30 जुलाई 2010

मृत्यु के बाद का सफ़र .??.

त्रयोदशाह अर्थात तेरहवें दिन जीव यमदूतों द्वारा पकड लिया जाता है । यमदूतों द्वारा पकडा गया अकेला ही वह जीव यमलोक के मार्ग में चलता है । वायु के द्वारा बडाया गया यह जीव दूसरे शरीर में प्रवेश करता है । दूसरे शरीर में जाने के पहले का जो शरीर है । वह पिन्डज यानी दिये गये पिन्डो से निर्मित होता है । अन्य योनियों का शरीर माता पिता के रज वीर्य से उत्पन्न होने वाला होता है । यमपुरी और मृत्युलोक के बीच 86 000 हजार योजन यानी 10 32 000 किलोमीटर का अन्तर है । एक योजन में
बारह किलोमीटर या चार कोस होते हैं । इस तरह जीव एक दिन में दो सौ सैतालीस योजन और आधा कोस ही चल पाता है । इस प्रकार मृत्यु के बाद जीव की यमपुरी की यात्रा तीन सौ अडतालीस दिन में पूरी होती है । इस यात्रा में व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार कष्ट से या सुख से ले जाया जाता है । यमदूत उसको कठोर बन्धन में बांधकर दक्षिण दिशा में स्थित अपने लोक को ले जाते हैं । इस मार्ग में कटीले कांटे । कुश । कील । कठोर पत्थर । बांबी । जलती हुयी अग्नि । दरारों वाली भूमि । सूर्य की प्रचन्ड गर्मी और मच्छर आदि जैसी परेशानियां और कष्ट हैं । इस दारुण मार्ग में शरीर जलने के कारण । कर्म के अनुसार विभिन्न जन्तुओं के खाये जाने के कारण । भेदन । छेदन आदि कष्टों के कारण क्षीण हुआ पापी चीत्कार करता हुआ अत्यधिक दुख को प्राप्त करता है । यमलोक के इस मार्ग में सोलह नगर पडते हैं । इनके नाम । याम्य । सौरिपुर । नगेन्द्रभवन । गन्धर्वपुर । शैलागम । क्रौंच । क्रूरपुर । विचित्रभवन ।
ब्रह्मपद । दुखद । नानाक्रन्दपुर । सुतप्तभवन । रौद्र । पयोवर्षण । शीताढय़ । बहुभीति हैं । ये सभी भयंकर और दुर्दर्शन हैं । याम्यपुर मार्ग पहुंचकर इन सोलह नगरों की यात्रा पूरी करके जीव यमराज के नगर में पहुंच जाता है । यहां पुष्पभद्रा नाम की नदी बहती है । अत्यन्त घने सुन्दर वटवृक्ष हैं । जिनके नीचे जीव विश्राम करना चाहता है । परन्तु यमदूत ऐसा नहीं करने देते । यहां पर वह पुत्रादि द्वारा दिया गया मासिक पिन्डदान खाता है । यदि दिया गया हो तो ? उसकी यात्रा सौरिपुर से शुरू होती है ।
सौरिपुर में कामरूपधारी । इच्छानुसार स्थित एवं गति वाला राजा राज्य करता है । जिसको देखते हीजीव भय से कांप उठता है । यहां स्वजनों द्वारा दिया गया जलपिन्ड खाता है । इसके बाद नगेन्द्रनगर जाता है । जहां दूसरे महीने में स्वजनों द्वारा दिये गये अन्न को खाकर बडता है । तीसरा मास पूरा होते ही गन्धर्वनगर पहुंच जाता है । यहां तीसरा मासिक पिन्ड प्राप्त करता है । इसी तरह चौथे मास में शैलागमपुर । चौथा पिन्ड या मासिक श्राद्ध । पांचवे मास में क्रौंचपुर । पांचवे मास का श्राद्ध पिन्ड खाता है और एक घडी विश्राम करता है । छठे मास क्रूरपुर । यहां से यातना शरीर धारणकर विचित्रनगर के लिये जाता है । यहां विचित्र नाम का राजा राज्य करता है । यहां से आगे की रास्ता में वैतरणी नदी पडती है ।
यह सौ योजन यानी बारह सौ किलोमीटर चौडी और रक्त और पीव से भरी हुयी है । यदि वैतरणी गौ का दान किया हो तो यहां मौजूद नाव वाला मल्लाह सुख से नदी पार करा देता है । अन्यथा नाविक घसीटते हुये ले जाते हैं । ऊपर मंडराते कौआ । उल्लू । बगुला । आदि पक्षी । उसे नुकीली चौंच से प्रहार करके घायल करते हैं । जीवन में सत्कर्म । दान । परोपकार । वैतरणी गौ का दान करने वाला यमलोक न जाकर विष्णुलोक जाता है । सातवें महीने में । ब्रह्मपद नगर में । सातवां पिन्ड । आंठवें मास में दुखदपुर । आठवां पिन्ड । नवें मास में नानाक्रन्द । दसवां मास वहीं बिताकर ग्यारह मास पूर्ण होते ही रौद्रपुर पहुंच जाता है । इसके बाद पयोवर्षण के लिये जाता है । वर्ष पूरा होते ही शीताढय नगर की और चल देता । यहां इसकी जीभ काट दी जाती है । यहां वार्षिक श्राद्ध ग्रहणकर पिन्डज शरीर में प्रवेश कर बहुभीति नाम के नगर में जाता है । इसके बाद वह निकट ही स्थित यमपुरी जाता है । यह यमलोक चौवालीस योजन यानी 528 किलोमीटर में बसा है । इसमें श्रवण नामके तेरह प्रतिहार है । यमराज के दो रूप हैं । सौम्य और विकराल । यमलोक या सयंमिनी नगरी पहुंचकर जीव लेखा जोखा के अनुसार शुभ अशुभ गति प्राप्त करता है । यहां जीव को भूख बहुत लगती है । इसलिये एकादशा । द्वादशा । षणमास । बरसी पर बहुत से ब्राह्मणों को कराया गया भोजन मृतक को प्राप्त होता है । इस पूरे मार्ग की इस यात्रा में यमदूत और अन्य जन्तु जीव के कर्मों के अनुसार उसे बेहद कष्ट देते हैं । और वह जीवन में सत्कर्म आदि न करने के लिये बेहद पछताता है । परन्तु अब कुछ नहीं हो सकता है ।

