28 फ़रवरी 2012

कैसे लगे मठा के आलू ?

अभी 25 feb 2012 को चण्डीगढ के कुलदीप सिंह जी हमारे घर खाना खाते हुये बोले - जब भी मैं आता हूँ । एक नयी सब्जी खाने को मिलती है । राजीव जी ये कौन सी सब्जी है ?
- मठ्ठा के आलू । मैंने जबाब दिया ।
अब और भी समस्या थी । कुलदीप को मठा ? ही नहीं मालूम था । क्या होता है । मैंने उसका दूसरा नाम छाछ भी बताया । पर उन्हें वो भी नहीं मालूम था ।
- क्या लस्सी ? उन्होंने कहा - लस्सी से मठ्ठा से बोलते हैं । अब मेरे लिये समस्या थी । UP में लस्सी - दही पानी चीनी बरफ़ को मिलाकर मिक्सर या रई या मथानी से खूब मिक्स ( फ़ेंटने की तरह ) कर देने को बोलते हैं ।
अतः मैंने कहा - दही को थोङा पानी मिलाकर मिक्सर में चलाने पर जो बनेगा । उसे क्या कहते हो ?
- लस्सी । कुलदीप  बोले - पर उसमें नमक और मिलाते हैं ।
मैं सोच में पङ गया । पंजाब में लोग छाछ को नहीं जानते क्या ? तब दही को मथकर जो देशी घी निकाला जाता होगा । और मक्खन निकलने के बाद जो शेष ? बचता होगा । उसका क्या उपयोग करते होंगे ? या फ़िर उससे क्या कहते होंगे ?
मैंने कहा - पंजाब में मठा के आलू नहीं बनाये जाते क्या ? कुलदीप ने ना में जबाब दिया ।
इससे पहली बार भी कोई स्पेशल सब्जी नहीं थी । बल्कि प्याज द्वारा तले हुये उवले आलू थे । कुलदीप को वो भी समझ में नहीं आये । और उसके बारे में भी पूछा । मुझे तब भी हैरानी हुयी ।
UP के ग्रामीण अंचलों में मठा के आलू सब्जी को बहुत पसन्द किया जाता है । हालांकि शहरी सभ्यता के प्रसार से असली मठ्ठा सहज उपलब्ध न होने से महिलायें दही को चलाकर विकल्प के रूप में अपनाती है । लेकिन गाँव के मठ्ठा ? का मजा ही अलग है ।
चलिये आज आत्म पूजा ज्ञान के जगह पेट पूजा ज्ञान के बारे में बात करते है । जान है तो जहान है । वरना तो दुनियाँ वीरान है ।
मेरे घर में जो तले आलू बनते हैं । उसके लिये आलू उबाल लिये । 1 प्याज महीन काट लिया । 4 आलू पर 1 प्याज । थोङा सा हरा धनिया । पिसी सूखी खटाई या अमचूर । हरी मिर्च । लाल मिर्च । नमक । और सरसों का तेल । टमाटर खाने के शौकीन 1 टमाटर भी काट कर मिला सकते हैं । और साबुत धनिया बीच में से आधा तोङा हुआ ( ये कोई विशेष दिक्कत नहीं है । आप लगभग 1 चम्मच साबुत धनिया आलू तलने के समय ही चकला बेलन या सिल बटना पर रखकर हल्का हल्का बेलन फ़िरा दें । धनिया आधा आधा टूट जायेगा । इसको हमेशा ताजा ही तोंङे । बहुत खुशबू आयेगी )
अब चलिये बनाते हैं । ये सिर्फ़ कङाही या तवे पर बनायें । तेल गर्म करें । धुँआ उठने लगे । तब प्याज डाल दें । और हल्का सा तलें । अब साबुत तोङा हुआ धनिया डाल  दें । इसके बाद उबले आलू के टुकङे डाल दें । थोङी देर इसको कङछी आदि से मिलायें । यदि टमाटर मिलायें । तो भी आलू के साथ ही डाल दें । इसके बाद - नमक । लाल मिर्च । खटाई । हरी मिर्च । आप स्वाद

अनुसार डाल सकते हैं । इसकों फ़िर से कङछी से तीन चार बार थोङी ही देर चलायें । बस आपके तले हुये आलू तैयार है । खटाई के स्थान पर थोङा नीबू भी निचोङ सकते हैं ।
- वृत उपवास में खाये जाने वाले । सैंधा नमक के तले आलू । इससे भी अधिक स्वादिष्ट लगते हैं । वो मुझे बहुत पसन्द हैं । तरीका वही है । पर उसमें प्याज खटाई टमाटर साबुत धनिया आदि नहीं पङते ।
- तेल गर्म करें । उबले आलू डाल दें । सिर्फ़ कटा हुआ हरा धनिया । कटी हरी मिर्च । और सैंधा नमक ( जिसको बहुत जगह लाहौरी नमक भी बोलते हैं ) स्वाद अनुसार डाल सकते हैं । इसमें थोङी सी ही पिसी काली मिर्च भी डाल सकते हैं । बस इन सबको थोङी देर चलायें । और आपके खाने के लिये मजेदार व्यंजन तैयार है ।
मेरे यहाँ इनको आलू के चिप्स तलकर उनके साथ खाया जाता है । एक चिप्स में तला आलू रखा । और खाया । अगर संयोगवश आपको अभी तक इन्हें खाने का चांस नहीं बना । तो निसंदेह आप एक बेहतरीन स्वाद से वंचित है । सबसे बङी बात है कि बेहद गुणकारी सैंधा नमक से बने होने के कारण ये पेट रोग आँखों सुस्ती आदि दूर करने में कई तरह से स्वास्थय के लिये लाभकारी हैं ।
अब आईये । मठा के आलू की बात करते हैं । कम से कम UP के त्यौहार । और दावतें । बारात भोज मठा के आलू के बिना बेकार लगती हैं । और इनको बनाना बहुत आसान है ।
- आलू उवाल लें । टुकङे कर लें । अगर 10 आलूओं की सब्जी है । तो 3 आलू बिलकुल पीसे हुये के समान कर लें ( हाथ से ही दबाकर हो जाते हैं । पीसने की आवश्यकता नहीं ) । इनको और टुकङों को एक प्लेट आदि में तैयार रख

दें । तेल गर्म करें । धुँआ उठने पर जीरा डालकर भूने । जीरा भुन जाने पर आलू डाल दें । थोङा सा चलायें । अब असली बात आती है । अब इसमें मठ्ठा डालें । और धीरे धीरे चमचा आदि से घुमाते रहें । वरना मठ्ठा फ़ट जायेगा ।
मठ्ठा के आलू का यही खास विज्ञान है । चमचा चलाते रहना । जो हरेक कोई नहीं सीख पाता । यदि मठ्ठा फ़्रिज से निकाल कर उपयोग करना है । तो लगभग 1 घन्टा पहले ही निकाल कर रख दें । ताकि उसमें ठण्डक न रहे । यदि मठ्ठा उपलब्ध नहीं । तो दही और पानी को मिक्सर या मथानी से चलाकर बना सकते हैं । लेकिन कुलदीप की तरह उसमें नमक नहीं डाला जाता ।
यदि आप हल्का खट्टा पसन्द करते हैं । तो मठ्ठा भी ताजा और हल्का खट्टा होना चाहिये । अधिक खट्टा खाने के लिये रखे हुये मठ्ठे को 1 दिन बाद उपयोग में लायें । इसको प्रेसर कुकर आदि में सीटी लगाकर नहीं बनाया जाता । बल्कि खुले बर्तन में बनाया जाता है । बस सावधानी यही होती है कि कुछ देर तक इसको बार बार चलाते रहना होता है । इससे मठ्ठा फ़टता नहीं है । मठ्ठा फ़ट जाने पर स्वाद में वो बात नहीं रहती । दूसरे इसको तब तक खदकाया ( धीरे धीरे पकाना ) जाता है । जब तक एक सोंधी सोंधी सी खुशबू न आने लगे । मठ्ठा बहुत अधिक गाङा न बनायें । बल्कि मध्यम रखें । न गाङा । न पतला ।
मठ्ठा के आलू में सिर्फ़ हरा धनिया ही डाल सकते हैं । नमक स्वाद अनुसार । और लाल मिर्च बहुत थोङी डालना 


चाहिये । ये सब मठ्ठा डालने के बाद चला लेने पर डाल दें । इसके अलावा इसमें कुछ नहीं डाला जाता । हरे धनिया डाले वगैर इसका मजा आधा रह जाता है ।
अब आगे की बात सुनिये । मैं इसको कई तरीके से खाता हूँ । मठ्ठा के आलू तैयार हो जाने के बाद देशी घी में सिर्फ़ 2 कली कटा लहसुन भूनकर तङका लगाकर ये और भी स्वादिष्ट लगता है । तङके में । यदि खाने के शौकीन हों । तो अतिरिक्त लाल मिर्च भी डाल सकते हैं । मठ्ठा के आलू उबले सादा चावल ( पुलाव खिचङी आदि नहीं )  के साथ खाने में बहुत टेस्टी लगते हैं । ध्यान रहें । लहसुन का तङका सिर्फ़ उतनी सब्जी में तुरन्त लगायें । जितनी अभी खानी है । पूरी  सब्जी में ऐसा तङका लगाकर उसको रख देने से उसका स्वाद बेकार हो जाता है । जिनका पेट साफ़ नहीं होता । या कब्ज रहता है । उन्हें बहुत फ़ायदा करता है । और टेस्टी तो होते ही हैं ।

27 फ़रवरी 2012

SUPREME POWER

अब मामला बङा अजीव सा हो गया है । इसलिये कुछ भी लिखने में मन ही नहीं लगता । दरअसल सच पूछा जाये । तो लिखने को नया ( आत्म ज्ञान पर ) कुछ है भी नहीं । बहुत कुछ लिखा बोला जा चुका है । और बङे सटीक और प्रमाणिक रूप में मौजूद है । बस वो कैसे है ?  जो उपलब्ध है । वो होता कैसे है ? इसको बताने वाला क्रियात्मक रूप देने वाला चाहिये । कबीर ने बङी सरलता से दो दो लाइनों में सभी गूढ रहस्य बता दिया है । ओशो ने बाल की खाल निकाल कर रख दी है । इसलिये और कुछ जोङने की आवश्यकता ही नहीं । जो है । जीव की क्षमता विकसित करने हेतु पर्याप्त है । पर्याप्त से बहुत अधिक ही है । बस उसको पढने गढने चढने की आवश्यकता भर है ।
लोग मुझसे कहते हैं - महाराज जी कृपा बनाये रखना । मैं कहता हूँ । कृपा के बोरे भरे हुये हैं । जितनी चाहो लो ।

लेकिन लेना होगा । और इस लेने के लिये मेरी से अधिक आपको अपनी कृपा की आवश्यकता होगी । जब आप खुद अपने ऊपर कृपा करेंगे । तो मार्ग आसान है । कोई कठिनाई नहीं है । बस रास्ते का विवरण और जाने का तरीका समझना है । फ़िर तो जाना भर शेष है । और ये भी तय है कि एक न एक दिन आपको वहाँ जाना ही होगा । अभी तक के विपरीत चलना होगा । बाहर से अन्दर की ओर । पीछे की ओर । हम आये कहाँ से है ? हमारा उदगम क्या है ?
इस मामले में मैं हमेशा खासा चालाक रहा । मैंने अंधों की भांति व्यवहार नहीं किया कि - लगे रहो इण्डिया । रिजल्ट चाहे कुछ निकले या निकले । मेरा सिद्धांत ही यह है कि - पहले इस्तेमाल करो । फ़िर विश्वास करो ।
इसलिये हर देवी देवा पूजा पाठ में मीन मेख निकालना मेरी आदत रही । जो मैं कर रहा हूँ । उसका फ़ल क्या होगा

? कर्म किये जा । फ़ल की इच्छा मत कर । जैसा गीता का सिद्धांत ( मगर मोटे रूप में । जैसा आम आदमी इसको समझता है । वास्तव में सही अर्थों में तो ये बहुत उच्च और गूढ बात है ) मेरी समझ के बाहर था । क्योंकिं खास हिन्दू परम्परा का तो पूरा जोर ही इस बात पर है कि आज जो कुछ भी अच्छा बुरा हमें प्राप्त हुआ है । उसका आधार हमारे पूर्व ( जन्मों के ) कर्म ही हैं । फ़िर अंधी पूजा क्यों ?अंधा कर्म क्यों ?और ध्यान दें । ये अंधी पूजा । अंधे कर्म । घोर अज्ञानी पण्डितों मुल्लों आदि ऐसे लोगों द्वारा ही समाज में स्थापित किये गये है । लोग सच्चाई जान न लें । धार्मिक पुस्तकों तक में छेङछाङ कर दी गयी । अर्थ का अनर्थ कर दिया गया । जबकि धर्म सूत्र ऐसा कभी नहीं कहीं नहीं कहते । आगे प्रमाण देखिये ।
मज्जन फल पेखिअ ततकाला । काक होहिं पिक बकउ मराला ।
सुनि आचरज करै जनि कोई । सतसंगति महिमा नहिं गोई ।
इस तीर्थ राज में स्नान का फल तत्काल ऐसा देखने में आता है कि कौए कोयल बन जाते हैं । और बगुले हंस । यह सुनकर कोई आश्चर्य न करे । क्योंकि सतसंग की महिमा छिपी नहीं है ।
बालमीक नारद घटजोनी । निज निज मुखनि कही निज होनी ?
वाल्मीकि नारद और अगस्त्य ने अपने अपने मुखों से अपनी होनी ( जीवन का वृत्तांत । आगे की बात ) कही है ।

