर भटकते हुये और मन से ही अनुमान लगाने वाले इस षटदर्शन रूपी तरंगो से ग्रस्त होकर कुतर्की बन जाते हैं । जो वेद । आगम और पुराण का ज्ञाता वास्तविक परमार्थ को नहीं जानता । वास्तविक ज्ञान को नही जानता । अर्थात उसने स्वयं उसको सिद्ध करके नहीं देखा । उस कपटी के सभी कथन कौवे की कांव कांव के समान ही होते हैं । यानी उनसे कोई लाभ नहीं होता । यह ज्ञान है ? यह जानने योग्य है । ऐसी चिन्ता से बैचेन लेकिन असल परमार्थ तत्व से दूर वह प्राणी दिन रात शास्त्रों का अध्ययन करता है । वाक्य ही छन्द हैं । और उस छन्द से गुथे हुये काव्यों में अलंकार सुशोभित होता है । इसी चिन्ता से दुखी होकर मूर्ख व्यक्ति अत्यन्त व्याकुल होकर भटकता ही है । उस परम तत्व का अन्य ही अर्थ है ? किन्तु लोग उसका दूसरा ही अर्थ लगाकर दुखी होते हैं ?शास्त्रों का सदभाव कुछ और ही है । किन्तु वे उसकी व्याख्या अपने ही तरीके से करते हैं ? उसका मतलब ही अलग निकाल लेते हैं ? उपदेश आदि से रहित कुछ अहंकारी व्यक्ति उनमनी भाव की बात करते हैं । किन्तु खुद उसका अनुभव कभी नहीं करते । वे शास्त्रों को पडते हैं । और परस्पर उसको जानने का प्रयास करते हैं । किन्तु जैसे कडाही में घूमती हुयी कलछी पकवान का आनन्द नहीं ले सकती । वैसे ही वे परम तत्व को नहीं जान पाते ? सिर फ़ूलों ( हार के रूप में ) को ढोता है । किन्तु उसकी सुगन्ध का आनन्द नासिका ही ले पाती है । इस तरह बहुत से लोग वेद शास्त्र आदि ग्रन्थों को पडते हैं । किन्तु उनके असली भव को जानने वाला । समझने वाला दुर्लभ ही होता है । अपने ही शरीर के भीतर विद्यमान उस परम तत्व को न पहचान कर मूर्ख प्राणी शास्त्रों में वैसे ही व्याकुल रहता है । जैसे कछार में आये हुये भेड बकरी के बच्चे को चरवाहा कुंए में खोजता है ? सांसारिक मोह को नष्ट करने में शब्द ज्ञान समर्थ नहीं होता ? क्योंकि दीपक की बात करने से कभी अंधकार दूर नहीं हो सकता ? बुद्धि रहित व्यक्ति का पढना वैसा ही है । जैसे अन्धे के हाथ में दर्पण हो ? अतः प्रज्ञावान पुरुषों के द्वारा अधीत शास्त्र ( यानी किसी ज्ञानी द्वारा उसका सही सार बताना ) ही तत्व ज्ञान का लक्षण है । यह ज्ञान है ? यह जानने योग्य है ? ऐसे विचारों में फ़ंसा हुआ मनुष्य सब कुछ जानने की इच्छा करता है । किन्तु हजार लाख वर्ष भी पडने पर भी वह शास्त्रों का अन्त नहीं समझ पाता है ? इसलिये शास्त्र तो अनेक हैं । पर उसके अनुसार तुम्हारी आयु बहुत छोटी है । और उसके बाद भी उनमें करोडों विघ्न बाधायें हैं । इसलिये जैसे जल में मिले हुये दूध को हंस दूध दूध ग्रहण कर लेता है । वैसे ही ज्ञानी के द्वारा तुम्हें उसका सार तत्व ही ग्रहण करना चाहिये । अन्यथा बाद में पछताने के सिवा कुछ हाथ नहीं आयेगा । इसलिये तत्व ज्ञानी की शरण में जाओ ।

