27 फ़रवरी 2014

3 चरण हैं चौथी मंजिल है

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुर्साक्षात परम ब्रह्म । तस्मै श्री गुरुवे नमः । यह सूत्र अपूर्व है । थोड़े से शब्दों में इतने राज़ों को 1 साथ रख देने की कला सदियों सदियों में निखरती है । यह सूत्र किसी 1 व्यक्ति ने निर्माण किया हो । ऐसा नहीं । अनंत काल में न मालूम कितने लोगो की जीवन चेतना से गुजर कर इस सूत्र ने यह रूप पाया होगा । इसलिये कौन इसका रचयिता है ? कहा नहीं जा सकता । यह सूत्र किसी 1 व्यक्ति का अनुदान नहीं है । सदियों के अनुभव का निचोड़ जैसे लाखों लाखों गुलाब के फूल से कोई इत्र की 1 बूंद निचोड़े । ऐसा यह अपूर्व अद्वितीय सूत्र है ।
सुना तुमने बहुत बार है । इसलिये शायद समझना भी भूल गये होओगे । यह भ्रांति होती है । जिस बात को हम बहुत बार सुन लेते हैं । लगता है । समझ गये । बिना समझे । और इस सूत्र को समझने के लिये प्रज्ञा चाहिये । बोध चाहिये । निखार चाहिये - चेतना का । ध्यान की गरिमा चाहिये । समझने की कोशिश करो ।
ईसाईयत ने परमात्मा को 3 रूप वाला कहा है । पता नहीं क्यों ? लेकिन पृथ्वी के कोने कोने में जहाँ भी धर्म का कभी भी अभ्युदय हुआ है । 3 का आंकड़ा किसी न किसी कोने से उभर ही आया है । ईसाई कहते हैं उसे - ट्रिनिटी । वह पिता रूप है । पुत्र रूप है । और दोनों के मध्य में - पवित्र आत्मा रूप है । लेकिन 3 का आंकड़ा तो ठीक पकड़ में आया । मगर 3 को जो शब्द दिये । वो बहुत बचकाने हैं । जैसे छोटा सा बच्चा परमात्मा के संबंध में सोचता हो । तो वो पिता के अर्थों में ही सोच सकता है । उसकी कल्पना उसकी मनोचेतना से बहुत दूर नहीं जा सकती । इसलिये ईसाईयत में थोड़ा बचकानापन है । उसकी धारणाओं में वह परिष्कार नहीं है ।
भारत ने भी इस 3 के आंकड़े को निखारा है । सदियों सदियों में इस पर धार रखी है । हम परमात्मा को त्रिमूर्ति कहते हैं । उसके 3 चेहरे हैं । वह तो 1 है । लेकिन उसके 3 पहलू हैं । वह तो 1 है । लेकिन उसके 3 आयाम हैं । उसके मंदिर के 3 द्वार हैं । और त्रिमूर्ति की धारणा में और विकास नहीं किया जा सकता । वह पराकाष्ठा है ।
ब्रह्मा विष्णु महेश । ये 3 परमात्मा के चेहरे हैं । ब्रह्मा का अर्थ होता है - सर्जक, सृष्टा । विष्णु का अर्थ होता है - संभालने वाला । और महेश का अर्थ होता है - विध्वंसक । यह विध्वंस की धारणा भी परमात्मा में समाविष्ट भी की जा सकती है । यह सिवाय इस देश के और कहीं भी घटी नहीं । सृष्टा तो सभी संस्कृतियों ने उसे कहा है । लेकिन विध्वंसक केवल हम कह सके ।
सृजन तो आधी बात है । 1 पहलू है । जो बनायेगा । वह मिटाने में भी समर्थ होना चाहिये । सच तो ये है । जो मिटा न सके । वह बना भी न सकेगा । जैसे कोई मूर्तिकार मूर्ति बनाये । तो मूर्ति का निर्माण ही विध्वंस से शुरू होता है । उठता है - छेनी हथोड़ी । तोड़ता है पत्थर को । अगर पत्थर में प्राण होते । तो चीखता कि - क्यों मुझे तोड़ते हो । यूं टूट टूट करके पत्थर में से प्रतिमा प्रकट होती है । बुद्ध की । महावीर की । कृष्ण की । विध्वंस के बिना सृजन नहीं है । और जो चीज़ भी बनेगी । उसे मिटना भी होगा । क्योंकि बनने की घटना समय में घटती है । और समय में शाश्वत कुछ भी नहीं हो सकता ।
जो बना है । उसे मिटना ही होगा । होने में 1 तरह की थकान है । हर चीज़ थक जाती है । यह जानकार तुम चकित होगे कि आधुनिक विज्ञान कहता है कि धातुयें भी थक जाती हैं ।
सर जगदीश चन्द्र बसु की बहुत सी खोजों में 1 खोज यह भी थी । जिन पर उनको नोबल पुरस्कार मिला था कि धातुयें भी थक जाती हैं । जैसे कलम से तुम लिखते हो । तो तुम्हारा हाथ ही नहीं थकता । कलम भी थक जाती है । जगदीश चन्द्र बसु ने तो इसे मापने की भी व्यवस्था खोज ली थी । और अब तो जगदीश चन्द्र को हुये काफी समय हो गया । आधी सदी बीत गई । इस आधी सदी में बहुत परिष्कार हुआ है विज्ञान का । अब तो पता चला है । हर चीज़ थक जाती है । मशीने थक जाती हैं । उनको भी विश्राम चाहिये ।
विध्वंस विश्राम हैं ।
जन्म - 1 पहलू । जीवन - दूसरा पहलू । मृत्यु - तीसरा पहलू । जीवन तो थकायेगा । इसलिये मृत्यु को कभी हमने बुरे भाव से नहीं देखा । हमने यम को भी देवता कहा । हमने उसे भी शैतान नहीं कहा । वह भी दिव्य है । मृत्यु भी दिव्य है । हम लेकिन अकेले हैं । जिन्होंने यह बात पहचानी थी कि जीवन मूल्यवान है । जन्म मूल्यवान है । मृत्यु भी मूल्यवान है । और तीनो को दिव्य कहा । परमात्मा के 3 रूप कहा ।
ब्रह्मा विष्णु महेश । ये जानकार तुम चकित होओगे कि भारत में पूरे भारत में ब्रह्मा को समर्पित केवल 1 मंदिर हैं । यह बात महत्वपूर्ण है । क्योंकि ब्रह्मा का काम तो हो चुका । ये तो प्रतीक रूप से 1 मंदिर समर्पित कर दिया । यूं ब्रह्मा का काम पूरा हो चुका । हाँ विष्णु के बहुत मंदिर हैं । सारे अवतार विष्णु के है - राम, कृष्ण, बुद्ध, परशुराम । ये सब विष्णु के अवतार हैं । इनमें कोई भी ब्रह्मा का अवतार नहीं है । ये संभालने वाले हैं । जैसे घर में कोई बीमार हो । तो डॉक्टर को बुलाना पड़ता है । ऐसे आदमी बीमार है । तो जीवन के विराट स्रोत से चिकित्सक पैदा होते रहें । 
बुद्ध ने कहा है कि - मैं वैद्य हूं । विद्वान नहीं । और नानक ने भी कहा है कि - मैं वैद्य हूं । मेरा काम है । तुम्हारे जीवन को रोगों से मुक्त कर देना । तुम्हारे जीवन को स्वास्थ्य दे देना । तुम्हें जीवन जीने की जो कला है । उसे दिखा देना । तो विष्णु के बहुत मंदिर हैं । राम का मंदिर हो कि कृष्ण का मंदिर हो कि बुद्ध का मंदिर हो । सब विष्णु के मंदिर हैं । ये सब विष्णु के अवतार हैं । विष्णु का काम बड़ा है । क्योंकि जन्म 1 क्षण में घट जाता है । मृत्यु भी 1 क्षण में घट जाती हैं । जीवन तो वर्षों लम्बा होता है । और तीसरी बात भी ख्याल रखना कि विष्णु से भी ज्यादा मंदिर शिव के हैं । महेश के है । इतने मंदिर हैं कि मंदिर बनाना भी हमें बंद करना पड़ा । अब तो कहीं भी 1 शंकर की पिंडी रख दी - झाड़ के नीचे । मंदिर बन गया । कहीं से भी गोल मटोल शंकर को ढूंढ़ लाये । बिठा दिया । 2 फूल चढ़ा दिये । फूल भी कितने चढाओगे । इसलिए शंकर पर पत्तियां ही चढ़ा देते हैं - वेल पत्री । फूल भी कहाँ से लाओगे । इतने शंकर के मंदिर हैं । हर झाड़ के नीचे । गांव गांव में । ये प्रतीक उपयोगी हैं । जन्म हो चुका । सृष्टि हो चुकी । ब्रह्मा का काम निपट गया ।
जीवन चल रहा है । इसलिये विष्णु का काम जारी है । लेकिन बड़ा काम तो होने को है । वह महेश का है । वह है । जीवन को फिर से निमज्जित कर देना । असृष्टि । जीवन को विसर्जित कर देना ।
महाप्रलय । जिसमें कि सब खो जायेगा । और फिर सब जागेगा । ताज़ा होके जागेगा । हम निद्रा को भी छोटी मृत्यु कहते हैं । उसका भी कारण यही है कि प्रति रात्रि जब तुम गहरी निद्रा में होते हो । तो छोटी सी मृत्यु घटती है । छोटी सी आणविक । जब चित्त विल्कुल शून्य हो जाता है - निर्विचार । इतना निर्विचार कि स्वप्न की झलक भी नहीं रह जाती । तब तुम कहाँ चले जाते हो ? तब तुम मृत्यु में लीन हो जाते हो । तुम वहीँ पहुंच जाते हो । जहाँ लोग मरकर पहुँचते हैं ।
सुषुप्ति छोटी सी मृत्यु है । इसलिये तो सुबह तुम ताज़े मालुम पड़ते हो । वो ताजगी रात तुम जो मरे । उसके कारण होती है । सुबह तुम जो प्रसन्न उठते हो । जो प्रमुदित झलक होती है । फिर जीवन में रस आ गया होता है । फिर पैरों में गति आ गई होती है । फिर तुम काम धाम के लिये तत्पर हो गये होते हो । वो इसीलिये कि रात तुम मर गये ।
सुषुप्ति स्वप्न रहित निद्रा । अगर सिर्फ आधा घड़ी को भी रात मिल जाये । तो पर्याप्त है । तुम्हें 24 घंटे के लिये ताज़ा कर जाती । रात वृक्ष भी सो जाते । तभी तो सुबह उनके फूल फिर खिल आते हैं । फिर सुंगंध उड़ने लगती है । रात पक्षी भी सो जाते । तभी तो सुबह उनके कंठो से फिर गीत झरने लगते हैं । उन गीतों को मैं साधारण गीत नहीं कहता । श्रीमद भगवत गीता कहता हूं । वे वही गीत हैं । जो कृष्ण के गीत हैं । उनके कंठो से क़ुरआन की आयते उठने लगती हैं । लेकिन ये सारा चमत्कार घटता है । रात छोटी सी मृत्यु के कारण ।
तुम देखते हो । छोटे बच्चे पैदा होते हैं । उनकी सरलता उनका सौंदर्य उनकी सौम्यता उनका प्रसाद । ये कहाँ से आया ? ये भी वूढ़े थे । मर गये । फिर पुनर्जीवित हुये हैं । धर्म जीते जी मरने की । और पुनर्जीवित होने की कला है । इसलिये गुरु को हमने तीनो नाम दिये - ब्रह्मा विष्णु महेश । ब्रह्मा का अर्थ है - जो बनाये । विष्णु का अर्थ है - जो संभाले । और महेश का अर्थ है - जो मिटाये ।
सदगुरु वही है । जो तीनो कलाएं जानता हो । स्रष्टि तो 1 अवसर है । मंच है । जिस पर तुम जीने के अभिनय की कला सीखो । और यूं जियो । जैसे कमल के पत्ते पानी में । पानी में और पानी छुये भी न । सदगुरु तुम्हें यही सिखाता है । और ये 3 घटनाएं सदगुरु के पास घट जायें । तो चौथी घटना तुम्हारे भीतर घटती है । इसलिये उस चौथे को भी हमने गुरु स्मरण में कहा है - गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः ।
ये तो 3 चरण हुये । फिर जो अनुभूति तुम्हारे भीतर इन 3 चरणों से होगी । ये तो 3 द्वार हुए । इनसे प्रवेश करके मंदिर की जो प्रतिमा का मिलन होगा । वो चौथा तुरीय है - चौथी अवस्था ।
गुरुर्साक्षात परम ब्रह्म - तब तुम जानोगे । जिसके पास तुम बैठे थे । वो कोई व्यक्ति नहीं था । जिसने संभाला । मारा । पीटा । तोडा । जगाया । वो कोई व्यक्ति नहीं था । वह तो था ही नहीं । उसके भीतर परमात्मा ही था । और जिस दिन तुम अपने गुरु के भीतर परमात्मा को देख लोगे । उस दिन अपने भीतर भी परमात्मा को देख लोगे । क्योंकि गुरु तो दर्पण है । उसमें तुम्हे अपनी ही झलक दिखाई पड़ जायेगी । आँख निर्मल हुई कि झलक दिखाई पड़ी । 3 चरण हैं । चौथी मंजिल है । और सदगुरु के पास चारो कदम पूरे हो जाते हैं ।
तस्मै श्री गुरुवे नमः। इसलिये गुरु को नमस्कार । इसलिये गुरु को नमन । इसलिये झुकते हैं उसके लिये ।

