13 मार्च 2018

सुमिरन को अंग



सुमिरन को अंग

नाम रतन धन पाय कर, गांठी बांध न खोल।
नहि पाटन नहि पारखी, नहि गाहक नहि मोल॥

नाम रतन धन संत पहँ, खान खुली घट मांहि।
सेंत मेंत ही देत हूं, गाहक कोई नांहि॥

नाम नाम सब कोइ कहै, नाम न चीन्है कोय।
नाम चीन्हि सतगुरू मिलै, नाम कहावै सोय॥

नाम बिना बेकाम है, छप्पन भोग विलास।
क्या इन्द्रासन बैठना, क्या बैकुंठ निवास॥

नाम रतन सो पाइहिं, ज्ञान दृष्टि जेहि होय।
ज्ञान बिना नहिं पावई, कोटि करै जो कोय॥

नाम जो रती एक है, पाप जु रती हजार।
आध रती घट संचरै, जारि करै सब छार॥

नाम जपत कुष्ठी भला, चुइ चुइ परै जु चाम।
कंचन देह किस काम की, जा मुख नाहीं नाम॥

नाम जपत कन्या भली, साकट भला न पूत।
छेरी के गल गलथना, जामें दूध न मूत॥

नाम जपत दरिद्री भला, टूटी घर की छानि।
कंचन मंदिर जारि दे, जहाँ न सदगुरू नाम॥

नाम लिया जिन सब लिया, सब सास्त्रन को भेद।
बिना नाम नरके गये, पढ़ि गुनि चारों वेद॥

नाम पियू का छोङि के, करै आन का जाप।
वेस्या केरा पूत ज्यौं, कहै कौन को बाप॥

आदिनाम वीरा अहै, जीव सकल ल्यौ बूझ।
अमरावै सतलोक ले, जम नहि पावै सूझ॥

आदिनाम पारस अहै, मन है मैला लोह।
परसत ही कंचन भया, छूटा बंधन मोह॥

आदिनाम निज सार है, बूझि लेहु सो हंस।
जिन जान्यो निज नाम को, अमर भयो सो बंस॥

आदिनाम निज मूल है, और मंत्र सब डार।
कहै कबीर निज नाम बिनु, बूङि मुवा संसार॥

कोटि नाम संसार में, ताते मुक्ति न होय।
आदिनाम जो गुप्त जप, बिरला जाने कोय॥

सत्तनाम निज औषधि, कोटिक कटै विकार।
विष वारी विरकत रहै, काया कंचन सार॥

यह औषधि अंग ही लगि, अनेक उघरी देह।
कोऊ फ़ेर कूपथ करै, नहि तो औषधि येह॥

सत्तनाम निज औषधि, सदगुरू दई बताय।
औषधि खाय रु पथ रहै, ताकी वेदन जाय॥

सतनाम विस्वास, करम भरम सब परिहरै।
सदगुरू पुरवै आस, जो निरास आसा करै॥

राम नाम को सुमिरतां, उधरे पतित अनेक।
कहैं कबीर नहि छांङिये, राम नाम की टेक॥

राम नाम को सुमिरता, हँसि कर भावै खीझ।
उलटा सुलटा नीपजै, ज्यौं खेतन में बीज॥

राम नाम जाना नहीं, लागी मोटी खोर।
काया हांठी काठ की, ना वह चढ़े बहोर॥

ॐकार निश्चै भया, सो कर्ता मति जान।
सांचा सब्द कबीर का, परदे मांहि पिछान॥

जो जन होइ है जौहरी, रतन लेहि बिलगाय।
सोहंग सोहंग जपि मुआ, मिथ्या जनम गंवाय॥

सबहि रसायन हम करि, नहीं, नाम सम कोय।
रंचक घट में संचरै, सब तन कंचन होय॥

जबहि नाम हिरदै धरा, भया पाप का नास।
मानो चिनगी आग की, परी पुरानी घास॥

कोई न जम सें बांचिया, नाम बिना धरि खाय।
जे जन विरही नाम के, ताको देखि डराय॥

पूंजि मेरी नाम है, जाते सदा निहाल।
कबीर गरजे पुरुष बल, चोरी करै न काल॥

कबीर हमरे नाम बल, सात दीप नव खंड।
जम डरपै सब भय करै, गाजि रहा ब्रह्मांड॥

कबीर हरि के नाम में, सुरति रहै करतार।
ता मुख सें मोती झरे, हीरा अनंत अपार॥

कबीर हरि के नाम में, बात चलावै और।
तिस अपराधी जीव को, तीन लोक कित ठौर॥

कबीर सब जग निरधना, धनवंता नहि कोय।
धनवंता सो जानिये, राम नाम धन होय॥

साहेब नाम संभारता, कोटि विघन टरि जाय।
राई मार वसंदरा, केता काठ जराय॥

कबीर परगट राम कहू, छानै राम न गाय।
फ़ूसक जोङा दूरि करू, बहुरि न लागे लाय॥

कबीर आपन राम कहि, औरन राम कहाय।
जा मुख राम न नीसरै, ता मुख राम कहाय॥

कबीर मुख सोई भला, जा मुख निकसै राम।
जा मुख राम न नीकसै, सो मुख है किस काम॥

कबीर हरि के मिलन की, बात सुनी हम दोय।
कै कछु हार को नाम ले, कै कर ऊंचा होय॥

कबीर राम रिझाय ले, जिह्वा सों कर प्रीत।
हरि सागर जनि बीसरै, छीलर देखि अनीत॥

कबीर राम रिझाय ले, मुख अमृत गुन गाय।
फ़ूटा नग ज्यौं जोरि मन, संधै संधि मिलाय॥

कबीर नैन झर लाइये, रहट वहै निस जाम।
पपिहा यौं पी पी करै, कबीर मिलेंगे राम॥

कबीर कठिनाई खरी, सुमिरत हरि को नाम।
सूली ऊपर नट विधा, गिरै तो नांहि ठाम॥

लंबा मारग दूर घर, विकट पंथ बहु मार।
कहो संत क्यौं पाइये, दुर्लभ गुरू दीदार॥

सूंन सिखर चढ़ि घर किया, सहज समाधि लगाय।
नाम रतन धन तहँ मिला, सतगुरू भये सहाय॥

घटहि नाम की आस करू, दूजी आस निरास।
बसै जु नीर गंभीर में, क्यौं वह मरै पियास॥

जा घट प्रीत न प्रेम रस, पुनि रसना नहि नाम।
ते नर पसु संसार में, उपजि मरे बेकाम॥

जैसे माया मन रमै, तैसा राम रमाय।
तारामंडल बेधि के, तब अमरापुर जाय॥

ज्ञान दीप परकास करि, भीतर भवन जराय।
तहाँ सुमिर सतनाम को, सहज समाधि लगाय॥

एक नाम को जानि के, मेटु करम का अंक।
तबही सो सुचि पाइ है, जब जिव होय निसंक॥

एक नाम को जानि करि, दूजा देइ बहाय।
तीरथ व्रत जप तप नहीं, सतगुरू चरन समाय॥50

12 मार्च 2018

भक्ति को अंग



भक्ति को अंग


भक्ति द्राविङ ऊपजी, लाये रामानंद।
परगट करी कबीर ने, सात दीप नवखंड॥

भक्ति भाव भादौं नदी, सबहि चली घहराय।
सरिता सोई सराहिये, जेठ मास ठहराय॥

भक्ति पान सों होत है, मन दे कीजै भाव।
परमारथ परतीति में, यह तन जाये जाव॥

भक्ति बीज बिनसै नहीं, आय पङै जो झोल।
कंचन जो विष्ठा पङै, घटै न ताको मोल॥

भक्ति बीज पलटै नहीं, जो जुग जाय अनंत।
ऊंच नीच घर औतरै, होय संत का संत॥

भक्ति कठिन आती दुर्लभ, भेष सुगम नित सोय।
भक्ति जु न्यारी भेष सें, यह जानै सब कोय॥

भक्ति भेष बहु अंतरा, जैसे धरनि अकास।
भक्त लीन गुरू चरन में, भेष जगत की आस॥

भक्ति रूप भगवंत का, भेष आहि कछु और।
भक्त रूप भगवंत है, भेष जु मन की दौर॥

भक्ति पदारथ तब मिलै, जब गुरू होय सहाय।
प्रेम प्रीति की भक्ति जो, पूरन भाग मिलाय॥

भक्ति दुहीली गुरुन की, नहि कायर का काम।
सीस उतारैं हाथ सों, ताहि मिलै सतनाम॥

भक्ति दुहीली राम की, नहि कायर का काम।
निस्प्रेही निरधार को, आठ पहर संग्राम॥

भक्ति दुहीली नाम की, जस खांडे की धार।
जो डोलै सो कटि पङै, निहचल उतरै पार॥

भक्ति जु सीढ़ी मुक्ति की, चढ़े भक्त हरषाय।
और न कोई चढ़ि सकै, निज मन समझौ आय॥

भक्ति निसैनी मुक्ति की, संत चढ़े सब धाय।
जिन जिन मन आलस किया, जनम जनम पछिताय॥
 
भक्ति बिना नहि निसतरै, लाख करै जो कोय।
सब्द सनेही ह्वै रहै, घर को पहुँचै सोय॥

भक्ति दुवारा सांकरा, राई दसवैं भाय।
मन तो मैंगल ह्वै रहा, कैसे आवै जाय

भक्ति दुवारा मोकला, सुमिरी सुमिरि समाय।
मन को तो मैदा किया, निरभय आवै जाय॥

भक्ति सोइ जो भाव सों, इक मन चित को राख।
सांच सील सों खोलिये, मैं तैं दोऊ नाख॥

भक्ति गेंद चौगान की, भावै कोइ ले जाय।
कहैं कबीर कछु भेद नहीं, कहा रंक कहा राय॥

भक्ति सरब ही ऊपरै, भागिन पावै सोय।
कहै पुकारै संतजन, सत सुमिरत सब कोय॥

भक्ति बिनावै नाम बिन, भेष बिना ये होय।
भक्ति भेष बहु अन्तरा, जानै बिरला कोय॥

कबीर गुरू की भक्ति करु, तज विषया रस चौज।
बार बार नहि पाइये, मनुष जनम की मौज॥

कबीर गुरू की भक्ति बिन, धिक जीवन संसार।
धुंवा का धौराहरा, बिनसत लगे न वार॥

कबीर गुरू की भक्ति का, मन में बहुत हुलास।
मन मनसा मांजै नही, होन चहत है दास॥

कबीर गुरू की भक्ति से, संसै डारा धोय।
भक्ति बिना जो दिन गया, सो दिन सालै मोय॥

जब लग नाता जाति का, तब लग भक्ति न होय।
नाता तोङै गुरू भजै, भक्त कहावै सोय॥

छिमा खेत भल जोतिये, सुमिरन बीज जमाय।
खंड ब्रह्मांड सूखा पङै, भक्ति बीज नहि जाय॥

जल ज्यौं प्यारा माछरी, लोभी प्यारा दाम।
माता प्यारा बालका, भक्ति प्यारी राम॥

प्रेम बिना जो भक्ति है, सो निज दंभ विचार।
उदर भरन कै कारनै, जनम गंवायो सार॥

भाग बिना नहिं पाइये, प्रेम प्रीति का भक्त।
बिना प्रेम नहि भक्ति कछु, भक्त भर्यो सब जक्त॥

जहाँ भक्त तहाँ भेष नहि, वरनाश्रम तहाँ नाहि।
नाम भक्ति जो प्रेम सों, सो दुरलभ जग मांहि॥

भाव बिना नहि भक्ति जग, भक्ति बिना नहि भाव।
भक्ति भाव इक रूप है, दोऊ एक सुभाव॥

गुरू भक्ति अति कठिन है, ज्यौं खांडे की धार।
बिना सांच पहुँचै नहीं, महा कठिन व्यवहार॥

कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति न होय।
भक्ति करै कोइ सूरमा, जाति बरन कुल खोय॥

जाति बरन कुल खोय के, भक्ति करै चित लाय।
कहैं कबीर सतगुरू मिलै, आवागवन नसाय॥

जब लग भक्ति सकाम है, तब लग निस्फ़ल सेव।
कहै कबीर वह क्यौं मिलै, निहकामी निज देव॥

जान भक्त का नित मरन, अनजाने का राज।
सर औसर समझै नहीं, पेट भरन सों काज॥

मन की मनसा मिटि गई, दुरमति भइ सब दूर।
जन मन प्यारा राम का, नगर बसै भरपूर॥

मेवासा मोहै किया, दुरिजन काढ़ै दूर।
राज पियारे राम का, नगर बसै भरपूर॥

आरत ह्वै गुरू भक्ति करु, सब कारज सिध होय।
करम जाल भौजाल में, भक्त फ़ंसे नहि कोय॥

आरत सों गुरूभक्ति करु, सब सिध कारज होय।
कूपा मांग्या राछ है, सदा न फ़वसी कोय॥

सबसों कहूं पुकार कै, क्या पंडित क्या सेख।
भक्ति ठानि सब्दै गहै, बहुरि न काछै भेष॥

देखा देखी भक्ति का, कबहु न चढ़सी रंग।
विपति पङै यौं छांङसी, केंचुली तजत भुजंग॥

देखा देखी पकङिया, गई छिनक में छूट।
कोइ बिरला जन बाहुरै, जाकी गहरी मूठ॥

तोटै में भक्ति करै, ताका नाम सपूत।
मायाधारी मसखरै, केते गये अऊत॥

ज्ञान संपूरन ना भिदा, हिरदा नांहि जुङाय।
देखा देखी भक्ति का, रंग नहीं ठहराय॥

खेत बिगार्यो खरतुआ, सभा बिगारी कूर।
भक्ति बिगारी लालची, ज्यौं केसर में धूर॥

तिमिर गया रवि देखते, कुमति गई गुरूज्ञान।
सुमति गई अति लोभ से, भक्ति गई अभिमान॥

निर्पक्षी की भक्ति है, निर्मोही को ज्ञान।
निरदुंदी की मुक्ति है, निर्लोभी निरबान॥

विषय त्याग वैराग है, समता कहिये ज्ञान।
सुखदाई सब जीव सों, यही भक्ति परमान॥

विषय त्याग वैराग रत, समता हिये समाय।
मित्र सत्रु एकौ नहीं, मन में राम बसाय॥

जब लग आसा देह की, तब लग भक्ति न होय।
आसा त्यागी हरि भजै, भक्त कहावै सोय॥

चार चिह्न हरि भक्ति के, प्रगट दिखाई देत।
दया धर्म आधीनता, परदुख को हरि लेत॥

और कर्म सब कर्म हैं, भक्ति कर्म निहकर्म।
कहैं कबीर पुकारि के, भक्ति करो तजि भर्म॥

भक्ति भक्ति सब कोइ कहै, भक्ति न आई काज।
जिहिको कियो भरोसवा, तिहिते भाई गाज॥

इन्द्र राजसुख भोगकर, फ़िर भौसागर मांहि।
यह सरगुन की भक्ति है, निर्भय कबहूं नांहि॥