23 जुलाई 2010

गुरू हमेशा एक मित्र होता है

क्या स्त्रियों को वेदाधिकार नहीं है ? इस विषय पर कुछ महत्वपूर्ण
तथ्यों की ओर ध्यान जाना चाहिए ।
1 जब ऋग्वेद के मन्त्र द्रष्टा ऋषि स्त्रियां हो सकतीं हैं । तो उनको अध्ययन के अधिकार का निषेध करना मेरी दृष्टि से कभी समय विशेष की आवश्यकता रही होगी । आज इस बात की आवश्यकता नहीं ।
2 ऋग्वेद के मन्त्रों का दर्शन करने वाले 402 ऋषियों में से 377 पुरुष तथा 25 महिलायें हैं । जब देवता हिरण्यगर्भ प्राण इन 25 ऋषिकाओं के पवित्र हृदय में वेद मन्त्रों का प्राकटय कर सकते हैं । तो फिर माताओं को वेदाध्ययन का अधिकार न देने का कोई औचित्य नहीं ।
3 बृहदारण्यकोपनिषद में गार्गी एवं मैत्रेयी के याज्ञवल्क्य मुनि के साथ संवाद को देखकर कहीं से भी नहीं लगता कि वे अपने वैदिक ज्ञान में
यजुर्वेद के इस श्रेष्ठतम मुनि से कहीं भी कम होंगी ।
4 इसके अतिरिक्त स्मृति वाक्यों ने स्वीकार किया कि प्राचीनकाल में
स्त्रियों को गायत्री मन्त्र भी दिया जाता था । और मौञ्जी बन्धन भी किया जाता था । पुरा कल्पे तु नारीणां मौज्ञ्जी बन्धनमिष्यते इत्यादि ।
5 पत्नी शब्द का संस्कृत में अर्थ ही होता है - पति के साथ यज्ञ में संयुक्त होने वाली । हम जानते हैं कि वैदिक काल में कोई भी यज्ञ
यजमानी के बिना नहीं हो सकता था । अब अगर उसको वेद का ज्ञान नहीं होगा । तो वह वैदिक यज्ञ कैसे सम्पन्न करेगी ?
6 हां, कुछ अपेक्षाकृत आधुनिक धर्म शास्त्रों में और पुराणों में स्पष्ट निषेध है । मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि जब विदेशियों के आक्रमण के परिणाम स्वरूप स्त्रियों का जीवन भारत में असुरक्षित होता चला गया है । तभी घूंघट से लेकर सारे सीमित करने वाले नियम उनकी सुरक्षा के लिये वैसे ही बनाये गये हैं । जैसे आज से कुछ वर्ष पहले तक फिलिस्तीन की मुसलमान लड़कियां कभी अपने बाल और सिर नहीं ढकती थी । पर अब इतने अधिक अत्याचार के उपरान्त अधिकतर अपनी सुरक्षा के लिये उन्हें ढकने लगी हैं ।
7 ऋग्वेद 10:85 के सम्पूर्ण मन्त्रों की ऋषिकाएँ " सूर्या सावित्री " हैं ।
8 ऋग्वेद की ऋषिकाओं की सूची ब्रह्म देवता के 24 अध्याय में इस प्रकार है - घोषा गोधा विश्ववारा अपालोपनिषन्नित । ब्रह्म जाया जहुर्नाम अगस्तस्य स्वसादिती । 94
इन्द्राणी चेन्द्र माता चा सरमा रोमशोर्वशी । लोपामुद्रा च नद्यस्य यमी नारी च शाश्वती । 85
श्री लक्ष्मिः सार्पराज्ञी वाक्श्रद्धा मेधाच दक्षिण । रात्रि सूर्या च सावित्री ब्रह्मवादिन्य ईरितः । 86
9 ऋग्वेद के 10:134, 10:39, 19:40, 8:91, 10:5, 10:107, 10:109, 10:154, 10:159, 10:189, 5:28, 8:91 आदि सूक्तों की मंत्र द्रष्टा यह ऋषिकाएँ हैं ।
10 आचार्य श्री माध्वाचार्य जी ने महाभारत निर्णय में द्रौपदी की विद्वता का वर्णन करते हुए लिखा है - वेदाश्चप्युत्तम स्त्रीभिः कृष्णात्ताभिरिहाखिलाः । इससे यह प्रमाणित होता है कि महाभारत काल में भी स्त्रियाँ वेदाध्ययन करती थीं ।
11 तैत्तिरीय ब्रह्मण में सोम द्वारा ' सीता सावित्री ' ऋषिका को 3 वेद देने का वर्णन विस्तार पूर्वक आता है । ( तैत्तिरीय ब्राह्मण 1:3:10 )
12 वभूव श्रीमती राजन शांडिलस्य महात्मनः । सुता धृतव्रता साध्वी, नियता ब्रह्मचारिणी । साधू तप्त्वा तपो घोरे दुश्चरम स्त्री जनेन ह । गता स्वर्ग महाभागा देव ब्रह्मण पूजिता । महाभारत । शल्य पर्व 54:9
अर्थात - महात्मा शांडिल्य की पुत्री " श्रीमती । थी । जिसने व्रतों को धारण किया । वेदाध्ययन में निरंतर प्रवृत्त थी । अत्यंत कठिन तप करके वह देवी ब्राह्मणों से पूजित हुई । और स्वर्ग सिधारीं ।
13 अत्र सिद्धा शिवा नाम ब्राह्मणी वेद पारगा ।
अधीत्य सकलान वेदान लेभेSसंदेहमक्षयम । महाभारत । उद्योग पर्व । 190:18
अर्थात - शिवा नामक ब्राह्मणी वेदों में पारंगत थीं । उसने सब वेदों को पढ़कर मोक्ष प्राप्त किया ।
14 विष्णु पुराण 1:10 और 18:19 में तथा मार्कंडेय पुराण अध्याय 22 में भी इस प्रकार ब्रह्मवादिनी ( वेद और ब्रह्म का उपदेश करने वाली ) महिलाओं का वर्णन है ।
15 आचार्य शंकर को भारती देवी के साथ शास्त्रार्थ करना पड़ा था । उसने ऐसा अदभुत शास्त्रार्थ किया था कि बड़े बड़े विद्वान भी अचंभित रह गए थे । शंकर दिग्विजय में भारती देवी के सम्बन्ध लिखा है ।
सर्वाणि शास्त्राणि षडंग वेदान । कव्यादिकान वेत्ति, परंच सर्वम ।
तन्नास्ति नो वेत्ति यदत्र वाला । तस्मादभुच्चित्र पदम् जनानाम ।
शंकर दिग्विजय 3:16
अर्थात - भारती देवी सर्व शास्त्र तथा अंगों सहित सब वेदों और काव्यों को जानती थीं । उससे बढ़कर श्रेष्ठ और विद्वान स्त्री और न थी । आज जिस प्रकार स्त्रियों के शास्त्राध्ययन पर रोक लगी जाती है । यदि उस समय ऐसे प्रतिबन्ध होते । तो याज्ञवल्क्य और शंकराचार्य से शास्त्रार्थ करने वाली स्त्रियां किस प्रकार हो सकती थीं ? ऐसे अनेकों प्रमाण मिलते हैं । जिनसे यह स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह यज्ञ करती । और कराती थीं । वे यज्ञ विद्या, ब्रह्म विद्या आदि में पारंगत थीं । वेद, उपनिषद आदि धर्मशास्त्रों पर स्त्रियों का सामान अधिकार सर्वदा रहा है ।
साभार - वैदिक सुधा निधि ।
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एक महिला ( नोबल प्राप्त ) पति की उपलब्धियों से ।
http://www.npr.org/blogs/krulwich/2010/12/14/132031977/don-t-come-to-stockholm-madame-curie-s-nobel-scandal
पति की मृत्यु होने पर क्या क्या किया ? देखिए ।
http://www.nobelprize.org/nobel_prizes/physics/laureates/1903/

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गुरू हमेशा एक मित्र होता है । लेकिन उसकी मित्रता में बिलकुल अलग सी सुगंध होती है । इसमें मित्रता कम मित्रत्व अधिक होता है । करुणा इसका आंतरिक हिस्सा होती है । वह तुम्हें प्रेम करता है । क्योंकि और कुछ वह कर नहीं सकता । वह अपने अनुभव तुम्हारे साथ बांटता है । क्योंकि वह देख पाता है कि तुम उसे खोज रहे हो । तुम उसके लिये प्यासे हो । वह अपने शुद्ध जल के झरने तुम्हारे लिये उपलब्ध करवाता है । वह आनंदित होता है । और अनुग्रहीत होता है । यदि तुम उसके प्रेम के, मित्रता के, सत्य के उपहार स्वीकार करते हो ।
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जैसा जिसका काम पाता वैसे दाम ।
तू क्यों सोचे बंदे सबकी सोचे राम । 

