26 मार्च 2010

सब पर प्यार लुटाता चल

दर्शन कर निज भगवान का ।
घट राखो अटल सुरती ने । दरसन कर निज भगवान का । 
सतगुरु धोरे गया सत्संग में । गुरांजी भर दिया हरी रंग में । 
शब्द बाण मारया मेरे तन में । सैल लाग्या ज्याणु स्यार का । 
मेरा मन चेत्या भक्ति में । घट राखो अटल सुरती ने । 
जब से शब्द सुण्या सतगुरु का । खुलगा खिड़क मेरे काया नगर का । 
मात पिता दरस्या नहीं घर का । दूत ले ज्या यमराज का ।
तेरा कोई न संगी जगती में । घट राखो अटल सुरती ने ।
नैन नासिका ध्यान संजो ले । रमता राम निजर भर जो ले ।
बिन बतलाया तेरे घट में बोले । बेरो ले भीतर बार का ।
अब क्यू भटकै भूली में । घट राखो अटल सुरती ने ।
अम्रतनाथ जी रम रह्या सुन्न में । मुझको दीदार दिखा दिया छिन में ।
मघो मगन होज्या भजन में । रूप सेख निराकार का ।
अब क्या सांसा मुक्ति में । घट राखो अटल सुरती ने ।
घट राखो अटल सुरती ने । दरसन कर निज भगवान का ।
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हर दरवाजा राम दुआरा । सबको शीश झुकाता चल ।
राही हैं सब एक डगर के । सब पर प्यार लुटाता चल ।
बिका बिकी सब ओर मची है । आने औ दो आने पर ।
अस्मत बिके दुराहों पर । तो प्यार बिके दुकानों पर ।
डगर डगर पर मंदिर मस्जिद । कदम कदम पर गुरुद्वारे ।
भगवानों की बस्ती में हैं । जुल्म बहुत इंसानों पर ।
खिड़की हर खुलवाता चल । सांकल हर कटवाता चल ।
इस पर भी हो न रोशनी । तो दिल का दिया जलाता चल ।
राही हैं सब एक डगर के । सब पर प्यार लुटाता चल ।
गोपाल दास नीरज
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वक़्त मेरी जिंदगी में । 2 ही गुजरे हैं कठिन ।
1 तेरे आने से पहले । 1 तेरे जाने के बाद ।
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वलसाड मे एक 23 साल के युवा ने दीक्षा ली । जहाँ पधारे जैन मुनि श्री पदम विजय सुरीजी ने कहा - जैनों को लगुमती ? दर्जा कभी नहीं स्वीकार करना चाहिए । क्योंकि जैन हिन्दू हैं । हिन्दू हैं और हमेंशा हिन्दू रहेंगे । यह षडयंत्र अंग्रेजों द्वारा फ़ैलाया गया है । 1942 से हिन्दू को तोडने का षडयंत्र चालू है । पहले हिन्दू मुसलमानों को लडाया । फिर हिन्दू सिखों को लडाया । अब जैनों को हिन्दू से अलग करके हिन्दू जैनों को लडाने का 1 बहुत बडा षडयंत्र है । वैसे इस बात मे कोइ संदेह नही है कि - जैन हिन्दू नही हैं । क्योंकि जैन के हर मंत्र की शुरुआत ॐ से होती है । और ॐ शिव का स्मरण स्वर है । क्या जैन ॐ को छोड सकते हैं ? नहीं छोड सकते हैं ? पंडितजी अभिषेक जोशी
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कही सुनी पे बहुत एतबार करने लगे ।
मेरे ही लोग मुझे संगसार करने लगे ।
पुराने लोगों के दिल भी हैं खुशबुओं की तरह ।
ज़रा किसी से मिले, एतबार करने लगे । वसीम बरेलवी ।
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बालों के झडऩे की समस्या - बालों को झडऩे से रोकने के लिए कुछ खास नुस्खे । बालों का झडऩा ऐसी समस्या है । जो किसी को भी तनाव में डाल सकती है । आज हर दूसरे व्यक्ति को बालों की समस्या से जूझना पड़ता है । अगर आप भी इस समस्या से परेशान हैं । तो नीचे दिए आयुर्वेदिक नुस्खे 1 बार जरूर अपनाएं ।
- नारियल के तेल में कपूर मिलाएं । और यह तेल अच्छी तरह बालों में तथा सिर पर लगाएं । कुछ ही दिनों डेंड्रफ की समस्या से राहत मिलेगी । - सामान्यत: सभी के यहां शहद आसानी से मिल जाता है । शहद के औषधीय गुण सभी जानते हैं । शहद की तासीर ठंडी होती है । और यह कई बीमारियों को दूर करने में सक्षम है । शहद से बालों का झडऩा भी रोका जा सकता है ।
- बाल झड़ते हैं । तो गरम जैतून के तेल में 1 चम्मच शहद और 1 चम्मच दालचीनी पाउडर का पेस्ट बनाएं । नहाने से पहले इस पेस्ट को सिर पर लगा लें । 15 मिनट बाद बाल गरम पानी से सिर को धोएं । ऐसा करने पर कुछ ही दिनों बालों के झडऩे की समस्या दूर हो जाएगी ।
- दालचीनी और शहद के मिश्रण काफी कारगर रहता है । आयुर्वेद के अनुसार इनके मिश्रण से कई बीमारियों का इलाज किया जा सकता है । त्वचा और शरीर को चमकदार और स्वस्थ बनाए रखने के लिए इनका उपयोग करना चाहिए ।
- नियमित रूप से नारियल पानी पीएं । अमरबेल को नारियल तेल में उबालकर बालों में लगाएं ।
- अमरबेल डालकर नहाने के लिए पानी उबालें । और उसे उबालकर एक चौथाई करके सिर में डालें ।
- अगर आप नशीले पदार्थों का सेवन या धूम्रपान करते हैं । तो बंद कर दें । बाल झडऩा जल्द ही कम हो जाएंगे ।
- अधिक से अधिक पानी पीएं । और चाय व काफी का सेवन कम कर दें । - आयुर्वेद में बालों की मालिश को आवश्यक माना गया है । ऐसे में नारियल तेल या बादाम के तेल से सिर की अच्छी तरह से मालिश करनी चाहिए ।
- सरसो के तेल में मेहंदी की पत्तियां डालकर गर्म करें । ठंडा करके बालों में लगाएं । इससे बालों का झडऩा रूक जाएगा ।

हनुमान जी के जन्म की कहानी..1

बहुत कम लोग ये बात जानते होंगे कि हनुमान जी का जन्म कैसे हुआ ?  श्रीराम के पद स्पर्श से पत्थर से औरत बनी अहिल्या हनुमान जी की नानी थीं ।
और गौतम ऋषि उनके नाना थे । हनुमान की माता अंजनी गौतम की पुत्री थीं ।
ये बात बहुत से लोगो को पता है कि इन्द्र अहिल्या की सुन्दरता पर आसक्त हो गया था ।
उसने एक दिन एक चाल चली । उसे पता था । गौतम सुबह चार बजे गंगा स्नान के लिये जातें हैं । उसने अपने एक साथी के साथ मिलकर एक दिन रात के दो बजे सूर्य निकलने जैसा प्रकाश फ़ैला दिया । और उसके साथी ने मुर्गे की नकली मगर हूबहू बांग निकाली ।
होनी ही थी, कि गौतम ने उसे सच समझा । और गंगास्नान के लिये चले गये । उधर इन्द्र ने गौतम का वेश बनाकर अहिल्या के साथ संभोग किया ।
वास्तव में थोडी ही देर में अहिल्या को पता चल गया कि उसके साथ संभोग करने वाला कोई कपटी है । लेकिन उसने कोई एतराज नहीं किया । अंजनी किसी दरार से यह दृश्य देख रही थी ।


बाद में जब अहिल्या को पता चला कि अंजनी ने उसके साथ छ्ल होते देख लिया है । उसने अंजनी से कहा कि वह ये बात अपने पिता को न बताये । लेकिन अंजनी ने उसकी बात मानने से साफ़ इंकार कर दिया ।
तब क्रोधित होकर अहिल्या ने उसे शाप दे दिया कि मैं तो करे हुये का भोगूंगी । पर तू बिना किये का ही भोगेगी ??
उधर थोडी ही देर में गौतम को पता चला कि उनके साथ छ्ल हुआ है । उन्होने वहीं ध्यान लगाया और सारा हाल जान लिया । अब उनके मन में एक ही बात थी कि देखें अहिल्या इस बात को छुपाती है । या बता देती है ।
ऐसा ही हुआ । अहिल्या इस बात को छुपा गयी । और गौतम ने उसे पत्थर की हो जाने का शाप दे दिया । उस समय अहिल्या क्रोध में थी । क्योंकि गौतम ने अंजनी से जब छल के बारे में पूछा । तो अंजनी ने साफ़ साफ़ सच बता दिया ।
इसीलिये अहिल्या ने अंजनी को शाप दिया कि वो बिना करे का भुगतेगी । इस पर अंजनी ने दृणता से कहा कि वह अपने जीवन में किसी पुरुष की छाया भी अपने ऊपर नहीं पडने देगी । ऐसा कहकर वह उसी समय निर्जन वन में तप करने चली गयी । और अहिल्या ऋषि के शाप से पत्थर की हो गयी ।

कृमशः ( दूसरा  भाग इसी के साथ प्रकाशित है । )

23 मार्च 2010

हनुमान जी की जन्म की कहानी 2

अहिल्या के शाप देने के बाद अंजनी रिष्यमूक पर्वत श्रंखला में चली गयी । और घनघोर तप करने लगी ।
उधर सती के अपने पिता के घर यग्य में दाह कर लेने के बाद बहुत समय बीत चुका था । और भगवान शंकर में तेज का समावेश हो चुका था ।
देवता विचार कर रहे थे कि शंकर जी को बहुत समय से सती का साथ नहीं है । ऐसे में यदि उनका तेज ( वीर्य ) स्खलित हो गया । तो हाहाकार मच जायेगा । इसके लिये वे एक ऐसी तपस्विनी की तलाश में थे । जो शंकर का तेज सह सके ।
तब देवताओं ने ध्यान से देखा । तो उन्हें अंजनी नजर आई । अंजनी संसार से ध्यान हटाकर घनघोर तपस्या में लीन थी । और राम के अवतरण का समय आ चुका था । रुद्र के ग्यारहवें अंश हनुमान जी के अवतार का भी समय आ रहा था ।
तब कुछ देवता भगवान शंकर के साथ महात्माओं का वेश वनाकर अंजनी की कुटिया के सामने पहुँचे । और पानी पीने की इच्छा जाहिर की । अंजनी ने प्रण कर रखा था कि किसी भी पुरुष की छाया तक अपने ऊपर न पङने देगी । लेकिन महात्माओं को जल पिलाने में उसे कोई बुराई नजर नही आयी । और महात्माओं को जल न पिलाने से उसकी तपस्या में दोष आ सकता था । 

