10 मार्च 2010

दीक्षा क्या है और क्यों ?


वैसे दीक्षा कई प्रकार की होती है । योग मार्ग की, सिद्धि मार्ग की, तन्त्र मार्ग की आदि । 
ये इस बात पर निर्भर है कि हमारी चाह और स्थिति किस मार्ग की है और हमें कैसा गुरु मिला है । आत्मज्ञान या अमरता की और ले जाने वाली दीक्षा केवल संतमत की हंसदीक्षा कहलाती है । आत्मज्ञान में चार दीक्षा होती हैं । जिनमें सबसे पहली हंसदीक्षा कहलाती है और ‘सहज योग’ की पहली दीक्षा है तथा इसे गृहस्थ जीवन में आराम से किया जा सकता है ।
इस दीक्षा से वास्तविक पूजा का रहस्य समझ में आता है । ये दीक्षा अमरत्व की ओर जाने का पहला कदम है । 
दूसरी दीक्षा ब्रह्मांड से ऊपर उठने के लिए परमहंस दीक्षा कहलाती है ।
इसको फक्कड़ मंजल कहते हैं । ये आमतौर पर ग्रहस्थों के लिए नहीं है । इसमें ज्यों ज्यों 
स्थिति बढ़ती जाती है । साधक का संसार से लगाव ख़त्म होता जाता है ।
पर यदि पूर्ण अमरत्व प्राप्त करना है तो इस दीक्षा को लेना ही होगा । इस दीक्षा को लेने की सही उम्र 45 वर्ष होती है ।
हंसदीक्षा 1 साल के बच्चे से लेकर 100 साल के लोग भी प्राप्त कर सकते हैं । आपने यदि सतगुरु से हंसदीक्षा प्राप्त की है तो आपका अगला जन्म मनुष्य का होगा ।
ये दीक्षा स्त्री पुरुष कोई भी ले सकता है ।
परमहंस से ऊपर की दो दीक्षा गुप्त हैं । उनको तभी बताया जाता है जब साधक उसका अधिकारी हो । यदि आपने आत्मज्ञान की कोई दीक्षा ले ली है तो परख कर लें । ये निर्वाणी महामंत्र द्वारा दी जाती है जो सिर्फ ढाई अक्षर का है । यदि आपको बताये मंत्र में ज्यादा अक्षर आते हैं तो वह आत्मज्ञान की दीक्षा नहीं है । यदि आपने सतगुरु से दीक्षा प्राप्त की है तो अधिकतम 1-2 महीने में आपका ध्यान ऊपर जाने (खिंचाव सा होने) लगता है और आपको अलौकिक अनुभव भी होने लगते हैं । अगर ऐसा नहीं हो रहा तो आपने सतगुरु से दीक्षा नहीं ली है ।
सहज योग आत्मा को जानने का एक बेहद सरल और क्रियात्मक विज्ञान है और इसके बिना मुक्ति असंभव है ।
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