12 जून 2010

छलावा..बच के रहना..?

छलावा या छिराया या छहराया एक बेहद छोटी किस्म की बेहद मामूली हैसियत रखने वाली प्रेत की एक किस्म होती है । मेरे लिये प्रेत की ये किस्म हमेशा इसलिये रहस्यमय रही । क्योंकि अक्सर इसका उद्देश्य क्या और क्यों होता है । ये मेरी समझ में नहीं आया । दूसरे इसके द्वारा गिनी चुनी घटनाओं को छोङकर । मैंने बहुत कम लोगों का इसके द्वारा अहित होते देखा है ।
लेकिन कुछ एक मामलों में इसके द्वारा स्त्री पुरुषों को प्रेरित कर मार डालने की घटनायें भी देखी गयी हैं । इसकी सबसे बङी खासियत ये होती है कि ये किसी को भी प्रेत भाव से लम्बे समय के लिये आवेशित नहीं करता । और न ही कभी ये आवाहन मैं अपने को प्रकट करता है । क्योंकि इसका आवाहन करने की नौबत ही नहीं आती ।
इसकी सबसे बङी वजह ये होती है  कि ये मुश्किल से दस पन्द्रह मिनट के लिये किसी को प्रभावित करता है । इसका शिकार इसकी मर्जी के अनुसार कार्य करे तो भी । और न करे तो भी । ये बाह्य रूप से उसको प्रभावित करके । अपने नाम के अनुसार । छलावे की तरह गायब हो जाता है ।
मेरी हैरत और दिलचस्पी की सबसे बङी वजह ये थी कि ये विश्व के किसी भी कोने में समान रूप से कभी घनी बस्ती और कभी पाश कालोनी और कभी निर्जन स्थानों पर याने कहीं भी कभी भी किसी भी स्थान पर ये समान रूप से प्रकट होता है । और अपना काम करके नौ दो ग्यारह ।
दूसरे ये उमर ,लिंग , समय आदि किसी भी चीज की परवाह नहीं करता । एक दूध पीते बच्चे से लेकर मरणासन्न वृद्ध इसके शिकार होते हैं ।


इसको ठीक से समझने के लिये एक ऐसे चालाक चोर की भी कल्पना की जा सकती है । जो बेहद चतुराई से चोरी करता है । और सबूत भी नहीं छोङता । एक और बात है । मैंने उल्लेखनीय प्रेत लोकों में कभी इस प्रेत का अस्तित्व नहीं देखा ।और क्योंकि मैंने कभी इस पर किसी प्रकार का न कोई काम किया और न ही वैसा अवसर कभी मेरे सामने आया । कि मुझे छलावा से किसी तरह के " टच " की जरूरत होती ।
फ़िर भी जो भी मैंने इसके बारे में जाना । उसके अनुसार ये प्रथ्वी पर ही रहता है । और छलावा की जो सात आठ किस्में मेरी जानकारी में आयी । इनमें सबसे खतरनाक मेरे अनुसार वो है । जो जीव को आत्महत्या के लिये प्रेरित करती है । अब मेन बात ये देखिये । कि मेरे अनुभव के अनुसार प्रथ्वी पर बहुत कम लोग लोग ऐसे होंगे । जो कभी न कभी किसी न किसी रूप में इससे प्रभावित न हुये हों ।
और उस पर हैरत की बात ये कि वे समझ तक नहीं पाते कि हम अभी अभी किसी छोटे मोटे प्रेत भाव से प्रभावित हुये थे । आईये देखें । छलावा किस प्रकार मनुष्य को प्रभावित करता है । इसकी एक किस्म जो बेधङक हमारे घरों में घुस आती है । और विश्व में लगभग प्रत्येक को प्रभावित करती है । इस तरह से कार्य करती है ।
जब हम गहरी नींद में सो रहे होते हैं । और अचानक बेहद डरावना सपना देखते हैं । इस सपने में कोई भी चाहे वो जंगली जानवर हो या कोई आतंकवादी या कोई भूत प्रेत चुङैल जैसी डरावनी आकृति या कोई हमारा जाना अनजाना दुश्मन कहने का आशय ये कि दुश्मन के माध्यम के रूप में कोई भी हो ।
सपने की उस स्थिति में हमें इस बात का भय हो जाता है  कि सामने वाला हमें मार डालने पर आमादा है । या हमारा गला दवा रहा है । या हमारे किसी परिजन या प्रिय बच्चे को मार डालने पर आमादा है..? और सपने की उस स्थिति में हम बेतहाशा अपने किसी परिजन को पुकार रहे होते हैं । हमें लगता है कि हम काफ़ी जोर से चिल्ला रहे मम्मी..पापा..भैया...आदि और हमारे परिजन हमारे पास ही दूसरे कमरे में या आंगन आदि में है ।
पर जाने क्यों वे हमारी आवाज सुन नहीं पा रहे । जबकि हम काफ़ी जोर लगाकर पुकार रहे हैं । वास्तविकता ये होती है कि हमारी आवाज ही नहीं निकल रही होती । इसी तरह ये सपना क्लायमेक्स पर पहुँचकर हमारी आंख खुल जाती है..और आँख खुल जाने के बाद भी ..अलग अलग मनुष्यों की स्थिति के अनुसार हमें सामान्य होने में दस से बीस मिनट लग जाते है ।