इसलिये वह महात्माओं को जल पिलाने के उद्देश्य से एक पात्र में जल ले आयी । जब वह जल पिलाने लगी । तो महात्माओं ने पूछा कि बेटी तुमने गुरु किया या नहीं ? अंजनी ने कहा कि वह गुरु के विषय में कुछ नहीं जानती । तब महात्माओं ने कहा कि निगुरा ( जिसका कोई गुरु न हो ) का पानी पीने से भी पाप लगता है ।
अतः हम तुम्हारा जल नहीं पी सकते । अंजनी को जब गुरु का इतना महत्व पता चला । तो उसने महात्माओं से गुरु के बारे में और अधिक जाना । फ़िर उसने इच्छा जाहिर की कि वे महात्मा लोग उसे गुरुदीक्षा कराने में मदद करें ।
देवताओं ने कहा कि ये महात्मा ( शंकरजी ) तुम्हें दीक्षा दे सकते हैं । अंजनी ने विधिवत दीक्षा ली । और शंकर ने दीक्षा प्रदान करते समय । उसके कान में मन्त्र फ़ूँकते समय अपना तेज उसके अंदर प्रविष्ट कर दिया । इससे अंजनी को गर्भ ठहर गया ।
उसे लगा कि महात्मा वेशधारी पुरुषों ने उसके साथ छल किया है । उसने अपनी अंजुली में जल लिया । और उसी समय शाप देने को उद्धत हो गयी । तब शंकर आदि अपने असली वेश में आ गये । और कहा कि बेटी तू अपनी तपस्या नष्ट न कर । और ये सब होना था । तेरा ये पुत्र युगों तक पूज्यनीय होगा । और ये सब पहले से निश्चित था ।
अंजनी संतुष्ट हो गयी । उधर केसरी वानर अंजनी पर पहले से ही आसक्त था । बाद में अंजनी का भी रुझान भी केसरी की तरफ़ हो गया । और दोनों ने विवाह कर लिया । इस तरह हनुमान जी के अवतार का कारण बना । और अहिल्या का ये शाप कि तू विना किये का भोगेगी भी सच हो गया । वास्तव में अलौकिक घटनायें रहस्मय होती हैं । और मानवीय बुद्धि से इनका आंकलन नहीं किया जा सकता है । जो सच हमारे सामने आता है । उसके पीछे भी कोई सच होता है ? .

19 मार्च 2010

अनुराग सागर की संक्षित कहानी


अनुराग सागर ।.. कबीर साहिब और धरमदास जी के संवादों पर आधारित महान ग्रन्थ  है । इसकी शुरुआत में बताया गया है कि सबसे पहले जब ये सृष्टि नहीं थी । प्रथ्वी । आसमान । सूरज । तारे आदि कुछ भी नहीं था । तब केवल परमात्मा ही था ।.. सिर्फ़ परमात्मा ही शाश्वत है ।

 इसलिये संतमत में । और सच्चे जानकार संत । परमात्मा के लिये । है । शब्द का प्रयोग करते हैं । उसने ( परमात्मा ने ) कुछ सोचा ।.. ( सृष्टि की शुरूआत में । उसमें स्वतः एक विचार उत्पन्न हुआ । इससे स्फ़ुरणा ( संकुचन जैसा ) हुयी ) । तब एक शब्द ( हुं.. ) प्रकट हुआ । ( जैसे हम लोग आज भी विचारशील होने पर । हुं.. । करते हैं । तब उसने सोचा । मैं कौन हूं ?..

 इसीलिये हर इंसान आज तक इसी प्रश्न का उत्तर खोज रहा है कि मैं कौन हूं ? उस समय ये पूर्ण था । ) तब उसने एक सुन्दर और आनंददायक दीप की रचना की । और उसमें विराजमान हो गया । फिर उसने एक एक करके । एक ही नाल से 16 अंश यानी सुत प्रकट किये । उनमें 5 वें अंश कालपुरुष को छोड़कर सभी सुत आनंद को देने वाले थे । और वे सतपुरुष द्वारा बनाये गए हंसदीपों मैं आनंदपूर्वक रहते थे ।

 इनमें कालपुरुष सबसे भयंकर और विकराल था । वह अपने भाइयों की तरह हंसदीपों में न जाकर । मानसरोवर दीप के निकट चला आया । और सत्पुरुष के प्रति घोर तपस्या करने लगा । लगभग 64 युगों तक तपस्या हो जाने पर । उसने सतपुरुष के  प्रसन्न होने पर तीन लोक । स्वर्ग । धरती और पाताल मांग लिए । और फिर से कई युगों तक तपस्या की  ।
इस पर सतपुरुष ने अष्टांगी कन्या ( आदिशक्ति । भगवती आदि ) को स्रष्टि बीज के साथ कालपुरुष के पास भेजा । ( इससे पहले सतपुरुष ने कूरम नाम के सुत को भेजकर उसकी तपस्या करने की इच्छा की वजह पूछी । )

अष्टांगी कन्या बेहद सुन्दर और मनमोहक अंगो वाली थी । वह कालपुरुष को देखकर भयभीत हो गयी । कालपुरुष उस पर मोहित हो गया । और उससे रतिक्रिया का आग्रह किया । ( यही प्रथम स्त्री पुरुष का काम मिलन  था । ) और दोनों रतिक्रिया मैं लीन हो गए । ये रतिक्रिया बहुत लम्बे समय तक चलती रही ।
इससे ब्रह्मा । विष्णु और शंकर का जन्म हुआ । अष्टांगी कन्या उनके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगी । पर कालपुरुष की इच्छा कुछ और ही थी ? इनके जन्म के उपरांत कुछ समय बाद कालपुरुष अदृश्य हो गया । और भविष्य के लिए आदिशक्ति को निर्देश दे गया ।
तब आदिशक्ति ने अपने अंश से तीन कन्यायें उत्पन्न की । और उन्हें समुद्र में छिपा दिया । फ़िर उसने अपने पुत्रों को समुद्र मंथन की आग्या दी । और समुद्र से मंथन के द्वारा प्राप्त हुयी तीनों कन्यायें अपने तीन पुत्रों को दे दी ।

ये कन्यायें सावित्री । लक्ष्मी और पार्वती थी । तीनों पुत्रों ने मां के कहने पर उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार लिया । तब आध्याशक्ति ने ( कालपुरुष के कहेनुसार..यह बात कालपुरुष दोबारा कहने आया  था । क्योंकि पहले अष्टांगी ने जब पुत्रों को इससे पहले सृष्टि रचना के लिये कहा । तो उन्होंने अनसुना कर दिया । )  अपने तीनो पुत्रों के साथ सृष्टि की रचना की ।
आद्धाशक्ति ने खुद अंडज । यानी अंडे से पैदा होने वाले जीवों को रचा । ब्रह्मा ने पिंडज । यानी पिंड से शरीर से पैदा होने वाले जीवों की रचना की । विष्णु ने ऊश्मज । यानी पानी । गर्मी से पैदा होने  वाले जीव कीट पतंगे जूं आदि की रचना की । शंकर जी ने स्थावर यानी पेड । पौधे । पहाड़ । पर्वत आदि जीवों की रचना की । और फिर इन सब जीवों को 4 खानों वाली 84 लाख योनियों में डाल दिया ।
इनमें मनुष्य शरीर की रचना सर्वोत्तम थी । इधर ब्रह्मा । विष्णु । शंकर ने अपने पिता कालपुरुष के वारे मैं जानने की बहुत कोशिश की । पर वे सफल न हो सके । क्योंकि वो अदृश्य था और उसने आध्याशक्ति से कह रखा था कि वो किसी को उसका पता न बताये । फिर वो सब जीवों के अन्दर ॥ मन ।। ??? के रूप मैं बैठ गया । और जीवों को तरह तरह की वासनाओं में फ़साने लगा । और समस्त जीव बेहद दुख भोगने लगे ।
 क्योंकि सतपुरुष ने उसकी  क्रूरता देखकर शाप दिया था कि वह एक लाख जीवों को नित्य खायेगा । और सवा लाख को उत्पन्न करेगा । समस्त जीव उसके क्रूर  व्यवहार से हाहाकार करने लगे और अपने बनाने  वाले को पुकारने  लगे ।  सतपुरुष को ये जानकर बहुत गुस्सा आया कि काल समस्त जीवों पर बेहद अत्याचार कर रहा है । ( दरअसल काल  जीवों को तप्तशिला पर रखकर पटकता और खाता था । )
तब सतपुरुष ने ग्यानी जी ( कबीर साहब ...जो सतपुरुष के 16 अंश में से एक है । ) को उसके पास भेजा । कालपुरुष और ग्यानी जी के बीच काफ़ी झडप हुयी । और कालपुरुष हार  गया । तप्तशिला पर तडपते जीवों ने ग्यानी जी से प्रार्थना की । कि वो उसे इसके अत्याचार से बचायें । ग्यानी जी ने उन जीवों को  सतपुरुष का नाम ( ढाई अक्षर का महामन्त्र । ) ध्यान करने को कहा । इस नाम के ध्यान करते ही जीव मुक्त होकर ऊपर ( सतलोक ) जाने लगे । यह देखकर काल घबरा गया ।
तब उसने ग्यानी जी से एक समझौता किया । कि जो जीव इस परम नाम ( वाणी से परे ) को सतगुरु से प्राप्त कर लेगा । वह यहां से मुक्त  हो जायेगा । ग्यानी जी ने कहा । मैं स्वयं आकर सभी जीवों  को यह नाम दूंगा । नाम के  प्रभाव से वे यहां से मुक्त होकर आनन्दधाम को  चले जायेंगे ।
तब काल  ने  कहा । मैं और माया ( उसकी पत्नी ) जीवों को तरह तरह की भोगवासना में फ़ंसा देंगे । जिससे जीव भक्ति भूल जायेगा । और यहीं फ़ंसा रहेगा ।
तब ग्यानी जी ने कहा । लेकिन उस सतनाम  के अंदर जाते ही जीव में ग्यान का प्रकाश हो जायेगा और जीव तुम्हारे सभी चाल समझ जायेगा । अब काल को चिंता हुयी ।
तब उसने बेहद चालाकी से कहा । ..मैं जीवों को मुक्ति  और उद्धार के  नाम पर तरह तरह के जाति धर्म पूजा पाठ तीर्थ वृत आदि में ऐसा उलझाऊंगा कि वह कभी अपनी असलियत नहीं जान पायेगा ।..साथ ही मैं तुम्हारे चलाये गये.. पंथ में भी..? अपना जाल फ़ैला दूंगा ? इस तरह अल्पबुद्धि जीव यही नहीं सोच पायेगा.. कि सच्चाई आखिर है  क्या ? मैं तुम्हारे असली नाम में भी अपने नाम  मिला दूंगा ?..आदि । अब क्योंकि समझौता हो  गया था ।
ग्यानी जी वापस लौट गये । वास्तव में मन रूप मैं यह काल ही है । जो हमें तरह तरह के कर्मजाल मैं फंसाता है । और फिर नरक आदि भोगवाता है ।
लेकिन वास्तव मैं यह आत्मा सतपुरुष का अंश होने से बहुत शक्तिशाली है । पर भोग वासनाओं में पड़कर इसकी ये दुर्गति हो गई है ।
 इससे छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय सतगुरु की शरण और महामंत्र का ध्यान करना ही है ।

