11 फ़रवरी 2012

हे पिया ! आप मेरे पास लौटकर नहीं आये

अपनी बात - पिछले दो दिन बहुत व्यस्तता के रहे । और दिन पर दिन व्यस्तता बढती ही जा रही है । कुछ लोगों की जिज्ञासा का समाधान भी करना शेष है । वैसे अभी बहुत कुछ रहस्य भी बताने बाकी हैं । इसलिये मेरी पूरी कोशिश रहेगी । व्यस्तता के इन्हीं क्षणों में फ़ुरसत के कुछ लम्हे चुराकर बातचीत जारी रहे ।
आपको याद होगा । अभी कुछ दिन पहले मैंने व्यास के पुत्र श्री शुकदेव जी का पक्षी तोता योनि से आत्म ज्ञान द्वारा मनुष्य शरीर प्राप्त करना आदि सटीक प्रमाणिक विवरण आपको बताया था । आज इन्ही शुकदेव के पिता व्यास और इनके दादा पाराशर ऋषि की अदभुत जीवन कथा आपको सुनाते हैं ।

और ये है - नई खुशखबरी 
विवरण कल तक

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पाराशर ऋषि शंकर पार्वती की संतान थे । यदि इनके जन्म आदि का विवरण कहा जाये । तो बात बहुत लम्बी हो जायेगी । इसलिये इनकी बाल्यावस्था से बात आरम्भ करते हैं । बीच बीच में भी जीवन चरित्र को संक्षिप्प्त किया गया है । और मुख्य घटना कृम पर जोर दिया गया है ।
पाराशर का विवाह प्राचीन परम्परा के अनुसार बाल अवस्था में ही हो गया था । उस समय के माहौल और संस्कार स्थान आदि के प्रभाव अनुसार पाराशर विवाह के कुछ समय बाद ही तप करने जाने लगे । तब इनकी

पत्नी को बहुत दुख और निराशा सी हुयी । उसने प्रार्थना की - यह तप आदि आप यौवन अवस्था के बाद ही करते । फ़िर विवाह का अर्थ क्या होगा ? और कुछ नहीं । तो कम से कम एक संतान तो मुझे देते  जाओ । अर्थात उस समय तक तो रुको ।
पर अवस्था के अनुसार वह समय अभी दूर था । पाराशर ने विचार किया । और अपनी पत्नी को - एक तोते का बच्चा । एक घोङे का बच्चा । और एक बरगद का पौधा लगाकर दिया । और बोले - देखो । अभी पर्याप्त समय है । इसलिये तुम्हें मैं ये तोता घोङा आदि दिये जा रहा हूँ । ये शिशु तोता जब सिखाये हुये मन्त्र आदि बोलने लगे । इस घोङे के बच्चे के दो दांत निकल आयें । और जब इस छोटे बरगद के पेङ पर फ़ल आने लगे । और तुम स्त्री यौवन धन से परिपूर्ण हो जाओ । तब मैं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करने आ जाऊँगा ।
यह कहकर वे वन को चले गये । इस तरह लगभग 12 वर्ष गुजर गये । और पाराशर नहीं आये । तव उनकी पत्नी ने एक सन्देश लिखकर उसी पालतू तोते के माध्यम से पाराशर के पास भेज  दिया । वह सन्देश इस प्रकार था -
पढ सुअना पण्डित भये । घु्ङल भये दो दन्त । बरी बरगदा आवन लागे । भर जुबना तिरिया भई । अब हू न लौटे कन्त
अर्थात - तोता भी पढना बोलना सीख गया । घोङे के भी दो दांत निकल आये । बरगद के वृक्ष पर भी फ़ल फ़ूल आने लगे । और आपकी  स्त्री भी यौवन रस से भर उठी है । फ़िर भी -  हे पिया ! आप मेरे पास लौटकर नहीं आये ।

