17 जून 2017

ब्रह्मरूपी स्थिति ही भक्ति

ज्ञान और भक्ति
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम ॥ (गीता 18-54)
टीका - सन्त श्री ज्ञानेश्वर जी
ब्रह्म होने की योग्यता के द्वारा वह पुरुष आत्मज्ञान-प्रसन्नता के पद पर जा बैठता है ।
(जिस अग्नि पर रसोई तैयार की जाती है वह जब शान्त हो जाती है तब रसोई का आनन्द लिया जाता है अथवा शरत-काल में ज्वार-भाटा छोङ जैसे गंगा शान्त हो जाती है, अथवा गीत समाप्त होते ही उसके उपांग तबला, तम्बूरा इत्यादि भी जैसे बन्द हो जाते हैं, वैसे ही आत्मज्ञान के लिये उद्यम करने के जो श्रम होते हैं, वे भी जहाँ शान्त हो जाते हैं)
उस दशा का नाम आत्मज्ञान-प्रसन्नता है ।
(वह योग्य पुरुष उस दशा का उपभोग करता है)
उस समय ‘यह वस्तु मेरी है’ ऐसा समझकर सोच करना अथवा किसी वस्तु की प्राप्ति की इच्छा करना आदि बातों का अन्त हो जाता है ।
उसमें केवल ‘ऐक्यभाव’ भरा हुआ रहता है ।
सूर्य का उदय होते ही सम्पूर्ण नक्षत्र जैसे अपनी दीप्ति खो देते हैं, वैसे ही आत्मानुभव प्राप्त होते ही वह पुरुष अनेक भूत व्यक्तियों की रचना ताङते तोङते सब आकाशरूप ही देखता है । जैसे पाटी पर लिखे हुये अक्षर हाथ से पोंछ लिये जायें, वैसे ही उसकी दृष्टि से सब भेदान्तरों का लोप हो जाता है । जागृति और स्वप्न ये दो अवस्थायें जो विपरीत ज्ञान का ग्रहण करती हैं उन्हें वह सुषप्तिरूपी अज्ञान में लीन कर देता है । फ़िर ज्यों ज्यों ज्ञान बढ़ता है त्यों त्यों वह अव्यक्त भी घटता जाता है और पूर्ण ज्ञान होते ही सम्पूर्ण विलीन हो जाता है ।
जैसे भोजन करते समय भूख धीरे धीरे बुझती जाती है और तृप्ति के समय सम्पूर्ण शान्त हो जाती है, अथवा चलते चलते जैसे रास्ता कटता जाता है और इष्ट स्थान को पहुँचते ही समाप्त हो जाता है, अथवा ज्यों ज्यों जागृति आती जाती है त्यों त्यों नींद छूटती जाती है और पूर्ण जागृत होने पर उसका पता नहीं रहता, अथवा वृद्धि समाप्त होने पर जब चन्द्र पूर्णता प्राप्त कर लेता है तो शुक्ल पक्ष की भी निःशेष समाप्त हो जाता है, वैसे ही वह पुरुष जब ज्ञेय विषयों को लीन कर लेता है तो ज्ञान का नाश हो जाता है, तब कल्पान्त के समय जैसे नदी या समुद्र की सीमा टूट जाने से ब्रह्मलोक तक जल ही जल भर जाता है, अथवा घट या मठ का नाश होने पर जैसे एक आकाश ही सर्वत्र रहता है, अथवा लकङी जलाकर जैसे अग्नि ही रह जाती है, अथवा जैसे अलंकारों को सांचे में डालकर गलाने से उनके नाम और रूपों का नाश हो सोना ही रह जाता है, यह भी रहने दो, फ़िर जागने पर जैसे स्वपन का नाश हो जाता है और मनुष्य केवल एक मेरे अतिरिक्त स्वयं अपने समेत और कुछ भी नही रहता ।
इस प्रकार वह मेरी चौथी भक्ति प्राप्त करता है ।
दूसरे आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी जिन रीतियों से मेरी भक्ति करते हैं उनकी अपेक्षा से हम इसे चौथी भक्ति कहते हैं ।
अन्यथा यह न तीसरी है, न पहली है, न अन्तिम है ।
वास्तव में मेरी ब्रह्मरूपी स्थिति का ही नाम भक्ति है ।
जो मेरे अज्ञान को प्रकाशित कर, मुझे अन्य रूप से दिखाकर, सबको सब विषयों की रुचि लगाकर उनका ज्ञान करा देता है, जिस अखंड प्रकाश से जो जहाँ जिस वस्तु को देखना चाहे वह वस्तु उसे वहाँ वैसी ही दिखाई देती है ।
स्वपन का दिखाई देना, न देना, जैसे अपने अस्तित्व पर निर्भर है, वैसे ही प्रकाश से ही विश्व की उत्पत्ति या लय होता है, वह मेरा जो स्वाभाविक प्रकाश है उसी को भक्त कहते हैं ।

अतः आर्तों में यह भक्ति इच्छारूप हो जो वस्तु की अपेक्षा करती हो, वह मैं ही हूँ ।
जिज्ञासु में भी यही भक्ति जिज्ञासा रूप हो मुझे जिज्ञास्य रूप से प्रकट करती है और यही भक्ति अर्थप्राप्ति की इच्छा बन मानो मुझे ही अपनी प्राप्ति के पीछे लगा मुझे अर्थ नाम का पात्र बनाती है, एवं यदि मेरी भक्ति अज्ञान के साथ हो तो वह मुझ सर्वसाक्षी को अदृश्य रूप से बताती है ।
दर्पण में मुख से ही मुख दिखाई देता है, इसमें कुछ सन्देह नहीं ।
परन्तु यह जो मिथ्या द्वितीयत्व है उसका हेतु दर्पण है ।
दृष्टि वास्तव में चन्द्रमा का ही ग्रहण करती है पर एक चन्द्र के जो दो रूप दिखाई देते हैं वह नेत्र रोग के कारण ।
वैसे ही वास्तव में मैं ही सर्वत्र निज को ही देखता हूँ ।
परन्तु जो मिथ्या दृश्य पदार्थ दिखाई देते हैं वह अज्ञान का कारण है ।
वह अज्ञान उस चौथे भक्ति का मिट जाता है, और प्रतिबिम्ब जैसे बिम्ब में मिल जाय, वैसे ही मेरी साक्षिरूपता मुझमें ही समा जाती है ।
सोना जब मिश्रित स्थिति में रहता है तब भी सोना ही रहता है, परन्तु मिश्रण अलगाने पर जैसे वह शुद्ध रूप से शेष रहता है ।
पूर्णमासी के पहले चन्द्रमा क्या सावयव नही रहता, परन्तु जैसे उस दिन उसकी पूर्णता उससे आ मिलती है ।
वैसे ही दिखाई तो मैं ही देता हूँ पर अज्ञान के कारण दृश्य रूप से और भिन्न दिखाई देता हूँ और दृष्टात्व विलीन होने पर मुझे ही अपनी प्राप्ति हो जाती है ।

अतएव, दृष्टिपथ के परे जो मेरा भक्तियोग है उसे मैंने चौथा कहा है । 

13 जून 2017

अनमोल ज्ञान सूत्र

चाह चमारी चूहरी, अति नीचन की नीच ।
मैं तो पूरण ब्रह्म था, जो तू न होती बीच ।
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राजीव बाबा, मेरे एक मित्र का प्रश्न है ।
क्या सशरीर चित्त के पार हुआ जा सकता है ? कृपया समाधान करें ।

उत्तर - प्रश्न उलझाव पैदा करता है ।
ऐसे प्रश्न सम्बन्धित साहित्य के अध्ययन के बाद, अनजाने निर्मित हुयी काल्पनिक धारणाओं से उपजते हैं । दूसरे, यदि प्रश्न अपने सभी बिन्दुओं को लेकर अपने सभी आशय को लेकर स्पष्ट न हो तो निराकरण और भी मुश्किल हो जाता है ।
पर फ़िर भी यहाँ ‘सशरीर’ शब्द मुझे इसी बाह्य, दर्शनीय, स्थूल शरीर के लिये प्रयुक्त लगा ।

- सशरीर चित्त के पार से क्या आशय है ?
कोई भी स्वयं और अन्य सब कुछ भी, स्वयं चित्त में ही (मन के द्वारा मन में ही) स्थित है ।
चित्त के पार क्या है ?
अगर ‘मूल स्थिति’ की बात की जाये तो फ़िर चित्त के पार कुछ है ही नहीं ।
जो है, वह सिर्फ़ आपका होना भर है ।
और बारीकी से कहा जाये तो फ़िर वह जो है - है ।
वहाँ होना जैसा भी कुछ नहीं है ।
होना शुरू होते ही चित्त भी हो जाता है ।
मन बुद्धि चित्त अहम, ये मिल जुल कर इतनी तेजी से क्रियान्वित होते हैं कि तय होना मुश्किल है कि ये किस कृमानुसार सक्रिय हुये । फ़िर भी किसी भी इच्छा के उदय होते ही चित्त बनता है ।
या स्थूल जीव में प्रथम चित्त जाता है ।
क्योंकि किसी भी हलन चलन हेतु भूमि और दूसरे अन्य अंगों की आवश्यकता होगी ।

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पुस्तक - अनमोल ज्ञान सूत्र pdf
लेखक - राजीव कुलश्रेष्ठ
विषय - आत्मज्ञान, सुरति शब्द योग
मूल्य - 150 रु.
प्रष्ठ - 157

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22 मई 2017

अनुराग सागर मुफ़्त डाउनलोड

संसार में जितनी भी पूजा और ज्ञान प्रचलित है, ये ज्यादातर काल-पूजा है, और काल, माया के प्रभाव से, इसी में सन्तमत यानी सत्यपुरुष का भेद, सतलोक या अमरलोक का भेद, असली हंसज्ञान, आत्मा का वास्तविक ज्ञान, घुल-मिल गया है ।
आपने बहुत पुस्तकें पढ़ी होंगी । एक बार इसको पढ़ें ।
ये आपकी आँखे खोल देगी ।

यदि आप इसकी गहरायी समझ गये तो जीवन का लक्ष्य और दुनियाँ में फ़ैला धार्मिक मकङजाल आपको आसानी से समझ में आ जायेगा । आपके दिमाग में भरा जन्म-जन्म का धार्मिक कचरा साफ़ होकर सच्चे प्रभु से लौ लग जायेगी । जो सबका उद्धारकर्ता है ।


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हँसदीक्षा, परमहँस दीक्षा, समाधि दीक्षा, शक्ति दीक्षा, सारशब्द दीक्षा, निःअक्षर ज्ञान, विदेही ज्ञान, सहज योग, सुरति-शब्द योग, नाद-बिन्द योग, राजयोग और उर्जात्मक ‘सहज ध्यान’ पद्धति के वास्तविक और प्रयोगात्मक अनुभव सीखने, समझने, होने हेतु सम्पर्क करें ।

               (मुख्य आश्रम)
निःअक्षर ज्ञान दीक्षा केन्द्र ॥मुक्तमंडल॥
  चिन्ताहरण आश्रम, नगला भादों
        जि. फ़िरोजाबाद, उ.प्र.
                  भारत
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मुक्तमंडल आगरा

