15 अगस्त 2010

प्रेम का असफल होना अनिवार्य


प्रश्न - क्या इस जगत में प्रेम का असफल होना अनिवार्य ही है ? इस जगत का प्रेम तो, चैतन्य कीर्ति, असफल होगा ही । उसकी असफलता से ही उस जगत का प्रेम जन्मेगा । बीज तो टूटेगा ही । तभी तो वृक्ष का जन्म होगा । अंडा तो फूटेगा ही । तभी तो पक्षी पंख पसारेगा । और उड़ेगा । इस जगत का प्रेम तो बीज है । पत्नी का प्रेम । पति का प्रेम । भाई का । बहन का । पिता का । मां का । इस जगत के सारे प्रेम बस प्रेम की शिक्षण शाला हैं । यहां से प्रेम का सूत्र सीख लो । लेकिन यहां का प्रेम सफल होने वाला नहीं है । टूटेगा ही । टूटना ही चाहिए । वही सौभाग्य है । और जब इस जगत का प्रेम टूट जाएगा । और इस जगत का प्रेम तुमने मुक्त कर लिया । इस जगत के विषय से तुम बाहर हो गए । तो वही प्रेम परमात्मा की तरफ बहना शुरू होता है । वही प्रेम भक्ति बनता है । वही प्रेम प्रार्थना बनता है ।
हमारी इच्छा होती है कि कभी टूटे न ।
कभी तिलिस्म न टूटे मेरी उम्मीदों का ।
मेरी नजर पे यही परदा ए शराब रहे ।
हम तो चाहते ही यही हैं कि यह परदा पड़ा रहे । टूटे न । यह जादू न टूटे । लेकिन यह जादू टूटेगा ही । क्योंकि यह जादू है । सत्य नहीं है । कितनी देर चलाओगे ? जितनी देर चलाओगे । उतना ही पछताओगे । जितनी जल्दी टूट जाए । उतना सौभाग्य है । क्योंकि यहां से आंखें मुक्त हों । तो आंखें आकाश की तरफ उठें । बाहर से मुक्त हों । तो भीतर की तरफ जाएं ।
हद्दे तलब में गम की कड़ी धूप ही मिली ।
जुल्फों की छांव चाह रहे थे किसी से हम ।
यहां कोई जुल्फों की छांव नहीं मिलती । यहां तो कड़ी धूप ही मिलती है । यहां तो तुम जिसको प्रेम करोगे । उसी से दुख पाओगे । यहां प्रेमी दुखी ही होता है । सुख के सपने देखता है । जितने सपने देखता है । उतने ही बुरी तरह सपने टूटते हैं । इसीलिए तो बहुत से लोगों ने तय कर लिया है कि सपने ही न देखेंगे । प्रेम का सपना न देखेंगे । विवाह कर लेंगे । न रहेगा सपना । न टूटेगा कभी । इसीलिए तो लोग विवाह पर राजी हो गए । समझदार लोगों ने प्रेम को हटा दिया । उन्होंने विवाह के लिए राजी कर लिया लोगों को । लेकिन विवाह का खतरा है 1 । सपना नहीं टूटेगा । यही खतरा है । सपना टूटना ही चाहिए । सपना होना चाहिए । और टूटना चाहिए । बड़ा सपना देखो । डरो मत । मगर टूटेगा । यह याद रखो । रूमानी सपने देखो । मगर टूटेंगे । यह याद रखो । यहां जुल्फों की छांव मिलती ही नहीं । यहां हर जुल्फ की छांव में धूप मिलती है । कड़ी धूप मिलती है । दागे दिल से भी रोशनी न मिली । यह दिया भी जला के देख लिया । जलाओ दीया । जलाना उचित है । इसलिए मैं प्रेम के खिलाफ नहीं हूं । और इसलिए मेरी बातें तुम्हें बड़ी बेबूझ मालूम पड़ती हैं । तुम्हारे तथाकथित संतों ने तुमसे कहा है - प्रेम के विपरीत हो जाओ । मैं प्रेम के विपरीत नहीं हूं । मैं कहता हूं - प्रेम करो । देखो । जानो । जलो । हालांकि प्रेम का सपना टूटेगा । और अगर ठीक से तोड़ना हो सपना । तो ठीक से उसमें जाना जरूरी है । भोग