अब इनमें नारद और अगस्त्य के वारे में आम लोग भले ही न जानते हों । पर डाकू से महर्षि बने वाल्मीकि को तो ज्यादातर लोग जानते ही हैं । बुद्ध अंगुलिमाल को तो जानते ही हैं । एक कट्टर डाकू का उच्च ज्ञान को उपलब्ध होना । क्या अगले जन्म में हुआ था ? पर लोग कैसे पागल है । सङी गली अंधी परम्पराओं का बोझा ढोये जा रहे हैं । इसलिये मेरे दिमाग में हमेशा ही ये बात रही कि - जो मैं करूँगा । उसका फ़ल कब  क्या कैसे क्यों होगा ? और एक आम सोच आम लालच आम जिज्ञासा वाली वात - सर्वोच्च शक्ति कौन है ?  SUPREME POWER कौन है ? ये साथ में रहती ही है । गौर करिये । ये बात सिर्फ़ मेरे साथ नहीं । आप सबके साथ भी है ।
SUPREME POWER ? एक बार भी आपकी कील इसी बिन्दु पर अटक जाये । तो समझ लो बहुत बङा मैदान मार लिया । बहुत सा कचरा स्वतः गिर गया । ये कोई उपदेश नहीं दे रहा । ठीक यही मेरे साथ हुआ । इसलिये अनुभूत ही बता रहा हूँ । राम की कथायें पढ लो । कृष्ण की पढ लो । शंकर की । जीसस की । मुहम्मद की  । 


नानक की । किसी की भी पढो । सभी यही कह रहे हैं - वो कोई और ही है ? अर्थात मैं जो ये ? हूँ । वो इससे अलग है । सबसे अलग । और वो जो है । वही सर्वोच्च है । SUPREME POWER
और बस इतना ही नहीं कह रहे । साथ में यह भी कह रहे हैं । वही सबका ध्येय है । वही सवका लक्ष्य भी है । वही शाश्वत सत्य भी है । उसको ही जानना । वास्तव में कुछ जानना है । बाकी का जाना हुआ अज्ञान ही है । धोखा । खुद का खुद के साथ ही धोखा । इसलिये मेरी सभी चेष्टायें इसी एक बिन्दु पर केन्द्रित होकर रह गयी । SUPREME POWER
और ये विचार बङा ही अनोखा था । इसने तमाम पुराने क्षीण शक्ति विचारों को ही पलक झपकते नष्ट कर दिया । SUPREME POWER पर एकनिष्ठ केन्द्रित होते ही एक भयंकर तूफ़ान मेरे अस्तित्व में आया । प्रलय होने लगी । तब राम कृष्ण शंकर बृह्मा विष्णु देवी देवा नानक मुहम्मद जीसस कबीर दादू पलटू कितने गिनाऊँ । सब पतझङ के सूखे पत्तों की भांति अस्तित्व हीन होकर झङ गये । कोई बचा ही नहीं । उस भयंकर आँधी में मैं भी नहीं बचा । मेरा भी समूल खात्मा हो गया । और ये सब मुझ पर ही तो आश्रित थे । इनके डेरे तम्बू मेरे अस्तित्व की चहारदीवारी में ही बने थे । और जब मैं ही न रहा । तो फ़िर ये बेचारे कहाँ रहते ? यही एकमात्र सत्य था । शाश्वत सत्य ।
अब खास बात - आज मैंने बङा सरल और बङा ही विलक्षण प्रयोग आपको दिया है । ऐसा नहीं  कि ये सिर्फ़ मेरे साथ हुआ । आप करेंगे । तो आपके साथ भी ऐसा ही होगा । बस - एकनिष्ठ होकर केन्द्रित । होने वाली बात याद रखना ।
- अभी वैसे लिखना बहुत कम हो पा रहा है । वजहें कई है । यदि सम्भव हुआ । तो आगे बताऊँगा ।  SUPREME POWER बेवसाइट पर हिन्दी और इंगलिश में लेख उपलब्ध होंगे । लेकिन ब्लाग भी बन्द नहीं होंगे । दोनों ही बेवसाइट का एड्रेस url अलग अलग है । जिनको आप नोट कर सकते हैं ।
- कुछ और बातें यहाँ भी हैं । क्लिक करें ।

25 फ़रवरी 2012

चिंताहरण - कौरारी आश्रम

विश्व प्रसिद्ध चूङियों के शहर फ़ीरोजावाद ( से 22 किमी ) मुस्तफ़ाबाद रोड पर
" चिंताहरण " कौरारी आश्रम । नगला भादों के पास

आगरा से 44 किमी फ़िरोजाबाद और फ़ीरोजावाद ( से 22 किमी ) मुस्तफ़ाबाद रोड पर
कोटला चुंगी ( फ़िरोजाबाद ) से फ़रिहा के लिये बस जाती है । फ़रिहा के आगे मुस्तफ़ाबाद है । और फ़रिहा और मुस्तफ़ाबाद के बीच में है - कौरारी ।

चिंताहरण के बारे में विस्तार से कुछ और जानने हेतु क्लिक करें ।

दिल्ली से आने पर एटा । एटा से फ़िरोजाबाद वाली बस में । मुस्तफ़ाबाद से आगे 5 किमी है - कौरारी । एटा वाली बस आपको सीधा कौरारी पर उतार देगी ।
ट्रेन से आने पर आगरा के बजाय सीधा फ़िरोजाबाद ही आयें । कोई दिक्कत होने पर ब्लाग पर लिखे फ़ोन नम्बर पर सम्पर्क करें । 
सभी चित्र - कुलदीप सिंह चण्डीगढ । चिंताहरण - कौरारी आश्रम से लौटकर ।
आपका बहुत बहुत धन्यवाद कुलदीप जी । 

22 फ़रवरी 2012

बेटा श्रवण कुमार कभी मत बनना

बङे बङे ज्ञानी महाज्ञानी आदि इस बात को लेकर एकमत हैं कि - धर्म में तर्क को कोई स्थान नहीं हैं । अर्थात यह तर्क से सिद्ध नहीं हो सकता । या जाना नहीं जा सकता । पर शायद सबसे अलग राजीव बाबा की थ्योरी कुछ और ही है ? हर बात में नुक्स ( क्या क्यों कब कैसे ) निकालना । और जिस बात की मना की जाय । उसे जान बूझ कर करना मेरी पुरानी आदत है । इस सम्बन्ध में ओशो बङी मजेदार चुटकी लेते हैं ।
हव्वा बोली - आदम वर्जित फ़ल मत खाना । गाड ने मना किया है । आदम जो वर्जित फ़ल खाने को लपक रहा था । थोङा सहम गया । तब शैतान जो सर्प के वेश में था । वह बोला - जानते हो । गाड इस वर्जित फ़ल को खाने को क्यों मना करता है ? क्योंकि वह इसे खुद खाता है । और वह नहीं चाहता कि कोई दूसरा इसका मजा जान जाय । आश्चर्यचकित आदम ने फ़ल खाया । और हव्वा के साथ आनन्द में डूब गया । और तब उन्होंने कहा - गाड ! भाङ में जाय तेरा स्वर्ग । डांट वरी वी हैप्पी । और इस तरह आदम हव्वा मस्त विचरण करने लगे ।
क्यों नहीं हो तर्क ? क्या दिक्कत है ? भगवान कोई पानी का बुलबुला है । जो तर्क से फ़ूट जायेगा । फ़्रिज से बाहर हुयी आइसक्रीम है । जो पिघल कर बह जायेगी । पूरे उपनिषदों में और क्या है ? याग्वल्क्य जैसे ज्ञानियों ने बाल की खाल निकाल दी कि नहीं । उदाहरण बहुत है । पर अभी नहीं । बात है । तर्क ।
और बात छोटे पन की है । जब कई अन्य चीजों की तरह । ये दो बातें भी मेरे जेहन से टकराई । 1 जब शादी होती है । तो महिलायें जो गीत गाया करती हैं । उनका आधार राम विवाह होता था । अर्थात राम सा पुत्र । सीता सी बहू । 


भरत लक्ष्मण से भाई आदि । बल्कि ये कार्यकृम लगुन आदि से ही शुरू हो जाता था - रघुनन्दन फ़ूले न समाय । लगुन आयी हरे हरे ।
मैंने कहा - एक बात बताओ । क्यों बेचारों की जिन्दगी खराब कर रहे हो । जो अभी शुरू भी नहीं हुयी । राम के विवाह का क्या अंजाम हुआ था ? क्या माँ बाप को सुख मिला । क्या खुद राम सीता को मिला ?
विवाह पढते हुये तोताराम पण्डित मेरी तरफ़ हैरत से देखने लगे ।
ऐसी ही एक बात अक्सर भारतीय समाज खासकर हिन्दू समाज में बहुत प्रचलित है । श्रवण कुमार सा पुत्र । और इसका अर्थ यह होता है । माँ बाप की भरपूर सेवा करने वाला । आज्ञाकारी । अक्सर जब भी बङों को किसी सपूत की बात करते सुनता । तो यही उदाहरण दिया जाता - उनका लङका एकदम श्रवण कुमार है । सबका बेटा श्रवण कुमार ही हो ।
कमाल के लोग हैं । मैं अक्सर सोचता । कहते वक्त यही नहीं सोचते कि - आखिर कह क्या रहे हैं ? इस बात में क्या मजा कि - माँ बाप अन्धे समान हों । और पुत्र पर बोझ भी हों । आईये आज आपको यही  रहस्य बताता हूँ । जिसको जानने के बाद कोई भी किसी को श्रवण कुमार बनने का आशीर्वाद नहीं देगा ।
हिन्दू ( जिसे अज्ञानतावश कहते हैं । वास्तव में सनातन ज्ञान परम्परा ) धर्म शास्त्र - रामायण । महाभारत आदि
वास्तव में रूपक हैं । और यथार्थ भी । मतलब राम कृष्ण आदि हुये भी हैं । और सनातन ज्ञान की थ्योरी का

तकनीकी प्रयोगात्मक पदार्थ भी हैं । circuit परिपथ पर बिछे तार भी । और ऊर्जा रूपांतरण के विभिन्न पुर्जे या स्रोत भी । अदृश्य प्रकृति पदार्थ । जो आत्म सत्ता के तंत्र को संचालित करते हैं । ठीक किसी circuit पर बिछे जाल की तरह ।
आप जब भी किसी धार्मिक पात्र को पढें । उसके नाम पर विशेष ध्यान दें - राम ( रमना या गति या चेतनता ) कृष्ण ( आकर्षण या चुम्बकत्व ) लक्ष्मण ( जीव या मन के लक्ष्य पर चलने वाला )
अब इसी आधार पर आप श्रवण कुमार प्रसंग को समझें ।
श्रवण कुमार ( केवल सुने ज्ञान पर आधारित पात्र । जिसकी सत्यता अनिश्चित है । ) अंधे माँ बाप ( माया के गर्भ में उत्पन्न हुआ जीव । जिसे अपना ही पता नहीं । ज्ञान रहित पालन पोषण । अंधा पिता यानी किससे उत्पन्न हूँ अज्ञात । यह आध्यात्म तल पर देखें । न कि मानवीय तल पर ) जल की प्यास ( विभिन्न वासनाओं की तृष्णा ) दशरथ ( दस प्रमुख इन्द्रियों का समूह । ये शरीर ) शब्द भेदी वाण ( सुरति से शब्द ( ध्वनात्मक नाम ) को भेदना )
अब देखिये । श्रवण कुमार जिसे वास्तविक ज्ञान का बोध नहीं है । केवल सुनी हुयी बातों पर ( धर्म या ईश्वर की ) धर्म ( धारण करना ) शील है । और अंधे माँ बाप ( कर्म । संस्कार । वासना का आपसी जीव सम्बन्ध ) को तीर्थ ( मन मथुरा दिल द्वारका काया काशी जान । पांच तत्व का पिंजरा जामें ज्योति पहचान ) कराने ले जा रहा है । लेकिन रुकावट आयी । अंधे माँ बाप को प्यास ( वासनाओं की तृष्णा । जो आत्म ज्ञान में बाधा डालती है ) लगी । वह घङे ( कुम्भ । शरीर ) में जल लेने  गया । यानी शरीर की तृष्णा को तृप्त करने का उपाय किया ।
तभी दशरथ (( दसों इन्दियाँ एकाग्र होकर । जिसे ही गूढ अर्थ में एकादशी कहा जाता है ) ने शब्द भेदी ( यानी वही शब्द रूपी नाम ध्वनि को लक्ष्य कर सुरति रूपी ) वाण चला दिया । इससे श्रवन कुमार मर गया । यानी ज्ञान जागृत हो गया । और सुने हुये की बजाय यथार्थ सत्य का स्व बोध हुआ )

दशरथ पानी लेकर अंधों के पास पहुँचे । क्योंकिं अज्ञान से उपजी तृष्णा अंधी ही है । तब उन तृष्णा से व्याकुल अंधों ने दशरथ को शाप दिया -  जैसे आज हम पुत्र वियोग से मर रहे हैं । तुम भी एक दिन मरोगे । अब समझिये । कोई भी ज्ञान हो जाने के बाद अंधे माँ बाप ( मायाकृत खेल । संस्कार सम्बन्ध । अनिश्चित पूजा आदि बहुत सी चीजों ) की प्यास क्यों बुझायेगा ? वो जो भी करेगा । ठोस करेगा । सीधी सी बात है । ज्ञान होते ही माया नष्ट हो जायेगी । तो अंधे माँ बाप ( ईश्वर के बारे में अज्ञान । अंधापन ) मर ही जायेंगे ।
लेकिन अंधों ने एक बङे काम की बात कहीं - तुम भी एक दिन मरोगे ।
दशरथ अन्त समय राम राम ( सुमिरते हुये ) करते हुये मर गये । बात किससे कही । दशरथ से  ( यानी दस इन्द्रियों के समूह । इस शरीर को ही सत्य मानने वाले से ) जाहिर है । राम ( नाम ) सुमरन से जब अज्ञान नष्ट हो जाता है । तो देह अभिमान भी नष्ट हो जाता है । और जीव जान जाता है कि - मैं न मन हूँ । न शरीर हूँ । बल्कि आत्मा हूँ ।  तब दशरथ अपने आप ही मर जायेगा ।