12 मार्च 2010

एक सेठ पर सन्त की कृपा

कुछ समय पहले की बात है । एक बहुत धनी आदमी था । एक बार उसके मन में भी किसी संत से ज्ञान लेने की इच्छा हुई । लेकिन उसके मन में धन का बहुत अहंकार था । वो संत के पास गया । तो वे सच्चे संत तुरन्त समझ गये कि - इसके मन में धन का बेहद अहंकार है । 
लेकिन ये बात उन्होंने अपने मन में ही रहने दी । सेठ ने उन सन्त से ज्ञान मंत्र लिया । 
और बोला - महाराज जी ! मेरे पास बहुत धन है । किसी चीज की कमी हो । तो बोलना । मेरे योग्य कोई सेवा हो । तो बताना । 
संत उसकी इस बात के पीछे छिपे अहंकार को समझ गये । और उन्होंने उसी पल उसका अहंकार दूर करने की सोची । वे कुछ देर सोचते रहे ।
फ़िर उन्होंने कहा - और तो मुझे कोई परेशानी नहीं हैं । पर मेरे कपड़ों को सीने के लिए सुई की अक्सर जरूरत पड़ जाती है । अतः यदि तुम मेरा काम करना ही चाहते हो । तो मेरे शरीर त्यागने के बाद । जब कभी तुम ऊपर ( मृत्यु के बाद ) आओ । तो मेरे लिये अपने साथ एक सुई लेते आना । 
सेठ को एक सुई का इंतजाम करना बेहद मामूली बात ही लगी । इसलिये वह झोंक में एकदम बोला - ठीक है महाराज ! 
लेकिन वो जल्दी में ये बात बोल तो गया । परन्तु फिर उसको ध्यान आया कि - ये कैसे हो सकता है ? मरने के बाद मैं भला सुई कैसे ले जा सकता हूँ । इस बात के ध्यान 


में आते ही संत की बात का सही मतलब सेठ की समझ में भली भांति आ गया कि - जिस धन पर मैं अभी गर्व कर रहा हूँ । वो सब यहीं का यहीं ही पड़ा रह जायेगा । और मैं एक सुई जैसी मामूली चीज भी अपने साथ नहीं ले जा सकता । तब उसका सारा अभिमान चूर चूर हो गया । और वो क्षमा माँगता हुआ संत के चरणों में गिर पड़ा  ।
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रे दिल गाफिल गफलत मत कर । एक दिना जम आवेगा ।
सौदा करने या जग आया । पूजी लाया मूल गॅंवाया ।
प्रेमनगर का अन्त न पाया । ज्यों आया त्यों जावेगा ।
सुन मेरे साजन सुन मेरे मीता । या जीवन में क्या क्या कीता ।
सिर पाहन का बोझा लीता । आगे कौन छुडावेगा ।
परलि पार तेरा मीता खडिया । उस मिलने का ध्यान न धरिया ।
टूटी नाव ऊपर जा बैठा । गाफिल गोता खावेगा ।
दास कबीर कहै समुझाई । अन्त समय तेरा कौन सहाई ।
चला अकेला संग न को । कीया अपना पावेगा ।
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दिवाने मन भजन बिना दुख पैहौ ।
पहिला जनम भूत का पै हौ सात जनम पछिताहौ । कॉंटा पर का पानी पैहौ प्यासन ही मरि जैहौ ।
दूजा जनम सुवा का पैहौ बाग बसेरा लैहौ । टूटे पंख मॅंडराने अधफड प्रान गॅंवैहौ ।
बाजीगर के बानर हो हौ लकडिन नाच नचैहौ । ऊच नीच से हाय पसरि हौ मॉंगे भीख न पैहौ ।
तेली के घर बैला होहौ ऑंखिन ढॉंपि ढॅंपैहौ । कोस पचास घरै मॉं चलिहौ बाहर होन न पैहौ ।
पॅंचवा जनम ऊट का पैहौ बिन तोलन बोझ लदैहौ । बैठे से तो उठन न पैहौ खुरच खुरच मरि जैहौ ।
धोबी घर गदहा होहौ कटी घास नहिं पैंहौ । लदी लादि आपु चढि बैठे लै घटे पहुचैंहौ ।
पंछिन मॉं तो कौवा होहौ करर करर गुहरैहौ। उडि के जय बैठि मैले थल गहिरे चोंच लगैहौ ।
सत्तनाम की हेर न करिहौ मन ही मन पछितैहौ। कहै कबीर सुनो भै साधो नरक नसेनी पैहौ ।
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तूने रात गँवायी सोय के । दिवस गँवाया खाय के ।
हीरा जनम अमोल था । कौड़ी बदले जाय ।
सुमिरन लगन लगाय के । मुख से कछु ना बोल रे ।
बाहर का पट बंद कर ले । अंतर का पट खोल रे ।
माला फेरत जुग हुआ । गया ना मन का फेर रे ।
गया ना मन का फेर रे ।
हाथ का मनका छाँड़ि दे । मन का मनका फेर ।
दुख में सुमिरन सब करें । सुख में करे न कोय रे ।
जो सुख में सुमिरन करे । तो दुख काहे को होय रे ।
सुख में सुमिरन ना किया । दुख में करता याद  रे ।
दुख में करता याद रे ।
कहे कबीर उस दास की । कौन सुने फ़रियाद ।
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ईशावास्य उपनिषद - 1 झेन फकीर के पास सुबह सुबह 1 आदमी आया । और कहने लगा कि - आप इतने शांत क्यों हैं ? और मैं इतना अशांत क्यों हूं ? उस फकीर ने कहा कि - बस मैं शांत हूं । और तुम अशांत हो । तुम अशांत हो । बात खत्म हो गई । अब इसमें कुछ और आगे कहने को नहीं है । उस आदमी ने कहा कि - नहीं । लेकिन आप शांत कैसे हुए ? उस फकीर ने पूछा कि - मैं तुमसे पूछना चाहूंगा कि तुम अशांत कैसे होते हो ? वह आदमी कहने लगा - अशांति आ जाती है । उस फकीर ने कहा - बस ऐसा ही हुआ है । शांति आ गई । और मेरा कोई गौरव नहीं है । जब तक अशांति आती थी । आती थी । मैं कुछ भी कर न सका । और जब शांति आ गई । तो अब मैं अगर अशांति लाना चाहूं । तो उतना ही बंध गया हूं । अब भी कुछ नहीं कर पाता हूं । उस आदमी ने कहा - नहीं । लेकिन मुझे भी रास्ता बताएं शांत होने का । उस फकीर ने कहा - मैं तो 1 ही रास्ता जानता हूं कि तुम यह भ्रम छोड़ दो कि तुम कुछ कर सकते हो । अशांत हो । तो अशांत हो जाओ । जानो कि अशांत हूं । मेरे हाथ में नहीं । और तब तुम पाओगे कि पीछे से शांति आने लगी । वह भी तुम्हारे हाथ में नहीं है । शांत होने की कृपा करके कोशिश मत करो । जो लोग भी शांत होने की कोशिश करते हैं । और अशांत हो जाते हैं । अशांत तो होते ही हैं । अब यह शांत होने की कोशिश और नई अशांति को जन्म दे जाती है । पर उस आदमी ने कहा कि - नहीं । मुझे बात कुछ जमती नहीं । मुझे शांत होना है । उस फकीर ने कहा - तुम अशांत रहोगे । क्योंकि तुम्हें कुछ होना है । तुम छोड़ नहीं सकते - परमात्मा पर । जबकि सब उस पर है । तुम्हारे हाथ में कुछ है नहीं । जिस दिन से हम राजी हो गए । जो था उसी के लिए । उसी दिन से हम शांत हुए । जब तक हम कुछ होना चाहते थे । तब तक हम कुछ हो न सके । पर नहीं । वह आदमी नहीं माना । उसने कहा कि - तुम्हारी शांति से ईर्ष्या पैदा होती है । और हम ऐसे मानकर चले न जाएंगे । तब उस फकीर ने कहा - रुको । जब कोई न रहे यहां । तब पूछ लेना । फिर दिन में कई मौके आए । कोई न था । उस आदमी ने फिर कहा कि - अब कुछ बता दें । अब कोई भी नहीं है । उस फकीर ने ओंठ पर उंगली रखी । और कहा कि - चुप । वह आदमी बड़ा परेशान हुआ । उसने कहा कि - जब लोग आ जाते हैं । तब मैं पूछता हूं । तो आप कहते हैं । जब कोई न रहे । और जब कोई नहीं रहता है । और मैं पूछता हूं । तो आप कहते हैं - चुप । यह हल कैसे होगा ? फिर सांझ हो गई । सूरज ढल गया । सब लोग चले गए । झोपड़ा खाली हो गया । उसने कहा कि - अब तो बताएं । तो फकीर ने कहा - बाहर आ । बाहर गए । पूर्णिमा का चांद निकला था । फकीर ने कहा - देखता है ये पौधे ? सामने ही छोटे छोटे पौधे लगे थे । उसने कहा - देखता हूं । फकीर ने कहा - देखता है वे दूर खड़े वृक्ष आकाश को छूते ? उसने कहा - देखता हूं । उस फकीर ने कहा - वे बड़े हैं । और ये छोटे हैं । और झगड़ा कुछ भी नहीं । इनमें मैंने कभी विवाद नहीं सुना । इस छोटे पौधे ने कभी बड़े पौधे से नहीं पूछा कि तू बड़ा क्यों है ? छोटा अपने छोटे होने में शांत है । बड़े ने कभी छोटे से नहीं पूछा कि तू छोटा क्यों है ? बड़े की अपनी मुसीबतें हैं । जब तूफान आते हैं । तब पता चलता है । छोटे की अपनी तकलीफें हैं । पर छोटा छोटा होने को राजी है । बड़ा बड़ा होने को राजी है । और उन दोनों के बीच मैंने कभी संवाद नहीं सुना । और मैंने दोनों को शांत पाया है । तू भी कृपा कर । और मुझे छोड़ । मैं जैसा हूं । वैसा हूं । तू जैसा है । वैसा है । ओशो.
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जीवन का संगीत पैदा होता है - प्रेम और ध्यान से । दोनों को सम्हालो । जब अकेले तब - ध्यान में । जब कोई मौजूद हो । तब - प्रेम में ।
जब प्रेम में । तो अपने को बिल्कुल भूल जाओ । और जब ध्यान में । तो दूसरे को बिलकुल भूल जाओ । और यह रूपांतरण इतना सहज होना चाहिए । इतना तरल होना चाहिए कि इसमें जरा भी अड़चन न हो । यह सहज रूप से हो जाए । जैसे तुम घर के बाहर आते । भीतर जाते । जैसे श्वास लेते । श्वास छोड़ते । इतना ही सहज होना चाहिए । ओशो
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प्रिय आत्मन ! जब भी कोई बुद्ध पुरुष हुआ हैं । तो उसकी कोई नहीं मानते हैं । जैसे कोई राजनीति में ईमानदार आते ही भष्टाचार खत्म हो जाता है । वैसे ही धर्म के ठेकेदार का नकली धर्म की पोल खुल जाती है । तो वो विरोध सबसे पहले वही ही करते हैं । मेरे 1 नाम ( महाप्रभु ) रखने से कई पंडितों की चोटी खिंची जाती है । जब कोई जागा हुआ इंसान अंधेरी नगरी में जाते ही रोशनी हो जाती है । तो यह तो होता आया है । और बुद्ध पुरुष को या तो औरत में । या धन दौलत में  बदनाम करेंगे । और हम भी ऐसे ही हैं । बुराई करने में और सुन लेने में बड़ा आनंद आता हैं । चाहे कोई लेना देना ना हो । ओशो
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मन हमें अपने साथ लिए घूमता है । जब तक सही जगह नहीं मिल जाती । तब तक वह हमें बैठने नहीं देता है । हम कहीं बैठते हैं । तो वह बारबार हमें उठा देता है । जब उसे लगता है कि हाँ अब सही जगह मिल गयी । तब वह पूरी तसल्ली करता है । और जब संतुष्ट हो जाता है । तभी वह हमसे विदाई लेता है । उससे पहले वो विदा नहीं हो सकता । इसलिए मन को बहुत बहुत धन्यवाद । सीमा 