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अनुराग सागर मुफ़्त डाउनलोड

29 मार्च 2017

ओशो का स्वर्ग

ओशो - कल मैंने मेलाराम असरानी को कहा था कि अब कब तक मेलाराम बने रहोगे, अरे मेला में तो बहुत झमेला है, अब राम ही रह जाओ । 
तो उन्होंने क्या लिखा ? 
उन्होंने लिखा कि भगवान, आप मुझे मेलाराम से शुद्धराम बना देगे । और संन्यास के लिये आपने आमंत्रण भी दिया, मैंने वर्षों पहले दादा लेखराज द्वारा स्थापित ईश्वरी विश्वविद्यालय में ब्रह्मा कुमार के रूप में दीक्षा ली थी, और तबसे मैं ‘सहज राजयोग’ की साधना करता हूँ, और अगर अब आपसे सन्यास ले के ये साधना छोड़ता हूँ, तो ब्रह्मा-कुमारियों के अनुसार आने वाली प्रलय में नष्ट हो जाऊँगा । आने वाले पाँच-दस वर्षों में प्रलय सुनिश्चित है । इसमें जो लोग ईश्वरी विश्वविद्यालय में दीक्षित होकर पवित्र जीवन जियेंगे । उनकी आत्मा का परम-ब्रह्म से संगम होगा, और वे परमधाम बैकुण्ठ में परमपद पायेंगे । 
मुझे आपके विचार बहुत क्रान्तिकारी लगते हैं और आप भी भगवत स्वरूप लगते हैं, लेकिन आपके संन्यासियों का जीवन मुझे पवित्र नहीं लगता, इसलिये आपसे संन्यास लेने में मैं आश्वस्त नहीं हो सकता कि आने वाली प्रलय में बच कर बैकुण्ठ में परमपद पा सकूँ । 
अब मेलाराम असरानी कैसे लोभ में पड़े हैं । कैसा डराया उन्हें, और मजा ये है कि हमारी मूढ़ता का कोई अंत नही है । ये पाँच-दस वर्ष में प्रलय सुनिश्चित है, ये बीस वर्ष तो मुझे सुनते हो गया, ये पाँच-दस वर्ष आगे ही बढ़ते चले जा रहे हैं तुम्हें भी सुनते हो गये होंगे, दादा लेखराज भी खत्म हो गये, पर पाँच-दस वर्ष खत्म नहीं होते ।
मगर सिंधी गुरु, क्या तरकीब लगा गये, दादा लेखराज सिंधियों को फँसा गये, और सिंधी हैं पक्के दुकानदार, उनको डरा गये कि देखो ख्याल रखना प्रलय सुनिश्चित है, पाँच-दस वर्षों में आने वाली है । क्योंकि ज्यादा देर की बात है, तब तक तो समय बहुत है, तब तक और कमाई कर लूँ, पाँच दस वर्ष का मामला है घबरा दिया, और ये कोई नई तरकीब नही है बहुत पुरानी तरकीब है, पुराने से पुराने ग्रन्थ में इस बात का उल्लेख है कि थोङे ही दिन में प्रलय होने वाली है ।
जो ईसा के शिष्य थे, जो उनके प्रथम संवाद वाहक बने, वो लोगों को कहा करते थे कि अब देर नहीं है, 2000 साल पहले यही बात, यही दादा लेखराज की बात कि अब ज्यादा समय देर नही है, प्रलय होने वाली है, क़यामत का दिन आने वाला है, जो जीसस के साथ नहीं होंगे, वो अनन्तकाल तक नर्क में सजेंगे, अभी समय है सावधान ! जीसस के साथ हो लो । 
क्यों ? 
क्योंकि क़यामत के दिन जब प्रलय होगी, तो ईश्वर जीसस को लेकर खङा होगा और कहेगा कि चुन लो, अपनी भेङें चुन लो, जो तुम्हारे मानने वाले हैं उनको बचा लो, बाकी को तो नरक में जाना है । उस वक्त तुम बहुत मुश्किल में पड़ोगे कि जीसस को नहीं माना, और जीसस अपनी भेङों को चुन लेंगे और अपनी भेड़ों को बचा लेंगे, और बाकी गये, गिरे अनन्तकाल के लिये नरक में, जहाँ से फिर कोई छुटकारा नहीं है । अनन्तकाल, ख्याल रखना, ऐसा भी नहीं एक साल, दो साल, तीन साल, पाँच साल, दस साल छूटेंगे, कभी तो छूट जायेंगे ।
नहीं ! अनन्तकाल तक फिर छुटकारा है ही नहीं । 
कैसा घबरा दिया होगा लोगों को, 2000 साल पहले ? 
और दो हजार साल बीत गये, क़यामत अभी तक नहीं आई, और बातें वे ऐसी कर रहे थे कि अब आई कि तब आई, आई ही रखी है, अब ज्यादा देर नही है । 
और ये बहुत पुरानी तरकीब है, सदियों से इसका उपयोग किया जा रहा है, और फिर भी अजीब आदमी है कि इन्हीं बातों को, इन्हीं जालसाजियों को फिर स्वीकार करने को राजी हो जाता है । कैसे कैसे लोग हैं ?
आदिवासियों के एक गाँव में मैं ठहरा था, बस्तर के आदिवासियों को ईसाई बनाया जाता है, काफ़ी ईसाई बना लिये गये हैं । मुझे कुछ ऐतराज़ नहीं, क्योंकि वे हिन्दू थे तो मूढ़ थे, ईसाई हैं तो मूढ़ हैं, मूढ़ता तो कुछ बदली नहीं, मूढ़ता तो कुछ मिटती नहीं है कि मूढ़ भीङ में इस भेङों के साथ रहें कि मूढ़ भीङ में उस भेड़ों के साथ रहें, क्या फर्क पङता है, मूढ़ता तो वही की वही है ।
मगर किस तरकीब से उन ग़रीब आदिवासियों को ईसाई बनाया जा रहा है !
एक पादरी उनको समझा रहा था । उसने राम की और जीसस की एक जैसी प्रतिमा बना रखी थी, और उनको समझा रहा था कि देखो यह बाल्टी भरी रखी है इसमें मैं दोनों को डालता हूँ । तुम देख लो, जो डूब जायेगा, उसके साथ रहे तो तुम भी डूबोगे, और जो तैरेगा, वही तुमको भी तिरायेगा । और बात बिलकुल साफ थी, सारे आदिवासी बिलकुल उत्सुक होकर बैठ गये ।
भाई ! देखने वाली बात है सिद्ध हुआ जा रहा है ।
तो सबके सामने उस पादरी ने दोनों मूर्तियों को छोङ दिया बाल्टी के भरे पानी में, रामजी तो एकदम डुबकी मार गये, जैसे रास्ते ही देख रहे थे, गोता मारा और निकले ही नहीं, और जीसस तैरने लगे ।
जीसस की मूर्ति बनाई थी लकड़ी की, और राम की मूर्ति बनाई थी लोहे की, उसमें रंग-रोगन एक सा कर दिया था । जिससे वे मूर्तियाँ एक जैसा लगने लगी थी ।
एक शिकारी, जो बस्तर शिकार करने जाता था, मेरा परिचित व्यक्ति था, मैं जिस विश्वविद्यालय में प्रोफेसर था, वहीं वो भी प्रोफेसर था, और उसका एक ही शौक़ था शिकार ।
उसने ये हरकत देखी और समझ गया फ़ौरन कि - ये जालसाज़ी है । 
उसने कहा - ठहरो ! इससे कुछ तय नहीं होता, क्योंकि हमारे शास्त्रों में तो अग्नि परीक्षा लिखी है, जल परीक्षा तो लिखी ही नहीं है । 
आदिवासियों ने कहा - ये बात भी सच है, अरे सीता मइया, जब आयीं थी तो कोई जल परीक्षा तो हुई नहीं थी, उनकी तो अग्नि परीक्षा हुई थी ।
पादरी तो घबरा गया कि - ये तो गड़बड़ हो गया, ये दुष्ट कहाँ से आ गया । 
भागने की कोशिश उस पादरी ने की । 
लेकिन आदिवासियों ने कहा - भइया, अब ठहरो, अग्नि परीक्षा और हो जाय, ये बिचारा ठीक ही कह रहा है, क्योंकि हमारे शास्त्रों में अग्नि परीक्षा का उल्लेख है ।
आग जलाई गई, पादरी बैठा है उदास कि अब फँसे, अब भाग भी नहीं सकता । 
जीसस और रामजी अग्नि में उतार दिये गये । 
अग्नि में रामचंद्र जी तो बाहर आ गये, और जीसस खाक हो गये । 
सो आदिवासियों ने कहा - भइया, अच्छा बचा लिया हमें, अगर आज अग्नि परीक्षा न होती तो हम सब तो ईसाई हुऐ जा रहे थे ।
मगर इन आदिवासियों में और मेलाराम तुममें फर्क है, तुम पढ़े लिखे आदमी हो, मगर कुछ भेद है ।
वही बुद्धि, वही जङ बुद्धि, पाँच-दस साल तुम कहते हो, और तुम कह रहे हो कि मैंने वर्षों पहले दादा लेखराज द्वारा स्थापित ईश्वरी विश्वविद्यालय से दीक्षा ली है ।
दादा लेखराज को मरे कितने साल हुये ये बताओ ? 
ये पाँच-दस साल तो तुम ही कह रहे हो कई सालों से । ये पाँच-दस साल कब खत्म होंगे ? 
ये कभी खत्म होने वाले नहीं, मगर डर, और सिंधी हो तुम, और सिंधी को तो यही दो बातें प्रभावित करती हैं, एक तो डर, और डर से भी ज्यादा लोभ ।
अब तुम कह रहे हो कि ब्रह्माकुमारी के अनुसार आने वाली प्रलय में अगर साधना छोङ दूँगा तो नष्ट हो जाऊँगा । आने वाले पाँच-दस वर्षों में प्रलय सुनिश्चित है । 
क्या तुम खाक साधना कर रहे हो, राजयोग की, सहज राजयोग की, सहज राजयोग की साधना करो, और इस तरह की मूढ़तापूर्ण बातों में भरोसा करो, ये दोनों बातें एक साथ चल सकती हैं ?
सहज राजयोगी तो समाधिष्ट हो जाता है । उसकी तो प्रलय हो गई । और जहाँ मन गया, वहाँ बैकुण्ठ है । बैकुण्ठ अभी है ।
कोई सारा संसार मिटेगा, तब तुम मेलाराम असरानी बैकुण्ठ जाओगे, तुम्हारे संसार के लिये सारे संसार को मिटाओगे ? जरा सोचो तो बडा महँगा सौदा करवा रहे हो । मतलब जिनको अभी बैकुण्ठ नहीं जाना है उनको भी ।
अरे बाल-बच्चों से, पत्नी से पूछा कि अगले पाँच-दस वर्षों में बैकुण्ठ चलना है ? 
किसी को बैकुण्ठ नहीं जाना है । अरे मजबूरी में जाना पड़े बात अलग, मगर जाना कौन चाहता है तुम भी नहीं जाना चाहते । इसीलिये ब्रह्माकुमारी तारीख तय नही करती । उनसे तारीख तय करवा लो, एक दफ़ा निपटारा हो जाय, पाँच-दस साल का मामला है, तारीख तय कर लो, किस तारीख, किस माह में, किस साल में ।
और ऐसे मूढ़ लोग हैं कि ये भी तय करवाया गया, और मूढ़ता ऐसी है कि फिर भी नहीं जाती ।