11 फ़रवरी 2012

हे पिया ! आप मेरे पास लौटकर नहीं आये

अपनी बात - पिछले दो दिन बहुत व्यस्तता के रहे । और दिन पर दिन व्यस्तता बढती ही जा रही है । कुछ लोगों की जिज्ञासा का समाधान भी करना शेष है । वैसे अभी बहुत कुछ रहस्य भी बताने बाकी हैं । इसलिये मेरी पूरी कोशिश रहेगी । व्यस्तता के इन्हीं क्षणों में फ़ुरसत के कुछ लम्हे चुराकर बातचीत जारी रहे ।
आपको याद होगा । अभी कुछ दिन पहले मैंने व्यास के पुत्र श्री शुकदेव जी का पक्षी तोता योनि से आत्म ज्ञान द्वारा मनुष्य शरीर प्राप्त करना आदि सटीक प्रमाणिक विवरण आपको बताया था । आज इन्ही शुकदेव के पिता व्यास और इनके दादा पाराशर ऋषि की अदभुत जीवन कथा आपको सुनाते हैं ।

और ये है - नई खुशखबरी 
विवरण कल तक

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पाराशर ऋषि शंकर पार्वती की संतान थे । यदि इनके जन्म आदि का विवरण कहा जाये । तो बात बहुत लम्बी हो जायेगी । इसलिये इनकी बाल्यावस्था से बात आरम्भ करते हैं । बीच बीच में भी जीवन चरित्र को संक्षिप्प्त किया गया है । और मुख्य घटना कृम पर जोर दिया गया है ।
पाराशर का विवाह प्राचीन परम्परा के अनुसार बाल अवस्था में ही हो गया था । उस समय के माहौल और संस्कार स्थान आदि के प्रभाव अनुसार पाराशर विवाह के कुछ समय बाद ही तप करने जाने लगे । तब इनकी

पत्नी को बहुत दुख और निराशा सी हुयी । उसने प्रार्थना की - यह तप आदि आप यौवन अवस्था के बाद ही करते । फ़िर विवाह का अर्थ क्या होगा ? और कुछ नहीं । तो कम से कम एक संतान तो मुझे देते  जाओ । अर्थात उस समय तक तो रुको ।
पर अवस्था के अनुसार वह समय अभी दूर था । पाराशर ने विचार किया । और अपनी पत्नी को - एक तोते का बच्चा । एक घोङे का बच्चा । और एक बरगद का पौधा लगाकर दिया । और बोले - देखो । अभी पर्याप्त समय है । इसलिये तुम्हें मैं ये तोता घोङा आदि दिये जा रहा हूँ । ये शिशु तोता जब सिखाये हुये मन्त्र आदि बोलने लगे । इस घोङे के बच्चे के दो दांत निकल आयें । और जब इस छोटे बरगद के पेङ पर फ़ल आने लगे । और तुम स्त्री यौवन धन से परिपूर्ण हो जाओ । तब मैं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करने आ जाऊँगा ।
यह कहकर वे वन को चले गये । इस तरह लगभग 12 वर्ष गुजर गये । और पाराशर नहीं आये । तव उनकी पत्नी ने एक सन्देश लिखकर उसी पालतू तोते के माध्यम से पाराशर के पास भेज  दिया । वह सन्देश इस प्रकार था -
पढ सुअना पण्डित भये । घु्ङल भये दो दन्त । बरी बरगदा आवन लागे । भर जुबना तिरिया भई । अब हू न लौटे कन्त
अर्थात - तोता भी पढना बोलना सीख गया । घोङे के भी दो दांत निकल आये । बरगद के वृक्ष पर भी फ़ल फ़ूल आने लगे । और आपकी  स्त्री भी यौवन रस से भर उठी है । फ़िर भी -  हे पिया ! आप मेरे पास लौटकर नहीं आये ।

तोता ये सन्देश लेकर तपस्या रत पाराशर के पास पहुँचा । जिनकी तपस्या पूर्ण होने वाली ही थी । पाराशर ने जैसे ही यह सन्देश पढा । तो नव यौवन अवस्था का वेग । और स्त्री तथा काम रहित जीवन व्यतीत करने के कारण । उनमें वेग से काम का संचार हुआ । और उनका वीर्य स्खलित हो गया । तपस्या उसी क्षण खण्डित हो गयी ।
पाराशर बङी चिन्ता में पङ गये । फ़िर कुछ देर सोच विचार के बाद उन्होंने वीर्य को युक्ति द्वारा । उसी तोते के माध्यम से अपनी स्त्री के पास भेज दिया । जब तोता आसमान में उङा जा रहा था । उसी समय एक चील ने उस पर झपट्टा मारा । जिससे बचाव आदि में वह वीर्य नीचे नदी में गिर गया । जिसे तत्काल ही एक मछली निगल गयी । इसी मछली को एक मछुवे द्वारा पकङने पर एक कन्या उसके उदर से निकली । जिसको मच्छोदरी और सत्यवती कहा जाने लगा ।
उधर तोता जब खाली हाथ पाराशर की पत्नी के पास पहुँचा । तो उस काम पीङित पत्नी ने पाराशर को शाप दे दिया - अगर तुम अभी न लौटे । तो अपनी ही पुत्री से भोग करोगे ।

पाराशर को इस बात का कोई पता नहीं था । वह जानते थे । तोता सही सलामत उनका सन्देश पहुँचा देगा । अतः वे फ़िर से निश्चिन्त होकर तपस्या करने लगे । और फ़िर से 12 वर्ष गुजर गये । उनका तप पूर्ण हुआ । तब उन्होंने घर जाने की सोची । और चलते चलते गंगा तट पर आये ।
उस वक्त मल्लाह भोजन कर रहा था । तव उसकी पुत्री सत्यवती ने कहा - पिताजी ऋषि को गंगा मैं पार करा देती हूँ । और इस तरह वह गंगा पार कराने लगी । सत्यवती सुन्दर और यौवन युक्त थी । जब नाव गंगा के मध्य थी । तब पाराशर में उसकी सामीप्यता से कामवासना का संचार हुआ । उन्होंने उससे कहा - मैं तुमसे काम भोग का इच्छुक हूँ ।

सत्यवती हैरान रह गयी । लेकिन शाप का प्रभाव था । फ़िर सकुचाते हुये बोली - मगर ऋषिवर ऊपर सूर्य  और नीचे गंगा हमें देख रहे हैं । पाराशर ने अभिमंत्रित जल ऊपर आकाश में फ़ेंका । तुरन्त घना कुहरा फ़ैल गया । ऐसा ही जल गंगा पर फ़ेंका । आसपास जल पर काई फ़ैल गयी । सत्यवती सन्तुष्ट हो गयी । और दोनों कामभोग

करने लगे । इसी काम भोग के परिणाम स्वरूप वेद व्यास पैदा हुये । जो इस तरह कुँवारी लङकी के गर्भ से पैदा हुये थे ।
उधर पति के न आने से निराश पाराशर की पत्नी तप करने लगी थी । और तप तेज से युक्त हो गयी थी । सत्यवती से भोग के उपरान्त जब पाराशर घर पहुँचे । तो उसे सब पता चल गया । तब उस तेजस्विनी स्त्री ने उन्हें शाप दिया - हे ऋषि ! आप अपनी ही पुत्री से काम भोग करके आये हो । इसलिये तुम अभी सियार हो जाओ ।
अपनी गलती और शाप के फ़लस्वरूप पाराशर सियार हो गये । और जंगल में भटकने लगे । तब ये सियार की बोली हु..आ..हु..आ बोलते हुये एक दिन गंगा तट पर पहुँचें । क्योंकि ये शाप वश पशु योनि को प्राप्त हुये थे । इन्हें अपनी पूर्व अवस्था का ज्ञान था । तब इन्होंने गंगा से कहा - देवी गंगा ! तुम  मुझसे विवाह कर लो ।
गंगा बोली - हे ऋषि ! आप 7 बार मेरी जल धार को बार बार इधर से उधर पार कर लें । तब हमारी शादी हो जायेगी ।
सियार शरीर में पाराशर ऐसा ही करने लगे । उस समय गंगा प्रवल वेग से बह रही थी । तब एक बार सियार बीच धार में ही डूब गया । और तत्क्षण ही उसकी मृत्यु हो गयी । और कुछ ही दिनों में शरीर गल कर सिर्फ़ हड्डियों का ढांचा गंगा में बहने लगा । इस हड्डियों के ढांचे के साथ कुछ लकङी कूङा टायप भी इकठ्ठा हो गया था । फ़िर ये पूरा मलबा और हड्डियाँ बहते बहते गंगा के किनारे जाकर लग गया ।
उन्हीं दिनों सप्त ऋषि ( आकाश में जो खटोला आकृति में 7 तारे नजर आते हैं । ये सप्त ऋषि स्थान है । यही तारे संभवतः स्वदेश फ़िल्म - शाहरुख खान में भी दिखाये हैं ) गंगा तट के पास आये । उन्हें गंगा को पार करना था । तब उन्हें वो हड्डियाँ और उससे जुङा कूङा करकट नजर आया । उन्होंने उसका उपयोग एक टेम्पररी नाव टायप

बनाने में किया । और उसी से गंगा पार की ।
क्योंकि वे ऋषि ( शोध कर्ता ) थे । उन्होंने सोचा - इस मृतक जानवर के अस्थि पंजर ने गंगा पार कराने में हमें सहयोग किया है । अतः हमें भी इसके लिये कुछ करना चाहिये । उन्होंने हड्डियों का आकार विधिवत किया । और मृतक संजीवनी विध्या से उसे फ़िर से जीवित सियार बना दिया । पाराशर को ये उस शरीर से शाप मुक्त होने का अच्छा अवसर लगा ।
उन्होंने कहा - ऋषियों यदि उपकार करना ही चाहते हो । तो इससे पहले में जो था । वह बनाओ । अन्यथा मुझे निर्जीव हड्डियाँ ही रहने दो । तब ऋषियों ने उन्हें फ़िर से मनुष्य रूप कर दिया । सात ऋषियों द्वारा पुनर्जीवन मिलने से ही  इनका नाम सान्तनु ( शान्तनु ) हुआ ।
तब मनुष्य रूप होते ही फ़िर इन्हें गंगा की याद आयी । और उससे जाकर बोले - गंगा अब तुम मुझसे शादी करो । क्योंकि गंगा वचन वद्ध थी । उसने शादी कर ली । लेकिन एक शर्त जोङ दी - जिस दिन मैंने अपने जिआये पुत्र का मुँह देख लिया । उसी दिन अपना ये स्त्री  रूप त्याग कर फ़िर जल रूप ( लीन ) हो जाऊँगी ।
गंगा के प्रति रूप आसक्त काम आसक्त शान्तनु ने यह शर्त मान ली । और दोनों मुक्त काम भोग करने लगे ।
तव गंगा को पहला प्रसव हुआ । शान्तनु ने उसकी ( गंगा ) आँखों पर पट्टी बाँधकर ये प्रसव कराया । और बच्चे को उसे दिखाये बिना तुरन्त सत्यवती को दे आये । सत्यवती इस बच्चे को पालने लगी । इसका नाम गांग देव ( गंगा पुत्र ) रखा गया ।
कुछ वर्ष और बीत गये । एक दिन दैवयोग से गांग देव शान्तनु की जानकारी के बिना उनके पीछे पीछे चला आया । जब वे सत्यवती के यहाँ से लौट रहे थे । तव गंगा की उस पर दृष्टि पङ गयी । उसने कहा - महाराज शर्त भंग हुयी । अब मैं जाती हूँ ।
और वह तुरन्त जल रूप हो विलीन हो गयी । अब शान्तनु को बेहद चिन्ता हुयी । दूसरे वह सत्यवती पर भी 


आसक्त थे । और उसकी सुन्दरता यौवन पर मोहित थे । और उससे शादी करना चाहते थे । गंगा के जल रूप हो जाने के बाद उन्होंने उसके साथ विवाह का प्रस्ताव रखा ।
तब सत्यवती बोली - महाराज ! मैं शादी के लिये तैयार हूँ । पर शर्त यही है कि - राजा मेरा ही पुत्र होगा ।
शान्तनु अपने पहले पुत्र गांग देव के ख्याल से यह शर्त मानने को राजी न हुये । और सत्यवती के विरह वियोग में जलने लगे । जब गांग देव को यह  बात मालूम पङी । तव वह सत्यवती के पास पहुँचा । और उससे कहा कि - वह उसके पिता से शादी कर ले । वह वचन देता है कि वह स्वयं कभी हस्तिनापुर की  राज गद्दी पर नहीं बैठेगा ।
तब सत्यवती बोली - पुत्र तेरे वचन पर मुझे पूर्ण विश्वास है । पर कल को तेरी सन्तान ये बात मान लें । इसका क्या भरोसा ?
इस पर गांग देव ने उसे फ़िर से वचन दिया - वह प्रतिज्ञा करता है कि कभी जीवन में विवाह ही नहीं करेगा । तब सन्तान का प्रश्न ही नहीं उठता ।
एक नव युवक द्वारा इतनी भीष्म ( कठोर ) प्रतिज्ञा से पूरे बृह्माण्ड में तहलका मच गया । अपनी इसी प्रतिज्ञा के कारण युवक गांग देव भीष्म पितामह के नाम से विख्यात हुआ । इससे आगे की कहानी सब जानते ही हैं ।
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अब मेरी बात - पहले तो यही बता दूँ । इस कथानक का आधार शास्त्र नहीं हैं । बल्कि अंतर्ज्ञानी सन्त हैं । इसलिये ये पूर्णतयाः सत्य है । जब ये कथानक मेरी जानकारी में आये । तब स्वाभाविक आप ही की तरह मेरे मन में दो प्रश्न उठे । शास्त्रों के कई प्रसंगों में ऐसे वीर्य से बच्चा उत्पन्न होने का जिक्र आया है । यानी वीर्य किसी पक्षी आदि माध्यम द्वारा दूरस्थ स्थान पर भेजा गया । और फ़िर उसका उपयोग किया गया ।