10 मार्च 2010

दीक्षा क्या है और क्यों ?


वैसे दीक्षा कई प्रकार की होती है । योग मार्ग की, सिद्धि मार्ग की, तन्त्र मार्ग की आदि । 
ये इस बात पर निर्भर है कि हमारी चाह और स्थिति किस मार्ग की है और हमें कैसा गुरु मिला है । आत्मज्ञान या अमरता की और ले जाने वाली दीक्षा केवल संतमत की हंसदीक्षा कहलाती है । आत्मज्ञान में चार दीक्षा होती हैं । जिनमें सबसे पहली हंसदीक्षा कहलाती है और ‘सहज योग’ की पहली दीक्षा है तथा इसे गृहस्थ जीवन में आराम से किया जा सकता है ।
इस दीक्षा से वास्तविक पूजा का रहस्य समझ में आता है । ये दीक्षा अमरत्व की ओर जाने का पहला कदम है । 
दूसरी दीक्षा ब्रह्मांड से ऊपर उठने के लिए परमहंस दीक्षा कहलाती है ।
इसको फक्कड़ मंजल कहते हैं । ये आमतौर पर ग्रहस्थों के लिए नहीं है । इसमें ज्यों ज्यों 
स्थिति बढ़ती जाती है । साधक का संसार से लगाव ख़त्म होता जाता है ।
पर यदि पूर्ण अमरत्व प्राप्त करना है तो इस दीक्षा को लेना ही होगा । इस दीक्षा को लेने की सही उम्र 45 वर्ष होती है ।
हंसदीक्षा 1 साल के बच्चे से लेकर 100 साल के लोग भी प्राप्त कर सकते हैं । आपने यदि सतगुरु से हंसदीक्षा प्राप्त की है तो आपका अगला जन्म मनुष्य का होगा ।
ये दीक्षा स्त्री पुरुष कोई भी ले सकता है ।
परमहंस से ऊपर की दो दीक्षा गुप्त हैं । उनको तभी बताया जाता है जब साधक उसका अधिकारी हो । यदि आपने आत्मज्ञान की कोई दीक्षा ले ली है तो परख कर लें । ये निर्वाणी महामंत्र द्वारा दी जाती है जो सिर्फ ढाई अक्षर का है । यदि आपको बताये मंत्र में ज्यादा अक्षर आते हैं तो वह आत्मज्ञान की दीक्षा नहीं है । यदि आपने सतगुरु से दीक्षा प्राप्त की है तो अधिकतम 1-2 महीने में आपका ध्यान ऊपर जाने (खिंचाव सा होने) लगता है और आपको अलौकिक अनुभव भी होने लगते हैं । अगर ऐसा नहीं हो रहा तो आपने सतगुरु से दीक्षा नहीं ली है ।
सहज योग आत्मा को जानने का एक बेहद सरल और क्रियात्मक विज्ञान है और इसके बिना मुक्ति असंभव है ।

क्या म्रत्यु अनिवार्य है ?


मंसूर के गुरु जुनैद 1 दिन पहाड़ी पर बैठे डूबते हुये सूर्य को देख रहे थे । कुछ कुछ अँधेरा सा होने लगा था कि तभी उनको 1 काली छाया उधर से जाती हुयी दिखाई दी । जुनैद ने काली छाया से पूछा - मौत । तू इस समय कहाँ जा रही है ?
मौत बोली - जुनैद । मैं कुछ आदमियों को लेने सामने वाले गांव में जा रही हूँ ।
कुछ दिन गुजर गए । एक दिन  मौत पुनः उसी रास्ते से वापस आ रही थी ।
जुनैद ने पूछा - तू तो कुछ लोगों की बात कर रही थी  । लेकिन वहाँ तो काफी लोग मरे हैं ।  बात क्या है ? क्या तुम मुझसे झूठ बोली थी ?
मौत बोली - मैंने तो कुछ ही लोगों को मारा । बाकी सब डर के कारण स्वतः मर गए ।  मैं क्या कर सकती थी ?
मृत्यु 1 परम सत्य है । मृत्यु से बच नहीं सकते ? एक दिन सबकी मृत्यु  होनी ही है ।
लेकिन क्या मृत्यु वाकई अंतिम सत्य है ?? फ़िर अमर शब्द का अस्तित्व कैसे है ? तब इसकी परिभाषा क्या होगी ? जिन लोगों को  होने वाले  कल्कि अवतार के बारे में जानकारी है । उन्हें मालूम होगा कि इस कल्कि अवतार को शस्त्र शिक्षा स्वयं त्रेतायुग के परशुराम देंगे । 