तोता ये सन्देश लेकर तपस्या रत पाराशर के पास पहुँचा । जिनकी तपस्या पूर्ण होने वाली ही थी । पाराशर ने जैसे ही यह सन्देश पढा । तो नव यौवन अवस्था का वेग । और स्त्री तथा काम रहित जीवन व्यतीत करने के कारण । उनमें वेग से काम का संचार हुआ । और उनका वीर्य स्खलित हो गया । तपस्या उसी क्षण खण्डित हो गयी ।
पाराशर बङी चिन्ता में पङ गये । फ़िर कुछ देर सोच विचार के बाद उन्होंने वीर्य को युक्ति द्वारा । उसी तोते के माध्यम से अपनी स्त्री के पास भेज दिया । जब तोता आसमान में उङा जा रहा था । उसी समय एक चील ने उस पर झपट्टा मारा । जिससे बचाव आदि में वह वीर्य नीचे नदी में गिर गया । जिसे तत्काल ही एक मछली निगल गयी । इसी मछली को एक मछुवे द्वारा पकङने पर एक कन्या उसके उदर से निकली । जिसको मच्छोदरी और सत्यवती कहा जाने लगा ।
उधर तोता जब खाली हाथ पाराशर की पत्नी के पास पहुँचा । तो उस काम पीङित पत्नी ने पाराशर को शाप दे दिया - अगर तुम अभी न लौटे । तो अपनी ही पुत्री से भोग करोगे ।

पाराशर को इस बात का कोई पता नहीं था । वह जानते थे । तोता सही सलामत उनका सन्देश पहुँचा देगा । अतः वे फ़िर से निश्चिन्त होकर तपस्या करने लगे । और फ़िर से 12 वर्ष गुजर गये । उनका तप पूर्ण हुआ । तब उन्होंने घर जाने की सोची । और चलते चलते गंगा तट पर आये ।
उस वक्त मल्लाह भोजन कर रहा था । तव उसकी पुत्री सत्यवती ने कहा - पिताजी ऋषि को गंगा मैं पार करा देती हूँ । और इस तरह वह गंगा पार कराने लगी । सत्यवती सुन्दर और यौवन युक्त थी । जब नाव गंगा के मध्य थी । तब पाराशर में उसकी सामीप्यता से कामवासना का संचार हुआ । उन्होंने उससे कहा - मैं तुमसे काम भोग का इच्छुक हूँ ।

सत्यवती हैरान रह गयी । लेकिन शाप का प्रभाव था । फ़िर सकुचाते हुये बोली - मगर ऋषिवर ऊपर सूर्य  और नीचे गंगा हमें देख रहे हैं । पाराशर ने अभिमंत्रित जल ऊपर आकाश में फ़ेंका । तुरन्त घना कुहरा फ़ैल गया । ऐसा ही जल गंगा पर फ़ेंका । आसपास जल पर काई फ़ैल गयी । सत्यवती सन्तुष्ट हो गयी । और दोनों कामभोग

