14 अगस्त 2017

झट-पट..घूं-घट खोल

प्रत्येक बात के दो अर्थ होते हैं । 
एक सामान्य सांसारिक भावों का अर्थ और दूसरा गूढ़, गम्भीर, पहेलीनुमा अर्थ ।
पहुँचे हुये सन्तों की वांणियां ऐसे ही दो अर्थों वाली होती हैं ।

कबीर की वाणी देखिये -
कस्तूरी कुंडलि बसे, मिरग ढ़ूंढ़े वन माहि ।
ऐसे घट घट राम हैं, दुनियां देखे नाहिं ।

सामान्य अर्थ - 
- विशेष जाति का एक मृग जिसकी नाभि में कस्तूरी नामक दुर्लभ वस्तु पायी जाती है । वह मृग अपनी ही नाभि से उठती कस्तूरी की तीव्र गन्ध से व्याकुल उस गन्ध का स्रोत खोजने हेतु वन में दौङता है ।
(इस तरह शिकारियों को उसका आभास हो जाता है और वह उनके विशेष छल द्वारा मारा जाता है)
- इसी प्रकार ‘घट-घट’ (प्रत्येक शरीर में) राम हैं लेकिन संसारी उसे देखते/जानते नहीं ।
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गूढ़ अर्थ - 
- कस्तूरी का अर्थ हम यहाँ उस अतृप्त प्यास, अज्ञात तपन और अज्ञात की चाह से करते हैं जो समय मिलते ही हरेक को बैचेन करती है कि - वह खुद नहीं समझ पाता कि क्या चाह रहा है और उसकी समस्त आपाधापी और अशान्ति किस कारण से है ?
- कुंडल का अर्थ घेरेदार अर्थात नाभि से (बसे) है ।
- मिरग का अर्थ बङा रहस्यपूर्ण है । इसका रहस्य मृगतृष्णा शब्द और मायामृग में भी है ।
मृगतृष्णा मतलब वही, तपते मरुस्थल में प्यास से तङपते हुये मृग को जलते रेत पर शीतल पानी की लहरों की मरीचिका आभासती है ।
और वह बार बार धोखा होने के बाबजूद आगे और आगे चलता जाता है और अन्त में प्यास से बेदम होकर गिर जाता है ।
- मृग के लिये मैंने अक्सर हिन्दी विद्वानों की किताब में ‘हरिण’ शब्द लिखा देखा है जो ही मेरे हिसाब से अधिक उचित है लेकिन हरिण की जगह हिरण या हिरन कैसे कर हुआ, यह शोध का विषय है ।
- अधिक बारीकी में न जाते हुये हिरण शब्द के उदभव में मुझे हिरण्य शब्द कारण लगता है जो (सही अर्थों में) हिरण्यगर्भ यानी सूक्ष्म शरीर के लिये प्रयुक्त होता है
इस शब्द के भी गूढ़ार्थों में जायें तो मृग के भावार्थ लिये ये शब्द ठीक हो जायेगा लेकिन आंतरिक स्थितियों के साथ, जिसको नगण्य लोग समझ पाते हैं ।
- लेकिन हरिण शब्द स्थूल होकर काफ़ी हद तक सरल हो जाता है ।
हरि (स्वांस) और ण (स्थिति, स्थित) यानी सांस द्वारा स्थित ।
- अब ‘सांस द्वारा स्थित = हरिण’ नामक जानवर कैसे हुआ, इतनी बारीकी से इस ‘लेख’ में बताना संभव नहीं (और वैसे भी ऐसे लेख सामान्य लोगों के लिये न होकर शोधार्थियों के लिये होते हैं)
- ढ़ूंढ़े वन माहि का अर्थ सरल है, वन में खोज रहा है ।
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अब ‘आगे की लाइन’ के लिये सतर्क हो जाईये और गौर से समझिये ।
कबीर कह रहे हैं - ऐसे ? ठीक ऐसे ही घट (शरीर) में कुंडल (नाभि) में वह स्रोत है जहाँ से राम को जाया/पाया जा सकता है । 
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विशेष - यह तो अर्थ हुआ आगे समझिये ।
योग वर्णन में नाभि स्थान को ही ‘भवसागर’ कहा गया है और सुरति शब्द योग में इसे भवसागर के अतिरिक्त ‘महाकारण’ शरीर स्थिति कहा है ।
महाकारण का गहरा अर्थ समझिये ।
उस ‘कारण’ से पार की स्थिति जहाँ किसी ने जीवत्व धारण किया और इस भवसागर में भटक गया । और इसी में चाँद, सूरज, तारे, ब्रह्माण्ड आदि स्थित हैं ।
और एक स्थिति में वह स्थिति जब आत्मा से पंच महाभूत क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर उपजे । 
इस महाकारण के बाद तुरीया (अहं ब्रह्मास्मि) है । 
जो महाकारण में ‘अविचल स्थिति’ के बाद बहुत सरल बात रह जाती है ।
अब कबीर का इस दोहे को लेकर इशारा समझ में आ गया होगा ।
या नहीं आया ?
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ठीक यही बात निम्न दोहा कह रहा है ।
पानी में मीन प्यासी, मोहे सुन सुन आवत हांसी ।
अर्थात जो अज्ञात, अतृप्त प्यास है उसको तृप्ति देने का स्रोत स्वयं सागर तेरे पास है ।
तू उसके केन्द्र (नाभि) पर सुर्त लगा । सुरति लगा । सु-रति लगा । अपनी-चेष्टा लगा ।
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अब इस पद को देखिये -
काहे री नलिनी तूं कुमिलानी । तेरे ही नालि सरोवर पानीं ॥
- सांसारिक तपन से जलती हुयी (सु-रति) कमलिनी क्यों उस ‘अज्ञात प्यास’ से बैचेन है ।
तेरे ही (गर्भ) नाल कुंड (सरोवर) में वह ‘जल’ है ।

जल में उतपति जल में बास, जल में नलिनी तोर निवास ।
अब यहाँ इसके ‘जल में कमल के उत्पन्न होने’ के बजाय जो छुपा रूपक भाव है उसे देखें ।
इसी नाभि कुंड से तेरी उत्पति हुयी है और ‘सांसों के ठहराव’ से (अभी) यही तेरा वास है ।

ना तलि तपति न ऊपरि आगि, तोर हेतु कहु कासनि लागि ॥
- अपने स्वरूप को जानने पर ये नीचे स्थिति भवसागर भी और ऊपर (सर्वत्र) तेरे लिये शीतल है अर्थात तुझे कोई बन्धन (कासनि) नहीं ।

कहे ‘कबीर’ जे उदकि समान, ते नहिं मुए हमारे जान ।
- उदकि का अर्थ जल है और आपु या आप का भी ।
तब यहाँ नाभि (भवसागर) में जिसका ‘कारण’ खत्म हो गया, मिथ्या अहं नष्ट हो गया तो, क्योंकि वो उत्पन्न ही यहाँ से हुआ है । इसलिये स्वयं भवसागर रूप हो गया, सबमें स्वयं को ही देखने लगा ।
आपु ही आप हो गया ।

तो कबीर कहते हैं ।
विशेष गौर करिये - कबीर कहते हैं वे हमारी जानकारी में फ़िर मृत्यु को प्राप्त नहीं हुये अर्थात अमर हो गये - ते नहिं मुए हमारे जान ।

इस स्थिति पर भी कबीर के बहुत पद/दोहे हैं ।
पर निम्न को और देखिये ।

जल में कुंभ कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी ।
कुंभ, घट, घङा तीनों का एक ही अर्थ है और शरीर को घटोपाधि यानी घट उपाधि यानी (तत्व कच्चे होने के कारण) कच्चा घङा कहा गया है और इसकी स्थिति उसी भवसागर नाभि से हुयी है ।
घङे के अन्दर बाहर जल ही जल है ।

फ़ूटा कुंभ जल जलहि समाना, येहि गति बिरले जानी ।
जिस अहं रूपी कारण से यह कुंभ उत्पन्न हुआ । उसके नष्ट होने पर यह ‘आप ही आप’ हो जायेगा ।
लेकिन इस गति को बिरले ही प्राप्त करते हैं ।
क्योंकि अन्य कहीं न कहीं घट (शरीर), पट (माया), भव (कुछ होने की इच्छा) से बंधे हैं ।
और इसी भवसागर की (मन रूपी) भंवर में घूमते रहते हैं ।
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ब्लाग की पाठिका सुनीता यादव ने निम्न दोहे का अर्थ जानना चाहा है ।
जो बेहद सरल है ।
आप बुद्धि लगाईये और इसका अर्थ टिप्पणी में लिखिये ।

ज्ञान कर ज्ञान कर, ज्ञान का गेंद कर ।
सुर्त का डंड कर, खेल चौगान मैदान माहि । 

खलक की भरमना, छोड़ दे बालका ।
आजा भगवंत भेष माहि । 

09 अगस्त 2017

महाविनाश

केवल सूचना और भाव साझा करने हेतु !
कोई आग्रह नहीं कि सच मानें ।

कुछ मुख्य संकेत -
1 - उत्तरी अटलांटिक में भूस्खलन जैसी स्थिति में विशाल हिमखंडों के धंसने की घटना होगी ।
यह प्राकृतिक हो या मानवीय ज्ञात नही ।
(निश्चय नहीं पर) इसका प्रभाव चीन, नार्वे, स्पेन पर होगा ।
2 - (प्रशांत ?) महासागर में तीन बङे टापू समुद्र में समा जायेंगे ।
साफ़ है कि जल स्तर बढ़ेगा और निचले और करीबी देश डूबेंगे ।
3 - बङी घटनाओं में एक विशालकाय ज्वालामुखी फ़टेगा ।
यह इटली में होगा ।
4 भारत के 3 खण्ड, अमेरिका के 10 और चीन, पाकिस्तान समूचा तबाह ।
(हालांकि इसमें कुछ और भी छोटे देश हैं पर वे उल्लेखनीय नहीं)
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ऐसे में जबकि हर तरफ़ युद्ध की संभावनाओं, कारणों, भूमिकाओं और परिणाम पर मंथन, चर्चायें जारी हैं ।
कुछ ऐसे तथ्य जिन पर ध्यान रखना है ।
कुत्ते - कुत्ते अशुभ घटनाओं, काली आत्माओं और भावी विनाश को सूंघने की अदभुत क्षमता रखते हैं । इनके व्यवहार पर नजर रखेंगे तो पायेंगे कि कुत्तों का व्यवहार (पिछले बहुत दिनों से) बदल गया है । वे रात को (सामान्यतः) सामूहिक भौंकते नहीं और शान्त, उदासीन हो चले हैं ।
अगर जानवरों को देखते रहते हैं तो गौर करना, उनका व्यवहार बदला है ।
चूहे - चूहे भी अकाल, अशुभ, महामारी की सटीक सूचना देते हैं । यदि चूहे आपके आसपास अनुभव में आते हैं तो ध्यान देना ।
कीट पतंगे - अगर हर चीज पर निगाह रहती है तो इन पर भी गौर करना, पहले जैसी बात नहीं होगी ।
गैर पालतू वन्य और अन्य जीव - ये अपनी प्रकृति के अनुसार ऊँचे वृक्षों या पहाङी, गुहाओं की तरफ़ जाने लगे हैं ।
स्वपन - आपके स्वपनों या मानसिक स्थिति में (लेकिन बाह्य पढ़े, सुने आधार पर नही) पहले की तुलना में बदलाव हुआ है ।
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शायद ही लोग इस रहस्य को जानते होंगे कि किसी बङे शुभ या अशुभ परिवर्तन पर ग्रह, नक्षत्र अपना स्थान पाला या दो चार पाला भी कूद जाने की तर्ज पर बदल लेते हैं ।
यह बात शाम (22-7-2017) आठ बजे घटित हुयी है ।
ऐसा खगोलीय इतिहास में अनेकों बार हुआ है ।
धार्मिक इतिहास में ‘राम जन्म’ इसका उदाहरण है ।
- लेकिन यह बात सिर्फ़ गणना आधार पर नक्षत्र स्थिति जानने वाले ज्योतिषी नही जान सकते ।
ये सिर्फ़ खगोलविद परख सकते हैं ।
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नासा वैज्ञानिकों के मुताबिक दिसंबर 2017 में बड़े खगोलीय परिवर्तन होंगे, जिसका असर धरती के कई हिस्‍सों पर पड़ेगा और इन इलाकों में उत्तरी बिहार भी शामिल है ।
पटना मोतीहारी के स्कूल टीचर उमेश प्रसाद वर्मा - दिसंबर 2017 में उत्तरी बिहार में भूकंप से ऐसी तबाही होगी जिसकी भरपाई करना मुश्किल होगा ।
(उमेश जी की कई भविष्यवाणियां सटीक हुयीं)
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और ये
Kaalsutrabhishekam द्वारा