21 फ़रवरी 2014

काल को जरा भी दया नहीं है

ये परेशानी अक्सर लोगों को हो जाती है । जिसका आधुनिक ऐलोपैथी आदि चिकित्सा में कोई निदान नहीं है । और न ही आयुर्वेद आदि में कोई औषधीय निदान तुरन्त लाभ हेतु है । ये सामान्य सी परेशानी इतनी खतरनाक है कि पीङित मिनट मिनट पर शौच हेतु भागता है । और कुछ खा पी भी नहीं सकता । हालांकि खुद के व्यक्तिगत अनुभव में मैं इसे बहुत सरलता से स्वयं ( निम्न विधि से नहीं ) ही उंगलियों के मध्यम दबाव और घुमाव से सही कर लेता हूँ । पर वह, शायद सब न कर पायें । लेकिन निम्न विधि का हमारे चिन्ताहरण आश्रम में कई जानकार खूब प्रयोग करते हैं । क्योंकि ये सादा और सरल है । औषधि नहीं । जो रियेक्शन का खतरा हो । अतः जनहितार्थ इसको साझा किया है ।
नाभि का टल जाना ( धरण पड़ना ) लेटकर नाभि को दबाकर महसूस करें । तो छोटी सी गेंद जैसी कोई चीज़ धड़कती महसूस होती है । यदि ये धड़कन ठीक नाभि के नीचे हो । तो सही मानी जाती है । यदि इधर उधर हो । तो कब्ज़, दस्त की शिकायत होती है । नाभि हमारे शरीर की 72000 नाड़ियों का संगम है । इसी कारण सारा शरीर प्रभावित होता है । धरण ठीक करने के सैकड़ों तरीके सदियों से प्रभावी रूप में प्रचलित हैं । जिनमें से सबसे आसन तरीका बता रहे हैं । जो तुरंत परिणाम देता है । धरण जांचने का तरीका ये है कि - अपने दोनों हाथों की रेखाएं मिलाकर छोटी उंगली की

लम्बाई चैक करें । अंतर दिखने पर धरण की पुष्टि होती है । तब पीठ के बल लेट जाएं । दोनों पैरों को 90 डिगरी एंगल पर जोड़ें । आप देखेंगे कि 1 पैर छोटा है । 1 बड़ा है । ये टली नाभि जांचने के तरीके हैं । पुष्टि होने पर इसे ठीक करने के लिए । छोटे पैर की टांग को धीरे धीरे ऊपर उठायें । 6-7-8-9  इंच तक उठायें । फिर धीरे धीरे ही नीचे रखकर लम्बा सांस लें । यही क्रिया 2 बार और करें । ये क्रिया सुबह शाम ख़ाली पेट करनी चाहिए । पैरों को फिर मिलाकर देखें । दोनों अंगूठे बराबर दिखेंगे । यानी आपकी नाभि सही जगह पर बैठ गयी है । फिर उठकर 20 ग्राम गुङ 20 ग्राम सौंफ का बनाया चूरन फांक लें - पानी से । इससे पुरानी से पुरानी धरण आप खुद महीना 2 महीने में ठीक कर सकते है । पेट को कभी भी मसलवाना नहीं चाहिए ।
साभार - आर्यावर्त भरतखण्ड संस्कृति ।
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समस्या से समाधान की ओर - समस्याओं से दूर भागने के कारण ही हम दुखी रहते हैं । त्वरित समाधान पाने के बजाय यदि हम समस्याओं के भीतर उतरें । तो समाधान हमारे सामने होगा । हम सभी अपनी समस्याओं के त्वरित समाधान चाहते हैं । हम सभी आम लोग हैं । भले ही हम सामाजिक या धार्मिक रूप से कितने ही उच्च पद पर आसीन हों । लेकिन हमारी रोजाना की आम जिंदगी में छोटी छोटी परेशानियां और शिकायतें बनी रहती हैं । जैसे - जलन, गुस्सा, हमें कोई प्यार नहीं करता । इस बात का दुख । यदि आप जीवन की इन छोटी छोटी चीजों को समझ सकें । तो आप इनमें अपने दिल दिमाग के काम करने के ढंग को देख सकेंगे । खुशी गम, विपत्ति, आशा निराशा की इन स्थितियों को यदि बहुत ही धैर्यपूर्वक, बिना प्रशंसा या निंदा करते हुए, सचेत रहते हुए, बिना कोई फैसला किए आप देखते हैं । तो आपका मन समस्या की गहराई में उतर जाता है । लेकिन यदि आप किसी समस्या विशेष से निजात पाने के पहलू से ही सरोकार रखते हैं । तो आपका मन बहुत ही सतही स्तर पर बना रहता है । ईर्ष्या जलन की समस्या को ही लें । ईर्ष्या लोभ से उपजती है । आपके पास कुछ है । मेरे पास नहीं है । आप कुछ हैं । मैं कुछ भी नहीं हूं । आपके पास अधिक ज्ञान है । अधिक धन दौलत है । अधिक अनुभव है । मेरे पास नहीं है । आप हमेशा आगे ही बढ़ते चले जाते हैं । और मैं हमेशा नीचे की ओर गिरता चला जाता हूं । इस प्रकार यह चिर स्थायी संघर्ष बना रहता है । यदि हम देख सकें । तो इन सभी संघर्ष के, इन सभी दुख 