ईसाइयों में एक सम्प्रदाय है - जिहोबा के साक्षी ! 
इन्होंने, कई दफ़ा घोषणा कर चुके हैं तारीख तक की । इन्होंने 1880 में एक जनवरी को प्रलय हो जायेगी 100 साल पहले, अभी एक जनवरी आती है, 100 साल पूरे हो जायेंगे । तो घोषणा की थी कि 1 जनवरी 1880 में प्रलय होने वाली है । 
तो उनके मानने वाले लोगों ने देखा कि महाप्रलय होने वाली है तो लोगों ने मकान बेच दिये, ज़मीनें बेच दी, अरे लोगों ने कहा कि गुलछर्रे कर लो, जो भी करना है कर लो, 1 जनवरी आ ही रही है इसके आगे कुछ तो बचना नहीं है । जिसको जो करना था, कर लिया ।
जिहोबा के मानने वाले पर्वत पर इकठ्ठे हुये, क्योंकि सारा जगत तो डूब जायेगा, इसलिये पर्वत पर, पवित्र पर्वत पर जो रहेंगे, उनको परमात्मा बैकुण्ठ ले जायेगा ।
एक तारीख भी आ गई, सुबह भी हो गया, लोग इधर-उधर देख रहे हैं, प्रलय कहीं दिखाई नहीं पङ रही है, लाखों लोग इकठ्ठे पर्वत पर, आखिर धीरे-धीरे खुस-फुस हुई कि बात क्या है अभी तक ! दोपहर भी हो गई, शाम भी होने लगी, दो तारीख भी आ गई, फिर लोगों में सनमनी हुई कि अब फँसे, सब बर्बाद करके आ गये । फिर लौट आये, फिर उसी दुनियाँ में, फिर कमाई-धमाई शुरु कर दी ।
मगर मजा ये है कि आदमी की मूढ़ता की कोई सीमा नही है ।
वही पंडित-पुजारी, जो उनको पहाङ पर ले गये थे, जिन्होंने उनसे सब दान करवा दिया था..दान क्या, खुदी को करवा लिया था ।
इन्होंने ये भी न सोचा कि एक जनवरी को जब सब नष्ट ही होने वाला है, तो ये दान किसलिये इकठ्ठा कर रहे हैं कि एक जनवरी को सब नष्ट ही हो जायेगा, अब दे ही दो, अब भगवान के नाम पर दान कर दो, जो दान कर देगा, उसे अनन्त गुना मिलेगा ।
तो ये पंडित पुजारी क्या करेंगे दान ले के ? ये तक किसी ने न सोचा ।
और वे पंडित पुजारी फिर से समझाने लगे कि थोड़ी तारीख में हमारी भूल हो गई फिर दस साल बाद से होगा । 
फिर दस साल बाद लोग इकठ्ठे हो गये ! 
आदमी की प्रतिभा ऐसी क्षीण हुई, ऐसी जंग खा गई है ।
अब तुम अगर सहज राजयोग की साधना करते हो, यहाँ कैसे आये ?
अगर सहजयोग से तुम्हें कुछ मिल रहा है, तो यहाँ किसलिये आये हो ?
अपना बैकुण्ठ गंवाना है, क्योंकि वहाँ, अगर पता भी चल गया कि तुम यहाँ आये थे, तो कोई दादा लेखराज वग़ैरह साथ न दे पायेंगे, क्योंकि मैं कहूँगा कि ये मेरी भेड़ है, न रही हो संन्यासी, मगर आधी मेरी है, आधी को बैकुण्ठ जाने दो, आधी को तो मैं नरक ले जाऊँगा ।
मेलाराम असरानी आधे-आधे कटोगे, रामजी को तो मैं ले जाऊँगा, मेला को वही छोङ जाऊँगा, वैसे तुम्हारी मर्ज़ी, रामजी वाले हिस्से को मैं छोड़ने वाला नहीं, वो तो, उस पर क़ब्ज़ा मेरा है ।
इस दरवाज़े के जो भीतर आया एक दफ़ा, उसको पहचान लिया कि भेड़ अपनी है, फिर कोई दादा लेखराज वग़ैरह काम नहीं आने वाले, तुमसे कहे देता हूँ । आधे तो वैसे ही गये, अब पूरे ही फँस जाओ, क्या झंझट ।
और तुम कहते हो, जो ईश्वरी विश्वविद्यालय में दीक्षित होकर पवित्र नहीं होगा, उनकी बङी मुश्किल होगी, और जो पवित्र होंगे, उनकी आत्मा का परमब्रह्म से संगम होगा, और वो परमधाम बैकुण्ठ में परमपद पायेंगे । 
देखते हो, परम-परम चल रहा है, धन्न-धन्न हो रहा है । कैसा लोभ चढ़ा हुआ है छाती पर । जरा परम-ब्रह्म से संगम हो गया, इतने से तृप्ति नही है । परमधाम, उससे भी मन राजी नही मानता; सिंधी मन, बैकुण्ठ ! उससे भी राजी नही, फिर परमपद ।
तो दादा लेखराज कहाँ बैठेंगे ? 
परम-पद पर तुम बैठ जाओगे, तो दादा लेखराज धक्का नही देंगे कि - क्यों रे मेलाराम असरानी, कमबख़्त मैंने दीक्षा दी, और परमपद पर तू बैठ रहा है, ब-मुश्किल तो हम बैठ पाये किसी तरह, परमात्मा को सरकाया, और अब तू आ गया । 
अरे परमपद पर कितने आदमी चढ़ोगे ?
परमपद पर तो एक ही बैठ सकेगा कि कई लोग बैठेंगे, पूरा मेला, पूरा झमेला ।
मगर सिंधी हो, तुम भी क्या करो !
दादा सांई बुद्धरमल को सिनेमाघर के बाहर पेशाब करने के आरोप में पकङ कर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, मजिस्ट्रेट भी था सिंधी, पहुँचा हुआ सिंधी ।
सांई बुद्धरमल पर एक सौ रुपये का जुर्माना किया गया ।
बुद्धरमल बोले - माई-बाप, यह तो अन्याय हो जायेगा, इतनी सी गलती के लिये इतना भारी जुर्माना !
मजिस्ट्रेट बोले - बडी सांई, ऐ कोई ऐरे गैरे का पिशाब नहीं है, सेठ बुद्धरमल का पेशाब था ।
इतना सुनते ही बुद्धरमल ने जल्दी से जुर्माना भर दिया ।
अरे, अब परमपद का मामला आया, सेठ बुद्धरमल का पेशाब । 
तुम भी कैसी कैसी बातों में पड़े हो । जब कोई आदमी किसी स्त्री के साथ बलात्कार करता है, तो साधारण में कहा जाता है कि - उस स्त्री की इज़्ज़त लूटी गई ।
मारवाड़ियों में मामला अलग ही है, यदि स्त्री के साथ कोई बलात्कार कर ले, और उसके पैसे और ज़ेवरात आदि नहीं छीने, तो मारवाड़ी लोग कहते हैं, चलो कोई बात नहीं, बलात्कार किया सो किया, अरे अपना क्या गया, कम से कम इज़्ज़त तो नहीं लूटी, इज़्ज़त बच गई, यही क्या कम है । 
सिंधी लोग और भी पहुँचे हुये लोग हैं । 
एक दिन झामनदास ने आकर बताया कि - कल रात एक अजनबी महिला ने उसकी इज़्ज़त लूट ली । मैंने पूछा - झामनदास क्या कहते हो, कभी ऐसी बात न कानों सुनी, न आँखों देखा कि किसी स्त्री ने तुम्हारी इज़्ज़त लूट ली, क्या कहते हो ?
झामनदास बोले - मैं तो उसके साथ बलात्कार करने में लगा था, और उस दुष्ट ने मेरी पॉकेट मार ली । हद हो गई कलियुग की भी, अब तो मनुष्य जाति पर से तो मेरा बिलकुल भरोसा उठ गया । 
अब ये मेलाराम असरानी परमपद पाने के पीछे पड़े हैं, और इस डर से कि कही परमपद न चूक जाये, सन्यास लेने में घबरा रहे हैं ।
और भी एक डर है कि मुझे आपके विचार बहुत क्रान्तिकारी लगते और आप भी भगवतस्वरूप लगते हैं ।
ये नहीं कि डर के मारे कह रहे है कि कौन झंझट ले, विचार तो क्रान्तिकारी लग रहे, ख़तरनाक मालूम होते हैं, मान लेना ठीक है भगवत-स्वरूप को, पता नहीं आखिर में कौन जीतेगा, दादा लेखराज या ये, आदमी भी उपद्रवी मालूम होता है, कहीं दादा लेखराज को चारों खाने चित्त कर दिया तो फिर..तो फिर होशियार आदमी सभी को सम्भाल कर रखता है कि आप भी भगवत-स्वरूप हैं, यदि मौका आ गया ऐसा, तो कह दूँगा कि याद रखो, मैंने कहा था कि आप भी भगवत-स्वरूप हो, और दादा लेखराज जीते, तो कह दूँगा कि मैंने पहले ही कह दिया था कि इनके विचार क्रान्तिकारी हैं पर अपने को जँचे नहीं ।
लेकिन कहते हैं कि आपके संन्यासियों का जीवन हमें पवित्र नहीं लगता । 
अरे, मेरे सन्यासियों के जीवन से तुम्हें क्या फ़िकर, इनको कोई बैकुण्ठ थोङे ही जाना है, ये तो यही बैकुण्ठ में हैं । 
तुम जब बैकुण्ठ जाओगे, और पाओगे कि दादा लेखराज के आसपास उर्वशी और मेनकायें नाच रही हैं, तो तुम्हें उनका जीवन भी पवित्र नहीं लगेगा कि अरे, ये दादा लेखराज क्या कर रहे हैं ? 
अरे रे सांई ये क्या कर रहे हैं, ये उर्वशी बाई को गोद में बिठाये बैठे हैं, ये कोई कन्या, कोई ब्रह्माकुमारी की भी नही हैं, ये कर क्या रहे हो, दादा हो के ये क्या कर रहे हो ?
मेरे सन्यासी तो बैकुण्ठ में हैं । इनको कहीं जाना नहीं, ये तो परमपद में विराजमान हैं ।
इनको मैं कोई प्रलोभन नहीं दे रहा हूँ । और इनको मैंने साफ कह दिया है कि यदि मेरे साथ रहे, तो नरक की तैयारी रखो ।
करोगे क्या खाक स्वर्ग में जाकर, धूल उड़ रही है वहाँ, मरे मुर्दा साधू संत वहाँ पहुँच गये हैं बहुत पहले से, कोई धूनी कमाये बैठा है, कोई झाड़ पर उल्टा लटका है । जटा-जूट तो देखो उनके, यदि तुम उन्हें खोजने जाओ तो मिले ही ना, अनंतकाल में भी न मिले, कोई भूखा ही मर रहा है । इस सर्कस में कहाँ मेरे संन्यासियों को ले जाना है । इन सबको तो मैंने नरक लेकर चलने का विचार किया है । 
नरक में कुछ करने को है । और इतने लोग तो विचारे नरक ही गये होंगे, उन सबका भी तो उद्धार करना है कि नहीं, शैतान को भी सन्यास देना है कि नही ? तो इनको तो कोई चिन्ता नहीं है । मेरे साथ जो हैं, वो मेरे साथ नरक को भी जाने को तैयार है ।
परमपद वद की तो मैं बात ही नहीं करता । 
क्योंकि मैं उन्हीं को ध्यानी मानता हूँ जो कि नरक में भी हो, तो उसके आसपास स्वर्ग घटित हो । और तुम्हारे तथाकथित साधू और संत ये कहीं स्वर्ग में भी होंगे तो उसे कभी का नरक बना दिया होगा । इनकी शक्लें तो देखो, इनके ढंग ठौर तो देखो, ये जहाँ इकठ्ठे हो जायेगे, वहाँ मातम छा जायेगा ।
स्वर्ग में तो बिलकुल मातमी हालत होगी - कोई महात्मा चरख़ा चला रहा है, अब ये मोरार जी भाई भी बैकुण्ठ में रहेंगे, वे वहाँ ‘जीवन जल’ ही पी रहे हैं । इन सबको इनकी तपश्चर्या का फल तो मिलेगा, ज़िन्दगी भर जीवन जल (स्वमूत्र) पिया, तो किसलिये पिया ? काहे को पिया ? 
अमृत की आशा में पिया, कि परमात्मा अमृत में मिलेगा । मेरे संन्यासियों को स्वर्ग से कुछ लेना देना नहीं । क्योंकि मैं कहता हूँ कि स्वर्ग कोई भूगोल नही है, और स्वर्ग कोई स्थान नहीं है, बल्कि चैतन्य की अवस्था है, तुम चाहो तो अभी और यहीं स्वर्ग में हो सकते हो, तो फिर कल पर क्यों टाल रहे हो ?
मेलाराम असरानी मेरा संन्यास लो, और प्रलय हुई । 
प्रलय का मतलब क्या होता है ? कि तुम खत्म, कि तुम गये, तुम मिटे, तुम समाप्त हुये ।
और उसी मिटने से, उसी राख से, उसी मृत्यु से, उसी शूली से एक नये जीवन का आविर्भाव होता है । एक नया अंकुरण होता है ।
मैं किसी को नैतिकता नहीं सिखा रहा हूँ, मैं सिर्फ आनन्द सिखा रहा हूँ, मेरे लिये आनन्द ही एकमात्र पवित्रता है, और इसलिये तुम्हें अड़चन लगती होगी कि आपके संन्यासियों का जीवन मुझे पवित्र नहीं लगता ।
तुम्हारी पवित्रता की परिभाषा क्या है ? तुम पवित्रता से क्या अर्थ लेते हो ? 
तुमने पवित्रता की कोई धारणा बना ली होगी, अपनी-अपनी धारणायें हैं, और उन्हीं धारणाओं के आधार पर आदमी पवित्रता मानता है । 
तुम व्यर्थ की धारणायें छोङो, और तनिक विवेक से काम लो मेलाराम असरानी, तुम्हारी प्रलय हो ही जायेगी । गलती से ही सही, पर ठीक जगह पर आ गये हो, थोङा हिम्मत करो, थोङा साहस करो ।
(ओशो और ब्रह्माकुमारी)
टंकण एवं प्रेषण - ओशो अनुयायी स्वामी अंतरप्रकाश जी द्वारा ।
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ओशो के इस प्रवचन को वीडियो में देखें ।
https://www.youtube.com/watch?v=MXzEDr-7Ags

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और अन्त में - 
अब (नीचे) इससे ज्यादा क्या बतायें ?

नैनों में निरखत रहे । अविगत नाम कबीर ?
बैडा पार लगावहिं । सुरत सरोवर तीर ।

26 मार्च 2017

सर्वभक्षी अन्यायी निरंजन

कबीर सागर के इस (निम्न) दोहे का अर्थ स्पष्ट नही होता । 
रामचन्द्र जी रावण का वध करके सभी के साथ अयोध्या लौट आये हैं और लंका से ‘अयोध्या कोट’ उठा लाये हैं तथा उसको अयोध्यापुरी में स्थापित करना चाहते हैं ।
साखी -
राज करै रघुवंश मणि, तब अस कीन्ह प्रमान ।
थाप्यौ कोट अयोध्यहि, सुनो मन्त्र हनुमान ।
जबहि राम लंका से आये, अयोध्या कोट उठावन लाये । 
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कोट का अर्थ किला है । इससे लगता है कि राम के लंका प्रवास के दौरान ऐसा कुछ अस्थायी रूप से बनाया गया होगा । जिसको वे स्मृति बतौर या अन्य कारणवश ले आये होंगे ।
(यदि अमेरिका जैसे देशों में घरों को अन्य स्थान पर स्थापित करने का उदाहरण हमारे सामने न होता, तो यह बात अजीब सी लगती)
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इसी ‘कोट’ को स्थापित करने हेतु नीव खोदी जा रही थी । तब खोदने की क्रिया में कुछ ‘पोले स्थान’ जैसी आवाज हुयी ।
फ़िर नीचे किसी द्रव्य (खजाने) आदि की आशंका के साथ ‘पोले स्थान’ की तरफ़ खोदा गया तो एक समाधिस्थ तपस्वी नजर आये, जो माथे पर लुहिङा(?) दिये तप कर रहे थे । और उनकी भौंहो के बाल लम्बे होकर उनका चेहरा छिप गया था । वे प्रथ्वी तल पर बैठे थे ।
फ़िर उनकी समाधि हटी । राम ने उनके चारो ओर परिक्रमा कर दण्डवत किया ।
ऋषि बोले - आप कौन हैं, वेषभूषा आदि से राजपुरुष लगते हैं ।
राम बोले - मैं दशरथ पुत्र राम हूँ । पास ही अवधपुरी में रहता हूँ ।
ऋषि बोले - राम अवतार हुआ, यह कब हुआ ?
राम बोले - संसार में यश और नाम रहे, इसलिये यह करता हूँ ।
ऋषि बोले - यह जीवन अल्पायु है, इसलिये ‘कोट’ स्थापन आदि झंझट को छोङकर सुनो ।
राम ने उनसे अपने ह्रदय की बातें कहीं और पूछा - आप कबसे तपस्यारत हैं ?  

