11 फ़रवरी 2014

जिसे भय से ऊपर उठना हो

प्रेम से बड़ी कोई शक्ति है ? नहीं । क्योंकि जो प्रेम को उपलब्ध होता है । वह भय से मुक्त हो जाता है । 1 युवक अपनी नववधू के साथ समुद्र यात्रा पर था । सूर्यास्त हुआ । रात्रि का घना अंधकार छा गया । और फिर एकाएक जोरों का तूफान उठा । यात्री भय से व्याकुल हो उठे । प्राण संकट में थे । और जहाज अब डूबा । तब डूबा होने लगा । किंतु वह युवक जरा भी नहीं घबड़ाया । उसकी पत्नी ने आकुलता से पूछा - तुम निश्चिंत क्यों बैठे हो ? देखते नहीं कि जीवन बचने की संभावना क्षीण होती जा रही है । उस युवक ने अपनी म्यान से तलवार निकाली । और पत्नी की गर्दन पर रखकर कहा - क्या तुम्हें डर लगता है ? वह युवती हंसने लगी । और बोली - तुमने यह कैसा ढोंग रचा ? तुम्हारे हाथ में तलवार हो । तो भय कैसा ? वह युवक बोला - परमात्मा के होने की जबसे मुझे गंध मिली है । तब से ऐसा ही भाव मेरा उसके प्रति भी है । तो भय रह ही नहीं जाता है । प्रेम अभय है । अप्रेम भय है । जिसे भय से ऊपर उठना हो । उसे समस्त के प्रति प्रेम से भर जाना होगा । चेतना के इस द्वार से प्रेम भीतर आता है । तो उस द्वार से भय बाहर हो जाता है ।
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1 अदभुत अनुभव मुझे हुआ । वह मैं कहूं । अब तक उसे कभी कहा नहीं । अचानक ख्याल आ गया । तो कहता हूं । कोई 12 साल पहले । 13 साल पहले । बहुत रातों तक 1 वृक्ष के ऊपर बैठकर ध्यान करता था । ऐसा बारबार अनुभव हुआ कि जमीन पर बैठकर ध्यान करने पर शरीर बहुत प्रबल होता है । शरीर बनता है - पृथ्वी से । और पृथ्वी पर बैठकर ध्यान करने से शरीर की शक्ति बहुत प्रबल होती है । वह जो हाइटस पर । पहाड़ों पर । और हिमालय पर जाने वाले योगी की चर्चा है । वह अकारण नहीं है । बहुत वैज्ञानिक है । जितनी पृथ्वी से दूरी बढ़ती है शरीर की । उतनी ही शरीर तत्व का प्रभाव भीतर कम होता चला जाता है । तो 1 बड़े वृक्ष के ऊपर बैठकर मैं ध्यान करता था रोज रात । 1 दिन ध्यान में कब कितना लीन हो गया । मुझे पता नहीं । और कब शरीर वृक्ष से गिर गया । वह मुझे पता नहीं । जब नीचे गिर पड़ा शरीर । तब मैंने चौंककर देखा कि यह क्या हो गया है । मैं तो वृक्ष पर ही था । और शरीर नीचे गिर गया । कैसा हुआ अनुभव । कहना बहुत मुश्किल है । मैं तो वृक्ष पर ही बैठा था । और शरीर नीचे गिरा था । और मुझे दिखाई पड़ रहा था कि वह नीचे गिर गया है । सिर्फ 1 रजत रज्जू । 1 सिलवर कार्ड नाभि से और मुझ तक जुड़ी हुई थी । 1 अत्यंत चमकदार शुभ्र रेखा । कुछ भी समझ के बाहर था कि अब क्या होगा ? कैसे वापस लौटूंगा ? कितनी देर यह अवस्था रही । वह भी पता नहीं । लेकिन अपूर्व अनुभव हुआ । शरीर के बाहर से पहली दफा देखा शरीर को । और शरीर उसी दिन से समाप्त हो गया । मौत उसी दिन से खत्म हो गई । क्योंकि 1 और देह दिखाई पड़ी । जो शरीर से भिन्न है । 