आज 9 अगस्त है ।
पिछले 2 वर्षों से सितंबर 2017 तक होने वाले जिस विनाश की बात करता आ रहा हूँ ।
उसमें 2 माह भी शेष नहीं बचे हैं ।
मात्र 2 माह के अंदर प्राकृतिक एवं अप्राकृतिक रूप में महाविनाश होगा ।
जिसमें लाखों, करोड़ों लोगों की जिंदगी संकट में पड़ जाएगी ।
प्राकृतिक रूप में भूकंप, बाढ़, भूस्खलन, ज्वालामुखी विस्फोट, सुनामी इत्यादि आते हैं ।
एवं अप्राकृतिक रूप में युद्ध ।
मैंने अपने पोस्ट एवं पुस्तक में सितंबर 2017 तक विनाश का प्रथम चक्र
एवं मार्च 2018 तक महाविनाश के अंतिम चक्र का जिक्र किया है ।
अन्य देशों में प्राकृतिक रूप एवं तृतीय विश्वयुद्ध से जो विनाश होगा सो तो होगा ही,
हमारे देश के 36.40 डिग्री से 43.20 डिग्री तक महाविनाश होगा ।
इन डिग्री में भारत, पाकिस्तान, चाइना, नेपाल एवम कुछ छोटे पड़ोसी देश भी आते हैं ।
36.40 डिग्री से 43.20 डिग्री का जिक्र भी पिछले 2 वर्षों से करता आ रहा हूँ ।
मेरे गणित के अनुसार तो फरवरी 2017 से ही तृतीय विश्वयुद्ध आरम्भ हो चुका है,
6 जून 2017 से समय और भी विपरीत हुआ है ।
वर्तमान में तृतीय विश्वयुद्ध का अब विकराल रूप लेना शेष है ।
जो सितंबर 2017 के अंदर देखने को मिल ही जायेगा ।
आज से कुछ माह पूर्व मैंने लिखा था कि
Donald trump will be last President of US.
इसका आशय यह है कि United State कई भागों में विभक्त हो जाएगा ।
परमात्मा से प्रार्थना करे धरती में आने वाली यह संकट टल जाए,
और अगर घटना घटित होती भी है तो नुकसान कम से कम हो ।

15 जुलाई 2017

तिब्बत 125 वर्ष पूर्व

मुझे याद है, आगरा में हमारे परिचित के यहाँ 10-12 गोरे (अंग्रेज) लोग मेहमान हुये थे ।
वे लगभग एक सप्ताह रहे ।
गृह स्वामिनी ने देखा कि वे शौच में जल के बजाय सिर्फ़ टिशू पेपर उपयोग करते हैं और प्रायः शौच के बाद हाथ नही धोते ।
उनको गोरों की एक सप्ताह की मेजबानी बेहद अखरी ।
और खास उनके जाते ही गृह स्वामिनी ने उनके द्वारा इस्तेमाल किये सभी चाय, भोजन आदि के बर्तन और छोटे मोटे अन्य सामान फ़ेंकवा दिये ।
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हिन्दुस्तानी भी !
ऐसे लोग तो अब भी अनेक हैं जो शौच के बाद साबुन या मिट्टी से हाथ नही धोते । सिर्फ़ सादा पानी से हाथ धो लेते हैं ।
हैरानी होती है परन्तु अब भी अक्सर ऐसे लोग मिल जाते हैं जो शौच के बाद शरीर ‘स्थान’ साफ़ नहीं करते ।
और ऐसे लोगों का प्रतिशत तो कही अधिक है जो (देहात क्षेत्र में) शौच उपरान्त मिट्टी से साफ़ करके सफ़ाई मान लेते हैं ।
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बौद्ध मतालम्बी जापानी ‘इकाई कावागुची’ की लगभग 125 वर्ष पूर्व की गयी ‘तिब्बत यात्रा’ तत्कालीन समय का रोचक दस्तावेज है ।

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तिब्बत के लोग बङे ही गन्दे होते हैं ।
जिस घर में मैं टिका हुआ था उसमें प्रायः बीस नौकर थे ।
वे लोग नित्य मेरे लिये चाय लाया करते थे ।
वे प्याले कभी न धोते थे ।
यदि मैं उनसे कहता कि प्याला गन्दा है तो वे उत्तर देते - कल ही रात को आपने ही तो चाय पी है ?
वे लोग प्याले को मैला तभी समझते थे जब उसमें कोई नीचे दर्जे का मनुष्य चाय पी लेता है ।
पर स्वयं अथवा बराबर दर्जे वालों के प्रयुक्त पात्र को वे झूठा नही मानते चाहे वह कितना ही गन्दा क्यों न हो ।
यदि मैं नौकर से प्याला धो लाने के लिये कहता तो वह उसे अपनी आस्तीन से पोंछ देता ।
आस्तीन इसी तरह के प्रयोग से एकदम काला हो गया था ।
वे इस तरह साफ़ कर उसमें चाय डाल देते थे ।
ऐसे गन्दे प्याले में कोई वस्तु पीना असम्भव था ।
पर मैं सफ़ाई की तरफ़ इतना जोर इस कारण नहीं दे सकता था कि सम्भव था मेरा भेद खुल जाय ।
बर्तनों का न धोना इतना गन्दा नही है जितना शौच आदि के बाद गुप्त स्थान का न धोना है ।
यह हालत बङे बङे लामाओं से लेकर छोटे छोटे चरवाहों तक की है ।
मुझे शौच के समय जल का प्रयोग करते देखकर बङे और छोटे सबों ने मेरा परिहास किया । इसके लिये मैं लाचार था ।
उनके यही काम गन्दे नही होते थे कि वे अपने शरीर को नही धोते ।
कितनों ने तो पैदायश के बाद से कभी भी शरीर को नहीं धोया है ।
आपको इस बात से आश्चर्य होगा ।
देहात के लोग और अधिकांश शहर के लोग भी इस बात का अभिमान करते हैं कि उन्होंने अपना बदन कभी साफ़ नही किया है ।
यदि कोई अपना हाथ भी धोये तो उसका परिहास किया जाता है ।
अतएव शरीर भर में हथेली और आँखों में ही मैल दिखाई नहीं देती अन्यथा सम्पूर्ण शरीर मैल से काला हो जाता है ।
शहर के रहने वाले सभ्य पुरुष और पुरोहित लोग कभी कभी अपने मुख और हाथों को धो डालते हैं ।
शेष शरीर ज्यों का त्यों काला बना रहता है ।
उनकी गर्दन और पीठ इत्यादि वैसी ही काली हो जाती है जैसी अफ़्रीका के हब्शियों की है ।
पर उनके हाथ उजले क्यों रहते हैं ?
इसका कारण है कि आटा गूंधते समय हाथों का मैल आटे में चला जाता है । अतएव उनके भोजन में आटा और मैल मिली रहती है ।
पर ऐसी घृणित व्यवस्था वे क्यों रखते हैं ?
उन लोगों में मिथ्या विश्वास है कि यदि वे अपने शरीर को धोयें तो उनका सौभाग्य धुल जायेगा ।
पर यह बात मध्य तिब्बत में नही है ।
सगाई होने के समय केवल बहू का मुख देखने ही से काम नही चलता है । 
यह भी देखना पङता है कि उसके शरीर पर कितनी मैल जमी है ।
यदि उसकी आँखों के अतिरिक्त अन्य सब अंग गन्दे हैं और उसके वस्त्र मैल और मक्खन के कारण चमक रहे हैं तो वह बङी भाग्यशाली बहू है अन्यथा बङी अभागिन है ।
क्योंकि सफ़ाई करने में उसका भाग्य धुल गया ।
लङकियां भी इसी मूढ़ विश्वास को मानती हैं ।
वे भी ऐसे स्वामी को चाहती हैं जो अधिक से अधिक मैल शरीर पर चढ़ाये हो ।
मैं जानता हूँ कि मेरी बात पर सहसा लोग विश्वास न करेंगे और जब तक मैंने अपनी आँखों से न देखा था तब तक मेरी भी यही दशा थी ।
नीचे दर्जे के लोग कपङे नही बदलते । नाक कपङों में ही साफ़ करते हैं । 
कपङों के ऊपर मैल और मक्खन जम कर चमढ़े की भांति कङा हो जाता है ।
(पूर्व तिब्बत में चाय में मक्खन डालकर पीने का जबरदस्त रिवाज था और यह अमीरी का प्रतीक भी था)

पर ऊँचे दर्जे के मनुष्य और पुरोहित हाथ मुँह भी धोते हैं और कपङे भी साफ़ रखते हैं ।
इन घृणित रीतियों के कारण किसी के यहाँ का निमन्त्रण स्वीकार करते समय मुझे बङा कलेश होता था ।
तसरंग में रहकर मैंने ऐसी आदतें डालने की चेष्टा की थी पर फ़िर भी अपने चित्त को पूर्णतया वैसा नही बना सका था ।
इन सब बातों के होते हुये भी वहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य देखकर मुग्ध हो जाता था ।

तिब्बत के रीति रिवाज
(तेतालीसवां परिच्छेद)
प्रष्ठ - 172
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पुस्तक - तिब्बत में तीन वर्ष pdf
लेखक (जापानी यात्री) श्री इकाई कावागुची 
अनुवादक - पण्डित गुलजारी लाल चतुर्वेदी
समय - मैंने मई सन 1897 में अपनी उस यात्रा की तैयारी की जिसमें केवल प्राणघातक घटनाओं की संभावना थी ।
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पुस्तक - तिब्बत में तीन वर्ष pdf
http://www.new.dli.ernet.in/handle/2015/287156?show=full