एक दृष्टि से ये हवा हवाई बातें लगती हैं । लेकिन बिलकुल सच हैं ।
वीर्य को किसी पत्ते आदि में गोंद आदि का उपयोग करते हुये पैक करके मन्त्र बिज्ञान द्वारा निश्चित समय के लिये रक्षित कर दिया जाता था । और प्राप्त कर्ता उसका उपयोग करता था । आज भौतिक बिज्ञान में भी ये मामूली बात है । जब कृतिम तरीके से वीर्य स्थापित कर सरोगेट मदर द्वारा शिशु प्राप्त किया जाता है । वह वीर्य भी रक्षित ही होता है । अतः ये बात तो सिद्ध है ही । जाहिर है । उस समय इस योग बिज्ञान को जानने वाले स्त्री पुरुष रहे होंगे । जो वीर्य को रक्षित और कृतिम तरीके से स्थापित करना जानते थे ।
अब दूसरी बात । जो मेरे दिमाग में थी । किसी भी मछली से इंसान का बच्चा कैसे उत्पन्न हो सकता है ? जबकि ये भी पूरी तरह सच था । लेकिन आज इतना ही ।
कैसे हुआ मछली से आदमी का बच्चा ? जानिये अगले रोज । और करते रहिये - सत्यकीखोज ।

08 फ़रवरी 2012

हम भी कुण्डलिनी जागृत करना चाहते हैं

हम भी कुण्डलिनी जागृत करना चाहते हैं । कृपया मार्गदर्शन करें । जोया रुबीना उस्मानी ।
- जोया जी सत्यकीखोज के साथ साथ ब्लाग जगत में आपका बहुत बहुत स्वागत है । आपसे मिलकर बहुत खुशी हुयी । चलिये आपकी जिज्ञासा पर बात करते हैं ।
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कभी कभी सोचता हूँ । क्या अजीव खेल है ? कैसा अदभुत खेल बनाया । मोह माया में जीव फ़ँसाया । दुनियाँ में फ़ँसकर वीरान हो रहा है । खुद को भूलकर हैरान  हो रहा है । तू अजर अनामी वीर भय किसकी खाता । तेरे ऊपर कोई न दाता । ईश्वर अंश जीव अविनाशी । चेतन अमल सहज सुखराशी जङ चेतन ग्रन्थि पर गई । यधपि मृषा छूटत कठिनई । सन्तों के सिर्फ़ इन 5  दोहों का कोई भी इंसान गहराई से मनन करके इनका मर्म ठीक से समझ ले । तो समझो । बहुत बङी बात हो गयी । कल्पना से भी परे ।
चलिये मैं कुछ मदद करता हूँ । इस अदभुत खेल में सिर्फ़ मोह माया द्वारा जीव फ़ँसा है । न कुछ लाया ।  न कुछ ले जायेगा । जो कुछ प्राप्ति हुयी । यही हुयी । और यहीं के लिये हुयी । और जाहिर है । सभी को होती है । और जब अभी हुयी । तो आगे भी होगी । तो इस आधार पर जो इस प्राप्ति को अपना और अपने द्वारा कृत मान बैठा । वही मोह माया है । और उसी के कारण शक्तिहीनता है । वरना आत्मा सर्वाधिक शक्तिशाली है । और स्वयं आनन्द स्वरूप भी है ।

दूसरा देखें । who am i ? इस मायावी सृष्टि में आकर्षित होकर ये जीवात्मा अपनी पहचान भूल गया । और हैरान स्थिति में इस 84 की अंधेरी भूल भुलैया में भटक गया । जैसे ही ये खुद के बारे में सोचेगा । सिर्फ़ अपनी पहचान के प्रति जागरूक होगा । तब इसको पता चलेगा कि मैं सर्वाधिक शक्तिशाली हूँ । और स्वयं आनन्द स्वरूप भी ।
तीसरा देखें । तू (  आत्मा ) अजर ( कभी बूढा न होने वाला ) अनामी ( कोई नाम नहीं ) वीर । भय किसका खाता । तेरे ऊपर ( देखिये कितनी महत्वपूर्ण बात है । ) कोई दाता ( देने वाला ) है ही नहीं । बस एक बार अपनी मूल स्थिति को जान ले ।
चौथा देखें । ईश्वर का ही अंश ये जीव अविनाशी  ( यानी कभी नष्ट नहीं होता ) और चेतन गुण (  जो सिर्फ़  आत्मा का ही है ) अमल ( इसमें मूल रूप में

कोई मल विकार है ही नहीं । हो ही नहीं सकता ) सहज ( बिना किसी कोशिश के ) सुखराशी ( सुख का भण्डार है । ) लेकिन गलती कहाँ हो गयी ? जङ (  प्रकृति ) से इस चेतन ने ग्रन्थि ( गाँठ ) बाँध ली । ये समझना थोङा कठिन है । प्रकृति जङ है । ये चेतन के होने से ही कार्य करती है । जैसे शरीर और मन दोनों ही जङ हैं । ये आत्मा के होने से ही कार्य करते हैं । और शरीर में आत्मा ही चेतन है । लेकिन कोई शरीरी अपने को कभी मानता है कि - मैं आत्मा हूँ । वह अपने रूप शरीर को मानता है । जबकि खूब मालूम है । ये मिट्टी में मिल जायेगा । यही मोह रूपी जङ चेतन ग्रन्थि है ।  यधपि मृषा ( हालांकि ये झूठी गाँठ है ) क्योंकि खूब मालूम है । शरीर निश्चित समय तक का है । छूटत कठिनई ( फ़िर भी इसको स्वीकार करना बहुत कठिन है ) इसलिये इस चेतन आत्मा में यही मायावी गाँठ सबसे बङी दिक्कत है ।
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अब आपकी जिज्ञासा पर बात करते हैं । वैसे कुण्डलिनी के बारे में कई पहलुओं से विस्त्रत जानकारी मेरे ब्लाग्स पर उपलब्ध है । वास्तव में यह एक शक्ति है । जो समस्त संसार में कार्य कर रही है । इसके बहुत सारे कार्य हैं । यह आकृति में नागिन के समान है । और साढे तीन लपेटे  मारे हुये सर्प कुण्डली के समान नीचे मुँह किये हुये पङी है । शरीर में इसका स्थान रीढ की हड्डी के अंतिम सिरे पर है । सामान्य मनुष्य की अवस्था में इसका नीचे मुख को होना । सोना कहा जाता है । ध्यान की बार बार ठोकर से यह मुँह ऊपर को उठा कर जागृत होकर चलने लगती है । वैसे तो पूरा द्वैत योग या कुण्डलिनी जागरण ही इसके ऊर्ध्व मुख ( ऊपर मुँह ) होते ही शुरू हो जाता है ।
लेकिन प्रारम्भिक स्थिति की बात करते हैं । साधारण स्थिति में इससे शरीर में जबरदस्त लाभ होता है । क्योंकि ये वेग से नस नाङियों में ( प्राण वायु ) प्रवाहित होती है । और असाध्य रोग ( केवल भोग छोङकर ) को चमत्कारिक ढंग से ठीक कर देती है । कुछ अन्य छोटी स्थितियों में दिव्य दृष्टि । अशरीरी आत्माओं से बातचीत । आगे की बात आदि जान लेना भी होता है । इसके अन्य बहुत से परिणाम होते हैं ।
लेकिन ये कोई मामूली और सरल क्रिया नहीं हैं । इसके लिये ध्यान में बैठना होता है । और फ़िर इसे जागृत करने के कई तरीके होते हैं । सबसे पहली बात । जब यह पहली बार जागृत होती है । शरीर में एक वेग आवेश सा उत्पन्न होता है । सामान्य मनुष्य का अपने जीवन में ऐसी स्थिति से कभी पाला नहीं पङा होता । उसे अपने शरीर से ऐसा कोई अनुभव नहीं हुआ होता । कुण्डलिनी जागरण । योग की सभी क्रियायें । देवी आवेश । प्रेत आवेश । और मृत्यु । इन सभी में लगभग समान क्रिया होती है । जब प्राण चेतना इकठ्ठा होकर किसी एक तरफ़ गति करती है । अतः बिना किसी अनुभवी के साथ । केवल विधि पढकर । इसको स्वयं करने से बेहद डर तो लगता ही है । साथ ही साथ कभी कभी गम्भीर स्थितियाँ बन जाती हैं । जिसमें भयभीत इंसान पागल भी हो सकता है । और उसकी मृत्यु भी हो सकती है । अतः इसको पत्राचार शिक्षा के माध्यम से भी नहीं किया जा सकता । सिर्फ़ एक ही उपाय है । समर्थ गुरु के सानिध्य में । इसको आसानी से । बिना किसी डर परेशानी के किया जा सकता है । दो तीन बार ध्यान अभ्यास के बाद । फ़िर डर के बजाय मजा आता है । ठीक उसी तरह - एस्सेल वर्ल्ड में रहूँगा मैं । घर नहीं जाऊँगा मैं । गोल गोल घूमूँगा । पानी में तैरूँगा । ई हू ‍ऽऽऽऽ । एस्सेल वर्ल्ड में रहूँगा मैं । घर नहीं जाऊँगा मैं । जी हाँ । बिलकुल एक नया अनोखा और जादुई संसार ।
लेकिन जहाँ तक मेरा ख्याल है । ये आम आदमियों की किस्मत में नहीं होता । इसलिये मैं अपने सभी पाठकों को एक बेहद सरल और इससे भी बङी शक्ति जगाने का उपाय बताता हूँ । वो शक्ति है - आत्मा का प्रकाश । जिसके घर कुण्डलिनी जैसी नौकरानियाँ पानी भरती हैं । और उसकी तुलना में ये बेहद सरल हैं ।
- सुबह के शान्त समय में ( 5 से 7 बजे तक ) लगभग आधा घण्टा सुखासन में बैठिये । और एक विचार पक्का कर लीजिये । आप न हिन्दू हैं । न मुसलमान । न सिख । न ईसाई । न कोई अन्य । दरअसल आप जो हैं । वो आपको पता नहीं है । और आप उसी को खोज  रहे हैं । क्योंकि आपको सब में कामन इंसान नजर आया । इसलिये बाकी बात आपको कूङा लगी । समझ नहीं आयी । फ़ेंक दी ।
- अब आ जाओ । दूसरी बात पर । राम । खुदा । गाड । अल्लाह । रब्ब । भगवान । पता नहीं । हैं भी या नहीं ? आय कांट बिलीव इट । जब तक खुद अनुभव न हो । खुद न देखूँ । मानने से भी कोई लाभ नहीं । बङा लफ़ङा है । हिन्दू राम आदि कहता है । मुसलमान अल्लाह आदि कहता है । या तो फ़िर सब एक ही बात कहते । हाँ याद आया । एक बात अवश्य ऐसी है । जो सभी एक ही बताते हैं - सबका मालिक 1 है । उसी को राम खुदा रब्ब गाड आदि कहा गया है । आयडिया ! तमाम प्रचलित नाम छोङकर कल्पना से उस 1 को ही याद करते हैं ।
- अब गौर करिये । फ़ार्मूला तैयार हो गया । आप किसी जाति धर्म के बजाय सिर्फ़ 1 इंसान रह गये । और धर्म की दीवारों में बँटा भगवान भी सिर्फ़ 1 ही रह गया । बहुत कूङा खत्म हुआ ।
- अब सबसे महत्वपूर्ण और ठोस हकीकत पर सोचिये । ये सब संसार । घर । परिवार । समाज । मित्र आदि दुनियाँ का मेला । सिर्फ़ इस शरीर रहने तक ही है । ओह गाड ! मरने के बाद क्या होता है ? किसी तरह पता लग सकता है क्या ? मरने के बाद मेरा क्या होगा ?
- जब ये विचार पक्का हो जाये । तव उस अविनाशी आत्मा को कल्पना से याद करिये । वह कल्पना इस तरह है - चटक दूधिया । चमकीला । तेज । स्व प्रकाशित । सूर्य के समान आकृति । और आकार जितना बङे से बङा आप कल्पना कर सकें । बस इसी को ह्रदय में बसा लीजिये । और अधिकतम ध्यान करिये ।
- अब दूसरी । और महत्वपूर्ण बात । अपने लिये सोचिये । मैं भी इससे अलग नहीं हूँ । मैं भी इस सनातन ( लगातार ) अमर आत्मा का ही अंश हूँ । यही मेरी असली पहचान है ।
- आपने देखा होगा । बीजगणित में कोई सवाल हल करने के लिये इस तरह माना जाता है - माना राम के पिता की उमृ य है । और राम की उमृ 10 वर्ष आदि । और मजे की बात ये है कि इसी य को फ़ार्मूले में फ़िट करके सही उत्तर आ जाता है । ऐसे ही यहाँ ज्ञान और शक्ति दोनों आयेगी ।
- इस तरह के अभ्यास से आपकी सिक्स्थ सेंस विकसित होगी । और अन्दर ज्ञान प्रकाश आत्म प्रकाश बङेगा । यही अदभुत सनातन भक्ति भी है । यही राज योग भी है । निश्चित जानिये । तब जो भी आप चाहते हैं । उसका रास्ता खुद ब खुद बनेगा ।
- यदि कोई बात समझ न आयी हो । तो दोबारा पूछ सकते हैं ।