अब देखिये । छलावा अपना काम कर गया और आपको पता तक नहीं चला । अब यहीं पर एक विरोधाभास भी है । इसी से मिलती जुलती एक स्थिति । और इसी से मिलता जुलता एक सपना । ऐसा भी होता है । जिसमें छलावा का कोई रोल नहीं होता । ये स्थिति तब होती है । जब हम सीने पर हाथ रखकर । या किसी अन्य प्रकार का दवाव लेकर सो जाते है । या हमारे शरीर का कोई भी कमर से ऊपर का हिस्सा हल्का या कुछ ही अधिक दवाव में लगभग पन्द्रह से बीस मिनट के लिये आ जाता है । और शरीर में निर्वाध रूप से होते रक्त संचार में बाधा आती है । और तब शरीर का स्वचालित सिस्टम एक " डरावने अलार्म " के स्टायल में हमें सचेत करता है ।
मैं खुद दावे से कहता हूँ कि ये भूतिया स्थिति नहीं होती । बेहद थकान में अस्त व्यस्त अवस्था में सो जाने पर । या बेहद गर्मी या बेहद सर्दी में भी सो जाने पर भी ये स्थिति होती है । और गारन्टिड ये भूतिया नहीं होती ।
दरअसल छलावे का प्रभाव और गलत (मुद्रा आदि में ) सोने की स्थिति से हुआ प्रभाव । एक समान प्रतीत होते हुये भी इन दोनों के अनुभव में काफ़ी अन्तर है । गलत ढंग से सोने से हुआ डरावना अनुभव मुश्किल से एक मिनट या उससे भी कम समय के लिये होता है ।
इसमें दुश्मन माध्यम के रूप में जो भी होता है । हमारा परिचित होता है । दूसरे सबसे बङी खास बात अक्सर ये होती है कि इसमें हम लम्बे समय तक चिल्लाने या सहायता के लिये पुकारने का अनुभव नहीं करते । जाग जाने के बाद हमें कोई खास भय महसूस नहीं होता । इसका प्रभाव अक्सर जागते ही समाप्त हो जाता है । जबकि छलावे के आक्रमण में स्थितियाँ ठीक विपरीत होती हैं । हम एक छोटी सी घटना टायप कोई कहानी देखते हैं । और उस वक्त वो कहानी हमारे लिये अनजानी नहीं होती । यानी जो हो रहा है ।
और हम जिस स्थान पर हैं । वो हमारे लिये उस वक्त परिचित होता है । भले ही ऐसी घटना और ऐसे स्थान से इस वर्तमान जीवन में हमारा कोई वास्ता न पङा हो । फ़िर अचानक कहानी चलते चलते ऐसा मोङ लेती है कि मान लो हमारे ऊपर मृत्यु के समान कोई खतरा है । और हम डरते हैं । बेतहाशा भागते हैं । परिजनों को पुकारते हैं । यह सब भय अनुमानतः हम दस से लेकर कभी कभी बीस मिनट तक महसूस करते हैं । और अन्त में बेहद घबराहट की स्थिति में जागते हैं और जागने के बाद भी भय और बैचेनी महसूस करते है । अगर ऐसे अनुभव से आप गुजरे हैं ।


और जब आप जागे । तब आपने देखा कि आप सामान्य स्थिति में ही सो रहे थे । यानी रक्त संचरण में कोई बाधा नहीं थी । यह निसंदेह छलावा था । ये छलावा इससे ज्यादा और कुछ नहीं करता । आप को किसी तरह की इससे कोई हानि नहीं होती । सिर्फ़ एक डरावने सपने के अनुभव के अतिरिक्त और कुछ नुकसान नही होता । दूसरे ये फ़िर आपकी जिन्दगी में दोबारा नहीं आता । यदि इसी से मिलता जुलता आपको फ़िर कोई अन्य अनुभव होता है । तो वो दूसरा छलावा है ।(
लेकिन यहाँ एक बात स्पष्ट कर दूँ । कुछ लोग बार बार एक ही तरह का डरावना या कोई रहस्यमय सपना देखते हैं । और अक्सर वो सपना उन्हें याद रहता है । यह छलावा नहीं होता ।) यही वो सामान्य छलावा है । जिसका प्रत्येक जीव अपने जीवन में कभी न कभी अनुभव करता है ।
इसके अतिरिक्त जो छलावे होते हैं वो कम या अधिक स्तर पर मनुष्य को नुकसान पहुँचाते हैं । दूसरे किस्म का एक छलावा अक्सर निर्जन स्थानों पर । खासकर निर्जन स्थानों में जहाँ नदी नहर तालाव या झील आदि होते हैं । वहाँ होता है । ये ऐसा द्रष्य क्रियेट करता है कि आपके अन्दर एक कौतूहल पैदा हो जाय । और आप लगभग सम्मोहित स्थिति में इसके पीछे पीछे चले जाँय ।
जैसे आपको ऐसे निर्जन स्थानों पर कोई घरेलू बकरी , भैंस या कुत्ता इस रूप में आकर्षित करेगा । मानों भटककर आ गया हो । उस वक्त वो आप को इस तरह आकर्षित करता है कि आप न चाहते हुये भी उसके पीछे चल देते हैं । और अपने अपेक्षित क्षेत्र में ले जाकर वो रूप अचानक गायब हो जाता है । कभी कभी इससे प्रभावित लोग नदी नहर या झील तक में उतर जाते हैं । भले ही वो ढंग से तैरना नहीं जानते ।