पीड़ाओं के और रोजाना की अन्य कई छोटी छोटी बातों के असंख्य निहितार्थ हैं ।
इनके समाधान के लिए आपको वेद पुराण या धार्मिक किताबें पढ़ने की कतई आवश्यकता नहीं है । आप इन सबको 1 तरफ रख दें । इनका कोई महत्व नहीं है । महत्वपूर्ण बात यह है कि आप अपने जीवन की इन छोटी छोटी समस्याओं को उनकी वास्तविकता में देखें । उनसे सीधे साक्षात्कार करें । तो यही चीजें आपको समस्या में छुपे तथ्यों से अलग रूप में साक्षात्कार कराएंगी । यह बात ध्यान रखें कि जब आप किसी वृक्ष का सौंदर्य देखते हैं । उड़ती हुई चिड़िया देखते हैं । सूर्यास्त या लहराता हुआ जल देखते हैं । तो ये सब आपको बहुत कुछ बताते हैं । और जब आप जीवन की कुरूप चीजें देखें - धूल, गंदगी, निराशा, अत्याचार, भय को, तो ये सब भी विचार की मूलभूत प्रक्रिया से परिचित कराते हैं । जिस प्रकार आप प्रिय चीजों को गहराई से देखते हैं । उसी प्रकार अप्रिय चीजों को भी देखें । यदि मन केवल पलायन से ही सरोकार रखता है । किसी रामबाण उपाय की तलाश में रहता है । तब वह अन्वेषण से बचना चाहता है । तब हम इन सबके प्रति कदापि सचेत नहीं हो सकते । दुर्भाग्य से हमारे पास धैर्य नहीं है । हम त्वरित जवाब चाहते हैं । समाधान चाहते हैं । हमारा मन समस्या के प्रति बहुत ही बेसब्र है । अधैर्यपूर्ण है । लेकिन यदि मन समस्या से दूर भागने के बजाय उसका अवलोकन करने में सक्षम हो सके । उसके साथ जी सके । तब यही समस्या उसके सामने अपने सारे अदभुत गुण धर्मों को खोलती चली जाएगी । तब मन समस्या की गहराई तक जा सकेगा । ऐसी स्थिति में मन कोई ऐसी चीज नहीं रह जाएगा । जो परिस्थितियों, समस्याओं, विपत्तियों द्वारा परेशान हो जाए । तब मन जल से आपूरित एक शांत स्निग्ध ताल की तरह हो जाएगा । और केवल ऐसा ही मन निश्चलता और शांति में सक्षम हो सकता है ।
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सत्य असीम है - शब्दों या शास्त्रों की सीमा में सत्य नहीं है । असल में जहां सीमा है । वहीं सत्य नहीं है । सत्य तो असीम है । उसे जानने को बुद्धि और विचारों की परिधि को तोड़ना आवश्यक है । असीम होकर ही असीम को जाना जाता है । विचार के घेरे से मुक्त होते ही चेतना असीम हो जाती है । वैसे ही जैसे मिट्टी के घड़े को फोड़ दें । तो उसके भीतर का आकाश असीम आकाश से 1 हो जाता है । सूर्य आकाश के मध्य में आ गया था । 1 सुंदर हंस 1 सागर से दूसरे सागर की ओर उड़ा जा रहा था । लंबी यात्रा और धूप की थकान से वह भूमि पर उतरकर 1 कुएं की पाट पर विश्राम करने लगा । वह बैठ भी नहीं पाया था कि कुएं के भीतर से 1 मेंढक की आवाज आयी - मित्र, तुम कौन हो । और कहां से आए हो ? वह हंस बोला - मैं 1 अत्यंत दरिद्र हंस हूं । और सागर पर मेरा निवास है । मेंढक का सागर से परिचित व्यक्ति से पहला ही मिलन था । वह पूछने लगा - सागर कितना बड़ा है ? हंस ने कहा - असीम । इस पर मेंढक ने पानी में 1 छलांग लगाई । और पूछा - क्या इतना बड़ा ? वह हंस हंसने लगा । और बोला - प्यारे मेंढक, नहीं । सागर इससे अनंत गुना बड़ा है । इस पर मेंढक ने 1 और बड़ी छलांग लगाई । और पूछा - क्या इतना बड़ा ? उत्तर फिर भी नकारात्मक पाकर मेंढक ने कुएं की पूर्ण परिधि में कूदकर चक्कर लगाया । और पूछा - अब तो ठीक है । सागर इससे बड़ा और क्या होगा ? उसकी आंखों में विश्वास की झलक थी । और इस बार उत्तर के नकारात्मक होने की उसे कोई आशा न थी । लेकिन उस हंस ने पुन: कहा - नहीं मित्र ! नहीं । तुम्हारे कुएं से सागर को मापने का कोई उपाय नहीं है । इस पर मेंढक तिरस्कार से हंसने लगा । और बोला - महानुभाव, असत्य की भी सीमा होती है ? मेरे संसार से बड़ा सागर कभी भी नहीं हो सकता । मैं सत्य के खोजियों से क्या कहता हूं । कहता हूं । सत्य के सागर को जानना है । तो अपनी बुद्धि के कुओं से बाहर आ जाओ । बुद्धि से सत्य को पाने का कोई उपाय नहीं । वह अमाप है । उसे तो वही पाता है । जो स्वयं के सब बांध तोड़ देता है । उनके कारण ही बाधा है । उनके मिटते ही सत्य जाना ही नहीं जाता । वरन उससे एक्य हो जाता है । उससे 1 हो जाना ही उसे जानना है ।
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काल निर्दयी है - इसका अर्थ यह है कि समय आपकी चिंता नहीं करता । इसलिए इस भरोसे मत बैठे रहना कि आज नहीं कल कर लेंगे । कल नहीं परसों कर लेंगे । पोस्टपोन मत करना । स्थगित मत करना । क्योंकि जिसके भरोसे स्थगित कर रहे हो । उसको जरा भी दया नहीं है । एक विचार ।
स्पष्टीकरण - निर्दयता काल के लिये कहा गया है । काल नियम में बंधा है । सिर्फ़ एक जीव पर ( काल ) दया करने से पूरा तंत्र बिखर जाता है । हालांकि यहाँ यदि ( काल क्षेत्र में ) दया के बजाय उपचार शब्द प्रयोग किया जाये । तो बात समझना आसान हो जाती है । और " सुबह " का भाव अकाल ( से जुङाव ) के लिये है । यानी अकाल काल को मार देगा । और नयी सुबह होगी ही होगी । आप जानते ही हैं । काल की तो औकात क्या अकाल के सामने महाकाल को भी मरना होता है । दोनों थर थर कांपते हैं । राजीव कुलश्रेष्ठ ।
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महाशंख माला क्या है ? जब भी आपके सामने ऐसा कोई असांसारिक अव्यवहारिक सा शब्द आये । तो पहले उसका स्रोत और उत्पादक स्थल या व्यक्ति के बारे में प्रश्न करें । क्योंकि ऐसी बहुत सी चीजें प्रचलन में हैं । वास्तव में जिनका हकीकी स्तर पर कोई अस्तित्व ही नहीं है । फ़िर भी ध्यान रखें । जहाँ भी किसी भी चीज में महा शब्द जुङ जाये । वह मानवीय स्तर का नहीं है । जाहिर है । वह सूक्ष्म या अलौकिकता से जुङा है । और तब स्थूल धरा पर उसका प्रतीक तो माना जा सकता है । पर वास्तविकता नहीं । ध्यान की क्रियाओं में घंटा शंख बांसुरी ज्योति आदि देखने सुनने के अनुभव होते हैं । ऐसे ही किसी विषय में ये शंख माला की बात भाव अनुसार कही होगी । जिस प्रकार गणेश - महा गणेश । विष्णु - महा - विष्णु । इन्द्र - महा इन्द्र आदि आदि ये सादा और महा दोनों अलग अलग हैं । पर आम लोग इनके बारे में जानकारी नहीं रखते ।

When heart Cry, tears wipe out like waves of unforgettable memories of beloved, for beloved and to beloved, It craves for irreversible past . and ends in silent occean ( Sufiyana )