07 फ़रवरी 2012

प्रलय पर कुछ और भी बातें

बङे अजीव रंग है इस जिन्दगी के । कभी कभी सोचता हूँ । इसलिये इस लेख को लिखने का मुझे कोई फ़ायदा नजर नहीं आता । पर शायद कभी कभी ऐसा आवश्यक भी होता है । बात फ़िर से प्रलय की है । और मेरे ये दस्तावेज सिर्फ़ इंटरनेट पर ही जमा है । ऐसी हालत में प्रलय होने पर इनका कोई महत्व नहीं । शायद ये भी प्रलय के विनाश में खत्म हो जायें । और प्रलय होने पर किसी भी भविष्य कथन का क्या मतलब ? जब शायद उसे जानने वाले ही न रहें ।
अभी 2011 में मैंने प्रलय के बारे में कुछ लेख भी लिखे थे । जिसको लेकर पाठकों में तमाम जिज्ञासायें भी हुयी । उनके मैंने यथा संभव उत्तर भी दिये । मैंने एक लेख में बताया था । 11 nov 2011 को प्रथ्वी और जीव लेखा जोखा समाप्त हो चुका है । और 2012 से 2017 तक खण्डों में प्रलय का कार्यकाल रहेगा ।
2020 तक बिगङी स्थिति सामान्य होगी । और 2060 से सतयुग शुरू हो जायेगा । जो सिर्फ़ 3060 तक रहेगा । 


यानी सिर्फ़ 1000 साल । इसके बाद फ़िर से यही कलयुग अपना शेष कार्यकाल पूरा करेगा । इसीलिये मैंने कहा - इस जिन्दगी के रंग बङे अजीव है ।
इस प्रलय को लेकर त्रिलोकी सत्ता बङी सशंकित स्थिति में हैं । क्योंकि एक तरह से स्थिति उसके नियन्त्रण से बाहर हो चुकी है । और उसके पास कोई सटीक उपाय भी नहीं हैं । प्रलय के अब नवीन स्थिति में तीन तरीके बन रहे हैं । प्राकृतिक विनाश । विश्व युद्ध या बङा युद्ध । परमाणु हमला । इनमें प्राकृतिक विनाश लीला तो तय है । बाकी दोनों के भी संकेत बनते हैं । क्योंकि प्रथ्वी का मौजूदा बिगङा स्वरूप संवारने हेतु और कोई विकल्प ही नहीं है । इसलिये इस तरह का खेल तो तय है ही ।

त्रिलोकी और सचखण्ड सत्ता के प्रतिनिधियों के बीच जो रस्साकशी जारी है । वो दूसरी मुख्य समस्या को लेकर है । जैसा कि मैंने कहा । 11 nov 2011 को प्रथ्वी और जीव लेखा जोखा समाप्त हो चुका है । प्रथ्वी से अधिक समस्या यहाँ धर्म के बिगङे स्वरूप और जाति पांत को लेकर घिनौनी स्थिति में पहुँच गयी है । और यही वो सबसे बङा रहस्य है । जो प्रलय की तेजी से डगमगाती नैया को डूबने से बचाये हुये है । जी हाँ । चौंकिये मत । बिलकुल उल्टा ।

आगे की बात जानने से पहले आप इसी प्रथ्वी के सत्ता तन्त्र को ध्यान में रखें । केन्द्रीय सरकार ( सचखण्ड ) राज्य सरकार ( त्रिलोकी ) मंत्री मंत्रालय आदि ( 33 करोङ देवी देवता ) अन्य अलग महाशक्तियाँ । जो तन्त्र से अलग भी  होती हैं । और उनका हिस्सा भी ( विश्व

के विभिन्न संगठन और सरकारें ) कुछ अलग तरह की योग महाशक्तियाँ ( निर्दलीय और उधोगपति जैसे लोग ) आदि । इस आधार पर आपको बात समझने में आसानी होगी । और ये मैं किसी उदाहरण के तौर पर भी नहीं बता रहा । क्योंकि परमात्मा का 1 नियम । 1 तन्त्र के आधार पर यहाँ जो कुछ भी है । ठीक ऐसा ही वहाँ भी है ।
अब आप एक दूसरे तथ्य पर गौर करिये । 2500 वर्ष से चला बौद्ध धर्म । इससे पहले था क्या ? 1500 वर्ष पहले से चला इस्लाम धर्म । इससे पहले था क्या ? 2012 वर्ष से चला ईसाई धर्म । इससे पहले था क्या ? 600 वर्ष पहले हिन्दू परिवार में 


जन्में नानक साहब से चला सिख धर्म । इससे पहले था क्या ? हिन्दू धर्म का एकदम सही इतिहास मुझे पता नहीं ।
ऐसे ही अन्य धर्मों का आंकलन करिये । अगर आप गौर करें । तो ये सभी धर्म और उनके प्रवर्तक ऐसे समय में हुये । जब किसी स्थान विशेष पर मानवता रूढिवाद और धार्मिक पाखण्ड । अनाचार । तन्त्र मन्त्र । मनमाने शास्त्र विरुद्ध यज्ञ । संकीर्ण मानसिकता । सामूहिक कट्टरता । पशुबलि । नरबलि या अति कठिन पूजा पाठ नियमों से त्राहि त्राहि कर उठी । तब कबीलाई तर्ज पर बने ये धर्म एक ही विचारधारा के लोगों को संगठित करने और समाज में जागरूकता उत्पन्न

करने और पाखण्डी वर्ग से संघर्ष करने के लिये आकार में आये । और तत्कालीन परिस्थितियों में इनके अच्छे परिणाम भी निकले ।
लेकिन आप ध्यान से देखेंगे । तो ये सभी धर्म और इनके प्रवर्तक सनातन धर्म और मानवता का सन्देश लेकर अवतरित हुये थे । न कि यह विचारधारा । जो आज कट्टरता से इनके अनुआईयों द्वारा अपना ली गयी है । अगर आप बहुत साधारण दृष्टि से भी ( इनके शुरूआती उद्देश्य ) देखें । तो आज सभी धर्म बुरी तरह सङ चुके हैं । और उनमें अति हानिकारक 


जीवाणु बिजबिजा रहे हैं । उनका मूल उद्देश्य एकदम लुप्त ही हो गया ।
यह था पहला महत्वपूर्ण तथ्य । जी हाँ । त्रिलोकी सत्ता और केन्द्रीय सत्ता के बीच रस्साकशी का । आप सोचें । तो आज कोई फ़ार्मूला बङे से बङे दिग्गज के पास नहीं हैं । जो धर्म के वर्तमान स्वरूप में सुधार करके इसे ( मूल स्थिति में छोङें ) संतोषजनक स्थिति में पहुँचा सके ।
इसीलिये त्रिलोकी की राज्य सरकार समय से पहले बर्खास्त कर दी गयी । और राष्ट्रपति शासन ( सचखण्ड ) लागू हो गया । और इसीलिये मैंने ऊपर कहा । ये सतयुग सिर्फ़ 1000 वर्ष के लिये होगा । इसी दौरान दो महत्वपूर्ण कार्य होंगे । ये पूरी व्यवस्था नवनिर्मित होगी । जैसे बुश और सद्दाम का मामला समझ लें । सिर्फ़ 9 साल के अन्दर प्रथ्वी पर प्रचलित सभी धर्म जीर्ण शीर्ण अवशेषों के रूप में इतिहास का हिस्सा हो जायेंगे । इनका नामोनिशान मिट जायेगा । न कोई हिन्दू होगा । न मुस्लिम । न सिख । न ईसाई । न बौद्ध । न अन्य । और सतयुग ( भले ही अस्थायी सही ) के कानून के अनुसार सिर्फ़ आर्य ( श्रेष्ठ ) और अनार्य दो ही तरह के लोग होंगे । इस तरह ये राष्ट्रपति शासन 1000 वर्ष में प्रथ्वी की सम्पूर्ण व्यवस्था को दुरुस्त करेगा । यही है वो रस्साकशी । जिसे स्वार्थी नेताओं की तरह बहुत से देवता । सिद्ध । योगी आदि हस्तक्षेप रखने वाले लोग नहीं चाहते । क्योंकि अभी बहुतों का कार्यकाल शेष है । और नई व्यवस्था उनकी शक्ति को क्षीण करेगी ।


एक और रहस्य की बात है । इसी प्रथ्वी पर कुछ अज्ञात और रहस्यमय कारणों से इस समय कई छोटी  बङी शक्तियाँ ( त्रिलोकी की  ) कार्यरत हैं । और आत्म ज्ञान के कुछ अच्छे गुप्त सन्त । जिन्हें कोई भी नहीं जानता । यहाँ सशरीर मौजूद हैं । वे पूरी हलचल पर न सिर्फ़ ध्यान रखे हुये हैं । बल्कि जरूरत पङने पर हस्तक्षेप भी करते हैं । यही बात समर्थ योगियों की भी है । अगर व्यवस्था सुधार हेतु कोई सहमति बनती भी है । तो कोई न कोई टांग अङा देता है । एक बार को तो ऐसा लगा कि प्रलय टल ही गयी ।
क्योंकि कलियुग के 28000 वर्ष ( आयु ) में से अभी सिर्फ़ प्रारम्भिक 5000 वर्ष हुये हैं । और कलियुग भन्ना उठा । जबकि ये स्थिति अन्तिम 5000 वर्ष यानी 23000 वर्ष बाद होनी चाहिये थी ।
अब चलिये । मान लीजिये । मौजूद धर्मों में सुधार का कोई तरीका निकल आये । और इस बिन्दु पर स्थिति सामान्य हो भी जाये । तो प्रथ्वी का सौन्दर्य जो कतई नष्ट हो चुका है । उसका क्या सुधार हो सकता है । क्षमता से 3 गुना अधिक आवादी पर नियन्त्रण कैसे होगा ? पर्यावरण सन्तुलन के लिये अति आवश्यक वृक्ष । जंगल । शुद्ध नदियाँ । तमाम लुप्त प्रायः जीव जन्तु । वातावरण में फ़ैली विषैली गैसें आदि इनका उचित समायोजन कैसे होगा ? ये अपने आवश्यक स्वरूप को कैसे प्राप्त होंगे ।
चलिये ये भी किसी जादू से ठीक हो जायें । तो सबसे बङा प्रश्न इतनी विशाल आवादी ( जो निरन्तर तेजी से बढती

ही चली जा रही है ) के लिये आवास । खेती । रोजगार हेतु जमीन । उनको पानी । बिजली । स्वास्थय । शिक्षा । लैंगिक अनुपात में समानता । नई और असाध्य बीमारियों से मुकाबला आदि ये सब कैसे होगा ? इसका कोई उपाय किसी को नजर नहीं आता । जाहिर है । उपाय एक ही है । सबका नये सिरे से नवनिर्माण । और इसके लिये पहले विध्वंस । मेरे निजी विचार से यह एकदम आपातकाल जैसी स्थिति है । जिसको लेकर प्रकृति भी परेशान है । क्या करे ? और कैसे करे ? क्योंकि उसे मनमानी नहीं करनी । बल्कि बङी कुशलता से सभी स्थितियों को सही करना है । अब बात समझिये । जिसके लिये मैंने जमीनी सत्ता तन्त्र का उदाहरण दिया था । इराक जैसी परिस्थितियाँ इस समय प्रथ्वी की मान लीजिये । बुश आदि को केन्द्रीय सत्ता मान लीजिये । और विश्व की विभिन्न सरकारों को टांग अङाने वाले । और दूसरे पक्ष में सहयोग वाले मान लीजिये । जाहिर है । ऐसी बङी घटनाओं में समर्थक और विरोधी  दोनों ही मुखर हो उठते हैं । ठीक ऐसी ही खींचातानी की स्थिति इस समय इस प्रथ्वी को लेकर बनी हुयी है । फ़िर देखिये आगे आगे होता है क्या ?
- इस विषय पर लिखने को अभी बहुत कुछ है । जो राजीव बाबा प्रलय में बच गये । तो लिखते ही रहेंगे । आज इतना ही ।

06 फ़रवरी 2012

बुद्ध ने ऐसा भी क्या कह दिया ?