भक्त आप भगवान है, जानत नाहि अयान।
सीस नबावै साधु कूं, बूझि करै अभिमान॥

सत्त भक्ति तरवार है, बांधे बिरला कोय।
कोइ एक बांधे सूरमा, तन मन डारै खोय॥

भक्ति महल बहु ऊंच है, दूरहि ते दरसाय।
जो कोई जन भक्ति करै, सोभा बरनि न जाय॥

भक्तन की यह रीत है, बँधे करै जो भाव।
परमारथ के कारनै, या तन रहै कि जाव॥

भक्ति भक्ति बहु कठिन है, रती न चाले खोट।
निराधार का खेल है, अधर धार की चोट॥

भक्ति निसैनी मुक्ति की, संत चढ़े सब आय।
नीचै बाघिन लुकि रही, कुचल पङे कूं खाय॥

भक्ति भक्ति सब कोइ कहै, भक्ति न जानै भेव।
पूरन भक्ति जब मिलै, कृपा करै गुरूदेव॥

सदगुरू की किरपा बिना, सत की भक्ति न होय।
मनसा वाचा कर्मना, सुनि लीजो सब कोय॥

दुख खंडन भव मेटना, भक्ति मुक्ति बिसराम।
वा घर राचे साथ री, यही भक्ति को नाम॥

भक्ति बीज है प्रेम का, परगट पृथ्वी मांहि।
कहै कबीर बोया घना, निपजै कोइक ठांहि॥

भक्ति भक्ति सब कोइ कहै, भक्ति भक्ति में फ़ेर।
एक भक्ति तो अजब है, इक है दमङी सेर॥

भक्त उलटि पीछै फ़िरे, संत धरै नहि पांव।
परतछ दीसै जीवताँ, मुआ मांहिला भाव॥

दया गरीबी दीनता, सुमता सील करार।
ये लच्छन हैं भक्ति के, कहै कबीर विचार॥

सलिल भक्त कहुं ना तरै, जावै नरक अघोर।
सतगुरू सें सनमुख नहीं, धर्मराय के चोर॥

संत सुहागी सूरमा, सब्दै उठे जाग।
सलिल सब्द मानै नहीं, जरि बरि लागे आग॥

सदगुरू सब्द उथापही, अपनी महिमा लाय।
कहैं कबीर वा जीव कूं, काल घसीटै जाय॥

सांच सब्द खाली करै, आपन होय सयान।
सो जीव मनमुखी भये, कलियुग के व्रतमान॥

11 मार्च 2018

दासातन को अंग




दासातन को अंग

गुरू समरथ सिर पर खङे, कहा कमी तोहि दास।
रिद्धि सिद्धि सेवा करै, मुक्ति न छांङै पास॥

दुख सुख सिर ऊपर सहै, कबहू न छाङै संग।
रंग न लागै और का, व्यापै सदगुरू रंग॥

धूम धाम सहता रहै, कबहू न छाङै संग।
पाहा बिन लागे नही, कपङा के बहु रंग॥

कबीर गुरू सबको चहै, गुरू को चहै न कोय।
जब लग आस सरीर की, तब लग दास न होय॥

कबीर गुरू के भावते, दूरहि ते दीसन्त।
तन छीना मन अनमना, जग ते रूठि फ़िरन्त॥

कबीर खालिक जागिया, और न जगै कोय।
कै जागै विषया भरा, दास बंदगी जोय॥

कबीर पांचौ बलधिया, ऊजङ ऊजङ जांहि।
बलिहारी वा दास की, पकङि जु राखै बांहि॥

काजर केरी कोठरी, ऐसो यह संसार।
बलिहारी वा दास की, पैठी निकसनहार॥

काजर केरी कोठरी, काजर ही का कोट।
बलिहारी वा दास की, रहै नाम की ओट॥

निरबंधन बंधा रहै, बंधा निरबंध होय।
करम करै करता नहीं, दास कहावै सोय॥

दासातन हिरदै नहीं, नाम धरावै दास।
पानी के पीये बिना, कैसे मिटै पियास॥

दासातन हिरदे बसै, साधुन सों आधीन।
कहैं कबीर सो दास है, प्रेम भक्ति लौ लीन॥

नाम धराया दास का, मन में नाहीं दीन।
कहैं कबीर सो स्वान गति, औरहि के लौलीन॥

नाम धरावै दास को, दासातन में लीन।
कहैं कबीर लौलीन बिन, स्वान बुद्धि कहि दीन॥

स्वामी होना सोहरा, दुहरा होना दास।
गाडर आनी ऊन को, बांधी चरै कपास॥

दास दुखी तो हरि दुखी, आदि अन्त तिहूंकाल।
पलक एक में प्रगट ह्वै, छिन में करूं निहाल॥

दास दुखी तो मैं दुखी, आदि अन्त तिहुंकाल।
पलक एक में प्रगटि के, छिन में करै निहाल॥

कबीर कुल सो ही भला, जा कुल उपजै दास।
जा कुल दास न ऊपजै, सो कुल आक पलास॥

भली भई जो भय मिटा, टूटी कुल की लाज।
बेपरवाही ह्वै रहा, बैठा नाम जहाज॥

कबीर भये हैं केतकी, भंवर भये सब दास।
जहँ जहँ भक्ति कबीर की, तहँ तहँ मुक्ति निवास॥

दास कहावन कठिन हैं, मैं दासन का दास।
अब तो ऐसा ह्वै रहूं, पांव तले की घास॥

काहूं को न संतापिये, जो सिर हंता सोय।
फ़िर फ़िर वाकूं बंदिये, दास लच्छ है सोय॥

लगा रहै सतनाम सों, सबही बंधन तोङ।
कहै कबीर वा दास सों काल रहै हथ जोङ॥

दास कहावन कठिन है, जब लग दूजी आन।
हांसी साहिब जो मिलै, कौन सहै खुरसान॥

डग डग पै जो डर करै, नित सुमिरैं गुरूदेव।
कहैं कबीर वा दास की, साहिब मानै सेव॥

निहकामी निरमल दसा, नित चरनों की आस।
तीरथ इच्छा ता करै, कब आवै वा दास॥

चंदन डरपि सरप सों, मति रे बिगाङै बास।
सरगुन डरपै निगुन सों, जग सें डरपै दास॥

10 मार्च 2018

सेवक को अंग



सेवक को अंग

सेवक सेवा में रहै, अन्त कहूं नहि जाय।
दुख सुख सिर ऊपर सहै, कहैं कबीर समुझाय॥

सेवक सेवा में रहै, सेवक कहिये सोय।
कहैं कबिर सेवा बिना, सेवक कभी न होय॥

सेवक मुखै कहावई, सेवा में दृढ नांहि।
कहैं कबीर सो सेवका, लख चौरासी मांहि॥

सेवक सेवा में रहै, सेव करै दिन रात।
कहैं कबीर कूसेवका, सनमुख ना ठहराव॥

सेवक फ़ल मांगै नहीं, सेव करै दिन रात।
कहैं कबीर ता दास पर, काल करै नहिं घात॥

सेवक स्वामी एक मत, मत में मत मिल जाय।
चतुराई रीझै नहीं, रीझै मन के भाय॥

सेवक कुत्ता राम का, मुतिया वाका नांव।
डोरी लागी प्रेम की, जित खैंचे तित जांव॥

तू तू करु तो निकट ह्वै, दुर दुर करु तो जाय।
ज्यौं गुरू राखै त्यौं रहै, जो देवै सो खाय॥

फ़ल कारन सेवा करै, निसदिन जाँचे राम।
कहैं कबीर सेवक नहीं, चाहै चौगुना दाम॥

सब कुछ गुरू के पास है, पाइये अपने भाग।
सेवक मन सोंप्या रहै, रहै चरन में लाग॥

सदगुरू सब्द उलंघि कर, जो सेवक कहुँ जाय।
जहाँ जाय तहाँ काल है, कहैं कबीर समुझाय॥

सतगुरू बरजै सिष करै, क्यौं करि बाचै काल।
दहुँ दिसि देखत बहि गया, पानी फ़ूटी पाल॥

सतगुरू कहि जो सिष करै, सब कारज सिध होय।
अमर अभय पद पाइये, काल न झांकै कोय॥

साहिब को भावै नहीं, सों हमसों जनि होय।
सदगुरू लाजै आपना, साधु न मानै कोय॥

साहिब जासों ना रुचै, सो हमसों जनि होय।
गुरू की आज्ञा में रहूं, बल बुधि आपा खोय॥

साहिब के दरबार में, कमी काहू की नांहि।
बंदा मौज न पावहीं, चूक चाकरी मांहि॥

द्वार धनी के पङि रहै, धका धनी का खाय।
कबहुक धनी निवाजिहै, जो दर छांङि न जाय॥

आस करै बैकुंठ की, दुरमति तीनों काल।
सुक्र कही बलि ना करी, तातै गयो पाताल॥

गुरू आज्ञा मानै नहीं, चलै अटपटी चाल।
लोक वेद दोनौं गये, आगे सिर पर काल॥

भुक्ति मुक्ति मांगौं नहीं, भक्ति दान दे मोहि।
और कोइ जांचौं नहीं, निसदिन जांचौं तोहि॥

भोग मोक्ष मांगों नहीं, भक्ति दान गुरूदेव।
और नही कुछ चाहिये, निसदिन तेरी सेव॥

यह मन ताको दीजिये, सांचा सेवक होय।
सिर ऊपर आरा सहै, तऊ न दूजा होय॥

अनराते सुख सोवना, राते निंद न आय।
ज्यौं जल छूटी माछरी, तलफ़त रैंन बिहाय॥

राता राता सब कहै, अनराता नहि कोय।
राता सोई जानिये, जा तन रक्त न होय॥

राता रक्त न नीकसे, जो तन चीरै कोय।
जो राता गुरू नाम सों, ता तन रक्त न होय॥

सीलवंत सुर ज्ञान मत, अति उदार चित होय।
लज्जावान अति निछलता, कोमल हिरदा सोय॥

दयावंत धरमक ध्वजा, धीरजवान प्रमान।
सन्तोषी सुखदायका, सेवक परम सुजान॥

चतुर विवेकी धीर मत, छिमावान बुधिवान।
आज्ञावान परमत लिया, मुदित प्रफ़ुल्लित जान॥

ज्ञानी अभिमानी नहीं, सब काहू सों हेत।
सत्यवान परमारथी, आदर भाव सहेत॥

पट दरसन को प्रेम करि, असन बसन सों पोप।
सेव करैं हरिजनन की, हरषित परम संतोष॥

यह सब लच्छन चित धरै, अप लच्छन सब त्याग।
सावधान सम ध्यान है, गुरू चरनन में लाग॥

गुरूमुख गुरू चितवत रहै, जैसे मनी भुवंग।
कहैं कबीर बिसरै नहीं, यह गुरूमुख को अंग॥

गुरूमुख गुरू चितवत रहै, जैसे साह दिवान।
और कभी नहि देखता, है वाही को ध्यान॥

गुरूमुख गुरू आज्ञा चलै, छांङि देइ सब काम।
कहैं कबीर गुरूदेव को, तुरत करै परनाम॥

उलटे सुलटे वचन के, सीष न मानैं दूख।
कहैं कबीर संसार में, सो कहिये गुरूमुख॥

सुरति सुहागिन सोइ सहि, जो गुरू आज्ञा मांहि।
गुरू आज्ञा जो मेटहीं, तासु कुसल ह्वै नांहि॥

गुरू आज्ञा लै आवही, गुरू आज्ञा लै जाय।
कहैं कबीर सो सन्त प्रिय, बहु विधि अमृत पाय॥

कहैं कबीर गुरू प्रेमवश, क्या नियरै क्या दूर।
जाका चित जासों बसै, सो तिहि सदा हजूर॥

कबीर गुरू औ साधु कूं, सीस नवावै जाय।
कहैं कबीर सो सेवका, महा परम पद पाय॥

07 मार्च 2018

संगति को अंग



संगति को अंग

कबीर संगति साधु की, नित प्रति कीजै जाय।
दुरमति दूर बहावसी, देसी सुमति बताय॥

कबीर संगति साधु की, कबहूं न निस्फ़ल जाय।
जो पै बोवै भूमि के, फ़ूलै फ़लै अघाय॥

कबीर संगति साधु की, जौ की भूसी खाय।
खीर खांड भोजन मिलै, साकट संग न जाय॥

कबीर संगति साधु की, ज्यौं गंधी का बास।
जो कुछ गंधी दे नहीं, तो भी बास सुवास॥

कबीर संगति साधु की, निस्फ़ल कभी न होय।
होसी चंदन वासना, नीम न कहसी कोय॥

कबीर संगति साधु की, जो करि जानै कोय।
सकल बिरछ चंदन भये, बांस न चंदन होय॥

 कबीर चंदन संग से, बेधे ढाक पलास।
आप सरीखा करि लिया, जो ठहरा तिन पास॥

मलयागिरि के पेङ सों, सरप रहै लिपटाय।
रोम रोम विष भीनिया, अमृत कहा समाय॥

एक घङी आधी घङी, आधी हूं पुनि आध।
कबीर संगति साधु की, कटै कोटि अपराध॥

घङी ही की आधी घङी, भाव भक्ति में जाय।
सतसंगति पल ही भली, जम का धका न खाय॥

जा पल दरसन साधु का, ता पल की बलिहार।
सत्तनाम रसना बसै, लीजै जनम सुधार॥

ते दिन गये अकारथी, संगति भई न सन्त।
प्रेम बिना पसु जीवना, भक्ति बिना भगवंत॥

जा घर गुरू की भक्ति नहीं, संत नही मिहमान।
ता घर जम डेरा दिया, जीवत भये मसान॥

रिद्धि सिद्धि मांगू नहि, मांगूं तुम पै येह।
नित प्रति दरसन साधु का, कहै कबीर मुहि देह॥

मेरा मन हंसा रमै, हंसा गगनि रहाय।
बगुला मन मानै नहीं, घर आंगन फ़िर जाय

कबीरा वन वन मैं फ़िरा, ढ़ूंढ़ि फ़िरा सब गाम।
राम सरीखा जन मिलै, तब पूरा ह्वै काम॥

कबीर तासों संग कर, जो रे भजिहैं राम।
राजा राना छत्रपति, नाम बिना बेकाम॥

कबीर लहरि समुद्र की, कभी न निस्फ़ल जाय।
बगुला परखि न जानई, हंसा चुगि चुगि खाय॥

कबीर मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा फ़ल पाय॥

कबीर खाई कोट की, पानी पिवै न कोय।
जाय मिले जब गंग में, सब गंगोदक होय॥

कबीर कलह रु कलपना, सतसंगति से जाय।
दुख वासों भागा फ़िरै, सुख में रहै समाय॥

संगति कीजै सन्त की, जिनका पूरा मन।
अनतोले ही देत हैं, नाम सरीखा धन॥

साधु संग अन्तर पङे, यह मति कबहूं होय।
कहै कबीर तिहुलोक में, सुखी न देखा कोय॥

मथुरा कासी द्वारिका, हरिद्वार जगन्नाथ।
साधु संगति हरि भजन बिन कछू न आवै हाथ॥

साखि सब्द बहुते सुना, मिटा न मन का दाग।
संगति सों सुधरा नही, ताका बङा अभाग॥

साधुन के सतसंग ते, थर थर कांपै देह।
कबहूं भाव कुभाव ते, मत मिटि जाय सनेह॥

राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय।
जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ न होय॥

