26 अप्रैल 2019

अज्ञान बोध






केवल बुद्धिविलास से, मुक्त हुआ न कोय।
जब अपनी प्रज्ञा जगे, सहज मुक्त है सोय॥

आगे रैन अंधेरा भारी, काज करो कुछ दिन में।
यह देही फिर हाथ न आवै, फिरे चौरासी वन में 

आत्मा में अज्ञानजन्य जन्मादि छह भाव-विकार नहीं हैं तथा गमनादि से रहित निर्विकार और पूर्ण है। जल के फ़ेन-समूह और अग्नि के धुंयें के समान पुरूष (आत्मा) के आश्रित और पुरूष ही को विषय करने वाली प्रकृति (माया) नाना प्रकार के विचित्र कार्यों की रचना करती है।

मनुष्य जबतक माया से आवृत रहते हैं तबतक आत्मा (स्वयं-स्वरूप) को नहीं जान सकते। विद्या की विरोधिनी अविद्या का जबतक विचार नहीं किया जाता तभी तक रहती है।

अविद्याजन्य देहादि संघातों में प्रतिबिम्बित हुयी चित-शक्ति ही इस जीव-लोक में जीव कहलाती है। यह जीव जबतक देह, मन, बुद्धि आदि में अभिमान करता है तभी तक कर्तत्व, भोक्तृत्व और सुख-दुःखादि को भोगता है।

वास्तव में आत्मा में जन्म-मरणादि, संसार किसी भी अवस्था में नहीं हैं, और बुद्धि में कभी ज्ञान-शक्ति नहीं है। अ-विवेक से इन दोनों को मिलाकर जीव “संसारी हूँ” ऐसा मानकर कर्म में प्रवृत हो जाता है।

जल और अग्नि का मेल होने से, जैसे जल में उष्णता, और अग्नि में शान्तता उत्पन्न हो जाती है। उसी प्रकार जङ (बुद्धि) का चेतन (आत्मा) में संयोग होने से उसमें चेतनता और चेतन आत्मा का जङ-बुद्धि से संयोग होने से उसमें (कर्तत्व-भोक्तृत्व आदि) जङता प्रकट हो जाती है।

जबतक मनुष्य भक्ति-सतसंग तथा भक्त और सन्तों का सानिध्य नहीं लेता तबतक वह संसार के दुख-समूह से पार नहीं होता। लेकिन जब वह सतसंग-उपासना आदि भक्ति-कर्मों में प्रवृत होता है तब माया शनै:-शनै क्षीण होकर चली जाती है। फ़िर उस साधक मनुष्य को ज्ञान से सम्पन्न सदगुरू की प्राप्ति होती है, और उन सदगुरूदेव से “महावाक्य” का बोध पाकर वह भवसागर से मुक्त हो जाता है।

भक्ति से शून्य पुरूषों को सौ करोङ कल्पों में भी मुक्ति अथवा ब्रह्मज्ञान, आत्मज्ञान होने की सम्भावना नहीं है, और इसीलिये उन्हें वास्तविक सुख मिलने की भी सम्भावना भी नहीं है।

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