04 फ़रवरी 2012

लेकिन कैसे बुद्ध जी..कैसे अप्प दीपो भव ?

कृपया बुद्ध के प्रसिद्ध वाक्य ‘अप्प दीपो भव’  का मतलब समझायें और ये भी बताएं कि जो पहला आत्मज्ञानी हुआ होगा । उसका गुरु कौन था ? कृष्णमुरारी शर्मा ।
पूरा धार्मिक वितण्डा वाद लोगों को भयभीत करने पर आधारित है । (ईमेल शीर्षक के साथ)
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अप्प दीपो भव - अपने दीये स्वयं बनो..अप्प दीपो भव का ये अर्थ मैंने एक जगह लिखा देखा पर मैं इससे सहमत नहीं हूँ । अप्प - आप, दीपो - दीपक, भव - होना या प्राप्ति ।
भव संस्कृत का शब्द है और संस्कृत शब्दकोश में इसके अर्थ - जन्म, शिव, बादल, कुशल, संसार, सत्ता, प्राप्ति, कारण, कामदेव हैं पर मैं किसी भी भाषा के पचङे में पङने के बजाय सरल सहज मार्ग का सदैव हिमायती हूँ । इसलिये प्रसिद्ध और आसान वाक्यों में इसका प्रमाण देखता हूँ ।
देखिये - आयुष्मान भव, कीर्तिमान भव, दीर्घायु भव । अब बङे आराम से समझ में आता है कि आशीर्वाद में भव का अर्थ - होओ निकला, बनो नहीं । 
क्योंकि इसका अर्थ बनने से करें तो फ़िर ये सलाह हुयी, आशीर्वाद कहाँ हुआ ? तुम बनो ।
और पागल से पागल भी जानता हैं कि दीर्घायु और यशस्वी होना अच्छा है फ़िर किसी आदरणीय द्वारा सिर्फ़ ये ‘सलाह’ देना - अजीब सी बात हुयी ।
लेकिन वह सलाह दे ही नहीं रहा, वह कह रहा है - होओ, यानी मैं आशीर्वाद के रूप में यह तेज यह ज्ञान तुम्हें प्रदान करता हूँ । शास्त्रों पर गौर करें तो ये आशीर्वाद यूँ ही औपचारिक अन्दाज में नहीं दिये गये कि जो मन में आया, कह दिया । बहुत से ऐसे प्रसंग हैं जब किसी निसंतान ने संतान का आशीर्वाद मांगा तो दिव्यदृष्टा ने उसे मना कर दिया, क्योंकि उसके भाग्य में नहीं है । बहुत से ऐसे प्रसंग हैं जब आशीर्वाद को सत्य वचन माना गया और इसके पीछे न होने पर एक धर्म कानूनी लङाई सी हुयी और अन्ततः मामला उस आशीर्वाद को पूरा करके सुलझाया गया ।
सुप्रसिद्ध प्रमाण - सावित्री यमराज प्रसंग । 
अब सीधी सी बात है यमराज कहता है - पुत्रवती भव यानी पुत्रवती होओ । अगर ये बनने की बात होती तो वह कह देता - नहीं बन सकता, मेरा क्या कसूर पति मर चुका है पर वचन फ़ेल हो रहा है,  यानी वो दे चुका ।
इससे साबित होता है कि - बना नहीं जाता, होना होता है । बनना और होना मोटे अर्थ में समान भाव वाले लग रहे हैं पर इनमें एक बङा फ़र्क है । बनना - स्वयं का बोध देता है, किसी नयी बात का नये निर्माण का इशारा सा करता है । जैसा कि किसी विद्वान ने बुद्ध को अपनी बुद्धि से लिख दिया और होना - स्थापित सत्य के समान, अप्प दीपो भव - दीप के समान प्रकाशित ।

फ़िर इस तरह बुद्ध ने कुछ बहुत नयी बात नहीं कह दी यह तो पूर्वजों के छोटे मोटे आशीर्वाद में शामिल था - यशस्वी भव, तेजस्वी भव ।
ज्यों तिल माँही तेल है, ज्यों चकमक में आग । 
तेरा सांई तुझमें है, जाग सके तो जाग । 
इसलिये बनना (निर्माण) नहीं हैं वो आग प्रकट करनी है ।
मैंने पहले भी ये बात कही है । बुद्ध 2500 वर्ष पूर्व हुये उन्होंने जब ये बात कही होगी तो किसी ने अवश्य पूछा होगा - लेकिन कैसे बुद्ध जी ! कैसे अप्प दीपो भव ?