ध्यान दें । परशुराम फ़िर से जन्म नहीं लेंगे बल्कि वे त्रेतायुग वाले ही होंगे ?? त्रेतायुग के ही जाम्बवान । द्वापर युग में श्रीकृष्ण से मिले थे । और उनकी लडकी जाम्बन्ती का विवाह भी श्रीकृष्ण से हुआ था । 
त्रेतायुग के ही हनुमान हिमालय से पूजा हेतु दिव्य कमल लेने गये अर्जुन को एक बूढे विशाल बन्दर के रूप  में रास्ते पर  मिले थे । त्रेता के हनुमान ही श्रीकृष्ण के राम रूप का दर्शन करने द्वापर में द्वारिकापुरी गये थे । 
यहां कुछ लोग सोच सकते हैं । ये भगवान और उनसे जुडे लोगों का मामला है ।..और बात क्योंकि अलौकिक है । अतः सामान्य लोगों के मतलब की नहीं है । 
पर ये सोच एकदम गलत ही है । ये आपके लिये ही है । हम कोई  उनसे अलग नहीं हैं ? सभी जानते हैं कि आत्मा अमर है । लेकिन न तो हमने आत्मा को देखा है । और न ही हम शरीर का मरना रोक पाते हैं । ऐसी  दशा में आत्मा के अमर होने की बात मुंह जबानी स्वीकारना । बस खुद को झूठी तसल्ली देने के ही समान है ।
इसलिये इसका सही उत्तर जानने के लिए हमें विभीषण । हनुमान । अश्वत्थामा । जाम्बवान । वशिष्ठ । परशुराम  आदि के बारे में जानना होगा । जो हिंदू शास्त्रों के अनुसार युगों युगों तक जीने के लिए चिरंजीवी हैं । ये सब योग विध्या के अच्छे जानकार और उच्च स्तरीय तपस्वी कहे जा सकते हैं ।  ( लेकिन इनके लिए कहीं अमर शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है ।  ) 
यहां.. अगर एक दृष्टि से देखा जाए । तो सभी अमर ही हैं । क्योंकि आत्मा तो कभी मरती नहीं है । केवल अलग अलग 84 लाख योनियों में जाने वाला भोग शरीर ही बदलता है । लेकिन वो हमारे हाथ में नहीं होता । हमारी इच्छा से नहीं होता । योगमाया का परदा प्रत्येक नये जन्म पर डाल दिया जाता है । मृत्यु पर डाल दिया जाता है । इसलिये बार बार जन्म भी होता है । बार बार मृत्यु भी होती है । इसीलिये इंसान की हमेशा यही तलाश रही कि काश ऐसा होता कि मृत्यु होती ही नहीं ? और हम हमेशा ही जीवित रहते । 
मगर क्या ऐसा होना संभव है ??
 इसका एकदम सरल उत्तर हैं । हां । ऐसा संभव है । मोक्ष और चिरंजीवी होने के लक्ष्य को बताते हुये ही हिंदू शास्त्र भरे पडे हैं । हम मोक्ष भी पा सकते हैं । और चिरंजीवी भी हो सकते हैं ? आपको आश्चर्य होगा । शास्त्रों में भले ही कुछ चिरंजीवियों का जिक्र हो । पर हकीकत में चिरंजीवी हजारों की संख्य़ा में होते हैं । लेकिन वे अपने रहस्यों  को गुप्त रखते हैं ?? 
दरअसल दिव्यसाधना द्वारा योगी उन रहस्यों को जानते हैं । जिनसे मृत्यु होती है । हमारा शरीर प्रथ्वी । जल । वायु । अग्नि । और आकाश इन पांच तत्वों का बना है  । जवानी तक ये तत्व सबल रहते है । बुढ़ापा आने पर ये तत्व निर्बल होने लगते है । और शरीर में कमजोरी दिखने लगती है । जब इन तत्वों का शरीर की जरूरत की सीमा से परे क्षरण हो जाता है । तो जीव की मृत्यु हो जाती है । 
वास्तव में योगी इन्ही तत्वों को सबल बनाते रहते है । जिससे वे सदा जवानी की अवस्था में रहते है । ( वैसे योग के गूढ रहस्यों को थोड़े शब्दों में बताना बेहद कठिन बात है । )  फिर तत्वों को सबल करने के बाद योगी देवत्व की और उठने लगता है ।..वास्तव में सही रास्ता । सही तरीका मिल जाने पर । ये कोई ज्यादा कठिन बात नहीं है । क्योंकि 84 लाख योनियों के बाद । ये मनुष्य शरीर हमें इसलिए मिला है कि हम अपनी स्थिति को ऊंचा कर सके । इसमें हम अमरता को भी प्राप्त हो सकते हैं । हम देवत्व को भी प्राप्त हो सकते हैं । अपने दुष्कर्मों से हम नरक को भी प्राप्त हो सकते हैं । और पशुवत जीवन जीने से हम 84 लाख पशु योनियों में जा सकते है । 
खाना । पीना । सोना । मैथुन में लिप्त रहना ( यानी स्वार्थपूर्ण जीवन ) ये पशुवत जीवन कहा गया है । भक्ति । परमार्थ । और इसी जीवन में खुद को जान लेना । मोक्ष लक्ष्य को प्राप्त कर लेना । सार्थक जीवन कहा गया है ।..स्वांस स्वांस पर हरि भजो । वृथा स्वांस न खोय । ना जाने । इस स्वांस को । आवन होय न होय ??? 
सावधान । सावधान । काल कब झपट्टा मार दे । पता नहीं ? इसलिये समय रहते । जीवन रहते । बचने का उपाय कर लो ??

09 मार्च 2010

सहज योग कितना अलग है ? सहज योग क्या है ?



आज संसार में कई तरह के योग प्रचलित हैं । जिनमें रामदेव बाबा की तर्ज पर पतंजलि योग साधना बहुत बड़े पैमाने पर नजर आ रही है । वास्तव में ये योग साधना शरीर के लिए अत्ति उत्तम है ।
अनुलोम विलोम से शरीर की नस नाङियाँ स्वस्थ रहती है । और मन विकार रहित होने लगता है । तथा प्राणायाम से साधक एक नयी ऊर्जा महसूस करता है । पर इसको सबसे बड़ा योग मान लेना और इसको ही भारत की प्राचीन परम्परा मान लेना एकदम गलत है ।
वास्तव में यह ऋषियों महर्षियों का शरीर तक सीमित ज्ञान है । और इसका आत्मज्ञान से अधिक वास्ता नहीं है । ये ॐ मंत्र को साथ लेकर चलता है । और ॐ से हमारे शरीर की रचना हुई है ।
शास्त्रों का अच्छा ज्ञान रखने वाले जानते हैं कि ॐ महामंत्र नहीं है । ये केवल शरीर का ज्ञान कराता है । इसलिए पतंजलि योग शरीर के लिए तो लाभदायक है । पर इसका मतलब आत्मज्ञान हरगिज नहीं है । हाँ ये जरूर कहा जा सकता है कि ये आत्मज्ञान की पहली सीङी तो है ।
इसके बजाय कुण्डलिनी जागरण कई सौ गुना बेहतर है ।


पर मेरा अनुभव ये कहता है । कुण्डलिनी जागरण करने बाले न के बराबर है । कुण्डलिनी जागरण जिस तरह आजकल सरल बताया जा रहा है । वैसा हरगिज नहीं है । वास्तव में ये एक बङी शक्ति है । जो संसार के लिए कार्य कर रही है । इसको जगाने में पूरा जन्म लगाना पङता है ।
वो भी तब जब इसका कोई ज्ञाता गुरु मिल जाय । और वो तुम्हें इस ज्ञान को देने का अधिकारी समझे । किताबों में पढकर या मनमाने तरीके से या हठयोग द्वारा जबरदस्ती कोशिश करने पर साधक की मौत तक हो सकती है । या वो पागल हो सकता है । ऐसे कई लोगों को मैं जानता हूँ । जो गलत तरीके से मनमानी मंत्र तंत्र साधना करने पर मर गये ।
सहज योग तो विना सतगुरु या पूर्णगुरु के हो ही नहीं सकता । वास्तव में सहज योग या सुरती शब्द योग सब योगों का राजा है । जिसे राजयोग कहा जाता है । पर एक मजे की बात ये है कि जिसे आजकल राजयोग बताया जा रहा है । वो राजयोग हरगिज नहीं है ।

क्या पतंजलि योग अथवा कुण्डलिनी जागरण से परमात्मा का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है ?

इसका सीधा सा सरल और एकदम सटीक उत्तर है -- नहीं ।
पतंजलि योग और कुण्डलिनी जागरण करवाने वाले गुरु पहले तो वास्तव में दुर्लभ हैं ।
यदि कहीं कोई छुपा हुआ गुरु मिल भी जाए । तो भी इस ज्ञान के जानकारों को पता है कि पतंजलि और कुण्डलिनी जागरण केवल 6 शरीरों का ज्ञान देती है । जिनमें भी कोई बिरला साधक ही 3 शरीरों तक पहुँच पाता है । ये 3 शरीर 1 स्थूल 2 सूक्ष्म 3 कारण हैं ।
परमात्मा को जानने की साधना संतमत की विहंगम मार्ग । नाम साधना ( नाम यानी महामन्त्र ) कहलाती है ।
वास्तव में यह साधना ही हमें परमात्मा का सही ज्ञान कराती है ।
पतंजलि योग के यम । नियम । आसन । प्राणायाम । प्रत्याहार । ये पांच जीवन के लिये व्यवहारिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिये । मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिये  बेहद लाभदायक हैं । इसमें कोई संदेह नहीं है ।
पर ज्यादातार आदमी ( वो भी रामदेव बाबा की बदौलत ) प्राणायाम के अनुलोम विलोम आदि को ही  मुश्किल से  सीख पाया है । इससे आगे के तीन । धारणा । ध्यान । समाधि । तो मेरे ख्याल से न कोई बताता है । न बताने वाला है ??
यहां एक बडा सवाल उठता है ? पतंजलि योग के इस दूसरे भाग को । जो बेहद महात्वपूर्ण है । और सही लाभ देने वाला है । आप किस तरह से क्रियान्वित करेंगे ।
इसमें पहले जो धारणा करनी होती है । वो आप कैसे करेंगे । और किसकी करेंगे ? क्योंकि यहां इष्ट कौन सा है ? आपको कौन बतायेगा ?

मान लीजिये आपने खुद या किसी साधु ने आपको भगवान शंकर को बता दिया । अब आगे कनेक्शन कैसे जोडेंगे ? चलो  ये भी मान लिया । साधु थोडा जानकार था ।  या आपने ही किसी किताब आदि से पढ लिया । कि शंकर को इष्ट रूप में धारणा करने पर आपको  ह्रदय कमल पर ध्यान करना होगा ।
तब आप ध्यान के लिये मन्त्र ( जो देने वाले द्वारा सिद्ध होना चाहिये । तभी काम करता है । ) कैसे पायेंगे ? मान लीजिये कोई उल्टा सीधा मन्त्र भी प्राप्त हो गया । तो मन्त्र एक्टिव किस तरह होगा ।
और आगे उसकी ध्यान विधि क्या है ? ये भी आपको नहीं पता ?? यानी मामला धारणा पर ही टांय टांय फ़िस्स हो गया । अब जब धारणा ही नहीं है  । तो फ़िर ध्यान किसका ? और कैसे करोगे ? और समाधि तो आपके लिये सपनों की चीज हो गयी ? आकाश कुसुम हो गयी ?
जैसा कि मैंने पहले ही कहा । पतंजलि योग या कुण्डलिनी ग्यान परमात्मा का मार्ग है ही नहीं । लेकिन यहां इसका उल्लेख इसलिये जरूरी लगा कि आजकल ध्यान जो मेडीटेशन के नाम से फ़ेमस है । बहुत लोग करते हैं । और ज्यादातर भ्रूमध्य ( भोंहो के बीच ) ध्यान टिकाकर इसको ध्यान होना मान लेते हैं ।
हांलाकि इसका भी लाभ है । पर वो लाभ आपके ( उस तरह से ) ध्यान पर बैठने का नहीं है । बल्कि हाय हाय फ़ांय फ़ांय की जिदगी से दूर आप थोडी देर शान्त होकर बैठे । उस बात का है ।
लेकिन मन की आंधी ने आपको वहां भी चैन से बैठने नहीं दिया ?? इससे अच्छा तो आप सोफ़े पर आराम से फ़्री स्टायल होकर बैठते । तो ज्यादा लाभ महसूस करते ।
..दरअसल मेरे कहने का अर्थ है । आज संसार के  तमाम लोग जो मेडीटेशन कर रहे हैं । उस वक्त ( ध्यान  के समय ) मन को डिसेबल करना सीख जांय । तो इतने ही समय और मेहनत में ध्यान का लाभ सौ गुना बढ जायेगा ???