16 जुलाई 2010

और जितना तुम प्रेम दे सको

प्रत्येक जीव तुरीया में जीता है । तुरीया का अर्थ तीन अवस्थाओं से है । ये चौथी अवस्था के सम्पर्क में भी आता है । पर बहुत अल्प समय के लिये । यह प्रत्येक जीव की बहुत रहस्यमय अवस्था होती है ? जिसे वो प्रत्येक वास्तविक निद्रा में दस से लेकर तीस और अधिकतम चालीस मिनट के लिये प्राप्त करता है । योगी या कुछ चले हुये साधक इस अवस्था को जान जाते हैं । जो बिना जाने तो लाभ पहुँचाती ही है । जान लेने पर इसके लाभ अनगिनत हैं । हैरत की बात है । कि हममें से प्रत्येक ही उस अवस्था को प्राप्त होता है ।चाहे वो छह महीने का बच्चा हो । अथवा अंतिम अवस्था में आ पहुँचा वृद्ध । क्या है ये रहस्य ?
लेकिन इस रहस्य को जानने से पहले आईये उन तीन अवस्थाओं के वारे में जानते हैं । जिनमें हम जीते हैं । साधारण बोलचाल की भाषा में इसको जागना । सोना और सपना कहते हैं । अर्थात स्वप्न । जाग्रति और सुषप्ति । विचार करकें देखें । आप इन्हीं तीनों अवस्थाओं में से किसी एक अवस्था में ही एक समय में होते हैं । या तो जाग रहे होते हैं । या सो रहे होते हैं । या स्वप्न देख रहे होते हैं । लेकिन इसमें भी एक रहस्य हैं ? आप को लगता होगा । कि आप इन तीनों अवस्थाओं में एक ही स्थान पर एक जैसे ही होते हैं ।
जबकि सत्य यह है । कि आप अलग अलग स्थिति और अलग अलग स्थानों पर होते हैं । अब ये क्रिया क्योंकि अनजाने में होती है । इसलिये आपको भय नहीं होता । इसी स्थिति का बदलाब आपकी जानकारी में हो तो आप को मृत्यु के समान भय प्रतीत होगा । क्योंकि मृत्यु के समय भी इसी से मिलती जुलती स्थिति होती है । पर उस समय इंसान उसको अपने होश में देखता है ।
मृत्यु के समय जो हमारी तमाम ग्रन्थियों और ब्रह्माण्ड द्वार पर ताला लगा होता है । वो आटोमैटिक ही खुल जाता है । क्योंकि जीवात्मा अपने उस जीवन के अंतिम सफ़र पर जा रहा होता है । अतः ब्रह्माण्डी रहस्यों को परदे में रखने का कोई लाभ नहीं । उसके भयभीत होने के अनेक कारणों में इस तरह का नया अनुभव और नये दृश्य भी होते हैं । दुबारा जीवन प्राप्त होने पर माया का यह ताला फ़िर से लगा दिया जाता है और जीव को महामाया द्वारा ये ग्यान भुला दिया जाता है ।
जबकि प्रत्येक दिन आदमी नशे जैसी हालत या बेहोशी में देखता है । आईये पहले इन तीन स्थितियों में अपनी स्थिति जानें ? जाग्रत अवस्था ( संत की जाग्रत अवस्था अलग होती है । जीव की अलग । जीव वास्तव में सत्य कहा जाय तो जागते में भी सोता या सपना देखता है । खुली आँखो का सपना ) में जीव " आग्या चक्र " पर या कहिये कि दोनों भोहों के मध्य कुछ पीछे की तरफ़ होता है । उस समय ये अपने " जीव " को जान रहा होता है । यानी खुद पर इसका नियन्त्रण होता है । ये हाथ उठाने का विचार करेगा तो हाथ उठा लेगा । इस तरह प्रत्येक क्रिया इसकी आग्या के अधीन होती है । सामान्य तौर पर जागने को जाग्रत अवस्था कहते हैं । उस स्थिति में ये संसार के कार्य व्यवहार करता है । दूसरी अवस्था स्वप्न की है । उस स्थिति में यह जीव " कंठ देश " या गले पर आ जाता है । इस स्थान पर " चित्रा नाङी । में हमारे नये पुराने करोङों जन्मों के संस्कार जमा है । जो कि चित्र के रूप में है । आज की परिचित भाषा में इसको " वीडियो क्लिप " भी कह सकते हैं । यानी कि हमारे इस जन्म या अन्य जन्मों की वे घटनायें जिन्होंने हमारे मानस पटल पर गहरा प्रभाव छोङा है । एक चल चित्रावली के रूप में संग्रहित हैं । यही संस्कार भी बन जाते हैं । यही कारण बीज बन जाते हैं । जिनसे हम बार बार जन्म लेने को बाध्य होते हैं । योग में इसी हुता नाङी के संस्कार जला दिये जाते हैं । जैसे किसी बीज को यदि भून दिया जाय
तो वो अंकुरित नहीं हो सकता । अब क्योंकि स्वप्न अवस्था में हम शरीर के उस हिस्से में आ जाते हैं । जहाँ एक तरह से फ़िल्म प्रोजेक्टर लगा है । तो हम अपनी वासना या मनोदशा के अनुसार स्वप्न जगत में विचरण करते हैं । मान लीजिये उस दिन आपको बहुत गहराई से पचास साल पूर्व का जीवन याद आया हो । और आप उसी का चिंतन करते रहे हों तो सोते समय उससे रिलेटिव कोई झलक आप देखेंगे । यह भी हरेक के लिये निश्चित नहीं है । क्योंकि मनुष्य का मष्तिष्क विलक्षण होता है । वहाँ क्या लीला होगी । यह ग्यान अवस्था में तो सटीक जाना जा सकता है । साधारण अवस्था में नहीं । हाँ लेकिन एक " कामन " या सामान्य अवस्था जिसे कहते हैं । उसके परिणाम हमेशा ही मिलते जुलते मगर एक से होते हैं । तो कहने का मतलब ये हुआ कि स्वप्न अवस्था में आपकी स्थिति गले या कंठ पर होती है । सोना या सपना देखना एक मिली जुली अवस्था होती है । फ़िर भी इनको दो ही माना गया है । अब तीसरी अवस्था सुषुप्ति यानी गहरी नींद को जानें । इस अवस्था में हम " ह्रदय देश " पर होते हैं । ये वो अवस्था होती है । जब सोने से पहले विचार करते करते अचानक हमें गहरी नींद दबा लेती है । और हम अपनी सुध बुध खो बैठते हैं । क्योंकि स्वप्न वाली स्थिति में तो हमें अपने होने का अहसास होता है । पर इस स्थिति में नहीं होता । ऐसा क्यों होता है ?
दरअसल ये ही वो दिव्य और पवित्र जगह है । जहाँ अंतकरण वृति यानी मन । बुद्धि । चित्त । अहम । नहीं होते । इस तरह ये स्वाभाविक मगर एक विलक्षण योग क्रिया प्रतिदिन आपके जीवन में एक दो बार होती है । यहाँ बङे सुन्दर और मनोहारी स्थान है । यही वो जगह है । जहाँ से प्रतिदिन के लिये आपको एक खुराक के रूप में आत्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है । आप सोचते हैं कि भोजन से आपको स्फ़ूर्ति और ऊर्जा मिलती है । यह आधी बात सही है । आधी गलत । भोजन से ऊर्जा आपके शरीर को प्राप्त होती है । आपको नहीं । उदाहरण के तौर पर आप कितना भी पौष्टिक भोजन खायें । लेकिन तब तक थका थका महसूस करेंगे । जब तक आप भरपूर नींद सो न लें । और ये रहस्यमय वाली गहरी नींद न जब तक आपको आ जाय । ये बीस मिनट की गहरी नींद फ़िर से आपको तरोताजा कर देती है ।
अगर आपने इस तरफ़ विचार या प्रक्टीकल न किया हो तो अब करके देख लेना । तो भोजन से ऊर्जा आपके शरीर को और चेतनात्मक ऊर्जा आपको ह्रदय देश में पहुँचने पर प्राप्त होती है । लेकिन ये बङे दुख की बात है । कि प्रथ्वीलोक या मृत्युलोक में जीव की स्थिति " माया " के कैदी की है । इसलिये इसको माया के बक्से में कैद करके ले जाया जाता है । अतः यह उन मनोहारी स्थानों को देखने से वंचित रह जाता है । यह उन दिव्य अनुभवों से भी वंचित रहता है । जोकि वहाँ पर होते है ।
उस अवस्था में इसको आत्मिक ऊर्जा की " पोलियो ( जैसी ) खुराक " दो बूंद पिलाकर वापस कर दिया जाता है । क्योंकि विशेष भक्ति के विना यह " महाप्रभु " के विधान के अनुसार उसको देखने या जानने का अधिकारी नहीं होता । इसके लिये भक्ति रूपी " वी .आई .पी " पास की आवश्यकता होती है । जो कुन्डलिनी स्तर के गुरु या आत्मग्यानी सतगुरु से प्राप्त होता है । तो इस तरह सामान्य अवस्था में यदि आप गहरी निद्रा वाले जीव हैं । तो ये तुरीया यानी तीन अवस्थायें हो गयी । चौथी अवस्था चेतन अवस्था कहलाती है । जो है तो यही । यानी आपका ह्रदय देश में जाना । पर बा होश जाना । बा इज्जत जाना । यानी उस अवस्था को जानना । उस अवस्था में जागना । तो मजे की बात ये है । कि ये जागना आपका सोने का काम कर देता है । संत इसी के लिये कहते हैं जागो जागो । योग या आत्मग्यान में जाग जाने पर जीव की " कागवृति " बदलकर " हँसवृति हो जाती है । फ़िर वह उन
मनोहारी स्थानों को देखने और दिव्यता के अनुभव प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है । हो सकता है । इस लेख में कुछ बातें छूट गयीं हो या आपको ठीक से समझ में न आयी हों । ऐसी स्थिति में आप फ़ोन या ई मेल द्वारा अपनी शंका का समाधान कर सकते हैं । क्योंकि इस चौथी अवस्था को जानना ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है । तुरीया में तो जीव अनादिकाल से खेल रहा है ।
जब आप गहरी नींद में थे । तब भी आपको पता था । इसीलिये तो आप बाद में कहते हैं कि आज ऐसा सोया कि होश खबर नहीं रहा । तो जिसको ये पता था कि मैं गहरी नींद में सोया था ।वो कौन था । यदि वो आप थे । तो आपको सोते समय क्यों नहीं पता था । तो अपने इस गुप्त परिचय को । उसको जान जाना बहुत बङी बात है । ये ही वो है । जो सबको जानता है । इसको जानना और मिथ्या जगत में जागना बहुत बङी उपलब्धि है ।
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ज्ञानी का मार्ग भक्त के मार्ग से क्या सर्वथा भिन्न है ? जिस होश की आप चर्चा करते हैं । वह प्रेमी का मार्ग है । या ज्ञानी का ? यदि होश हो । तो प्रेम कैसे घटेगा ?
- 3 संभावनाएं हैं । 1 - कि कोई व्यक्ति ज्ञान के मार्ग से खोजे । जो व्यक्ति ज्ञान के मार्ग से खोजेगा । ध्यान उसकी विधि होगी । ध्यान उसका रास्ता होगा । जिस दिन उपलब्धि होगी । समाधि फलेगी । जीवन में चैतन्य का फूल लगेगा । उस दिन वह अचानक पाएगा कि करता तो जीवन भर ध्यान रहा । और समाधि मिली । लेकिन अब समाधि के साथ अचानक प्रेम का आविर्भाव हुआ है । प्रेम फल की भांति आता है - ध्यानी को । ध्यान साधन बनता है । और प्रेम फल की भांति आता है । परिणाम बनता है ।
दूसरा मार्ग है - कि तुम भक्ति के मार्ग से चलो । भक्ति के मार्ग पर प्रेम साधन है । और जब मंजिल आती है । और भक्त मंदिर पर पहुंचता है । तो अचानक चकित हो जाता है कि ध्यान की लवलीनता उपलब्ध हो गई है । वह परिणाम है । तो जो ध्यान के मार्ग से चलते हैं । वे प्रेम को पाते हैं अंत में । जो प्रेम के मार्ग से चलते हैं । वे ध्यान को पाते हैं अंत में । ज्ञानी भक्त हो जाते हैं । भक्त ज्ञानी हो जाते हैं ।
और 1 तीसरा मार्ग है - कि तुम दोनों पर 1 साथ चल सकते हो । तुम प्रेम को भी साथ साध सकते हो । तुम ध्यान को भी साथ साध सकते हो । तब तुम प्रेमी भक्त, ज्ञानी भक्त या भक्त ज्ञानी हो । मेरी पूरी चेष्टा यही है कि तुम दोनों साथ साथ साध लो । क्यों इतनी देर भी प्रतीक्षा करनी । ध्यान के साथ ही प्रेम साधा जा सकता है । और जब ध्यान के साथ प्रेम को साधोगे । तो तुम्हारे ध्यान में 1 रससिक्तता होगी । जो खाली ध्यान साधने वाले में नहीं होती । उसमें प्रेम तो होता नहीं । इसलिए खाली ध्यानी रूखा, मरुस्थल जैसा हो जाता है । उसमें मरुद्यान नहीं होते । उसमें तुम कहीं वृक्षों की छाया न पाओगे । वह रूखा हो जाएगा । कठोर हो जाएगा । तुम उसको पाओगे कि जीवन के प्रति उसके मन में 1 उपेक्षा है । 1 गहरी उदासी है । वह जीवन की तरफ पीठ कर लेगा । भगोड़ा हो जाएगा । अगर तुम ध्यान ही ध्यान साधोगे । तो प्रेम फलेगा अंत में । लेकिन पूरे रास्ते वह जो प्रेम की वर्षा साथ साथ हो सकती थी । उससे तुम वंचित रह जाओगे । मैं कहता हूं - क्यों वंचित रहना ? जो व्यक्ति प्रेम को साधेगा । उसके जीवन में प्रेम तो रहेगा । रस रहेगा । माधुर्य रहेगा । लेकिन ध्यान से जो शांति फलित होती है । वह जो परम शून्यता फलित होती है । वह फलित नहीं होगी । उसके जीवन में रंग तो होगा । प्रसन्नता भी होगी । लेकिन प्रसन्नता के भीतर शून्यता की शांति नहीं होगी । तो कभी कभी तुम पाओगे कि उसका परमात्मा भी 1 राग रंग है । उसकी भक्ति भी 1 राग रंग है । ये दोनों ही थोड़े अपंग होंगे । 1-1 पैर से चलने की कोशिश कर रहे हैं । और ये दोनों एक दूसरे के विपरीत होंगे । क्योंकि मार्ग पर ध्यानी को पता नहीं है कि अंत में प्रेम भी आ जाता है । और मार्ग में प्रेमी को भी पता नहीं है कि अंत में ध्यान भी आ जाता है । तो ध्यानी कहेगा - क्या व्यर्थ ही पूजा प्रार्थना में लगे हो । किसके लिए हाथ जोड़ रहे हो ? वहां कोई भी नहीं है । आंख बंद करो । परमात्मा भीतर है । गिराओ मंदिरों को । हटाओ मस्जिदों को । इनसे क्या सार है ? ज्ञानी ब्रह्मज्ञान की बात करेगा । और भक्त ? भक्त कहेगा - क्या आंख बंद करके बैठे हो ? सब तरफ परमात्मा की लीला हो रही है ।