11 फ़रवरी 2014

क्या करोगे सारी दुनिया को जीतने के बाद

मैं विद्यार्थी था । मेरे जो शिक्षक थे । उनका मुझसे अति प्रेम था । M. A. की अंतिम परीक्षा । उन्होंने मुझे कहा कि - खयाल रखना । जो किताबों में लिखा है । वही लिखना । रत्ती भर इधर उधर की बात मत करना । तुम्हें गलत भी मालूम पड़े । तो भी वही लिखना । जो किताबों में लिखा है । मुझे जानते थे कि मैं वही लिखूंगा । जो मुझे ठीक लगता है । मैंने वही लिखा भी । जो मुझे ठीक लगता है । मगर परीक्षा में जो लिखा गया था । वह तो उन्होंने किसी तरह सम्हाल लिया । फिर 1 मुखाग्र परीक्षा भी थी - अंतिम । उसमें तो उन्होंने मुझे बहुत समझाया कि अब तो दूसरे विश्वविद्यालय के शिक्षक आ रहे हैं । अब मेरे हाथ में बात नहीं है । अब तो तुम ठीक वही कहना । जो किताब में लिखा है । नहीं तो मैं भी कुछ सहायता नहीं कर सकूंगा । वे शिक्षक आये । अलीगढ़ विश्वविद्यालय के दर्शन शास्त्र के प्रधान थे । बुजुर्ग थे । उन्होंने मुझसे पहला ही प्रश्न पूछा कि - भारतीय दर्शन की क्या विशिष्टता है ? मैंने उनसे कहा कि - दर्शन भी भारतीय और अभारतीय हो सकता है ? मेरे प्रोफेसर मेरे पास ही बैठे थे । वे मेरी टांग में टांग मारने लगे कि तुम्हें जवाब देना है । तुम्हें सवाल नहीं पूछना है । जब मैंने उनकी टांग की कोई फिक्र न की । तो वे मेरा कुर्ता खींचने लगे । तो मैंने अलीगढ़ से आये हुए प्रोफेसर को कहा कि - मैं बहुत अड़चन में हूं । मैं आपका उत्तर दूं कि मेरे प्रोफेसर टांग में टांग मारते हैं । मेरा कुर्ता खींचते हैं । मैं इनकी फिक्र करूं ? मेरे शिक्षक तो बहुत घबडा गये । उन्होंने कहा - यह भी कोई कहने की बात थी । मैंने कहा कि भारतीय दर्शन । और गैर भारतीय दर्शन । ऐसा भेद हो नहीं सकता । दर्शन तो दर्शन है ।
दर्शन का अर्थ है - दृष्टि । तो फिर जीसस की हुई कि कृष्ण की । भेद क्या होगा ? सफेद चमडी वाला देखे कि काली चमडी वाला देखे । भेद क्या होगा ? चमड़ी से कुछ आंखों के रंग बदल जायेंगे । देखने के ढंग बदल जायेंगे ? जिन्होंने पश्चिम में भी देखा है । उन्होंने वही देखा है । जो पूरब में देखा है । हेराक्लाइटस ने वही देखा । जो बुद्ध ने देखा । पाइथागोरस ने वही देखा । जो पार्श्वनाथ ने देखा । जरा भी भेद नहीं है । और जिन्होंने भिन्न भिन्न देखा । वे सब अंधे हैं । आँख वालों ने 1 ही देखा । तो मैंने उनसे पूछा - अगर दर्शन शास्त्र में आँख वालों की ही गिनती करो । तो कभी भी । कहीं भी । किसी ने देखा हो । तो 1 ही बात देखी है । और अगर अंधों की भी गिनती करते हो । तब तो फिर हिसाब लगाना बहुत मुश्किल हो जायेगा । पर अंधों की गिनती दर्शन शास्त्र में होनी ही नहीं चाहिए । दर्शन शास्त्र में तो सिर्फ द्रष्टाओं की गिनती होनी चाहिए । मेरे प्रोफेसर को तो पक्का हो गया कि यह परीक्षा गयी । मगर अलीगढ़ से आये उन बुजुर्ग को बात बहुत जमी । उन्होंने कहा - मैंने कभी सोचा ही नहीं था । इस तरह कि यह भेद ठीक नहीं है । हमने तो मान ही लिया है कि भारतीय दर्शन, पाश्चात्य दर्शन । तुम्हारा उत्तर किताब का तो नहीं है । मगर उत्तर सही है । उन्होंने मुझे 99 अंक दिये 100 में से । मैंने पूछा - 1 आपने कैसे काटा ? कुछ गलती हो । तो मुझे आप बता दें । उन्होंने कहा - नहीं । तुम्हारी गलती के लिए नहीं काटा है । यह तो केवल अपनी रक्षा के लिए कि लोग सोचेंगे कि मैंने पक्षपात किया है । 100 के 100 दे दिये । 100 ही देने चाहिए । मुझे क्षमा करो । दिये नहीं जाते । 100 ही दिये जाने चाहिए । मगर दिये नहीं जाते - नियम से । अगर मैं 100 के 100 दे दूं । तो ऐसा लगेगा कि कुछ पक्षपात किया है । इसलिए 99 दे रहा हूं ।
1 पंडित है । लकीर का फकीर है । जैसा किताब में लिखा है । तोते की तरह दोहरा देता है । न सोचता । न विचार करता । न मनन है । न चिंतन है । न ध्यान है । वह विद्यार्थी है । विद्यार्थियों से सावधान रहना । उन्हें तो अभी स्वयं ही पता नहीं है । ओशो
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सिकंदर सारी दुनिया जीतना चाहता था । डायोजनीज ने उससे कहा - क्या करोगे सारी दुनिया को जीतने के बाद ? सिकंदर ने कहा - क्या करेंगे ? फिर विश्राम करेंगे ।
डायोजनीज खूब हंसने लगा । उसने कहा - अगर विश्राम ही करना है । तो हम अभी विश्राम कर रहे हैं । तो तुम भी करो । सारी दुनिया जीत कर विश्राम करोगे । यह बात कुछ समझ में नहीं आई । इसमें तर्क क्या है ? क्योंकि सारी दुनिया के जीतने का विश्राम से कोई भी तो संबंध नहीं है । विश्राम मैं बिना कुछ जीते कर रहा हूं । जरा मेरी तरफ देखो ।
और वह कर ही रहा था - विश्राम । वह नदी तट पर नग्न लेटा था । सुबह की सूरज की किरणें उसे नहला रही थीं । मस्त बैठा था । मस्त लेटा था । कहीं कुछ करने को न था । विश्राम में था । तो वह खूब
हंसने लगा । उसने कहा - सिकंदर तुम पागल हो । तुम जरा मुझे कहो तो कि अगर विश्राम दुनिया को जीतने के बाद हो सकता है । तो डायोजनीज कैसे विश्राम कर रहा है ? मैं कैसे विश्राम कर रहा हूं ? मैंने तो कुछ जीता नहीं । मेरे पास तो कुछ भी नहीं है । मेरे हाथ में 1 भिक्षा पात्र हुआ करता था । वह भी मैंने छोड़ दिया । वह इस कुत्ते की दोस्ती के कारण छोड़ दिया । कुत्ता उसके पास बैठा था । डायोजनीज का नाम ही हो गया था यूनान में - डायोजनीज कुत्ते वाला ।
वह कुत्ता सदा उसके साथ रहता था । उसने आदमियों से दोस्ती छोड़ दी । उसने कहा - आदमी कुत्तों से गए बीते हैं । उसने 1 कुत्ते से दोस्ती कर ली । और उसने कहा - इस कुत्ते से मुझे 1 शिक्षा मिली । इसलिए मैंने पात्र भी छोड़ दिया । पहले 1 भिक्षा पात्र रखता था । 1 दिन मैंने इस कुत्ते को नदी में पानी पीते देखा । मैंने कहा - अरे, यह बिना पात्र के पानी पी रहा है । मुझे पात्र की जरूरत पड़ती है । वहीं मैंने छोड़ दिया । इस कुत्ते ने मुझे हरा दिया । मैंने कहा - यह हमसे आगे पहुंचा हुआ है ? मुझे पात्र की जरूरत पड़ती है ? क्या जरूरत ? जब कुत्ता पी लेता है पानी । और कुत्ता भोजन कर लेता । तो मेरे पास कुछ भी नहीं है । फिर भी मैं विश्राम कर रहा हूं । और क्या तुम संदेह कर सकते हो मेरे विश्राम पर ?
नहीं । सिकंदर भी संदेह न कर सका । वह आदमी सच कह रहा था । वह निश्चित ही विश्राम में था । उसकी आंखें । उसका सारा भाव । उसके चेहरे की विभा । वह ऐसा था । जैसे दुनिया में कुछ पाने को बचा नहीं । सब पा लिया है । कुछ खोने को नहीं । कोई भय नहीं । कोई प्रलोभन नहीं ।
सिकंदर ने कहा - तुमसे मुझे ईर्ष्या होती है । चाहता मैं भी हूं ऐसा ही विश्राम । लेकिन अभी न कर सकूंगा । दुनियां तो जीतनी ही पड़ेगी । मैं यह तो बात मान ही नहीं सकता कि सिकंदर बिना दुनिया को जीते मर गया । डायोजनीज ने कहा - जाते हो । 1 बात कहे देता हूं । कहनी तो नहीं चाहिए । शिष्टाचार में आती भी नहीं । लेकिन मैं कहे देता हूं । तुम मरोगे बिना विश्राम किए ।
और सिकंदर बिना विश्राम किए ही मरा । भारत से लौटता था । रास्ते में ही मर गया । घर तक भी नहीं पहुंच पाया । और जब बीच में मरने लगा । और चिकित्सकों ने कहा कि - अब बचने की कोई उम्मीद नहीं । तो उसने कहा - सिर्फ मुझे 24 घंटे बचा दो । क्योंकि मैं अपनी मां को मिलना चाहता हूं । मैं अपना सारा राज्य देने को तैयार हूं । मैंने यह राज्य अपने पूरे जीवन को गंवा कर कमाया है । मैं वह सब लुटा देने को तैयार हूं - 24 घंटे । मैंने अपनी मां को वचन दिया है कि मरने के पहले जरूर उसके चरणों में आ जाऊंगा ।
चिकित्सकों ने कहा कि - तुम सारा राज्य दो । या कुछ भी करो । 1 श्वास भी बढ़ नहीं सकती । सिकंदर ने कहा - किसी ने अगर मुझे पहले यह कहा होता । तो मैं अपना जीवन न गंवाता । जिस राज्य को पाने में मैंने सारा जीवन गंवा दिया । उस राज्य को देने से 1 श्वास भी नहीं मिलती । डायोजनीज ठीक कहता था कि - मैं कभी विश्राम न कर सकूंगा ।
खयाल रखना । कठिन में 1 आकर्षण है - अहंकार को । सरल में अहंकार को कोई आकर्षण नहीं है । इसलिए सरल से हम चूक जाते हैं । सरल । परमात्मा बिलकुल सरल है । सत्य बिलकुल सरल है । सीधा साफ । जरा भी जटिलता नहीं । 

जिसे भय से ऊपर उठना हो

प्रेम से बड़ी कोई शक्ति है ? नहीं । क्योंकि जो प्रेम को उपलब्ध होता है । वह भय से मुक्त हो जाता है । 1 युवक अपनी नववधू के साथ समुद्र यात्रा पर था । सूर्यास्त हुआ । रात्रि का घना अंधकार छा गया । और फिर एकाएक जोरों का तूफान उठा । यात्री भय से व्याकुल हो उठे । प्राण संकट में थे । और जहाज अब डूबा । तब डूबा होने लगा । किंतु वह युवक जरा भी नहीं घबड़ाया । उसकी पत्नी ने आकुलता से पूछा - तुम निश्चिंत क्यों बैठे हो ? देखते नहीं कि जीवन बचने की संभावना क्षीण होती जा रही है । उस युवक ने अपनी म्यान से तलवार निकाली । और पत्नी की गर्दन पर रखकर कहा - क्या तुम्हें डर लगता है ? वह युवती हंसने लगी । और बोली - तुमने यह कैसा ढोंग रचा ? तुम्हारे हाथ में तलवार हो । तो भय कैसा ? वह युवक बोला - परमात्मा के होने की जबसे मुझे गंध मिली है । तब से ऐसा ही भाव मेरा उसके प्रति भी है । तो भय रह ही नहीं जाता है । प्रेम अभय है । अप्रेम भय है । जिसे भय से ऊपर उठना हो । उसे समस्त के प्रति प्रेम से भर जाना होगा । चेतना के इस द्वार से प्रेम भीतर आता है । तो उस द्वार से भय बाहर हो जाता है ।
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1 अदभुत अनुभव मुझे हुआ । वह मैं कहूं । अब तक उसे कभी कहा नहीं । अचानक ख्याल आ गया । तो कहता हूं । कोई 12 साल पहले । 13 साल पहले । बहुत रातों तक 1 वृक्ष के ऊपर बैठकर ध्यान करता था । ऐसा बारबार अनुभव हुआ कि जमीन पर बैठकर ध्यान करने पर शरीर बहुत प्रबल होता है । शरीर बनता है - पृथ्वी से । और पृथ्वी पर बैठकर ध्यान करने से शरीर की शक्ति बहुत प्रबल होती है । वह जो हाइटस पर । पहाड़ों पर । और हिमालय पर जाने वाले योगी की चर्चा है । वह अकारण नहीं है । बहुत वैज्ञानिक है । जितनी पृथ्वी से दूरी बढ़ती है शरीर की । उतनी ही शरीर तत्व का प्रभाव भीतर कम होता चला जाता है । तो 1 बड़े वृक्ष के ऊपर बैठकर मैं ध्यान करता था रोज रात । 1 दिन ध्यान में कब कितना लीन हो गया । मुझे पता नहीं । और कब शरीर वृक्ष से गिर गया । वह मुझे पता नहीं । जब नीचे गिर पड़ा शरीर । तब मैंने चौंककर देखा कि यह क्या हो गया है । मैं तो वृक्ष पर ही था । और शरीर नीचे गिर गया । कैसा हुआ अनुभव । कहना बहुत मुश्किल है । मैं तो वृक्ष पर ही बैठा था । और शरीर नीचे गिरा था । और मुझे दिखाई पड़ रहा था कि वह नीचे गिर गया है । सिर्फ 1 रजत रज्जू । 1 सिलवर कार्ड नाभि से और मुझ तक जुड़ी हुई थी । 1 अत्यंत चमकदार शुभ्र रेखा । कुछ भी समझ के बाहर था कि अब क्या होगा ? कैसे वापस लौटूंगा ? कितनी देर यह अवस्था रही । वह भी पता नहीं । लेकिन अपूर्व अनुभव हुआ । शरीर के बाहर से पहली दफा देखा शरीर को । और शरीर उसी दिन से समाप्त हो गया । मौत उसी दिन से खत्म हो गई । क्योंकि 1 और देह दिखाई पड़ी । जो शरीर से भिन्न है । 1 और सूक्ष्म शरीर का अनुभव हुआ । कितनी देर यह रहा । कहना मुश्किल है । सुबह होते होते 2 औरतें वहां से निकलीं दूध लेकर किसी गांव से । और उन्होंने आकर पड़ा हुआ शरीर देखा । वह मैं देख रहा हूं ऊपर से कि वे करीब आकर बैठ गई हैं । कोई मर गया । और उन्होंने सिर पर हाथ रखा । और 1 क्षण में जैसे तीव्र आकर्षण से मैं वापस अपने शरीर में आ गया । और आंख खुल गई । तब 1 दूसरा अनुभव भी हुआ । वह दूसरा अनुभव यह हुआ कि स्त्री पुरुष के शरीर में 1 कीमिया और केमिकल चेंज पैदा कर सकती है । और पुरुष स्त्री के शरीर में 1 केमिकल चेंज पैदा कर सकता है । यह भी ख्याल हुआ कि उस स्त्री का छूना और मेरा वापस लौट आना । यह कैसे हो गया ? फिर तो बहुत अनुभव हुए इस बात का । और तब मुझे समझ में आया कि हिंदुस्तान में जिन तांत्रिकों ने समाधि पर और मृत्यु पर सर्वाधिक प्रयोग किये थे । उन्होंने क्यों स्त्रियों को भी अपने साथ बांध लिया था । क्योंकि गहरी समाधि के प्रयोग में अगर शरीर के बाहर तेजस शरीर चला गया है । सूक्ष्म शरीर चला गया है । तो बिना स्त्री की सहायता के पुरुष के तेजस शरीर को वापस नहीं लौटाया जा सकता । या स्त्री का तेजस शरीर अगर बाहर चला गया है । तो बिना पुरुष की सहायता के उसे वापस नहीं लौटाया जा सकता । स्त्री और पुरुष के शरीर के मिलते ही 1 विद्युत वृत, 1 इलेक्ट्रिक सर्किल पूरा हो जाता है । और वह जो बाहर निकल गई है चेतना । तीव्रता से भीतर वापस लौट आती है । फिर तो 6 महीने में कोई 6 बार अनुभव निरंतर । और 6 महीने में मुझे अनुभव हुआ कि मेरी उम्र कम से कम 10 वर्ष कम हो गई । 10 वर्ष कम हो गई मतलब । अगर मैं 70 साल जीता । तो अब 60 ही साल जी सकूंगा । 6 महीने में कई अजीब अजीब से अनुभव हुए । ओशो
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प्रत्येक देही अस्तित्व के दो पहलू होते हैं । एक सामान्य और दूसरा किसी भी ज्ञान से युक्त या संयुक्त । जैसे किसी पढोसी डाक्टर आदि को सशरीर रोज देखो । और उसको उसके ज्ञान के स्तर पर जानते हो । तो यह देखना और ही होता है । इसी से श्रद्धा नफ़रत आदर आदि भावों का सृजन होता है । गुरु या अंतर के साधकों, ज्ञानियों का एक प्रकाशित आंतरिक रूप अलग होता है । उसी को देखना असली देखना होता है ।
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शून्य में रस लो । तो धीरे धीरे ये विचार समाप्त हो जायेंगे । यह शून्य बड़ा महिमाशाली है । शून्य को ही तो ध्यान कहा है । सौभाग्य से मिलता है । अब मिल गया है । तो इसे खराब मत करो । अब तो इस शून्य में डूबो । यद्यपि प्राथमिक चरण पर डूबना ऐसा ही लगेगा । जैसा मरे । मौत हुई । और 1 अर्थ में ठीक भी है । तुम तो मरोगे ही । तुम जैसे अब तक रहे हो । इस शून्य में डूबोगे । मिट जाओगे । नये का जन्म होगा । आविर्भाव होगा ।
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तुलसी कहते धनुष हाथ है । सूर कहे बस मुरली है । 
गौतम कहते अजब शांति है । महावीर कहे करूणा ही है । 
कहे कबीर सूरज सा सच्चा । मीरा कहे वो प्रेमी है ।
जैसे चाहो मिलता वैसे । वो तो बस अपना ही है । 
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1 लड़की दुपटटा मुंह पर लपेटे हुए स्कूटी से जा रही थी । पास से 1 आदमी बाइक से जाते हुए बोला - जानेमन ! ज़रा मुखड़ा तो दिखाती जाओ । लड़की - पापा ! मैं हूँ पिंकी ।
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Meditation cannot be a part  Either it is whole or not It is not an act
It is not an activity It is your very being - Osho