खैर..ऊपर मैंने तीन शरीरों  के बारे में बताया । स्थूल ( ऊपरी या बाह्य शरीर ) सूक्ष्म ( आंतरिक शरीर । मृत्यु के  बाद यही जाता है । ) कारण शरीर ( इसी में वह तमाम कारण मौजूद हैं । जिससे आपका ये जन्म हुआ । और आगे लाखों होने वाले हैं ।..कारण में जाय के नाना संस्कार देखे ।( योग की एक स्थिति ) ) सूक्ष्म शरीर तक प्रायः छोटे मोटे योगी भी पहुंच जाते हैं । पर कारण शरीर तक ही पहुंचना बहुत दुर्लभ है ।
 याद करें भीष्म पितामह की बात कि वह मात्र सौ जन्म तक चढ पाते थे ।..अब इसके बाद महाकारण आदि शरीरो की स्थिति है । यहां पर ध्यान रखने की बात ये है । श्रीकृष्ण । जिनको योगेश्वर की पदवी मिली हुयी है । उन्होंने छह शरीर पार करके शून्य सत्ता को  जाना था । और जो परमात्मा की सत्ता नहीं है ?? यानी जिसका मतलब परमात्मा को जानना नहीं है । क्योंकि परमात्मा 0 नहीं 1 है । और 1 के बिना 0 की कोई वैल्यू नहीं है ??? इसका मतलब तो ये हुआ । कि परमात्मा किसी को नहीं मिलेगा ??
नहीं ।..ऐसा नहीं है । परमात्मा को जानने का ग्यान । चेतनधारा से जुडना । सुरति का शब्द से योग कराना । और तुम्हारे शरीर की चेतनधारा में उसका ( परमात्मा ) जो वास्तविक नाम स्वतः गुंजायमान है ।
उसको किसी सच्चे संत की कृपा से जानना । और फ़िर उसका अभ्यास करना । इसको सबसे श्रेष्ठ विहंगम मार्ग की उपमा दी गयी है ।
 बुद्ध जब साधना करते करते परेशान हो गये । और उन्होंने दुखी होकर ( परमात्मा से ) कहा । क्या मुझे कभी बोध नहीं होगा ? तब आकाशवाणी हुयी ।..ए साधक अपने शरीर के माध्यम पर ध्यान कर ??? ये शरीर का माध्यम क्या था ? आप इसका उत्तर खोजने की कोशिश करें । क्योंकि यही चेतनधारा है । जिसमें अजर । अमर । अविनाशी । परमात्मा का वास्तविक नाम अखंड गूंज रहा है ।

