08 फ़रवरी 2012

हम भी कुण्डलिनी जागृत करना चाहते हैं

हम भी कुण्डलिनी जागृत करना चाहते हैं । कृपया मार्गदर्शन करें । जोया रुबीना उस्मानी ।
- जोया जी सत्यकीखोज के साथ साथ ब्लाग जगत में आपका बहुत बहुत स्वागत है । आपसे मिलकर बहुत खुशी हुयी । चलिये आपकी जिज्ञासा पर बात करते हैं ।
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कभी कभी सोचता हूँ । क्या अजीव खेल है ? कैसा अदभुत खेल बनाया । मोह माया में जीव फ़ँसाया । दुनियाँ में फ़ँसकर वीरान हो रहा है । खुद को भूलकर हैरान  हो रहा है । तू अजर अनामी वीर भय किसकी खाता । तेरे ऊपर कोई न दाता । ईश्वर अंश जीव अविनाशी । चेतन अमल सहज सुखराशी जङ चेतन ग्रन्थि पर गई । यधपि मृषा छूटत कठिनई । सन्तों के सिर्फ़ इन 5  दोहों का कोई भी इंसान गहराई से मनन करके इनका मर्म ठीक से समझ ले । तो समझो । बहुत बङी बात हो गयी । कल्पना से भी परे ।
चलिये मैं कुछ मदद करता हूँ । इस अदभुत खेल में सिर्फ़ मोह माया द्वारा जीव फ़ँसा है । न कुछ लाया ।  न कुछ ले जायेगा । जो कुछ प्राप्ति हुयी । यही हुयी । और यहीं के लिये हुयी । और जाहिर है । सभी को होती है । और जब अभी हुयी । तो आगे भी होगी । तो इस आधार पर जो इस प्राप्ति को अपना और अपने द्वारा कृत मान बैठा । वही मोह माया है । और उसी के कारण शक्तिहीनता है । वरना आत्मा सर्वाधिक शक्तिशाली है । और स्वयं आनन्द स्वरूप भी है ।

दूसरा देखें । who am i ? इस मायावी सृष्टि में आकर्षित होकर ये जीवात्मा अपनी पहचान भूल गया । और हैरान स्थिति में इस 84 की अंधेरी भूल भुलैया में भटक गया । जैसे ही ये खुद के बारे में सोचेगा । सिर्फ़ अपनी पहचान के प्रति जागरूक होगा । तब इसको पता चलेगा कि मैं सर्वाधिक शक्तिशाली हूँ । और स्वयं आनन्द स्वरूप भी ।
तीसरा देखें । तू (  आत्मा ) अजर ( कभी बूढा न होने वाला ) अनामी ( कोई नाम नहीं ) वीर । भय किसका खाता । तेरे ऊपर ( देखिये कितनी महत्वपूर्ण बात है । ) कोई दाता ( देने वाला ) है ही नहीं । बस एक बार अपनी मूल स्थिति को जान ले ।
चौथा देखें । ईश्वर का ही अंश ये जीव अविनाशी  ( यानी कभी नष्ट नहीं होता ) और चेतन गुण (  जो सिर्फ़  आत्मा का ही है ) अमल ( इसमें मूल रूप में

कोई मल विकार है ही नहीं । हो ही नहीं सकता ) सहज ( बिना किसी कोशिश के ) सुखराशी ( सुख का भण्डार है । ) लेकिन गलती कहाँ हो गयी ? जङ (  प्रकृति ) से इस चेतन ने ग्रन्थि ( गाँठ ) बाँध ली । ये समझना थोङा कठिन है । प्रकृति जङ है । ये चेतन के होने से ही कार्य करती है । जैसे शरीर और मन दोनों ही जङ हैं । ये आत्मा के होने से ही कार्य करते हैं । और शरीर में आत्मा ही चेतन है । लेकिन कोई शरीरी अपने को कभी मानता है कि - मैं आत्मा हूँ । वह अपने रूप शरीर को मानता है । जबकि खूब मालूम है । ये मिट्टी में मिल जायेगा । यही मोह रूपी जङ चेतन ग्रन्थि है ।  यधपि मृषा ( हालांकि ये झूठी गाँठ है ) क्योंकि खूब मालूम है । शरीर निश्चित समय तक का है । छूटत कठिनई ( फ़िर भी इसको स्वीकार करना बहुत कठिन है ) इसलिये इस चेतन आत्मा में यही मायावी गाँठ सबसे बङी दिक्कत है ।