04 जुलाई 2017

2 या अनेक परमात्मा

बहुत सी बातें बताना उचित नहीं होती या कहिये, उनका कुछ लाभ नहीं होता ।
जैसा कि अधिकांश लोग मुझे (मेरे कथन आधारों पर) किसी दूसरी दुनियाँ का समझते हैं ।
मुझे सामान्यतः लगता है वे सत्य हैं परन्तु आंशिक ही ।
क्योंकि उससे ज्यादा सोचना ‘बुद्धिक परिभाषा, और लक्षण, और क्षमता’ के अंतर्गत संभव नही ।
ऐसा क्यों ?
इस सृष्टि का सर्वोच्च (जो भी ‘वह’ है) और बौद्धिक शब्द और उसमें निहित उपाधि ‘परमात्मा’ है ।
अब इस ‘हौआ’ बन चुके शब्द के निहितार्थ को सरलता से समझें ।
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परमात्मा - न आदि है, न अन्त है । न है, न नही है । अजर, अमर, अविनाशी आदि आदि है ।
ये इस शब्द के निहितार्थ प्रमुख अवयव या गुण-धर्म हैं ।
और इससे ऊपर या परे जैसे सोचने पर भी Stop है ।
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अब इसे उपर लिखित वही ‘निश्चित वैचारिक क्षमता’ या ‘अधिकाधिक ज्ञान सामर्थ्य’ के अन्दर स्वीकार लें तो ठीक है अन्यथा यहाँ ‘प्रज्ञा’ आदि शब्द देकर औपचारिकता सी हो जाती है एक तसल्ली सी ही हो जाती है लेकिन प्रज्ञा भी कहते किसको हैं उसका अनुभव क्या कैसा है ?
ये अधिकांश के लिये हवा हवाई ख्याल ही हैं ।
तब वहाँ ‘बुद्धि’ ‘प्रज्ञा’ या जिससे जाना जा रहा है, अनुभव हो रहा है वो क्या है, कैसा है ।
इसके लिये सर्वाधिक समर्थ संस्कृत या हिन्दी भाषा में भी शब्द नहीं मिलता ।
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यदाकदा सन्त परिभाषा में आने वाले इक्का दुक्का लोग जो अनन्त गहराई (या दूसरे भावों में ऊँचाई) में गये हैं ।
उनका मानना है - यहाँ की परिभाषा, गुण धर्म, वर्णन आदि हेतु सांसारिक शब्द काम नहीं करते ।
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वास्तव में परमात्मा को लेकर जो भी ‘सार निष्कर्ष’ कहे गये ।
वे कृतिम हैं या फ़िर वही बात, उसी ‘सीमित क्षमता’ के अन्दर कहे हैं ।
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अब थोङा विशेष गौर करें - ये क्यों कहा गया कि परमात्मा का न आदि है, न अन्त है ।
कहने वाले को कैसे पता कि उसकी कभी शुरूआत या जन्म नहीं हुआ और वह किस आधार पर निश्चित है कि उसका कभी अन्त नही होगा ?
इसी में अमर (मृत्यु न होना) अविनाशी (नष्ट न होना) भी कहा जा सकता है ।
विशेष गहराई से समझें - सच बात तो यह है कि स्वयं, जिसको परमात्मा आदि कहा जाता है,
उसे ही अब तक नहीं पता कि वो कौन है, क्या है, क्यों है और कब तक है ?
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अब पहले तो परमात्मा के प्रति ‘दो प्रमुख स्थितियों’ को समझें ।
इसमें से एक को अनुभूत कर चुके महाज्ञानी जानते हैं ।
और दूसरे उनके ही वर्णन आधार पर बनी अनेकों धारणाओं का चूरमा बनाकर बनायी हुयी एक मोटी और ‘कामन’ धारणा है ।

जो सामान्यतः बिलकुल नाजानकार से लेकर, कुछ कुछ छोटे मोटे अनुभवी जानते/मानते हैं ।
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यद्यपि (मेरी नहीं बल्कि अब तक उपलब्ध और सटीक) शब्द असामर्थ्य को लेकर यह कठिन ही है फ़िर भी समझाने की कोशिश करता हूँ ।
स्थितिप्रज्ञता और उसके वर्णन आधार पर निर्मित काल्पनिक धारणाओं के आधार पर
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परमात्मा आखिर कहते किसे हैं ?
1 - अब तक अनुभूत और सर्वोच्च स्थिति ‘विस्माध’ है ।
विस्माध के सरल वर्णन में कहा जाता है - तब जब वह ‘आप ही आप’ है ।
बल्कि उससे भी परे । अकथनीय ! अवर्णनीय !
अब इसके लिये समाधि, परम समाधि जैसे शाब्दिक अन्य अन्य अलंकार चाहे जितने बना लें ।
अनुभवी ज्ञानी ‘इसको’ ही परमात्मा कहते हैं ।
विशेष - इसे (जो ये है) किसी से कोई मतलब नहीं, न इसकी कोई सृष्टि है, न ये किसी का कोई नियन्ता है । मूलतः ये समझें, इसे किसी से कुछ लेना देना नही ।
2 - लेकिन परमात्म तत्व को सिर्फ़ प्रारम्भिक और बेहद सीमित स्तर पर जानने/अनुभूत करने वाले इससे भी 2-3 स्थित बाद (नीचे की ओर) को परमात्मा कहते हैं ।
जो दरअसल पहला और मूल अंतःकरण (जिसे ‘आदि-निरंजन’ नाम से कहा गया) है और जिसने पूरी सृष्टि को धीरे धीरे, कई चरणों में, कई बार बना बिगाङ कर, सुधार कर रचा है ।
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कबीर के अतिरिक्त इस ‘परमात्मा 2’ से आगे/अलग बढ़ने की धृष्टता किसी ने नहीं की ।
और कबीर ने भी ‘विस्माध’ ‘हंस’ या ‘आप ही आप’ के बाद बात खत्म कर दी ।
# मैं निश्चित नहीं कि कबीर इससे परे/अतिरिक्त भी जानते थे ।
सन्त-मत में ‘अकह’ को अन्तिम स्थिति कहा है पर सच कहा जाये तो ‘अनन्त’ की यहाँ से शुरूआत होती है ।
अकह को सिर्फ़ एक ही (सामान्य) भाव में कहा गया है । अनन्त के प्रति इसको छुआ भी नही गया । क्योंकि उसके कहे जाने का भी कोई अर्थ नहीं, जो इस ‘सामान्य अकह’ (पर) तक आ जाता है ।
उसे किसी की आवश्यकता नहीं, वह स्वयं है ।
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यद्यपि एक उल्लेखनीय जिक्र करना चाहूँगा कि कबीर मतालम्बियों में ‘सतलोक’ ‘चौथा लोक’ और उसके अधिपति ‘सतपुरुष’ का बङे जोर शोर से और ‘अन्तिम स्थिति’ जैसी घोषणा करता हुआ सिद्धांत आता है ।
पर कबीर ने कहा है - एक बार मेरे अन्दर ये विचार उठा कि सतलोक से आगे क्या है ?
मैं आगे गया और उसी तरह एक के बाद एक अनेक सतलोक आते गये ।
जैसे प्रथ्वी पर ‘अन्तिम क्षितिज को पाना’
और जैसे अनेक सतलोक थे उसी प्रकार उतने ही सतपुरुष भी थे ।
यहाँ एक गूढ़ बात विशेष ध्यान रखना कि - कबीर एक ही थे ।
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इस लेख के द्वारा मैं वह कहना चाहता हूँ जो (मेरी जानकारी में तो) आज तक नहीं कहा गया ।
#आत्म तत्व, परमात्म या जो भी वह है (ध्यान रहे, जो शोध के एकदम करीब पहुँचें उन्होंने) ‘इसे’ आत्मा, परमात्मा जैसे शब्द नहीं दिये । क्योंकि ये शब्द अपने अर्थ को लेकर ‘उस सत्य’ को समझाने में समर्थ नहीं थे और आजकल तो उतना भी प्रभावित नहीं रहे ।
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बात यह है कि वह इतना ‘सूक्ष्म तत्व’ है कि (कितना है ?) इसको लेकर फ़िर वही व्यक्त न कर पाने की असमर्थता ही है । और ‘यहाँ’ पहुँचकर कभी एक विलक्षण अचलता, या फ़िर अन्य मुख्य स्थिति में एक सर्व-व्यापी प्रवाह महसूस होता है ।
अब यहाँ गौर करना, अचलता में भी वह गतिहीन है निस्पन्द है और दूसरी स्थिति में जो सर्व-व्यापी प्रवाह महसूस होता है । वो भी उसी अचल स्थिति में और उसी में, उसी के अन्दर ही महसूस होता है ।
इस समय, जैसे तीव्र वेग से बहती मोटी धारा में हाथ या पैर डालने पर जैसा ‘बल’ अनुभव होता है । ठीक वैसा ही बल अनुभव होता है ।
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अब जो लेख का मुख्य बिन्दु है !
जब वह ‘मूलतत्व’ इतना सूक्ष्म और अचल है (इसमें जो विराट अनुभव होता है उसको किसी led जैसे छोटे बल्ब से निकलती प्रकाश किरणें, बनते दायरे से समझें, यही निरति कही गयी है) और उसमें से उठती निरति और सुरति इतने में ही यह सृष्टि है ।
यहाँ रैदास, कबीर आदि के उन कथनों पर ध्यान दें ।
जिसमें उन्होंने सृष्टि स्थिति को ‘गूलर फ़ल’ वट बीज के समान कहा है ।
फ़िर से ध्यान कर लें, अभी तक अन्तिम और निर्णायक तौर पर इसे ‘अचल’ कहा गया है ।
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तब बहुत संभव है कि इससे परे करोङों, अरबों बल्कि असंख्य और असंख्य प्रकार के सार-तत्व और सृष्टियां हो सकती हैं बल्कि इस सारतत्व का भी नियन्ता, जन्मदाता या अन्य कुछ हो सकता है ।
इस दृश्य को और सरलता से समझने हेतु काली रात के गहन काले आसमान में चमकते असंख्य तारों को देखिये और जानिये कि ये स्थिर, अचल हैं ।
लेकिन इन्हीं में प्रत्येक में एक ऐसी ही सृष्टि समाई हुयी है जैसी हमारे अनुभव में आ रही है ।
अब इन्हीं असंख्य तारों को, एक एक को उसी ‘सार-तत्व’ को जानो । परमात्मा मानो ।
तब ये तारे आपस में सिर्फ़ सौ फ़ुट दूर या एक फ़ुट या छह इंच या एक इंच पर भी हों ।
तो भी हमें उनके बारे में पता नही है कि कितने परमात्मा हैं या हो सकते हैं ?
# इस समय मैं इसी खोज अभियान पर हूँ ।
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अगर लेख में कही बात आप ग्रहण कर सके तो एक ‘अजीब सा’ झटका लग सकता है ।
बस एक बात पर आपको ये लेख एकदम आधारहीन, निरर्थक लग सकता है कि - सृष्टि तो अरबों वर्ष से है, इस तत्व का न आदि है न अन्त है, जीव अविनाशी है, अमर अजर आदि है ।
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ये सब किताबी और किस्साई बातें हैं ।
ये यदि सच हैं तो इसी रचना के अंतर्गत, रचना से बाहर नहीं ।
और ‘समय’ ?
समय की कृतिमता, जोन के अनुसार मानक के घटाव बढ़ाव, अन्य अन्य अनेक भूमिकाई रूपान्तरण तो सन्तों के ही अनुभव में प्रायः आते रहे ।
और अब तो प्रमुख वैज्ञानिक भी स्वीकार करने लगे ।
यानी ‘यथार्थ’ रूप में समय जैसा कुछ है ही नहीं, बल्कि ये अनुभव रूप व्यंजन है ।
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अन्त में माथापच्ची
समाधि, साक्षात्कार, साक्षी, द्वैत, अद्वैत आदि जिनको खोजने हेतु सब व्यग्र हैं ।
ये सब इकठ्ठे कहाँ पाये जाते हैं ?
(अर्थात कुछ ऐसा जानना, युक्ति हो, जिससे सब एक साथ पकङ में आ जायें)
उत्तर - ?