वह घटना बाहर की नहीं है

कहा है - सुरति फंसी संसार में । तासो हुय गयो दूर । सुरति मान थिर करो । तो आठों पहर हजूर । यानी परमात्मा कहीं दूर नहीं है । परमात्मा कहीं खोया भी नहीं हैं । परमात्मा को कहीं खोजने भी नहीं जाना है । वह तो हमारे बहुत पास है । बस तुम्ही संसार में खोये हुये हो । अपने को भूलकर भटक रहे हो । खुद को भूलकर हैरान हो रहा है । दुनियां में फ़ंसकर वीरान हो रहा है । कबीर साहब ने कहा था । ना मैं काशी । ना मैं कावा । ना हूं मैं कैलाश में । मुझको कहां खोजे है । बन्दे मैं तो तेरे पास में । कबीर की ये बात जानते तो बहुत लोग हैं । मानते भी बहुत लोग हैं । पर सवाल है कि इतने पास होते हुये भी वो मिलता क्यों नहीं है ? कितने ही ऋषि मुनि हिमालय आदि की कन्दराओं में तप कर करके गल गये । पर वो किसी को नहीं मिला । इसके पीछे 1 ही बात है । कहूं वस्तु रखी । कहीं खोजो । तो वस्तु न आवे हाथ । वस्तु तभी पाईये । जब भेदी होवे साथ । यानी जिन्होंने उसे पाया है । और जो उसका तरीका जानते हैं । परमात्मा का भेद जानने वालों को संत कहा गया है । और उसकी प्राप्ति का एकमात्र साधन हमारे घट ( शरीर ) में अखन्ड गुंजायमान । वो अविनाशी नाम ( ढाई अक्षर का महामन्त्र ) है । जो अपने भक्तों के लिये परमात्मा ने संतो को दिया है । या यूं कहे । उस परम रहस्य का राज केवल पहुंचे हुये संत ही जानते हैं । और जब वो देखते हैं कि संसार के कलेशों से तंग आ गया कोई जीव वापस प्रभु की शरण में जाना चाहता है । तो वो विधिवत ( संतमत दीक्षा द्वारा नाम देना या प्रकट करना । ) उसे नामदान देते हैं । तब संसार में फ़ैली हुयी सुरती के सिमटते ही जीव वापस अपने आनन्दधाम और वास्तविक घर सतलोक की यात्रा भजन अभ्यास से करने लगता है । यानी उसे दिव्य अनुभव होने लगते हैं । और अब तक संसार की कलेश में फ़ंसा जीव अनोखी शांति का अनुभव करता है । निज अनुभव तोहे कहूं खगेसा । बिनु हरि भजन न मिटे कलेशा । अब सुरति क्या है ? हमारे अन्तःकरण में 4 बिंदु होते है । 1 मन 2 बुद्धि 3 चित्त 4 अहम । इन्हीं से हम संसार के सभी कार्य करते हैं । वास्तव में ठीक ठीक कहा जाय । तो संसार का वजूद ही इन्हीं से है । अन्यथा तो संसार मिथ्या है । शास्त्रों में कहा है । बृह्म सत्य । जगत मिथ्या । अज्ञानता बश हम यही सत्य मान लेते हैं कि संसार ही सत्य है । वास्तव में अहम यानि । मैं । भाव और मन । बुद्धि । चित्त से ही संसार का होना सत्य लगता है । लेकिन जब ये चारों आप ( मन । बुद्धि । चित्त । अहम  ) 1 करना सीख जाते हैं । तो इन चारों के 1 होने पर उसे सुरति कहते हैं । आजकल प्रचलित योग ध्यान में इसी को एकाग्र किया जाता है । पर सच बात ये है कि सुरति शब्द साधना एकदम अलग ज्ञान है । यह गूढ़ रहस्य है । और केवल संतों की कृपा से ही प्राप्त हो सकता है ।
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सभी संतों ने । बुद्ध पुरुषों ने । सत्य को अपने अंदर ही पाया । फिर कहीं भी बाहर समर्पण पर इतना जोर क्यों दिया गया है ? अपने स्वभावानुसार या भटक कर शायद कभी कहीं और सत्य की झलक मिल भी जाए । पर बाहर तो अंधे गुरु भी मौजूद हैं । जो रात को दिन और दिन को रात कहेंगे ?
- इसे समझना जरूरी है । समर्पण बाहर होता ही नहीं । समर्पण भीतर की घटना है । गुरु बाहर हो । समर्पण भीतर की घटना है । समझो । तुम किसी के प्रेम में पड़ गए । तो प्रेमी तो बाहर होता है । लेकिन प्रेम तो तुम्हारे भीतर की घटना है । वह तो तुम्हारे हृदय में जलता है । प्रेमी मर भी जाए । तो भी प्रेम जारी रह सकता है । जारी रहेगा ही । अगर था । प्रेमी की राख भी न बचे । तो भी प्रेम अहर्निश गूंजता रहेगा । धड़कन धड़कन में श्वास श्वास में बहता रहेगा । प्रेम पात्र तो बाहर होता है । प्रेम भीतर होता है । समर्पण का पात्र तो बाहर होता है । गुरु बाहर होता है । लेकिन समर्पण तो भीतर होता है । वह घटना बाहर की नहीं है । और गुरु भी तभी तक बाहर दिखाई पड़ता है । जब तक हमने समर्पण नहीं किया । जिस दिन तुमने समर्पण किया । गुरु भी भीतर है । बाहर भीतर का भेद ही गिर गया । सीमा ही टूट गई । समर्पण करते ही । जैसे ही तुमने अपनी सुरक्षा की दीवाल तोड़ दी । सब तरह से गुरु तुम्हारे भीतर बह आता है । इसलिए तो हमने गुरु को परमात्मा कहा है । और भीतर छुपी आत्मा को परम गुरु कहा है । इससे बड़ी पहेलियां पैदा हो जाती हैं । पश्चिम के बहुत से लोग जब भारत के शास्त्रों का अध्ययन करते हैं । तो उनको लगता है कि ये तो बिलकुल पहेलियां हैं । इनमें कोई व्यवस्था नहीं है । कोई तर्कबद्धता नहीं है । कहीं कहते हो - गुरु बाहर । कहीं कहते हो - गुरु भीतर । लेकिन ये सभी बातें सच हैं । भारत की भी मजबूरी है । क्योंकि भारत सत्य को ही कहना चाहता है । वह जैसा है । उलझन भी भला खड़ी हो जाती हो । लेकिन हम सत्य को वैसा ही कहना चाहते हैं । जैसा है । जब तक शिष्य समर्पित नहीं है । तब तक गुरु बाहर है । वस्तुतः तब तक गुरु गुरु ही नहीं है । इसलिए बाहर है । तुम क्या सोचते हो । तुम्हारे समर्पण के पहले कोई गुरु हो सकता है ? 1 स्त्री रास्ते से जा रही है । क्या तुम्हें प्रेम न हुआ हो  इसके प्रति । तो क्या तुम इसे प्रेयसी कह सकते हो कि यह मेरी प्रेयसी है । अभी हालांकि मेरा प्रेम नहीं हुआ ? तो लोग तुम्हें पागल कहेंगे । जिसके प्रति समर्पण नहीं हुआ । क्या तुम उसे गुरु कह सकते हो ? वह किसी और का गुरु होगा । वह किसी और की प्रेयसी होगी । लेकिन तुम्हारा इससे क्या लेना देना ? तुम्हारा तो गुरु तभी घटता है । जब तुम्हारा समर्पण होता है । और यह बड़े मजे की बात है कि अगर तुम सच में ही समर्पण कर दो । तो तुम्हें कोई गुरु भटका नहीं सकता । वस्तुतः सचाई तो यह है कि अगर समर्पण करने वाला शिष्य मिल जाए । तो भटका हुआ गुरु भी रास्ते पर आ जाएगा । समर्पण इतनी बड़ी घटना है । जब तुम्हें रास्ते पर ला सकता है - समर्पण । तो गुरु को भी ला सकता है । लेकिन कठिनाई ऐसी है कि सदगुरु को भी शिष्य नहीं मिलते । असदगुरु को शिष्य मिलना तो बहुत मुश्किल है । अनुयायियों की बात नहीं कर रहा हूं । शिष्य की बात कर रहा हूं । जिसको नानक ने सिक्ख कहा है । सिक्ख शिष्य का अपभ्रंश है । लेकिन सिक्खों की बात नहीं कर रहा हूं । नानक के सिक्ख । वह बात ही और है । जब तुम्हारे भीतर शिष्यत्व का भाव जन्मता है । तब कोई तुम्हारे लिए गुरु होता है । और अगर तुम्हारा समर्पण पूरा हो । तो तुम बिलकुल फिक्र ही छोड़ दो कि गुरु कुगुरु है कि सदगुरु है कि क्या है । तुम चिंता ही छोड़ो । समर्पण इतनी बड़ी घटना है कि वह तुम्हें तो बदलेगी ही । उस गुरु को भी बदल डालेगी । समर्पण का मतलब है - अटूट श्रद्धा । समर्पण का अर्थ है - बेशर्त आस्था । समर्पण का अर्थ है । गुरु कहे - मरो । तो मरने की तैयारी । जीओ तो जीने की तैयारी । क्या तुमने इतना बुरा आदमी दुनिया में देखा है । जो अटूट श्रद्धा को धोखा दे सके ? अखंड श्रद्धा को धोखा देने वाला आदमी कभी पृथ्वी पर हुआ ही नहीं । हां अगर तुम्हें कोई धोखा दे पाता है तो इसलिए कि तुम्हारी श्रद्धा अखंड नहीं । तुम भी बेईमान । गुरु भी बेईमान । तुम भी रत्ती रत्ती देते हो । वह भी समझता है कि तुम कैसे दे रहे हो । वह भी छीनने की कोशिश करता है । और तुम सोचते हो कि यह गुरु बेईमान है । ठीक गुरु नहीं है । भटका देगा । अगर समर्पण किया । तो भटक जाएंगे । तुम समर्पण नहीं करना चाहते । तुम हजार बहाने खोजते हो । तुम डरे हो । और तब तुम पक्का समझो कि तुम्हें सदगुरु तो मिलने वाला ही नहीं है । तुम्हें कोई चालबाज ही मिलेगा । तुम्हारे भीतर का यह जो संदेह है । यह तुम्हें किसी असदगुरु से ही मिला सकता है । संदेह का और असदगुरु का मिलना हो सकता है । श्रद्धा और असदगुरु का मिलना होता ही नहीं । या तो गुरु भाग खड़ा होगा श्रद्धावान शिष्य को पाकर । और या बदल जाएगा । तुम कभी किसी पर श्रद्धा करके तो देखो । श्रद्धा बड़ी क्रांतिकारी कीमिया है । जिस पर तुम श्रद्धा करोगे । उसे तुम बदलना शुरू कर दोगे । छोटे बच्चे घर में पैदा होते हैं । मां बाप को बदल देते हैं । छोटे बच्चे पर ध्यान रखना पड़ता है । तो बाप को सिगरेट नहीं पीनी । शराब नहीं पीनी । कहीं यह छोटा बच्चा बिगड़ न जाए । छोटा बच्चा भी इतना छोटा नहीं है । जितना श्रद्धा से भरा हुआ शिष्य होता है । उसकी सरलता का तो मुकाबला ही नहीं है । वह इतना सरल होता है कि गुरु भी डरने लगेगा कि इतनी सरलता को धोखा देना ? इतनी सरलता को धोखा देने वाला कोई शैतान पैदा ही कभी नहीं हुआ । तुम उस भय को छोड़ो । तुम यह चिंता ही मत करो । तुम सिर्फ समर्पण की फिक्र करो । अगर तुम समर्पण कर सकते हो । तो मैं तुमसे कहता हूं कि तुम पत्थर के प्रति भी समर्पण कर दो । तो भी क्रांति घटेगी । आदमी की तो बात और, पत्थर के प्रति भी और क्रांति हो जाएगी । क्रांति समर्पण से होती है । अब इस बात को भी समझ लो । गुरु थोड़ी क्रांति करता है । शिष्य को लगता है । गुरु ने की । यह उसका निरहंकार भाव है । अगर तुम गुरु से पूछो । तो गुरु ऊपर इशारा करेगा । कहेगा - उसने की । क्योंकि वह भी जानता है । गुरु ने नहीं की । परमात्मा ने की । जीसस 1 गांव से गुजरते हैं । 1 बाजार में बड़ी भीड़ है । और 1 स्त्री आती है । उसे कोढ़ हो गया है । वह बीमार है । उसे गांव के बाहर फेंक दिया गया है । वह डरती है जीसस के सामने आने में भी । लेकिन उसे पक्की श्रद्धा है कि अगर वह जीसस का स्पर्श कर ले । तो वह ठीक हो जाएगी । लेकिन उसे डर है कि वह भीड़ गांव में उसे अंदर भी आने देगी ? तो वह किसी तरह छिपी भीड़ के अंदर प्रवेश कर जाती है । वह जीसस के सामने जाने में डरती है । वह उनसे प्रार्थना करने में डरती है । यह भी कोई बात है कहने की ? इस काम में भी उनको लगाना क्या उचित है ? वह सिर्फ किनारे से । भीड़ से आकर जीसस का कपड़े का 1 कोना छू लेती है । जीसस चौंक कर खड़े हो जाते हैं । उन्होंने कहा - किसने मुझे इतनी श्रद्धा से छुआ ? और उस स्त्री का सर्वांग बदल गया है । उसी स्त्री ने अपने शरीर को देखा होगा । भरोसा न कर सकी । उसने कहा - लेकिन मैं बदल गई । जीसस ने कहा - तू अपनी श्रद्धा के कारण बदली है । मेरा इसमें कुछ हाथ नहीं । धन्यवाद देना हो । तो परमात्मा को धन्यवाद देना । करने वाला सभी वही है । यही तो कबीर कहते हैं कि - गुरु प्रसाद से हुआ । गुरु से पूछें । तो रामानंद यह न कहेंगे । रामानंद राम की तरफ बताएंगे । राम की कृपा से हुआ । राम की कृपा से कहने का मतलब यह है कि कोई भी नहीं कर रहा है । समर्पण के भीतर ही घटना घटती है । कोई करने वाला नहीं है । तुम इस चिंता में मत पड़ो कि समर्पण बाहर है । समर्पण भीतर है । और इस चिंता में भी मत पड़ो कि जब तक हमें पक्का न हो जाए । जब तक अदालत सर्टिफिकेट न दे दे कि यह आदमी ईमानदार है कि सच्चा गुरु है । कौन अदालत देगी ? किस अदालत के बस के भीतर है ? कौन सर्टिफिकेट देगा ? कौन प्रमाणित करेगा ? और तुम अपनी बुद्धि से कैसे खोज कर पाओगे ? तुममें इतनी ही बुद्धि होती तो गुरु की जरूरत ही क्या थी ? तुम कैसे पहचानोगे । कौन सदगुरु है । कौन नहीं है ? तुम इस उलझन में ही मत पड़ो । तुम पत्थर को भी पकड़ लो । पत्थर के स्पर्श से भी तुम्हारा रोग चला जाएगा । असली सवाल हृदय का है । असली सवाल समर्पण का है । असली सवाल आस्था का है । तो मैं तुमसे कहता हूं । न तो गुरु करता है । न शिष्य करता है । श्रद्धा करवाती है । श्रद्धा से होता है । समर्पण में होता है । गुरु भी बहाना है । वह बहाना है । ताकि तुम श्रद्धा कर सको । अन्यथा तुम्हें मुश्किल होगा । बिना बहाने के श्रद्धा करनी मुश्किल होगी । तुम्हें कोई सहारा चाहिए । कोई निमित्त चाहिए । अन्यथा तुम कैसे श्रद्धा करोगे ? अगर तुम बिना किसी में श्रद्धा किए भी श्रद्धा कर सको । मात्र श्रद्धा कर सको । तो भी घटना घट जाएगी । लेकिन तब मुश्किल होता जाएगा । वह ऐसे ही होगा कि बिना प्रेयसी के और प्रेम । बिना प्रेमी के प्रेम । बस प्रेम । कोई है ही नहीं । जिसको प्रेम करना है । मगर प्रेम का भाव । कठिन होगा । होता तो है । हो सकता है । प्रेम तुम्हारी भाव दशा बन सकती है । इसलिए तो बुद्ध जैसे लोग कहते हैं - कोई जरूरत नहीं है । तुम सिर्फ प्रेम से भर जाओ । घटना घट जाएगी । प्रेम अग्नि है । श्रद्धा महा अग्नि है । क्योंकि श्रद्धा प्रेम का निखरे से निखरा रूप है । नवनीत है । ओशो
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वीर्य को जबरदस्ती रोक लेने से ब्रह्मचर्य का कोई संबंध है ? ब्रह्मचर्य तो 1 ऐसे आनंद की घटना है । जब आपका अस्तित्व के साथ संभोग शुरू हो गया । और इसलिए व्यक्ति के साथ संभोग की कोई जरूरत नहीं रह जाती । यह जरा कठिन है समझना । और अगर मैं कहूं । तो बहुत बेचैनी होगी । संत वैसा व्यक्ति है । जिसका अस्तित्व के साथ संभोग शुरू हो गया । वहां कोयल कूकती है । तो उसका पूरा शरीर संभोग के आनंद को अनुभव करता है । वह वृक्ष में फूल खिलते हैं । तो उसके पूरे शरीर पर जैसी संभोग में आपको थिरक अनुभव होती है । उसका रोआं रोआं वैसा थिरकता है । और नाचता है । सुबह सूरज उगता है । रात चांद आकाश में होता है । तो हर घड़ी संभोग की समाधि उसे उपलब्ध होती रहती है । उसका रोआं रोआं संभोग में समर्थ हो गया है । आपका केवल जननेंद्रिय संभोग में समर्थ है । इस संबंध में 1 बात समझ लेनी जरूरी है । कभी खयाल भी नहीं आया होगा । हमने शिव की प्रतिमा, शिवलिंग निर्मित की है । शिव जैसे पूरे के पूरे लिंग हैं । इसका मतलब यह होता है । इसका मतलब होता है । शिव के पास न आंखें हैं । न हाथ हैं । न पैर हैं । मात्र लिंग है । सिर्फ जननेंद्रिय है । यह संतत्व की आखिरी दशा है । जब व्यक्ति का पूरा शरीर जननेंद्रिय हो गया । इसका प्रतीक अर्थ यह हुआ कि अब वह पूरे शरीर के साथ जगत के साथ संभोग में रत है । अब यह संभोग लोकल नहीं है । यह जननेंद्रिय और जननेंद्रिय का मिलना नहीं है । अब यह अस्तित्व और अस्तित्व का मिलना है । शिव का शिवलिंग हमने निर्मित करके जगत को 1 ऐसी धारणा दी है । जिसका हिसाब लगाना मुश्किल है ।
शिवलिंग का अर्थ है - 1 ऐसी दशा । जब तुम्हारा पूरा शरीर रोएं रोएं से संभोग अनुभव कर सकता है । तभी तुम्हें जननेंद्रिय के संभोग से छुटकारा मिलेगा । और ब्रह्मचर्य उपलब्ध होगा । तो ब्रह्मचर्य भोग से मुक्ति नहीं है । परम भोग का आस्वाद है । लेकिन भोग इतना परम हो जाता है कि तु्म्हें उसे करने की अलग से जरूरत नहीं होती । हवा का झोंका आता है । तो तुम्हारा रोआं रोआं उस पुलक को अनुभव करता है । जो प्रेमी अपनी प्रेयसी के स्पर्श से अनुभव करेगा ।
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प्रेम - प्रेम सबसे बड़ी कला है । उससे बड़ा कोई ज्ञान नहीं है । सब ज्ञान उससे छोटे हैं । क्योंकि और सब ज्ञान से तो तुम जान सकते हो बाहर बाहर से । प्रेम में ही तुम अंतर्गृह में प्रवेश करते हो । और परमात्मा अगर कहीं छिपा है । तो परिधि पर नहीं । केंद्र में छिपा है ।
और 1 बार जब तुम 1 व्यक्ति के अंतर्गृह में प्रवेश कर जाते हो । तो तुम्हारे हाथ में कला आ जाती है । वही कला सारे अस्तित्व के अंतर्गृह में प्रवेश करने के काम आती है । तुमने अगर 1 को प्रेम करना सीख लिया । तो तुम उस 1 के द्वारा प्रेम करने की कला सीख गए । वही तुम्हें 1 दिन परमात्मा तक पहुंचा देगी । इसलिए मैं कहता हूं कि - प्रेम मंदिर है । लेकिन तैयार मंदिर नहीं है । 1-1  कदम तुम्हें तैयार करना पड़ेगा । रास्ता पहले से पटा पटाया तैयार नहीं है । कोई राजपथ है नहीं कि तुम चल जाओ । चलोगे 1-1  कदम । और चल चल कर रास्ता बनेगा - पगडंडी जैसा । खुद ही बनाओगे । खुद ही चलोगे । इसलिए मैं प्रेम के विरोध में नहीं हूं । मैं प्रेम के पक्ष में हूं । और तुमसे मैं कहना चाहूंगा कि अगर प्रेम ने तुम्हें दुख में उतार दिया हो । तो अपनी भूल स्वीकार करना । प्रेम की नहीं । क्योंकि बड़ा खतरा है । अगर तुमने प्रेम की भूल स्वीकार कर ली । तो यह मैं जानता हूं कि तुम साधु संतों की बातों में पड़ कर छोड़ दे सकते हो - प्रेम का मार्ग । क्योंकि वहां तुमने दुख पाया है । तुम थोड़े सुखी भी हो जाओगे । लेकिन आनंद की वर्षा तुम पर फिर कभी न हो पाएगी । कैसे तुम चढ़ोगे ? तुम सीढ़ी ही छोड़ आए । गिरने के डर से तुम सीढ़ी से ही उतर आए । चढ़ोगे कैसे ? गिरोगे नहीं । यह तो पक्का है । जिसको हम सांसारिक कहते हैं । गृहस्थ कहते हैं । वह गिरता है सीढ़ी से । जिसको हम संन्यासी कहते हैं - पुरानी परंपरा धारणा से । वह सीढ़ी छोड़कर भाग गया । मैं उसको संन्यासी कहता हूं । जिसने सीढ़ी को नहीं छोड़ा । अपने को बदलना शुरू किया । और जिसने प्रेम से ही । प्रेम की घाटी से ही । धीरे धीरे प्रेम के शिखर की तरफ यात्रा शुरू की ।  कठिन है । जीवन की संपदा मुफ्त नहीं मिलती । कुछ चुकाना पड़ेगा । अपने से ही पूरा चुकाना पड़ेगा । अपने को ही दांव पर लगाना पड़ेगा । और प्रेम जितनी कसौटी मांगता है । कोई चीज कसौटी नहीं मांगती । इसलिए कमजोर भाग जाते हैं । और भागकर कोई कहीं नहीं पहुंचता । प्रेम के द्वार से गुजरना ही होगा । हां उसके पार जाना है । वहीं रुक नहीं जाना है ।  ओशो
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प्रेम - अगर प्रेम में उतर गये । तो प्रेम की समझ तो आ जायेगी । लेकिन अध्ययन नहीं हो सकेगा । अध्ययन के लिये दूरी चाहिये । और तटस्थता चाहिये । और फासला चाहिये । प्रेम के लिये दूरी मिटनी चाहिये । सब फासले गिरने चाहिये । तब प्रेम की समझ का तो उदय होगा । लेकिन उस समझ को हम अध्ययन नहीं कह सकते । ओशो
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आत्मा का कोई घर नही था ।  वह दूसरे के घर में आया है ।  जैसे कोई किसी बड़े शहर में घूमने आता है । जिस समय व्यक्ति अपने शरीर को अपनी आत्मा में स्थित कर लेता है । तो शरीर उसके घर की पहचान करा देता है । वह अपने घर चला जाता है ।
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प्रेम की कला सीखो । यह कोई संपति नहीँ है । ये कला है । वृक्ष को देखो । तो प्रेम से देखो । कैसा हरा है । कैसे फूल खिले हैँ । ज़रा पास जाओ । वृक्ष को छुओ । और तुम पाओगे । भीतर कोई सोया था । जागने लगा । चाँद सितारोँ को देखो । पत्थर पहाड़ों को देखो । सरोवर सागर को देखो । मगर प्रेम से । प्रेम तुम्हारी शैली बन जाये । ओशो
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100 साल बाद लोग बिलकुल ठीक ढंग से ये जान पायेंगे कि मुझे ग़लत क्यों समझा गया । क्योंकि मैं रहस्यवाद और अतर्क की शुरुआत हूं । मैं अतीत से जुड़ा हुआ नहीं हूं । अतीत मुझे समझ न पायेगा । केवल भविष्य मुझे जान पायेगा ।
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पंच कोश five bodies
1 अन्नमय कोश food body - पृथ्वी earth
2 प्राणमय कोश energy body - अग्नि fire
3  मनोमय कोश mental body - जल water
4 विज्ञानमय कोश intuitive body - वायु air
5 आंनदमय कोश bliss body  - आकाश ethar