में उतरोगे । तो ही योग का जन्म होगा । राग में जलोगे । तो विराग की सुगंध उठेगी । जो राग में नहीं जला । वह विराग से वंचित रह जाएगा । और जिसने भोग की पीड़ा नहीं जानी । वह योग का रस कैसे पीएगा ? इसलिए मेरी बातें तुम्हें बहुत बार उलटी मालूम पड़ती हैं । मैं कहता हूं - अगर योगी बनना है । तो भोगी बनने से डरना मत । भोग ही लेना । उसी भोग के विषाद में से तो योग का सूत्रपात है । जब तुम देखोगे । देखोगे । देखोगे । दुख पाओगे । जलोगे । तड़फोगे । जब सब तरह से देखोगे ।
दागे दिल से भी रोशनी न मिली । यह दिया भी जला के देख लिया ।
जब रोशनी मिलेगी नहीं । अंधेरा बना ही रहेगा । बना ही रहेगा । 1 दिन तुम सोचोगे कि मैं जो दीया जला रहा हूं । वह दीया । जलने वाला दीया नहीं है । तब मैं तलाश करूं उस दीये की । जो जलता है । और वह दीया सदा से जल रहा है । जरा लौटोगे पीछे । और उसे जलता हुआ पाओगे । वह दीया तुम हो ।
बुझ गए आरजू के सब चिराग । 1 अंधेरा है 4 सू बाकी ।
और जब वासना के सब चिराग बुझ जाएंगे । तो निश्चित गहन अंधकार में पड़ोगे । उसी गहन अंधकार में से तलाश पैदा होती है । आदमी टटोलना शुरू करता है ।  इसलिए डरो मत । कच्चे मत प्रार्थना में उतरना । अन्यथा तुम्हारी प्रार्थना भी कच्ची रह जाएगी । प्रार्थना का गुण धर्म तुम्हारे अनुभव पर निर्भर होता है । जिसने संसार को ठीक से देख लिया । और कांटों में चुभ गया है । और ज़ार ज़ार हो गया है । और घाव घाव हो गया है । और जिसने सब तरफ से अनुभव कर लिया । और अपने अनुभव से जान लिया कि - संसार असार है । शास्त्रों में लिखा है - इसलिए नहीं । कोई ज्ञानी ने कहा है - इसलिए नहीं । नानक कबीर ने दोहराया है । इसलिए नहीं । अपने अनुभव से गवाह हो गया कि - हां, संसार असार है - बस । इसी क्षण में क्रांति घटती है । संन्यास का जन्म होता है ।
कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए ।
कहीं पे शाम सिरहाने लगाके बैठ गए ।
खड़े हुए थे अलावों की आंच लेने को ।
सब अपनी अपनी हथेली जला के बैठ गए ।
दुकानदार तो मेले में लुट गए यारो ।
तमाशबीन दुकानें लगा के बैठ गए ।
ये सोच कर कि दरख्तों में छांव होती है ।
यहां बबूल के साए में आ के बैठ गए ।
इस संसार को तुम बबूल का वृक्ष पाओगे । देर अबेर यह अनुभव आएगा ही ।
ये सोच कर कि दरख्तों में छांव होती है ।
यहां बबूल के साए में आ के बैठ गए ।
लेकिन तुम्हारे अनुभव से ही यह बात उठनी चाहिए । उधार अनुभव काम नहीं आएगा । उधार ज्ञान कूड़ा कर्कट है । उसे जितनी जल्दी फेंक दो । उतना बेहतर । अपना थोड़ा सा ज्ञान पर्याप्त है । 1 कण भी अपने ज्ञान का पर्याप्त है - रोशनी के लिए । और शास्त्रों का बोझ जरा भी काम नहीं आता । शास्त्रों से बचो । शास्त्र को हटाओ । जीवन को जीओ । यह जीवन सपना है । यह टूटेगा । इसके टूटने में ही हित है । इसके टूटने में सौभाग्य है । वरदान है । क्योंकि यह सपना टूटे । तो परमात्मा से मिलन हो । यह विराग जगे संसार से । तो परमात्मा से राग जगे । 2 तरह के लोग हैं । जिनका संसार से राग है । उनका परमात्मा से विराग होता है । क्योंकि राग और विराग 1 ही सिक्के के 2 पहलू हैं । जिन्होंने संसार की तरफ मुंह कर लिया । परमात्मा की तरफ पीठ हो गई । संसार के सम्मुख हो गए । परमात्मा से विमुख हो गए । ओशो