17 जून 2017

ब्रह्मरूपी स्थिति ही भक्ति

ज्ञान और भक्ति
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम ॥ (गीता 18-54)
टीका - सन्त श्री ज्ञानेश्वर जी
ब्रह्म होने की योग्यता के द्वारा वह पुरुष आत्मज्ञान-प्रसन्नता के पद पर जा बैठता है ।
(जिस अग्नि पर रसोई तैयार की जाती है वह जब शान्त हो जाती है तब रसोई का आनन्द लिया जाता है अथवा शरत-काल में ज्वार-भाटा छोङ जैसे गंगा शान्त हो जाती है, अथवा गीत समाप्त होते ही उसके उपांग तबला, तम्बूरा इत्यादि भी जैसे बन्द हो जाते हैं, वैसे ही आत्मज्ञान के लिये उद्यम करने के जो श्रम होते हैं, वे भी जहाँ शान्त हो जाते हैं)
उस दशा का नाम आत्मज्ञान-प्रसन्नता है ।
(वह योग्य पुरुष उस दशा का उपभोग करता है)
उस समय ‘यह वस्तु मेरी है’ ऐसा समझकर सोच करना अथवा किसी वस्तु की प्राप्ति की इच्छा करना आदि बातों का अन्त हो जाता है ।
उसमें केवल ‘ऐक्यभाव’ भरा हुआ रहता है ।
सूर्य का उदय होते ही सम्पूर्ण नक्षत्र जैसे अपनी दीप्ति खो देते हैं, वैसे ही आत्मानुभव प्राप्त होते ही वह पुरुष अनेक भूत व्यक्तियों की रचना ताङते तोङते सब आकाशरूप ही देखता है । जैसे पाटी पर लिखे हुये अक्षर हाथ से पोंछ लिये जायें, वैसे ही उसकी दृष्टि से सब भेदान्तरों का लोप हो जाता है । जागृति और स्वप्न ये दो अवस्थायें जो विपरीत ज्ञान का ग्रहण करती हैं उन्हें वह सुषप्तिरूपी अज्ञान में लीन कर देता है । फ़िर ज्यों ज्यों ज्ञान बढ़ता है त्यों त्यों वह अव्यक्त भी घटता जाता है और पूर्ण ज्ञान होते ही सम्पूर्ण विलीन हो जाता है ।
जैसे भोजन करते समय भूख धीरे धीरे बुझती जाती है और तृप्ति के समय सम्पूर्ण शान्त हो जाती है, अथवा चलते चलते जैसे रास्ता कटता जाता है और इष्ट स्थान को पहुँचते ही समाप्त हो जाता है, अथवा ज्यों ज्यों जागृति आती जाती है त्यों त्यों नींद छूटती जाती है और पूर्ण जागृत होने पर उसका पता नहीं रहता, अथवा वृद्धि समाप्त होने पर जब चन्द्र पूर्णता प्राप्त कर लेता है तो शुक्ल पक्ष की भी निःशेष समाप्त हो जाता है, वैसे ही वह पुरुष जब ज्ञेय विषयों को लीन कर लेता है तो ज्ञान का नाश हो जाता है, तब कल्पान्त के समय जैसे नदी या समुद्र की सीमा टूट जाने से ब्रह्मलोक तक जल ही जल भर जाता है, अथवा घट या मठ का नाश होने पर जैसे एक आकाश ही सर्वत्र रहता है, अथवा लकङी जलाकर जैसे अग्नि ही रह जाती है, अथवा जैसे अलंकारों को सांचे में डालकर गलाने से उनके नाम और रूपों का नाश हो सोना ही रह जाता है, यह भी रहने दो, फ़िर जागने पर जैसे स्वपन का नाश हो जाता है और मनुष्य केवल एक मेरे अतिरिक्त स्वयं अपने समेत और कुछ भी नही रहता ।
इस प्रकार वह मेरी चौथी भक्ति प्राप्त करता है ।
दूसरे आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी जिन रीतियों से मेरी भक्ति करते हैं उनकी अपेक्षा से हम इसे चौथी भक्ति कहते हैं ।
अन्यथा यह न तीसरी है, न पहली है, न अन्तिम है ।
वास्तव में मेरी ब्रह्मरूपी स्थिति का ही नाम भक्ति है ।
जो मेरे अज्ञान को प्रकाशित कर, मुझे अन्य रूप से दिखाकर, सबको सब विषयों की रुचि लगाकर उनका ज्ञान करा देता है, जिस अखंड प्रकाश से जो जहाँ जिस वस्तु को देखना चाहे वह वस्तु उसे वहाँ वैसी ही दिखाई देती है ।
स्वपन का दिखाई देना, न देना, जैसे अपने अस्तित्व पर निर्भर है, वैसे ही प्रकाश से ही विश्व की उत्पत्ति या लय होता है, वह मेरा जो स्वाभाविक प्रकाश है उसी को भक्त कहते हैं ।

अतः आर्तों में यह भक्ति इच्छारूप हो जो वस्तु की अपेक्षा करती हो, वह मैं ही हूँ ।
जिज्ञासु में भी यही भक्ति जिज्ञासा रूप हो मुझे जिज्ञास्य रूप से प्रकट करती है और यही भक्ति अर्थप्राप्ति की इच्छा बन मानो मुझे ही अपनी प्राप्ति के पीछे लगा मुझे अर्थ नाम का पात्र बनाती है, एवं यदि मेरी भक्ति अज्ञान के साथ हो तो वह मुझ सर्वसाक्षी को अदृश्य रूप से बताती है ।
दर्पण में मुख से ही मुख दिखाई देता है, इसमें कुछ सन्देह नहीं ।
परन्तु यह जो मिथ्या द्वितीयत्व है उसका हेतु दर्पण है ।
दृष्टि वास्तव में चन्द्रमा का ही ग्रहण करती है पर एक चन्द्र के जो दो रूप दिखाई देते हैं वह नेत्र रोग के कारण ।
वैसे ही वास्तव में मैं ही सर्वत्र निज को ही देखता हूँ ।
परन्तु जो मिथ्या दृश्य पदार्थ दिखाई देते हैं वह अज्ञान का कारण है ।
वह अज्ञान उस चौथे भक्ति का मिट जाता है, और प्रतिबिम्ब जैसे बिम्ब में मिल जाय, वैसे ही मेरी साक्षिरूपता मुझमें ही समा जाती है ।
सोना जब मिश्रित स्थिति में रहता है तब भी सोना ही रहता है, परन्तु मिश्रण अलगाने पर जैसे वह शुद्ध रूप से शेष रहता है ।
पूर्णमासी के पहले चन्द्रमा क्या सावयव नही रहता, परन्तु जैसे उस दिन उसकी पूर्णता उससे आ मिलती है ।
वैसे ही दिखाई तो मैं ही देता हूँ पर अज्ञान के कारण दृश्य रूप से और भिन्न दिखाई देता हूँ और दृष्टात्व विलीन होने पर मुझे ही अपनी प्राप्ति हो जाती है ।

अतएव, दृष्टिपथ के परे जो मेरा भक्तियोग है उसे मैंने चौथा कहा है । 

13 जून 2017

अनमोल ज्ञान सूत्र

चाह चमारी चूहरी, अति नीचन की नीच ।
मैं तो पूरण ब्रह्म था, जो तू न होती बीच ।
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राजीव बाबा, मेरे एक मित्र का प्रश्न है ।
क्या सशरीर चित्त के पार हुआ जा सकता है ? कृपया समाधान करें ।

उत्तर - प्रश्न उलझाव पैदा करता है ।
ऐसे प्रश्न सम्बन्धित साहित्य के अध्ययन के बाद, अनजाने निर्मित हुयी काल्पनिक धारणाओं से उपजते हैं । दूसरे, यदि प्रश्न अपने सभी बिन्दुओं को लेकर अपने सभी आशय को लेकर स्पष्ट न हो तो निराकरण और भी मुश्किल हो जाता है ।
पर फ़िर भी यहाँ ‘सशरीर’ शब्द मुझे इसी बाह्य, दर्शनीय, स्थूल शरीर के लिये प्रयुक्त लगा ।

- सशरीर चित्त के पार से क्या आशय है ?
कोई भी स्वयं और अन्य सब कुछ भी, स्वयं चित्त में ही (मन के द्वारा मन में ही) स्थित है ।
चित्त के पार क्या है ?
अगर ‘मूल स्थिति’ की बात की जाये तो फ़िर चित्त के पार कुछ है ही नहीं ।
जो है, वह सिर्फ़ आपका होना भर है ।
और बारीकी से कहा जाये तो फ़िर वह जो है - है ।
वहाँ होना जैसा भी कुछ नहीं है ।
होना शुरू होते ही चित्त भी हो जाता है ।
मन बुद्धि चित्त अहम, ये मिल जुल कर इतनी तेजी से क्रियान्वित होते हैं कि तय होना मुश्किल है कि ये किस कृमानुसार सक्रिय हुये । फ़िर भी किसी भी इच्छा के उदय होते ही चित्त बनता है ।
या स्थूल जीव में प्रथम चित्त जाता है ।
क्योंकि किसी भी हलन चलन हेतु भूमि और दूसरे अन्य अंगों की आवश्यकता होगी ।

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पुस्तक - अनमोल ज्ञान सूत्र pdf
लेखक - राजीव कुलश्रेष्ठ
विषय - आत्मज्ञान, सुरति शब्द योग
मूल्य - 150 रु.
प्रष्ठ - 157

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22 मई 2017

अनुराग सागर मुफ़्त डाउनलोड

संसार में जितनी भी पूजा और ज्ञान प्रचलित है, ये ज्यादातर काल-पूजा है, और काल, माया के प्रभाव से, इसी में सन्तमत यानी सत्यपुरुष का भेद, सतलोक या अमरलोक का भेद, असली हंसज्ञान, आत्मा का वास्तविक ज्ञान, घुल-मिल गया है ।
आपने बहुत पुस्तकें पढ़ी होंगी । एक बार इसको पढ़ें ।
ये आपकी आँखे खोल देगी ।