राम राम रटिबो करै, निसदिन साधुन संग।
कहो जु कौन विचारते, नैना लागत रंग॥

मन दीया कहुं और ही, तन साधुन के संग।
कहैं कबीर कोरी गजी, कैसे लागे रंग॥

भुवंगम बास न बेधई, चंदन दोष न लाय।
सब अंग तो विष सों भरा, अमृत कहाँ समाय॥

चंदन परसा बावना, विष ना तजै भुजंग।
यह चाहै गुन आपना, कहा करै सतसंग॥

कबीर चंदन के निकट, नीम भि चंदन होय।
बूङे बांस बङाइया, यौं जनि बूङो कोय॥

चंदन जैसे संत हैं, सरप जैसा संसार।
वाके अंग लिपटा रहै, भागै नही विकार॥

चंदन डर लहसुन करै, मति रे बिगारै बास।
सगुरा निगुरा सों डरै, जग से डरपै दास॥

कबीर कुसंग न कीजिये, लोहा जल न तिराय।
कदली सीप भुजंग मुख, एक बूंद तिर भाय॥

कबीर कुसंग न कीजिये, जाका नांव न ठांव।
ते क्यौं होसी बापरा, साध नहि जिहि गांव॥

कबीर गुरू के देस में, बसि जानै जो कोय।
कागा ते हंसा बनै, जाति बरन कुल खोय॥ 

कबीर कहते क्यों बने, अनबनता के संग।
दीपक को भावै नहीं, जरि जरि मरैं पतंग॥

ऊजल बुंद अकास की, पङि गइ भूमि बिकार।
माटी मिलि भई कीच सों, बिन संगति भौ छार॥

हरिजन सेती रूठना, संसारी सों हेत।
ते नर कबहु न नीपजे, ज्यौं कालर का खेत॥

गिरिये परबत सिखर ते, परिये धरनि मंझार।
मूरख मित्र न कीजिये, बूङो काली धार॥

मूरख को समझावते, ज्ञान गांठि का जाय।
कोयला होय न ऊजल, सौ मन साबुन लाय॥

कोयला भि होय ऊजल, जरि बरि ह्वै जो सेत।
मूरख होय न ऊजला, ज्यौं कालर का खेत॥

संगति अधम असाधु की, मीच होय ततकाल।
कहैं कबीर सुन साधवा, बानी ब्रह्म रसाल॥

मेर निसानी मीच की, कूसंगति ही काल।
कहैं कबीर सुन प्रानिया, बानी ब्रह्म संभाल॥

ऊंचे कुल कह जनमिया, करनी ऊंच न होय।
कनक कलस मद सों भरा, साधुन निंदा सोय॥

जानि बूझ सांची तजै, करै झूठ सों नेह।
ताकी संगति रामजी, सपनेहू मति देह॥

काचा सेती मति मिलै, पाका सेती बान।
काचा सेती मिलत ही, ह्वै तन धन की हान॥

तोहि पीर जो प्रेम की, पाका सेती खेल।
काची सरसों पेलि के, खरी भया नहिं तेल॥

कुल टूटै कांची पङी, सरा न एकौ काम।
चौरासी वासा भया, दूर पङा हरिनाम॥

दाग जु लागा नील का, सौ मन साबुन धोय।
कोटि जतन परमौधिये, कागा हंस न होय॥

जग सों आपा राखिये, ज्यौं विषहर सो अंग।
करो दया जो खूब है, बुरा खलक का संग॥

जीवन जोवन राजमद, अविचल रहै न कोय।
जु दिन जाय सतसंग में, जीवन का फ़ल सोय॥

ब्राह्मन केरी बेटिया, मांस शराब न खाय।
संगति भई कलाल की, मद बिन रहा न जाय॥

साखि सब्द बहुतहि सुना, मिटा न मन का मोह।
पारस तक पहुँचा नहीं, रहा लोह का लोह॥

माखी चंदन परिहरे, जहँ रस मिलि तहँ जाय।
पापी सुनै न हरिकथा, ऊंधे कै उठि जाय॥

पुरब जनम के भाग से, मिले संत का जोग।
कहैं कबीर समुझै नहीं, फ़िर फ़िर, चाहै भोग॥

जहाँ जैसी संगति करैं, तहँ तैसा फ़ल पाय।
हरि मारग तो कठिन है, क्यौं करि पैठा जाय॥

ज्ञानी को ज्ञानी मिलै, रस की लूटम लूट।
ज्ञानी अज्ञानी मिल, होवै माथा कूट॥

सज्जन सों सज्जन मिले, होवे दो दो बात।
गदहा सों गदहा मिले, खाबे दो दो लात॥

मैं मांगूं यह मांगना, मोहि दीजिये सोय।
संत समागम हरिकथा, हमरे निसदिन होय।

कंचन भौ पारस परसि, बहुरि न लोहा होय।
चंदन बास पलास बिधि, ढाक कहै न कोय॥

पहिले पट पासै बिना, बीघे पङै न भात।
पासै बिन लागे नहीं, कुसुँभ बिगारै साथ॥

कबीर सतगुरू सेविये, कहा साधु को रंग।
बिन बगुरे भिगोय बिना, कोरै चङै न रंग॥

कबीर विषधर बहु मिले, मनिधर मिला न कोय।
विषधर को मनिधर मिले, विषधर अमृत होय॥

प्रीति करो सुख लेन को, सो सुख गयो हिराय।
जैसे पाई छछुंदरी, पकङि सांप पछिताय॥

जो छोङै तो आंधरा, खाये तो मरि जाय।
ऐसे खंध छछुंदरी, दोउ भांति पछताय॥

सांप छछुंदर दोय कूं, नौला नीगल जाय।
वाकूं विष बेङै नहीं, जङी भरोसे खाय॥

कूसंगति लागे नहीं, सब्द सजीवन हाथ।
बाजीगर का बालका, सोवै सरपकि साथ॥

पानी निरमल अति घना, पल संगे पल भंग।
ते नर निस्फ़ल जायेंगे, करै नीच को संग॥

निगुनै गांव न बासिये, सब गुन को गुन जाय।
चंदन पङिया चौक में, ईंधन बदले जाय॥

संगति को वैरी घनो, सुनो संत इक बैन।
येही काजल कोठरी, येही काजल नैन॥

साधू संगति परिहरै, करै विषय को संग।
कूप खनी जल बाबरे, त्यागि दिया जल गंग॥

अनमिलता सों संग करि, कहा बिगोयो आप।
सत्त कबीर यों कहत है, ताहि पुरबलो पाप॥

लकङी जल डूबै नहीं, कहो कहाँ की प्रीति।
अपनो सींचो जानि के, यही बङन की रीति॥

मैं सींचो हित जानि के, कठिन भयो है काठ।
ओछी संगति नीच की, सिर पर पाङी वाट॥

साधू सब्द सुलच्छना, गांधी हाट बनेह।
जो जो मांगे प्रीति सों, सो सो कौङी देह॥

तरुवर जङ से काटिया, जबै सम्हारो जहाज।
तारै पन बोरै नहीं, बाँह गहै की लाज॥

साधु संगति गुरूभक्ति जु, निष्फ़ल कबहूं न जाय।
चंदन पास है रूखङा, कबहुँक चंदन भाय॥

संत सुरसरी गंगजल, आनि पखारा अंग।
मैले से निरमल भये, साधूजन के संग॥

चर्चा करु तब चौहटे, ज्ञान करो तब दोय।
ध्यान धरो तब एकिला, और न दूजा कोय॥

संगति कीजै साधु की, दिन दिन होवै हेत।
साकट काली कामली, धोते होत न सेत॥

साधु संगति गुरूभक्ति रु, बढ़त बढ़त बढ़ि जाय।
ओछी संगति खर सब्द रु, घटत घटत घटि जाय॥

संगति ऐसी कीजिये, सरसा नर सों संग।
लर लर लोई होत है, तऊ न छाङै रंग॥

सत संगति सबसों बङी, बिन संगति सब ओस।
सतसंगति परमानता, कटै करम को दोस॥

साहिब दरसन कारनै, निसदिन फ़िरूं उदास।
साधू संगति सोधि ले, नाम रहै उन पास॥

तेल तिली सों ऊपजै, सदा तेल को तेल।
संगति को बेरो भयो, ताते नाम फ़ुलेल॥

हरिजन केवल होत हैं, जाको हरि का संग।
विपति पङै बिसरै नहीं, चङै चौगुना रंग॥

भीख को अंग



भीख को अंग

मांगन मरन समान है, मति कोई मांगो भीख।
मांगन ते मरना भला, यह सतगुरू की सीख॥

मांगन मरन समान है, सीख दई मैं तोहि।
कहैं कबीर सदगुरू सुनो, मति रे मंगाउ मोहि॥

मांगन मरन समान है, तोहि दई मईं सीख।
कहैं कबीर समुझाय के, मति कोई मांगै भीख॥

मांगन गय सो मर रहे, मरै जु मांगन जांहि।
तिनते पहिले वे मरे, होत करत हैं नांहि॥

उदर समाता मांगि ले, ताको नाहीं दोष।
कहैं कबीर अधिका गहि, ताकी गति ना मोष॥

अजहूं तेरा सब मिटै, जो मानै गुरू सीख।
जब लग तूं घर में रहै, मति कहुं मांगै भीख॥

उदर समाता अन्न ले, तनहि समाता चीर।
अधिकहि संग्रह ना करै, तिसका नाम फ़कीर॥

अनमांगा तो अति भला, मांग लिया नहि दोष।
उदर समाता मांगि ले, निश्चै पावै मोष॥

अनमांगा उत्तिम कहा, मध्यम मांगि जु लेय।
कहै कबीर निकृष्ट सो, पर घर धरना देय॥

सहज मिलै सो दूध है, मांगि मिलै सो पानि।
कहैं कबीर वह रकत है, जामें ऐंचातानि॥

आब गया आदर गया, नैनन गया सनेह।
यह तीनों तबही गये, जबहि कहा कछु देह॥

भीख तीन परकार की, सुनहु संत चित लाय।
दास कबीर परगट कहै, भिन्न भिन्न अरथाय॥

उत्तिम भीख है अजगरी, सुनि लीजै निज बैन।
कहैं कबीर ताके गहै, महा परम सुख चैन॥

भंवर भीख मध्यम कही, सुनो संत चितलाय।
कहैं कबीर ताके गहैं, मध्यम मांहि समाय॥

खर कूकर की भीख जो, निकृष्ट कहावे सोय।
कहैं कबीर इस भीख सें, मुक्ति कबहूं न होय॥

भेष को अंग



भेष को अंग

कबीर भेष अतीत का, अधिक करै अपराध।
बाहिर दीसै साधु गति, अन्तर बङा असाध॥

कबीर वह तो एक है, परदा दीया भेष।
भरम करम सब दूर कर, सबही मांहि अलेख॥

तत्व तिलक तिहुलोक में, सत्तनाम निजसार।
जन कबीर मस्तक दिया, सोभा अगम अपार॥

तत्व तिलक की खानि है, महिमा है निजनाम।
अछै नाम वा तिलक को, रहै अछै बिसराम॥४

तत्व तिलक माथे दिया, सुरति सरवनी कान।
करनी कंठी कंठ में, परसा पद निरवान॥

तत्वहि फ़ल मन तिलक है, अछै बिरछ फ़ल चार।
अमर महातम जानि के, करो तिलक ततसार॥

त्रिकुटी ही निजमूल है, भ्रकुटी मध्य निसान।
ब्रह्म दीप अस्थूल है, अगर तिलक निरवान॥