देखो । आंख खोलो । ऐसा हुआ । 1 सूफी फकीर औरत हुई - राबिया । वह ध्यानी थी । 1 भक्त । हसन नाम का फकीर । उसके घर में मेहमान था । सुबह सूरज उगा । और हसन बाहर नाचने लगा । क्योंकि भक्त को तो सभी इशारे उसी के हैं । सूरज उगे । तो वही उगा । फूल खिले । तो वही खिला । पक्षी गाए । तो वही गाया । वही दिखायी पड़ता है । बाकी तो सब रूप रह जाते हैं । भीतर वही दिखाई पड़ता है । तो हसन नाचने लगा । और हसन ने जोर से आवाज दी कि - राबिया, क्या भीतर बैठी है । अंधेरे में ? बाहर आ । देख कैसा सूरज निकला है । देख । परमात्मा कैसे प्रकट हुए हैं । राबिया ने भीतर से ही कहा - हसन ! मैं आंख बंद किए हूं । और मैं निश्चित ही भीतर हूं । और मैं तुमसे कहती हूं । तुम भी भीतर आ जाओ । बाहर के सूरज को देखने से क्या होगा ? हम भीतर उसी को देख रहे हैं । जिसने सूरज को बनाया । यह प्रेमी और भक्त का विरोध है । मगर दोनों अधूरे हैं । दोनों अधूरे हैं । एकांगी है । दोनों पहुंच जाते हैं । इसलिए किसी को अगर एकांगी ही होकर चलना हो । कुछ लोग शौकीन होते हैं । 1 टांग से ही उनको यात्रा करनी है । क्या करोगे ? तो ठीक है । मौज है । स्वतंत्रता है । ऐसे ही चलो । किसी ने यह ही तय कर लिया कि 1 टांग से ही परमात्मा के मंदिर तक पहुंचना है । पहुंचो । लेकिन तुम अचानक मंदिर के द्वार पर पाओगे कि परमात्मा दोनों ही टांगें पसंद करता है । नहीं तो वह 2 देता ही नहीं । उसने 2 दी हैं । उसका प्रयोजन है । उसने 2 पंख दिए हैं कि उड़ो संतुलन से । उसने 2 पैर दिए हैं कि चलो संतुलन से । जीवन में 1 संतुलन हो । संतुलन यानी संयम । तो कभी कभी भक्ति भी अति हो जाती है । वह भी असंयम है । और ध्यान भी अति हो जाता है । वह भी असंयम है । ध्यान अगर ऐसा हो जाए कि तुम सब बाहर को बिलकुल भूल ही जाओ । तो बाहर भी परमात्मा था । तुम्हारा परमात्मा अधूरा हो गया । और भक्ति ऐसी अगर हो जाए कि तुम मंदिर में बैठे प्रार्थना करते रहो । कभी भीतर आंख बंद ही न करो । देखते रहो कि कृष्ण का कैसा सुंदर रूप है । कैसे मोर मुकुट । कैसी पैर में पैंजनियां । और उसी रूप को निहारते रहो । और उसी में डूबे रहो । तो भीतर भी परमात्मा था । उससे तुम वंचित रह गए । अंत में तो तुम्हें पूरा हो जाना पड़ेगा । परमात्मा के पास पहुंचकर तो तुम्हें पूरा हो जाना पड़ेगा । इसलिए भक्त ज्ञानी हो जाता है । ध्यानी हो जाता है । ध्यानी भक्त हो जाता है । लेकिन जो अंत में हो जाना है । मैं कहता हूं । पहले से ही क्यों न हो जाओ ? मंजिल पर ही जाकर क्यों पूरे को उपलब्ध करो । यात्रा को भी क्यों न मंजिल बना लो ? हर कदम क्यों न मंजिल हो जाए ? राह भी क्यों न मंजिल हो जाए ? साधना भी क्यों न साध्य हो जाए ? तो मेरी सारी चेष्टा यह है कि तुम ध्यान भी करो । तुम नाचो भी । तुम प्रेम भी करो । तुम भक्ति भी करो । तुम शून्यता में भी जाओ । और तुम पूर्णता के गीत भी गाओ । और जिस दिन तुम दोनों को साध लोगे । उस दिन तुम पाओगे कि - अद्वैत सधा । नहीं तो ज्ञानी भक्तों के खिलाफ हैं । भक्त ज्ञानियों के खिलाफ हैं । संप्रदाय खड़े होते हैं । विरोध खड़ा होता है । द्वैत खड़ा होता है । विभाजन करो ही मत । तुम्हें परमात्मा ने हृदय भी दिया है । उसे भक्ति में डूबने दो । तुम्हें परमात्मा ने प्रज्ञा दी है । बुद्धि दी है । उसे ध्यान में डूबने दो । ये तुम्हारे 2 पंख । दोनों ही उड़ें । परमात्मा का खुला आकाश । बड़ा आकाश । तुम क्यों लंगड़ाने को उत्सुक हो ? लेकिन मैं जानता हूं । कारण है । लंगड़ाने की उत्सुकता में राज है । राज यह है कि 1 को चुनने में सरलता लगती है । जटिलता नहीं लगती । सीधा सीधा मामला लगता है । 2 और 2 = 4 । ऐसा मालूम पड़ता है । दोनों को चुनने में विरोधाभास हो जाता है । अगर तुम ध्यान को और भक्ति को 1 साथ चुनोगे । तो तुम पाओगे कि ये दोनों बड़ी विरोधी चीजें हैं । कहां प्रेम ।
उसमें तो दूसरे से जुड़ना है । परमात्मा के चरण खोजने हैं । और कहां ध्यान । उसमें तो सब दूसरे को छोड़ देना है । अकेले रह जाना है । दोनों विपरीत लगते हैं । और मैं तुमसे कहता हूं कि अगर तुम 2 विपरीत के बीच एकता को न देख पाए । तो तुम अंधे ही हो । जैसे दिन है । और रात है । और श्रम है । और विश्राम है । और जन्म है । और मृत्यु है । ऐसे ही भक्ति है । और ध्यान है । तुम जन्मे । तुम मरोगे भी । तुम यह नहीं कह सकते कि जन्मे । अब मर कैसे सकते हैं ? क्योंकि जन्म और मृत्यु में तो बड़ा विरोध मालूम पड़ता है । 1 में तो आते हैं । दूसरे में जाते हैं । तुम यह नहीं कहते कि दिन में तो सूरज उगता है । प्रकाश ही प्रकाश । रात में अंधकार हो जाता है । यह विरोध बरदाश्त के बाहर है । जीवन विरोध से बना है । जीवन विरोधाभासी है । पैराडाक्सिकल है । जीवन का रस और मजा ही यही है कि यहां पुरुष ही पुरुष नहीं हैं । स्त्रियां भी हैं । विरोध है । नदी के 2 किनारे हैं । और तभी तो सेतु बन पाता है । नहीं तो सेतु बने ही न । 1 ही किनारे पर कैसे तुम सेतु बनाओगे ? यहां अंधकार भी है । उजाला भी है । यहां भीतर की तरफ यात्रा भी हो सकती है । और बाहर की तरफ भी यात्रा हो सकती है । और अगर तुम दोनों को साथ साथ सम्हाल लो । कभी भीतर डुबकी ले लो । कभी बाहर भी डुबकी लो । बाहर भी वही है । और भीतर भी वही है । यह फर्क ही तुम्हारी नासमझी का है कि तुम बाहर और भीतर को 2 कर रहे हो । 1 ही है । जो आकाश तुम्हारे घर के बाहर है । वही तुम्हारे आंगन में भी है । आंगन के आकाश का गुण धर्म नहीं बदलता । और तुम्हारी दीवारों के भीतर जो कमरा घिरा है । उसमें जो आकाश है । उसका भी गुण धर्म नहीं बदलता । वह भी वही है । तुम्हारी अंतरात्मा और बाहर फैला हुआ परमात्मा 1 ही है । अगर इस 1 को तुम शुरू से ही साधो । तो तुम्हारे जीवन में बड़ा अदभुत अर्थ प्रकट होगा । जो साधारण ध्यानी के जीवन में प्रकट नहीं होता । जैसे मैं तुम्हें कहूं । जैन धर्म, बौद्ध धर्म ध्यान पर खड़े हैं । वे दोनों अंतर्मुखी धर्म हैं । तो तुम उनके साधुओं के जीवन में किसी तरह की रसधार न देखोगे । सूखे सूखे । मरे मरे । जितना मरा हुआ साधु हो । जैनी कहते हैं - उतना ही पहुंचा हुआ कि देखो । बिलकुल मरा हुआ है । देखो कैसा तप चल रहा है । शरीर बिलकुल पीला पड़ जाए । तो वे कहते हैं - स्वर्ण जैसी काया । शरीर पीला पड़ गया उपवास कर करके । मगर वे कहते हैं - देखो कैसी तपश्चर्या कि कुंदन जैसा चेहरा दिखाई पड़ रहा है । यही पता हो उनको कि यह आदमी संन्यासी नहीं है । तो वे पूछेंगे - भाई, कौन सी बीमारी हो गई है ? पीलिया हो गया है । क्या हो गया है ? अस्पताल में भरती हो जाओ । लेकिन ये मुनि महाराज हैं । तो उनके चरण छू रहे हैं । गुणगान गा रहे हैं । क्योंकि उनको पीलापन नहीं दिखाई पड़ता । स्वर्ण दिखाई पड़ता है । अपनी धारणा है । तो जैन साधु, बौद्ध भिक्षु धीरे धीरे सूख गए हैं । रस नहीं है । तुम उन्हें हंसते हुए न पाओगे । अगर जैन मुनि हंस दे । तो भक्तों को शक हो जाएगा कि यह कैसा मुनि । हंस रहा है । खिलखिला रहा है ? यह कहीं साधु का लक्षण है ? अगर वह छोटी छोटी बातों में रस ले । तो अनुयायी छोड़ देंगे उसे । उसे तो रस लेना ही नहीं है । उसे तो ऐसा डरा हुआ । दूर अपने को सिकोड़े हुए खड़ा रहना है । तो 1 भ्रांति पैदा हुई है । फिर दूसरी तरफ हिंदू हैं । उनके साधु संन्यासी हैं । भक्ति संप्रदाय हैं - रामानुज का । वल्लभ का । तुम उनको पाओगे कि वे सिर्फ खा पी रहे हैं । और मोटे हो रहे हैं । और कुछ नहीं । खीर पूड़ी । वह उनके जीवन की कुल साधना है । क्योंकि वही भोग भगवान को लगाते हैं । भगवान तो बहाना है । वही भोग खुद को लगाते हैं । तुम उनको मोर मुकुट पहने हुए देखोगे । वे तुम्हें विदूषक मालूम पड़ेंगे । किसी सर्कस में होते । नाटक में होते । जंचते । यहां क्या कर रहे हैं ? उनका व्यक्तित्व तुम्हें भोगी का मालूम पड़ेगा । योगी का नहीं मालूम पड़ेगा । लेकिन भक्त कहेंगे कि यह तो भक्ति का रस है । ये दोनों ही बातें अधूरी हो गई हैं । और दोनों ने नुकसान पहुंचाया । तो मैं तो तुमसे कहता हूं । दोनों को साथ ही लेना । और दोनों के बीच 1 रिदम । 1 छंदबद्धता पैदा कर लेना । कभी बाहर रस से भरे नाचते हुए । कभी भीतर शांत । शून्य । दोनों ही । और अगर तुम दोनों ही किनारों को छूकर बह सको । तो तुम्हारी जीवन सरिता सागर तक निश्चित ही पहुंच जाएगी । और तब तुम परमात्मा को पाकर ऐसा न पाओगे कि कुछ नया पा रहे हो । तुम ऐसा पाओगे कि यह तो पाया ही हुआ था । प्रतिपल पाया हुआ था । थोड़ा बड़ा हो गया । बड़ा हो गया । अब विराट हो गया । लेकिन ऐसा नहीं था कि कभी ऐसा भी था कि न पाया हो । थोड़ा था । हर कदम पर था । इसको मैं कदम कदम को मंजिल बना लेना कहता हूं । लेकिन ऐसा व्यक्ति विरोधाभासी होगा । कभी तुम उसे नाचते पाओगे । कभी उसे तुम शांत ध्यान करते पाओगे । कभी तुम उसे भोजन का आनंद लेते हुए भी पाओगे । क्योंकि वह कहेगा - अन्नम ब्रह्म कि अन्न ब्रह्म है । कभी तुम उसे उपवास करते हुए भी पाओगे । क्योंकि वह भीतर इतना डूब गया कि भोजन की याद ही न रही । ऐसा व्यक्ति ही मेरे लिए जीवन का काव्य है । ऐसा व्यक्ति मेरे लिए परिपूर्ण है । अंत में तो यह घटना सभी को घटती है । लेकिन शुरू से घट जाए । तो सौभाग्य । इसलिए मैं 3 विभाजन करता हूं । 1 - ज्ञानी, ध्यानी - वह लंगड़ा है । पहुंच जाता है लंगड़ाते । लंगड़े भी पहुंच जाते हैं । फिर भक्त - रस से भरा । लेकिन अधूरा है । उसे भीतर का कोई अनुभव नहीं है । शून्य की कोई प्रतीति नहीं है । वह परमात्मा की स्तुति तो गा सकता है । लेकिन चुप और मौन नहीं हो सकता । प्रार्थना कर सकता है । लेकिन ध्यान नहीं कर सकता । ध्यान और प्रार्थना का यही फर्क है । प्रार्थना है भक्त का अंग । जोर जोर से बोलता है । भगवान की स्तुति करता है । सुनता ही नहीं किसी की । मैंने पढ़ा है । 1 बहुत बड़ा मूर्तिकार और चित्रकार हुआ - माइकल ऐंजिलो । उसके जीवन को मैं पढ़ता था । तो 1 बढ़ा चर्च बन रहा था - सिसटाइन चैपल । और उसकी सीलिंग पर उसने वर्षो तक चित्र खोदे हैं । माइकल ऐंजिलो ने । बड़ा कठिन काम था । क्योंकि 24 घंटे पड़ा रहता । सीलिंग पर खोदता रहता । पीठ पर पड़े पड़े खोदना पड़ता । 1 दिन उसने देखा । थक गया था । तो हाथ थोड़े रुक गए थे । नीचे देखा कि कोई भी नहीं है । सिर्फ 1 औरत जो सदा आती है । और सदा प्रार्थना करती है बड़े जोर जोर से । वह परमात्मा से बातें कर रही है । बड़े जोर जोर से । उसे ऐसा मजाक सूझा । थका मांदा था । थोड़ी हंसी हो जाएगी । थोड़ा मन बहलाव हो जाएगा । उसे मजाक सूझा । तो उसने जोर से कहा कि - देखो, मैं जीसस क्राइस्ट हूं । और जो तुझे मांगना हो । मांग ले । ऊपर चढ़े हुए अपनी सीढ़ी से । वहीं से वह चिल्लाया । उस औरत ने ऊपर भी न देखा । उसने कहा - चुप रहो । बकवास बंद करो । मैं तुम्हारे बाप से बात कर रही हूं । भक्त कहीं किसी की सुनता है । वह अपनी धुन में है । मैं परम पिता परमात्मा से । तुम्हारे बाप से बात कर रही हूं । तुम बीच में न बोलो । उसने कहा । माइकल ऐंजिलो ने लिखा है कि मैं भी चौंक गया । मैं तो सोचता था कि यह मजाक समझेगी । बाकी वह अपने में लगी थी इतना कि उसको यह भी पता नहीं चला कि मैंने क्या कहा । क्या मामला था । भक्त अपनी लगाए हुए है स्तुति । चुप होना । वह जानता ही नहीं । वह भी अधूरापन है । वे भी पहुंच जाते हैं । लेकिन द्वार पर दोनों 1 हो जाते हैं । मैं तुमसे कहता हूं । तुम अभी से 1 हो जाओ । 
मेरा मार्ग तीसरा है । और उसमें प्रेम और ध्यान संयुक्त हैं । जितने तुम शांत हो सको । जितने मौन हो सको । उतने मौन हो जाओ । और जितना तुम प्रेम दे सको । उतना तुम प्रेम दे दो । 1 ऐसी घड़ी तुम्हारे जीवन में आ जाए कि शरीर तो नाचे । और तुम ध्यान में संलग्न । भीतर सब चुप । बाहर गीत चलता रहे । भीतर ध्यान । बाहर प्रार्थना होती रहे । वह मेरे लिए परिपूर्ण पुरुष का लक्षण है । और जिस दिन दुनिया में वैसा धर्म होगा । उस दिन दुनिया में अधिकतम लोगों के लिए धर्म के द्वार खुल जाएंगे । क्योंकि लंगड़े लंगड़े जाना बहुत थोड़े लोगों के लिए संभव है । दोनों पैर से जाना बहुत लोगों के लिए संभव हो सकता है । ओशो 