08 मार्च 2010

जय सतगुरु की जय जय श्री गुरुदेव |

मैंने ये ब्लाग शाश्वत सत्यकीखोज में लगे हुए उन ज्ञान पिपासुओं को ध्यान में रखकर बनाया है । जो सदियों से जीवन का रहस्यमय सत्य जानना चाहते हैं । पर वास्तव में बहुत कम लोग ही सोच पाते हैं कि आखिर हम हैं कौन ? कहाँ से आये हैं ? कहाँ जाना है ? आखिर इस पृथ्वी पर जिसे मृत्यु लोक कहा जाता है । इतनी विषमता क्यों है ? कोई अमीर कोई गरीब । कोई सुखी । कोई दुखी है । इसलिये सामान्यतयाः कोई भी इंसान क्यों न हो । किसी भी देश काल जाति धर्म मजहब का क्यों न हो । सभी के सामने तीन खास प्रश्न है  1 मैं कौन हूँ ? 2 भगवान का असली नाम क्या है ? 3 इस जीवन का लक्ष्य क्या है आदि ? आज से लगभग 7 साल पहले तक द्वैत की 18 साल की पढाई के बाबजूद भी ये प्रश्न और ऐसे प्रश्न समय बेसमय मेरे मन को झिंझोडते रहे । इस बात को आप यूं समझिये कि भूखे का पेट खाली बातों से नहीं भरता ? गुङ की मिठास खाये बिना महसूस नहीं हो सकती ? भगवान है ? नहीं है ? हर एक सामान्य इंसान की तरह । ये दो आस्तिक और नास्तिक अस्तित्व मेरी विचार सत्ता को हिलाते रहते थे । कभी आस्तिक के तर्क प्रबल हो जाते । तो नास्तिक ढेर हो जाता । पर नास्तिक के तर्क भी कम प्रबल नहीं थे । वह प्रत्यक्ष प्रमाण मांगता । तो आस्तिक ढेर हो जाता । आसपास के बुजुर्गों से पूछा । आपने कभी भगवान देखा है ? या आपकी एक दो पीढी पहले किसी ने देखा हो ? तो सदैव उन्हें असहाय भाव से इंकार करते हुये ही पाया । आपको कांफ़ीडेस है कि आप जो पूजा परम्परा । जो आस्तिक हमारे दिमाग में फ़िट कर रहे हो । उसकी कोई ठोस वजह है ? उसका आज कल या आगे चलकर कोई लाभ होगा ? भगवान को देखा जा सकता है । या नहीं ?
क्यों ? मेरे पास उसके लिये बहुत से प्रश्न हैं । मैं उससे समय समय पर बात करना चाहता हूं । पर कहीं कोई जबाब नहीं था । जो हमें सिखाते थे । कि पूजा करो ? परम्परा का पालन करो । वही क्यों करें । इसकी कोई वजह नहीं बता पाते थे । तमाम साधु संत भी मौन मिले । बाबा । भगवान देखने को मिल जायेगा ? हां क्यों नहीं । मेहनत करोगे । अवश्य मिलेगा । आपको मिला ? मौन ? मौन क्यों हो ? जब भी भगवान की बात करता हूं । मौन क्यों हो जाते हो ? सदियों से भगवान भगवान चिल्ला रहे हो । रामायण भागवत करके हमारे कान फ़ोडते हो । पर मैं कहता हूं । किसी को मिला क्या ? तो मौन हो जाते हो । 
ये भगवान के नाम पर इतना अज्ञात सन्नाटा क्यों है ? क्यों नहीं बताते । कोई परमात्मा है ? कोई भगवान है ? किसी ने देखा था । ये इतनी मोटी मोटी धर्म किताबें । किसने । किसके लिये ? और क्यों लिखी ? आप सब बोलते क्यों नहीं हो ?

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