यदि आप इसकी गहरायी समझ गये तो जीवन का लक्ष्य और दुनियाँ में फ़ैला धार्मिक मकङजाल आपको आसानी से समझ में आ जायेगा । आपके दिमाग में भरा जन्म-जन्म का धार्मिक कचरा साफ़ होकर सच्चे प्रभु से लौ लग जायेगी । जो सबका उद्धारकर्ता है ।


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size - 1 MB

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हँसदीक्षा, परमहँस दीक्षा, समाधि दीक्षा, शक्ति दीक्षा, सारशब्द दीक्षा, निःअक्षर ज्ञान, विदेही ज्ञान, सहज योग, सुरति-शब्द योग, नाद-बिन्द योग, राजयोग और उर्जात्मक ‘सहज ध्यान’ पद्धति के वास्तविक और प्रयोगात्मक अनुभव सीखने, समझने, होने हेतु सम्पर्क करें ।

               (मुख्य आश्रम)
निःअक्षर ज्ञान दीक्षा केन्द्र ॥मुक्तमंडल॥
  चिन्ताहरण आश्रम, नगला भादों
        जि. फ़िरोजाबाद, उ.प्र.
                  भारत
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मुक्तमंडल आगरा

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अनुराग सागर मुफ़्त डाउनलोड

29 मार्च 2017

ओशो का स्वर्ग

ओशो - कल मैंने मेलाराम असरानी को कहा था कि अब कब तक मेलाराम बने रहोगे, अरे मेला में तो बहुत झमेला है, अब राम ही रह जाओ । 
तो उन्होंने क्या लिखा ? 
उन्होंने लिखा कि भगवान, आप मुझे मेलाराम से शुद्धराम बना देगे । और संन्यास के लिये आपने आमंत्रण भी दिया, मैंने वर्षों पहले दादा लेखराज द्वारा स्थापित ईश्वरी विश्वविद्यालय में ब्रह्मा कुमार के रूप में दीक्षा ली थी, और तबसे मैं ‘सहज राजयोग’ की साधना करता हूँ, और अगर अब आपसे सन्यास ले के ये साधना छोड़ता हूँ, तो ब्रह्मा-कुमारियों के अनुसार आने वाली प्रलय में नष्ट हो जाऊँगा । आने वाले पाँच-दस वर्षों में प्रलय सुनिश्चित है । इसमें जो लोग ईश्वरी विश्वविद्यालय में दीक्षित होकर पवित्र जीवन जियेंगे । उनकी आत्मा का परम-ब्रह्म से संगम होगा, और वे परमधाम बैकुण्ठ में परमपद पायेंगे । 
मुझे आपके विचार बहुत क्रान्तिकारी लगते हैं और आप भी भगवत स्वरूप लगते हैं, लेकिन आपके संन्यासियों का जीवन मुझे पवित्र नहीं लगता, इसलिये आपसे संन्यास लेने में मैं आश्वस्त नहीं हो सकता कि आने वाली प्रलय में बच कर बैकुण्ठ में परमपद पा सकूँ । 
अब मेलाराम असरानी कैसे लोभ में पड़े हैं । कैसा डराया उन्हें, और मजा ये है कि हमारी मूढ़ता का कोई अंत नही है । ये पाँच-दस वर्ष में प्रलय सुनिश्चित है, ये बीस वर्ष तो मुझे सुनते हो गया, ये पाँच-दस वर्ष आगे ही बढ़ते चले जा रहे हैं तुम्हें भी सुनते हो गये होंगे, दादा लेखराज भी खत्म हो गये, पर पाँच-दस वर्ष खत्म नहीं होते ।
मगर सिंधी गुरु, क्या तरकीब लगा गये, दादा लेखराज सिंधियों को फँसा गये, और सिंधी हैं पक्के दुकानदार, उनको डरा गये कि देखो ख्याल रखना प्रलय सुनिश्चित है, पाँच-दस वर्षों में आने वाली है । क्योंकि ज्यादा देर की बात है, तब तक तो समय बहुत है, तब तक और कमाई कर लूँ, पाँच दस वर्ष का मामला है घबरा दिया, और ये कोई नई तरकीब नही है बहुत पुरानी तरकीब है, पुराने से पुराने ग्रन्थ में इस बात का उल्लेख है कि थोङे ही दिन में प्रलय होने वाली है ।
जो ईसा के शिष्य थे, जो उनके प्रथम संवाद वाहक बने, वो लोगों को कहा करते थे कि अब देर नहीं है, 2000 साल पहले यही बात, यही दादा लेखराज की बात कि अब ज्यादा समय देर नही है, प्रलय होने वाली है, क़यामत का दिन आने वाला है, जो जीसस के साथ नहीं होंगे, वो अनन्तकाल तक नर्क में सजेंगे, अभी समय है सावधान ! जीसस के साथ हो लो । 
क्यों ? 
क्योंकि क़यामत के दिन जब प्रलय होगी, तो ईश्वर जीसस को लेकर खङा होगा और कहेगा कि चुन लो, अपनी भेङें चुन लो, जो तुम्हारे मानने वाले हैं उनको बचा लो, बाकी को तो नरक में जाना है । उस वक्त तुम बहुत मुश्किल में पड़ोगे कि जीसस को नहीं माना, और जीसस अपनी भेङों को चुन लेंगे और अपनी भेड़ों को बचा लेंगे, और बाकी गये, गिरे अनन्तकाल के लिये नरक में, जहाँ से फिर कोई छुटकारा नहीं है । अनन्तकाल, ख्याल रखना, ऐसा भी नहीं एक साल, दो साल, तीन साल, पाँच साल, दस साल छूटेंगे, कभी तो छूट जायेंगे ।
नहीं ! अनन्तकाल तक फिर छुटकारा है ही नहीं । 
कैसा घबरा दिया होगा लोगों को, 2000 साल पहले ? 
और दो हजार साल बीत गये, क़यामत अभी तक नहीं आई, और बातें वे ऐसी कर रहे थे कि अब आई कि तब आई, आई ही रखी है, अब ज्यादा देर नही है । 
और ये बहुत पुरानी तरकीब है, सदियों से इसका उपयोग किया जा रहा है, और फिर भी अजीब आदमी है कि इन्हीं बातों को, इन्हीं जालसाजियों को फिर स्वीकार करने को राजी हो जाता है । कैसे कैसे लोग हैं ?
आदिवासियों के एक गाँव में मैं ठहरा था, बस्तर के आदिवासियों को ईसाई बनाया जाता है, काफ़ी ईसाई बना लिये गये हैं । मुझे कुछ ऐतराज़ नहीं, क्योंकि वे हिन्दू थे तो मूढ़ थे, ईसाई हैं तो मूढ़ हैं, मूढ़ता तो कुछ बदली नहीं, मूढ़ता तो कुछ मिटती नहीं है कि मूढ़ भीङ में इस भेङों के साथ रहें कि मूढ़ भीङ में उस भेड़ों के साथ रहें, क्या फर्क पङता है, मूढ़ता तो वही की वही है ।
मगर किस तरकीब से उन ग़रीब आदिवासियों को ईसाई बनाया जा रहा है !
एक पादरी उनको समझा रहा था । उसने राम की और जीसस की एक जैसी प्रतिमा बना रखी थी, और उनको समझा रहा था कि देखो यह बाल्टी भरी रखी है इसमें मैं दोनों को डालता हूँ । तुम देख लो, जो डूब जायेगा, उसके साथ रहे तो तुम भी डूबोगे, और जो तैरेगा, वही तुमको भी तिरायेगा । और बात बिलकुल साफ थी, सारे आदिवासी बिलकुल उत्सुक होकर बैठ गये ।
भाई ! देखने वाली बात है सिद्ध हुआ जा रहा है ।
तो सबके सामने उस पादरी ने दोनों मूर्तियों को छोङ दिया बाल्टी के भरे पानी में, रामजी तो एकदम डुबकी मार गये, जैसे रास्ते ही देख रहे थे, गोता मारा और निकले ही नहीं, और जीसस तैरने लगे ।
जीसस की मूर्ति बनाई थी लकड़ी की, और राम की मूर्ति बनाई थी लोहे की, उसमें रंग-रोगन एक सा कर दिया था । जिससे वे मूर्तियाँ एक जैसा लगने लगी थी ।
एक शिकारी, जो बस्तर शिकार करने जाता था, मेरा परिचित व्यक्ति था, मैं जिस विश्वविद्यालय में प्रोफेसर था, वहीं वो भी प्रोफेसर था, और उसका एक ही शौक़ था शिकार ।
उसने ये हरकत देखी और समझ गया फ़ौरन कि - ये जालसाज़ी है । 
उसने कहा - ठहरो ! इससे कुछ तय नहीं होता, क्योंकि हमारे शास्त्रों में तो अग्नि परीक्षा लिखी है, जल परीक्षा तो लिखी ही नहीं है । 
आदिवासियों ने कहा - ये बात भी सच है, अरे सीता मइया, जब आयीं थी तो कोई जल परीक्षा तो हुई नहीं थी, उनकी तो अग्नि परीक्षा हुई थी ।
पादरी तो घबरा गया कि - ये तो गड़बड़ हो गया, ये दुष्ट कहाँ से आ गया । 
भागने की कोशिश उस पादरी ने की । 
लेकिन आदिवासियों ने कहा - भइया, अब ठहरो, अग्नि परीक्षा और हो जाय, ये बिचारा ठीक ही कह रहा है, क्योंकि हमारे शास्त्रों में अग्नि परीक्षा का उल्लेख है ।
आग जलाई गई, पादरी बैठा है उदास कि अब फँसे, अब भाग भी नहीं सकता । 
जीसस और रामजी अग्नि में उतार दिये गये । 
अग्नि में रामचंद्र जी तो बाहर आ गये, और जीसस खाक हो गये । 
सो आदिवासियों ने कहा - भइया, अच्छा बचा लिया हमें, अगर आज अग्नि परीक्षा न होती तो हम सब तो ईसाई हुऐ जा रहे थे ।
मगर इन आदिवासियों में और मेलाराम तुममें फर्क है, तुम पढ़े लिखे आदमी हो, मगर कुछ भेद है ।
वही बुद्धि, वही जङ बुद्धि, पाँच-दस साल तुम कहते हो, और तुम कह रहे हो कि मैंने वर्षों पहले दादा लेखराज द्वारा स्थापित ईश्वरी विश्वविद्यालय से दीक्षा ली है ।
दादा लेखराज को मरे कितने साल हुये ये बताओ ? 
ये पाँच-दस साल तो तुम ही कह रहे हो कई सालों से । ये पाँच-दस साल कब खत्म होंगे ? 
ये कभी खत्म होने वाले नहीं, मगर डर, और सिंधी हो तुम, और सिंधी को तो यही दो बातें प्रभावित करती हैं, एक तो डर, और डर से भी ज्यादा लोभ ।
अब तुम कह रहे हो कि ब्रह्माकुमारी के अनुसार आने वाली प्रलय में अगर साधना छोङ दूँगा तो नष्ट हो जाऊँगा । आने वाले पाँच-दस वर्षों में प्रलय सुनिश्चित है । 
क्या तुम खाक साधना कर रहे हो, राजयोग की, सहज राजयोग की, सहज राजयोग की साधना करो, और इस तरह की मूढ़तापूर्ण बातों में भरोसा करो, ये दोनों बातें एक साथ चल सकती हैं ?
सहज राजयोगी तो समाधिष्ट हो जाता है । उसकी तो प्रलय हो गई । और जहाँ मन गया, वहाँ बैकुण्ठ है । बैकुण्ठ अभी है ।
कोई सारा संसार मिटेगा, तब तुम मेलाराम असरानी बैकुण्ठ जाओगे, तुम्हारे संसार के लिये सारे संसार को मिटाओगे ? जरा सोचो तो बडा महँगा सौदा करवा रहे हो । मतलब जिनको अभी बैकुण्ठ नहीं जाना है उनको भी ।
अरे बाल-बच्चों से, पत्नी से पूछा कि अगले पाँच-दस वर्षों में बैकुण्ठ चलना है ? 
किसी को बैकुण्ठ नहीं जाना है । अरे मजबूरी में जाना पड़े बात अलग, मगर जाना कौन चाहता है तुम भी नहीं जाना चाहते । इसीलिये ब्रह्माकुमारी तारीख तय नही करती । उनसे तारीख तय करवा लो, एक दफ़ा निपटारा हो जाय, पाँच-दस साल का मामला है, तारीख तय कर लो, किस तारीख, किस माह में, किस साल में ।
और ऐसे मूढ़ लोग हैं कि ये भी तय करवाया गया, और मूढ़ता ऐसी है कि फिर भी नहीं जाती ।