10 फ़रवरी 2014

नान फ्लोरिडेटेड टूथपेस्ट का इस्तेमाल करिये

आंवला मुरब्बा, च्यवनप्राश और दूसरे आयुर्वेदिक खाद्य वस्तुओं को खाने से हो रहा है - कैन्सर । 1 अन्तर्राष्ट्रीय साजिश के तहत इनमें सोडियम बेंजोएट और पैराबेन नाम के खतरनाक केमिकल मिलाए जा रहे हैं प्रिज़र्वेटीव की तरह । जो आंवले में मौजूद विटामिन C से रिएक्ट कर करके " बेन्जीन " बनाते हैं । जोकि विश्व का नंबर 1 कैन्सर उत्पन्न करने वाला कैमिकल है ! मैं किसी भी आयुर्वेदिक कंपनियों पर दोषारोपण नहीं कर रहा हूँ । दरअसल उन्हें बाध्य किया जा रहा है । नए क़ानून बनाकर प्रिज़र्वेटीव डालना अनिवार्य कर दिया गया है ।
च्यवनप्राश और आंवला मुरब्बे में पहले से ही इतनी शर्करा ( शक्कर ) होती है कि वह नेचुरल प्रिसेर्वेटीव का काम करती है । और महीनों तक ठीक रहते है । बिना खराब हुए । यही हाल दन्त कान्ति और दूसरे टूथपेस्ट का है । उसमें बहुत खतरनाक सोडियम मोनो फ्लोरो फास्फेट SMFP   मिलाया जा रहा है । जो हमें निकम्मा नाकारा उत्साहहीन और गुलाम बना रहा है । IQ क्यू कम करता है । यह 1 anti ryot   ड्रग है ।.फ्लोराइड 1 धीमा जहर है । जो मस्तिष्क में स्थित पीनिअल ग्रंथि या आज्ञा चक्र को ब्लाक कर देता है । इन सबका हल आसान है । वही आयुर्वेदिक खाद्य वस्तुएं खरीदें । जिसमें यह हानिकारक कैमिकल नहीं डाले जा रहे हैं । ढूंढे तो मिल जायेंगी । दांतों के लिए नान फ्लोरिडेटेड टूथपेस्ट का इस्तेमाल करिये । और मैं पतंजलि आदि आयुर्वेदिक कंपनियों से निवेदन करना चाहता हूँ कि वे तत्काल इन प्राणघातक कैमिकलों को आयुर्वेदिक दवाओं में डालना बन्द करें । ताकि इन इलुमिनातियों ( वैश्विक दानवी सरकार ) का सारे विश्व को गुलाम बनाने का एजेण्डा नष्ट हो जाए ।
सोडियम बेंजोएट से कैन्सर उत्पन्न होने का सबूत । 
http://www.naturalnews.com/033726_sodium_benzoate_cancer.html

http://www.rense.com/general74/benz.htm
फ्लोराइड से दिमाग कमजोर और बुद्धू बनने का सबूत । 
http://fluoridealert.org/
https://www.facebook.com/FluorideActionNetwork
इलुमिनाती के लिए यहाँ देखे 
http://www.wisdom-square.com/top-10-things-you-shouldnt-know-about-the-illuminati.html
http://www.stopnwo.com
जिस प्रकार दूध में 1 बूँद भी जहर मिल जाए । तो वह फट जाता है । और पीने योग्य नहीं रहता । उसी प्रकार अमृत सामान च्यवनप्राश आदि आयुर्वेदिक वस्तुओं में सूक्ष्म सा विष भी उन्हें प्रभावहीन और विषतुल्य बना देता है । सभी से अनुरोध है । इसे अपने अपने समूह ( ग्रुप और पेजों ) में शेयर करें । research by - Naresh Arya 
http://www.naturalcuresnotmedicine.com/2013/10/why-you-should-decalcify-your-pineal.html

09 फ़रवरी 2014

You’re sending me back in time ?


The Egg - Universe and You . You were on your way home when you died.  It was a car accident. Nothing particularly remarkable, but fatal nonetheless. You left behind a wife and two children. It was a painless death. The EMTs tried their best to save you, but to no avail. Your body was so utterly shattered you were better off, trust me.   And that’s when you met me.
- What.. what happened ?  You asked - Where am I ?
- You died, I said, matter-of-factly. No point in mincing words.
-There was a… a truck and it was skidding ”
- Yup, I said.
- I… I died ?
- Yup. But don’t feel bad about it. Everyone dies, I said.
You looked around. There was nothingness. Just you and me.
- What is this place  ? You asked. “Is this the afterlife ?
- More or less, I said.
- Are you god ? You asked.
- Yup, I replied - I’m God.
- My kids… my wife, you said.
What about them ?
- Will they be all right ?
That’s what I like to see, I said - You just died and your main concern is for your family. That’s good stuff right there.
You looked at me with fascination. To you, I didn’t look like God. I just looked like some man. Or possibly a woman. Some vague authority figure, maybe. More of a grammar school teacher than the almighty.
- Don’t worry, I said. They’ll be fine. Your kids will remember you as perfect in every way. They didn’t have time to grow contempt for you. Your wife will cry on the outside, but will be secretly relieved. To be fair, your marriage was falling apart. If it’s any consolation, she’ll feel very guilty for feeling relieved.
- Oh, you said - So what happens now ? Do I go to heaven or hell or something ?
- Neither, I said.- You’ll be reincarnated.
- Ah, you said - So the Hindus were right,
- All religions are right in their own way, I said - Walk with me.
You followed along as we strode through the void - Where are we going ?
- Nowhere in particular, I said - It’s just nice to walk while we talk.
- So what’s the point, then ?  You asked - When I get reborn, I’ll just be a blank slate, right ? A baby. So all my experiences and everything I did in this life won’t matter.
- Not so! I said - You have within you all the knowledge and experiences of all your past lives. You just don’t remember them right now.
I stopped walking and took you by the shoulders - Your soul is more magnificent, beautiful, and gigantic than you can possibly imagine. A human mind can only contain a tiny fraction of what you are. It’s like sticking your finger in a glass of water to see if it’s hot or cold. You put a tiny part of yourself into the vessel, and when you bring it back out, you’ve gained all the experiences it had.
- You’ve been in a human for the last 48 years, so you haven’t stretched out yet and felt the rest of your immense consciousness. If we hung out here for long enough, you’d start remembering everything. But there’s no point to doing that between each life.
- How many times have I been reincarnated, then ?
- Oh lots. Lots and lots. An in to lots of different lives - I said - This time around, you’ll be a Chinese peasant girl in 540 AD.
- Wait, what ? You stammered - You’re sending me back in time ?
- Well, I guess technically. Time, as you know it, only exists in your universe. Things are different where I come from.
- Where you come from ? You said.
- Oh sure, I explained - I come from somewhere. Somewhere else. And there are others like me. I know you’ll want to know what it’s like there, but honestly you wouldn’t understand.
- Oh, you said, a little let down - But wait. If I get reincarnated to other places in time, I could have interacted with myself at some point.
- Sure. Happens all the time. And with both lives only aware of their own lifespan you don’t even know it’s happening.
- So what’s the point of it all ?
- Seriously ?  I asked - Seriously ? You’re asking me for the meaning of life ? Isn’t that a little stereotypical ?
- Well it’s a reasonable question - you persisted.
I looked you in the eye.  The meaning of life, the reason I made this whole universe, is for you to mature.
- You mean mankind ? You want us to mature ? 
- No, just you. I made this whole universe for you. With each new life you grow and mature and become a larger and greater intellect. 
- Just me ? What about everyone else ?
- There is no one else, I said - In this universe, there’s just you and me.
You stared blankly at me. But all the people on earth…
- All you. Different incarnations of you.
- Wait. I’m everyone  ?
- Now you’re getting it, I said, with a congratulatory slap on the back.
- I’m every human being who ever lived ?
- Or who will ever live, yes.
- I’m Abraham Lincoln ?
- And you’re John Wilkes Booth, too, I added.
- I’m Hitler ? You said, appalled.
- And you’re the millions he killed.
- I’m Jesus  ?
- And you’re everyone who followed him.
You fell silent.
- Every time you victimized someone, I said - you were victimizing yourself. Every act of kindness you’ve done, you’ve done to yourself. Every happy and sad moment ever experienced by any human was, or will be, experienced by you.
You thought for a long time.
- Why ? You asked me - Why do all this ?
- Because someday, you will become like me. Because that’s what you are. You’re one of my kind. You’re my child.
- Whoa,  you said, incredulous - You mean I’m a god ?
- No. Not yet. You’re a fetus. You’re still growing. Once you’ve lived every human life throughout all time, you will have grown enough to be born.
- So the whole universe, you said - it’s just .
- An egg. I answered - Now it’s time for you to move on to your next life.
And I sent you on your way.  By - Andy Weir

http://www.amarujala.com/feature/samachar/national/mulayam-again-remarks-on-firing-a-kar-sevaks/