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अब आपकी जिज्ञासा पर बात करते हैं । वैसे कुण्डलिनी के बारे में कई पहलुओं से विस्त्रत जानकारी मेरे ब्लाग्स पर उपलब्ध है । वास्तव में यह एक शक्ति है । जो समस्त संसार में कार्य कर रही है । इसके बहुत सारे कार्य हैं । यह आकृति में नागिन के समान है । और साढे तीन लपेटे  मारे हुये सर्प कुण्डली के समान नीचे मुँह किये हुये पङी है । शरीर में इसका स्थान रीढ की हड्डी के अंतिम सिरे पर है । सामान्य मनुष्य की अवस्था में इसका नीचे मुख को होना । सोना कहा जाता है । ध्यान की बार बार ठोकर से यह मुँह ऊपर को उठा कर जागृत होकर चलने लगती है । वैसे तो पूरा द्वैत योग या कुण्डलिनी जागरण ही इसके ऊर्ध्व मुख ( ऊपर मुँह ) होते ही शुरू हो जाता है ।
लेकिन प्रारम्भिक स्थिति की बात करते हैं । साधारण स्थिति में इससे शरीर में जबरदस्त लाभ होता है । क्योंकि ये वेग से नस नाङियों में ( प्राण वायु ) प्रवाहित होती है । और असाध्य रोग ( केवल भोग छोङकर ) को चमत्कारिक ढंग से ठीक कर देती है । कुछ अन्य छोटी स्थितियों में दिव्य दृष्टि । अशरीरी आत्माओं से बातचीत । आगे की बात आदि जान लेना भी होता है । इसके अन्य बहुत से परिणाम होते हैं ।
लेकिन ये कोई मामूली और सरल क्रिया नहीं हैं । इसके लिये ध्यान में बैठना होता है । और फ़िर इसे जागृत करने के कई तरीके होते हैं । सबसे पहली बात । जब यह पहली बार जागृत होती है । शरीर में एक वेग आवेश सा उत्पन्न होता है । सामान्य मनुष्य का अपने जीवन में ऐसी स्थिति से कभी पाला नहीं पङा होता । उसे अपने शरीर से ऐसा कोई अनुभव नहीं हुआ होता । कुण्डलिनी जागरण । योग की सभी क्रियायें । देवी आवेश । प्रेत आवेश । और मृत्यु । इन सभी में लगभग समान क्रिया होती है । जब प्राण चेतना इकठ्ठा होकर किसी एक तरफ़ गति करती है । अतः बिना किसी अनुभवी के साथ । केवल विधि पढकर । इसको स्वयं करने से बेहद डर तो लगता ही है । साथ ही साथ कभी कभी गम्भीर स्थितियाँ बन जाती हैं । जिसमें भयभीत इंसान पागल भी हो सकता है । और उसकी मृत्यु भी हो सकती है । अतः इसको पत्राचार शिक्षा के माध्यम से भी नहीं किया जा सकता । सिर्फ़ एक ही उपाय है । समर्थ गुरु के सानिध्य में । इसको आसानी से । बिना किसी डर परेशानी के किया जा सकता है । दो तीन बार ध्यान अभ्यास के बाद । फ़िर डर के बजाय मजा आता है । ठीक उसी तरह - एस्सेल वर्ल्ड में रहूँगा मैं । घर नहीं जाऊँगा मैं । गोल गोल घूमूँगा । पानी में तैरूँगा । ई हू ‍ऽऽऽऽ । एस्सेल वर्ल्ड में रहूँगा मैं । घर नहीं जाऊँगा मैं । जी हाँ । बिलकुल एक नया अनोखा और जादुई संसार ।
