28 सितंबर 2015

एक मृत्यु और

अभी पिछले 8 दिनों से मौसम कुछ कुछ राहत वाला है । लेकिन इससे पूर्व कोई 40 दिनों तक लगातार आश्रम में भी भीषण गर्मी का साम्राज्य कायम था । आश्रम में भी मैंने इसलिये लिखा । क्योंकि आश्रम में दो सालों में ऐसी गर्मी मैंने पहली बार देखी । थोङा आश्चर्य कर सकते हैं कि 48 दिनों पूर्व जब भीषण गर्मी वाले दिन थे । आश्रम में बसन्त बहार सी छायी हुयी थी ।
ऐसी ही गर्मी के मध्य मुझे करीब 22 दिन पहले एलर्जिक जुकाम और फ़िर खांसी हो गयी । और कुछ दिनों में भोजन कङवा सा लगने लगा । पर अधिक कुछ न मालूम पङा । साथ के लोगों ने कहा - शरीर बहुत गर्म है । पर उसका भी मैंने कोई नोटिस न लिया । शरीर का बहुत गर्म या बहुत ठंडा हो जाना, मेरे लिये उन शारीरिक क्रियाओं में से था । जो अक्सर हो जाते हैं । फ़िर सबने कहा - तेज बुखार है । लेकिन मुझे अलग से कुछ नहीं लग रहा था । पर यकायक मुझे थोङे में ही थकान महसूस होने लगी । और मुझे 2 घन्टे बाद ही लेटना पङता था । जब सबने फ़िर कहा - तेज बुखार है । तो अबकी मैंने मान लिया । और डाक्टर को भी बोल दिया । लेकिन अन्दर से कोई कमजोरी या बुखार जैसा नहीं लगा ।
इससे पहले अमृतसर के दो सरदार जी आये थे । उन्होंने मुझे सेहत का ख्याल रखने और धूम्रपान न करने की सलाह दी । इस पर मेरे मुँह से निकल गया - मृत्यु मेरे लिये वरदान के जैसी है । और दूसरे जीने की कोई वजह नहीं ।
उन्होंने कहा - आप ऐसा न कहें । हम लोगों को आपकी बेहद जरूरत है । और परमात्मा अभी आपसे कार्य लेना चाहता हो ।
डाक्टर ने मुझे वायरल फ़ीवर के तौर पर इलाज दिया । जिससे हल्का बुखार तो कम हुआ । पर अन्ततः चार दिन बाद वह भी बेकार हो गया । तब डाक्टर ने मुझे विभिन्न टेस्ट के बाद उपचार की सलाह दी । और फ़िर मैं फ़िरोजाबाद ट्रामा सेंटर में भर्ती हो गया । तुरन्त सभी टेस्ट के बाद मुझे भर्ती कर लिया गया । टेस्ट रिपोर्ट के बाद जो बात मेरे नोटिस में आ रही थी । वो डाक्टरों का चौंकना और बारबार पूछना था..पहले कभी मूत्र, थूक आदि से खून आया । किसी कारण से कोई गर्म चीज खायी हो । पहले कोई गम्भीर बीमारी बनी हो ।
मेरी तरफ़ से इन सबका उत्तर ‘नहीं’ था । मैं उनके पूछने चौंकने के कारण जानता था । पर वे मेरा कोई कारण न जानते थे । टेस्ट की रिपोर्ट के बाद मेरा ब्लड प्रेसर नापा गया । और नर्स हैरत से बोली - हैं..बीपी तो नार्मल है ( फ़िर ऐसा तीन बार हुआ और यही संवाद दोहराया गया ) जो विभिन्न टेस्ट रिपोर्ट आयी थीं । उनके चलते वे अचानक और निश्चय ही मुझमें कोई भूकंपीय अटैक अनुमानित कर रहे थे । और मेरे थोङा खांसने पर भी चौंक कर देखते । जबकि वास्तव में मैं पूर्णतः शान्तचित्त था । और कोई परेशानी नहीं थी ।
आनन फ़ानन एक के बाद एक मुझे तीन बोतलें चढाई गयीं । और कुछ इंजेक्शन कुछ गोलियां भी दी गयीं । इसके बाद डाक्टर ने पूछा - कोई फ़र्क महसूस हुआ । आराम आया ।
मैंने कहा - मुझे तो कुछ नहीं लगा । ( वह कुछ नहीं बोला )
दूसरे दिन मैंने अपनी तरफ़ से छुट्टी के लिये बोला । ट्रामा सेंटर में पेशेंट केस फ़ाइल टेस्ट रिपोर्ट आदि उन्हीं के पास रहती है । मरीज को नहीं देते ।
तब डाक्टर ने कहा - इतनी जल्दी छुट्टी कैसे हो सकती है । इनको टायफ़ाइड है । और प्लेटलेटस कम हो चुकी हैं । आगे कुछ कहते कहते वह रुक गया ।