08 फ़रवरी 2014

कत्ल होते समय उनकी जो चीत्कार निकलती है


कमजोर दिल वाले इसे न पढें - कत्लखानों में जब गौ को कतल किया जाता है । तो बहुत बेरहमी के साथ क्या जाता है । बहुत हिंसा होती है । बहुत अत्याचार होता है । गौ को 1 स्टोर में 4 दिनों के लिये भूखा प्यासा रखा जाता है । उसके बाद उनके पैर तोडे जाते है । और आंखे भी फ़ोडी जाती है । ताकि ये सिद्ध किया जा सके कि ये जानवर किसी काम के नही हैं । भू्खे प्यासे रहने के कारण उनके शरीर का हीमोग्लोबिन खून में से चर्बी में आ जाता है । जिससे उनके मांस की अच्छी कीमत मिलती है । इसके बाद इन पर गर्म गर्म पानी डाला जाता है । जिसका तापमान 200 डिग्री के करीब होता है । इससे उनकी खाल नर्म हो जाती है । और जल्दी उतर जाती है । इस समय वो बेहोश हो जाता है । इसके बाद उसे 1 पैर से 1 चैन से चलित हैंगर वाली मशीन पर टांग दिया जाता है । और उसकी आधी गर्दन काट दी जाती है । जिससे वो जिंदा तो रहता है । और सारा खून नीचे निकल जाता है । क्योकि मरने के बाद जानवर की चमडी मोटी हो जाती है । जो कम दाम में बिकती है । जबकि जिन्दा जानवर की त्वचा पतली रहती है । इसलिये उसे जिन्दा रखा जाता है । जब तक खून नीचे उतरता है । तब तक उसके पेट में 1 सुराख किया जाता है । और मशीन से उसके अन्दर हवा भरी जाती है । जिससे उसका शरीर फ़ूल जाये । और खाल आसानी से उतारी जा सके । अब उसकी खाल उतारी जाती है । और फ़िर उसके शरीर को 4 हिस्सो सिर, पैर, पूंछ और बाकी का हिस्सा में काटा जाता है । बाद में मशीन के द्वारा हड्डियां अलग की जाती है । और मांस को डिब्बो में बंद करके बाहर भेजा जाता है ।
गौ वंश का कत्ल होते समय उनकी जो चीत्कार निकलती है । उनके शरीर से जो स्ट्रेस होरमोन निकलते हैं । वो पूरी दुनिया को तरंगित कर देती है । कम्पायमान कर देती है । गौ को जब काटा जाता है । आज का आधुनिक विज्ञान ने ये सिद्ध किया है कि मरते समय जानवर हो । या व्यक्ति हो । अगर उसको क्रूरता से मारा जाता है । तो उसके शरीर से निकलने वाली जो चीख पुकार है । उनको भाई ब्रसन में उनको ओएव्स की थियोरी में जब समझाया जाता है । तो जो नेगेटिव ओएव्स निकलते हैं । वो पूरे वातावरण को बुरी तरह से प्रभावित करता है । और उससे अन्य सभी मनुष्यों पर प्रभाब पड़ता है । उससे नकारात्मक भाव ज्यादा से ज्यादा आते हैं । इससे मनुष्य में हिंसा करने की प्रवृति ज्यादा आती है । तो अत्याचार और पाप पूरी दुनिया में बढ रही है ।
दिल्ली विश्यविद्यालय के 2 प्रोफेसर हैं - 1 मदनमोहन जी । और 1 उनके सहयोगी । जिन्होंने 20 साल इन पर रिसर्च किया है । और उनकी फीसिक्स की रिसर्च ये कहती है कि - गौ को जितना ज्यादा कत्ल किया जायेगा । जितना ज्यादा हिंसा से मारा जायेगा । उतना ही अधिक दुनिया में भूकंप आएंगे । जलजले आएंगे । प्राकृतिक आपदा आयेगी । उतने ही दुनिया में संतुलन बिगड़ेगा ।
हैदराबाद का अलकबीरा, औरंगाबाद का एलेना, अलीगढ का हिन्द इंडर्स्टीज, देहली में अलाना सन्स, महाराष्ट्र का देवनार में किस तरह बर्बरता पूर्वक गायों को मांस और चमडे क़े लिए मार दिया जाता है । आज पूरे भारत में करीबन 36  000 अधिकृत बूचड़खाने क़ेवल मांस और चमडे के लिए चल रहें हैं । जिनमें से 10 बूचड़खाने हाइली आटोमेटेड हैं । इनमें करीबन 2 50 000 जानवर इसी तरह बेरहमी से मारे जाते हैं । आज भैसों की संख्या पूरे देश में केवल 75 मिलियन बची है । वहीं गाय की संख्या करीबन 200 मिलियन है । अलकबीर बूचडखाने को करीबन 6 लाख गाय और भैंसों का इसी तरह प्रति वर्ष बेरहमी से मारने का लायसेंस दे रखा है । वहीं मुंबई के देवनार बुचड़खाने में प्रति वर्ष 25 लाख गाय भैसों को प्रति वर्ष मारने का लायसेंस दे रखा है । वहीं कोलकाता के बूचड़खानों में करीबन 122 लाख गायें और भैंसे प्रति वर्ष इसी तरह हत्या की जाती हैं । ये सब केवल आफिशियल संख्या है । ये दुगुनी और तिगुनी भी हो सकती है ।
भाई राजीव दीक्षित जी इस बारें में बताते हुए । वीडियो देखें ।
http://youtu.be/ojaFZRQvfGU
भारतीय संस्कृति मे गाय को मां का दर्जा दिया गया है । खुद भगवान श्रीकृष्ण गायों के पालनहार हैं । जिस देश के हर घर में इनको पूजा जाता था । उसी देश में इनको कसाईयों द्वारा काटा जा रहा है । अब देश के लोग गऊ माता के स्थान पर कुत्ता पालने लगे हैं । हमारी भारतीय संस्क्रति को भूलकर अंग्रेज बनने लगे हैं ।
राजीव भाई ने बताया था कि इन 63 सालों में 75 करोड गायों को मौत के घाट उतारा जा चुका है । सरकार की अनुमति से 30 000 कत्लखाने चल रहे हैं । एक 1 गाय करोड रुपये का फ़ायदा देने वाली है । और माता कहने वाले लोग चुप बैठे उसे कटते देख रहे हैं । कसाई खाना खोलने के लिए यह सरकार और बैंक लोन देते हैं । वो भी सब्सिडी के साथ । लेकिन कोई भी बैंक गौ शाला खोलने पर लोन नहीं देता है । http://youtu.be/tAhVGTwvuxI
आईये सब मिलकर गौ वध रोकने का प्रण लें । गौ भारतीय और हिन्दू संस्कृति की अमूल्य धरोहर है ।