15 जुलाई 2010

गुरुपूर्णिमा उत्सव पर आप सभी सादर आमन्त्रित हैं ।


गुर्रुब्रह्मा गुर्रुविष्णु गुर्रुदेव महेश्वरा । गुरुः साक्षात पारब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ।श्री श्री 1008 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज " परमहँस "
अनन्तकोटि नायक पारब्रह्म परमात्मा की अनुपम अमृत कृपा से ग्राम - उवाली । पो - उरथान । बुझिया के पुल के पास । करहल । मैंनपुरी । में सदगुरुपूर्णिमा उत्सव बङी धूमधाम से सम्पन्न होने जा रहा है ।गुरुपूर्णिमा उत्सव का मुख्य उद्देश्य इस असार संसार में व्याकुल पीङित एवं अविधा
से ग्रसित श्रद्धालु भक्तों को ग्यान अमृत का पान कराया जायेगा । यह जीवात्मा सनातन काल से जनम मरण की चक्की में पिसता हुआ धक्के खा रहा है व जघन्य यातनाओं से त्रस्त एवं बैचेन है ।जिसे उद्धार करने एवं अमृत पिलाकर सदगुरुदेव यातनाओं से अपनी कृपा से मुक्ति करा देते हैं ।अतः ऐसे सुअवसर को न भूलें एवं अपनी आत्मा का उद्धार करें । सदगुरुदेव का कहना है । कि
मनुष्य यदि पूरी तरह से ग्यान भक्ति के प्रति समर्पण हो । तो आत्मा को परमात्मा को जानने में सदगुरु की कृपा से पन्द्रह मिनट का समय लगता है । इसलिये ऐसे पुनीत अवसर का लाभ उठाकर आत्मा की अमरता प्राप्त करें ।
नोट-- यह आयोजन 25-07-2010 को उवाली ( करहल ) में होगा । जिसमें दो दिन पूर्व से ही दूर दूर से पधारने वाले संत आत्म ग्यान पर सतसंग करेंगे ।
विनीत -
राजीव कुलश्रेष्ठ । आगरा । पंकज अग्रवाल । मैंनपुरी । पंकज कुलश्रेष्ठ । आगरा । अजब सिंह परमार । जगनेर ( आगरा ) । राधारमण गौतम । आगरा । फ़ौरन सिंह । आगरा । रामप्रकाश राठौर । कुसुमाखेङा । भूरे बाबा उर्फ़ पागलानन्द बाबा । करहल । चेतनदास । न . जंगी मैंनपुरी । विजयदास । मैंनपुरी । बालकृष्ण श्रीवास्तव । आगरा । संजय कुलश्रेष्ठ । आगरा । रामसेवक कुलश्रेष्ठ । आगरा । चरन सिंह यादव । उवाली ( मैंनपुरी । उदयवीर सिंह यादव । उवाली ( मैंनपुरी । मुकेश यादव । उवाली । मैंनपुरी । रामवीर सिंह यादव । बुझिया का पुल । करहल । सत्यवीर सिंह यादव । बुझिया का पुल । करहल । कायम सिंह । रमेश चन्द्र । नेत्रपाल सिंह । अशोक कुमार । सरवीर सिंह