अगर तिलक सिर सोहई, बैसाखी उनिहार।
सोभा अविचल नाम की, देखो सुरति विचार॥

जैसि तिलक उनहार है, तस सोभा अस्थीर।
खम्भ ललाटे सोहई, तत्व तिलक गंभीर॥

मध्य गुफ़ा जहँ सुरति है, उपरि तिलक का धाम।
अमर समाधि लगावई, दीसै निरगुन नाम॥

द्वादस तिलक बनावही, अंग अंग अस्थान।
कहैं कबीर विराजहीं, ऊजल हंस अमान॥

ऊजल देखि न धीजिये, बग ज्यौं मांडै ध्यान।
धौरै बैठि चपेटसी, यौं ले बूङै ज्ञान॥

चाल बकुल की चलत है, बहुरि कहावै हंस।
ते मुक्ता कैसे चुगै, पङै काल के फ़ंस॥

साधु भया तो क्या हुआ, माला पहिरी चार।
बाहर भेष बनाइया, भीतर भरी भंगार॥

जेता मीठा बोलवा, तेता साधु न जान।
पहिले थाह दिखाइ करि, औडै देसी आन॥

मीठे बोल जु बोलिये, ताते साधु न जान।
पहिले स्वांग दिखाय के, पीछे दीसै आन॥

बांबी कूटै बाबरा, सरप न मारा जाय।
मूरख बांबी ना डसै, सरप सबन को खाय॥

माला तिलक लगाय के, भक्ति न आई हाथ।
दाढ़ी मूंछ मुढ़ाय के, चले दुनी के साथ॥

दाढ़ी मूंछ मुंङाय के, हुआ घोटम घोट।
मन को क्यौं नहि मूंडिये, जामें भरिया खोट॥

केसन कहा बिगारिया, मूंङा सौ सौ बार।
मन को क्यौं नहि मूंङिये, जामें विषय विकार॥

मन मेवासी मूंडिये, केसहि मूंडै काहि।
जो कुछ किया सो मन किया, केस किया कुछ नाहिं॥

मूंड मुंङावत दिन गया, अजहु न मिलिया राम।
राम नाम कहो क्या करै, मन के औरै काम॥

मूंङ मुंङाये हरि मिले, सब कोई लेह मुंङाय।
बार बार के मूंङते, भेङ न बैकुंठ जाय॥

स्वांग पहिरि सोहरा भया, दुनिया खाई खुंद।
जा सेरी साधू गया, सो तो राखी मूंद॥

भूला भसम रमाय के, मिटी न मन की चाह।
जो सिक्का नहि साँच का, तब लग जोगी नाहं॥

ऐसी ठाठां ठाठिये, बहुरि न यह तन होय।
ज्ञान गूदरी ओढ़िये, काढ़ि न सकही कोय॥

मन माला तन सुमरनी, हरिजी तिलक दियाय।
दुहाई राजा राम की, दूजा दूरि कियाय॥

मन माला तन मेखला, भय की करै भभूत।
राम मिला सब देखता, सो जोगी अवधूत॥

माला फ़ेरै मनमुखी, बहुतक फ़िरै अचेत।
गांगी रोलै बहि गया, हरि सों किया न हेत॥

माला फ़ेरै कछु नहीं, डारि मुआ गल भार।
ऊपर ढ़ोला हींगला, भीतर भरी भंगार॥

माला फ़ेरै क्या भयाम गांठ न हिय की खोय।
हरि चरना चित राखिये, तो अमरापुर जोय॥

माला फ़ेरै कछु नहीं, काती मन के हाथ।
जब लग हरि परसै नहीं, तब लग थोथी बात॥

ज्ञान संपुरन ना बिधा, हिरदा नहि भिदाय।
देखा देखी पकरिया, रंग नही ठहराय।

बाना पहिरै सिंघ का, चले भेङ की चाल।
बोली बोले सियार की, कुत्ता खावै फ़ाल॥

भरम न भागै जीव का, बहुतक धरिया भेष।
सतगुरू मिलिया बाहिरै, अन्तर रहा अलेख॥

तन को जोगी सब करै, मन को करै न कोय।
सहजै सब सिधि पाइये, जो मन जोगी होय॥

हम तो जोगी मनहि के, तन के हैं ते और।
मन को जोग लगावतां, दसा भई कछु और॥

पहिले बूङी पिरथवी, झूठे कुल की लार।
अलख बिसार्यो भेष में, बूङि काल की धार॥

चतुराई हरि ना मिलै, यह बातों की बात।
निस्प्रेही निरधार का, गाहक दीनानाथ॥

जप माला छापा तिलक, सरै न एकौ काम।
मन काचे नाचे व्रिथा, सांचे सांचे राम॥

हम जाना तुम मगन हो, रहै प्रेमरस पाग।
रंच पौन के लागते, उठै आग से जाग॥

सीतल जल पाताल का, साठि हाथ पर मेख।
माला के परताप ते, ऊपर आया देख॥

करिये तो करि जानिये, सरिखा सेती संग।
झिर झिर जिमि लोई भई, तऊ न छाङै रंग॥

संसारी साकट भला, कन्या क्वारी माय।
साधु दुराचारी बुरा, हरिजन तहाँ न जाय॥

वैरागी विरकत भला, गिरा पङा फ़ल खाय।
सरिता को पानी पिये, गिरही द्वार न जाय॥

गिरही द्वारै जाय के, उदर समाता लेय।
पीछे लागे हरि फ़िरै, जब चाहै तब देय॥

सिष साखा संसार गति, सेवक परतछ काल।
वैरागी छावै मढ़ी, ताको मूल न डाल॥

जो मानुष गृहि धर्मयुत, राखै सील विचार।
गुरूमुख बानी साधु संग, मन वच सेवा सार॥

सेवक भाव सदा रहै, वहम न आनै चित्त।
निरनै लखी यथार्थ विधि, साधुन को करै मित्त॥

सत्त सील दाया सहित, बरते जग व्यौहार।
गुरू साधू का आश्रित, दीन वचन उच्चार॥

बहु संग्रह विषयान को, चित्त न आवै ताहि।
मधुकर इमि सब जगत जिव, घटि बढ़ि लखि बरताहि।

गिरही सेवै साधु को, साधू सुमरै नाम।
यामें धोखा कछु नहीं, सरै दोउ का काम॥

गिरही सेवै साधु को, भाव भक्ति आनन्द।
कहै कबीर वैरागि को, निरवानी निरदुंद॥

सब्द विचारे पथ चले, ज्ञान गली दे पांव।
क्या रमता क्या बैठता, क्या ग्रह कंदला छांव॥

जैसा मीठा घृत पकै, तैसा फ़ीका साग।
राम नाम सों राचहीं, कहै कबीर वैराग॥

पांच सात सुमता भरी, गुरू सेवा चित लाय।
तब गुरू आज्ञा लेय के, रहे दिसंतर जाय॥

गुरू आज्ञा तें जो रमै, रमते तजै सरीर।
ताको मुक्ति हजूर है, सदगुरू कहै कबीर॥

गुरू के सनमुख जो रहै, सहै कसौटी दूख।
कहैं कबीर ता दूख पर, बारौं कोटिक सूख॥

सतगुरू अधम उधारना, दया सिंधु गुरू नाम।
गुरू बिनु कोई न तरि सकै, क्या जप अल्लह राम॥

माला पहिरै कौन गुन, मन दुविधा नहि जाय।
मन माला करि राखिये, गुरूचरनन चित लाय॥

मन का मस्तक मूंडि ले, काम क्रोध का केस।
जो पांचौ परमौधि ले, चेला सबही देस॥

माला तिलक बनाय के, धर्म विचारा नांहि।
माल विचारी क्या करै, मैल रहा मन मांहि॥

माल बनाई काठ की, बिच में डारा सूत।
माल विचारी क्या करै, फ़ेरनहार कपूत॥

माल तिलक तो भेष है, राम भक्ति कछु और।
कहै कबीर जिन पहिरिया, पाँचौ राखै ठौर॥

माला तो मन की भली, औ संसारी भेष।
माला फ़ेरे हरि मिले, हरहट के गल देख।

मन मैला तन ऊजला, बगुला कपटी अंग।
तासों तो कौआ भला, तन मन एकहि रंग॥

कवि तो कोटिन कोटि है, सिर के मूंङे कोट।
मन के मूंङे देख करि, ता संग लीजै ओट॥

भेष देखि मत भूलिये, बूझि लीजिये ज्ञान।
बिना कसौटी होती नहीं, कंचन की पहिचान॥

फ़ाली फ़ूली गाङरी, ओढ़ि सिंघ की खाल।
सांचा सिंघ जब आ मिले, गाडर कौन हवाल॥

पांचौ में फ़ूला फ़िरै, साधु कहावै सोय।
स्वान न मेलै बाघरो, बाघ कहाँ से होय॥

बोली ठाली मसखरी, हांसी खेल हराम।
मद माया औ इस्तरी, नहि संतन के काम॥

भांड भवाई खेचरी, ये कुल को बेवहार।
दया गरीबी बंदगी, संतन का उपकार॥

दूध दूध सब एक है, दूध आक भी होय।
बाना देखि न बंदिये, नैना परखो सोय॥

बाना देखी बंदिये, नहि करनी सों काम।
नीलकंठ कीङा चुगै. दरसन ही सों काम॥

कबीर भेष भगवंत का, माला तिलक बनाय।
उनकूं आवत देखि के, उठि कर मिलिये धाय॥

गिरही को चिंता घनी, वैरागी को भीख।
दोनों का बिच जीव है, देहु न सन्तो सीख॥

वैरागी बिरकत भला, गिरही चित्त उदार।
दोउ चूकि खाली पङै, ताको वार न पार॥

घर में रहै तो भक्ति करूं, नातर करूं वैराग।
वैरागी बंधन करै, ताका बङा अभाग॥

धारा तो दोनों भली, गिरही कै वैराग।
गिरही दासातन करै, वैरागी अनुराग॥

अजर जु धान अतीत का, गिरही करै अहार।
निश्चै होई दरिद्री, कहैं कबीर विचार॥

05 मार्च 2018

साधु को अंग 1



साधु को अंग

कबीर दरसन साधु के, साहिब आवै याद।
लेखे में सोई घङी, बाकी के दिन बाद॥

कबीर दरसन साधु का, करत न कीजै कानि।
ज्यौं उद्यम से लक्ष्मी, आलस से मन हानि॥

कबीर सोइ दिन भला, जा दिन साधु मिलाय।
अंक भरै भरी भेटिये, पाप सरीरा जाय॥

कबीर दरसन साधु के, बङे भाग दरसाय।
जो होवै सूली सजा, कांटै ई टरि जाय॥

दरसन कीजै साधु का, दिन में कई कई बार।
आसोजा का मेह ज्यौं, बहुत करै उपकार॥

कई बार नहि करि सकै, दोय बखत करि लेय।
कबीर साधू दरस ते, काल दगा नहि देय॥

दोय बखत नहि करि सकै, दिन में करु इक बार।
कबीर साधू दरस ते, उतरे भौजल पार॥

एक दिना नहि करि सकै, दूजै दिन करि लेह।
कबीर साधू दरस ते, पावै उत्तम देह॥

दूजै दिन नहि करि सकै, तीजै दिन करु जाय।
कबीर साधु दरस ते, मोक्ष मुक्ति फ़ल पाय॥

तीजै चौथै नहि करै, बार बार करु जाय।
यामें बिलंब न कीजिये, कहै कबीर समुझाय॥

बार बार नहि करि सकै, पाख पाख करि लेय।
कहै कबीर सो भक्त जन, जनम सुफ़ल करि लेय॥

पाख पाख नहि करि सकै, मास मास करु जाय।
यामें देर न लाइये, कहैं कबीर समुझाय॥

मास मास नहि करि सकै, छठै मास अलबत्त।
यामें ढील न कीजिये, कहैं कबीर अविगत्त॥

छठै मास नहि करि सकै, बरस दिना करि लेय।
कहै कबीर सो भक्तजन, जमहि चुनौती देय॥

बरस बरस नहि करि सकै, ताको लागे दोष।
कहै कबीरा जीव सो, कबहु न पावै मोष॥

मात पिता सुत इस्तरी, आलस वधू कानि।
साधु दरस को जब चलै, ये अटकावै आनि॥

इन अटकाया  ना रहै, साधु दरस को जाय।
कहैं कबीर सोई संतजन, मोक्ष मुक्ति फ़ल पाय॥

साधु चलत रो दीजिये, कीजै अति सनमान।
कहै कबीर कछु भेंट धरु, अपने बित अनुमान॥

खाली साधु न विदा करु, सुनि लीजो सब कोय।
कहै कबीर कछु भेंट धरु, जो तेरे घर होय॥

मोहर रुपैया पैसा, छाजन भोजन देय।
कह कबीर सो जगत में, जनम सफ़ल करि लेय॥

हाथी घोङा गाय भैंस, रथ अरु गाङी भवन।
कबीर दीजै साधु को, कीया चाहै गवन॥

बेटा बेटी इस्तरी, साधु चहै सो देय।
सिर साधु के अरपही, जनम सुफ़ल करि लेय॥

कबीर दरसन साधु के, खाली हाथ न जाय।
यही सीख बुधि लीजिये, कहैं कबीर समुझाय॥

सुनिये पार जु पाइया, छाजन भोजन आनि।
कहैं कबीरा साधु को, देत न कीजै कानि॥

कबीर लौंग इलायची, दातुन माटी पानि।
कहैं कबीरा साधु को, देत न कीजै कानि॥

टूका माहीं टूक दे, चीर मांहि सों चीर।
साधू देत न सकुचिये, यौं कहैं सत्त कबीर॥

कंचन दीया करन ने, द्रौपदी दीया चीर।
जो दीया सो पाइया, ऐसे कहैं कबीर॥

निराकार निजरूप है, प्रेम प्रीत सों सेव।
जो चाहै आकार को, साधू परतछ देव॥

साधू आवत देखि के, चरनौं लागौ धाय।
क्या जानौ इस भेष में, हरि आपै मिल जाय॥

साधू आवत देख करि, हँसी हमारी देह।
माथा का ग्रह उतरा, नैनन बढ़ा सनेह॥

साधू आवत देखि के, मन में करै मरोर।
सो तो होसी चूहरा, बसै गांव की ओर॥

साधु आया पाहुना, माँगै चार रतन।
घुनी पानी साथरा, सरधा सेती अंन॥

साधु दया साहिब मिले, उपजा परमानंद।
कोटि विघन पल में टलै, मिटै सकल दुख दंद॥

साधू सब्द समुद्र है, जामें रतन भराय।
मंद भाग मुठ्ठी भरे, कंकर हाथ लगाय॥

साधु मिलै यह सब टलै, काल जाल जम चोट।
सीस नवावत ढहि पङै, अघ पापन के पोट॥

साधु सेव जा घर नहि, सदगुरू पूजा नाहि।
सो घर मरघट जानिये, भूत बसै तेहि मांहि॥

साधु सीप साहिब समुंद, निपजत मोती मांहि।
वस्तु ठिकानै पाइये, नाल खाल में नांहि॥

साधु बङे संसार में, हरि ते अधिका सोय।
बिन इच्छा पूरन करै, साहिब हरि नहि दोय॥

साधु बिरछ सतनाम फ़ल, सीतल सब्द विचार।
जग में होते साधु नहि, जरि मरता संसार॥

साधु हमारी आतमा, हम साधुन की देह।
साधुन में हम यौं रहैं, ज्यौं बादल में मेह॥

साधु हमारी आतमा, हम साधुन की सांस।
साधुन में हम यौं रहै, ज्यौं फ़ूलन में बास॥

साधु हमारी आतमा, हम साधुन के जीव।
साधुन में हम यौं रहैं, ज्यौं पय मध्ये घीव॥

ज्यौं पय मद्धे घीव है, रमी रहा सब ठौर।
वक्ता स्रोता बहु मिले, मथि काढ़ै ते और॥

साधु नदी जल प्रेम रस, तहाँ प्रछालो अंग।
कहैं कबिर निरमल भया, हरि भक्तन के संग॥

साधु मिले साहिब मिले, अन्तर रही न रेख।
मनसा वाचा करमना, साधू साहिब एक॥

साधू को उठि भेटिये, मुख ते कहिये राम।
नातो साधु सरूप को, करनी सो नहि काम॥

साधुन के मैं संग हूं, अन्त कहूं नहि जाँव।
जु मोहि अरपै प्रीति सो, साधुन मुख ह्वै खाँव॥

साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नांहि।
धन का भूखा जो फ़िरै, सो तो साधु नांहि॥

साधु बङे परमारथी, घन ज्यौं बरसै आय।
तपन बुझावै और की, अपनो पारस लाय॥

साधु बङे परमारथी, सीतल जिनके अंग।
तपन बुझावै और की, दे दे अपनो रंग॥

आवत साधु न हरषिया, जात न दीया रोय।
कहैं कबिर वा दास की, मुक्ति कहाँ ते होय॥

छाजन भोजन प्रीति सों, दीजै साधु बुलाय।
जीवत जस है जगत में, अन्त परम पद पाय॥

सरवर तरुवर संतजन, चौथा बरसै मेह।
परमारथ के कारनै, चारौं धारी देह॥

बिरछा कबहु न फ़ल भखै, नदी न अँचवै नीर।
परमारथ के कारनै, साधुन धरा सरीर॥

अलख पुरुष की आरसी, साधु ही की देह।
लखा जु चाहै अलख को, इनही में लखि लेह॥

साधु को अंग 2




साधु को अंग 2

सुख देवै दुख को हरै, दूर करै अपराध।
कहै कबिर वह कब मिलै, परम सनेही साध॥

जाति न पूछो साधु की पूछि लीजिये ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पङा रहन दो म्यान॥

हरि दरबारी साधु हैं, इनते सब कुछ होय।
वेगि मिलावें राम को, इन्हें मिले जु कोय॥

कह अकास को फ़ेर है, कह धरती का तोल।
कहा साधु की जाति है, कह पारस का मोल॥

हरि सों तू मति हेत करु, कर हरिजन सों हेत।
माल मुल्क हरि देत हैं, हरिजन हरि ही देत॥