लेकिन मैंने अपनी परेशानी बतायी । और आश्रम पर ही निर्देशित इलाज करा लेने को कहकर छुट्टी करा ली ।
ये सब वह था, जो बाह्य तौर पर हुआ । ये दरअसल एक मृत्यु और थी । कुछ वैसी ही जिनसे मैं पहले भी दो चार बार गुजर चुका था । मैं चाह रहा था । शरीरान्त हो जाये । पर मैं अच्छी तरह जानता था । ऐसा नहीं होगा ।
इस बार के अनुभव में भी जो सबसे पहली चीज मुझे ज्ञात हुयी कि कोई भी अग्नि लौ ( माचिस की तीली आदि ) मेरे लिये बेहद धुंधली नजर आ रही है । जबकि अन्य चीजें एकदम स्पष्ट थी । कहने का मतलब बुखार या कमजोरी की वजह से दृष्टि धुंधली नहीं हुयी थी । जब पहली बार मैंने इस चीज का नोटिस लिया । तो और भी पक्का करने हेतु बारबार लौ को देखा । वह चमकीली के बजाय एकदम मरियल थी । कुछ मटैली सी थी । यह अग्नि तत्व का क्षीण होना था ।
इसके बाद पानी एकदम बेजान सा अजीब सा और बेमतलब सा लगा । ये जल तत्व क्षीण होना था ।
इक्का दुक्का चीजों को छोङकर कोई भी खाद्य पदार्थ एकदम बेस्वाद रसहीन और कुछ भी खाने की इच्छा न होना जैसा अनुभव हुआ । ये प्रथ्वी तत्व का क्षीण होना था ।
हाँ वायु तत्व और आकाश तत्व पुष्ट थे । और लगभग निर्मल थे । लेकिन जब जब चेतना डूबने या लुप्त सी होने लगती । ये भी सिमट जाते ।
यहाँ मनोवैज्ञानिक दिमाग वाले एक उपहासी अन्दाज में इनको बुखार और कमजोरी का लक्षण मान सकते हैं । और ये सत्य भी है कि कुछ कुछ ऐसे ही लक्षण होते भी हैं । क्योंकि प्रायः सभी बीमारियों में तत्व क्षीणता ही होती है ।
लेकिन यहाँ एक बारीक और असामान्य फ़र्क यह होता है कि उनका अनुभव दूसरे तरह का होता है । यदि वह मृत्यु पूर्व का न हो । तो चेतना डूबने जैसा अनुभव अक्सर नहीं होता । और जब चेतना डूबने का नहीं होता । तो महसूस हुयी तत्व क्षीणता कमजोर महसूस होती है । लेकिन वैसी कभी नहीं । जो मैंने ऊपर कही । मोटे तौर पर उन्हें कभी नहीं लगता कि वे मरने वाले हैं या मर सकते हैं ।
आत्मज्ञान के साधक को यदि वह कारण महाकारण से ही ऊपर है । और निरन्तर अग्रसर है । तो कई कई बार ऐसी मृत्यु के अनुभव होना सामान्य बात है । जो पूरी तरह मृत्यु ही होते हैं । पर शरीरान्त नहीं होता ।
जैसा कि हमेशा ही मेरी मजबूरी रही है कि कुछ वर्जित बातें, जिनसे तस्वीर एकदम स्पष्ट हो जाये । मैं वैसे नियम के कारण नहीं बता पाता ।
पर ये दरअसल सिर्फ़ एक यौगिक क्रिया न होकर मेरे विद्रोह और अहंकार की एक सजा भी थी । जो बर्दाश्त की सीमा टूट जाने पर स्वाभाविक ही उत्पन्न हो जाते हैं । और सोचिये, तब क्या मजा होता होगा । जब अपराधी मृत्यु या किसी भी अंजाम से भयभीत न हो ।
यहाँ गौर करने वाली बात ये भी है कि नियम तोङने वाला ही पदार्थिक फ़ेरबदल कर नये निर्माण करता है । पर तय पदार्थिक नियमों को तोङना बेहद कष्टमय शारीरिक स्थिति को झेलना है । जिसका अब मैं आदी हो चुका हूँ । और शायद ऐसे ही स्वभाव और उससे उत्पन्न हुयी प्रेरणा से मैंने जिस मंडल का गठन किया । उसका नाम ही है - मुक्त मंडल ।
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बरहाल ये लेख लिखना इस बात का प्रमाण है कि अब मैं लगभग स्वस्थ हूँ । और फ़ौजी की राह तकती उस पत्नी की भांति कलेंडर में उस तारीख को खोजता हूँ । जब वास्तविक रूप से मेरी शरीरान्त वाली मृत्यु होगी ।

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