वह ऋषि बोले - मेरा नाम लोमस है । मनुष्यों के आठ पहर का रात दिन होता है । जिसे सब अहोरात (एक दिवस) कहते हैं । ऐसे मनुष्य दिवसों के (शुक्ल-कृष्ण) दो पक्ष (यानी एक महीना) को मिलाकर पितरों का एक दिवस होता है । फ़िर पितरों के एक वर्ष के बराबर देवताओं का एक दिन होता है ।
तब ऐसे देवताओं के बारह वर्ष बीत जाने पर मनु का एक दिवस होता है, ऐसे चौदह हजार वर्ष
एक मनु की आयु है ।
(यहाँ दोहे का अर्थ स्पष्ट नही है)
बारह वर्ष दिवस जब जाना, चौदह सहस्र इक मनु जो बखाना ।
ऐसे सात मनु जब समाप्त हो जाते हैं । तब एक इन्द्र की आयु पूर्ण होती है ।
फ़िर ऐसे सात इन्द्रों का नाश होने पर एक ब्रह्मा समाप्त होता है ।
सात ब्रह्मा नाश होने पर एक विष्णु समाप्त हो जाता है ।
और सात विष्णु (ओं) के नाश होने पर एक रुद्र का नाश होता है ।
ऐसे सोलह रुद्रों के नष्ट हो जाने पर मेरा (सिर्फ़) एक रोम गिरता है ।
इसीलिये मेरा नाम लोमस (बालों से पूर्णरूपेण भरे शरीर वाला) है ।
यह सुनकर राम को विश्वास न हुआ ।
तब लोमस ने उनके मन भाव जानकर कहा - तुम्हारी तरह ही प्रत्येक (अवतारी) राम ने मुझे भेंट के समय अंगूंठी दी । जो इस कमण्डल में हैं, उन्हें गिनो । इतने (उनचास करोङ) बार राम रावण हो चुके हैं ।
राम ने गिना, वे उनचास करोङ थीं ।
इतनी तो वे उस प्रकार की ही थी, फ़िर कमण्डल का लेखा कैसे कहा जाये ?
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‘यहाँ उल्लेखनीय है कि कबीर गोरखनाथ प्रसंग में गोरखनाथ द्वारा कबीर की आयु पूछने पर भी इतने (उनचास करोङ) ही राम, कृष्ण अवतार हो चुकने की बात कही थी । इससे सिद्ध होता है कि कबीर के अभी वाले जन्म तक इतना सब हुआ है । और फ़िर इसी सूत्र से आदिसृष्टि का समय निकाला जा सकता है ।’
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यहाँ राम जिस ‘निराकार निरंजन’ के अंश से उत्पन्न थे । स्वयं उसका मर्म न जान सके ।
जान्यो जन्महि अल्प जब, चले स्वर्ग अस्थान ।
निराकार निरंजन, तासु मर्म नहि जान ।
इस घटना से राम को ऐसी विरक्ति हुयी कि राजपाट, बन्धु आदि को त्यागकर स्वर्ग चले गये । फ़िर अपनी इच्छा से कृष्ण अवतार के रूप में जन्म लिया ।
इसके बाद कबीर ने ‘निरंजन’ के छल कपट और देवी, देवता, अवतारों को धोखे में रखकर ठगने, मारने का वर्णन किया है ।
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विशेष - इसके बाद जो साखी है । उसी से ‘कबीर सागर’ विश्वसनीय और कबीर की वाणी लगता है ।
नाम अदल जो पावै, कहै कबीर विचार ।
होय अटल जो निश्चय, जम राजा रहे हार ।
- ये जो ‘नाम अदल’ और ‘अष्टम कमल’ के बारे में कबीर वाणी में कई स्थानों पर आया है । यही अन्तिम स्थिति है । ‘सार शब्द’ ‘निःअक्षर’ के बारे में बहुत बोला जाता है । पर इसके बारे में कोई गुरु नही बोलता (क्योंकि वे खुद नही जानते)
- आठवाँ कमल और अदली नाम शरीर से बाहर है । कोई गुरु इसका ध्यान, सुमिरन आदि बताता है ?
काया से बाहर लखे, हँस कहावै सोय ?
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इसके बाद कबीर द्वारा कृष्ण चरित्र आदि का वर्णन करने के बाद, धर्मदास कल्पों और उत्पत्ति प्रलय के बारे में प्रश्न करते हैं ।
कबीर कहते हैं - यह चारो युग रहट की भांति चक्राकार घूमते रहते हैं । चारो युग के अन्त में निरंजन अग्नि में रहता है । वह प्रथ्वी को जलाकर जल में लीन कर देता है । और सातों स्वर्ग के नाके पर रहता है । फ़िर तप के बल पर स्थित रहे तैतीस करोङ देवता, चन्द्र, सूर्य, तारे...चतुर्मुख ब्रह्मा के पतित होते ही पतित हो जाते हैं (अर्थात इनके स्थान पर नये आ जाते हैं)
फ़िर दस अवतारों का कार्य समाप्त कर विष्णु समाप्त हो जाते हैं ।
लेकिन योगस्थ रहस्य को जानने और सेवन करने के कारण शंकर तब तक बचे रहते हैं ।
इस तरह सतपुरुष की सेवा के फ़ल का परिणाम (और सतपुरुष द्वारा उसे दिये वचन) के कारण यह अन्यायी निरंजन ‘बहत्तर चतुर्युगी’ तक यही मारने, जन्माने का खेल करता हुआ ‘भवसागर’ को बनाये रखता है ।
लेकिन ‘महाप्रलय’ के समय निरंजन अग्नि से हट जाता है । इसी समय लोमस ऋषि का भी अन्त हो जाता है । और चन्द्रमा, सूर्य, जल (ये 5 तत्वों वाला नही है) सब पूर्णतः खत्म हो जाते हैं (यानी पूर्व की खण्ड प्रलय की भांति उनके स्थान पर नये देवता आदि नियुक्त नही होते)
तब पाँच तत्व, तीनों गुण, इसके बनाये 14 यम, आकाश (ये 5 तत्वों वाला नही है) ये भी नही रहते । इसी समय यह (पूर्व की ही भांति) आदिकन्या महादेवी को भी खा जाता है ।
सब भक्षै निरंजन राय, आदि अन्त कछु ना रहै ।
शिव, कन्या, नाम बिहाय, सब जीव राखे आप में ।

20 मार्च 2017

ध्यान के प्रकार

प्रथमहिं ध्यान पदस्थ है, दुतिये पिण्ड अधीत । 
त्रितिय ध्यान रूपस्थ पुनि, चतुर्थ रूपातीत  । (दोहा)
- ध्यान चार प्रकार का होता है, 
1 पदस्थ ध्यान 2 पिण्डस्थ ध्यान 3 रूपस्थ ध्यान एवं 4 रूपातीत ध्यान ।
स्तम्भिनी द्राविणी चैव दहनी भ्रामिणी तथा । 
शोषिणी च भवत्येषा भूतानां पंच धारणा ।  
(गोरक्ष पद्धति श 2 श्लोक 51 का अनुवाद)  
यह पंच धारणाओं का वर्णन प्रायः गोरक्षनाथ पद्धति के दूसरे शतक के श्लोकों के अनुसार है ।
यह धारणा की योग क्रिया गुरुगम्य है । केवल पुस्तक से सिद्धि की इच्छा करना हानिकारक है ।
2 सुन्दरदास जी ने चार प्रकार के ध्यान कहे है 1 पदस्थ 2 पिंडस्थ 3 उपस्थ 4 रूपातीत । 
परन्तु गोरक्ष पद्धति में प्रथम दो भेद सगुण और निर्गुण (याज्ञवल्क्य के अनुसार) करके 9 ध्यान कहे हैं ।
गुदं मेढ्रं च नाभिश्च हृत्पद्मं च तदूर्ध्वतः । 
घण्टिकालम्बिकास्थानं भ्रूमध्ये च नभो बिलम । 
पदस्य ध्यान वर्णन 
जे पद चित्र विचित्र रचे अति, गूढ महा परमारथ जामैं ।
ते अवलोकि विचार करै पुनि, चित्त धरै निहचै करि तामैं ।
कै करि कुम्भक मंत्र जपै उह, अक्षर ते पुनि जानि अनामै । 
‘सुन्दर’ ध्यान पदस्थ इहै मन, निश्चल होइ लहै जु विरामै । (इंदव)

- पदस्थ ध्यान में साधक को चित्र विचित्र (नाना प्रकार के) अति गम्भीर तथा परम तत्व का निरूपण करने वाले सन्त वचनों का श्रवण कर उन्हीं में अपना मन निश्चय पूर्वक लगाना चाहिये । इस तरह सन्तवाणी के किसी पद में ध्यान लगाना पदस्थ ध्यान का पहला तरीका है ।
दूसरा तरीका - पूर्वोक्त कुम्भक विधि से कार बीज मन्त्र या गुरु उपदिष्ट मन्त्र के अक्षरों में ध्यान लगाते हुये उसका जाप करे तो योगी का मन निर्मल (निर्विकार) हो जाता है ।
- ध्यान की उपर्युक्त विधि पदस्थ ध्यान है । इससे योगी का मन निश्चल, शान्त तथा मुक्तावस्था को प्राप्त हो जाता है ।

पिंडस्थ का वर्णन 
सुनि शिष्य कहौं ध्यान पिंडस्थं । पिंड शोधन करिये स्वस्थं । 
षट्चक्रनि  कौ धरिये ध्यानं । पुनि सदगुरु कौ ध्यान प्रमानं । (चौपई)
- पिण्डस्थ ध्यान के द्वारा पिण्ड (शरीर) का शोधन कर उसे स्वस्थ बनाया जाता है । इसमें षट्चक्रों का ध्यान करना चाहिये और अन्त में गुरु (सदगुरु) विग्रह का ध्यान करना चाहिये ।
1 नाना प्रकार के चित्रों में रचित पद और बीज मंत्रों के ध्यान तथा महावाक्यों या महामंत्रों के जप सहित ध्यान ‘पदस्थ’ ध्यान है ।
2 षट्चक्र का वर्णन ऊपर छन्द 50 से 56 तक पृ. 5758 पर आ ही गया ।
(उल्लास 1 ज्ञानसमुद्र 69) 
रूपस्थ ध्यान वर्णन 
निहारि कैं त्रिकूट मांहिं, विस्फुलिंग देखि है ।
पुनः प्रकाश दीप ज्योति, दीप माल पेखि है ।
नक्षत्र माल विज्जुली, प्रभा प्रत्यक्ष होइ है । 
अनन्त कोटि सूर चन्द्र, ध्यान मध्य जोइ है । 
मरीचिका समान शुभ्र, और लक्ष जांनिये ।
झलामलं समस्त विश्व, तेजमै बषांनिये ।
समुद्र मध्य डूबि कैं, उघारि नैन दीजिये । 
दशौं दिशा जलामई, प्रत्यक्ष ध्यान कीजिये । (नराय)
- योगी अपने अन्तर चक्षु से त्रिकूट भ्रूमध्य की ओर देखे । वहाँ पहले तेजोमण्डल में चिनगारियां दिखायी देंगी, फिर कुछ अभ्यास के बाद दीपक की ज्योति दिखायी देगी (मानों हजारों दीपमालायें एक साथ जल रही हों) आगे कुछ अभ्यास करने पर योगी को उसी ध्यान में नक्षत्र माला तथा बिजली की सी चकाचौंध स्पष्ट दिखायी देगी । इससे आगे अभ्यास करने से, रूपस्थ ध्यान में अनन्तकोटि सूर्य चन्द्र का प्रकाश दिखायी देगा ।
- अन्त में श्वेत प्रकाश मरीचिका के समान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को व्याप्त कर झिलमिल झिलमिल होता हुआ दिखायी देगा और योगी की ऐसी स्थिति हो जायगी कि उसे सर्वत्र इस प्रकाश के अतिरिक्त और कुछ नहीं दिखायी देगा (उदाहरण) जैसे तालाब, समुद्र आदि में डुबकी लगाकर आंख खोलकर देखने पर दसों दिशाओं में जल ही जल दिखायी देता है, उसी तरह इस रूपस्थ ध्यान की अन्तिम अवस्था में योगी को प्रकाश ही प्रकाश दिखायी देता है और कुछ नहीं ।