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चेतना की पूरी अलग ही गुणवत्ता है । जो न ही सोचने से आती है । न ठीक । न गलत से । बस - नहीं सोचने की दशा । तुम बस देखते हो ।
तुम बस होश पूर्ण होते हो । लेकिन तुम सोचते नहीं । और यदि कोई विचार आता है । वे आते हैं । क्योंकि विचार तुम्हारे नहीं हैं । वे बस
हवा में तैर रहे हैं । यहां चारों तरफ विचार तैर रहे हैं । विचारों का क्षेत्र तैयार हो गया है । ऐसे ही जैसे कि यहां हवा है । तुम्हारे चारों तरफ पर विचार हैं । और ये स्वतः घुसते चले जाते हैं । यह तभी रुकते हैं । जब तुम अधिक से अधिक होश से भरते हो । इसमें कुछ ऐसा है । यदि तुम अधिक होश से भरते हो । विचार विलीन हो जाते हैं । वे पिघल जाते हैं । क्योंकि होश की ऊर्जा विचारों से अधिक बड़ी है । होश विचारों के लिए आग की तरह है । यह ऐसे ही है । जैसे कि तुम घर में दीपक जलाओ । और अंधेरा प्रवेश नहीं कर सकता । तुम प्रकाश को बंद कर दो । चारों तरफ से अंधेरा प्रवेश कर जाता है । बगैर 1 मिनट लिए । 1 क्षण
भी लिए । वह वहां होता है । जब घर में प्रकाश जलता है । अंधेरा प्रवेश नहीं कर सकता । विचार अंधेरे की तरह होते हैं । वे तब ही प्रवेश करते हैं । जब भीतर प्रकाश न हो । होश आग है । तुम अधिक होश से भरते हो । कम से कम विचार प्रवेश करते हैं । यदि तुम अपने होश से पूरे
एकीकृत हो जाते हो । विचार तुम्हारे में प्रवेश नहीं करते । तुम अभेद्य दुर्ग हो गए । कुछ भी प्रवेश नहीं कर सकता । ऐसा नहीं है कि तुम बंद हो गए । याद रखना । तुम पूरी तरह से खुले हो । पर तुम्हारी ऊर्जा दुर्ग बन जाती है । और जब कोई विचार तुम्हारे में प्रवेश नहीं कर सकता । वे आएंगे । और तुम्हारे पास से गुजर जाएंगे । तुम उन्हें आते देखोगे । और बस । जब वे तुम्हारे करीब आएंगे । वे मुड़ जाएंगे । तब तुम किसी तरफ मुड़ सकते हो । तब तुम नर्क में भी चले जाओ । तुम्हें कुछ भी छू
नहीं सकता । बुद्धत्व का यही अर्थ है । ओशो ।
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तुम शून्य बनो । पूर्ण अपने से आएगा - लोग पूर्ण की तलाश में निकल जाते हैं । इसकी फिक्र बिना किए कि - हम अभी शून्य नहीं हैं । और जिंदगी को ऐसा बांटो भी मत कि यह साधु है । वह असाधु है । यह सुंदर । वह असुंदर । यह सत्य । वह झूठ । जिंदगी तो 1 है । कौन साधु । कौन असाधु । कौन सुंदर । कौन असुंदर ? जिन्होंने जाना है । उन्होंने सर्वांग को सुंदर पाया है । जिन्होंने जाना है । उन्होंने सारे अस्तित्व को परमात्मामय पाया है । उन्होंने राम में तो देखा ही है । रावण में भी देखा है । रावण को जलाना बंद करो । रावण को जलाने में तुम बस इसकी ही घोषणा कर रहे हो कि हम परमात्मा के भी खास खास ढंग चुनेंगे । हम चुनाव करेंगे । परमात्मा ऐसा होगा । तो चुनेंगे । वैसा होगा । तो नहीं चुनेंगे । गोरा होगा । तो चुनेंगे । काला होगा । तो नहीं चुनेंगे । सुंदर होगा । तो चुनेंगे । असुंदर होगा । तो नहीं चुनेंगे । 