आंवले का सेवन रोजाना करने से लाभ होता है


आंवले के प्रयोग - जुकाम - 2 चम्मच आंवले के रस को 2 चम्मच शहद के साथ मिलाकर सुबह और शाम चाटने से जुकाम ठीक हो जाता है । जिन लोगों को अक्सर हर मौसम में जुकाम रहता है । उन लोगों को आंवले का सेवन रोजाना करने से लाभ होता है ।
दस्त - आंवले को पीसकर बारीक चूर्ण बनाकर 3 ग्राम की मात्रा में लेकर सेंधा नमक मिलाकर दिन में कई बार पानी के साथ पीने से दस्त का आना बंद हो जाता है । सूखे आंवले को नमक और थोड़ा पानी डालकर 4 ग्राम के रूप में दिन में 4 बार खाने से लाभ मिलता है । सूखे आंवले को पीसकर चूर्ण बना लें । फिर इसी चूर्ण में काला नमक डालकर पानी के साथ इस्तेमाल करने से पुराने दस्त में लाभ मिलता है ।
आंवले को सुखाकर 250 ग्राम पानी में मिलाकर पीसकर नाभि के चारों तरफ लगा दें । नाभि में अदरक का रस लगाकर और थोड़ा सा पिलाने से अतिसार मिटता है । आंवले की पत्ती, बबूल की पत्ती और आम की पत्ती को बराबर मात्रा में लेकर बारीक पीसकर कपड़े से छानकर प्राप्त रस को निकाल कर रख दें । फिर इसी रस को 2-2 ग्राम की मात्रा में 6 ग्राम शहद के साथ मिलाकर प्रयोग करने से सभी प्रकार के दस्त आना रुक जाते हैं ।
सूखा आंवला, धनिया, मस्तंगी और छोटी इलायची को बराबर मात्रा में पीसकर चूर्ण बनाकर रख लें । फिर इस चूर्ण को 3-3 ग्राम की मात्रा में बेल की मीठी शर्बत के साथ प्रयोग करने से गर्भवती स्त्री को होने वाले दस्त में आराम मिलता है ।
आंवले और धनियां को सुखाकर बारीक पीसकर चूर्ण बनाकर रख लें । फिर उसमें थोड़ा सा सेंधा नमक मिलाकर जल के साथ लगभग 2 ग्राम की मात्रा में 1 दिन में 2 से 3 बार सेवन करने से दस्त से पीड़ित रोगी को छुटकारा मिल जाता है ।
आंवले का सूखा हुआ 10 ग्राम चूर्ण और 5 ग्राम काली हरड़ को अच्छी तरह से पीसकर रख लें । 1-1 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम पानी के साथ फंकी के रूप में 1 दिन में सुबह, दोपहर और शाम पीने से दस्त का आना बंद हो जाता है । और मेदा यानी आमाशय को बल देता है ।
सूखे आंवले, धनिया, जीरा और सेंधा नमक को मिलाकर चटनी बनाकर खाने से आमातिसार में लाभ मिलता है ।
आंवले को पीसकर उसका लेप बनाकर अदरक के रस में मिलाकर पेट की नाभि के चारों ओर लगाने से मरीज के दस्त में लगभग आधे घंटे में आराम मिलता है ।
सूखे आंवले को पीसकर चूर्ण बनाकर आधा चम्मच में 1 चुटकी की मात्रा में नमक मिलाकर फंकी के रूप में खाकर ताजा पानी को ऊपर से पी जायें ।
आंवले के कोमल पत्तों को पीसकर चूर्ण बनाकर छाछ के साथ रोजाना दिन में 3 बार 10 ग्राम चूर्ण को पीने से अतिसार यानी दस्त में लाभ मिलता है ।
आंवले का पिसा हुआ चूर्ण शहद के साथ खाने से खूनी दस्त और आंव का आना समाप्त हो जाता है ।
आंवले के पत्तों और मेथी के दानों को मिलाकर काढ़ा बनाकर सेवन करने से अतिसार में लाभ पहुंचता है ।
करंज के पत्तों को पीसकर या घोटकर पिलाने से पेट में गैस, पेट के दर्द और दस्त में लाभ होता है ।
नपुंसकता ( नामर्दी ) - आंवले का रस निकालकर 1 चम्मच आंवले के चूर्ण में मिलाकर लें । उसमें थोड़ी सी शक्कर ( चीनी ) और शहद मिलाकर घी के साथ सुबह शाम खायें ।
गर्भवती की उल्टी और जी का मिचलना - आंवले के रस में चंदन घिसकर 20 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से उल्टी बंद हो जाती है । इसे प्रतिदिन 2 से 3 बार देना चाहिए ।
काला ज्वर - लगभग 1 चम्मच आंवले के चूर्ण को दिन में 2 बार शहद के साथ मिलाकर रोगी को देने से शरीर का खून बढ़ता है ।
बहरापन - 1-1 चम्मच आंवले के पत्तों का रस, जामुन के पत्तों का रस और महुए के पत्तों के रस को लेकर 100 ग्राम सरसों के तेल में डालकर पकाने के लिये रख दें । पकने के बाद जब बस तेल ही बाकी रह जाये । तो उस तेल को शीशी में भरकर रख लें । इस तेल की 2-3 बूंदे रोजाना कान में डालने से बहरेपन का रोग जाता रहता है ।
आमातिसार - लगभग 40 से 80 ग्राम भुई आंवले के कोमल तने के फांट ( घोल ) का सेवन करने से आमातिसार के रोगी का रोग ठीक होता है ।
रजोनिवृत्ति ( मासिक धर्म समाप्ति ) के बाद के शारीरिक व मानसिक कष्ट - शारीरिक जलन, ब्रहमतालु में गर्मी आदि के लिए आंवले का रस 10 से 20 ग्राम की मात्रा में मिश्री के साथ या सूखे आंवले का चूर्ण समान मात्रा में मिश्री के साथ सुबह शाम सेवन करने से लाभ मिलता है ।
मासिक धर्म संबन्धी परेशानियां - 1 चम्मच आंवले का रस पके हुए केले के साथ कुछ दिनों तक लगातार सेवन करें । इसके सेवन से मासिक धर्म में अधिक रक्तस्राव नहीं होता है ।
चोट लगना - कटने से रक्तस्राव होने पर कटे हुए स्थान पर आंवले का ताजा रस लगाने से खून का बहना बंद हो जाता है ।
आंव रक्त ( पेचिश ) - कच्चा और भुना आंवला बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें । 10 ग्राम चूर्ण दही में मिलाकर खाने से पेचिश के रोगी को लाभ मिलता है ।
10 ग्राम आंवले का रस, 5 ग्राम घी और शहद मिलाकर सेवन करें । और ऊपर से बकरी का दूध पीयें । इससे पेचिश के रोगी का रोग दूर हो जाता है ।
6 ग्राम आंवला की जड़ और सोंठ के छिलके को धोकर पीस लें । तथा मसूर के दाने और नमक मिलाकर 4 चम्मच मिलाकर गर्म करें । फिर उसे पियें । पेचिश के रोगी को लाभ मिलेगा ।
भगन्दर - आंवले का रस, हल्दी और दन्ती की जड़ 5-5 ग्राम की मात्रा में लें । और इसको अच्छी तरह से पीसकर इसे भगन्दर पर लगाने से घाव नष्ट होते हैं ।
प्रदर - आंवले के बीज के चूर्ण को शर्करा और शहद के साथ सेवन करने से पीत ( पीला स्राव ) प्रदर में आराम मिलता है ।
आंवले के बीजों को पानी के साथ पीसकर उसमें पानी, शहद और मिश्री मिलाकर पीने से 3 दिन में श्वेत प्रदर मिट जाता है ।
2 चम्मच आंवले का रस और 1 चम्मच शहद को 1 साथ मिलाकर 1 महीने तक पीने से सफेद प्रदर मिट जाता है ।
आंवले को सूखाकर अच्छी तरह से पीसकर बारीक चूर्ण बनाकर रख लें । फिर इसी बने चूर्ण की 3 ग्राम मात्रा को लगभग 1 महीने तक सुबह और शाम पीने से श्वेत प्रदर समाप्त होता है ।
जिगर का रोग - 4 ग्राम सूखे आंवले का चूर्ण, या 25 ग्राम आंवले का रस 150 ग्राम पानी में अच्छी तरह मिलाकर दिन में 4 बार सेवन करने से फायदा होता है ।
25 ग्राम आंवलों का रस या 4 ग्राम सूखे आंवले का चूर्ण पानी के साथ दिन में 3 बार सेवन करने से 15-20 दिन में यकृत के सभी बीमारी से लाभ मिलता है ।
ताजे आंवले का रस निकाकलर 10 मिली शहद डालकर ज्यादा दिनों तक सेवन करने से दोनों प्रकार के प्रदर रोग मिट जाते हैं ।
आंवले के बीजों का मिश्रण शहद के पानी के साथ सेवन करने से प्रदर रोग में लाभ होता है ।
अग्निमान्द्यता ( अपच ) - ताजे हरे आंवलों का रस और अनार का रस 4-4 चम्मच की मात्रा में शहद के साथ रोजाना सुबह और खाना खाने बाद लेने से लाभ होता है ।
अल्सर - 1 चम्मच आंवले का चूर्ण, आधा चम्मच पिसी हुई सोंठ, आधा चम्मच पिसा हुआ जीरा, 1 चम्मच पिसी हुई मिश्री, सबको मिलाकर 1 खुराक सुबह और 1 खुराक शाम को लें ।
1 चम्मच आंवले का रस और 1 चम्मच शहद दोनों को मिलाकर पीना चाहिए ।
अम्ल पित्त ( एसिडिटीज ) - 2 चाय के चम्मच आंवले के रस में इतनी ही मिश्री मिलाकर पीएं । या बारीक सूखा पिसा हुआ आंवला और मिश्री बराबर मात्रा में मिलाकर पानी से फंकी लेने से लाभ मिलता है ।
आंवले के फल के बीच के भाग को पीसकर चूर्ण बना लें । फिर चूर्ण 3 से 6 ग्राम को 100 मिली से 250 मिली दूध के साथ दिन में सुबह और शाम लेने से अम्लता से छुटकारा मिल सकता है ।
आंवले का रस 1 चम्मच, चौथाई चम्मच भुना हुआ जीरा का चूर्ण, मिश्री और आधा चम्मच धनिए का चूर्ण मिलाकर लेने से अम्ल पित्त में कुछ ही दिनों में लाभ मिलता है ।
आंवला, सफेद चंदन का चूर्ण, चूक, नागरमोथा, कमल के फूल, मुलेठी, छुहारा, मुनक्का तथा खस को बराबर मात्रा में कूटकर चूर्ण बना लें । फिर सुबह और शाम के दौरान 2-2 चुटकी शहद के साथ सेवन करें ।
आंवला, हरड़, बहेडा़, ब्राह्मी और मुण्डी को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चूर्ण बना लें । फिर इसमें मिश्री मिलाकर 6-6 ग्राम चूर्ण की मात्रा को बकरी के दूध के साथ पीने से लाभ होता है ।
आंवले के चूर्ण को दही या छाछ के साथ सेवन करें ।
आंवला का रस शहद मिलाकर पीने से अम्ल पित्त शांत करता है ।
आंवलों को अच्छी तरह पीसकर चूर्ण बना लें । फिर इसके 2 ग्राम चूर्ण को नारियल के पानी के साथ, दिन में 2 बार सुबह और शाम पीने से अम्ल पित्त से छुटकारा मिलता है ।
यकृत का बढ़ना - 3 ग्राम से 10 ग्राम की मात्रा में आंवले का चूर्ण, शहद के साथ सुबह शाम सेवन करने से यकृत की क्रिया ठीक हो जाती है ।
पथरी - आंवला, गोखरू, किरमाला, डाम की जड़, कास की जड़ तथा हरड़ की छाल 25-25 ग्राम की मात्रा में लेकर कूट पीसकर चूर्ण बना लें । उस चूर्ण को 2 किलो पानी में डालकर गाढ़ा काढ़ा बना लें । 25 ग्राम काढ़ा शहद के साथ प्रतिदिन सुबह शाम खायें । इससे सभी प्रकार की पथरी ठीक होती है ।
सूखे आंवले का चूर्ण बनाकर मूली के रस के साथ मिलाकर खाने से मूत्राशय की पथरी ठीक होती है ।
कफ ( बलगम ) - आंवला सूखा और मुलहठी को अलग अलग बारीक करके चूर्ण बना लें । और मिलाकर रख लें । इसमें से 1 चम्मच चूर्ण दिन में 2 बार खाली पेट सुबह शाम 7 दिनों तक ले सकते हैं । इससे छाती में जमा हुआ सारा कफ ( बलगम ) बाहर आ जायेगा ।
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टिपिकल बनारसी धमकी -
1 बेटा जेतना तोहर उमर हौ । ओकर दुगना हमार कमर हौ ।
2 जेतना तू पानी न पीले होबे । ओसे ज्यादा हम मूत चुकल हई ।
3 चवन्नी भर क हउवे आउर डालर भर भौकाल ।
4 एतना गोली मारब की छर्रा बिनत बिनत करोडपति हो जइबे ।
5 धाम चंडी काशी में । जीवन बीतल बदमाशी में ।
6 हमके जान ले । हम मारीला कम और घसिटीला जादा ।
7 बेटा... सज के आयल हउवे । बज के जइबे ।
8 गुरु... सम्हर जा । नाही त हफ्तन गोली चली । महिन्नन धुंआ उडी । आउर 2-4 साल तक खोखा बिन्नबे तैं ।
9 सरउ के ! एक लप्पड़ में तीन तरह के मुतबे ।
10 बेटा एतना मारब की उज्जर होइ जाबा । 
कापी पेस्ट ।

भला अत्याचार कौन खरीदेगा ?