बुद्ध ने संसार को जीवन के 4 आर्य सत्य दिये । उनकी देशना सर्वकालिक है । वे 2500 वर्ष पूर्व हुये ।
बुद्ध ने 4 आर्य सत्यों की घोषणा की -
1 दुख है । मनुष्य दुखी है । 2 मनुष्य के दुख का । उसके दुखी होने का कारण है । क्योंकि दुख अकारण तो होता नहीं । 3 दुख का निरोध है । दुख के कारणों को हटाया जा सकता है । दुख मिटाने के साधन है । वे ही आनन्द को पाने के साधन है । 4 दुख निरोध की अवस्था है । एक ऐसी दशा है । जब दुख नहीं रह जाता । दुख से मुक्त होने की पूरी संभावना है ।
बुद्ध कहते हैं - जन्म दुख है । जवानी दुख है । मित्रता दुख है । प्रेम दुख है । रोग दुख है । सम्बन्ध दुख है । असफलता तो दुख है ही । सफलता भी दुख है ।
और कहा - अप्प दीपो भव - अपने दीये स्वयं बनो ।
और कहा - आकाशे च पदं नत्थि । समणों नत्थि बाहरे - आकाश में पथ नहीं होता । और जो बाहर की तरफ

दौड़ता है । वह ज्ञान को उपलब्ध नहीं हो सकता ।
और कहा - दुख के कारण व्यक्ति के मन में होते हैं । बाहर खोजने गये । तो गलती हो गई ।
और कहा - जितनी हानि द्वेषी की द्वेषी या बैरी बैरी की करता है । उससे अधिक बुराई गलत मार्ग पर लगा हुआ चित्त करता है । दुश्मन से डरने की जरूरत नहीं है । चित्त से डरना चाहिए । क्योंकि गलत दिशा में जाता हुआ चित्त ही हानि पहुंचाता है ।
बुद्ध ने धम्मपद में कहा  - ससुखं वत । जीवाम  वेरिनेसू स्वेरिनो । वेरिनेसू मनुस्सेसू विहराम अवेरिनो । वैरियो के बीच अबैरी होकर । अहो हम सुख पूर्वक जीवन बिता रहे हैं । बैरी मनुष्यों के बीच अवैरी होकर हम विहार करते हैं ।
और कहा - सोचो । नाम मात्र के मूल्य के लिए अमूल्य को मिटाने चले हो । असार के लिए सार को गंवाते हो । दृष्टि बदल गयी । तो सब बदल गया । व्याख्या बदल गयी । तो सब बदल गया ।
धम्मपद ने एक स्वर्ण नियम दिया है - जो तुम अपने लिए चाहते हो । उससे अन्यथा दूसरे के लिए मत करना ।
और कहा - अतानं उपमं कत्वा न हत्रेय न घातये । अर्थात अपने समान ही सबको जानकर न मारे । न किसी को मारने की प्रेरणा दें ।
और कहा - जो बाल्यावस्था में बृह्मचर्य का पालन नहीं करते । युवावस्था में धन नहीं कमाते । वे वृद्धावस्था में चिंता को प्राप्त होते हैं ।
बुद्ध जेतवन में ठहरे थे । उनके साथ 500 भिक्षु थे । जो आसंशाला में बैठे रात को बाते कर रहे थे । उनकी बात

साधारण लोगों जैसी थी । बुद्ध मौन बैठे उन्हें सुन रहे थे । वे बातों में इतने तल्लीन थे कि बुद्ध को भूल ही गये । कोई कह रहा था - उस गाँव का मार्ग बड़ा सुन्दर है । उस गाँव का मार्ग बड़ा खराब है । उस मार्ग पर छायादार वृक्ष है । स्वच्छ सरोवर भी है । और वह मार्ग बहुत रूखा है । उससे भगवान बचाये । कोई कह रहा था - वह राजा अदभुत है । और वह नगर सेठ भी अदभुत और बड़ा दानी । उस नगर का राजा  कंजूस । और नगर सेठ भी कंजूस । वहाँ तो कोई भूल कर पैर न रखे । इसी प्रकार की बातें हो रही थी । बुद्ध ने  सुना । चौके । हँसे । भिक्षुओं को पास बुलाया ।
और कहा - भिक्षु होकर भी बाह्य मार्गों की बात करते हो । समय थोड़ा है । और करने को बहुत है । बाह्य मार्गों पर जन्म जन्म भटकते रहे हो । अब भी थके नहीं । अंतर्मार्गों की सोचो । सौन्दर्य तो अंतर्मार्गों में है । शरण भी खोजनी हो । तो वहाँ खोजो । क्योंकि दुख निरोध का वही मार्ग है ।
और कहा - भिक्षुओं मग्गानुट्ठगिको सेट्टो । यदि श्रेष्ठ मार्ग की बात करनी है । तो आर्य अष्टांगिक मार्ग की बात करो । यह तुम किन मार्गों की बात करते हो । तब उन्होंने गाथा कही ।
और कहा - भीतर आने के बहुत मार्गों में 8 अंगों वाला मार्ग श्रेष्ठ है ।
बुद्ध ने दुख निरोध के 8 सूत्र दिए ।


1 सम्यक दृष्टि - सम्यक दृष्टि का अर्थ है कि जीवन में अपना दृष्टिकोण ऐसा रखना कि जीवन में सुख और दुख आते जाते रहते हैं । यदि दुख है । तो उसका कारण भी होगा । तथा उसे दूर भी किया जा सकता है ।
2 सम्यक संकल्प - इसका अर्थ है कि मनुष्य को जीवन में जो करने योग्य है । उसे करने का । और जो न करने योग्य है । उसे नहीं करने का दृढ़ संकल्प लेना चाहिए ।
3 सम्यक वचन - इसका अर्थ यह है कि मनुष्य को अपनी वाणी का सदैव सदुपयोग ही करना चाहिए । असत्य । निंदा । और अनावश्यक बातों से बचना चाहिए ।
4 सम्यक कर्मांत - किसी भी प्राणी के प्रति मन । कर्म या वचन से हिंसा न करना । जो दिया नहीं गया है । उसे नहीं लेना । दुराचार और भोग विलास दूर रहना ।
5 सम्यक आजीव - गलत । अनैतिक । या अधार्मिक तरीकों से आजीविका प्राप्त नहीं करना ।
6 सम्यक व्यायाम - बुरी और अनैतिक आदतों को छोडऩे का सच्चे मन से प्रयास करना । सदगुणों को ग्रहण करना । व बढ़ाना ।
7 सम्यक स्मृति - इसका अर्थ है कि यह सत्य सदैव याद रखना कि यह सांसारिक जीवन क्षणिक और नाशवान है ।
8 सम्यक समाधि - ध्यान की वह अवस्था । जिसमें मन की अस्थिरता । चंचलता । शांत होती है । तथा विचारों का अनावश्यक भटकाव रुकता है ।
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पढ लिया । बाबा बुद्ध ने क्या कहा ? क्या कहने से बच गया ? ध्यान रहे । बुद्ध मेरी कोई भैंस नहीं खोल ले गये । 


उसे कोई खोल भी नहीं सकता । क्योंकि दरअसल मेरे घर भैंस है ही नहीं ।
अब सुनिये । राजीव बाबा ने क्या कहा - मुझे बङी हैरत होती है । लोगो के पास सोचने वाला उपकरण है भी । या नहीं । क्या है । इन उपदेशों में ? चलिये । एक प्रयोग करिये । एक ग्रामीण टायप व्यक्ति से । जो थोङा ही समझदार हो । जिसने किसी बुद्ध को पढना तो दूर । सुना भी न हो । उससे सादा सफ़ल मगर उच्च जीवन के सूत्र पूछिये । और ये सूत्र बतौर रिकार्ड अपने पास प्रतिलिपि रखें । मेरी गारंटी और वारंटी दोनों हैं । वो आपके ठीक ऐसे 8 क्या 80 सूत्र बता देगा । सामान्य नैतिक शिक्षा ।
मेरे घर के पास ही एक सदैव का निठल्ला । कामचोर । हरामखोर ( उसकी बीबी ने ये उपाधियाँ दी हैं । ये न सोचना मैं कह रहा हूँ ) महान व्यक्तित्व है । और एक सब प्रकार दुश्चरित्रा ( ये भी लोग कहते हैं । मैं नहीं कह रहा ) कुटिल । जटिल औरत है । मुझे इन दोनों महान हस्तियों के वचन सुनकर बहुत ही हैरत होती है । सच कह रहा हूँ । इसमें मजाक या व्यंग्य की कतई टोन नहीं हैं । वे ऐसे सद उपदेश देते हैं । उच्च जीवन का ऐसा

दर्शन शास्त्र बताते हैं कि अच्छे अच्छे PhD भी चकरा जायें ।
सारी भाईयों ! किसी की आलोचना । कटु आलोचना । मेरा लक्ष्य नहीं । पर विचार करिये । इनमें ऐसी क्या खास बातें हैं ? जो हमारे ही घर के आदरणीय बुजुर्ग नहीं जानते थे । गौ धन गज धन बाजि धन और रतन धन खान । जब आवे सन्तोष धन । सब धन धूर समान ।
अतः हमें किसी बुद्ध की जरूरत नहीं होती । जो हम अपने ( आज उपेक्षित ) बुजुर्गों को सर आँखों पर बैठाते । उन्हें पूरा पूरा मान सम्मान देते । तो उनके पास ऐसे ज्ञान का भण्डार भरा पङा था ।

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हो सकता है । मैं गलत होऊँ । पर मेरे ख्याल से सम्यक का अर्थ है - मध्यम । मध्यम मार्ग । यानी 50% । न 100% । न 1% । बीच में । सम । जिसको दूसरे अर्थों में कह सकते हैं - समझौता । फ़िर भी मैं सम्यक के अर्थ को लेकर कनफ़्यूज्ड था । लिहाजा मैंने इंटरनेट पर उपलब्ध शब्दकोश का उपयोग किया । और हिन्दी से इंगलिश टूल का उपयोग करते हुये सम्यक शब्द कापी पेस्ट करके सर्च बटन क्लिक किया । आप भी इस वेवसाइट साइट पर जाने के लिये इसी लाइन पर क्लिक कर सकते हैं तो उस साइट ने अंग्रेजी में ये अर्थ बताया - middle of the raod । न दायें चलो । न बाँये चलो । बीच सङक पर चलो । डांट वरी । LIC जीवन बीमा पालिसी । इधर आपका अन्त । ( उधर ) बीबी को भुगतान तुरन्त ।
खैर आपको मालूम ही है । मेरी हिन्दुस्तानी अंग्रेजी कितनी अच्छी है ? ये शब्द raod देखकर मेरी अंग्रेज बुद्धि भी

चकरा गयी । ये उसी साइट पर आता है । गौर से देखें । मैंने सोचा । शायद कोई नया शब्द हो । मैंने फ़िर से केवल इसी शब्द को अंग्रेजी से हिन्दी टूल द्वारा कापी पेस्ट कर सर्च किया । परिणाम आया - बाबा क्या स्कूल के पीछे पढा था ? जो लिखना भी नहीं आता । raod नहीं road है ।
खैर..फ़िर मुझे ओशो बाबा याद आये । जिनके विचार कुछ ऐसे थे ।
और ओशो ने कहा - तुम लोगों को देखते हो । वे दुखी हैं । क्योंकि उन्होंने हर मामले में समझौता किया है । और वे खुद को माफ नहीं कर सकते कि उन्होंने समझौता किया है । वे जानते हैं कि वे साहस कर सकते थे । लेकिन वे कायर सिद्ध हुए । अपनी नजरों में ही वे गिर गए । उनका आत्म सम्मान खो गया । समझौते से ऐसा ही होता है ।
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और ये भी किसी ने कहा - Your pajamas have duckies on them. Why did you switch from choo - 


choos ? YOU CAN GIVE A BETTER ANSWER
- early to bed early to rise, a man makes healthy wealthy and wise
और चलते चलते - एक आदमी के बच्चा नहीं होता था । सारी ! उसकी औरत के बच्चा नहीं होता था । डाक्टर के पास गये । उसने कहा । तुम्हें जो रोग है । उसकी दबा तो नहीं बनी । तुम्हारी एक ग्रन्थि में कमी है । इसलिये तुम अपने पूर्वज बन्दर की ग्रन्थि लगवा लो । बच्चा हो जायेगा ।
वह बोला - लगा दो । 9 महीने बाद ।
वह आदमी बैचेन सा आपरेशन थियेटर के बाहर टहल रहा था । जैसे ही डाक्टर निकल कर आया । उसने पूछा - लङका या लङकी ?
डाक्टर बोला - लङका लङकी तो तब पता चलेगा । जब वो हाथ में आयेगा । पैदा होते ही वो सीलिंग फ़ैन पर चढ गया ।

05 फ़रवरी 2012

इस चुङैल की असली कहानी ?