- ज्ञान की रगङ से । बुद्ध ने निश्चय ही उत्तर दिया होगा - और ज्ञान के लिये किसी बुद्ध के पास जाओ ।
क्योंकि अगर इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी तो बुद्ध क्या रोचक कहानी भर सुना रहे थे ? अगर ज्ञान स्वयं से हो सकता था तो बुद्ध की ही क्या आवश्यकता थी । उन्हें यह कहने की ही क्या आवश्यकता थी ? लेकिन लोगों ने बात को अपनी सन्तुष्टि अनुसार पकङ लिया ।
बहुत पहले कोई मरा होगा किसी बच्चे आदि ने जिज्ञासावश पूछा होगा - अब दद्दा (मृतक) कहाँ गये ? तो उसने ज्ञान दृष्टि से कहा होगा - स्वर्ग प्राप्त हुआ । उस एक को क्या हुआ आज तक सबको स्वर्ग ही प्राप्त हो रहा है । मरने के बाद अखबार में (उठावनी ) खबर छपती है । स्वर्ग पहुँच गये, गोलोक पहुँच गये । फ़ोन आ गया मौज में है ।
नरक तो कोई गया ही नहीं तबसे । मैंने आज दिन तक घोर पापी (जिन्हें मैं व्यक्तिगत जानता था) की खबर में भी नहीं देखा - नरकवासी हुये । स्वर्ग अच्छा था स्वर्ग पकङ लिया । इसमें कौन से पैसे खर्च होते हैं । बात वही है - जो खुद को अच्छा लगा ले लिया ? मगर क्या वास्तव में मिला ?
तो बुद्ध ने आगे भी कुछ कहा होगा ? ज्ञान की तलाश करो । गुरु की भावना करो । बस मतलब की बात मिल गयी इसलिये  उलझाऊ संकलित ही नहीं की ।
लेकिन बुद्ध बुद्धि वाले लोगों की भारत में कभी कमी नहीं रही । एक बाबा तुलसीदास भी हुये । उन्होंने रामचरित मानस उत्तरकाण्ड में - ये दिया कैसे जलेगा ? ये पहेली सुलझा दी ।
देखिये -

जोग अगिन कर प्रगट । तब कर्म शुभा शुभ लाइ । 
बुद्धि सिरावे ज्ञान घृत । ममता मल जर जाइ ।
तब बिज्ञान रूपिनि । बुद्धि बिसद घृत पाइ ।
चित्त दिया भरि धरे । दृढ़ समता दिअटि बनाइ ।
तीन अवस्था तीन गुन । तेहि कपास ते काढ़ि । 
तूल तुरीय संवारि पुनि । बाती करे सुगाढ़ि ।
एहि बिधि लेसे दीप । तेज रासि बिज्ञानमय ।
जातहिं जासु समीप । जरहिं मदादिक सलभ सब ।
लीजिये - अप्प दीप जलने लगा फ़िर क्या हुआ ?
सोहस्मि इति बृति अखंडा । दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा ।  
जैसे ही सोऽहंग वृति अखण्ड हुयी यानी चेतनधारा से अखण्ड ध्यान जुङ गया । इस दीपक की लौ परम प्रचण्ड जल उठी ।
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा । तब भव मूल भेद भृम नासा । 
आत्मा का अनुभव होने लगा और सुप्रकाश (ध्यान दें - अपना प्रकाश) का सुख जाना । तब मैं क्या हूँ । मूल यानी जङ कहाँ है । ये भेद क्या हैं ? इन सब भृमों का नाश हो गया ।
आगे देखिये ।
परम प्रकास रूप दिन राती । नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती । 
दिन रात सदा परम प्रकाशमय रूप का अनुभव । लेकिन ? अब न दिया न तेल न घी न कोई बत्ती  वगैरह कुछ नहीं चाहिये ।
भाव सहित खोजइ जो प्रानी । पाव भगति मनि सब सुख खानी । 
और बस भाव से यदि प्राणी खोजे तो ये सभी सुखों की खान भक्तिमणि उसे प्राप्त हो जाती है ।
सब कर फल हरि भगति सुहाई । सो बिनु संत न काहू पाई । 
तुम्हारे सारे प्रयत्न जप, तप, वृत, तीर्थ, पुण्य, दान आदि इनका फ़ल प्रभु की सच्ची भक्ति मिलना ही है । लेकिन ? वो बिना सन्तों के कोई प्राप्त न कर सका और भी आगे देखिये ।
