05 मार्च 2018

साधु को अंग 4



साधु को अंग 4

सोई साधु पति बरत जु, सदा जरै पिय आग।
लाभ हानि बिसराय के, रहु गुरू चरनन लाग॥

दया गरीबी बंदगी, समता सील सुभाव।
येते लच्छन साधु के, कहै कबीर सदभाव॥

मान नहि अपमान नहीं, ऐसे सीतल संत।
भवसागर ऊतर पङे, तोरै जम के दंत॥

आसा तजि माया तजै, मोह तजै अरु मान।
हरख सोक निन्दा तजै, कहै कबिर संत जान॥

साधु सोई सराहिये, कनक कामिनी त्याग।
और कछू इच्छा नहीं, निसदिन रह अनुराग॥

साधू ऐसा चाहिये, जैसा फ़ोफ़ल भग।
आप करावै टूकङा, पर राखै रंग॥

तनहि ताप जिनको नही, माया मोह संताप।
हरख सोक आसा नहीं, सो हरिजन हरि आप॥

संतन के मन भय रहे, भय धरि करै विचार।
निसदिन नाम जपउ करै, बिसरत नहीं लगार॥

आसन तो इकान्त करै, कामिनी संगत दूर।
सीतल संत सिरोमनी, उनका ऐसा नूर॥

साधु साधु मुख से कहै, पाप भसम ह्वै जाय।
आप कबीर गुरू कहत हैं, साधू सदा सहाय॥

हौं साधुन के संग रहूं, अंत न कितहूं जाऊं।
जु मोहि अरपै प्रीति सों, साधुन मुख ह्वै खाऊं॥

यह कलियुग आयो अवै, साधु न मानै कोय।
कामी क्रोधी मसखरा, तिनकी पूजा होय॥

संत संत सब कोइ कहै, संत समुंदर पार।
अनल पंख कोइ एक है, पंखी कोटि हजार॥

कबीर सेवा दोउ भली, एक संत इक राम।
राम है दाता मुक्ति का, संत जपावै नाम॥

साधू खारा यौं तजै, सीप समुंदर मांहि।
वासो तो वामें रहै, मन चित वासों नाहिं॥

साधु मिले साहिब मिले, ये सुख कहो न जाय।
अंतरगत अंगीठडी, ततचिन टाढी थाय॥

साहिब संग राचै भंवर, कबहू न छूटै रंग।
जैसे जैसे कीजिये, उन संतन को संग॥

साधू के घर जाय के, किरतन दीजै कान।
ज्यौं उद्यम त्यौं लाभ है, ज्यौं आलस त्यौं हानि॥