बहुत दिनों से इस लेख को लिखना चाह रहा था लेकिन कुछ न कुछ ऐसा व्यवधान आ ही जाता कि बात टल ही जाती । आपको याद होगा कि इसी सत्यकीखोज ब्लाग पर एक सचित्र विवरण छपा था - सत्यकीखोज को प्राप्त हुये 2 असली चुङैल फ़ोटो ।
मजे की बात ये थी कि ये दोनों फ़ोटो देखकर मुझे बहुत हँसी आयी । दरअसल हुआ ये कि किसी राजू द्वारा कुशीनगर, गोरखपुर की भेजी गयी फ़ोटो सविवरण मुझे प्राप्त हुयी और जब तक मैं इस चुङैल की असली कहानी ? आपको बता पाता । तभी चण्डीगढ के कुलदीप सिंह ने फ़ोन पर बताया कि - जब वो अपने कार्य से ऊना हिमाचल प्रदेश गये तो वहाँ भी पूर्व में एक घटना ऐसी घटी थी । जिसका फ़ोटो उनके पास है जिसे वो जल्द भेज देंगे ।
तब मैंने राजू द्वारा पूछे गये उस सवाल को कुछ समय के लिये स्थगित कर दिया । फ़िर वो भी फ़ोटो सविवरण मेरे पास आ गयी और मैंने उस विवरण को सचित्र ज्यों का त्यों छाप दिया । 
आपको ध्यान होगा । इसमें मेरा एक भी शब्द नहीं था सिवाय उन दोनों चुङैलों के प्रकार के । ये प्रकार उन स्थानों और घटनाओं के आधार पर था न कि फ़ोटो को देखकर । अब मजे की बात ये थी कि कुशीनगर वाली फ़ोटो जब मेरे पास आयी । उससे पहले ही उस चुङैल की mother फ़ोटो मेरे कम्प्यूटर में मौजूद थी । (फ़ोटो देखें)
जाहिर है मैंने इस विवरण को एक समाचार की तरह छापा । इसके पीछे एक और भी सोच थी कि - आम इंसान की क्या प्रतिक्रिया होती है ?
अब प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया तो मुझे पता नहीं पर शायद ज्यादातर लोगों को बात सच लगी ।
मगर प्रकाश गोविन्द जी ने कहा - फ़ोटो नकली है और इफ़ेक्ट से बनी है । 
किसी दूसरे बेनामी ने कहा - बकवास भूत चुङैल जैसा कुछ नहीं होता ।
जी हाँ ! ये एकदम सच है दोनों फ़ोटो एकदम नकली और मनगढन्त कहानी पर आधारित हैं । उनमें सत्यता कतई नहीं हैं । दरअसल इस ब्लाग पर भी मैं अपने जीवन की तरह समय समय पर प्रयोग करता रहता हूँ । तब एक अजीब सी बात लगी कि लोगों की सोच कितने सीमित दायरे में रहती है । अगर जरा सा भी जोर देकर सोचते तो फ़ोटो का कच्चा चिठ्ठा सामने आ जाता । दोनों फ़ोटो सामान्य कैमरे और मोबायल आदि डिवाइस से खींची गयी हैं ।
अब गौर करिये आजकल डिजिटल कैमरे और मोबायल आम बात है । गरीब से गरीब के पास हैं और अक्सर बहुत से लोग रात बिरात बहुत जगह फ़ोटोग्राफ़ी करते ही रहते हैं और प्रेत योनियों के लोग तमाम स्थान पर होते हैं । 
मेरे घर से ठीक पीछे 100 मीटर दूरी पर पीपल आदि वृक्ष समूह पर ही दो तीन प्रेत रहते हैं और कभी अलग से भी आ जाते हैं । कहने का मतलब ये आपके आसपास ही तमाम स्थान ऐसे हो सकते हैं जहाँ प्रेतवासा हो । तब वे कभी न कभी इन कैमरों की नजर में आ जाने चाहिये ।
इसको भी छोङिये । आपने देखा होगा डिस्कवरी जैसे तमाम खोजी चैनलों के फ़ोटोग्राफ़र आदि अत्याधुनिक और महंगे कैमरों के साथ दिन रात वीरान स्थानों पर भटकते ही रहते हैं । उनके कैमरों में आज तक कोई भूत प्रेत क्यों नहीं आया ?
इसको भी छोङिये NASA जैसे अंतरिक्ष केन्द्रों की दूरबीनें और उपकरण दिन रात आसमान को ही खंगालते रहते हैं । तब इनके कैमरों में भी कोई सूक्ष्म शरीरी कोई भूत प्रेत चुङैल आदि आ जाना चाहिये । क्योंकि आसमानी क्षेत्र में ऐसी आत्माओं का विचरण आम बात है बल्कि चहल पहल बनी ही रहती है ।
जाहिर है सूक्ष्म शरीर कभी कैमरों से दिखाई ही नहीं दे सकते । ये सिर्फ़ दिव्य दृष्टि या 3rd eye से नजर आते हैं । बस एक अपवाद होता है जब कभी किसी कारणवश ये अपने आपको किसी के सामने जाहिर करना चाहते हैं तो उसको प्रेत की इच्छानुसार प्लस उस आदमी की प्रेतक भावना के अनुसार भासित शरीर में दिखाई देते हैं । 
अब तक प्राप्त विवरणों के अनुसार ये कपङों में ही नजर आते हैं । अक्सर सफ़ेद कपङे या काले कपङे । जबकि वास्तविकता ये हैं प्रेत कपङे के नाम पर एक चिथङा भी नहीं पहनते । पहनेंगे कैसे ? कपङे आयेंगे कहाँ से ?
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प्रेतों से जुङे बहुत से अनुभव हैं मेरे पास । अभी ताजा घटना की बात बताता हूँ । बात लङकियों के हास्टल की है । हास्टल से अक्सर बहुत सी प्रेत कहानियाँ जुङी होती हैं पर मैं सच्ची और झूठी तुरन्त समझ जाता हूँ । ये लङकी करीब 17 साल की थी और आगरा के पास ही कंस नगरी की बात है । ये अपने हास्टल की खिङकी से खङी थी । ये तीसरा फ़्लोर था उस दिन वह कुछ हल्का ज्वर सा महसूस कर रही थी । खिङकी से पार कुछ दूर एक बगीचा सा था । वह वहीं गौर से देख रही थी ।
अचानक लङकी खुद ब खुद केन्द्रित होने लगी । उसकी समस्त सोच बिन्दुवत हो उठी । वह अपना अस्तित्व ही भूल गयी और उसे लगा कि वह इतनी ऊँचाई के बाबजूद भी खिङकी से आराम से छलांग लगा सकती है और दौङकर बगीचे में जा सकती है और वह ऐसा करने ही वाली थी ।
लेकिन बस एक बात अलग थी लङकी ने सतनाम का उपदेश लिया हुआ था । जैसे ही आवेश सक्रिय होने वाला था । नाम प्रभाव दिखाने लगा । लङकी के शरीर ने जोरों की झुरझुरी सी ली और वह वापिस चैतन्य होने लगी । अपनी स्थिति में आ गयी । उसने गुरुदेव को याद किया और बिना किसी दुर्घटना के सब सामान्य हो गया । ये 100% सत्य घटना थी ।
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अक्सर आवेश ऐसे ही होते हैं । बिना किसी आडम्बर के जैसे प्रायः समाज में प्रचलित हैं ।
ऐसे ही एक आवेश की दूसरी घटना मुझे एक महिला ने बतायी । वह एक गाँव के लगभग रास्ते से लगे परिचित बगीचे में दोपहर के समय खङी थी और लिफ़्ट हेतु किसी वाहन की प्रतीक्षा कर रही थी । जो वहाँ से 5 किमी दूर सङक तक लिफ़्ट दे दे । लेकिन काफ़ी देर तक कोई नहीं आया । अचानक वह सुन्न सी होने लगीं और एक आयत की शक्ल में लगे चार बङे वृक्षों के बीच अजीब सी ध्वनि युक्त हवा का चक्रवात सा घूमने लगा । प्रत्येक वृक्ष की आपस में दूरी लगभग 17 फ़ुट थी और वह वहीं खङी थी ।
उन्होंने बताया - उन्हें यकायक कुछ नहीं सूझा न कोई डर लगा । बल्कि वे मन्त्रमुग्ध सी उसे देखती सुनती रही । उन्हें अपना कुछ होश ही नहीं था । 
हालांकि कुछ दिखाई नहीं दे रहा था पर जाने क्यों ऐसा लग रहा था । जैसे उन चारों वृक्षों के बीच कोई उस ध्वनि और हवा के बहाव के साथ तेजी से घूम सा रहा है । वायु और उसकी तीवृता से जो ध्वनि पैदा हो रही थी । वैसी ध्वनि बताना तो कठिन हैं पर जैसे किसी ने बाइक का एक्सीलेटर मरोङ कर रख दिया हो - हूँ ऊँऽऽऽऽ । बस ऐसी ही ध्वनि उत्पन्न होकर वायु एक चक्र पूरा करती और फ़िर दोबारा ध्वनि । दोबारा चक्र ।
महिला के समस्त रोंगटें खङे हो गये । अब उन्हें कुछ कुछ डर सा भी लगा और वो लहराकर गिरने ही वाली थी । तभी सतनाम सक्रिय हो उठा । ये भी उपदेश लिये थीं । महिला के शरीर में हल्का हल्का कम्पन हुआ और वह अपनी जगह पर ही हिलने लगी ।
ये संयोग ही था अभी तक वहाँ से कोई गुजरा न था और समय भी अभी दस मिनट ही लगभग हुआ था । फ़िर वह चैतन्य हो उठी । उन्होंने गुरुदेव को प्रणाम किया और वहाँ से काफ़ी दूर हट गयीं ।
तब उनको ध्यान आया कि वे तो क्या उस स्थान पर गाँव वाले भी नहीं जाते । दरअसल कुछ साल पहले उन्हीं चार वृक्षों से किसी आदमी ने फ़ाँसी लगाकर स्व शरीर हत्या कर ली थी और प्रेत योनि होकर वहीं भटक रहा था । मजे की बात ये थी कि महिला को अच्छी तरह से ये बात पहले ही मालूम थी । वह प्रेत प्रमाणित स्थान था पर उस दिन उस समय न जाने कैसे बुद्धि पलट गयी और वह उसी  स्थान पर खङी  हो गयीं । अब खास बात ये थी कि उस अनुभव से पहले भी हवा एकदम शान्त थी । हवा चल ही नहीं रही थी और अनुभव से धीरे धीरे निकलने तक भी हवा नहीं चल रही थी । उन चार वृक्षों के मध्य या बाहर भी ।
बस उन्हीं चार वृक्षों के मध्य जैसे कोई वायुयान सा उङा रहा था । ये 100% सत्य घटना थी ।
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- इस तरह की सच्ची प्रेतक घटनाओं से आपको परिचित कराने का उद्देश्य ऐसी स्थिति आने पर बचाव करना और समझ जाना कि ये प्रेतक घटना है ही मेरा उद्देश्य है । ऐसा होने पर कभी डरिये मत, अपने को नियन्त्रण करने की कोशिश करें । ध्यान वहाँ से हटायें, इष्ट को भाव से ध्यान करें । 
सात्विक भाव बनते ही भय हट जायेगा और वहाँ से निकल जाना भी हो जायेगा ।

विशेष - उपरोक्त फ़ोटो को देखकर कोई पागल भी समझ जायेगा कि किसी ग्रामीण टायप विधवा और दुबली सी स्त्री के हाथ पैर मुँह मिटा दिया गया है और फ़िर इस कट को कहीं भी दूसरे फ़्रेम में प्लांट किया जा सकता है । ये कोई विशेष इफ़ेक्ट भी नहीं हैं । शायद PAINT में ही ऐसा करना संभव है ।

04 फ़रवरी 2012

लेकिन कैसे बुद्ध जी..कैसे अप्प दीपो भव ?

कृपया बुद्ध के प्रसिद्ध वाक्य ‘अप्प दीपो भव’  का मतलब समझायें और ये भी बताएं कि जो पहला आत्मज्ञानी हुआ होगा । उसका गुरु कौन था ? कृष्णमुरारी शर्मा ।
पूरा धार्मिक वितण्डा वाद लोगों को भयभीत करने पर आधारित है । (ईमेल शीर्षक के साथ)
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अप्प दीपो भव - अपने दीये स्वयं बनो..अप्प दीपो भव का ये अर्थ मैंने एक जगह लिखा देखा पर मैं इससे सहमत नहीं हूँ । अप्प - आप, दीपो - दीपक, भव - होना या प्राप्ति ।
भव संस्कृत का शब्द है और संस्कृत शब्दकोश में इसके अर्थ - जन्म, शिव, बादल, कुशल, संसार, सत्ता, प्राप्ति, कारण, कामदेव हैं पर मैं किसी भी भाषा के पचङे में पङने के बजाय सरल सहज मार्ग का सदैव हिमायती हूँ । इसलिये प्रसिद्ध और आसान वाक्यों में इसका प्रमाण देखता हूँ ।
देखिये - आयुष्मान भव, कीर्तिमान भव, दीर्घायु भव । अब बङे आराम से समझ में आता है कि आशीर्वाद में भव का अर्थ - होओ निकला, बनो नहीं । 
क्योंकि इसका अर्थ बनने से करें तो फ़िर ये सलाह हुयी, आशीर्वाद कहाँ हुआ ? तुम बनो ।
और पागल से पागल भी जानता हैं कि दीर्घायु और यशस्वी होना अच्छा है फ़िर किसी आदरणीय द्वारा सिर्फ़ ये ‘सलाह’ देना - अजीब सी बात हुयी ।
लेकिन वह सलाह दे ही नहीं रहा, वह कह रहा है - होओ, यानी मैं आशीर्वाद के रूप में यह तेज यह ज्ञान तुम्हें प्रदान करता हूँ । शास्त्रों पर गौर करें तो ये आशीर्वाद यूँ ही औपचारिक अन्दाज में नहीं दिये गये कि जो मन में आया, कह दिया । बहुत से ऐसे प्रसंग हैं जब किसी निसंतान ने संतान का आशीर्वाद मांगा तो दिव्यदृष्टा ने उसे मना कर दिया, क्योंकि उसके भाग्य में नहीं है । बहुत से ऐसे प्रसंग हैं जब आशीर्वाद को सत्य वचन माना गया और इसके पीछे न होने पर एक धर्म कानूनी लङाई सी हुयी और अन्ततः मामला उस आशीर्वाद को पूरा करके सुलझाया गया ।
सुप्रसिद्ध प्रमाण - सावित्री यमराज प्रसंग । 
अब सीधी सी बात है यमराज कहता है - पुत्रवती भव यानी पुत्रवती होओ । अगर ये बनने की बात होती तो वह कह देता - नहीं बन सकता, मेरा क्या कसूर पति मर चुका है पर वचन फ़ेल हो रहा है,  यानी वो दे चुका ।
इससे साबित होता है कि - बना नहीं जाता, होना होता है । बनना और होना मोटे अर्थ में समान भाव वाले लग रहे हैं पर इनमें एक बङा फ़र्क है । बनना - स्वयं का बोध देता है, किसी नयी बात का नये निर्माण का इशारा सा करता है । जैसा कि किसी विद्वान ने बुद्ध को अपनी बुद्धि से लिख दिया और होना - स्थापित सत्य के समान, अप्प दीपो भव - दीप के समान प्रकाशित ।