13 जुलाई 2010

नग्नता और सम्भोग

कुछ लोग जो प्रेत आवाहन की क्रियाओं के बारे में जानकारी रखते हैं । उनका मानना है कि प्रेत आवाहन के लिये स्त्री या पुरुष का नग्न अवस्था में होना आवश्यक नहीं होता ? 
दूसरे इस तरह वर्णन भी उन्हें अविश्वसनीय लगता है ।
अलौकिक ज्ञान को लेकर प्रत्येक साधक का स्तर और तरीका एक ही विषय में एकदम भिन्न होता है । लेकिन जो लोग नग्नता या सम्भोग पर विशेष परिस्थितियों में भी आपत्ति समझते हैं । उनके लिये हमारे जीवन के ही कुछ खास पहलू हैं ।
कोई भी स्त्री पुरुष हो । अगर डाक्टर से कुछ खास किस्म के चेकअप कराने होते हैं तो वहाँ ‘नग्न’ होना ही पङता है । इसी प्रकार प्रेत आवाहन क्रिया एक प्रकार की डाक्टरी ही है ।
नग्नता की एक दूसरी जरूरत ये भी होती है कि जब भी कोई प्रेतपीङा से ग्रसित हो जाता है तो प्रेत पूरे शरीर पर प्रभावी होता है । इस स्थिति में अभिमन्त्रित धुंआ फ़ेंकने और अन्य क्रियाओं द्वारा वह पूर्णतया मुक्त हो जाता है ।
एक छोटा सा उदाहरण समझें कि जब स्टीम बाथ लेते हैं । उस स्थिति में कपङे पहनकर क्या पूरा लाभ उठा सकते हैं ?
दूसरा उदाहरण, आजकल बाडी मसाज का काफ़ी चलन है तो जब कोई स्त्री, पुरुष गैर मर्द या स्त्री से मसाज कराते हैं तो क्या वो पूरे कपङे पहनकर मसाज का लाभ उठा सकते हैं । इसी तरह सी बीच पर लेटकर सूर्य की धूप लेने के लिये मात्र चढ्ढी आदि ही पहनते हैं । नहाते हैं तो नग्न होकर नहाते हैं । बहुत से स्त्री पुरुष नग्न अवस्था में रात को सोते हैं । ऐसे उदाहरणों पर किसी के पास  तर्क है कि आखिर नग्नता क्यों जरूरी है ?

महाभारत काल में (जब) हस्तिनापुर की गद्दी के लिये वारिस की समस्या आन पङी । क्योंकि उस समय जो शासक था वो संतान पैदा करने में अक्षम था । तब महारानी द्वारा महाभारत आदि कई धार्मिक ग्रन्थों के रचयिता श्री वेदव्यास जी से आग्रह किया गया कि वो ‘वंशबेल’ को बढ़ाने में योगदान करें ।
‘नियोग पद्धित’ के जानकार व्यास ने कहा - रानियाँ पूर्णतः नग्न अवस्था में मेरे सामने से गुजर जायें । महारानी ने दोनों रानियों और एक दासी को इसके लिये तैयार किया । दासी इसलिये शामिल कर ली कि रानियों से कोई गङबङ हो जाय तो दासी पुत्र को गुपचुप रूप से तैयार कर लिया जायेगा ।
रानियों को यह बात बेहद अटपटी और नागवार लगी । इसलिये एक रानी ने शर्म की वजह से अपने चेहरे को लम्बे बालों से ढक लिया । आँखे बन्द हो जाने से इस रानी के जन्मांध धृतराष्ट्र पैदा हुये ।
दूसरी रानी ने शर्म की वजह से अपने पूरे शरीर पर ‘पङुआ’ (पीली) मिट्टी का लेप कर लिया । इस रानी के गर्भ से ‘पांडु’ पैदा हुये । जो जन्म से ही पान्डु रोग यानी पीलिया से पीङित थे ।
दासी बेचारी आज्ञा मानने को बेबस थी । इसलिये वो और कुछ तो नहीं कर पायी पर मुँह ही मुँह में बुदबुदाते हुये ‘बुदुर बुदुर’ करते हुये निकली । 
दासी के इसी तरह बुदबुदाते रहने वाले ‘विदुर’ पैदा हुये । उनका नाम ही इसीलिये विदुर पङा ।
इससे सिद्ध होता है कि इलाज में जिस स्थान पर कमी हो गयी वहीं विकार हो गया ।
महाभारत से ही एक और उदाहरण - महाभारत का युद्ध समाप्त होने के कगार पर था और कौरवों में केवल दुर्योधन शेष था । तब उसकी माता गांधारी ने ये एक ही पुत्र शेष बचा रहे । इस हेतु एक विशेष उपाय किया ।
उसने दुर्योधन से कहा कि - मैंने विवाहोपरान्त आज तक किसी को नहीं देखा । इसलिये तुम पूर्णतः नग्न होकर मेरे सामने आ जाना । तब जब मैं पट्टी खोलकर तुम्हें देखूँगी । उससे तुम्हारा शरीर वज्र के समान हो जायेगा ।
दुर्योधन ऐसा कर भी रहा था ।
किन्तु तभी श्रीकृष्ण ने सोचा - ऐसा हुआ तो सब खेल ही खराब हो जायेगा । 
उन्होंने उसकी हँसी बनाते हुये कहा  - अरे, तुमने माता की बात का गलत अर्थ लगा लिया । नग्न होने का मतलब अधोवस्त्र भी उतार देना नही है ?
दुर्योधन बातों में आ गया और उसने कमर का हिस्सा ढक लिया । 
गांधारी ने पट्टी खोली तो उसे बेहद अफ़सोस हुआ । पर अब तो जो होना था वो हो चुका । 
बाद में भीम ने गदा युद्ध में उसकी जंघा ही तोङी थी । यदि वो नग्न होता तो जंघा भी वज्र हो जाती ।
एक और बात - शुकदेव जी जब युवावस्था के प्रारम्भ में ही थे । वे तप करने को वन में चल दिये । पीछे पीछे उनके वृद्ध पिता मनाने हेतु चले । तब पिता ने देखा कि आगे एक सरोवर में नग्न स्त्रियाँ स्नान कर रही थीं । शुकदेव जी निकलते चले गये और वे स्त्रियाँ पूर्ववतः नहाती रहीं ।
पर जैसे ही उन्होंने शुकदेव के वृद्ध पिता को आते देखा । उन्होंने तेजी से कपङे पहने और बाहर आकर उन्हें प्रणाम किया । तब शुकदेव के पिता को बहुत जिज्ञासा हुयी ।
उन्होंने कहा - हे देवियों ! मेरे युवा पुत्र के सामने तुम नग्न अवस्था में ही स्नान करती रहीं और मुझ वृद्ध को देखते ही तुमने वस्त्र पहन लिये । इसका क्या कारण है ?
स्त्रियों ने कहा - महात्मन ! शुकदेव जी ज्ञान की उस अवस्था में पहुँच चुके हैं । जहाँ स्त्री पुरुष का भेद नहीं होता पर आपकी दृष्टि में वो भेद है ।
अक्सर देखा जाता है कि उच्च स्थिति के महात्मा जब किसी वीराने या वन आदि में होते हैं । वे दिगम्बरावस्था में रहना पसन्द करते हैं । परमात्मा से मिलने हेतु साधक को पूर्णतः आवरण रहित होना होना पङता है । लेकिन यहाँ इसका अर्थ मात्र नग्नता ही नहीं बल्कि सभी विकार आवरणों को त्यागना है ।
विश्व में कुछ स्थानों पर न्यूडिस्ट सिटी, न्यूडिस्ट सोसाइटी, न्यूडिस्ट पीपुल जैसी अनेक संस्थायें हैं । जिनसे जुङे लोग नियमानुसार अपने उस परिवेश में नग्न ही रहते हैं । प्रमाण हेतु ये शब्द ‘गूगल’ में टायप कर सर्च करें ।
जहाँ तक ‘सम्भोग’ की बात है । सम्भोग शब्द आते ही एकदम स्त्री पुरुष की कामक्रीङा का दृश्य सामने आता है । क्या वास्तव में सम्भोग का अर्थ इतना ही है ?
वास्तव में तो संभोग का अर्थ इससे कहीं बहुत व्यापक है । भूख लगने पर भूख और भोजन का सम्भोग, प्यास लगने पर प्यास और पानी का सम्भोग, कोई रोग हो जाने पर रोग और औषधि का सम्भोग । यह सब सम्भोग ही हैं ।
प्रकृति (नारी) पुरुष (चेतन) से निरंतर संभोगरत है । इसी से प्रकृति में हर क्षण बदलाव और नया निर्माण होता रहता है ।
सम्भोग क्या है ? निरंतर होती हुयी क्रिया में जब कोई ‘क्षुधा’ जैसी आवश्यकता उत्पन्न होती है । उसकी पूर्ति करना ही सम्भोग है ।
ओशो रजनीश ने ‘सम्भोग से समाधि’ बताया है । इसका भी अर्थ बहुत लोग ये लगा लेते हैं कि अधिक स्त्री या पुरुष सेवन (विपरीत लिंगी) से समाधि को प्राप्त किया जा सकता है । ओशो ने कोई अनोखी बात नहीं कही । शास्त्र भरा पङा है इस बात से ।
पर इसका अर्थ वह नहीं हैं जो अक्सर लोग समझते हैं । इसका वास्तविक अर्थ है ,भोगों का इस तरह से व्यवहार करना कि आपकी आवश्यकता भी पूर्ति हो जाय और भोग आप पर कोई प्रभाव भी न छोङें । आसक्ति रहित उपभोग ।

यानी भोगों में सम स्थिति को प्राप्त करना, भोगों को सम दृष्टि से देखना, भोगों को आवश्यकता अनुसार भोगना और तदुपरान्त भोगों से नीरस हो जाना ही वास्तविक सम्भोग है ।

12 जुलाई 2010

शब्दों में छुपा रहस्य..?