साधू खोजा राम के, धसै जु महलन मांहि।
औरन को परदा लगे, इनको परदा नांहि॥

जा घर साधु न सेवहीं, पारब्रह्म पति नांहि।
ते घर मरघट सारिखा, भूत बसें ता ठांहि॥

साधुन की झुपङी भली, ना साकट को गाँव।
चंदन की कुटकी भली, ना बाबुल वनराव॥

पुर पट्टन सूबस बसै, आनन्द ठांवै ठांव।
राम सनेही बाहिरा, ऊजङ मेरे भाव॥

हयबर गयबर सघन घन, छत्रपति की नारि।
तासु पटतर ना तुलै, हरिजन की पनिहारि॥

क्यौं नृपनारी निन्दिये, पनिहारी को मान।
माँग संवारे पीव कूं, नित वह सुमरै राम॥

साधुन की कुतिया भली, बुरी साकट की माय।
वह बैठी हरिजस सुनै, निन्दा करनै जाय॥

तीरथ न्हाये एक फ़ल, साधु मिले फ़ल चार।
सदगुरू मिलें अनेक फ़ल, कहैं कबीर विचार॥

साधु सिद्ध बहु अन्तरा, साधु मता परचंड।
सिद्ध जु तारे आपको, साधु तारि नौ खंड॥

यही बङाई सन्त की, करनी देखो आय।
रज हूं ते झीना रहै, लौलीन ह्वै गुन गाय॥

परमेश्वर ते सन्त बङ, ताका कहँ उनमान
हरि माया आगै धरै, सन्त रहै निरवान॥

नीलकंठ कीङा भखै, मुख वाके हैं राम।
औगुन वाकै नहि लगै, दरसन ही से काम॥

अन वैस्नव कोई नहीं, सब ही वैस्नव जानि।
जेता हरि को ना भजै, तेता ताको हानि॥

आप साधु करि देखिये, देख असाधु न कोय।
जाके हिरदे हरि नही, हानी उसकी होय॥

जा सुख को मुनिवर रटैं, सुर नर करैं विलाप।
सो सुख सहजै पाइया, सन्तों संगति आप॥

मेरा मन पंछी भया, उङि के चढ़ा अकास।
बैकुंठहि खाली पङा, साहिब सन्तों पास॥

परवत परवत मैं फ़िरा, कारन अपने राम।
राम सरीखे जन मिले, तिन सारै सब काम॥

कबीर सीतल जल नहि, हिम न सीतल होय।
कबीर सीतल संतजन, नाम सनेही होय॥

भली भई हरिजन मिले, कहने आयो राम।
सुरति दसौं दिस जाय थी, अपने अपने काम॥

संत मिले जनि बीछुरौ, बिछुरौ यह मम प्रान।
सब्द सनेही ना मिले, प्रान देह में आन॥

कोटि कोटि तीरथ करै, कोटि कोटि करु धाम।
जब लग साधु न सेवई, तब लग काचा काम॥

आसा वासा सन्त का, ब्रह्मा लखै न वेद।
षट दरसन खटपट करैं, बिरला पावै भेद॥

वेद थके ब्रह्मा थके, थाके सेस महेस।
गीता हूं की गम नही, संत किया परवेस॥

धन सो माता सुन्दरी, जाया साधू पूत।
नाम सुमिरि निर्भय भया, अरु सब गया अबूत॥

साधू ऐसा चाहिये, दुखै दुखावै नांहि।
पान फ़ूल छैङै नहीं, बसै बगीचा मांहि॥

साधू जन सब में रमें, दुख न काहू देहि।
अपने मत गाढ़ा रहै, साधन का मत येहि॥

साध हजारी कापङा, तामें मल न समाय।
साकट काली कामली, भावै तहाँ बिछाय॥

साधु भौंरा जग कली, निस दिन फ़िरै उदास॥
टुकि टुकि तहाँ बिलंबिया, सीतल सब्द निवास॥

साधु सिद्ध बङ अन्तरा, जैसे आम बबूल।
बाकी डारी अमी फ़ल, बाकी डारी सूल॥

साधु कहावन कठिन है, ज्यौं खांडे की धार।
डगमगाय तो गिरि पङे, निहचल उतरे पार॥

साधु कहावन कठिन है, लम्बी पेङ खजूर।
चढ़ूं तो चाखै प्रेमरस, गिरूं तो चकनाचूर॥

साधु चाल जु चालई, साधु कहावै सोय।
बिन साधन तो सुधि नही, साधु कहाँ ते होय॥

साधू सोई जानिये, चलै साधु की चाल।
परमारथ राता रहै, बोले वचन रसाल॥

साधु सती औ सूरमा, दई न मोङै मूंह।
ये तीनों भागा बुरा, साहिब जाकी सूंह॥

साधु सती औ सूरमा, राखा रहै न ओट।
माथा बांधि पताक सों, नेजा घालैं चोट॥

साधु सती औ सिंघ को, ज्यौं लंघन त्यौं सोभ।
सिंघ न मारै मेंढका, साधु न बांधे लोभ॥

साधु सिंघ का इक मता, जीवत ही को खाय।
भावहीन मिरतक दसा, ताके निकट न जाय।

साधु साधु सब एक है, जस अफ़ीम का खेत।
कोई विवेकी लाल हैं, और सेत का सेत॥

साधू तो हीरा भया, ना फ़ूटै घन खाय।
ना वह बिनसै कुंभ ज्यौं, ना वह आवै जाय॥

साधु साधु सबही बङे, अपनी अपनी ठौर।
सब्द विवेकी पारखी, ते माथे की मौर॥

साधू ऐसा चाहिये, जाके ज्ञान विवेक।
बाहर मिलते सों मिलै, अन्तर सब सों एक॥

सदकृपाल दुख परिहरन, वैर भाव नहि दोय।
छिमा ज्ञान सत भाखही, हिंसा रहित जु होय॥

दुख सुख एक समान है, हरष सोक नहि व्याप।
उपकारी निहकामता, उपजै छोह न ताप॥

सदा रहै सन्तोष में, धरम आप दृढ़ धार।
आस एक गुरूदेव की, और न चित्त विचार॥

सावधान औ सीलता, सदा प्रफ़ुल्लित गात।
निर्विकार गंभीर मत, धीरज दया बसात॥

निर्वैरी निहकामता, स्वामी सती नेह।
विषया सों न्यारा रहै, साधुन का मत येह॥

मान अमान न चित्त धरै, औरन को सनमान।
जो कोई आसा करै, उपदेसै तेहि ज्ञान॥

सीलवंत दृढ़ ज्ञान मत, अति उदार चित होय।
लज्जावान अति निछलता, कोमल हिरदा सोय॥

दयावंत धरमक ध्वजा, धीरजवान प्रमान।
सन्तोषी सुखदायका, साधु परम सुजान॥

साधु को अंग 3




साधु को अंग 3

निहचल मत अरु दृढ़ मता, ये सब लच्छन जान।
साधू सोई जगत में, जो यह लच्छनवान॥ 

मन रंजन पर दुखहरन, वैर भाव बिसराय।
छिपा ज्ञान हिंसा रहित, सो नर साधु कहाय॥

इन्द्रिय मन निग्रह करन, हिरदा कोमल होय।
सदा शुद्ध आचार में, रह विचार में सोय॥

और देव नहि चित बसै, मन गुरूचरन बसाय।
स्वल्पाहार भोजन करु, तृस्ना दूर पराय॥

और देव नहि चित बसै, बिन प्रतीत भगवान।
मिला (अ)हार भोजन करै, तृस्ना चलै न जान॥

षङ विकार यह देह के, तिनको चित्त न लाय।
सोक मोह प्यासहि छुधा, जरा मृत्यु नसि जाय॥

कपट कुटिलता छांङि के, सबसों मित्रहि भाव।
कृणवान सम ज्ञानवत, वैर भाव नहि काव॥

कपट कुटिलता दुरवचन, त्यागी सबसों हेत।
कृपाबन्त आसारहित, गुरूभक्ति सिख देत॥

रवि को तेज घटै नहीं, जो घन जुरै घमंड।
साधु वचन पलटै नहीं, पलटि जाय ब्रह्मंड॥

जौन चाल संसार की, तौन साधु की नांहि।
डिंभ चाल करनी करै, साधु कहो मति ताहि॥

गांठी दाम न बांधई, नहि नारी सों नेह।
कहैं कबीर ता साधु की, हम चरनन की खेह॥ 

कोई आवै भाव ले, को अभाव ले आव।
साधु दोऊ को पोषते, भाव न गिनै अभाव॥

रक्त छांङि पय को गहै, ज्यौं रे गउ का बच्छ।
औगुन छाङै गुन गहै, ऐसा साधु लच्छ॥

संत न छाङै संतता, कोटिक मिले असन्त।
मलय भुवंगम बेधिया, सीतलता न तजन्त॥

साकट ब्राह्मन मति मिलो, साधु मिलो चंडाल।
जाहि मिलै सुख ऊपजै, मानो मिले दयाल॥

कमल पत्र है साधुजन, बसै जगत के मांहि।
बालक केरी धाय ज्यौं, अपना जानत नांहि॥

हरि दरिया सूभर भरा, साधू का घट सीप।
तामें मोती नीपजै, चढ़ै देसावर दीप॥

बहता पानी निरमला, बंधा गन्दा होय।
साधू जन रमता भला, दाग न लागे कोय॥

बंधा पानी निरमला, जो टुक गहिरा होय।
साधूजन बैठा भला, जो कछु साधन होय॥

ढोल दमामा गङगङी, सहनाई औ तूर।
तीनों निकसि न बाहुरै, साधु सती औ सूर।

तूटै बरत अकास सों, कौन सकत है झेल।
साधु सती औ सूर का, अनी उपर का खेल॥

हांसी खेल हराम है, जो जन राते नाम।
माया मंदिर इस्तरी, नहि साधु का काम॥

उडगन और सुधाकरा, बसत नीर की संध।
यौं साधू संसार में, कबीर पङत न फ़ंद॥

जौन भाव ऊपर रहै, भितर बसावै सोय।
भीतर औ न बसावई, ऊपर और न होय॥

तन में सीतल सब्द है, बोलै वचन रसाल।
कहैं कबीर ता साधु को, गंजि सकै नहि काल॥

तीन लोक उनमान में, चौथा अगम अगाध।
पंचम दसा है अलख की, जानैगा कोई साध॥

सब वन तो चंदन नहीं, सूरा के दल नांहि।
सब समुद्र मोती नहि, यौं साधू जग मांहि॥

सिंघन के लेहङा नहीं, हँसों की नहि पांत।
लालन की नहि बोरियां, साधु न चले जमात॥

स्वांगी सब संसार है, साधू समज अपार।
अलल पंछि कोइ एक है, पंछी कोटि हजार॥

ऐसा साधू खोजि के, रहिये चरनों लाग।
मिटै जनम की कलपना, जाके पूरन भाग॥

ऊंडा चित अरु सम दसा, साधू गुन गंभीर।
जो धोखा बिचलै नहीं, सोई संत सुधीर॥

चित चैन में गरकि रहा, जागि न देख्यौ मित्त।
कहाँ कहाँ सल पारि हो, गल बल सहर अनित्त॥

कबीर हमरा कोइ नहि, हम काहू के नांहि।
पारै पहुँची नाव ज्यौं, मिलि के बिछुरी जांहि॥

आज काल के लोग हैं, मिलि के बिछुरी जांहि।
लाहा कारन आपने, सौगंद राम की खांहि॥

कबीर सब जग हेरिया, मेल्यौ कंध चढ़ाय।
हरि बिन अपना कोइ नहि, देखा ठोकि बजाय॥

निसरा पै बिसरा नहीं, तो निसरा ना काहि।
पहिली खाद उखालिया, सो फ़िर खाना नाहिं॥

जो विभूति साधुन तजी, मूढ़ ताहि लपटाय।
ज्यौंहि वमन करि डारिया, स्वान स्वाद करि खाय॥

दुनिया बंधन पङि गई, साधू हैं निरबंध।
राखै खंग जु ज्ञान का, काटत फ़िरै जु फ़ंद॥

कबीर कमलन जल बसै, जल बसि रहे असंग।
साधूजन तैसे रहें, सुनि सदगुरू परसंग॥

मुर्गाबी को देखकर, मन उपजा यह ज्ञान।
जल में गोता मार कर, पंख रहे अलगान॥

जुआ चोरी मुखबिरी, ब्याज विरानी नारि।
जो चाहै दीदार को, इतनी वस्तु निवारि॥

सन्त समागम परम सुख, जान अलप सुख और।
मान सरोवर हंस है, बगुला ठौरै ठौर॥

संत मिले सुख ऊपजे, दुष्ट मिले दुख होय।
सेवा कीजै संत की, जनम कृतारथ होय॥

हरिजन मिले तो हरि मिले, मन पाया विश्वास।
हरिजन हरि का रूप है, ज्यूं फ़ूलन में वास॥

संत मिले तब हरि मिले, कहिये आदि रु अन्त।
जो संतन को परिहरै, सदा तजै भगवंत॥

राम मिलन के कारनै, मो मन बङा उदास।
संत संग में सोधि ले, राम उनों के पास॥

सरनै राखौ साइयां, पूरो मन की आस।
और न मेरे चाहिये, संत मिलन की प्यास॥

कलियुग एकै नाम है, दूजा रूप है संत।
सांचे मन से सेइये, मेटै करम अनंत॥

संत जहाँ सुमरन सदा, आठों पहर अमूल।
भरि भरि पीवै रामरस, प्रेम पियाला फ़ूल॥

फ़ूटा मन बदलाय दे, साधू बङे सुनार।
तूटी होवै राम सों, फ़ेर संधावन हार॥

राज दुवार न जाइये, कोटिक मिले जु हेम।
सुपच भगत के जाइये, यह विस्नू का नेम॥

संगत कीजै साधु की, कदी न निस्फ़ल होय।
लोहा पारस परस ते, सो भी कंचन होय॥

सो दिन गया अकाज में, संगत भई न संत।
प्रेम बिना पशु जीवना, भाव बिना भटकंत॥

संत मिले तब हरि मिले, यूं सुख मिलै न कोय।
दरसन ते दुरमत कटै, मन अति निरमल होय॥

साहिब मिला तब जानिये, दरसन पाये साध।
मनसा वाचा करमना, मिटे सकल अपराध॥

साधु को अंग 4



साधु को अंग 4

सोई साधु पति बरत जु, सदा जरै पिय आग।
लाभ हानि बिसराय के, रहु गुरू चरनन लाग॥

दया गरीबी बंदगी, समता सील सुभाव।
येते लच्छन साधु के, कहै कबीर सदभाव॥

मान नहि अपमान नहीं, ऐसे सीतल संत।
भवसागर ऊतर पङे, तोरै जम के दंत॥

आसा तजि माया तजै, मोह तजै अरु मान।
हरख सोक निन्दा तजै, कहै कबिर संत जान॥

साधु सोई सराहिये, कनक कामिनी त्याग।
और कछू इच्छा नहीं, निसदिन रह अनुराग॥

साधू ऐसा चाहिये, जैसा फ़ोफ़ल भग।
आप करावै टूकङा, पर राखै रंग॥

तनहि ताप जिनको नही, माया मोह संताप।
हरख सोक आसा नहीं, सो हरिजन हरि आप॥

संतन के मन भय रहे, भय धरि करै विचार।
निसदिन नाम जपउ करै, बिसरत नहीं लगार॥

आसन तो इकान्त करै, कामिनी संगत दूर।
सीतल संत सिरोमनी, उनका ऐसा नूर॥

साधु साधु मुख से कहै, पाप भसम ह्वै जाय।
आप कबीर गुरू कहत हैं, साधू सदा सहाय॥

हौं साधुन के संग रहूं, अंत न कितहूं जाऊं।
जु मोहि अरपै प्रीति सों, साधुन मुख ह्वै खाऊं॥