फ़िर इस तरह बुद्ध ने कुछ बहुत नयी बात नहीं कह दी यह तो पूर्वजों के छोटे मोटे आशीर्वाद में शामिल था - यशस्वी भव, तेजस्वी भव ।
ज्यों तिल माँही तेल है, ज्यों चकमक में आग । 
तेरा सांई तुझमें है, जाग सके तो जाग । 
इसलिये बनना (निर्माण) नहीं हैं वो आग प्रकट करनी है ।
मैंने पहले भी ये बात कही है । बुद्ध 2500 वर्ष पूर्व हुये उन्होंने जब ये बात कही होगी तो किसी ने अवश्य पूछा होगा - लेकिन कैसे बुद्ध जी ! कैसे अप्प दीपो भव ?
- ज्ञान की रगङ से । बुद्ध ने निश्चय ही उत्तर दिया होगा - और ज्ञान के लिये किसी बुद्ध के पास जाओ ।
क्योंकि अगर इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी तो बुद्ध क्या रोचक कहानी भर सुना रहे थे ? अगर ज्ञान स्वयं से हो सकता था तो बुद्ध की ही क्या आवश्यकता थी । उन्हें यह कहने की ही क्या आवश्यकता थी ? लेकिन लोगों ने बात को अपनी सन्तुष्टि अनुसार पकङ लिया ।
बहुत पहले कोई मरा होगा किसी बच्चे आदि ने जिज्ञासावश पूछा होगा - अब दद्दा (मृतक) कहाँ गये ? तो उसने ज्ञान दृष्टि से कहा होगा - स्वर्ग प्राप्त हुआ । उस एक को क्या हुआ आज तक सबको स्वर्ग ही प्राप्त हो रहा है । मरने के बाद अखबार में (उठावनी ) खबर छपती है । स्वर्ग पहुँच गये, गोलोक पहुँच गये । फ़ोन आ गया मौज में है ।
नरक तो कोई गया ही नहीं तबसे । मैंने आज दिन तक घोर पापी (जिन्हें मैं व्यक्तिगत जानता था) की खबर में भी नहीं देखा - नरकवासी हुये । स्वर्ग अच्छा था स्वर्ग पकङ लिया । इसमें कौन से पैसे खर्च होते हैं । बात वही है - जो खुद को अच्छा लगा ले लिया ? मगर क्या वास्तव में मिला ?
तो बुद्ध ने आगे भी कुछ कहा होगा ? ज्ञान की तलाश करो । गुरु की भावना करो । बस मतलब की बात मिल गयी इसलिये  उलझाऊ संकलित ही नहीं की ।
लेकिन बुद्ध बुद्धि वाले लोगों की भारत में कभी कमी नहीं रही । एक बाबा तुलसीदास भी हुये । उन्होंने रामचरित मानस उत्तरकाण्ड में - ये दिया कैसे जलेगा ? ये पहेली सुलझा दी ।
देखिये -

जोग अगिन कर प्रगट । तब कर्म शुभा शुभ लाइ । 
बुद्धि सिरावे ज्ञान घृत । ममता मल जर जाइ ।
तब बिज्ञान रूपिनि । बुद्धि बिसद घृत पाइ ।
चित्त दिया भरि धरे । दृढ़ समता दिअटि बनाइ ।
तीन अवस्था तीन गुन । तेहि कपास ते काढ़ि । 
तूल तुरीय संवारि पुनि । बाती करे सुगाढ़ि ।
एहि बिधि लेसे दीप । तेज रासि बिज्ञानमय ।
जातहिं जासु समीप । जरहिं मदादिक सलभ सब ।
लीजिये - अप्प दीप जलने लगा फ़िर क्या हुआ ?
सोहस्मि इति बृति अखंडा । दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा ।  
जैसे ही सोऽहंग वृति अखण्ड हुयी यानी चेतनधारा से अखण्ड ध्यान जुङ गया । इस दीपक की लौ परम प्रचण्ड जल उठी ।
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा । तब भव मूल भेद भृम नासा । 
आत्मा का अनुभव होने लगा और सुप्रकाश (ध्यान दें - अपना प्रकाश) का सुख जाना । तब मैं क्या हूँ । मूल यानी जङ कहाँ है । ये भेद क्या हैं ? इन सब भृमों का नाश हो गया ।
आगे देखिये ।
परम प्रकास रूप दिन राती । नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती । 
दिन रात सदा परम प्रकाशमय रूप का अनुभव । लेकिन ? अब न दिया न तेल न घी न कोई बत्ती  वगैरह कुछ नहीं चाहिये ।
भाव सहित खोजइ जो प्रानी । पाव भगति मनि सब सुख खानी । 
और बस भाव से यदि प्राणी खोजे तो ये सभी सुखों की खान भक्तिमणि उसे प्राप्त हो जाती है ।
सब कर फल हरि भगति सुहाई । सो बिनु संत न काहू पाई । 
तुम्हारे सारे प्रयत्न जप, तप, वृत, तीर्थ, पुण्य, दान आदि इनका फ़ल प्रभु की सच्ची भक्ति मिलना ही है । लेकिन ? वो बिना सन्तों के कोई प्राप्त न कर सका और भी आगे देखिये ।
कमठ पीठ जामहिं बरु बारा । बंध्या सुत बरु काहुहि मारा । 
कछुये की पीठ पर बाल उग आयें । बांझ स्त्री का पुत्र किसी को मार दे ।
फूलहिं नभ बरु बहु बिधि फूला । जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला ।  
आकाश में तरह तरह के फ़ूल खिल उठे यानी ये असंभव कार्य भी यदि हो जायं लेकिन हरि (नाम) से प्रतिकूल जीव सुख नहीं पा सकता ।
तृषा जाइ बरु मृगजल पाना । बरु जामहिं सस सीस बिषाना । 
मृग मरीचिका के जल से प्यास बुझ जाये । खरगोश के सर पर सींग उग आयें ।
अंधकारु बरु रबिहि नसावे । राम बिमुख न जीव सुख पावे ।  
और अंधकार सूर्य को नष्ट कर दे । ये सब भले हो जाये लेकिन राम से विमुख जीव सुख नहीं पा सकता ।
हिम ते अनल प्रगट बरु होई । बिमुख राम सुख पाव न कोई । 
बर्फ़ से अग्नि प्रकट हो जाये लेकिन राम से विमुख कोई जीव सुख नहीं पा सकता ।
और देखिये ।
जहं लगि साधन बेद बखानी । सब कर फल हरि भगति भवानी । 
हे पार्वती ! वेद जितने भी साधनों का बखान करते हैं । अंततः सभी (साधन उपाय) का फ़ल निचोङ हरि भक्ति ही बनता है यानी उतना सब करने के बाद समझ आता है या हरि भक्ति के पात्र हो जाते हैं ।
सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई । राम कृपा काहू एक पाई । 
वही रघुनाथ जी की भक्ति वेद गाते हैं । जो राम कृपा से किसी एक (बिरले) को प्राप्त होती है । कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं । ते गोपद इव भवनिधि तरहीं । 
जो इस राम कथा (अंतर में गूँजता अखण्ड नाम) को कहते सुनते और अनुसरण करते हैं । वे इस संसार सागर को गोपद (यानी गाय के खुर से बने गढ्ढे के समान) जैसी आसानी से पार (तर) कर जाते हैं ।
जो पहला आत्म ज्ञानी हुआ होगा । उसका गुरु कौन था ?
ये तो बङा साधारण सा प्रश्न है । इसका भी विस्त्रत उत्तर मेरे ब्लाग्स पर मौजूद है । जब ये सृष्टि बनी और कालपुरुष का नाम उस वक्त धर्मराय था लेकिन वो अष्टांगी को निगल गया । तब उसे यमराय या जमराय कहा जाने लगा । फ़िर उसे दिये गये ‘सोऽहंग’ जीवों को तप्तशिला आदि पर जलाने लगा, पाप कर्मों में उलझाने लगा, कष्ट देने लगा ।
तब इन जीवों की करुण पुकार से दृवित होकर सतपुरुष ने अपने प्रतिनिधि वहीं के लोगों को इनके उद्धार के लिये भेजा । इन्होंने जीव को उसके आत्मस्वरूप का बोध कराया और इस तरह युग युग में यह आत्मज्ञान परम्परा शुरू हुयी । 
अभी कुछ ही दिन पहले के लेख में मैंने बताया है कि - आत्मज्ञानी किस तरह प्रकट होते हैं ?
रामानन्द और कबीर प्रकरण में तो इसी चीज का बहुत विस्तार से वर्णन है । द्वैत ज्ञान की धज्जियाँ उङा दी हैं । रामानन्द के गुरु कबीर थे या कबीर के गुरु रामानन्द थे ? यही रहस्य बताया गया है । जब ये राज्य सत्ता (कई त्रिलोकी सृष्टि) बनी भी नहीं थी तब केन्द्रीय सत्ता पूर्ण अवस्था में आकार ले चुकी थी और वहाँ सभी मुक्त आत्मायें (आत्म ज्ञानी) ही थे । मुक्त आत्मा का मतलब ही ये है । सकल सृष्टि में उनकी निर्बाध गति होती है ।
अपनी मढी में आप मैं खेलूँ । खेलूँ खेल स्वेच्छा ।

02 फ़रवरी 2012

जहाँ मन फ़ँस जाय वही माया है

राजीव जी नमस्ते ! आपसे एक बात पूछनी थी । मैंने कबीर दास जी का एक दोहा सुना था । जिसका अर्थ नहीं समझ पा रहा हूँ । वो दोहा इस तरह  से है ।
माया छाया एक सी बिरला जाने कोई । ढायात के पीछे पडे सनमुख भागे सोई ।
इस दोहे मे माया भागने वाले के पीछे पड़ती है । सनमुख होते भाग जाती है । यहाँ माया के सनमुख होने का क्या मतलब है । मार्गदर्शन करें । आपका bhupendra
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आपके द्वारा प्रेषित दोहे में प्रयुक्त शब्द मैंने पहली बार देखे । कवीर वाणी में यह दोहा निम्नलिखित है ।
माया छाया एक सी ।  बिरला जाने कोय । भगता के पीछे लगे ।   सम्मुख भागे सोय । दोहा चाहे आपका हो । या ये । शायद बात एक ही है । और इसका अर्थ अति सरल है । माया को जन साधारण में धन सम्पत्ति आदि के रूप में कहा जाता है । लेकिन इसके विस्त्रत अर्थ में तुलसी आदि आत्मज्ञानी सन्तों ने स्त्री पुत्र माता पिता घर परिवार अन्ततः संसार को भी माया कहा है । शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है । ये भासित ( ध्यान दें - प्रतीत होने वाला । मगर है नहीं । ) जगत रज्जु ( रस्सी ) में कल्पित सर्प के समान है । यानी अँधेरे ( अज्ञान ) में जिस प्रकार रस्सी को देखकर सर्प का विचार हो जाता है । लेकिन प्रकाश ( ज्ञान ) होते ही रस्सी की असलियत पता चल जाती है । उसी प्रकार ये समस्त जगत बृह्माण्ड निकाय ( नगर ) माया से निर्मित हैं । देखिये प्रमाण - सुन रावन बृह्माण्ड निकाया । पाय जासु बल विरचित माया । और भी देखिये - बृह्माण्ड निकाया निर्मित माया ।

रोम रोम प्रति वेद कहे ।
लेकिन माया का एकदम सटीक अर्थ है - जहाँ मन फ़ँस जाय । वही माया है । चलिये मायावती के बारे में आपको बता दिया । अब छाया देवी के बारे में तो लगभग सभी जानते ही हैं । प्रतिबिम्ब या परछाईं को छाया कहा जाता है । बिरला - लाखों करोंङों में कोई एक । भगता का सीधा सा अर्थ है - प्रभु का भक्त । सम्मुख का अर्थ है - सामने होना ।
अब आईये दोहे को हल करते हैं । माया छाया का एक सा व्यवहार होता है । ये भगवान की ओर ही देखने वाले भक्त के पीछे पीछे अपनी सेवाये देने को भागती है । लेकिन  इसके विपरीत भगवान के बजाय जो माया की चाहना करता है । ये उससे सदा दूर ( भागती ) रहती है । इसको समझाने के लिये सन्त मत में सूर्य का ( भगवान के रूप में ) उदाहरण दिया जाता है ।
यदि कोई सूर्य की तरफ़ मुँह करके चले । तो उसकी माया रूपी छाया सदा उसके पीछे पीछे चलेगी । लेकिन इसके विपरीत कोई ( सूर्य  ) भगवान से मुँह फ़ेरकर अपनी ही इस माया रूपी छाया के पीछे चले । और उसको लाख पकङना चाहे । तो भी ये एक निश्चित दूरी पर ही रहेगी ।

ऐसा भी नहीं है कि सन्तों ने माया को एकदम महत्वहीन कहा हो । ज्ञान रहित स्थिति में माया से ही कार्य होता है । ये जीव माया के गर्भ में तो है ही । माया से छूटने में माया का ही सर्वप्रथम उपयोग होता है । कहा गया है - जो माया को झूठा कहें । उनका झूठा ज्ञान । माया से ही होत हैं । तीर्थ पुण्य और दान ।

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