वेद के अध्ययन से मुक्ति सम्भव नहीं है ।

वेद पुराण आदि शास्त्रों का अध्ययन करके ग्यान के द्वारा जो बुद्धिमान व्यक्ति उस परम तत्व का ग्यान प्राप्त कर लेता है । उसको उन सभी शास्त्रो का परित्याग उसी प्रकार कर देना चाहिये । जिस प्रकार अनाज की इच्छा वाला अनाज तो ग्रहण कर लेता है । किन्तु पुआल आदि शेष कूडे को फ़ेंक देता है । जैसे अमृत को प्राप्त हुये व्यक्ति को भोजन से कोई सरोकार नही रह जाता है । वैसे ही तत्व को जानने वाले विद्वान को शास्त्र से कोई प्रयोजन नहीं रहता है । वेद के अध्ययन से मुक्ति सम्भव नहीं है । और न ही शास्त्रों के पढने से वह प्राप्त होगी । वह केवल आत्म ग्यान से ही मिलती है । और किसी अन्य साधन से नहीं । आश्रम उस मोक्ष का कारण नहीं हो सकता । दर्शन से भी मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी । इसी तरह सभी कर्मों से भी मोक्ष प्राप्त नहीं होगा । वह केवल ग्यान से प्राप्त होगा । मुक्ति । सहज मुक्ति देने वाली एकमात्र गुरु की वाणी है । संतो की वाणी है । अन्य सभी विध्यायें विडम्बना ही करने वालीं हैं । हजार शास्त्रों का भार सिर पर ढोने पर भी प्राणी को संजीवनी देने वाला वह परम तत्व अकेला ही है । सब प्रकार की क्रियाओं से रहित वह अद्वैत शिव तत्व कहा गया है । उसको गुरुमुख से प्राप्त करना चाहिये । इसके विपरीत वह करोडों शास्त्रों के अध्ययन करने से मिलने वाला नही है ।
ग्यान दो प्रकार का माना गया है । एक शास्त्र कथित ग्यान और दूसरा है विवेक से प्राप्त हुआ ग्यान । इसमें । शब्द । ही ब्रह्म है । ऐसा आगम शास्त्र कहते हैं । वह परम तत्व ही ब्रह्म है । ऐसा विवेकीजन कहते हैं ।
कुछ लोग अद्वैत को प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं । और कुछ लोग द्वैत को चाहते हैं । किन्तु वे सब ये नहीं जानते कि वह परम तत्व समभाव वाला है । और द्वैत अद्वैत से भी रहित है । परे है । बन्धन और मोक्ष के लिये इस संसार में दो ही पद हैं । एक पद से । यह मेरा है । और दूसरे पद से । यह मेरा नहीं है । यह मेरा है । ऐसा मानने वाला । ऐसा ग्यान रखने वाला बंध जाता है । और यह मेरा नहीं है । ऐसा ग्यान रखने वाला तत्काल ही मुक्त हो जाता है । जो कर्म इस जीवात्मा को बन्धन में नहीं डालता वही सतकर्म है । जो प्राणी को मुक्त करने में समर्थ है । वही असली विध्या है । इसके अतिरिक्त दूसरा कर्म परिश्रम मात्र है ।
दूसरी विध्या कला की निपुणता के लिये ही होती है । जब तक प्राणियों को कर्म अपनी ओर आकृष्ट करते हैं । जब तक उनमें सांसारिक वासना बनी हुयी है । और जब तक उनकी इन्द्रियों में चंचलता है । तब तक उन्हें परमतत्व का ग्यान नहीं हो सकता । जब तक व्यक्ति में शरीर का अभिमान है । जब तक उसमें ममता है । जब तक प्राणी में प्रयत्न की क्षमता रहती है । जब तक उसमें संकल्प और कल्पना करने की शक्ति है । जब तक उसके मन में स्थिरता नहीं है । जब तक वह शास्त्र चिंतन नहीं करता है । और जब तक उस पर गुरु की दया नहीं होती । तब तक उसको परम तत्व की प्राप्ति कैसे हो सकती है । सर्वाधिक गूढ रहस्य को कोई मूढ कैसे जान सकता है ?

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