1 और सूक्ष्म शरीर का अनुभव हुआ । कितनी देर यह रहा । कहना मुश्किल है । सुबह होते होते 2 औरतें वहां से निकलीं दूध लेकर किसी गांव से । और उन्होंने आकर पड़ा हुआ शरीर देखा । वह मैं देख रहा हूं ऊपर से कि वे करीब आकर बैठ गई हैं । कोई मर गया । और उन्होंने सिर पर हाथ रखा । और 1 क्षण में जैसे तीव्र आकर्षण से मैं वापस अपने शरीर में आ गया । और आंख खुल गई । तब 1 दूसरा अनुभव भी हुआ । वह दूसरा अनुभव यह हुआ कि स्त्री पुरुष के शरीर में 1 कीमिया और केमिकल चेंज पैदा कर सकती है । और पुरुष स्त्री के शरीर में 1 केमिकल चेंज पैदा कर सकता है । यह भी ख्याल हुआ कि उस स्त्री का छूना और मेरा वापस लौट आना । यह कैसे हो गया ? फिर तो बहुत अनुभव हुए इस बात का । और तब मुझे समझ में आया कि हिंदुस्तान में जिन तांत्रिकों ने समाधि पर और मृत्यु पर सर्वाधिक प्रयोग किये थे । उन्होंने क्यों स्त्रियों को भी अपने साथ बांध लिया था । क्योंकि गहरी समाधि के प्रयोग में अगर शरीर के बाहर तेजस शरीर चला गया है । सूक्ष्म शरीर चला गया है । तो बिना स्त्री की सहायता के पुरुष के तेजस शरीर को वापस नहीं लौटाया जा सकता । या स्त्री का तेजस शरीर अगर बाहर चला गया है । तो बिना पुरुष की सहायता के उसे वापस नहीं लौटाया जा सकता । स्त्री और पुरुष के शरीर के मिलते ही 1 विद्युत वृत, 1 इलेक्ट्रिक सर्किल पूरा हो जाता है । और वह जो बाहर निकल गई है चेतना । तीव्रता से भीतर वापस लौट आती है । फिर तो 6 महीने में कोई 6 बार अनुभव निरंतर । और 6 महीने में मुझे अनुभव हुआ कि मेरी उम्र कम से कम 10 वर्ष कम हो गई । 10 वर्ष कम हो गई मतलब । अगर मैं 70 साल जीता । तो अब 60 ही साल जी सकूंगा । 6 महीने में कई अजीब अजीब से अनुभव हुए । ओशो
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प्रत्येक देही अस्तित्व के दो पहलू होते हैं । एक सामान्य और दूसरा किसी भी ज्ञान से युक्त या संयुक्त । जैसे किसी पढोसी डाक्टर आदि को सशरीर रोज देखो । और उसको उसके ज्ञान के स्तर पर जानते हो । तो यह देखना और ही होता है । इसी से श्रद्धा नफ़रत आदर आदि भावों का सृजन होता है । गुरु या अंतर के साधकों, ज्ञानियों का एक प्रकाशित आंतरिक रूप अलग होता है । उसी को देखना असली देखना होता है ।
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शून्य में रस लो । तो धीरे धीरे ये विचार समाप्त हो जायेंगे । यह शून्य बड़ा महिमाशाली है । शून्य को ही तो ध्यान कहा है । सौभाग्य से मिलता है । अब मिल गया है । तो इसे खराब मत करो । अब तो इस शून्य में डूबो । यद्यपि प्राथमिक चरण पर डूबना ऐसा ही लगेगा । जैसा मरे । मौत हुई । और 1 अर्थ में ठीक भी है । तुम तो मरोगे ही । तुम जैसे अब तक रहे हो । इस शून्य में डूबोगे । मिट जाओगे । नये का जन्म होगा । आविर्भाव होगा ।
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तुलसी कहते धनुष हाथ है । सूर कहे बस मुरली है । 
गौतम कहते अजब शांति है । महावीर कहे करूणा ही है । 
कहे कबीर सूरज सा सच्चा । मीरा कहे वो प्रेमी है ।
जैसे चाहो मिलता वैसे । वो तो बस अपना ही है । 
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1 लड़की दुपटटा मुंह पर लपेटे हुए स्कूटी से जा रही थी । पास से 1 आदमी बाइक से जाते हुए बोला - जानेमन ! ज़रा मुखड़ा तो दिखाती जाओ । लड़की - पापा ! मैं हूँ पिंकी ।
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Meditation cannot be a part  Either it is whole or not It is not an act
It is not an activity It is your very being - Osho
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