ईसाइयों में एक सम्प्रदाय है - जिहोबा के साक्षी ! 
इन्होंने, कई दफ़ा घोषणा कर चुके हैं तारीख तक की । इन्होंने 1880 में एक जनवरी को प्रलय हो जायेगी 100 साल पहले, अभी एक जनवरी आती है, 100 साल पूरे हो जायेंगे । तो घोषणा की थी कि 1 जनवरी 1880 में प्रलय होने वाली है । 
तो उनके मानने वाले लोगों ने देखा कि महाप्रलय होने वाली है तो लोगों ने मकान बेच दिये, ज़मीनें बेच दी, अरे लोगों ने कहा कि गुलछर्रे कर लो, जो भी करना है कर लो, 1 जनवरी आ ही रही है इसके आगे कुछ तो बचना नहीं है । जिसको जो करना था, कर लिया ।
जिहोबा के मानने वाले पर्वत पर इकठ्ठे हुये, क्योंकि सारा जगत तो डूब जायेगा, इसलिये पर्वत पर, पवित्र पर्वत पर जो रहेंगे, उनको परमात्मा बैकुण्ठ ले जायेगा ।
एक तारीख भी आ गई, सुबह भी हो गया, लोग इधर-उधर देख रहे हैं, प्रलय कहीं दिखाई नहीं पङ रही है, लाखों लोग इकठ्ठे पर्वत पर, आखिर धीरे-धीरे खुस-फुस हुई कि बात क्या है अभी तक ! दोपहर भी हो गई, शाम भी होने लगी, दो तारीख भी आ गई, फिर लोगों में सनमनी हुई कि अब फँसे, सब बर्बाद करके आ गये । फिर लौट आये, फिर उसी दुनियाँ में, फिर कमाई-धमाई शुरु कर दी ।
मगर मजा ये है कि आदमी की मूढ़ता की कोई सीमा नही है ।
वही पंडित-पुजारी, जो उनको पहाङ पर ले गये थे, जिन्होंने उनसे सब दान करवा दिया था..दान क्या, खुदी को करवा लिया था ।
इन्होंने ये भी न सोचा कि एक जनवरी को जब सब नष्ट ही होने वाला है, तो ये दान किसलिये इकठ्ठा कर रहे हैं कि एक जनवरी को सब नष्ट ही हो जायेगा, अब दे ही दो, अब भगवान के नाम पर दान कर दो, जो दान कर देगा, उसे अनन्त गुना मिलेगा ।
तो ये पंडित पुजारी क्या करेंगे दान ले के ? ये तक किसी ने न सोचा ।
और वे पंडित पुजारी फिर से समझाने लगे कि थोड़ी तारीख में हमारी भूल हो गई फिर दस साल बाद से होगा । 
फिर दस साल बाद लोग इकठ्ठे हो गये ! 
आदमी की प्रतिभा ऐसी क्षीण हुई, ऐसी जंग खा गई है ।
अब तुम अगर सहज राजयोग की साधना करते हो, यहाँ कैसे आये ?
अगर सहजयोग से तुम्हें कुछ मिल रहा है, तो यहाँ किसलिये आये हो ?
अपना बैकुण्ठ गंवाना है, क्योंकि वहाँ, अगर पता भी चल गया कि तुम यहाँ आये थे, तो कोई दादा लेखराज वग़ैरह साथ न दे पायेंगे, क्योंकि मैं कहूँगा कि ये मेरी भेड़ है, न रही हो संन्यासी, मगर आधी मेरी है, आधी को बैकुण्ठ जाने दो, आधी को तो मैं नरक ले जाऊँगा ।
मेलाराम असरानी आधे-आधे कटोगे, रामजी को तो मैं ले जाऊँगा, मेला को वही छोङ जाऊँगा, वैसे तुम्हारी मर्ज़ी, रामजी वाले हिस्से को मैं छोड़ने वाला नहीं, वो तो, उस पर क़ब्ज़ा मेरा है ।
इस दरवाज़े के जो भीतर आया एक दफ़ा, उसको पहचान लिया कि भेड़ अपनी है, फिर कोई दादा लेखराज वग़ैरह काम नहीं आने वाले, तुमसे कहे देता हूँ । आधे तो वैसे ही गये, अब पूरे ही फँस जाओ, क्या झंझट ।
और तुम कहते हो, जो ईश्वरी विश्वविद्यालय में दीक्षित होकर पवित्र नहीं होगा, उनकी बङी मुश्किल होगी, और जो पवित्र होंगे, उनकी आत्मा का परमब्रह्म से संगम होगा, और वो परमधाम बैकुण्ठ में परमपद पायेंगे । 
देखते हो, परम-परम चल रहा है, धन्न-धन्न हो रहा है । कैसा लोभ चढ़ा हुआ है छाती पर । जरा परम-ब्रह्म से संगम हो गया, इतने से तृप्ति नही है । परमधाम, उससे भी मन राजी नही मानता; सिंधी मन, बैकुण्ठ ! उससे भी राजी नही, फिर परमपद ।
तो दादा लेखराज कहाँ बैठेंगे ? 
परम-पद पर तुम बैठ जाओगे, तो दादा लेखराज धक्का नही देंगे कि - क्यों रे मेलाराम असरानी, कमबख़्त मैंने दीक्षा दी, और परमपद पर तू बैठ रहा है, ब-मुश्किल तो हम बैठ पाये किसी तरह, परमात्मा को सरकाया, और अब तू आ गया । 
अरे परमपद पर कितने आदमी चढ़ोगे ?
परमपद पर तो एक ही बैठ सकेगा कि कई लोग बैठेंगे, पूरा मेला, पूरा झमेला ।
मगर सिंधी हो, तुम भी क्या करो !
दादा सांई बुद्धरमल को सिनेमाघर के बाहर पेशाब करने के आरोप में पकङ कर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, मजिस्ट्रेट भी था सिंधी, पहुँचा हुआ सिंधी ।
सांई बुद्धरमल पर एक सौ रुपये का जुर्माना किया गया ।
बुद्धरमल बोले - माई-बाप, यह तो अन्याय हो जायेगा, इतनी सी गलती के लिये इतना भारी जुर्माना !
मजिस्ट्रेट बोले - बडी सांई, ऐ कोई ऐरे गैरे का पिशाब नहीं है, सेठ बुद्धरमल का पेशाब था ।
इतना सुनते ही बुद्धरमल ने जल्दी से जुर्माना भर दिया ।
अरे, अब परमपद का मामला आया, सेठ बुद्धरमल का पेशाब । 
तुम भी कैसी कैसी बातों में पड़े हो । जब कोई आदमी किसी स्त्री के साथ बलात्कार करता है, तो साधारण में कहा जाता है कि - उस स्त्री की इज़्ज़त लूटी गई ।
मारवाड़ियों में मामला अलग ही है, यदि स्त्री के साथ कोई बलात्कार कर ले, और उसके पैसे और ज़ेवरात आदि नहीं छीने, तो मारवाड़ी लोग कहते हैं, चलो कोई बात नहीं, बलात्कार किया सो किया, अरे अपना क्या गया, कम से कम इज़्ज़त तो नहीं लूटी, इज़्ज़त बच गई, यही क्या कम है । 
सिंधी लोग और भी पहुँचे हुये लोग हैं । 
एक दिन झामनदास ने आकर बताया कि - कल रात एक अजनबी महिला ने उसकी इज़्ज़त लूट ली । मैंने पूछा - झामनदास क्या कहते हो, कभी ऐसी बात न कानों सुनी, न आँखों देखा कि किसी स्त्री ने तुम्हारी इज़्ज़त लूट ली, क्या कहते हो ?
झामनदास बोले - मैं तो उसके साथ बलात्कार करने में लगा था, और उस दुष्ट ने मेरी पॉकेट मार ली । हद हो गई कलियुग की भी, अब तो मनुष्य जाति पर से तो मेरा बिलकुल भरोसा उठ गया । 
अब ये मेलाराम असरानी परमपद पाने के पीछे पड़े हैं, और इस डर से कि कही परमपद न चूक जाये, सन्यास लेने में घबरा रहे हैं ।
और भी एक डर है कि मुझे आपके विचार बहुत क्रान्तिकारी लगते और आप भी भगवतस्वरूप लगते हैं ।
ये नहीं कि डर के मारे कह रहे है कि कौन झंझट ले, विचार तो क्रान्तिकारी लग रहे, ख़तरनाक मालूम होते हैं, मान लेना ठीक है भगवत-स्वरूप को, पता नहीं आखिर में कौन जीतेगा, दादा लेखराज या ये, आदमी भी उपद्रवी मालूम होता है, कहीं दादा लेखराज को चारों खाने चित्त कर दिया तो फिर..तो फिर होशियार आदमी सभी को सम्भाल कर रखता है कि आप भी भगवत-स्वरूप हैं, यदि मौका आ गया ऐसा, तो कह दूँगा कि याद रखो, मैंने कहा था कि आप भी भगवत-स्वरूप हो, और दादा लेखराज जीते, तो कह दूँगा कि मैंने पहले ही कह दिया था कि इनके विचार क्रान्तिकारी हैं पर अपने को जँचे नहीं ।
लेकिन कहते हैं कि आपके संन्यासियों का जीवन हमें पवित्र नहीं लगता । 
अरे, मेरे सन्यासियों के जीवन से तुम्हें क्या फ़िकर, इनको कोई बैकुण्ठ थोङे ही जाना है, ये तो यही बैकुण्ठ में हैं । 
तुम जब बैकुण्ठ जाओगे, और पाओगे कि दादा लेखराज के आसपास उर्वशी और मेनकायें नाच रही हैं, तो तुम्हें उनका जीवन भी पवित्र नहीं लगेगा कि अरे, ये दादा लेखराज क्या कर रहे हैं ? 
अरे रे सांई ये क्या कर रहे हैं, ये उर्वशी बाई को गोद में बिठाये बैठे हैं, ये कोई कन्या, कोई ब्रह्माकुमारी की भी नही हैं, ये कर क्या रहे हो, दादा हो के ये क्या कर रहे हो ?
मेरे सन्यासी तो बैकुण्ठ में हैं । इनको कहीं जाना नहीं, ये तो परमपद में विराजमान हैं ।
इनको मैं कोई प्रलोभन नहीं दे रहा हूँ । और इनको मैंने साफ कह दिया है कि यदि मेरे साथ रहे, तो नरक की तैयारी रखो ।
करोगे क्या खाक स्वर्ग में जाकर, धूल उड़ रही है वहाँ, मरे मुर्दा साधू संत वहाँ पहुँच गये हैं बहुत पहले से, कोई धूनी कमाये बैठा है, कोई झाड़ पर उल्टा लटका है । जटा-जूट तो देखो उनके, यदि तुम उन्हें खोजने जाओ तो मिले ही ना, अनंतकाल में भी न मिले, कोई भूखा ही मर रहा है । इस सर्कस में कहाँ मेरे संन्यासियों को ले जाना है । इन सबको तो मैंने नरक लेकर चलने का विचार किया है । 
नरक में कुछ करने को है । और इतने लोग तो विचारे नरक ही गये होंगे, उन सबका भी तो उद्धार करना है कि नहीं, शैतान को भी सन्यास देना है कि नही ? तो इनको तो कोई चिन्ता नहीं है । मेरे साथ जो हैं, वो मेरे साथ नरक को भी जाने को तैयार है ।
परमपद वद की तो मैं बात ही नहीं करता । 
क्योंकि मैं उन्हीं को ध्यानी मानता हूँ जो कि नरक में भी हो, तो उसके आसपास स्वर्ग घटित हो । और तुम्हारे तथाकथित साधू और संत ये कहीं स्वर्ग में भी होंगे तो उसे कभी का नरक बना दिया होगा । इनकी शक्लें तो देखो, इनके ढंग ठौर तो देखो, ये जहाँ इकठ्ठे हो जायेगे, वहाँ मातम छा जायेगा ।
स्वर्ग में तो बिलकुल मातमी हालत होगी - कोई महात्मा चरख़ा चला रहा है, अब ये मोरार जी भाई भी बैकुण्ठ में रहेंगे, वे वहाँ ‘जीवन जल’ ही पी रहे हैं । इन सबको इनकी तपश्चर्या का फल तो मिलेगा, ज़िन्दगी भर जीवन जल (स्वमूत्र) पिया, तो किसलिये पिया ? काहे को पिया ? 
अमृत की आशा में पिया, कि परमात्मा अमृत में मिलेगा । मेरे संन्यासियों को स्वर्ग से कुछ लेना देना नहीं । क्योंकि मैं कहता हूँ कि स्वर्ग कोई भूगोल नही है, और स्वर्ग कोई स्थान नहीं है, बल्कि चैतन्य की अवस्था है, तुम चाहो तो अभी और यहीं स्वर्ग में हो सकते हो, तो फिर कल पर क्यों टाल रहे हो ?
मेलाराम असरानी मेरा संन्यास लो, और प्रलय हुई । 
प्रलय का मतलब क्या होता है ? कि तुम खत्म, कि तुम गये, तुम मिटे, तुम समाप्त हुये ।
और उसी मिटने से, उसी राख से, उसी मृत्यु से, उसी शूली से एक नये जीवन का आविर्भाव होता है । एक नया अंकुरण होता है ।
मैं किसी को नैतिकता नहीं सिखा रहा हूँ, मैं सिर्फ आनन्द सिखा रहा हूँ, मेरे लिये आनन्द ही एकमात्र पवित्रता है, और इसलिये तुम्हें अड़चन लगती होगी कि आपके संन्यासियों का जीवन मुझे पवित्र नहीं लगता ।
तुम्हारी पवित्रता की परिभाषा क्या है ? तुम पवित्रता से क्या अर्थ लेते हो ? 
तुमने पवित्रता की कोई धारणा बना ली होगी, अपनी-अपनी धारणायें हैं, और उन्हीं धारणाओं के आधार पर आदमी पवित्रता मानता है । 
तुम व्यर्थ की धारणायें छोङो, और तनिक विवेक से काम लो मेलाराम असरानी, तुम्हारी प्रलय हो ही जायेगी । गलती से ही सही, पर ठीक जगह पर आ गये हो, थोङा हिम्मत करो, थोङा साहस करो ।
(ओशो और ब्रह्माकुमारी)
टंकण एवं प्रेषण - ओशो अनुयायी स्वामी अंतरप्रकाश जी द्वारा ।
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ओशो के इस प्रवचन को वीडियो में देखें ।
https://www.youtube.com/watch?v=MXzEDr-7Ags