करने लगे । इसी काम भोग के परिणाम स्वरूप वेद व्यास पैदा हुये । जो इस तरह कुँवारी लङकी के गर्भ से पैदा हुये थे ।
उधर पति के न आने से निराश पाराशर की पत्नी तप करने लगी थी । और तप तेज से युक्त हो गयी थी । सत्यवती से भोग के उपरान्त जब पाराशर घर पहुँचे । तो उसे सब पता चल गया । तब उस तेजस्विनी स्त्री ने उन्हें शाप दिया - हे ऋषि ! आप अपनी ही पुत्री से काम भोग करके आये हो । इसलिये तुम अभी सियार हो जाओ ।
अपनी गलती और शाप के फ़लस्वरूप पाराशर सियार हो गये । और जंगल में भटकने लगे । तब ये सियार की बोली हु..आ..हु..आ बोलते हुये एक दिन गंगा तट पर पहुँचें । क्योंकि ये शाप वश पशु योनि को प्राप्त हुये थे । इन्हें अपनी पूर्व अवस्था का ज्ञान था । तब इन्होंने गंगा से कहा - देवी गंगा ! तुम  मुझसे विवाह कर लो ।
गंगा बोली - हे ऋषि ! आप 7 बार मेरी जल धार को बार बार इधर से उधर पार कर लें । तब हमारी शादी हो जायेगी ।
सियार शरीर में पाराशर ऐसा ही करने लगे । उस समय गंगा प्रवल वेग से बह रही थी । तब एक बार सियार बीच धार में ही डूब गया । और तत्क्षण ही उसकी मृत्यु हो गयी । और कुछ ही दिनों में शरीर गल कर सिर्फ़ हड्डियों का ढांचा गंगा में बहने लगा । इस हड्डियों के ढांचे के साथ कुछ लकङी कूङा टायप भी इकठ्ठा हो गया था । फ़िर ये पूरा मलबा और हड्डियाँ बहते बहते गंगा के किनारे जाकर लग गया ।
उन्हीं दिनों सप्त ऋषि ( आकाश में जो खटोला आकृति में 7 तारे नजर आते हैं । ये सप्त ऋषि स्थान है । यही तारे संभवतः स्वदेश फ़िल्म - शाहरुख खान में भी दिखाये हैं ) गंगा तट के पास आये । उन्हें गंगा को पार करना था । तब उन्हें वो हड्डियाँ और उससे जुङा कूङा करकट नजर आया । उन्होंने उसका उपयोग एक टेम्पररी नाव टायप

बनाने में किया । और उसी से गंगा पार की ।
क्योंकि वे ऋषि ( शोध कर्ता ) थे । उन्होंने सोचा - इस मृतक जानवर के अस्थि पंजर ने गंगा पार कराने में हमें सहयोग किया है । अतः हमें भी इसके लिये कुछ करना चाहिये । उन्होंने हड्डियों का आकार विधिवत किया । और मृतक संजीवनी विध्या से उसे फ़िर से जीवित सियार बना दिया । पाराशर को ये उस शरीर से शाप मुक्त होने का अच्छा अवसर लगा ।
उन्होंने कहा - ऋषियों यदि उपकार करना ही चाहते हो । तो इससे पहले में जो था । वह बनाओ । अन्यथा मुझे निर्जीव हड्डियाँ ही रहने दो । तब ऋषियों ने उन्हें फ़िर से मनुष्य रूप कर दिया । सात ऋषियों द्वारा पुनर्जीवन मिलने से ही  इनका नाम सान्तनु ( शान्तनु ) हुआ ।
तब मनुष्य रूप होते ही फ़िर इन्हें गंगा की याद आयी । और उससे जाकर बोले - गंगा अब तुम मुझसे शादी करो । क्योंकि गंगा वचन वद्ध थी । उसने शादी कर ली । लेकिन एक शर्त जोङ दी - जिस दिन मैंने अपने जिआये पुत्र का मुँह देख लिया । उसी दिन अपना ये स्त्री  रूप त्याग कर फ़िर जल रूप ( लीन ) हो जाऊँगी ।
गंगा के प्रति रूप आसक्त काम आसक्त शान्तनु ने यह शर्त मान ली । और दोनों मुक्त काम भोग करने लगे ।
तव गंगा को पहला प्रसव हुआ । शान्तनु ने उसकी ( गंगा ) आँखों पर पट्टी बाँधकर ये प्रसव कराया । और बच्चे को उसे दिखाये बिना तुरन्त सत्यवती को दे आये । सत्यवती इस बच्चे को पालने लगी । इसका नाम गांग देव ( गंगा पुत्र ) रखा गया ।
कुछ वर्ष और बीत गये । एक दिन दैवयोग से गांग देव शान्तनु की जानकारी के बिना उनके पीछे पीछे चला आया । जब वे सत्यवती के यहाँ से लौट रहे थे । तव गंगा की उस पर दृष्टि पङ गयी । उसने कहा - महाराज शर्त भंग हुयी । अब मैं जाती हूँ ।
और वह तुरन्त जल रूप हो विलीन हो गयी । अब शान्तनु को बेहद चिन्ता हुयी । दूसरे वह सत्यवती पर भी 