कभी तुम अपने बड़े हो गये बच्चों के झगड़े देखना । पति पत्नी के झगड़े देखना । तुम चकित होओगे । वे ठीक तुम्हारे रिकार्ड हैं - हिज मास्टर्स वायस । वे वही दोहरा रहे हैं । जो तुमने किया था । और बड़े ढंग से दोहरा रहे हैं - अक्षर अक्षर । रंग ढंग चेहरे का भी वही हो जाता है उनका । जब झगड़ते हैं । और वही तुम्हारा बेटा करेगा अपनी पत्नी के साथ । जो तुम्हारा पति तुम्हारे साथ कर रहा है ।
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वैराग्य का अर्थ है - खराब आदतों का त्याग । जैसे शक्तिशाली अपने बाहुबल से पार हो जाता है ।  एक फकीर कहीं जा रहे थे । रास्ते में उन्हें 1 सौदागर मिला । जो 5 गधों पर बड़ी बड़ी गठरियां लादे हुए जा रहा था । गठरियां बहुत भारी थीं । जिसे गधे बड़ी मुश्किल से ढो पा रहे थे । फकीर ने सौदागर से प्रश्न किया - इन गठरियों में तुमने ऐसी कौन सी चीजें रखी हैं । जिन्हें ये बेचारे गधे ढो नहीं पा रहे हैं ?
सौदागर ने जवाब दिया - इनमें इंसान के इस्तेमाल की चीजें भरी हैं । उन्हें बेचने मैं बाजार जा रहा हूं । फकीर ने पूछा - अच्छा ! कौन कौन सी चीजें हैं ? जरा मैं भी तो जानूं । सौदागर ने कहा - यह जो पहला गधा आप देख रहे हैं । इस पर अत्याचार की गठरी लदी है । फकीर ने पूछा - भला अत्याचार कौन खरीदेगा ? सौदागर ने कहा - इसके खरीदार हैं - राजा महाराजा और सत्ताधारी लोग । काफी ऊंची दर पर बिक्री होती है इसकी । फकीर ने पूछा - इस दूसरी गठरी में क्या है ? सौदागर बोला - यह गठरी अहंकार से लबालब भरी है । और इसके खरीदार हैं - पंडित और विद्वान । तीसरे गधे पर ईर्ष्या की गठरी लदी है । और इसके ग्राहक हैं वे धनवान लोग । जो एक दूसरे की प्रगति को बर्दाश्त नहीं कर पाते । इसे खरीदने के लिए तो लोगों का तांता लगा रहता है । फकीर ने पूछा -अच्छा ! चौथी गठरी में क्या है भाई ? सौदागर ने कहा - इसमें बेईमानी भरी है । और इसके ग्राहक हैं वे कारोबारी । जो बाजार में धोखे से की गई बिक्री से काफी फायदा उठाते हैं । इसलिए बाजार में इसके भी खरीदार तैयार खड़े हैं । फकीर ने पूछा - अंतिम गधे पर क्या लदा है ? सौदागर ने जवाब दिया - इस गधे पर छल कपट से भरी गठरी रखी है । और इसकी मांग उन औरतों में बहुत ज्यादा है । जिनके पास घर में कोई काम धंधा नहीं हैं । और जो छल कपट का सहारा लेकर दूसरों की लकीर छोटी कर अपनी लकीर बड़ी करने की कोशिश करती रहती हैं । वे ही इसकी खरीदार हैं । तभी महात्मा की नींद खुल गई । इस सपने में उनके कई प्रश्नों का उत्तर मिल गया था ।
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हर 40 मिनट के करीब जब तुम्हारी श्वास बदलती है । एक नासापुट से दूसरे नासापुट में । तब जरा खयाल करना । तुम्हारी भाव दशा भी बदल जाती है । यह 24 घंटे होता रहता है । रात भी तुम करवट बदलते हो । बस भाव दशा बदल जाती है ।
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मेरी अपनी देशना तो यही है कि - जब बच्चे स्वस्थ हों । चाहो तो उन पर थोड़ा ज्यादा ध्यान दे देना । मगर बीमार हों । तो ज्यादा ध्यान मत देना । ध्यान को स्वास्थ्य से जुड़ने दो । जब बच्चे मस्त हों । आनंदित हों । उनको गले लगा लेना । लेकिन जब बीमार हों । तो कंबल उढाकर उनको सुला देना । यह कठोर मालूम पड़ेगा । ऊपर से तो कठोर साफ ही लग रहा है । लगेगा कि यह भी क्या मैं उलटी बातें सिखा रहा हूं ? ऐसे भी मैं उलटी ही बातें सिखाता हूं । लेकिन बच्चा बीमार हो । तब उसे कंबल उढाकर सुला देना । दवा पिला देना । बस ऐसे ही जैसे नर्स करती है । उस वक्त मातृत्व मत दिखलाना । सुविधा हो । तो नर्स ही रख देना । वह ज्यादा अच्छा है । लेकिन जब बच्चा प्रसन्न हो । आनंदित हो । तो कभी उसे गले भी लगाना । उसका हाथ में हाथ लेकर नाचना भी । उसका स्वास्थ्य में रस जोड़ो । ताकि जिंदगी भर उसका रस स्वास्थ्य में रहे । बीमारी में न हो जाये । दुनिया की 70%  बीमारियां समाप्त हो सकती हैं । अगर हम बच्चों का संबंध स्वास्थ्य से जोड़ दें ।
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स्त्रियों ने तो बीमार होने की कला सीख ली है । उनको पक्का पता है कि उन पर ध्यान ही तब दिया जाता है । पत्नी बीमार हो जाये । तो पति पूछने लगता है - साङी लेनी है । क्या करना है ? जो करना हो । भाई करो । मगर बीमार न हो । पत्नी भी जानती है कि जब बीमार हो । तभी पति ध्यान देता है । नहीं तो पति अपना अखबार पढ़ता है । ध्यान देने की फुर्सत कहां है ? वह आते ही से अपने पैर फैलाकर अखबार की ओट में हो जाता है । अखबार ओट है । वह बचने का उपाय है । पति आते ही से अखबार खोल लेता है । पत्नी इत्यादि सब उस तरफ छूट गये । झंझट मिटी । अब वह 1 ही अखबार को कई दफे पढ़ता है ।
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सबके बच्चे इतने सौभाग्यशाली होने चाहिए कि उनके माता पिता के जीवन में धन, पद, परिवार से ज्यादा कुछ हो । उनके माता पिता के जीवन में परमात्मा की थोड़ी सी झलक हो । बूंद ही सही । वही झलक उनको पकड ले । तो वे तृप्त न हो सकेंगे - साधारण जीवन से । फिर उन्हें कितना ही धन मिल जाये । और कितना ही पद मिल जाय । उनके पीछे कोई कचोटता ही रहेगा कि अभी वह बूंद नहीं मिली । जो मेरी मां की आंखों थी । अभी वह मस्ती मुझे नहीं मिली । पाना है उसे । पाना ही होगा । नहीं तो जीवन अकारथ गया । नहीं तो जीवन में कोई अर्थ नहीं है । वह काव्य मुझे मालूम नहीं हो रहा है । तो जरूर कहीं कोई कमी रह गयी है । कोई तलाश करनी है । कोई खोज करनी है ।
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परमात्मा बड़ी सरल घटना है । और चुपचाप घट जाती है । पगध्वनि भी सुनाई नहीं पड़ती । जरा शोरगुल नहीं होता । मौन सन्नाटे में घट जाती है । जरा आंख खोलो । कुछ करने को नहीं है । कुछ करने की कभी कोई जरूरत नहीं थी । तुम वही हो - तत्वमसि ।
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अगर बच्चा अपने मां और पिता की मस्ती की प्रतिमा अपने भीतर रख सके । तो आज नहीं । कल वह भी मस्त होगा । उसके पीछे वह प्रतिमा घूमती रहेगी । उसका पीछा करेगी । उसे लगता रहेगा कि जब तक ऐसी मस्ती मुझे न मिल जाए । तब तक कुछ कमी है । जिंदगी में कुछ चूका हुआ है । मेरी मां तो मस्त थी । अभी बच्चों को यह पता ही नहीं चलता कि उनकी जिंदगी में कुछ चूक रहा है । क्योंकि उनकी मां भी ऐसी ही परेशान थी । उनके पिता भी ऐसे ही परेशान थे । उनकी मां भी लड़ रही थी । उनके पिता भी लड़ रहे थे । घर में कलह ही कलह थी । वे भी लड़ेंगे । हर लड़की अपनी मां को दोहरायेगी । हर बेटा अपने बाप को दोहरायेगा ।
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तुम्हारे बच्चों को कभी पता नहीं चलेगा कि उनके जीवन में कुछ खोया है । क्योंकि उनके पास कोई और मापदंड नहीं है । जिससे वे तौलें । वे देखेंगे इसी तरह हमारी मां थी परेशान । उसी तरह हम परेशान हैं । इसी तरह हमारी मां लड़ रही थी । उसी तरह हम लड़ रहे हैं । इसी तरह हमारी मां कर रही थी । उसी तरह हम कर रहे हैं । उन्हें पता नहीं चल सकता कि जीवन में कुछ खोया है । उन्होंने जाना ही नहीं कोई मस्त आह्लादित जीवन । उन्होंने कोई झलक ही नहीं देखी । जब फूल खिले हों । उन्होंने काटे ही जाने हैं । कांटे ही उनको चुभ रहे हैं । यही भाग्य है । ऐसा मानकर वे जी लेंगे ।
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इस जगत के जो सर्वाधिक अमृतमय वचन हैं । उनमें सबसे ऊंची कोटि पर रखा जा सके । तो यह उदघोषणा करने वाला वचन है - तत्वमसि । 
तुम वही हो । तुम जरा भी अन्यथा नहीं हो । इसे ही दूसरे ढंग से कहा है - अहं ब्रह्मास्मि । मैं ब्रह्म हूं । मुझ में और ब्रह्म में जरा भी भेद नहीं है ।
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ध्यान से जो मस्ती आती है । वह मस्ती 1 अर्थ में बेहोशी लाती है । और 1 अर्थ में होश भी लाती है । वह मस्ती बड़ी विरोधाभासी है - होश और बेहोश 1 साथ बढ़ता है ।
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Truth is  Within  You  Do not   Search   For it   Elsewhere - OSHO

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