आईये आज शब्दों में छुपे रहस्य की बात करते हैं । मैंने अपने पिछले कुछ लेखों में भी इस बात का जिक्र किया है । कि शब्दों को यदि हम ध्यान से देखें तो बहुत से प्रकृति के रहस्य खुलने लगते हैं । और यदि हमशब्दों की प्रकृति या धातु को जानने लगें । तो फ़िर कहने ही क्या हैं ? आज में आपको बिलकुल शुरुआत में ले चलता हूँ । इन शब्दों को देखें ।( रज । वीर्य ।)( स्त्री ।मनुष्य ।)( पुरुष । प्रकृति ।) ये प्रत्येक जोङा एक ही अर्थ को बताता है । जैसे किसी भी चीज का रहस्य जानने के किये हमें उसका पोस्टमार्टम करना आवश्यक होता है । शब्दों पर भी यही बात लागू होती है । पहले रज । वीर्य को लेते हैं । रज । धूल या मिट्टी को कहते हैं । स्त्री रज और पुरुष वीर्य के संयोग से बच्चे का जन्म होता है । वीर्य को सामान्य भाषामें बीरज या बीज भी कहते हैं । जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि रहस्य जानने के लिये शब्द का पोस्टमार्टम करना होगा । अब वीर्य को लें । वीर्य को वीर । य । इस तरह कर लें । रज तो पहले ही अलग है । वीर । य । का अर्थ हुआ । ये । चेतन । यानी चेतन का कारण बीज । रज यानी मिट्टी यानी जङ प्रकृति से संयोग होने के कारण सृष्टि में परिवर्तन हो रहें हैं ।रज में भी र चेतन और ज जङ है । यानी आत्मा जो ऊर्जा का अक्षय स्रोत है ।( इसको मुख्य विधुत केन्द्र मान लें ) र जो इस तरह का करेंट बनाता है। र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र तो र एक ट्रांसफ़ार्मर का काम करता है । तो मुख्य लाइन । फ़िर र ट्रान्सफ़ार्मर और ज
जङ प्रकृति या वो उपकरण । जिसमें करेंट प्रवाहित होकर उसे एक्टिव बनाता है । सृष्टि का पूरा सिस्टम इसी नियम पर आधारित है । तो वीर्य र ( चेतन ) होकर ज ( जङ ) में मिला । और नया निर्माण होने लगा ।हांलाकि साधारण अवस्था में इसको समझना थोङा कठिन है । पर प्रयास करने से कुछ तो समझ में आयेगा ही । अब स्त्री और मनुष्य को लें । स्त्री । इस । तरी । यानी इस और त्र यानी तीन गुणों वाली सृष्टि । मनुष्य । मन । उस । य । यानी आत्मा के मन से संयुक्त होने से ये सब । ये मनुष्य का वास्तविक अर्थ है । यानी आत्मा जब मन से संयुक्त होकर सत रज तम इन तीन गुणों के द्वारा क्रीङा करता है । ये स्त्री पुरुष है । अब पुरुष और प्रकृति को लें । पुरुष । पुर । उस । पुर यानी पूरना । उस यानी आत्मा या चेतन द्वारा । प्रकृति । पर । करती । यानी आत्मा के द्वारा पूरने पर ये प्रकृति पर आश्रित होकर अपना कार्य कर रही है । अन्यथा तो ये जङ है । यानी इसमें चेतन से हरकत या हलचल हो रही है । इसकी अपनी सामर्थ्य नहीं है । वास्तव में पुरुष का । प । उर । उस । इस तरह भी किया जा सकता है । पर ये अत्यधिक गूढ है । सिया राम में सब जग जानी । ये यही तो बात कही जा रही है । सिया या सीना ( सिलाई ) इसी से बना है । राम तीन गुणों की प्रकृति के साथ स्वांसों की सिलाई द्वारा जङ प्रकृति को पूरित कर रहा है । शास्त्र में लिखा है । कि प्रकृति पुरुष से निरंतर " सम्भोग " कर रही है । इसका यही अर्थ है । कुछ ग्यानियों ने कह दिया कि वो पुरुष का उद्धार कर रही है । वास्तव में इसको " रगङ " के रूप में देखें तो तो बात सही लगती है । लेकिन जङ प्रकृति चेतन का उद्धार कैसे कर सकती है ? जबकि चेतन तो स्वयं निर्लेप है । उसमें बिगाङ होता ही नहीं । लेकिन जीव संयुक्त हो जाने पर ये बात सही हो जाती है । जीव तो आवरण में आ जाता है । इसी हेतु शास्त्रों में जगह जगह नारी को पुरुष के अधीन बताया गया है । जो कि रूपक है । और वास्तव में नारी में प्रकृति के गुण अधिक होते हैं । इसलिये ग्यानियों ने इससे बचने की सलाह दे । क्योंकि अपनी ही बनायी हुयी प्रकृति में खोकर ये ( आत्मा ) अपनी पहचान भूल गया । इसी को कबीर ने कहा है । कि नय्या में नदिया डूबी जाय । तमाशा देखने वाले तमाशा हो नहीं जाना । तो सत्य यही है कि तमाशा बनाकर तमाशा देखने वाला आज इस स्थिति में पहुँच गया कि खुद तमाशा हो गया । इसी लिये संत कहते हैं । चेत । चेत । जिस तमाशे में तू भरमा हुआ है । वह तमाशा तेरे ही द्वारा बनाया गया है । पर ये " माया " के खेल में ऐसा खो गया । कि अपना पता भी नहीं जानना चाहता कि " आखिर मैं हूँ कौन " जो इस तरह पाप पुण्य की चक्की में पिस रहा हूँ ।
चलती चाकी देखकर । दिया कबीरा रोय । दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय । ये दो पाट पाप और पुण्य ही तो है । जिनमें जीव समय रूपी चक्की में पिस रहा है । इस सबसे आपको थोङे संकेत अवश्य मिल सकते हैं । पर असली बात और सही ग्यान उच्चतम साधकों को ही समझ में आ सकता है । इसलिये मैंने सरलता से समझाने की कोशिश की है । एक बात ये भी है । कि ऊपर लिखी बातों को मोटे तौर पर मैंने समझाया है । इनके गूढ अर्थ तो बेहद रहस्यमय और विस्तार वाले हैं । जो जन सामान्य के लिये वर्जित भी हैं और इतनी आसानी से समझ में आने वाले भी नहीं हैं ।