कमठ पीठ जामहिं बरु बारा । बंध्या सुत बरु काहुहि मारा । 
कछुये की पीठ पर बाल उग आयें । बांझ स्त्री का पुत्र किसी को मार दे ।
फूलहिं नभ बरु बहु बिधि फूला । जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला ।  
आकाश में तरह तरह के फ़ूल खिल उठे यानी ये असंभव कार्य भी यदि हो जायं लेकिन हरि (नाम) से प्रतिकूल जीव सुख नहीं पा सकता ।
तृषा जाइ बरु मृगजल पाना । बरु जामहिं सस सीस बिषाना । 
मृग मरीचिका के जल से प्यास बुझ जाये । खरगोश के सर पर सींग उग आयें ।
अंधकारु बरु रबिहि नसावे । राम बिमुख न जीव सुख पावे ।  
और अंधकार सूर्य को नष्ट कर दे । ये सब भले हो जाये लेकिन राम से विमुख जीव सुख नहीं पा सकता ।
हिम ते अनल प्रगट बरु होई । बिमुख राम सुख पाव न कोई । 
बर्फ़ से अग्नि प्रकट हो जाये लेकिन राम से विमुख कोई जीव सुख नहीं पा सकता ।
और देखिये ।
जहं लगि साधन बेद बखानी । सब कर फल हरि भगति भवानी । 
हे पार्वती ! वेद जितने भी साधनों का बखान करते हैं । अंततः सभी (साधन उपाय) का फ़ल निचोङ हरि भक्ति ही बनता है यानी उतना सब करने के बाद समझ आता है या हरि भक्ति के पात्र हो जाते हैं ।
सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई । राम कृपा काहू एक पाई । 
वही रघुनाथ जी की भक्ति वेद गाते हैं । जो राम कृपा से किसी एक (बिरले) को प्राप्त होती है । कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं । ते गोपद इव भवनिधि तरहीं । 
जो इस राम कथा (अंतर में गूँजता अखण्ड नाम) को कहते सुनते और अनुसरण करते हैं । वे इस संसार सागर को गोपद (यानी गाय के खुर से बने गढ्ढे के समान) जैसी आसानी से पार (तर) कर जाते हैं ।
जो पहला आत्म ज्ञानी हुआ होगा । उसका गुरु कौन था ?
ये तो बङा साधारण सा प्रश्न है । इसका भी विस्त्रत उत्तर मेरे ब्लाग्स पर मौजूद है । जब ये सृष्टि बनी और कालपुरुष का नाम उस वक्त धर्मराय था लेकिन वो अष्टांगी को निगल गया । तब उसे यमराय या जमराय कहा जाने लगा । फ़िर उसे दिये गये ‘सोऽहंग’ जीवों को तप्तशिला आदि पर जलाने लगा, पाप कर्मों में उलझाने लगा, कष्ट देने लगा ।
तब इन जीवों की करुण पुकार से दृवित होकर सतपुरुष ने अपने प्रतिनिधि वहीं के लोगों को इनके उद्धार के लिये भेजा । इन्होंने जीव को उसके आत्मस्वरूप का बोध कराया और इस तरह युग युग में यह आत्मज्ञान परम्परा शुरू हुयी । 
अभी कुछ ही दिन पहले के लेख में मैंने बताया है कि - आत्मज्ञानी किस तरह प्रकट होते हैं ?
रामानन्द और कबीर प्रकरण में तो इसी चीज का बहुत विस्तार से वर्णन है । द्वैत ज्ञान की धज्जियाँ उङा दी हैं । रामानन्द के गुरु कबीर थे या कबीर के गुरु रामानन्द थे ? यही रहस्य बताया गया है । जब ये राज्य सत्ता (कई त्रिलोकी सृष्टि) बनी भी नहीं थी तब केन्द्रीय सत्ता पूर्ण अवस्था में आकार ले चुकी थी और वहाँ सभी मुक्त आत्मायें (आत्म ज्ञानी) ही थे । मुक्त आत्मा का मतलब ही ये है । सकल सृष्टि में उनकी निर्बाध गति होती है ।
अपनी मढी में आप मैं खेलूँ । खेलूँ खेल स्वेच्छा ।
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