रूपातीत ध्यान वर्णन 
यह रूपातीत जु शून्य ध्यान । कछु रूप न रेख न है निदान । 
तहां अष्ट प्रहर लौं चित्त लीन । पुनि सावधान है अति प्रवीन । (पद्धडी)
जिम पक्षी की गति गगन मांहि । कहुं जात जात दिठि परय नांहि । 
पुनि आइ दिखाई देत सोइ । वा योगी को गति इहै होइ । 
इहिं शून्य ध्यान सम और नांहिं । उत्कृष्ट ध्यान सब ध्यान मांहि । 
है शून्याकार जु ब्रह्म आपु । दशहू दिशि पूरण अति अमापु ।  
- रूपातीत ध्यान में शून्य का ध्यान करना पङता है । इसमें न कोई रूप दिखायी देता है, न किसी प्रकार की रेखा । योगी को अत्यन्त सावधान होकर पूर्ण तन्मयता से चित्त को आठों पहर इस शून्य में ध्यान लगाना चाहिये ।
- इससे योगी के चित्त की वही स्थिति हो जाती है जैसे दूर आकाश में उङता पक्षी दिखायी देता हुआ अचानक दृष्टि से ओझल हो जाता है और कुछ देर बाद फिर दिखायी देने लगता है ।
- इस शून्य (रूपातीत) ध्यान के समान कोई अन्य ध्यान योगी को सहायक नहीं होता । यह ध्यान पूर्वोक्त ध्यानों में सर्वोत्कृष्ट है । इसमें दसों दिशाओं को व्याप्त करने वाला प्रमाणातीत ब्रह्म शून्य रूप में योगी को प्रत्यक्ष दिखायी देने लगता है ।
यों करय ध्यान सायोज्य होइ । तब लगै समाधि अखंड सोइ । 
पुनि उहै योग निद्रा कहाइ । सुनि शिष्य देउं तोकौं बताइ । 
- इन चारों ध्यानों का अभ्यास करने से योगी सायुज्य अवस्था को प्राप्त होता है । उसकी अखण्ड समाधि लगने की स्थिति आ जाती है ।
शिष्य ! अन्त में तुझे बता दूँ कि इसी अवस्था को योग शास्त्र में ‘योगनिद्रा’ कहा है ।
1 रूपातीत या शून्य ध्यान का वर्णन याज्ञवल्क्यादि के अनुसार है ।
(उल्लास 1 ज्ञानसमुद्र 71) 
~सन्त सुन्दरदास जी महाराज~

16 मार्च 2017

प्राप्तव्यमर्थं

किसी नगर में सागरदत्त नामक वणिक रहता था । उसके पुत्र ने सौ रुपये में एक पुस्तक खरीदी । जिसमें सिर्फ़ इतना ही लिखा था ।
प्राप्तव्यमर्थं लभते मनुष्यो, देवोऽपि तं लंघयुतिं न शक्तः ।
तस्मान्न शोचामि न विस्मयो मे, यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम ।
प्राप्त होने योग्य अर्थ को ही मनुष्य लेता है । उसको देव भी उलंघन करने में समर्थ नहीं है । इस कारण न मैं शोच करता हूँ न मुझको विस्मय है । जो हमारा है वह दूसरों का नही ।
यह देख सागरदत्त ने पूछा - पुत्र, कितने मूल्य में यह पुस्तक खरीदी ?
वह बोला - सौ रुपये में ।
सागरदत्त बोला - धिक, मूर्ख ! जो तूने लिखे हुये एक श्लोक को सौ रुपये में खरीदा । इस बुद्धि से किस प्रकार धन उपार्जन करेगा । सो आज से तुम हमारे घर में प्रवेश न करना ।
इस प्रकार घर से घुङक कर निकाल दिया । वह उससे दुःखी हो दूर देशान्तर स्थित हुआ ।
तब कुछ दिनों बाद वहाँ के निवासियों ने पूछा - आप कहाँ से आये हो, क्या नाम है ?
वह बोला - मनुष्य प्राप्त होने योग्य अर्थ को प्राप्त होता है इत्यादि ।
फ़िर किसी अन्य के भी परिचय आदि पूछने पर उसने यही कहा ।
तब नगर में उसका नाम ‘प्राप्तव्यमर्थं’ हुआ । 

उस नगर की रूप यौवन सम्पन्न चन्द्रवती नाम की राज्यकन्या एक बार अपनी सखी के साथ एक महोत्सव देखने आयी और वहाँ किसी रूप सम्पन्न मनोहर राजपुत्र को देखकर कुसुम बाण से हत मोहित हो गयी ।
और उसने अपनी सखी से कहा - सखि ! जिस प्रकार इससे समागम हो, तुम अवश्य ही वह यत्न करो ।
यह सुन सखी उस राजपुत्र के पास जाकर बोली - मुझे चन्द्रवती ने तुम्हारे पास भेजा है और उसने तुमसे कहा है कि तुम्हारे दर्शन से ही कामदेव ने मेरी मृत्युदशा कर दी । सो यदि शीघ्र हमारे निकट न आओगे तो मैं मरण की शरण लूँगी ।
यह सुनकर उसने कहा - यदि अवश्य में वहाँ आऊँ तो किस उपाय से आऊँ ?
सखी बोली - रात्रि में महल पर से लम्बायमान कठिन रस्सी के सहारे चढ़ आना ।
वह बोला - जो तुम्हारा यह निश्चय है तो मैं यही करूँगा ।
रात होने पर वह राजपुत्र विचारने लगा - अहो ! यह बङा कुकर्म है ।
- गुरुकन्या, मित्र की भार्या, स्वामी सेवक की स्त्री इनसे जो पुरुष गमन करता है । वह ब्रह्मघाती होता है ।
- जिससे अयश हो, जिस कर्म से दुर्गति हो, जिस कर्म से स्वर्ग से भ्रष्ट हो । वह कर्म न करे ।
ऐसा विचार कर उसके पास न गया ।
उसी समय घूमता हुआ प्राप्तव्यमर्थं वहाँ श्वेत घर के निकट लम्बायमान रस्सी को देख कर कौतुक ह्रदय से उसको पकङकर (ऊपर) गया ।
उस राजपुत्री ने ‘ये वही है’ ऐसा जानकर सन्तुष्ट चित्त से स्नान, भोजन, पानाच्छादनादि से सन्मान किया ।
फ़िर उसके संग शय्या में सोती हुयी उसके अंग स्पर्श से प्राप्त हुये हर्ष से रोमांचित शरीर हो उसने कहा - तुम्हारे दर्शन मात्र से अनुरक्त हुयी मैंने अपना आत्मा तुमको दिया । तुमको छोङकर मेरा स्वामी स्वपन में भी और न होगा । सो मेरे साथ आलाप क्यों नही करते ।
वह बोला - मनुष्य प्राप्त होने योग्य अर्थ को ही प्राप्त होता है ।
उसके ऐसा कहने पर ‘यह (कोई) और है’ ऐसा विचार कर उसने अपने धवल गृह से उतार कर छोङ दिया । तब वह किसी टूटे हुये देवमन्दिर में जाकर सो गया ।
वहाँ किसी कुलटा का संकेत किया हुआ नगर रक्षक आया । प्राप्तव्यमर्थं को सोया हुआ देखकर उसने अपना भेद छिपाने हेतु पूछा - आप कौन हैं ?
वह बोला -  मनुष्य प्राप्त होने योग्य अर्थ को ही प्राप्त होता है ।
यह सुनकर वह दण्डपाशक बोला - यह देवगृह शून्य है सो मेरे स्थान में जाकर सो रह ।
‘बहुत अच्छा’ ऐसा कह बुद्धि की विपरीतता से अन्य स्थान में सो गया ।
उस रक्षक की नियमवती नाम वाली कन्या किसी पुरुष में अनुरक्त हुयी उसे संकेत कर उसी स्थान में सोयी हुयी थी ।
तब प्राप्तव्यमर्थं को आया देखकर ‘यही मेरा प्रिय है’ ऐसा रात्रि के घने अन्धकार से मोहित हुयी उठकर भोजन आदि क्रिया करा कर गान्धर्व रीति से अपना विवाह कर उसके संग शयन में स्थित हुयी खिले मुखकमल से बोली - अब भी क्यों निडर होकर मुझसे नही बोलते हो ?
वह बोला - मनुष्य प्राप्त होने योग्य अर्थ को ही प्राप्त होता है ।
यह सुनकर उस (नियमवती) ने विचार किया - बिना विचारे जो कार्य किया जाता है, उसका ऐसा ही फ़ल होता है ।
फ़िर इस विचार से दुःखी हो उसने प्राप्तव्यमर्थं को निकाल दिया ।
तब प्राप्तव्यमर्थं को मार्ग में जाते हुये वरकीर्ति नाम का वर (किसी) और देश का रहने वाला गाजे-बाजे के साथ बारात ले जा रहा था, मिला । प्राप्तव्यमर्थं बारात के साथ चलने लगा ।
लेकिन जब तक लग्न समय आता, उससे पहले ही राजमार्ग में स्थिति (उस) श्रेष्ठी के गृह द्वार में, जहाँ कि मंगल वेश किये रत्न मण्डप की वेदी में विवाह के निमित्त वह वणिक पुत्री स्थित थी ।
एक मदमत्त बिगङा हाथी अपने आरोहक को मार कर जनसमूह के कोलाहल के साथ लोगों को रौंदता हुआ वहाँ आया । सारे बाराती और दूल्हा डरकर भाग गये । 
उसी समय भय से चंचल नेत्र वाली उस अकेली रह गयी दुल्हन कन्या को देखकर ‘डरो मत, मैं रक्षक हूँ’ ऐसा कहकर उसका दक्षिण (सीधा) हाथ पकङ कर प्राप्तव्यमर्थं ने साहस के साथ हाथी को कठोर वाक्यों से घुङक कर उसे बचाया ।
तब दैवयोग से हाथी के हट जाने पर, सुह्रद बान्धव के साथ लग्न समय बीत जाने पर, वरकीर्ति ने वहाँ आने पर उस कन्या को अन्य के साथ देख कर कन्या के पिता से कहा - श्वसुर ! यह आपने विरुद्ध किया । जो (पहले) मुझको देकर के कन्या और को दी ।
वह बोला - मैं भी हाथी के डर से भागा हुआ आपके साथ ही आया हूँ । यह न जाने क्या हुआ ।
फ़िर वह अपनी पुत्री से बोला - वत्से ! तूने यह अच्छा न किया । सो कह, यह क्या वृतान्त है ।
वह बोली - इसने मेरी प्राण संकट से रक्षा की, सो इसको छोङकर मुझ जीती हुयी का हाथ कोई ग्रहण नही करेगा ।
इसी बात में रात बीत गयी ।
तब प्रातःकाल होने पर महाजनों के समूह में इस वार्ता का व्यतिकर सुनकर वह राजदुहिता (चन्द्रवती) उस स्थान पर आयी ।
कर्ण परंपरा से सुनकर दण्डपाश की कन्या भी उस स्थान पर आ गयी ।
तब उस महाजन के समूह को सुनकर राजा भी वहाँ आ गया ।
और प्राप्तव्यमर्थं से बोला - निडर होकर कहो, ये सब क्या वृतान्त है ।
वह बोला - मनुष्य प्राप्त होने योग्य अर्थ को ही प्राप्त होता है ।
राजकन्या बोली - देव भी उसको लंघन करने में समर्थ नही ।
दण्डपाशक की सुता बोली - इस कारण न मैं कुछ शोचती हूँ न मुझे कुछ विस्मय है ।
इस अखिल लोक के वृतान्त को सुन कर (फ़िर) वणिकसुता भी बोली - जो हमारा है सो दूसरे का नही ।
तब राजा ने उनको अभयदान देकर सबसे प्रथक प्रथक वृतान्त पूछा और सब वृतान्त जानकर प्राप्तव्यमर्थं को बहुत मान के साथ सम्पूर्ण अलंकार, परिवार सहित अपनी कन्या देते हुये ‘तू मेरा पुत्र है’ ऐसी घोषणा के साथ उसको युवराज अभिषिक्त कर दिया ।
दण्डपाशक ने भी निजशक्ति अनुसार वस्त्रपानादि आदि से सत्कृत कर अपनी कन्या प्राप्तव्यमर्थं को अर्पित कर दी ।
तब प्राप्तव्यमर्थं ने अपने माता पिता को कुटुम्ब सहित उस नगर में सम्मानपूर्वक बुलाया और अपने गोत्रों के साथ अनेक भोग भोगता हुआ सुख से रहा ।  

07 मार्च 2017

मैं शैतान हूँ !