यह कलियुग आयो अवै, साधु न मानै कोय।
कामी क्रोधी मसखरा, तिनकी पूजा होय॥

संत संत सब कोइ कहै, संत समुंदर पार।
अनल पंख कोइ एक है, पंखी कोटि हजार॥

कबीर सेवा दोउ भली, एक संत इक राम।
राम है दाता मुक्ति का, संत जपावै नाम॥

साधू खारा यौं तजै, सीप समुंदर मांहि।
वासो तो वामें रहै, मन चित वासों नाहिं॥

साधु मिले साहिब मिले, ये सुख कहो न जाय।
अंतरगत अंगीठडी, ततचिन टाढी थाय॥

साहिब संग राचै भंवर, कबहू न छूटै रंग।
जैसे जैसे कीजिये, उन संतन को संग॥

साधू के घर जाय के, किरतन दीजै कान।
ज्यौं उद्यम त्यौं लाभ है, ज्यौं आलस त्यौं हानि॥

साधू के घर जाय के, सुधि न लीजै कोय।
पीछै करी न देखिये, आगे ह्वै सो होय॥

साधु विहंगम सुरसरी, चेल विहंगम चाल।
जो जो गलियां नीकसे, सो सो करै निहाल॥

साधू सोई सराहिये, पाँचौ राखै चूर।
जिनके पांचौ बस नही, तिनते साहिब दूर॥

निहकामी निरमल दसा, पकङे चारौं खूंट।
कहै कबीर वा दास का, आस करै बैकुंठ॥

रति एक धुँवा संत का, भूत ऊधरे चार।
जले जलाये फ़िर जले, कहैं कबीर विचार॥

साधू सरवन सांभरी, छोङ चले ग्रह काम।
डग डग पै असमेध जग, यौं कहि श्री भगवान॥

साधु दरस को जाइये, जेता धरिये पांय।
डग डग पै असमेध जग, कहैं कबीर समुझाय॥

साधू दरसन महाफ़ल, कोटि जज्ञ फ़ल लेह।
इक मंदिर की का पङी, सहर पवित्र करि लेह॥

साधु मिले सूख ऊपजे, साधु गये दुख होय।
ताते देही दूबली, नैनन दीन्हा रोय॥

जाकी धोति अधर तपै, ऐसे मिले असंख।
सब रिषियन के देखतां, सुपच बजाया घंट॥

साहिब का बाना सही, संतन पहिरा जानि।
पांडव जग पूरन भयो, सुपच बिराजे आन।

कुलवंता कोटिक मिले, पंडित कोटि पचीस।
सुपचि भक्त की पनहि में, तुलै न काहू सीस॥

हरि सेती हरिजन बङे, जानै संत सुजान।
सेतु बांधि रघुवर चले, कूदि गये हनुमान॥

ज्ञान ध्यान मन धनुष गहि, खैंचनहार अलेख।
केते दुरजन मारिया, आप कढ़ै या भेख॥

साधू ऐसा चाहिये, जहाँ रहै तहाँ गैब।
बानी के विस्तार में, ताकूं कोटिक ऐब॥

सन्तमता गजराज का, चाले बंधन छोङ।
जग कुत्ता पीछै फ़िरै, सुनै न वाका सोर॥

आज काल दिन पांच में, बरस पंच जुग पंच।
जब तब साधु तारसी, और सकल परपंच॥

सतगुरू केरा भावता, दूरहि ते दीसंत।
तन छीन मन उनमुनी, झूठा रूठ फ़िरंत॥

ज्यौं जल में मच्छी रहैं, साहिब साधू मांहि।
सब जग में साधू रहै, असमझ चीन्है नांहि॥

समझे घट कूं यूं बनै, ये तो बात अगाध।
सबही सों निरवैरता, पूजन कीजै साध॥

मिलता सेती मिलि रहै, बिछुरे सें वैराग।
साहिब सेती यौं रहै, विमन के गल ताग॥

हाजी कूं दुख बहुत हैं, नाजी कू दुख नांहि।
कबीर हाजी ह्वै रहो, अपने ही दिल मांहि॥

सन्त कहि सो साधु कहि, वेद कही मति जानि।
कहैं कबीर एकै रही, ताते होत पिछान॥

साधू ऐसा चाहिये, जाका पूरन मन।
विपति पङै छाङै नही, चढ़ै चौगुना रंग।।

कबीर साधू दुरमति, ज्यौं पानी में लात।
पल एकै विरजत रहै, पीछै इक ह्वै जात॥

साधू ऐसा चाहिये, जामें लछन बतीस।
विरचाया बिरचै नहीं, पांव चढ़े दे सीस॥

साधु मिले सचु पाइया, साकट मिलि ह्वै हानि।
बलिहारी वा दास की, पिवै प्रेमरस छानि॥

केता जिभ्या रस भखै, रती न लागै टक।
ज्ञानी माया मुक्ति ये, यौं साधू निकलंक॥

काग साधू दरसन कियो, कागा ते भये हंस।
कबीर साधू दरस ते, पाये उत्तम बंस॥

हंस साधु दरसन कियो, हंसा ते भय कौर।
कबीर साधू दरस ते पाये उत्तम ठौर॥

कौर साधु दरसन कियो, पायो उत्तम मोष।
कबीर साधू दरस ते, मिटि गये तीनों दोष॥

कागा ते हंसा भयो, हंसा ते भयो कौर।
कबीर साधू दरस ते, भयो और को और॥

हेत बिना आवै नही, हेत तहाँ चलि जाय।
कबीर जल औ संतजन, नवै तहाँ ठहराय॥

संत होत है हेत के, हेत तहाँ चलि जाय।
कहै कबीर वे हेत बिन, गरज कहाँ पतियाय॥

दृष्टि मुष्टि आवै नही, रूप बरन पुनि नांहि।
जो मन में परतीत ह्वै, देखा संतन मांहि॥

सदा मीन जल में रहै, कब अचवै है पानि।
ऐसी महिमा साधु की, पङै न काहू जानि॥

सूर चढ़ै संग्राम कूं, बांधे तरकस चार।
साधू जन माने नही, बांधे बहु हंकार॥

संत सेवा गुरू बंदगी, गुरू सुमिरन वैराग।
येता तबही पाइये, पूरन मस्तक भाग॥

04 मार्च 2018

निगुरा को अंग




निगुरा को अंग

जो निगुरा सुमिरन करै, दिन में सौ सौ बार।
नगर नायका सत करै, जरै कौन की लार॥

गुरू बिन अहनिस नाम ले, नही संत का भाव।
कहै कबीर ता दास का, पङै न पूरा दाव॥

गुरू बिन माला फ़ेरते, गुरू बिन देते दान।
गुरू बिन सब निष्फ़ल गया, पूछौ वेद पुरान॥

गरभ योगेसर गुरू बिना, लागा हरि की सेव।
कहैं कबीर बैकुंठ में, फ़ेर दिया सुकदेव॥

जनक विदेही गुरू किया, लागा गुरू की सेव।
कहैं कबीर बैकुंठ में, उलटि मिला सुकदेव॥

चौसठ दीवा जोय के, चौदह चंदा मांहि।
तिहि घर किसका चांदना, जिहि घर सतगुरू नांहि॥

निसि अंधियारी कारनै, चौरासी लख चंद।
गुरू बिन येते उदय ह्वै, तहूं सुद्रिष्टिहि मंद॥

दारुक में पावक बसै, घुनका घर किय जाय।
हरि संग विमुख नर को, काल ग्रास ही खाय॥

पूरे को पूरा मिला, पूरा पङसी दाव।
निगुरू का कृवट चलै, जब तब करै कुदाव॥

जो कामिनी परदे रहै, सुनै न गुरूमुख बात।
सो तो होगी कूकरी, फ़िरै उघारै गात॥

कबीर गुरू की भक्ति बिनु, नारि कूकरी होय।
गली गली भूंकत फ़िरै, टूंक न डारै कोय॥

कबीर गुरू की भक्ति बिनु, राजा रासभ होय।
माटी लदै कुम्हार की, घास न डारै सोय।

गगन मंडल के बीच में, तहवाँ झलकै नूर।
निगुर महल न पावई, पहुँचेगा गुरू पूर॥

कबीर ह्रदय कठोर के, सब्द न लगै सार।
सुधि बुधि के हिरदै बिधे, उपजे ज्ञान विचार॥

झिरमिर झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेह।
माटी गलि पानी भई, पाहन वाही नेह॥

हरिया जानै रूखङा, उस पानी का नेह।
सूखा काठ न जानि है, कितहूं बूङा मेह॥

कबीर हरिरस बरसिया, गिरि परबत सिखराय।
नीर निबानू ठाहरै, ना वह छापर डाय॥

पसुवा सों पालौ पर्यो, रहु रहु हिया न खीज।
ऊसर बीज न ऊगसी, बोवै दूना बीज॥

ऊंचै कुल के कारनै, बांस बंध्यो हंकार।
राम भजन हिरदै नही,  जार्यो सब परिवार॥

कबीर चंदन के मिरै, नीम भी चन्दन होय।
बूड्यौ बांस बढ़ाइयां, यौं जनि बूङौ कोय॥

कबीर लहरि समुद्र की, मोती बिखरे आय।
बगुला परख न जानई, हंसा चुगि चुगि खाय॥

सारा लश्कर ढ़ूंढ़िया, सारदूल नहि पाय।
गीदङ को सर वाहिके, नामै काम गंवाय॥

सुकदेव सरीखा फ़ेरिया, तो को पावै पार।
गुरू बिनु निगुरा जो रहे, पङै चौरासी धार॥

सत्त नाम है मोतिया, सचराचर रहो छाय।
सगुरे थे सो चुनि लिये, चूक पङी निगुराय॥

कंचन मेरु अरपहीं, अरपै कनक भंडार।
कहै कबीर गुरू बेमुखी, कबहूं न पावै पार॥

दारू के पावक करै, घुनक जरी न जाय।
कहैं कबीर गुरू बेमुखी, काल पास रहि जाय॥

साकट का मुख बिंध है, निकसत वचन भुजंग।
ताकी औषधि मौन है, विष नही व्यापै अंग॥

साकट कहा न कहि चलै, सुनहा कहा न खाय।
जो कौआ मठ हगि भरै, मठ को कहा नशाय॥

साकट सूकर कूकरा, तीनों की गति एक।
कोटि जतन परमोधिये, तऊ न छाङै टेक॥

टेक न कीजै बाबरे, टेक माहि है हानि।
टेक छाङि मानक मिले, सदगुरू वचन प्रमान॥

टेक करै सो बाबरा, टेकै होवै हानि।
जा टेकै साहिब मिले, सोई टेक परमान॥

साकट संग न बैठिये, अपनो अंग लगाय।
तत्व सरीरां झङि पङै, पाप रहै लपटाय॥

साकट संग न बैठिये, करन कुबेर समान।
ताके संग न चालिये, पङिहै नरक निदान॥

साकट ब्राह्मन मति मिलो, वैस्नव मिलु चंडाल।
अंग भरै भरि बैठिये, मानो मिले दयाल॥

साकट सन का जेवरा, मीजै सो करराय।
दो अच्छर गुरू बाहिरा, बांधा जमपुर जाय॥

साकट से सूकर भला, सूचौ राखै गांव।
बूङौ साकट बापुरा, वाइस भरमी नांव॥

साकट हमरै कोऊ नहि, सबही वैस्नव झारि।
संशय ते साकट भया, कहैं कबीर विचारि॥

साकट ब्राह्मन सेवरा, चौथा जोगी जान।
इनको संग न कीजिये, होय भक्ति में हान॥

साकट संग न जाइये, दे मांगा मोहि दान।
प्रीत संगाती ना मिलै, छाङै नहि अभिमान॥

साकट नारी छांङिये, गनिका कीजै नारि।
दासी ह्वै हरि जनन की, कुल नही आवै गारि॥

साकट ते संत होत है, जो गुरू मिले सुजान।
राम नाम निज मंत्र है, छुङवै चारों खान॥

कबीर साकट की सभा, तू मति बैठे जाय।
एक गुवाडै कदि बङै, रोज गदहरा गाय॥

मैं तोही सों कब कह्या, साकट के घर जाव।
बहती नदिया डूब मरूं, साकट संग न खाव॥

संगति सोई बिगुर्चई, जो है साकट साथ।
कंचन कटोरा छांङि कै, सनहक लीन्ही हाथ॥

सूता साधु जगाइये, करै ब्रह्म को जाप।
ये तीनों न जगाइये, साकट सिंह अरु सांप॥

आँखौं देखा घी भला, ना मुख मेला तेल।
साधु सों झगङा भला, ना साकट सों मेल॥

घर में साकट इस्तरी, आप कहावै दास।
ओ तो होयगी सूकरी, वह रखवाला पास॥

खसम कहावै वैस्नव, घर में साकट जोय।
एक घरा में दो मता, भक्ति कहाँ ते होय॥

एक अनूपम हम किया, साकट सों बेवहार।
निंदा साटि उजागरो, कीयो सौदा सार॥

ऊजङ घर में बैठि के, किसका लीजै नाम।
साकट के संग बैठि के, क्यूं कर पावै राम

साकट साकट कहा करो, फ़िट साकट को नाम।
ताही सें सुअर भला, चोखा राखै गाम॥

हरिजन की लातां भलीं, बुरि साकट की बात।
लातों में सुख ऊपजे, बातें इज्जत जात॥

साकट भलेहि सरजिया, परनिंदा जु करंत।
पर को पार उतार के, आपहि नरक परंत॥

वैस्नव भया तो क्या भया, साकट के घर खाय।
वैस्नव साकट दोऊ मिलि, नरक कुंड में जाय॥

सूने मंदिर पैठता, नही धनी की लाज।
कूकर कीने फ़िरत हैं, क्यौं करि सरिगो काज॥

पारब्रह्म बूङो मोतिया, झङी बांधि शिखर।
सुगरा सुगरा चुनि लिया, चूक पङी निगुर॥

बेकामी को सिरजि निवावै, सांटि खोवै भालि गंवावै।
दास कबीर ताहि को भावै, रारि समै सनमुख सरसावैं॥

हरिजन आवत देखि के, मोहङो सूख गयो।
भाव भक्ति समुझयो नहीं, मूरख चूक गयो॥

दासी केरा पूत जो, पिता कौन से कहै।
गुरू बिन नर भरमत फ़िरै, मुक्ति कहाँ से लहै॥

निगुरा ब्राह्मन नहि भला, गुरूमुख भला चमार।
देवतन से कुत्ता भला, नित उठ भूंके द्वार॥