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और अन्त में - 
अब (नीचे) इससे ज्यादा क्या बतायें ?

नैनों में निरखत रहे । अविगत नाम कबीर ?
बैडा पार लगावहिं । सुरत सरोवर तीर ।

26 मार्च 2017

सर्वभक्षी अन्यायी निरंजन

कबीर सागर के इस (निम्न) दोहे का अर्थ स्पष्ट नही होता । 
रामचन्द्र जी रावण का वध करके सभी के साथ अयोध्या लौट आये हैं और लंका से ‘अयोध्या कोट’ उठा लाये हैं तथा उसको अयोध्यापुरी में स्थापित करना चाहते हैं ।
साखी -
राज करै रघुवंश मणि, तब अस कीन्ह प्रमान ।
थाप्यौ कोट अयोध्यहि, सुनो मन्त्र हनुमान ।
जबहि राम लंका से आये, अयोध्या कोट उठावन लाये । 
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कोट का अर्थ किला है । इससे लगता है कि राम के लंका प्रवास के दौरान ऐसा कुछ अस्थायी रूप से बनाया गया होगा । जिसको वे स्मृति बतौर या अन्य कारणवश ले आये होंगे ।
(यदि अमेरिका जैसे देशों में घरों को अन्य स्थान पर स्थापित करने का उदाहरण हमारे सामने न होता, तो यह बात अजीब सी लगती)
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इसी ‘कोट’ को स्थापित करने हेतु नीव खोदी जा रही थी । तब खोदने की क्रिया में कुछ ‘पोले स्थान’ जैसी आवाज हुयी ।
फ़िर नीचे किसी द्रव्य (खजाने) आदि की आशंका के साथ ‘पोले स्थान’ की तरफ़ खोदा गया तो एक समाधिस्थ तपस्वी नजर आये, जो माथे पर लुहिङा(?) दिये तप कर रहे थे । और उनकी भौंहो के बाल लम्बे होकर उनका चेहरा छिप गया था । वे प्रथ्वी तल पर बैठे थे ।
फ़िर उनकी समाधि हटी । राम ने उनके चारो ओर परिक्रमा कर दण्डवत किया ।
ऋषि बोले - आप कौन हैं, वेषभूषा आदि से राजपुरुष लगते हैं ।
राम बोले - मैं दशरथ पुत्र राम हूँ । पास ही अवधपुरी में रहता हूँ ।
ऋषि बोले - राम अवतार हुआ, यह कब हुआ ?
राम बोले - संसार में यश और नाम रहे, इसलिये यह करता हूँ ।
ऋषि बोले - यह जीवन अल्पायु है, इसलिये ‘कोट’ स्थापन आदि झंझट को छोङकर सुनो ।
राम ने उनसे अपने ह्रदय की बातें कहीं और पूछा - आप कबसे तपस्यारत हैं ?  

वह ऋषि बोले - मेरा नाम लोमस है । मनुष्यों के आठ पहर का रात दिन होता है । जिसे सब अहोरात (एक दिवस) कहते हैं । ऐसे मनुष्य दिवसों के (शुक्ल-कृष्ण) दो पक्ष (यानी एक महीना) को मिलाकर पितरों का एक दिवस होता है । फ़िर पितरों के एक वर्ष के बराबर देवताओं का एक दिन होता है ।
तब ऐसे देवताओं के बारह वर्ष बीत जाने पर मनु का एक दिवस होता है, ऐसे चौदह हजार वर्ष
एक मनु की आयु है ।
(यहाँ दोहे का अर्थ स्पष्ट नही है)
बारह वर्ष दिवस जब जाना, चौदह सहस्र इक मनु जो बखाना ।
ऐसे सात मनु जब समाप्त हो जाते हैं । तब एक इन्द्र की आयु पूर्ण होती है ।
फ़िर ऐसे सात इन्द्रों का नाश होने पर एक ब्रह्मा समाप्त होता है ।
सात ब्रह्मा नाश होने पर एक विष्णु समाप्त हो जाता है ।
और सात विष्णु (ओं) के नाश होने पर एक रुद्र का नाश होता है ।
ऐसे सोलह रुद्रों के नष्ट हो जाने पर मेरा (सिर्फ़) एक रोम गिरता है ।
इसीलिये मेरा नाम लोमस (बालों से पूर्णरूपेण भरे शरीर वाला) है ।
यह सुनकर राम को विश्वास न हुआ ।
तब लोमस ने उनके मन भाव जानकर कहा - तुम्हारी तरह ही प्रत्येक (अवतारी) राम ने मुझे भेंट के समय अंगूंठी दी । जो इस कमण्डल में हैं, उन्हें गिनो । इतने (उनचास करोङ) बार राम रावण हो चुके हैं ।
राम ने गिना, वे उनचास करोङ थीं ।
इतनी तो वे उस प्रकार की ही थी, फ़िर कमण्डल का लेखा कैसे कहा जाये ?
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‘यहाँ उल्लेखनीय है कि कबीर गोरखनाथ प्रसंग में गोरखनाथ द्वारा कबीर की आयु पूछने पर भी इतने (उनचास करोङ) ही राम, कृष्ण अवतार हो चुकने की बात कही थी । इससे सिद्ध होता है कि कबीर के अभी वाले जन्म तक इतना सब हुआ है । और फ़िर इसी सूत्र से आदिसृष्टि का समय निकाला जा सकता है ।’
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यहाँ राम जिस ‘निराकार निरंजन’ के अंश से उत्पन्न थे । स्वयं उसका मर्म न जान सके ।
जान्यो जन्महि अल्प जब, चले स्वर्ग अस्थान ।
निराकार निरंजन, तासु मर्म नहि जान ।
इस घटना से राम को ऐसी विरक्ति हुयी कि राजपाट, बन्धु आदि को त्यागकर स्वर्ग चले गये । फ़िर अपनी इच्छा से कृष्ण अवतार के रूप में जन्म लिया ।
इसके बाद कबीर ने ‘निरंजन’ के छल कपट और देवी, देवता, अवतारों को धोखे में रखकर ठगने, मारने का वर्णन किया है ।
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विशेष - इसके बाद जो साखी है । उसी से ‘कबीर सागर’ विश्वसनीय और कबीर की वाणी लगता है ।
नाम अदल जो पावै, कहै कबीर विचार ।
होय अटल जो निश्चय, जम राजा रहे हार ।
- ये जो ‘नाम अदल’ और ‘अष्टम कमल’ के बारे में कबीर वाणी में कई स्थानों पर आया है । यही अन्तिम स्थिति है । ‘सार शब्द’ ‘निःअक्षर’ के बारे में बहुत बोला जाता है । पर इसके बारे में कोई गुरु नही बोलता (क्योंकि वे खुद नही जानते)
- आठवाँ कमल और अदली नाम शरीर से बाहर है । कोई गुरु इसका ध्यान, सुमिरन आदि बताता है ?
काया से बाहर लखे, हँस कहावै सोय ?
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इसके बाद कबीर द्वारा कृष्ण चरित्र आदि का वर्णन करने के बाद, धर्मदास कल्पों और उत्पत्ति प्रलय के बारे में प्रश्न करते हैं ।
कबीर कहते हैं - यह चारो युग रहट की भांति चक्राकार घूमते रहते हैं । चारो युग के अन्त में निरंजन अग्नि में रहता है । वह प्रथ्वी को जलाकर जल में लीन कर देता है । और सातों स्वर्ग के नाके पर रहता है । फ़िर तप के बल पर स्थित रहे तैतीस करोङ देवता, चन्द्र, सूर्य, तारे...चतुर्मुख ब्रह्मा के पतित होते ही पतित हो जाते हैं (अर्थात इनके स्थान पर नये आ जाते हैं)
फ़िर दस अवतारों का कार्य समाप्त कर विष्णु समाप्त हो जाते हैं ।
लेकिन योगस्थ रहस्य को जानने और सेवन करने के कारण शंकर तब तक बचे रहते हैं ।
इस तरह सतपुरुष की सेवा के फ़ल का परिणाम (और सतपुरुष द्वारा उसे दिये वचन) के कारण यह अन्यायी निरंजन ‘बहत्तर चतुर्युगी’ तक यही मारने, जन्माने का खेल करता हुआ ‘भवसागर’ को बनाये रखता है ।
लेकिन ‘महाप्रलय’ के समय निरंजन अग्नि से हट जाता है । इसी समय लोमस ऋषि का भी अन्त हो जाता है । और चन्द्रमा, सूर्य, जल (ये 5 तत्वों वाला नही है) सब पूर्णतः खत्म हो जाते हैं (यानी पूर्व की खण्ड प्रलय की भांति उनके स्थान पर नये देवता आदि नियुक्त नही होते)
तब पाँच तत्व, तीनों गुण, इसके बनाये 14 यम, आकाश (ये 5 तत्वों वाला नही है) ये भी नही रहते । इसी समय यह (पूर्व की ही भांति) आदिकन्या महादेवी को भी खा जाता है ।
सब भक्षै निरंजन राय, आदि अन्त कछु ना रहै ।
शिव, कन्या, नाम बिहाय, सब जीव राखे आप में ।