फ़ादर इस्मान को लोग धार्मिक आध्यात्मिक बातों के लिये पथ प्रदर्शक मानते थे । क्योंकि वे धर्म अध्यात्म के प्रकांड पंडित थे । कौन अपराध क्षम्य और कौन दण्डनीय, इसकी उन्हें पूर्ण जानकारी थी । स्वर्ग, नर्क और पाप-मोचन जैसे रहस्यों से वह पूर्ण परिचित थे ।
उत्तरी लेबनान में फ़ादर इस्मान का कार्य गांव गांव घूमकर जन-साधारण को उपदेश देते हुये आध्यात्मिक रोगों से मुक्त कराना और शैतान के भयानक जाल से बचाना था । इस्मान का शैतान से अनवरत युद्ध जारी रहता ।
लोगों की इस चर्च पुजारी में श्रद्धा थी और वे इनका बङा आदर करते थे । वे फ़ादर के उपदेशों को सोने-चाँदी से खरीदते और अपने खेतों की फ़सल के सुन्दरतम फ़ल भेंट करते ।  
शरद ऋतु की एक संध्या को फ़ादर इस्मान सुदूर एकान्त गांव की ओर घाटियां पहाङी पार करते चले जा रहे थे कि उन्होंने एक दर्दनाक चीत्कार सुनी, जो सङक के किनारे खाई से आ रही थी ।
इस्मान रुक गये और आवाज की दिशा में देखने लगे ।
वहाँ एक नग्न आदमी प्रथ्वी पर पङा था । उसके सिर और छाती के गहरे घाव से रक्त बह रहा था । वह करुण स्वर में सहायता की गुहार कर रहा था - मुझे बचाओ, मेरी सहायता करो, दया करो, मैं मर रहा हूँ ।
फ़ादर उसे व्यग्रता से ताकने लगे और स्वयं से बोले - यह अवश्य कोई चोर है । इसने राहगीरों को लूटने का प्रयास किया किन्तु असफ़ल रहा, और किसी ने इसे घायल कर दिया । यदि यह मर गया तो इसे मारने का अपराध मुझ पर थोप दिया जायेगा ।
ऐसा सोचकर वह आगे बढ़ चले ।
किन्तु मरणासन्न की आर्त पुकार ने उन्हें फ़िर रोक दिया - कृपया मुझे छोङकर न जाओ, मैं मर रहा हूँ ।
फ़ादर को लगा कि वे दुखी की सहायता से इंकार कर रहे हैं ।
यह सोचकर उनका मुख पीला पङ गया । उनके होठ फ़ङकने लगे ।
किन्तु वे मन ही मन बोले - अवश्य यह उन पागलों में से है, जो वन में निरुद्देश्य घूमते हैं । इसके घाव देखकर मन कांप जाता है । क्या करना चाहिये; परन्तु एक आध्यात्मिक चिकित्सक शारीरिक चिकित्सिक तो नही हो सकता ।
यह सोच कर वह कुछ कदम आगे बढ़े तो उस अधमरे व्यक्ति ने ऐसी कष्टदायक आह भरी, जिससे पत्थर भी पिघल जाता ।
वह लगभग हांफ़ता सा कराह कर बोला - मेरे पास आओ ! बहुत अरसे तक हम दोनों गहरे मित्र रहे । तुम फ़ादर इस्मान हो । अच्छे चरवाहे, मैं न तो चोर हूँ और न पागल, अतः मुझे इस एकान्त में न मरने दो और पास आओ तब बताऊँगा, मैं कौन हूँ ।
तब फ़ादर इस व्यक्ति के थोङे पास आ गये और झुककर उसे देखा ।
किन्तु उन्हें एक अजीब चेहरा दिखाई दिया, जिसकी आकृति नितान्त भिन्न थी । उन्हें उसमें बुद्धिमता के साथ कपट, सुन्दरता के साथ कुरूपता और नम्रता के साथ दुष्टता साफ़ दिखाई दी ।
वे तुरन्त उल्टे पांव हुये और पूछा - तुम कौन हो ?
मरने वाला बहुत क्षीण स्वर में बोला - फ़ादर, मुझसे डरो मत । बहुत समय हम दोनों मित्र थे । खङा होने में मेरी सहायता करो और पास के झरने पर ले जाकर मेरे घाव अपने कपङे से धो दो ।
फ़ादर ने कहा - पहले बताओ, तुम कौन हो ? मैं तुम्हें नहीं पहचानता और याद नहीं कि तुम्हें कहीं देखा भी हो ।
वह आदमी पीङित स्वर में बोला - तुम पहचानते हो । तुमने मुझे हजार बार देखा है और तुम मेरे ही बारे में नित्य बात करते हो । मैं तुम्हें अपने जीवन से भी अधिक प्रिय हूँ ।
फ़ादर ने उसे लगभग झिङक कर कहा - झूठे, पाखंडी ! मरने वाले को सत्य बोलना चाहिये । तुम्हारा पापी चेहरा मैंने सारे जीवन नही देखा । बताओ तुम कौन हो, वरना तुम्हें तुम्हारे हाल पर छोङ जाऊँगा ।
घायल आदमी जरा सा हिला और उसने फ़ादर की आँखों में झांका । उसके होठों पर एक दुष्ट मुस्कान फ़ैल गयी ।
फ़िर वह शान्त, गूढ़, नम्रता भरे सर्द स्वर में बोला - मैं शैतान हूँ ।
इस भयानक शब्द को सुनते ही फ़ादर इस्मान ने उत्कट चीत्कार किया । जो सुदूर घाटियों के अन्त तक गूंज गया । तब उन्होंने देखा और अनुभव किया कि मरणासन्न व्यक्ति का शरीर अपनी विचित्र वक्रता के साथ उस शैतान से मिलता है । जिसकी छवि गांव के गिर्जाघर की दीवार पर टंगे एक धार्मिक चित्र में अंकित है ।
वह भयभीत होकर चिल्ला उठे - ईश्वर ने मुझे तेरी नारकीय छवि दिखाई, परन्तु तुझे घृणा करने के निमित्त ही, तेरा सदैव को अन्त हो । चरवाहे को उचित है कि वह मुर्दा भेङ को अलग कर दे, जिससे  दूसरी भेङें रोगी न हों ।
शैतान बोला - फ़ादर ! जल्दी न करो । तेजी से भागते समय को व्यर्थ न जाने दो । इससे पहले कि जीवन मेरे शरीर को त्यागे, मेरे घावों को भर दो ।
फ़ादर सख्त स्वर में बोले - जो हाथ नित्य ईश्वर अर्चना करते हों, उन्हें नर्क के रहस्यों से गढ़े शरीर को नहीं छूना चाहिये । तुझे युग-युग की जिह्वाओं और मानवता के होठों ने अपराधी घोषित किया है ।  तुझे अवश्य मरना चाहिये क्योंकि तू मानवता का शत्रु है और सदाचार का अन्त करना तेरा स्पष्ट उद्देश्य है ।  
शैतान बङे कष्ट के साथ थोङा हिला और कुहनी के सहारे उचक कर बोला - तुम नही जानते तुम क्या कर रहे हो और न तुम वह पाप समझते हो, जो स्वयं अपने ऊपर कर रहे हो । लेकिन अब छोङो इसे; क्योंकि अब मैं तुम्हें अपनी कहानी सुनाऊँगा ।
इस निर्जन घाटी में मैं आज अकेला घूम रहा था । जब मैं इस स्थान पर पहुँचा तो देवताओं के एक गिरोह ने ऊपर से उतरकर मुझ पर आक्रमण किया और मुझे बङी बेरहमी से मारा । यदि उनमें वह एक देवता न होता, जिसके हाथ में चमचमाती तलवार थी तो मैं उन्हें खदेङ देता, किन्तु उस चमचमाती तलवार के विरोध की शक्ति मुझमें नही थी ।
कुछ देर के लिये शैतान चुप हो गया और अपने कांपते हाथ से पहलू के घाव को दबाने लगा ।
फ़िर वह बोला - हथियारों से लैस देवता, जो शायद (अरब का एक देवता) मीचेल था । एक चतुर तलवार चलाने वाला था । यदि मैं प्रथ्वी पर न गिर गया होता और मरने का बहाना न किया होता तो अवश्य ही उसने मुझे मौत के घाट उतार दिया होता ।
फ़ादर ने आकाश की ओर देखते हुये हर्षित स्वर में कहा - मीचेल का भला हो, जिसने मानवता को उसके सबसे बङे शत्रु से मुक्त किया ।
तभी शैतान ने बीच में ही विरोध किया - जितनी घृणा तुम अपने आपसे करते हो । उससे कम मैं मनुष्यता का तिरस्कार करता हूँ । तुम मीचेल की पूजा कर रहे हो, जो तुम्हारे उद्धार के लिये नही आया । मेरी हार के समय तुम मेरी निन्दा कर रहे हो । यद्यपि मैं सदैव से और अभी भी तुम्हारी शान्ति और सुख का स्रोत हूँ ।
तुम मुझे अपनी शुभकामनायें नहीं देना चाहते और न मुझ पर दया ही करना चाहते हो; किन्तु तुम मेरे ही साये में जीवित रहते और फ़लते फ़ूलते हो । तुमने मेरे अस्तित्व को एक बहाना बनाया है और अपनी जीवन वृत्ति के लिये एक अस्त्र, और अपने कर्मों को न्यायोचित बताने के लिये तुम लोगों से मेरा नाम लेते फ़िरते हो ।
क्या मेरे भूतकाल ने मेरी भविष्यकालीन महत्ता को प्रमाणित नहीं कर दिया । क्या तुम समस्त आवश्यक धन संचय कर अपने लक्ष्य तक पहुँच सके । क्या तुम्हें ज्ञात हो गया कि मेरी सत्ता का भय दिखाकर तुम अपने अनुयायियों से और अधिक सोना चाँदी प्राप्त नही कर सकते ?
क्या तुम्हें यह पता नही कि यदि आज मेरा अन्त हो गया तो तुम भी भूखे मर जाओगे । यदि आज तुम मुझे मर जाने दोगे फ़िर कल को तुम क्या करोगे । अगर मेरा नाम ही दुनियां से उठ गया तो तुम्हारी जीविका का क्या होगा ?
देखो वर्षों से तुम गांव गांव घूमकर लोगों को चेतावनी देते फ़िरे कि वे मेरे जाल में न फ़ँस जायें । वे तुम्हारे उपदेशों को अपनी गरीबी के पैसों और खेतों की फ़सल से मोल लेते रहे । फ़िर कल जब वे जान जायेंगे कि उनके दुष्ट शत्रु का अब कोई अस्तित्व ही नही है तो वे तुमसे क्या मोल लेंगे ? तुम्हारी जीविका का मेरे साथ ही अन्त हो जायेगा । क्योंकि लोग पाप करने से ही छुटकारा पा जायेंगे ।
एक पुजारी होकर क्या तुम यह नही सोच पाते कि केवल शैतान के अस्तित्व ने ही उसके शत्रु मन्दिर का निर्माण किया है । वह पुरातन विरोध ही एक ऐसा रहस्यमय हाथ है, जो कि निष्कपट लोगों की जेबों से सोना-चाँदी निकाल कर उपदेशकों और महन्तों की तिजोरियों में संचित करता है ।
तुम किस प्रकार मुझे यहाँ मरता हुआ छोङ सकते हो, जबकि तुम जानते हो कि निश्चय ही ऐसी दशा में तुम अपनी प्रतिष्ठा, अपना मन्दिर, अपना घर, अपनी जीविका खो दोगे ?
शैतान कुछ देर के लिये चुप हो गया । उसकी आद्रता अब पूर्ण स्वतन्त्रता में परिणित हो गयी ।
फ़िर वह बोला - तुम गर्व में चूर हो, किन्तु नासमझ भी हो । मैं तुम्हें ‘विश्वास’ का इतिहास सुनाऊँगा और उसमें तुम उस ‘सत्य’ को पाओगे जो हम दोनों के ‘अस्तित्व को संयुक्त’ करता है और मेरे अस्तित्व को तुम्हारे अंतःकरण से बांध देता है ।  
समय के पहले पहर के आरम्भ में आदमी सूर्य के चेहरे के सामने खङा हो गया ।
उसने अपनी बाँहें फ़ैला दी और पहली बार चिल्लाया - आकाश के पीछे एक महान, स्नेहमय और उदार ईश्वर वास करता है ।
जब आदमी ने उस बङे वृत की ओर पीठ फ़ेर ली तो उसे अपनी ‘परछाई’ प्रथ्वी पर दिखाई दी और वह चिल्ला उठा - प्रथ्वी की गहराईयों में एक शैतान रहता है जो दुष्टता को प्यार करता है ।
और वह आदमी अपने आपसे कानाफ़ूसी करता हुआ अपनी गुफ़ा की ओर चल दिया - मैं दो बलशाली शक्तियों के बीच हूँ । एक वह, जिसकी मुझे शरण लेनी चाहिये । दूसरा वह, जिसके विरुद्ध मुझे युद्ध करना होगा ।
और सदियां जुलूस बनाकर निकल गयीं, लेकिन मनुष्य दो शक्तियों के बीच डटा रहा । एक वह, जिसकी वह अर्चना करता था, क्योंकि इसी में उसकी उन्नति थी । और दूसरी वह, जिसकी वह निन्दा करता था, क्योंकि वह उसे भयभीत करती थी ।
किन्तु उसे कभी यह नहीं मालूम हुआ कि अर्चना अथवा निन्दा का अर्थ क्या है ? वह तो बस दोनों के मध्य में स्थित है । एक ऐसे वृक्ष के समान, जो ग्रीष्म के, जबकि वह खिलता है और शीत के, जबकि वह मुर्झा जाता है, बीच खङा है ।
जब मनुष्य ने सभ्यता का उदय होते देखा, जैसा कि मनुष्य समझते हैं परिवार एक इकाई के रूप में अस्तित्व में आया, फ़िर वर्ग बने, फ़िर मजदूरी योग्यता और प्रवृत्ति के अनुसार बांट दी गयी । एक जाति खेती करने लगी, दूसरी मकान बनाने लगी, कुछ कपङे बुनने या अन्न की पैदावार करने लगे ।
इसके बाद भविष्यवक्ता ने अपना रूप दिखाया और यह सर्वप्रथम जीविका थी, जो ऐसे लोगों ने अंगीकार की, जिनको दुनियां की किसी भी जरूरी चीज की आवश्यकता नहीं थी ।   
फ़िर कुछ देर के लिये शैतान खामोश हो गया । तब वह एकबारगी हँस पङा और उसके प्रमोद की गूँज निर्जन घाटी में दूर तक फ़ैल गयी, किन्तु उसकी हँसी ने उसे उसके जख्मों की याद दिलाई और दर्द के कारण एक हाथ उसने अपने जख्मों पर रख लिया ।
फ़िर वह खुद को स्थिर करता हुआ बोला - तो ज्योतिष की उत्पत्ति हुयी और प्रथ्वी पर इसकी उन्नति अनोखे ढ़ंग से होने लगी ।
प्रथम जाति में एक ला-विस नाम का मनुष्य था । मैं नहीं जानता कि उसके नाम की उत्पत्ति कहाँ से हुयी । वह बुद्धिमान था, किन्तु बहुत ही निरुद्योगी । खेत पर काम करने, झोपङे बनाने, गाय-बैल पालने या ऐसे किसी कार्य से वह घृणा करता था, जिसमें कि शारीरिक श्रम की आवश्यकता पङे ।   
और चूँकि इन दिनों रोटी पाने के लिये सिवा कङी मेहनत के कोई दूसरा उपाय न था । ला-विस को अनेक रातें खाली पेट काटनी पङती थीं ।
गर्मियों की एक रात को, जबकि जाति के सब लोग गिरोह के सरदार की झोपङी को चारो ओर से घेरे खङे थे और दिन की कार्यवाही पर चर्चा कर रहे थे और सोने के समय की बाट जोह रहे थे ।
एक आदमी हठात उठ खङा हुआ और चन्द्रमा की ओर इशारा करता हुआ चिल्लाया - रात्रिदेव की ओर देखो । उसके चेहरे पर अंधकार छा गया है । उसकी सुन्दरता समाप्त हो गयी है । वह एक ऐसे काले पत्थर के रूप में बदल गया है, जो आकाश की छत से लटका हुआ है ।
सभी लोगों ने चन्द्रमा की ओर देखा । वे चिल्ला उठे और मारे डर के बेदम से हो गये । मानों अन्धकार के हाथों ने उनके ह्रदय को दबोच लिया हो, क्योंकि उन्होंने देखा कि रात्रिदेव काली गेंद के रूप में बदल गया है । जिसके कारण प्रथ्वी की चमक मिट गयी है और पहाङियां तथा घाटियां उनके सामने ही काले आवरण के पीछे अन्तर्धान हो गयी हैं ।
इसी समय ला-विस जिसने इससे पहले चन्द्रग्रहण देखा था और उसके मामूली से कारण को समझा था, अवसर से पूरा-पूरा लाभ उठाने के लिये आगे बढ़ा । वह गिरोह के बीच खङा हो गया और अपने हाथों को आकाश की ओर उठाकर भरी हुयी आवाज में बोला - नीचे झुक जाओ और प्रार्थना करो, क्योंकि अन्धकार के दुष्टदेव और उज्ज्वल रजनीदेव में युद्ध ठन गया है । यदि दुष्टदेव जीत गया तो हम सब लोग भी समाप्त हो जायेंगे, किन्तु यदि रजनीदेव की विजय हुयी तो हम सभी लोग जीवित रहेंगे ।
अब प्रार्थना करो । अपने चेहरों को मिट्टी से ढंक लो । अपनी आँखें बन्द कर लो और अपने सिरों को आकाश की ओर न उठाओ । क्योंकि जो भी दोनों देवताओं के युद्ध को देखेगा, वह ज्योतिहीन और बुद्धिहीन हो जाएगा और जीवनपर्यन्त अन्धा तथा पागल बना रहेगा । अपने मस्तक नीचे झुकाओ और अपने ह्रदय की पूर्ण भक्ति से अपने उस शत्रु के विरोध में, जो कि हम सबका प्राणघातक शत्रु है, रात्रिदेव को सबल बनाओ ।
~खलील जिब्रान
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मैं शैतान हूँ ! (2)
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मैं शैतान हूँ ! (2)