परमात्मा सभी में व्याप्त है । बुरे से बुरे में भी उतना ही है । जितना भले से भले में है । जिस दिन तुम्हें शुभ और अशुभ में । जीवन में और मृत्यु में । रोशनी में और अंधेरे में । सफलता में और विफलता में । सुख में और दुःख में । सबमें 1 का ही अनुभव होने लगेगा । ऐसी जब तुम्हारी पात्रता होगी । तभी तुम कह पाओगे - परमात्मा है । उसके पहले नहीं । ओशो ।
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स्वास्थ्य - स्वास्थ्य 1 शारीरिक घटना ही नहीं है । यह मात्र इसका 1 आयाम है । और वह भी ऊपरी आयाम । क्योंकि मौलिक रूप से देह तो मरण धर्मा है । स्वस्थ या अस्वस्थ । यह क्षणभंगुर है ।  वास्तविक स्वास्थ्य को तो कहीं तुम्हारे भीतर घटित होना है । तुम्हारी अंतरात्मा में । तुम्हारी चेतना में । क्योंकि चेतना का कभी जन्म नहीं होता । मृत्यु नहीं होती । यह शाश्वत है । चेतना में स्वस्थ होने का अर्थ है । प्रथम - जागरूक होना । द्वितीय - लयबद्ध होना । त्रितीय - आनंदित होना । और चतुर्थ - करुणावान होना । यदि यह 4 बातें पूरी हो जाती हैं । तो व्यक्ति भीतर से स्वस्थ हुआ । और सन्यास इन चारों बातों को पूरा कर सकता है । यह तुम्हें और अधिक जागरूक करता है । क्योंकि सभी ध्यान विधियां तरीके हैं । तुम्हें और अधिक जागरूक करने के । यह पद्धतियां हैं । तुम्हें आध्यात्मिक निद्रा से बाहर लाने के लिये । और नृत्य, गायन, उत्सव तुम्हें अधिक लयबद्ध बना सकते हैं । 1 क्षण आता है । जब नर्तक खो जाता है । और केवल नृत्य शेष बचता है । उस विशिष्ट अंतराल में व्यक्ति लयबद्धता का अनुभव करता है । जब गायक पूर्णत: खो जाता है । और केवल गीत शेष बचता है । जब कोई केन्द्र कार्य नहीं कर रहा होता । और केवल गीत शेष रह जाता है । जब कोई केन्द्र मैं की भांति कार्य नहीं कर रहा होता । मैं पूर्णत: अनुपस्थित होता है । और तुम 1 प्रवाह में होते हो । तो वह बहती चेतना लय बद्धता होती है । जागरूक और लयबद्ध होना संभावना पैदा करता है - आनंद घटित होने की । आनद का अर्थ है - परम सुख । अकथनीय । कोई भी शब्द इसके बारे में कुछ कहने के समर्थ नहीं । और जब व्यक्ति आनद को उपलब्ध हो गया है । जब व्यक्ति ने परम सुख के शिखर को छू लिया हो । तो करुणा 1 परिणाम के रूप में आती है । जब तुम्हें वह आनंद उपलब्ध हो जाता है । तो तुम उसे बांटना चाहते हो । तुम बांटे बिना नहीं रह सकते । बांटना अपरिहार्य है । यह होने का तर्क युक्त परिणाम है । यह छलकने लगता है । तुम्हें कुछ करना नहीं पड़ता । यह स्वय ही घटने लगता है । यह 4 स्वास्थ्य के 4 स्तंभ हैं । इन्हें प्राप्त कर लें । यह हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है । हमें सिर्फ इसे प्राप्त करना है । ओशो
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