साधू के घर जाय के, सुधि न लीजै कोय।
पीछै करी न देखिये, आगे ह्वै सो होय॥

साधु विहंगम सुरसरी, चेल विहंगम चाल।
जो जो गलियां नीकसे, सो सो करै निहाल॥

साधू सोई सराहिये, पाँचौ राखै चूर।
जिनके पांचौ बस नही, तिनते साहिब दूर॥

निहकामी निरमल दसा, पकङे चारौं खूंट।
कहै कबीर वा दास का, आस करै बैकुंठ॥

रति एक धुँवा संत का, भूत ऊधरे चार।
जले जलाये फ़िर जले, कहैं कबीर विचार॥

साधू सरवन सांभरी, छोङ चले ग्रह काम।
डग डग पै असमेध जग, यौं कहि श्री भगवान॥

साधु दरस को जाइये, जेता धरिये पांय।
डग डग पै असमेध जग, कहैं कबीर समुझाय॥

साधू दरसन महाफ़ल, कोटि जज्ञ फ़ल लेह।
इक मंदिर की का पङी, सहर पवित्र करि लेह॥

साधु मिले सूख ऊपजे, साधु गये दुख होय।
ताते देही दूबली, नैनन दीन्हा रोय॥

जाकी धोति अधर तपै, ऐसे मिले असंख।
सब रिषियन के देखतां, सुपच बजाया घंट॥

साहिब का बाना सही, संतन पहिरा जानि।
पांडव जग पूरन भयो, सुपच बिराजे आन।

कुलवंता कोटिक मिले, पंडित कोटि पचीस।
सुपचि भक्त की पनहि में, तुलै न काहू सीस॥

हरि सेती हरिजन बङे, जानै संत सुजान।
सेतु बांधि रघुवर चले, कूदि गये हनुमान॥

ज्ञान ध्यान मन धनुष गहि, खैंचनहार अलेख।
केते दुरजन मारिया, आप कढ़ै या भेख॥

साधू ऐसा चाहिये, जहाँ रहै तहाँ गैब।
बानी के विस्तार में, ताकूं कोटिक ऐब॥

सन्तमता गजराज का, चाले बंधन छोङ।
जग कुत्ता पीछै फ़िरै, सुनै न वाका सोर॥

आज काल दिन पांच में, बरस पंच जुग पंच।
जब तब साधु तारसी, और सकल परपंच॥

सतगुरू केरा भावता, दूरहि ते दीसंत।
तन छीन मन उनमुनी, झूठा रूठ फ़िरंत॥

ज्यौं जल में मच्छी रहैं, साहिब साधू मांहि।
सब जग में साधू रहै, असमझ चीन्है नांहि॥

समझे घट कूं यूं बनै, ये तो बात अगाध।
सबही सों निरवैरता, पूजन कीजै साध॥

मिलता सेती मिलि रहै, बिछुरे सें वैराग।
साहिब सेती यौं रहै, विमन के गल ताग॥

हाजी कूं दुख बहुत हैं, नाजी कू दुख नांहि।
कबीर हाजी ह्वै रहो, अपने ही दिल मांहि॥

सन्त कहि सो साधु कहि, वेद कही मति जानि।
कहैं कबीर एकै रही, ताते होत पिछान॥

साधू ऐसा चाहिये, जाका पूरन मन।
विपति पङै छाङै नही, चढ़ै चौगुना रंग।।

कबीर साधू दुरमति, ज्यौं पानी में लात।
पल एकै विरजत रहै, पीछै इक ह्वै जात॥

साधू ऐसा चाहिये, जामें लछन बतीस।
विरचाया बिरचै नहीं, पांव चढ़े दे सीस॥

साधु मिले सचु पाइया, साकट मिलि ह्वै हानि।
बलिहारी वा दास की, पिवै प्रेमरस छानि॥

केता जिभ्या रस भखै, रती न लागै टक।
ज्ञानी माया मुक्ति ये, यौं साधू निकलंक॥

काग साधू दरसन कियो, कागा ते भये हंस।
कबीर साधू दरस ते, पाये उत्तम बंस॥

हंस साधु दरसन कियो, हंसा ते भय कौर।
कबीर साधू दरस ते पाये उत्तम ठौर॥

कौर साधु दरसन कियो, पायो उत्तम मोष।
कबीर साधू दरस ते, मिटि गये तीनों दोष॥

कागा ते हंसा भयो, हंसा ते भयो कौर।
कबीर साधू दरस ते, भयो और को और॥

हेत बिना आवै नही, हेत तहाँ चलि जाय।
कबीर जल औ संतजन, नवै तहाँ ठहराय॥

संत होत है हेत के, हेत तहाँ चलि जाय।
कहै कबीर वे हेत बिन, गरज कहाँ पतियाय॥

दृष्टि मुष्टि आवै नही, रूप बरन पुनि नांहि।
जो मन में परतीत ह्वै, देखा संतन मांहि॥

सदा मीन जल में रहै, कब अचवै है पानि।
ऐसी महिमा साधु की, पङै न काहू जानि॥

सूर चढ़ै संग्राम कूं, बांधे तरकस चार।
साधू जन माने नही, बांधे बहु हंकार॥

संत सेवा गुरू बंदगी, गुरू सुमिरन वैराग।
येता तबही पाइये, पूरन मस्तक भाग॥
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