और ला-विस इसी प्रकार की बातें करता रहा और अपने भाषण में उसने स्वयं अपने द्वारा ही रचित अनेक ऐसे गुप्त शब्दों का प्रयोग किया, जो उन लोगों ने कभी न सुने थे ।
इस धूर्तता के बाद, जब चन्द्रमा अपनी पूर्ण उज्जवलता में परिणित हो गया तो ला-विस ने पहले से भी अधिक अपनी आवाज को ऊँचा किया और प्रभावशाली स्वर में बोला - अब ऊपर उठो और देखो कि रात्रिदेव ने अपने दुष्ट शत्रु पर विजय पा ली है । सितारों के बीच वह फ़िर अपनी यात्रा पर अग्रसर हुआ है । तुम्हें यह जानना चाहिये कि अपनी प्रार्थनाओं द्वारा तुमने उसे अंधकार के दैत्य को जीतने में सहायता दी है । वह अब बहुत प्रसन्न है और सदैव से अधिक प्रसन्न है ।
सभी लोग उठ खङे हुये और चन्द्रमा को देखने लगे, जो फ़िर पूर्ण रूप से प्रकाशित था । उनका भय समाप्त हो गया और उनकी व्याकुलता आनन्द में परिवर्तित हो गयी । वे नाचने गाने लगे और अपनी भारी छङी से लोहे की चादरों पर आघात करने लगे । इस प्रकार उपत्यकायें शोर से भर उठीं ।
उस रात को गिरोह के सरदार ने ला-विस को निमन्त्रित किया और कहा - तुमने ऐसा कार्य किया है, जिसे आज तक कोई नही कर पाया । तुमने एक गुप्त भेद की जानकारी का दर्शन किया है, जिसे हममें से कोई भी समझ पाने में असमर्थ है ।
जैसी कि मेरी प्रजा चाहती है, आज से तुम सारे गिरोह में, मेरे बाद, सबसे उच्च पदाधिकारी होगे । मैं सबसे अधिक बलबान हूँ और तुम सबमें बुद्धिमान तथा बहुत ही शिक्षित पुरुष हो । तुम हमारे और देवताओं के बीच मध्यस्थ हो । उन देवों की इच्छाओं और उनके कार्यों की व्याख्या तुम्हें करनी होगी और तुम हम लोगों को ऐसी बातें सिखाओगे, जो उनकी शुभकामनाओं तथा स्नेह पाने के लिये आवश्यक हैं ।
और ला-विस ने चतुराई से विश्वास दिलाया - मनुष्य का ईश्वर, जो कुछ भी मेरे दिव्य सपनों के माध्यम से मुझसे कहेगा । वह सभी जाग्रत अवस्था में तुम्हें बता दिया जायेगा और तुम विश्वास करो कि मैं तुम्हारे और ईश्वर के बीच में प्रत्यक्ष रूप से कार्य करूँगा ।
सरदार को विश्वास हुआ और ला-विस को दो घोङे, सात गायें, सत्तर भेङें और सत्तर मेमने भेंट किये गये । फ़िर वह ला-विस से इस प्रकार बोला - गिरोह के आदमी तुम्हारे लिये एक मजबूत मकान बना देंगे और हर फ़सल के समय अन्न का एक भाग तुम्हें भेंट किया करेंगे, जिससे कि तुम सम्मानित और माननीय गुरु की भांति रह सको ।
ला-विस खङा हो गया और जाने को तैयार ही था कि सरदार ने रोक लिया और कहा - वह कौन है और कहाँ है, जिसे तुम मनुष्य का ईश्वर कहते हो । और यह साहसी देव कौन है जो कि उज्जवल रात्रि के देवता से युद्ध करता है ? पहले तो कभी हमने उसके बारे में नहीं सुना था ।
ला-विस ने अपने माथे को खुजाया और उत्तर दिया - मेरे माननीय सरदार ! प्राचीन समय में, मनुष्य के जन्म से पहले सभी देवता एक साथ शान्तिपूर्वक सितारों की विस्तीर्णता के पीछे ऊपर के संसार में वास करते थे । देवताओं के देवता प्रभु उनके पिता थे । प्रभु उन बातों को जानते थे । जिसे देवता नही जानते थे । प्रभु ऐसे कार्य करते थे, जो देवता लोग करने में असमर्थ थे । उन्होंने ऐसे दिव्य रहस्य, जो नित्य विधान के बाहर के थे, केवल अपने पास तक सीमित रखे थे ।
बारहवें युग के सातवें वर्ष में (अरब का वह देवता, जो बाद में शैतान बना) ‘बाहतार’ की आत्मा ने जो महान ईश्वर से घृणा करता था, विद्रोह कर दिया । 
और अपने पिता के सम्मुख खङे होकर बोला - सभी जीवधारियों पर आप स्वयं अपनी ही महान सत्ता का अधिकार क्यों जमाये रखते हैं और हमसे सृष्टि के विधान को क्यों छिपाये हुये हैं ? क्या हम आपके वे बच्चे नहीं, जो केवल आपमें ही विश्वास रखते हैं और आपके अनन्त ज्ञान और महान सत्ता के भागीदार हैं ?
देवताओं के देवता इस पर क्रुद्ध हो गये और बोले - प्रारम्भिक अधिकार और महान सत्ता तथा आवश्यक रहस्य तो मैं अपने पास सुरक्षित रखूँगा ही, क्योंकि मैं ही आदि और मैं ही अन्त हूँ ।
तब बाहतार बोला - जब तक आप मुझे अपनी सत्ता और अधिकार में भागीदार नहीं बनायेंगे, मैं मेरे बच्चे और मेरे बच्चों के बच्चे आपके विरुद्ध विद्रोह करेंगे ।
तब देवताओं के देवता अनन्त आकाश में अपने सिंहासन पर खङे हो गये और उन्होंने म्यान में से अपनी तलवार निकाल ली तथा सूर्य को ढाल के रूप में हाथ में थाम लिया ।
एक ऐसी आवाज जिसने सृष्टि के समस्त कोनों को हिला दिया, वह बोले - नीच गिर, दुष्ट, विद्रोही, उस नीचे के शोकयुक्त संसार में, जहाँ अन्धकार और दुर्भाग्य का राज्य है । वहाँ तू अकेला रहेगा और निरुद्देश्य घूमता रहेगा, जब तक सूर्य राख के ढेर में, और सितारे छितरी हुयी किरणों में परिवर्तित न हो जायेंगे ।
उसी क्षण बाहतार ऊपरी संसार से गिरकर नीचे की दुनियां में जा पङा, जहाँ कि समस्त अधर्मी आत्मायें लङती-झगङती रहती हैं ।
तब बाहतार ने जीवन के रहस्यों की शपथ ली कि वह अपने पिता और भाईयों से युद्ध करेगा और प्रत्येक आत्मा को, जो उससे प्रेम करेगी, अपने फ़न्दे में फ़ँसायेगा ।
जैसे ही सरदार ने यह सुना उसके माथे पर सिलवट पङ गयी और उसका चेहरा भय से पीला पङ गया ।  
उसने कठिनाई से पूछा - तो पापी देवता का नाम बाहतार है ।
ला-विस ने उत्तर दिया - हाँ उसका नाम बाहतार था । पहले वह ऊपर के संसार में था । किन्तु जब वह नीचे की दुनियां में आ गया तो उसने बङी सफ़लता से अपने भिन्न-भिन्न नाम रखे..बालजाबूल, शैतानेल, बलिआल, जमील, आहरीमान, मारा, अबदौन, डेविल और अन्त में शैतान, जो कि विख्यात है ।
सरदार ने ‘शैतान’ शब्द को कंपित स्वर में कई बार दोहराया । उसके मुख से एक ऐसी आवाज निकल रही थी, जो तेज हवा के चलने पर सूखी पत्तियों की खङखङाहट से उत्पन्न होती है ।
तब उसने कहा - शैतान आदमी से भी उतनी ही घृणा क्यों करता है जितनी कि ईश्वर से ?
ला-विस ने शीघ्रता से उत्तर दिया - वह मनुष्य से इसलिये घृणा करता है क्योंकि वे भी शैतान के भाई बहनों की सन्तान ही हैं ।
सरदार ने प्रश्न किया - तब शैतान मनुष्य का चाचा है ?
ला-विस बोला - हाँ माननीय सरदार ! किन्तु वह उनका सबसे बङा शत्रु है, जो उनके दिनों में दुःख एवं रात्रियों को भयानक स्वपनों से भर देता है । यह वह शक्ति है, जो कि तूफ़ान को उन मनुष्यों के घरों की ओर भेजती है और उनके खेतों पर दुर्भिक्ष लाती है तथा उनको और उनके जानवरों को रोग-ग्रस्त बनाती है । वह एक अधर्मी किन्तु शक्तिशाली देव है । वह बङा ही दुष्ट है । जब हम दुःखी होते हैं वह हँसता है और जब हम प्रसन्न होते हैं वह दुःख मनाता है । तुम सबको मेरी योग्यता की सहायता से उसकी ठीक से जाँच पङताल करनी चाहिये ताकि तुम लोग उसके जाल में न फ़ँस पाओ और उसके दुष्ट कर्मों से दूर रह सको ।
सरदार ने अपना सिर मोटी छङी पर झुका दिया और फ़ुसफ़ुसाया - उस अदभुत शक्ति का रहस्य आज मुझे ज्ञात हुआ है, जो तूफ़ान को हमारे घरों की ओर भेजती है तथा हम पर और हमारे जानवरों पर महामारी फ़ैलाती है । सब लोगों को यह समझ लेना चाहिये, जो मैं अब समझा हूँ, और हमें ला-विस को धन्यवाद देना चाहिये तथा उसका आदर सत्कार करना चाहिये । क्योंकि उसने हमारे सबसे बङे शत्रु के गुप्त रहस्यों को हम पर प्रकट किया है और इस प्रकार हमें अधर्म की राह पर चलने से बचाया है ।
और ला-विस गिरोह के सरदार को वही छोङकर अपने झोपङे में चला गया । उसे अपनी समझ-बूझ पर गर्व था और खुशी की तरंग में वह झूम रहा था ।
प्रथम बार उस दिन ला-विस के सिवा सरदार और उस गिरोह ने वह रात विकराल देवों से घिरे अपनी शय्याओं पर, भयानक दृश्यों और व्याकुल कर देने वाले सपनों को देख-देखकर ऊँघते हुये काटी ।