आसक्त थे । और उसकी सुन्दरता यौवन पर मोहित थे । और उससे शादी करना चाहते थे । गंगा के जल रूप हो जाने के बाद उन्होंने उसके साथ विवाह का प्रस्ताव रखा ।
तब सत्यवती बोली - महाराज ! मैं शादी के लिये तैयार हूँ । पर शर्त यही है कि - राजा मेरा ही पुत्र होगा ।
शान्तनु अपने पहले पुत्र गांग देव के ख्याल से यह शर्त मानने को राजी न हुये । और सत्यवती के विरह वियोग में जलने लगे । जब गांग देव को यह  बात मालूम पङी । तव वह सत्यवती के पास पहुँचा । और उससे कहा कि - वह उसके पिता से शादी कर ले । वह वचन देता है कि वह स्वयं कभी हस्तिनापुर की  राज गद्दी पर नहीं बैठेगा ।
तब सत्यवती बोली - पुत्र तेरे वचन पर मुझे पूर्ण विश्वास है । पर कल को तेरी सन्तान ये बात मान लें । इसका क्या भरोसा ?
इस पर गांग देव ने उसे फ़िर से वचन दिया - वह प्रतिज्ञा करता है कि कभी जीवन में विवाह ही नहीं करेगा । तब सन्तान का प्रश्न ही नहीं उठता ।
एक नव युवक द्वारा इतनी भीष्म ( कठोर ) प्रतिज्ञा से पूरे बृह्माण्ड में तहलका मच गया । अपनी इसी प्रतिज्ञा के कारण युवक गांग देव भीष्म पितामह के नाम से विख्यात हुआ । इससे आगे की कहानी सब जानते ही हैं ।
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अब मेरी बात - पहले तो यही बता दूँ । इस कथानक का आधार शास्त्र नहीं हैं । बल्कि अंतर्ज्ञानी सन्त हैं । इसलिये ये पूर्णतयाः सत्य है । जब ये कथानक मेरी जानकारी में आये । तब स्वाभाविक आप ही की तरह मेरे मन में दो प्रश्न उठे । शास्त्रों के कई प्रसंगों में ऐसे वीर्य से बच्चा उत्पन्न होने का जिक्र आया है । यानी वीर्य किसी पक्षी आदि माध्यम द्वारा दूरस्थ स्थान पर भेजा गया । और फ़िर उसका उपयोग किया गया ।


एक दृष्टि से ये हवा हवाई बातें लगती हैं । लेकिन बिलकुल सच हैं ।
वीर्य को किसी पत्ते आदि में गोंद आदि का उपयोग करते हुये पैक करके मन्त्र बिज्ञान द्वारा निश्चित समय के लिये रक्षित कर दिया जाता था । और प्राप्त कर्ता उसका उपयोग करता था । आज भौतिक बिज्ञान में भी ये मामूली बात है । जब कृतिम तरीके से वीर्य स्थापित कर सरोगेट मदर द्वारा शिशु प्राप्त किया जाता है । वह वीर्य भी रक्षित ही होता है । अतः ये बात तो सिद्ध है ही । जाहिर है । उस समय इस योग बिज्ञान को जानने वाले स्त्री पुरुष रहे होंगे । जो वीर्य को रक्षित और कृतिम तरीके से स्थापित करना जानते थे ।
अब दूसरी बात । जो मेरे दिमाग में थी । किसी भी मछली से इंसान का बच्चा कैसे उत्पन्न हो सकता है ? जबकि ये भी पूरी तरह सच था । लेकिन आज इतना ही ।
कैसे हुआ मछली से आदमी का बच्चा ? जानिये अगले रोज । और करते रहिये - सत्यकीखोज ।
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