27 जून 2010

कुन्डलिनी महामाया

सर्व संसार में एक शक्ति काम कर रही है । संसार की समस्त रचना उसी के द्वारा हुयी है । इस शरीर में भी कार्य करने वाली वही शक्ति है । उसको कुन्डलिनी महामाया कहते है ।
इसका स्थान नाभि के नीचे है । पेट में मांस का एक कमल है । इस कमल के बीच ही ह्रदय कमल स्थिति है । इस कमल में सूर्य और चन्द्रमा स्थित है । इस कमल के अन्दर दो और कमल हैं ।
एक कमल नीचे और दूसरा ऊपर है । एक कमल आकाश रूप और दूसरा प्रथ्वी रूप है । ऊपर के कमल में सूर्य का निवास और नीचे के कमल में चन्द्रमा का निवास है ।
इन दोनों के मध्य में ही कुन्डलिनी महामाया रहती है । और साँप के समान साढे तीन लपेटे मारकर बैठी है । वह उज्जवल मोतिंयो के भन्डार के समान प्रकाशित है ।
इससे स्वतः जो वायु निकलती है । वह साँप की फ़ुफ़कार के समान " प्राण " और " अपान " रूप में स्थित रहती है ।
यह दोनों वायु आपस में टकराती हैं । तो इनसे एक प्रकार की संघर्ष शक्ति पैदा होती है । उसका दूसरा नाम जठरागिन है । यह पेट में इस तरह रहती है । जैसे सागर में बङबानल अग्नि का वास होता है । यह दोनों ही जल सुखाती हैं ।


प्राण और अपान परस्पर टक्कर खाती हैं । उससे ह्रदय में बङा प्रकाश होता है । इस ह्रदय में एक भंवरा सोने के रंग का है । उस भंवरे के दर्शन से योगी की दृष्टि लाख योजन तक देखने की क्षमता वाली हो जाती है । शीतल वायु को चन्द्रमा और गर्म वायु को सूर्य कहते हैं ।
इसके मुख से फ़ुँकार की आवाज निकलती है । इस आवाज को " शब्द " प्रणव " ॐ " या मन इत्यादि भी कहते हैं । यह वासनाओं से भरी हुयी होती है । भांति भांति की सांसारिक वासनायें उसका विषय है ।
जब कुन्डलिनी में स्फ़ुरण पैदा होता है । तब " मन " प्रकट होता है । जब निश्चय भाव हुआ । तब बुद्धि उत्तपन्न हुयी । जब " अहं " भाव हुआ । तब अहंकार पैदा हुआ । जब चिन्तन होता है । तब चित्त उत्पन्न होता है । " रस " लेने की इच्छा से " जल " सूँघने की इच्छा से प्रकृति । इसी तरह पाँचों तन्मात्रा । चारों अंतकरण चौदह इन्द्रियां और सब नाङियां इसी कुन्डलिनी से ही उत्पन्न होती हैं ।
मन से तीनों लोक और चारों वेद उत्पन्न होते हैं ।सब कर्म धर्म इसी से प्रकट होते हैं । यह स्थूल

रूप से ब्रह्माण्ड में विराजमान है। पिंड से ब्रह्माण्ड के लिये सुष्मणा नाङी से होकर मार्ग जाता है । प्राण और अपान दोनों तरह की वायु को योगेश्वर सुष्मणा नाङी के मार्ग से ब्रह्माण्ड में पहुँचाते हैं । एक क्षण इस स्थान पर वायु ठहराने से
सिद्ध पुरुषों का दर्शन होता है ।
सुष्मणा के भीतर जो ब्रह्मारन्ध्र है । उसमें पूरक द्वारा कुन्डलिनी शक्ति स्थित होती है । अथवा रेचक प्राणवायु के प्रयोग से बारह अंगुल तक मुख से बाहर अथवा भीतर ऊपर एक मुहूर्त तक एक ही बार स्थित होती है । तब पाँच कोषों में सिद्धों का दर्शन होता है ।
विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।
" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "
" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "
एक टिप्पणी भेजें

Follow by Email