03 मार्च 2018

गुरू शिष्य हेरा को अंग



गुरू शिष्य हेरा को अंग

ऐसा कोई ना मिला, हमको दे उपदेस।
भौसागर में डूबते, कर गहि काढ़े केस॥

ऐसा कोई ना मिला, घर दे अपन जराय।
पाँचौ लङके पटकि के, रहै नाम लौ लाय॥

ऐसा कोई ना मिला, जासों कहूं दुख रोय।
जासों कहिये भेद को, सो फ़िर वैरी होय॥

ऐसा कोई ना मिला, सब विधि देय बताय।
सुन्न मंडल में पुरुष है, ताहि रहूं लौ लाय॥

ऐसा कोई ना मिला, समझै सैन सुजान।
ढोल दमामा ना सुनै, सुरति बिहूना  कान॥

ऐसा कोई ना मिला, समझै सैन सुजान।
अपना करि किरपा करै, लो उतारि मैदान॥

ऐसा कोई ना मिला, जासो कहूं निसंक।
जासों हिरदा की कहूं, सो फ़िर मांडै कंक॥

ऐसा कोई ना मिला, जलती जोति बुझाय।
कथा सुनावै नाम की, तन मन रहै समाय॥

ऐसा कोई ना मिला, टारै मन का रोस।
जा पैडे साधु चले, चलि न सकै इक कोस॥

ऐसा कोई ना मिला, सब्द देऊं बतलाय।
अक्षर और निहअक्षरा, तामें रहै समाय॥

हम घर जारा आपना, लूका लीन्हा हाथ।
वाहू का घर फ़ूंक दूं, चलै हमारे साथ॥

हम देखत जग जात है, जग देखत हम जांहि।
ऐसा कोई ना मिला, पकङि छुङावै बांहि॥

सरपहि दूध पियाइये, सोई विष ह्वै जाय।
ऐसा कोई ना मिला, आपैहि विष खाय॥

तीन सनेही बहु मिले, चौथा मिला न कोय।
सबहि पियारे राम के, बैठे परबस होय।

जैसा ढ़ूंढ़त मैं फ़िरूं, तैसा मिला न कोय।
ततवेता तिरगुन रहित, निरगुन सो रत होय॥

सारा सूरा बहु मिले, घायल मिला न कोय।
घायल को घायल मिले, राम भक्ति दृढ़ होय॥

माया डोलै मोहती, बोले कङुवा बैन।
कोई घायल ना मिला, सांई हिरदा सैन॥

प्रेमी ढ़ूंढ़त मैं फ़िरूं, प्रेमी मिले न कोय।
प्रेमी सों प्रेमी मिले, विष से अमृत होय॥

जिन ढ़ूंढ़ा तिन पाइया, गहिरै पानी पैठ।
मैं बपुरा बूढ़न डरा, रहा किनारे बैठ॥

सदगुरू हमसों रीझि के, एक दिया उपदेस।
भौसागर में बूङता, कर गहि काढ़े केस॥

आदि अंत अब को नहीं, निज बाने का दास।
सब संतन मिलि यौं रमै, ज्यौं पुहुपन में बास॥

पुहुपन केरी बास ज्यौं, व्यापि रहा सब ठांहि।
बाहर कबहू न पाइये, पावै संतों मांहि॥

बिरछा पूछै बीज सों, कौन तुम्हारी जात।
बीज कहै ता वृच्छ, कैसे भै फ़ल पात॥

बिरछा पूछे बीज को, बीज वृच्छ के मांहि।
जीव जो ढ़ूंढ़े ब्रह्म को, ब्रह्म जीव के मांहि॥

डाल जो ढ़ूंढ़े मूल को, मूल डाल के पांहि।
आप आपको सब चले, मिले मूल सों नांहि॥

डाल भई है मूल ते, मूल डाल के मांहि।
सबहि पङे जब भ्रम में, मूल डाल कछु नांहि॥

मूल कबीरा गहि चढ़ै, फ़ल खाये भरि पेट।
चौरासी की भय नहीं, ज्यौं चाहे त्यौं लेट॥

आदि हती सब आपमें, सकल हती ता मांहि।
ज्यौं तरुवर के बीज में, डार पात फ़ल छांहि॥

हेरत हेरत हेरिया, रहा कबीर हिराय।
बूंद समानी समुंद में, सो कित हेरी जाय॥

हेरत हेरत हे सखी, रहा कबीर हिराय।
समुंद समाना बूंद में, सो कित हेरा जाय॥

कबीर वैद बुलाइया, जो भावै सो लेह।
जिहि जिहि औषध गुरू मिले, सो सो औषध देह॥

परगट कहूं तो मारिया, परदा लखै न कोय।
सहना छिपा पयाल में, को कहि बैरी होय॥

जैसे सती पिय संग जरै, आसा सबकी त्याग।
सुघर कूर सोचै नही, सिख पतिवर्त सुहाग॥

सरवस सीस चढ़ाइये, तन कृत सेवा सार।
भूख प्यास सहे ताङना, गुरू के सुरति निहार॥

गुरू को दोष रती नही, सीष न सोधे आप।
सीष न छाङै मनमता, गुरूहि दोष का पाप॥

जैसी सेवा सिष करै, तस फ़ल प्रापत होय।
जो बोवै सो लोवही, कहैं कबीर बिलोय॥

हिरदे ज्ञान न ऊपजे, मन परतीत न होय।
ताको सदगुरू कहा करै, घनघसि कुल्हरा न होय॥

घनघसिया जोई मिले, घन घसि काढ़े धार।
मूरख ते पंडित किया, करत न लागी वार॥

सिष पूजै गुरू आपना, गुरू पूजे सब साध।
कहै कबीर गुरू सीष का, मत है अगम अगाध॥

गुरू सोज ले सीष का, साधु संत को देत।
कहै कबीरा सौंज से, लागे हरि से हेत॥

सिष किरपन गुरू स्वारथी, मिले योग यह आय।
कीच कीच कै दाग को, कैसे सकै छुङाय॥

देस दिसन्तर मैं फ़िरूं, मानुष बङा सुकाल।
जा देखै सुख ऊपजै, वाका पङा दुकाल॥

सत को ढूंढ़त में फ़िरूं, सतिया मिलै न कोय।
जब सत कूं सतिया मिले, विष तजि अमृत होय॥

स्वामी सेवक होय के, मन ही में मिलि जाय।
चतुराई रीझै नहीं, रहिये मन के मांय॥

धन धन सिष की सुरति कूं, सतगुरू लिये समाय।
अन्तर चितवन करत है, तुरतहि ले पहुंचाय॥

गुरू विचारा क्या करै, बांस न ईंधन होय।
अमृत सींचै बहुत रे, बूंद रही नहि कोय॥

गुरू भया नहि सिष भया, हिरदे कपट न जाव।
आलो पालो दुख सहै, चढ़ि पाथर की नाव॥

चच्छु होय तो देखिये, जुक्ती जानै सोय।
दो अंधे को नाचनो, कहो काहि पर मोय॥

गुरू कीजै जानि कै, पानी पीजै छानि।
बिना विचारै गुरू करै, पङै चौरासी खानि॥

गुरू तो ऐसा चाहिये, सिष सों कछू न लेय।
सिष तो ऐसा चाहिये, गुरू को सब कुछ देय॥

02 मार्च 2018

गुरू पारख को अंग




गुरू पारख को अंग 

गुरू लोभी सिष लालची, दोनों खेले दाव।
दोनों बूङे बापुरे, चढ़ि पाथर की नाव॥

गुरू मिला नहि सिष मिला, लालच खेला दाव।
दोनों बूङे धार में, चढ़ि पाथर की नाव॥

जाका गुरू है आंधरा, चेला खरा निरंध।
अंधे को अंधा मिला, पङा काल के फ़ंद॥

जानीता बूझा नही, बूझि किया नहि गौन।
अंधे को अंधा मिला, पंथ बतावै कौन॥

जानीता जब बूझिया, पैंडा दिया बताय।
चलता चलता तहँ गया, जहाँ निरंजन राय॥

अंधा गुरू अंधा जगत, अंधे हैं सब दीन।
गगन मंडल में बज रही, अनहद बानी बीन॥

सो गुरू निसदिन बन्दिये, जासों पाया नाम।
नाम बिना घट अंध है, ज्यौं दीपक बिन धाम॥

आगे अंधा कूप में, दूजा लिया बुलाय।
दोनों डूबे बापुरे, निकसै कौन उपाय॥

रात अंधेरी रैन में, अंधे अंधा साथ।
वो बहिरा वो गूंगिया, क्यौं करि पूछै बात॥

अगम पंथ को चालताँ, अंधा मिलिया आय।
औघाट घाट सूझै नहीं, कौन पंथ ह्वै जाय॥

जाका गुरू है लालची, दया नही सिष मांहि।
उन दोनों कू भेजिये, ऊजङ कूआ मांहि॥

जिसका गुरू है लालची, पीतल देखि भुलाय।
सिष पीछै लागा फ़िरै, (ज्यों) बछुआ पीछै गाय॥

कलि के गुरूआ लालची, लालच लोभै जाय।
सिष पीछै धाया फ़िरै, (ज्यों) बछुआ पीछै गाय॥ 

जाके हिय साहिब नही, सिष साखों की भूख।
ते जन ऊभा सूखसी, दाहै दाझा रूख॥

सिष साखा चीना भया, गुरू कूं आगम नांहि।
जेता पेटै प्रीति सूं, तेता डूबै मांहि॥

माई मूंड गुरू की, जाते भरम न जाय।
आपन बूङा धार में, चेला दिया बहाय॥

गुरू गुरू में भेद है, गुरू गुरू में भाव।
सोई गुरू नित बंदिये, सब्द बतावै दाव॥

पूरे सदगुरू के बिना, पूरा सीष न होय।
गुरू लोभी सिष लालची, दूनी दाझन सोय॥

पूरा सतगुरू ना मिला, सुनी अधूरी सीख।
निकसा था हरि मिलन को, बीचहि खाया वीख॥
वीख - विष

पूरा सदगुरू ना मिला, सुनी अधूरी सीख।
मूंड मुंडावे मुक्ति कूं, चालि न सकई वीक॥
वीक - विस्वा

कबीर गुरू हैं घाट के, हाटूं बैठा चेल।
मूंड मुंडाया सांझ कूं, गुरू सबेरे खेल॥

पूरा सहजे गुन करै, गुन नहि आवै छेह।
सायर पोपै सर भरै, दान न मांगे मेह॥

गुरू किया है देह का, सदगुरू चीन्हा नांहि।
भौसागर की जाल में, फ़िर फ़िर गोता खांहि॥

जा गुरू ते भ्रम ना मिटैं, भ्रांति न जिव की जाय।
सो गुरू झूठा जानिये, त्यागत देर न लाय॥

झूठे गुरू के पक्ष को, तजत न कीजै बार।
द्वार न पावै सब्द का, भटके बारं बार॥

सांचे गुरू के पक्ष में, मन को दे ठहराय।
चंचल ते निश्चल भया, नहि आवै नहि जाय॥

कनफ़ूका गुरू हद्द का, बेहद का गुरू और।
बेहद का गुरू जब मिलै, लहै ठिकाना ठौर॥

जा गुरू को तो गम नही, पाहन दिया बताय।
सिष सोधै बिन सेइया, पार न पहुँचा जाय॥

सदगुरू ने तो गम कही, भेद दिया अरथाय।
सुरति कमल के अंतरे, निराधार पद पाय॥

सतगुरू का सारा नही, सब्द न लागा अंग।
कोरा रहिगा सीदरा, सदा तेल के संग॥

सदगुरू मिले तो क्या भया, जो मन परिगा भोल।
कपास बिनाया कापङा, करै बिचारी चोल॥

सदगुरू ऐसा कीजिये, ज्यौं भृंगी मत होय।
पल पल दाव बतावही, हंस न जाय बिगोय॥

सतगुरू ऐसा कीजिये, लोभ मोह भ्रम नांहि।
दरिया सों न्यारा रहै, दीसै दरिया मांहि॥

सतगुरू ऐसा कीजिये, जाका पूरन मन।
अनतोले ही देत है, नाम सरीखा धन॥

गुरू तो ऐसा कीजिये, वस्तू लायक होय।
यहाँ दिखावै शब्द में, वहाँ पहुँचावै लोय॥

गुरू तो ऐसा कीजिये, तत्व दिखावै सार।
पार उतारे पलक में, दरषन दे दातार॥

गुरू की सूनी आतमा, चेल चहै निज नाम।
कहै कबीर कैसे बसै, धनी बिहूना गाम॥

काचे गुरू के मिलन से, अगली भी बिगङी।
चाले थे हरि मिलन को, दूनी विपति पङी॥

कबीर बेङा सार का, ऊपर लादा सार।
पापी का पापी गुरू, यौं बूङा संसार॥

ऐसा गुरू न कीजिये, जैसी लटलटी राव।
माखी जामें फ़ँसि रहै, वा गुरू कैसें खाव।

गुरू नाम है गम्य का, सीष सीख ले सोय।
बिनु पद बिनु मरजाद नर, गुरू सीष नहि कोय॥

गु अंधियारी जानिये, रू कहिये परकास।
मिटे अज्ञान तम ज्ञान ते, गुरू नाम है तास॥

भेरैं चढ़िया झांझरै, भौसागर के मांहि।
जो छांङै तो बाचि है, नातर बूङै मांहि॥

जाका गुरू है गीरही, गिरही चेला होय।
कीच कीच के धोवते, दाग न छूटे कोय॥

गुरुवा तो सस्ता भया, पैसा केर पचास।
राम नाम धन बेचि के, करै सीष की आस॥

गुरुवा तो घर घर फ़िरे, दीक्षा हमरी लेह।
कै बूङौ कै ऊबरौ, टका पर्दनी देहु॥

घर में घर दिखलाय दे, सो गुरू चतुर सुजान।
पांच सब्द धुनकार धुन, बाजै सब्द निसान॥

छिपा रँगे सुरंग रँग, नीरस रस करि लेय।
ऐसा गुरू पै जो मिलै, सीष मोक्ष पुनि देय॥

मैं उपकारी ठेठ का, सदगुरू दिया सुहाग।
दिल दरपन दिखलाय के, दूर किया सब दाग॥

ऐसा कोई ना मिला, जासों रहिये लाग।
सब जग जलता देखिया, अपनी अपनी आग॥

ऐसे तो सदगुरू मिले, जिनसों रहिये लाग।
सबही जग सीतल भया, मिटी आपनी आग॥

यह तन विष की बेलरी, गुरू अमृत की खान।
सीस दिये जो गुरू मिले, तो भी सस्ता जान॥

गुरू बतावै साध को, साध कहै गुरू पूज।
अरस परस के खेल में, भई अगम की सूझ॥

नादी बिंदी बहु मिले, करत कलेजे छेद।
तख्त तले का ना मिला, जासों पूछूं भेद॥

तख्त तले की सो कहै, तख्त तले का होय।
मांझ महल की को कहै, पङदा गाढ़ा सोय॥

मांझ महल की गुरू कहै, देखा जिन घर बार।
कुंजी दीन्ही हाथ कर, पङदा दिया उघार॥

वस्तु कहीं ढ़ूंढ़ै कहीं, किहि विधि आवै हाथ।
कहैं कबीर तब पाइये, भेदी लीजै साथ॥

भेदी लीया साथ करि, दीन्हा वस्तु लखाय।
कोटि जनम का पंथ था, पल में पहुँचा जाय॥

घट का परदा खोलि करि, सनमुख ले दीदार।
बाल सनेही सांइया, आदि अंत का यार॥

गुरू मिला तब जानिये, मिटे मोह तन ताप।
हरष सोक व्यापै नही, तब गुरू आपै आप॥

सिष साखा बहुते किया, सतगुरू किया न मीत।
चाले थे सतलोक को, बीचहि अटका चीत।

बंधे को बंधा मिला, छूटै कौन उपाय।
कर सेवा निरबंध की, पल में लेत छुङाय॥

गुरू बेचारा क्या करै, हिरदा भया कठोर।
नौ नेजा पानी चढ़ा, पथर न भीजी कोर॥

गुरू बेचारा क्या करै, सब्द न लागा अंग।
कहै कबीर मैली गजी, कैसे लागै रंग॥

गुरू है पूरा सिष है सूरा, बाग मोरि रन पैठ।
सत सुकृत को चीन्हि के, एक तख्त चढ़ि बैठ॥