लेकिन जहाँ तक मेरा ख्याल है । ये आम आदमियों की किस्मत में नहीं होता । इसलिये मैं अपने सभी पाठकों को एक बेहद सरल और इससे भी बङी शक्ति जगाने का उपाय बताता हूँ । वो शक्ति है - आत्मा का प्रकाश । जिसके घर कुण्डलिनी जैसी नौकरानियाँ पानी भरती हैं । और उसकी तुलना में ये बेहद सरल हैं ।
- सुबह के शान्त समय में ( 5 से 7 बजे तक ) लगभग आधा घण्टा सुखासन में बैठिये । और एक विचार पक्का कर लीजिये । आप न हिन्दू हैं । न मुसलमान । न सिख । न ईसाई । न कोई अन्य । दरअसल आप जो हैं । वो आपको पता नहीं है । और आप उसी को खोज  रहे हैं । क्योंकि आपको सब में कामन इंसान नजर आया । इसलिये बाकी बात आपको कूङा लगी । समझ नहीं आयी । फ़ेंक दी ।
- अब आ जाओ । दूसरी बात पर । राम । खुदा । गाड । अल्लाह । रब्ब । भगवान । पता नहीं । हैं भी या नहीं ? आय कांट बिलीव इट । जब तक खुद अनुभव न हो । खुद न देखूँ । मानने से भी कोई लाभ नहीं । बङा लफ़ङा है । हिन्दू राम आदि कहता है । मुसलमान अल्लाह आदि कहता है । या तो फ़िर सब एक ही बात कहते । हाँ याद आया । एक बात अवश्य ऐसी है । जो सभी एक ही बताते हैं - सबका मालिक 1 है । उसी को राम खुदा रब्ब गाड आदि कहा गया है । आयडिया ! तमाम प्रचलित नाम छोङकर कल्पना से उस 1 को ही याद करते हैं ।
- अब गौर करिये । फ़ार्मूला तैयार हो गया । आप किसी जाति धर्म के बजाय सिर्फ़ 1 इंसान रह गये । और धर्म की दीवारों में बँटा भगवान भी सिर्फ़ 1 ही रह गया । बहुत कूङा खत्म हुआ ।
- अब सबसे महत्वपूर्ण और ठोस हकीकत पर सोचिये । ये सब संसार । घर । परिवार । समाज । मित्र आदि दुनियाँ का मेला । सिर्फ़ इस शरीर रहने तक ही है । ओह गाड ! मरने के बाद क्या होता है ? किसी तरह पता लग सकता है क्या ? मरने के बाद मेरा क्या होगा ?
- जब ये विचार पक्का हो जाये । तव उस अविनाशी आत्मा को कल्पना से याद करिये । वह कल्पना इस तरह है - चटक दूधिया । चमकीला । तेज । स्व प्रकाशित । सूर्य के समान आकृति । और आकार जितना बङे से बङा आप कल्पना कर सकें । बस इसी को ह्रदय में बसा लीजिये । और अधिकतम ध्यान करिये ।
- अब दूसरी । और महत्वपूर्ण बात । अपने लिये सोचिये । मैं भी इससे अलग नहीं हूँ । मैं भी इस सनातन ( लगातार ) अमर आत्मा का ही अंश हूँ । यही मेरी असली पहचान है ।
- आपने देखा होगा । बीजगणित में कोई सवाल हल करने के लिये इस तरह माना जाता है - माना राम के पिता की उमृ य है । और राम की उमृ 10 वर्ष आदि । और मजे की बात ये है कि इसी य को फ़ार्मूले में फ़िट करके सही उत्तर आ जाता है । ऐसे ही यहाँ ज्ञान और शक्ति दोनों आयेगी ।
- इस तरह के अभ्यास से आपकी सिक्स्थ सेंस विकसित होगी । और अन्दर ज्ञान प्रकाश आत्म प्रकाश बङेगा । यही अदभुत सनातन भक्ति भी है । यही राज योग भी है । निश्चित जानिये । तब जो भी आप चाहते हैं । उसका रास्ता खुद ब खुद बनेगा ।
- यदि कोई बात समझ न आयी हो । तो दोबारा पूछ सकते हैं ।
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