20 मार्च 2017

ध्यान के प्रकार

प्रथमहिं ध्यान पदस्थ है, दुतिये पिण्ड अधीत । 
त्रितिय ध्यान रूपस्थ पुनि, चतुर्थ रूपातीत  । (दोहा)
- ध्यान चार प्रकार का होता है, 
1 पदस्थ ध्यान 2 पिण्डस्थ ध्यान 3 रूपस्थ ध्यान एवं 4 रूपातीत ध्यान ।
स्तम्भिनी द्राविणी चैव दहनी भ्रामिणी तथा । 
शोषिणी च भवत्येषा भूतानां पंच धारणा ।  
(गोरक्ष पद्धति श 2 श्लोक 51 का अनुवाद)  
यह पंच धारणाओं का वर्णन प्रायः गोरक्षनाथ पद्धति के दूसरे शतक के श्लोकों के अनुसार है ।
यह धारणा की योग क्रिया गुरुगम्य है । केवल पुस्तक से सिद्धि की इच्छा करना हानिकारक है ।
2 सुन्दरदास जी ने चार प्रकार के ध्यान कहे है 1 पदस्थ 2 पिंडस्थ 3 उपस्थ 4 रूपातीत । 
परन्तु गोरक्ष पद्धति में प्रथम दो भेद सगुण और निर्गुण (याज्ञवल्क्य के अनुसार) करके 9 ध्यान कहे हैं ।
गुदं मेढ्रं च नाभिश्च हृत्पद्मं च तदूर्ध्वतः । 
घण्टिकालम्बिकास्थानं भ्रूमध्ये च नभो बिलम । 
पदस्य ध्यान वर्णन 
जे पद चित्र विचित्र रचे अति, गूढ महा परमारथ जामैं ।
ते अवलोकि विचार करै पुनि, चित्त धरै निहचै करि तामैं ।
कै करि कुम्भक मंत्र जपै उह, अक्षर ते पुनि जानि अनामै । 
‘सुन्दर’ ध्यान पदस्थ इहै मन, निश्चल होइ लहै जु विरामै । (इंदव)

- पदस्थ ध्यान में साधक को चित्र विचित्र (नाना प्रकार के) अति गम्भीर तथा परम तत्व का निरूपण करने वाले सन्त वचनों का श्रवण कर उन्हीं में अपना मन निश्चय पूर्वक लगाना चाहिये । इस तरह सन्तवाणी के किसी पद में ध्यान लगाना पदस्थ ध्यान का पहला तरीका है ।
दूसरा तरीका - पूर्वोक्त कुम्भक विधि से कार बीज मन्त्र या गुरु उपदिष्ट मन्त्र के अक्षरों में ध्यान लगाते हुये उसका जाप करे तो योगी का मन निर्मल (निर्विकार) हो जाता है ।
- ध्यान की उपर्युक्त विधि पदस्थ ध्यान है । इससे योगी का मन निश्चल, शान्त तथा मुक्तावस्था को प्राप्त हो जाता है ।

पिंडस्थ का वर्णन 
सुनि शिष्य कहौं ध्यान पिंडस्थं । पिंड शोधन करिये स्वस्थं । 
षट्चक्रनि  कौ धरिये ध्यानं । पुनि सदगुरु कौ ध्यान प्रमानं । (चौपई)
- पिण्डस्थ ध्यान के द्वारा पिण्ड (शरीर) का शोधन कर उसे स्वस्थ बनाया जाता है । इसमें षट्चक्रों का ध्यान करना चाहिये और अन्त में गुरु (सदगुरु) विग्रह का ध्यान करना चाहिये ।
1 नाना प्रकार के चित्रों में रचित पद और बीज मंत्रों के ध्यान तथा महावाक्यों या महामंत्रों के जप सहित ध्यान ‘पदस्थ’ ध्यान है ।
2 षट्चक्र का वर्णन ऊपर छन्द 50 से 56 तक पृ. 5758 पर आ ही गया ।
(उल्लास 1 ज्ञानसमुद्र 69) 
रूपस्थ ध्यान वर्णन 
निहारि कैं त्रिकूट मांहिं, विस्फुलिंग देखि है ।
पुनः प्रकाश दीप ज्योति, दीप माल पेखि है ।
नक्षत्र माल विज्जुली, प्रभा प्रत्यक्ष होइ है । 
अनन्त कोटि सूर चन्द्र, ध्यान मध्य जोइ है । 
मरीचिका समान शुभ्र, और लक्ष जांनिये ।
झलामलं समस्त विश्व, तेजमै बषांनिये ।
समुद्र मध्य डूबि कैं, उघारि नैन दीजिये । 
दशौं दिशा जलामई, प्रत्यक्ष ध्यान कीजिये । (नराय)
- योगी अपने अन्तर चक्षु से त्रिकूट भ्रूमध्य की ओर देखे । वहाँ पहले तेजोमण्डल में चिनगारियां दिखायी देंगी, फिर कुछ अभ्यास के बाद दीपक की ज्योति दिखायी देगी (मानों हजारों दीपमालायें एक साथ जल रही हों) आगे कुछ अभ्यास करने पर योगी को उसी ध्यान में नक्षत्र माला तथा बिजली की सी चकाचौंध स्पष्ट दिखायी देगी । इससे आगे अभ्यास करने से, रूपस्थ ध्यान में अनन्तकोटि सूर्य चन्द्र का प्रकाश दिखायी देगा ।
- अन्त में श्वेत प्रकाश मरीचिका के समान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को व्याप्त कर झिलमिल झिलमिल होता हुआ दिखायी देगा और योगी की ऐसी स्थिति हो जायगी कि उसे सर्वत्र इस प्रकाश के अतिरिक्त और कुछ नहीं दिखायी देगा (उदाहरण) जैसे तालाब, समुद्र आदि में डुबकी लगाकर आंख खोलकर देखने पर दसों दिशाओं में जल ही जल दिखायी देता है, उसी तरह इस रूपस्थ ध्यान की अन्तिम अवस्था में योगी को प्रकाश ही प्रकाश दिखायी देता है और कुछ नहीं ।

रूपातीत ध्यान वर्णन 
यह रूपातीत जु शून्य ध्यान । कछु रूप न रेख न है निदान । 
तहां अष्ट प्रहर लौं चित्त लीन । पुनि सावधान है अति प्रवीन । (पद्धडी)
जिम पक्षी की गति गगन मांहि । कहुं जात जात दिठि परय नांहि । 
पुनि आइ दिखाई देत सोइ । वा योगी को गति इहै होइ । 
इहिं शून्य ध्यान सम और नांहिं । उत्कृष्ट ध्यान सब ध्यान मांहि । 
है शून्याकार जु ब्रह्म आपु । दशहू दिशि पूरण अति अमापु ।  
- रूपातीत ध्यान में शून्य का ध्यान करना पङता है । इसमें न कोई रूप दिखायी देता है, न किसी प्रकार की रेखा । योगी को अत्यन्त सावधान होकर पूर्ण तन्मयता से चित्त को आठों पहर इस शून्य में ध्यान लगाना चाहिये ।
- इससे योगी के चित्त की वही स्थिति हो जाती है जैसे दूर आकाश में उङता पक्षी दिखायी देता हुआ अचानक दृष्टि से ओझल हो जाता है और कुछ देर बाद फिर दिखायी देने लगता है ।
- इस शून्य (रूपातीत) ध्यान के समान कोई अन्य ध्यान योगी को सहायक नहीं होता । यह ध्यान पूर्वोक्त ध्यानों में सर्वोत्कृष्ट है । इसमें दसों दिशाओं को व्याप्त करने वाला प्रमाणातीत ब्रह्म शून्य रूप में योगी को प्रत्यक्ष दिखायी देने लगता है ।
यों करय ध्यान सायोज्य होइ । तब लगै समाधि अखंड सोइ । 
पुनि उहै योग निद्रा कहाइ । सुनि शिष्य देउं तोकौं बताइ । 
- इन चारों ध्यानों का अभ्यास करने से योगी सायुज्य अवस्था को प्राप्त होता है । उसकी अखण्ड समाधि लगने की स्थिति आ जाती है ।
शिष्य ! अन्त में तुझे बता दूँ कि इसी अवस्था को योग शास्त्र में ‘योगनिद्रा’ कहा है ।
1 रूपातीत या शून्य ध्यान का वर्णन याज्ञवल्क्यादि के अनुसार है ।
(उल्लास 1 ज्ञानसमुद्र 71) 
~सन्त सुन्दरदास जी महाराज~

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