08 जुलाई 2010

संन्यास को घर घर में पहुंचाने का मेरा खयाल है ।

इधर अभी मनाली शिविर में 20 लोगों ने 1 नये प्रकार के संन्यास में प्रवेश किया है । उस संबंध में रोज पूछा जा रहा है कि - वह संन्यास क्या है ? वह मैं आपसे कहूं । 2-3  बातें संक्षिप्त में । पहली बात तो यह कि संन्यास जैसा आज तक दुनिया में था । अब भविष्य में उसके बचने की कोई संभावना नहीं है । वह नहीं बच सकेगा । सोवियत रूस में आज संन्यासी होना संभव नहीं है । चीन में संन्यासी होना अब संभव नहीं है । और जहां जहां समाजवाद प्रभावी होगा । वहां वहां संन्यास असंभव हो जाएगा । जहां भी यह खयाल पैदा हो जाएगा कि जो आदमी कुछ भी नहीं करता है । उसे खाने का हक नहीं है । वहां संन्यास मुश्किल हो जाएगा । आने वाले 50 वर्षों में दुनिया में बहुत सी संन्यास की परंपराएं एकदम विदा हो जाएंगी । चीन में बड़ी बौद्ध परंपरा थी संन्यास की । वह एकदम विदा हो गई । तिब्बत से लामा विदा हो रहे हैं । वे बच नहीं सकते । रूस में भी बहुत पुराने ईसाई फकीरों की परंपरा थी । वह नष्ट हो गई । और दुनिया में कहीं भी बचना मुश्किल है । इसलिए मेरी अपनी दृष्टि यह है कि संन्यास जैसा कीमती फूल नष्ट नहीं होना चाहिए । संन्यास की संस्था चाहे विदा हो जाए । लेकिन संन्यास विदा नहीं होना चाहिए । तो उसे बचाने का 1 ही उपाय है । और वह उपाय यह है कि संन्यासी जिंदगी को छोड़कर न भागे । जिंदगी के बीच संन्यासी हो जाए । दुकान पर बैठे । मजदूरी करे । दफ्तर में काम करे । भागे न । उसकी आजीविका समाज के ऊपर निर्भर न हो । वह जहां है । जैसा है । वहीं संन्यासी हो जाए । तो इन 20 संन्यासियों को इस दिशा में प्रवृत्त किया है कि वे अपने दफ्तर में काम करेंगे । अपने स्कूल में नौकरी करेंगे । अपनी दुकान पर बैठेंगे । और संन्यासी का जीवन जीएंगे । इसका परिणाम दोहरा होगा । 1 तो इसका परिणाम यह होगा कि संन्यासी शोषक नहीं मालूम होगा । वह किसी के ऊपर निर्भर है । ऐसा नहीं मालूम होगा । संन्यासी को भी इससे लाभ होगा । क्योंकि जो संन्यास की परंपरा समाज पर निर्भर हो जाती है । वह गुलाम हो जाती है । हमें पता चले । या न चले । वह समाज की गुलामी में जीने लगती  है। और जिनको हम रोटी देते हैं । उनसे हम आत्मा भी खरीद लेते हैं । इसलिए संन्यासी आमतौर से विद्रोही होना चाहिए । लेकिन हो नहीं पाता । क्योंकि वह जिनसे भोजन पाता है । उनकी गुलामी में उसे समय बिताना पड़ता है । वह वही बातें कहता रहता है । जो आपको प्रीतिकर हैं । क्योंकि आप उसको रोटी देते हैं ।
संन्यास 1 क्रांतिकारी घटना है । उसके लिए जरूरी है कि व्यक्ति भीतरी रूप से । आर्थिक रूप से । अपने ही ऊपर निर्भर हो । तो 1 तो संन्यास को घर घर में पहुंचाने का मेरा खयाल है । इसका दूसरा गहरा परिणाम यह होगा कि जब संन्यासी घरों को छोड़कर भाग जाता है । तो संन्यासी से जो फायदा संसार को होना चाहिए । वह नहीं हो पाता । अच्छे लोग जब संसार छोड़ देते हैं । तो संसार बुरे लोगों के हाथ में पड़ जाता है । इससे नुकसान हुआ है । मैं मानता हूं कि किसी आदमी की जिंदगी में अच्छाई का फूल खिले । तो उसे ठेठ बाजार में बैठा होना चाहिए कि उसकी सुगंध बाजार में फैलनी शुरू हो । अन्यथा वह तो भाग जाएगा । दुर्गंध फैलाने वाले जम कर बैठे रहेंगे । तो संन्यासी को घर घर में । वह वेश परिवर्तन कर ले । वह अपनी सारी वृत्तियों को परमात्मा की ओर लगा दे । लेकिन छोड़कर न भागे । बल्कि अब, जिस घर का काम कल तक वह सोचता था - मैं कर रहा हूं । अब परमात्मा का उपकरण बनकर उस घर का काम किए चला जाए । न पत्नी को छोड़े । न बच्चों को छोड़े । न घर को छोड़े । अब यह सारे काम को परमात्मा का काम समझ कर चुपचाप करता चला जाए । इसका कर्ता न रह जाए । बस इसका द्रष्टा भर रह जाए । ऐसे संन्यास की प्रक्रिया से, मैं सोचता हूं । 1 तो लाखों लोग उत्सुक हो सकेंगे । जो कभी घर छोड़ने का विचार नहीं कर पाते हैं । उनकी जिंदगी में भी संन्यास का आनंद आ सकेगा । और यह जिंदगी भी प्रफुल्लित होगी । अगर हमें सड़कों पर । बाजारों में । मकानों में । दफ्तरों में संन्यासी उपलब्ध होने लगे । उसके कपड़े । उसकी स्मृति । उसकी हवा । उसका व्यवहार । वह सारी जिंदगी को प्रभावित करेगा । इस दृष्टि से जो लोग भी बारबार पूछ रहे हैं । वे अगर उत्सुक हों । तो आज 3 से 4 वे मुझसे अलग से बात कर लें । जिन्हें संन्यास का खयाल हो कि उनकी जिंदगी में यह संभावना बने । इस संन्यास में मैंने 2-3  बातें और संयुक्त की हैं । 1 तो इस संन्यास को पीरियाडिकल रिनंसिएशन कहा है । सावधि संन्यास कहा है । मेरा मानना है । किसी आदमी को भी जिंदगी भर के निर्णय नहीं लेने चाहिए । आज आप निर्णय लेते हैं । हो सकता है । 6 महीने बाद आपको लगे कि गलती हो गई । तो आपके वापस लौटने का उपाय होना चाहिए । अन्यथा संन्यास भी बोझ हो सकता है । जब हम 1 दफे 1 आदमी को संन्यास दे देते हैं । तो आग्रह रखते हैं कि वह जिंदगी भर संन्यासी रहे । हो सकता है । साल भर बाद उसे लगे कि यह गलती हो गई है । तो उसे वापस लौटने का अधिकार होना चाहिए । बिना निंदा के । इसलिए यह जो मेरा । जिसे मैंने संन्यास कहा है । पीरियाडिकल है । आप जिस दिन भी चाहें । वापस चुपचाप लौट जा सकते हैं । कोई आपके ऊपर इसका बंधन नहीं होगा । थाईलैंड और बर्मा में इस तरह के संन्यास का प्रयोग प्रचलित है । और उससे थाईलैंड और बर्मा की जिंदगी में फर्क पड़ा है । हर आदमी थोड़े बहुत दिन के लिए संन्यास तो 1 दफे ले ही लेता है । किसी आदमी को वर्ष में 2 महीने की फुरसत होती है । तो 2 महीने संन्यास ले लेता है । और 2 महीने संन्यासी की तरह जीकर वापस अपने घर की दुनिया में लौट आता है । आदमी बदल जाता है । 2 महीने संन्यासी रहने के बाद आदमी वही नहीं हो सकता । जो था । उसके भीतर का सब बदल जाता है । फिर वर्ष, 2 वर्ष के बाद उसे सुविधा होती है । 2 महीने के लिए संन्यास ले लेता है । इसलिए दूसरी भी दिशा मैंने इसमें जोड़ी है कि जो लोग कुछ सीमित समय के लिए संन्यास लेना चाहें । वे सीमित समय के लिए संन्यास लेकर प्रयोग करें । अगर उनका आनंद बढ़ता जाए । तो समय को बढ़ा लें । अगर उन्हें ऐसा लगे कि नहीं । वह उनकी बात नहीं है । तो चुपचाप वापस लौट आएं । इससे दोहरे फायदे होंगे । संन्यास बंधन नहीं बनेगा । संन्यास स्वतंत्रता है । इसलिए बंधन बनना नहीं चाहिए । अभी हमारा संन्यासी बिलकुल बंधा हुआ कैदी हो जाता है । और दूसरी बात - संन्यास बंधन नहीं बनेगा । 1 - और दूसरी बात कि संन्यास प्रत्येक के लिए । चाहे थोड़े समय के लिए ही सही । उपलब्ध हो जाएगा । और अगर 1 आदमी अपने 70 साल की जिंदगी में 5 दफा 2-2  महीने के लिए भी संन्यासी हो गया हो । तो मरते वक्त दूसरा आदमी होगा । वह वही आदमी नहीं हो सकता । अधिकतम लोगों को संन्यासी होने का मौका मिल जाएगा । अधिकतम लोग संन्यास का रस और आनंद अनुभव कर सकेंगे । और मेरा मानना है कि जो 1 दफे संन्यास में जाएगा । वह वापस लौटेगा नहीं । यह न लौटना नियम से नहीं होना चाहिए । यह न लौटना संन्यास के आनंद से होना चाहिए । लेकिन लौटने की स्वतंत्रता कायम रहनी चाहिए । इस संबंध में अभी ज्यादा बात करनी उचित नहीं होगी । जिन मित्रों को संन्यास की दिशा में उत्सुकता हो । वे दोपहर 3 से 4 मुझे मिल ले सकते हैं । ओशो
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अहंकार हार को स्वीकार नहीं करने देता । और उसी कारण हम बुरी तरह हार जाते हैं । जो हार को स्वीकार कर लेता है । उसकी तो जीत शुरू हो गयी । कहते हैं न - हारे को हरिनाम । जिसने हार को अंगीकार कर लिया । उसके जीवन में तो हरि उतरना शुरू हो जाता है । संसार में जीत तो होती ही नहीं । हार ही होती है । जीत हो ही नहीं सकती । जीत संसार का स्वभाव नहीं है । वह छोटी मोटी जीत । जो तुम्हें दिखायी पड़ती है । बड़ी हारों की तैयारी है । और कुछ भी नहीं । वह वैसे ही है । जैसे जुआरी जुआ खेलने जाता है । कभी कभी जीत भी जाता है । वह जीत सिर्फ बड़ी हार के लिए आकर्षण है ।
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भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता धन्य है । इस मित्रता ने मानव जाति को 1 खूबसूरत सन्देश दिया है । सुदामा ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा - प्रभु मित्रता का मतलब क्या होता है ? तो भगवान ने हंसकर कहा - अरे सुदामा जहाँ मतलब होता है । वहाँ मित्रता कहाँ होती है ।
- देखि सुदामा की दीन दशा करुणा करके करूणानिधि रोये । पानी परात को हाथ छुओ ना नैनन के जल सों पग धोये । जय श्रीकृष्ण
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भगवान बुद्ध जिसे धम्म कहते हैं । वह धर्म/मजहब या रिलीजिन से सर्वथा अलग है । जहाँ मजहब या रिलीजन व्यक्तिगत चीज है । वही दूसरी ओर धम्म 1 सामाजिक वस्तु है । वह प्रधान रुप से और आवश्यक रुप से सामाजिक है । धम्म का मतलब है - सदाचरण । जिसका अर्थ है । जीवन के सभी क्षेत्रों में 1 आदमी का दूसरे आदमी के प्रति अच्छा व्यवहार । इससे स्पष्ट है कि यदि कही परस्पर 2 आदमी भी साथ रहते हों । तो चाहे न चाहे उन्हें धम्म के लिये जगह बनानी
पडेगी । दोनों में से 1 भी बचकर नही जा सकता । जबकि यदि कही 1 आदमी अकेला हो । तो उसे किसी धर्म की आवश्यकता नहीं । धम्म की नहीं । ये तो जनसंख्या नियंत्रण और व्यस्था के नियम होते
हैं । धम्म क्या है ? धम्म की आवश्यकता क्यों है ? भगवान बुद्ध के अनुसार धम्म के 2 प्रधान तत्व हैं - प्रज्ञा और करुणा । प्रज्ञा का अर्थ है - बुद्धि ( निर्मल बुद्धि या विवेक ) भगवान बुद्ध ने प्रज्ञा को अपने धर्म के 2 स्तम्भों में से 1 माना है । क्योंकि वह नही चाहते थे कि मिथ्या विश्वासों के लिये कोई जगह बचे । करुणा क्या है ? और किसके लिये ? करुंणा का अर्थ है - दया, प्रेम और मैत्री । इसके बगैर न तो समाज जीवित रह सकता है । और न तो समाज की उन्नति हो
सकती है । प्रज्ञा और करुणा का अलौकिक मिश्रण ही तथागत का धम्म है । समय बुद्धा ने कहा है - धम्म क्या है ? अगर इसका 1 वाक्य में उत्तर देना हो । तो मैं यही कहूँगा कि ये ऐसा मार्ग या तरीका है । जिससे मनुष्य में ऐसी मानसिक योग्यता उत्पन्न हो जाती है । जिसके बाद वो अपनी बुद्धि को समय और परिस्थिति के हिसाब से सही इस्तेमाल करके दुखों से मुक्त जीवन जी सकता है । इतना ही नहीं । वो संसार का सर्वज्ञ न्याय कर्ता बन सकता है । बुद्ध का " धम्म " को अन्य धर्मो के समान न समझना । ये काफी अलग है । इसे श्रद्धा और भक्ति से नहीं । बुद्धि और समझ से पाओगे । ये किसी सम्प्रदाए विशेष के लिए ही नहीं है । सम्पूर्ण मानवता के लिए है । 

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