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थोङी देर के लिये शैतान चुप हो गया तब फ़ादर इस्मान ने व्यग्र भाव से उसकी ओर देखा । फ़ादर के होठों पर मौत जैसी रूखी मुस्कान फ़ैल गयी थी ।
शैतान फ़िर बोला - इस तरह प्रथ्वी पर भविष्यवाणी का जन्म हुआ । अतएव मेरा अस्तित्व ही उसके जन्म का कारण बना ।
ला-विस प्रथम मनुष्य था, जिसने मेरी पैशाचिकता को अपना व्यवसाय बनाया । ला-विस की मृत्यु के उपरान्त यह वृत्ति उसके बच्चों ने अपनाई और इस व्यवसाय की वृद्धि निरन्तर होती गयी । यहाँ तक कि ये एक पूर्ण और पवित्र धन्धा बन गया और उन लोगों ने इसे अपनाया, जिनके मस्तिष्क ज्ञान के भंडार हैं तथा जिनकी आत्मायें श्रेष्ठ, ह्रदय स्वच्छ और कल्पनाशक्ति अनन्त है ।
बेबीलोन (बाबुल) में एक पुजारी की पूजा लोग सात बार झुककर करते हैं, जो मेरे साथ अपने भजनों द्वारा युद्ध ठाने हुये है ।
नाइनेवेह (नेनवा) में वे एक मनुष्य को, जिसका कहना है कि उसने मेरे आन्तरिक रहस्यों को जान लिया है, ईश्वर और मेरे बीच की एक सुनहरी कङी मानते हैं ।
तिब्बत में वे एक मनुष्य को, जो मेरे साथ एक बार अपनी शक्ति आजमा चुका है, सूर्य और चन्द्रमा के पुत्र के नाम से पुकारते हैं ।
बाइबल्स में इफ़ेसस और ऐटियोक ने अपने बच्चों का जीवन मेरे विरोधी पर बलिदान कर दिया ।
और यरुशलम तथा रोम में लोगों ने अपने जीवन को उनके हाथों सौंप दिया, जो मुझसे घृणा करते हैं और अपनी सम्पूर्ण शक्ति द्वारा मुझसे युद्ध में लगे हुये हैं ।
सूर्य के साये के नीचे प्रत्येक नगर में मेरा नाम धार्मिक शिक्षा, कला और दर्शन का केन्द्र है । यदि मैं न होता तो मन्दिर न बनाये जाते । मीनारों और विशाल धार्मिक भवनों का निर्माण न हुआ होता । 
मैं वह साहस हूँ, जो मनुष्य में दृढ़ निष्ठा पैदा करता है ।
मैं वह स्रोत हूँ, जो भावनाओं की अपूर्वता को उकसाता है ।
मैं एक ऐसा हाथ हूँ, जो आदमी के हाथों में गति लाता है ।
मैं शैतान हूँ । अजर-अमर शैतान हूँ । जिसके साथ लोग इसलिये युद्ध करते हैं कि जीवित रह सकें । 
यदि वे युद्ध करना बन्द कर दें तो आलस्य उनके मस्तिष्क, ह्रदय और आत्मा के स्पन्दन को बन्द कर देगा और इस प्रकार उनकी अत्यधिक शक्ति के बीच अदभुत असुविधायें आ खङी होंगी ।  
मैं एक मूक और क्रुद्ध तूफ़ान हूँ, जो पुरुष के मस्तिष्क और नारी के ह्रदय को झकझोर डालता है । मुझसे भयभीत होकर वे मुझे दण्ड दिलाने हेतु मन्दिरों एवं धर्म-मठों को भागे जाते हैं अथवा मेरी प्रसन्नता के लिये बुरे स्थान में जाकर मेरी इच्छा के सम्मुख आत्म-समर्पण कर देते हैं ।
सन्यासी, जो रात की नीरवता में, मुझे अपनी शय्या से दूर रखने के लिये ईश्वर से प्रार्थना करता है, एक ऐसी वैश्या के समान है, जो मुझे अपने शयन-कक्ष में निमन्त्रित करती है ।
मैं शैतान हूँ अजर अमर !
भय की नीव पर खङे धर्म-मठों का मैं ही निर्माता हूँ । विषय-भोग तथा आनन्द की लालसा की नीव पर मैं ही मदिरालय और वैश्यालय का निर्माण करता हूँ ।
यदि मैं न रहूँ तो विश्व में भय और आनन्द का अन्त हो जायेगा और इनके लोप हो जाने से मनुष्य के ह्रदय में आशायें एवं आकांक्षायें भी न रहेंगी । तब जीवन नीरस, ठंडा और खोखला हो जायेगा । मानों टूटे हुये तारों का सितार हो ।
मैं अमर शैतान हूँ !
झूठ, अपयश, विश्वासघात, विडम्बना और वंचना के लिये मैं प्रोत्साहन हूँ । और इन तत्वों का यदि विश्व से बहिष्कार कर दिया जाये तो मानव समाज एक निर्जन क्षेत्र मात्र रह जायेगा । जिसमें धर्म के कांटों के अतिरिक्त कुछ न पनप सकेगा । 
मैं अमर शैतान हूँ !
मैं पाप का जन्मदाता हूँ और यदि पाप ही न रहेगा तो उसके साथ ही पाप से युद्ध करने वाले योद्धा अपने सम्पूर्ण गृह और परिवार सहित समाप्त हो जायेंगे ।
मैं पाप का ह्रदय हूँ, क्या तुम यह इच्छा कर सकोगे कि मेरे ह्रदय के स्पन्दन को थामकर तुम मनुष्य-मात्र की गति रोक दो ?
क्या तुम मूल को नष्ट कर उस परिणाम को स्वीकार कर पाओगे ? मैं ही तो मूल हूँ ।
क्या तुम अब भी मुझे इस निर्जन वन में मुझे इसी प्रकार मर जाने दोगे ? क्या तुम आज ही उस बन्धन को तोङ फ़ेंकना चाहते हो, जो मेरे और तुम्हारे बीच दृढ़ है, जबाब दो ऐ पुजारी !
यह कहकर शैतान ने बाँहें फ़ैला दी और सिर झुका लिया ।
तब वह जोर जोर से हाँफ़ने लगा । उसका चेहरा पीला पङ गया और वह मिस्र की उन मूर्तियों जैसा दीखने लगा, जो नील नदी के किनारे समय द्वारा ठुकराई पङी हैं ।
तब उसने अपनी बुझती आँखों को फ़ादर इस्मान के चेहरे पर गङा दिया ।
और लङखङाती आवाज में बोला - मैं थक गया हूँ और बहुत दुर्बल हो गया हूँ । अपनी मिटती आवाज में वे ही बातें बताकर, जिन्हें तुम स्वयं जानते हो, मैंने गलती की है । अब जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा कर सकते हो । तुम मुझे अपने घर ले जाकर मेरे घावों की चिकित्सा कर सकते हो अथवा मुझे मेरे हाल पर यहीं मरने को छोङ सकते हो ।  
फ़ादर इस्मान व्याकुल हो उठे और कांपते हुये अपने हाथों को मलने लगे ।
तब अपने स्वर में क्षमा-याचना भरकर वे बोले - एक घन्टा पूर्व, जो मैं नहीं जानता था, वह अब मुझे मालूम हुआ है । मेरी भूल को क्षमा करो । मैं अब जान गया हूँ कि तुम्हारा अस्तित्व संसार से प्रलोभन का जन्मदाता है और प्रलोभन ही एक ऐसी वस्तु है, जिसके द्वारा ईश्वर मनुष्यता का मोल आंकता है । यह एक माप-दण्ड है, जिससे सर्व-शक्तिमान ईश्वर आत्माओं को तौलता है ।
मुझे विश्वास हो गया है कि यदि तुम्हारी मृत्यु हो गयी तो प्रलोभन का भी अन्त हो जायेगा और इसके अन्त से मृत्यु उस आदर्श शक्ति को नष्ट कर देगी, जो मनुष्य को उन्नत एवं चौकस बनाती है ।
तुम्हें जीवित रहना होगा । यदि तुम मर गये और यह बात लोगों को ज्ञात हो गयी तो नरक के लिये उनके भय का अन्त हो जायेगा और वे पूजा अर्चना करना छोङ देंगे । क्योंकि पाप का तो अस्तित्व ही न रहेगा ।
तुम्हें अवश्य जीवित रहना होगा, क्योंकि तुम्हारे जीवन के ही अपराध और पाप में मनुष्य की मुक्ति का द्वार है ।
जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं, मनुष्यों के प्रति अपने प्रेम की स्मृति में, तुमसे जो घृणा करता हूँ, उसका त्याग करूँगा ।
इस पर शैतान ने एक विकट अट्टहास किया, जिसने प्रथ्वी को हिला दिया ।
और बोला - तुम कितने बुद्धिमान हो फ़ादर ! अध्यात्म-विद्या का कितना आश्चर्यमय ज्ञान तुम्हारे पास संचित है । अपने ज्ञान के द्वारा तुमने मेरे अस्तित्व का कारण ढ़ूँढ़ निकाला है, जिसे मैं स्वयं कभी न समझ पाया और अब हमें एक-दूसरे की आवश्यकता का ज्ञान हुआ है । 
मेरे भाई ! आओ मेरे निकट आओ । प्रथ्वी पर अंधकार फ़ैलता जा रहा है और मेरा आधा रक्त इस घाटी के उदर में समा चुका है, मानों अब मुझमें कुछ रहा ही नहीं । एक टूटे हुये शरीर के टुकङे भर हैं, जिन्हें यदि तुम्हारी सहायता प्राप्त न हुयी तो मृत्यु शीघ्र ही अपना कर ले जायेगी ।
फ़ादर इस्मान ने अपने कुरते की आस्तीनें ऊपर चढ़ा लीं और अपने घर की ओर चल पङे ।
उन घाटियों के बीच सन्नाटे में घिरे और घोर अन्धकार के आवरण से सुशोभित फ़ादर इस्मान अपने गांव की ओर चले जा रहे थे ।
उनकी कमर उनके ऊपर के बोझ से झुकी जा रही थी और उनकी काली पोशाक और लम्बी दाढ़ी पर से रक्त की धारा बह रही थी, किन्तु उनके कदम सतत आगे बढ़ते जा रहे थे और उनके होठ मृतप्रायः शैतान के जीवन के लिये ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे । 

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