कहता हूँ कहि जात हूं, देता हूं हेला।
गुरू की करनी गुरू जानै, चेला की चेला॥

01 मार्च 2018

सतगुरू को अंग



सतगुरू को अंग

कबीर रामानन्द को, सतगुरू भये सहाय।
जग में युक्ति अनूप है, सो सब दई बताय॥

सतगुरू के परताप तें, मिटि गयो सब दुंद।
कहै कबीर दुबिधा मिटी, मिलियो रामानन्द॥

सतगुरू सम को है सगा, साधु सम को दात।
हरि समान को है हितु, हरिजन सम को जात॥

सतगुरू सम कोई नही, सात दीप नव खंड।
तीन लोक न पाइये, और इक्कीस ब्रह्मंड॥

सतगुरू की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघारिया, अनंत दिखावनहार॥

दिल ही में दीदार है, वादि झखै संसार।
सदगुरू शब्दहि मसकला, मुझे दिखावनहार॥

सतगुरू सांचा सूरमा, नख सिख मारा पूर।
बाहिर घाव न दीसई, अन्तर चकनाचूर॥

सतगुरू सांचा सूरमा, शब्द जु बाह्या एक।
लागत ही भय मिट गया, पङा कलेजे छेक॥

सदगुरू मेरा सूरमा, बेधा सकल शरीर।
शब्द बान से मरि रहा, जीये दास कबीर॥

सदगुरू मेरा सूरमा, तकि तकि मारै तीर।
लागे पन भागे नही, ऐसा दास कबीर॥

सतगुरू मारा बान भरि, निरखि निरखि निज ठौर।
नाम अकेला रहि गया, चित्त न आवै और॥

सतगुरू मारा बान भरि, धरि करि धीरी मूठ।
अंग उघाङे लागिया, गया दुवाँ सों फ़ूट॥

सतगुरू मारा बान भरि, टूटि गयी सब जेब।
कहुँ आपा कहुँ आपदा, तसबी कहूँ कितेब॥

सतगुरू मारा बान भरि, डोला नाहिं शरीर।
कहु चुम्बक क्या करि सके, सुख लागै वहि तीर॥

सतगुरू मारा बान भरि, रहा कलेजे भाल।
राठी काढ़ी तल रहै, आज मरै की काल॥

गोसा ज्ञान कमान का, खैंचा किनहू न जाय।
सतगुरू मारा बान भरि, रोमहि रहा समाय॥

सतगुरू मारा तान करि, शब्द सुरंगी बान।
मेरा मारा फ़िर जिये, हाथ न गहौ कमान॥

सदगुरू मारी प्रेम की, रही कटारी टूट।
वैसी अनी न सालई, जैसी सालै मूठ॥

सदगुरू शब्द कमान करि, बाहन लागे तीर।
एकहि बाहा प्रेम सों, भीतर बिधा शरीर॥

सतगुरू सत का शब्द है, सत्त दिया बतलाय।
जो सत को पकङे रहै, सत्तहि माहिं समाय॥

सदगुरू शब्द सब घट बसै, कोई कोई पावै भेद।
समुद्र बूंद एकै भया, काहे करहु निखे(षे)द॥

सदगुरू दाता जीव के, जीव ब्रह्म करि लेह।
सरवन शब्द सुनाय के, और रंग करि देह॥

सतगुरू से सूधा भया, शब्द जु लागा अंग।
उठी लहरि समुंद की, भीजि गया सब अंग॥

शब्दै मारा खैंचि करि, तब हम पाया ज्ञान।
लगी चोट जो शब्द की, रही कलेजे छान॥

सतगुरू बङे सराफ़ है, परखे खरा रु खोट।
भौसागर ते काढ़ि के, राखै अपनी ओट॥

सदगुरू बङे जहाज हैं, जो कोई बैठे आय।
पार उतारै और को, अपनो पारस लाय॥

सदगुरू बङे सुनार हैं, परखे वस्तु भंडार।
सुरतिहि निरति मिलाय के, मेटि डारे खुटकार॥

सतगुरू के सदके किया, दिल अपने को सांच।
कलियुग हमसों लङि पङा, मुहकम मेरा बांच॥

सतगुरू मिलि निर्भय भया, रही न दूजी आस।
जाय समाना शब्द में, सत्त नाम विश्वास॥

सदगुरू मोहि निवाजिया, दीन्हा अंमर बोल।
सीतल छाया सुगम फ़ल, हंसा करैं किलोल॥ 

सदगुरू पारस के सिला, देखो सोचि विचार।
आइ परोसिन ले चली, दीयो दिया सम्हार॥

सदगुरू सरन न आवही, फ़िरि फ़िरि होय अकाज।
जीव खोय सब जायेंगे, काल तिहूपुर राज॥

सतगुरू तो सतभाव है, जो अस भेद बताय।
धन्य सीष धन्य भाग तिहि, जो ऐसी सुधि पाय॥

सदगुरू हमसों रीझि कै, कह्यो एक परसंग।
बरषै बादल प्रेम को, भीजि गया सब अंग॥

हरी भई सब आतमा, सब्द उठै गहराय।
डोरी लागी सब्द की, ले निज घर कूं जाय॥

हरी भई सब आतमा, सतगुरू सेव्या मूल।
चहुंदिस फ़ूटी वासना, भया कली सों फ़ूल॥

सदगुरू के भुज दोय हैं, गोविंद के भुज चार।
गोविंद से कछु ना सरै, गुरू उतारै पार॥

सदगुरू की दाया भई, उपजा सहज सुभाव।
ब्रह्म अगनि परजालिया, अब कछु कहा न जाय॥

सदगुरू हमसों भल कही, ऐसी करै न कोय।
तीन लोक जम फ़ंद में, पला न पकङे कोय॥

सदगुरू मिले जु सब मिले, ना तो मिला न कोय।
मातु पिता सुत बंधुवा, ये तो घर घर होय॥

सदगुरू मिला जु जानिये, ज्ञान उजाला होय।
भ्रम का भांडा तोङि करि, रहै निराला होय॥

सतगुरू आतम दृष्टि है, इन्द्री टिकै न कोय।
सदगुरू बिन सूझै नहीं, खरा दुहेला होय॥

सदगुरू किरपा फ़ेरिया, मन का औरहि रूप।
कबीर पांचौं पलटिया, मेले किया अनूप॥

सदगुरू की मानै नही, अपनी कहै बनाय।
कहै कबीर क्या कीजिये, और मता मन मांय॥

सदगुरू अम्रित बोइया, सिष खारा ह्वै आय।
नाम रसायन छांङि कर, आक धतूरा खाय॥

सदगुरू महल बनाईया, प्रेम गिलावा दीन्ह।
साहिब दरसन कारनै, सब्द झरोखा कीन्ह॥

सदगुरू तो ऐसा मिला, ताते लोह लुहार।
कसनी दे कंचन किया, ताय लिया ततसार॥

सदगुरू के उपदेस का, सुनिया एक विचार।
जो सदगुरू मिलता नही, जाता जम के द्वार॥

जमद्वारे में दूत सब, करते ऐंचातान।
उनते कबहू न छूटता, फ़िरता चारौं खान॥

चारि खानि में भरमता, कबहू न लगता पार।
सो फ़ेरा सब मिटि गया, सतगुरू के उपकार॥

पाछे लागा जाय था, लोक वेद के साथ।
पैंडे में सदगुरू मिले, दीपक दीन्हा हाथ॥

दीपक दीन्हा तेल भरि, बाती दई अघट्ट।
पूरा किया बिसाहना, बहुरि न आवै हट्ट॥

पूरा सदगुरू सेवता, अंतर प्रगटे आप।
मनसा वाचा कर्मना, मिटे जनम के ताप॥

पूरा सदगुरू सेव तूं, धोखा सब दे डार।
साहिब भक्ति कहँ पाईये, अब मानुष औतार॥

पूरा सतगुरू सेवता, सरन पायो नाम।
मनसा वाचा कर्मना, सेवक सारा काम॥

मनहि दिया जिन सब दिया, मन के संग शरीर।
अब देवे को क्या रहा, यौं कथि कहैं कबीर॥


तन मन दिया जु क्या हुआ, निज मन दिया न जाय।
कहैं कबीर ता दास सौं, कैसे मन पतियाय॥

तन मन दिया जु आपना, निज मन ताके संग।
कहैं कबीर सदके किया, सुनि सदगुरू परसंग॥


पारस लोहा परस तें, पलटि गया सब अंग।
संशय सबही मिटि गया, सतगुरू के परसंग॥

सब जग भरमा यौं फ़िरै, ज्यौं रामा का रोज।
सदगुरू सों सुधि जब भई, पाया हरि का खोज॥

थापन पाई थिर भया, सतगुरू दीन्ही धीर।
कबीर हीरा बनिजिया, मान सरोवर तीर॥

कबीर हीरा बनिजिया, हिरदै प्रगटी खान।
पारब्रह्म किरपा करी, सदगुरू मिले सुजान॥

निश्चय निधी मिलाय तत, सदगुरू साहस धीर।
निपजी में साझी घना, बाँटनहार कबीर॥

थिति पाई मन थिर भया, सदगुरू करी सहाय।
अनन्य कथा जिव संचरी, हिरदै रही समाय॥

कर कामन सर साधि के, खैंचि जु मारा मांहि।
भीतर बींधे सो मरै, जिय पै जीवै नांहि॥

चेतन चौकी बैठि के, सदगुरू दीन्ही धीर।
निर्भय होय निःसंक भजु, केवल कहैं कबीर॥

जब ही मारा खैंचि के, तब मैं मुआ जानि।
लागी चोट जु सब्द की, गयी कलेजे छानि॥

हँसै न बोलै उनमुनी, चंचल मेल्या मार।
कह कबीर अंतर बिंध्या, सतगुरू का हथियार॥

गूंगा हुआ बाबरा, बहरा हुआ कान।
पांवन ते पंगुला भया, सदगुरू मारा बान॥

ज्ञान कमान रु लौ गुना, तन तरकस मन तीर।
भलक बहै ततसार का, मारा हदफ़ कबीर॥

जो दीसै सो बिनसिहै, नाम धरा सो जाय।
कबीर सोई तत गह्यौ, सतगुरू दीन्ह बताय॥

कुदरत पाई खबर सों, सदगुरू दिया बताय।
भंवर बिलंवा कमल रस, अब उङि अन्त न जाय॥

सत्त नाम छाङौं नहीं, सदगुरू सीख दई।
अविनासी सों परसि के, आतम अमर भई॥

चित चोखा मन निरमला, बुधि उत्तम मति धीर।
सो धोखा नहि विरहही, सदगुरू मिले कबीर॥

बिन सतगुरू बाचै नही, फ़िर बूङे भव मांहि।
भौसागर की त्रास में, सदगुरू पकङे बांहि॥

जीव अधम अति कुटिल है, काहू नही पतियाय।
ताका औगुन मेटि कर, सदगुरू होत सहाय॥

जेहि खोजत ब्रह्मा थके, सुर नर मुनि अरु देव।
कहै कबीर सुन साधवा, करू सदगुरू की सेव॥

काल के माथे पाँव दे, सतगुरू के उपदेस।
साहिब अंक पसारिया, ले चल अपने देस॥

जाय मिल्यौ परिवार में, सुख सागर के तीर।
बरन पलटि हंसा किया, सतगुरू सत्त कबीर॥

जग मुआ विषघर धरै, कहै कबीर पुकार।
जो सतगुरू को पाइया, सो जन उतरै पार॥

अन्धा ऊवट जात है, दोनों लोचन नांहि।
उपकारी सतगुरू मिले, डारै बस्ती मांहि॥

दौङ आय सो दौङसी, पहुँचेगा उन देस।
जाय मिले वा पुरुष कूं, सदगुरू के उपदेस॥

जग में युक्ति अनूप है, साध संग गुरू ज्ञान।
तामें निपट अनूप है, सतगुरू लागा कान॥

सीष हरिन गुरू पारधी, सत्तनाम के बान।
लागा तबही भय मिटा, तबही निकसे प्रान॥

सब जग तो भरमत फ़िरै, ज्यौं जंगल का रोज।
सतगुरू सों सूधि भई, जब देखा कछु मौज॥

तीन लोक है देह में, रोम रोम में धाम।
सतगुरू बिन नहि पाइये, सत्त सार निज नाम॥

सकल जगत जनै नही, सो गुरू प्रगटे आय।
जिन आँखों देखा नहीं, सो गुरू दीन्ह लखाय॥

चलते चलते युग गया, को न बतावै धाम।
पैडे में सतगुरू मिले, पाव कोस पर गाम॥

खेल मचा खेलाङि सों, आनन्द जीतै जाय।
सदगुरू के संग खेलता, जीव ब्रह्म ह्वै जाय॥

सीप जु तब लग उतरती, जब लग खाली पेट।
उलटि सीप पैडे गई, भई स्वाति सों भेंट॥

सीप समुंदर में बसै, रटत पियास पियास।
सकल समुंद तिनखा गिनै, स्वांति बूंद की आस॥

कबीर समझा कहत है, पानी थाह बताय।
तांकूं सदगुरू कह करै, औघट डूबै जाय॥

डूबा औघट ना तरै, मोहि अंदेसा होय।
लोभ नदी की धार में, कहा पङौ नर सोय॥

सचु पाया सुख ऊपजा, दिल दरिया भरपूर।
सकल पाप सहजे गया, सदगुरू मिले हजूर॥

बिन सदगुरू उपदेस, सुर नर मुनि नहि निस्तरे।
ब्रह्मा विष्नु महेस, और सकल जीव को गिनै॥

केते पढ़ि गुनि पचि मुआ, योग यज्ञ तप लाय।
बिन सदगुरू पावै नही, कोटिन करै उपाय॥

करहु छोङ कुल लाज, जो सदगुरू उपदेस है।
होय तब जिव काज, निश्चय करि परतीत करु॥

अक्षर आदि जगत में, जाका सब विस्तार।
सदगुरू दाया पाईये, सत्तनाम निज सार॥

सदगुरू खोजो संत, जीव काज जो चाहहु।
मेटो भव को अंक, आवागवन निवारहु॥

सत्तनाम निज सोय, जो सदगुरू दाया करै।
और झूठ सब होय, काहे को भरमत फ़िरै॥

जो सत्तनाम समाय, सतगुरू की परतीति कर।
जम के मल मिटाय, हँस जाय सतलोक कहँ॥

ततदरसी जो होय, सो ततसार विचारई।
पावै तत्त बिलोय, सदगुरू के चेला सई॥

जग भौसागर माहिं, कहु कैसे बूङत तरै।
गहु सदगुरू की बांहि, जो जल थल रक्षा करै॥

निजमत सदगुरू पास, जाहि पाय सब सुधि मिले।
जग ते रहै उदास, ताकहँ क्यौं नहि खोजिये॥

यह सदगुरू उपदेस है, जो मानै परतीत।
करम भरम सब त्यागि के, चलै सो भवजल जीत॥

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