इसके दो प्रमुख उद्देश्य मेरी स्टडी में आये । एक तो ये अपने नाम और स्वभाव के अनुसार निरुद्देश्य आपको परेशान कर मजा लेता है । दूसरा ये अक्सर आपको प्रेत प्रभावित क्षेत्र में ले जाता है । छलावे की एक तीसरी किस्म मेरे हिसाब से खतरनाक होती है । पर राहत की बात ये है कि ये ज्यादातर बस्ती से दूरस्थ स्थानों जैसे किसी नहर आदि का पुल , जैसे प्रयोग में न लाया जाने बाला शमशान स्थल , कोई खन्डित हो चुका निर्जन देवालय के समीप का स्थल..आदि कई प्रकार के स्थान हो सकतें हैं ।
 बस खास पहचान ये है  कि स्थान लगभग निर्जन होगा और किसी प्रकार से दोष युक्त होगा ..जैसे आसपास किसी की हत्या या आत्महत्या हुयी हो । किसी ने गलत तरीके से किसी शव का संस्कार किया हो । किसी प्रकार के देवी देवता पूजन विधान में किसी से भारी गलती हुयी हो । ऐसे अनेकों कारण हो सकते हैं ।
अब ये छलावा क्या करता है । कोई शराब में धुत..या मांसाहार का सेवन करके..या किसी विशेष पूजा में जानवूझकर कोई गलती करता है । जैसे विशेष वृतों आदि में अभक्ष्य भोजन का सेवन । स्त्री या पुरुष किसी के द्वारा उस वृत या पूजा में वर्जित होने के बाबजूद सहवास कर लेना । तो ये उस दोषी व्यक्ति की बुद्धि हरण कर लेता हैं ।
और मनुष्य में अचानक एक भारी हताशा का जन्म हो जाता है । और वैसी अवस्था में मनुष्य सोचता है कि जीवन बेकार है..? और आत्महत्या कर लेता है । यदि भाग्यवश बच भी जाता है । तो भी वह अपने शरीर को काफ़ी नुकसान पहुँचा लेता हैं । ये आत्महत्या आदि मनुष्य उन्हीं दूषित स्थानों पर पहुँचकर करता है । जिनका मैंने ऊपर वर्णन किया है ।
पर आप लोग डरें नहीं । अरबों की आवादी वाली इस प्रथ्वी पर एक मोटे अनुमान के मुताविक ( आंकङे नहीं हैं । ये दर ऊपर नीचे हो सकती है ) यदि एक करोङ मत्यु प्रतिदिन होती है । तो पूरी प्रथ्वी पर दो या तीन हजार लोग प्रेतभाव से प्रभावित होकर मरते हैं । वो भी तब जब उन्होंने खुद कोई गलती की हो और " आ बैल मुझे मार " जैसा काम जाने या अनजाने कर बैठे हों । और जो सात्विक भाव के हैं । और केवल हनुमान चालीसा आदि जैसी कोई छोटी मोटी पूजा भी करतें हैं । उनसे इस तरह की बलांए चार कोस दूर भागती हैं ।
प्रेतों से बचने के कुछ उपाय ये हैं । किसी भी इस प्रकार के निर्जन क्षेत्र से यदि आपको गुजरना पङें तो एकदम नये और सफ़ेद वस्त्र हरगिज न पहनें । किसी प्रकार की खुशबू या परफ़्यूम का उपयोग न करें । उस क्षेत्र से गुजरते वक्त काम विचारों से एकदम दूर रहें और हो सकें तो अपने इष्ट का चिंतन करें ।
यदि किसी कारणवश आपको ऐसे क्षेत्र से गरमागरम भोजन चाहे वो शाकाहारी हो या माँसाहारी के साथ ( जिसमें खाने की मनमोहक खुशबू आ रही हो या न भी आ रही हो ) गुजरना पङे तो उस भोजन में से एक टुकङा खाकर उसे झूठा कर दें । भोजन और कामवासना के विचारों से प्रेतावेश के मामले सर्वाधिक देखने को मिलते हैं । भोजन में से उङने वाली खुशबू प्रेतों का आहार होती है ।
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