22 फ़रवरी 2012

बेटा श्रवण कुमार कभी मत बनना

बङे बङे ज्ञानी महाज्ञानी आदि इस बात को लेकर एकमत हैं कि - धर्म में तर्क को कोई स्थान नहीं हैं । अर्थात यह तर्क से सिद्ध नहीं हो सकता । या जाना नहीं जा सकता । पर शायद सबसे अलग राजीव बाबा की थ्योरी कुछ और ही है ? हर बात में नुक्स ( क्या क्यों कब कैसे ) निकालना । और जिस बात की मना की जाय । उसे जान बूझ कर करना मेरी पुरानी आदत है । इस सम्बन्ध में ओशो बङी मजेदार चुटकी लेते हैं ।
हव्वा बोली - आदम वर्जित फ़ल मत खाना । गाड ने मना किया है । आदम जो वर्जित फ़ल खाने को लपक रहा था । थोङा सहम गया । तब शैतान जो सर्प के वेश में था । वह बोला - जानते हो । गाड इस वर्जित फ़ल को खाने को क्यों मना करता है ? क्योंकि वह इसे खुद खाता है । और वह नहीं चाहता कि कोई दूसरा इसका मजा जान जाय । आश्चर्यचकित आदम ने फ़ल खाया । और हव्वा के साथ आनन्द में डूब गया । और तब उन्होंने कहा - गाड ! भाङ में जाय तेरा स्वर्ग । डांट वरी वी हैप्पी । और इस तरह आदम हव्वा मस्त विचरण करने लगे ।
क्यों नहीं हो तर्क ? क्या दिक्कत है ? भगवान कोई पानी का बुलबुला है । जो तर्क से फ़ूट जायेगा । फ़्रिज से बाहर हुयी आइसक्रीम है । जो पिघल कर बह जायेगी । पूरे उपनिषदों में और क्या है ? याग्वल्क्य जैसे ज्ञानियों ने बाल की खाल निकाल दी कि नहीं । उदाहरण बहुत है । पर अभी नहीं । बात है । तर्क ।
और बात छोटे पन की है । जब कई अन्य चीजों की तरह । ये दो बातें भी मेरे जेहन से टकराई । 1 जब शादी होती है । तो महिलायें जो गीत गाया करती हैं । उनका आधार राम विवाह होता था । अर्थात राम सा पुत्र । सीता सी बहू । 


भरत लक्ष्मण से भाई आदि । बल्कि ये कार्यकृम लगुन आदि से ही शुरू हो जाता था - रघुनन्दन फ़ूले न समाय । लगुन आयी हरे हरे ।
मैंने कहा - एक बात बताओ । क्यों बेचारों की जिन्दगी खराब कर रहे हो । जो अभी शुरू भी नहीं हुयी । राम के विवाह का क्या अंजाम हुआ था ? क्या माँ बाप को सुख मिला । क्या खुद राम सीता को मिला ?
विवाह पढते हुये तोताराम पण्डित मेरी तरफ़ हैरत से देखने लगे ।
ऐसी ही एक बात अक्सर भारतीय समाज खासकर हिन्दू समाज में बहुत प्रचलित है । श्रवण कुमार सा पुत्र । और इसका अर्थ यह होता है । माँ बाप की भरपूर सेवा करने वाला । आज्ञाकारी । अक्सर जब भी बङों को किसी सपूत की बात करते सुनता । तो यही उदाहरण दिया जाता - उनका लङका एकदम श्रवण कुमार है । सबका बेटा श्रवण कुमार ही हो ।
कमाल के लोग हैं । मैं अक्सर सोचता । कहते वक्त यही नहीं सोचते कि - आखिर कह क्या रहे हैं ? इस बात में क्या मजा कि - माँ बाप अन्धे समान हों । और पुत्र पर बोझ भी हों । आईये आज आपको यही  रहस्य बताता हूँ । जिसको जानने के बाद कोई भी किसी को श्रवण कुमार बनने का आशीर्वाद नहीं देगा ।
हिन्दू ( जिसे अज्ञानतावश कहते हैं । वास्तव में सनातन ज्ञान परम्परा ) धर्म शास्त्र - रामायण । महाभारत आदि
वास्तव में रूपक हैं । और यथार्थ भी । मतलब राम कृष्ण आदि हुये भी हैं । और सनातन ज्ञान की थ्योरी का

तकनीकी प्रयोगात्मक पदार्थ भी हैं । circuit परिपथ पर बिछे तार भी । और ऊर्जा रूपांतरण के विभिन्न पुर्जे या स्रोत भी । अदृश्य प्रकृति पदार्थ । जो आत्म सत्ता के तंत्र को संचालित करते हैं । ठीक किसी circuit पर बिछे जाल की तरह ।
आप जब भी किसी धार्मिक पात्र को पढें । उसके नाम पर विशेष ध्यान दें - राम ( रमना या गति या चेतनता ) कृष्ण ( आकर्षण या चुम्बकत्व ) लक्ष्मण ( जीव या मन के लक्ष्य पर चलने वाला )
अब इसी आधार पर आप श्रवण कुमार प्रसंग को समझें ।
श्रवण कुमार ( केवल सुने ज्ञान पर आधारित पात्र । जिसकी सत्यता अनिश्चित है । ) अंधे माँ बाप ( माया के गर्भ में उत्पन्न हुआ जीव । जिसे अपना ही पता नहीं । ज्ञान रहित पालन पोषण । अंधा पिता यानी किससे उत्पन्न हूँ अज्ञात । यह आध्यात्म तल पर देखें । न कि मानवीय तल पर ) जल की प्यास ( विभिन्न वासनाओं की तृष्णा ) दशरथ ( दस प्रमुख इन्द्रियों का समूह । ये शरीर ) शब्द भेदी वाण ( सुरति से शब्द ( ध्वनात्मक नाम ) को भेदना )
अब देखिये । श्रवण कुमार जिसे वास्तविक ज्ञान का बोध नहीं है । केवल सुनी हुयी बातों पर ( धर्म या ईश्वर की ) धर्म ( धारण करना ) शील है । और अंधे माँ बाप ( कर्म । संस्कार । वासना का आपसी जीव सम्बन्ध ) को तीर्थ ( मन मथुरा दिल द्वारका काया काशी जान । पांच तत्व का पिंजरा जामें ज्योति पहचान ) कराने ले जा रहा है । लेकिन रुकावट आयी । अंधे माँ बाप को प्यास ( वासनाओं की तृष्णा । जो आत्म ज्ञान में बाधा डालती है ) लगी । वह घङे ( कुम्भ । शरीर ) में जल लेने  गया । यानी शरीर की तृष्णा को तृप्त करने का उपाय किया ।
तभी दशरथ (( दसों इन्दियाँ एकाग्र होकर । जिसे ही गूढ अर्थ में एकादशी कहा जाता है ) ने शब्द भेदी ( यानी वही शब्द रूपी नाम ध्वनि को लक्ष्य कर सुरति रूपी ) वाण चला दिया । इससे श्रवन कुमार मर गया । यानी ज्ञान जागृत हो गया । और सुने हुये की बजाय यथार्थ सत्य का स्व बोध हुआ )

दशरथ पानी लेकर अंधों के पास पहुँचे । क्योंकिं अज्ञान से उपजी तृष्णा अंधी ही है । तब उन तृष्णा से व्याकुल अंधों ने दशरथ को शाप दिया -  जैसे आज हम पुत्र वियोग से मर रहे हैं । तुम भी एक दिन मरोगे । अब समझिये । कोई भी ज्ञान हो जाने के बाद अंधे माँ बाप ( मायाकृत खेल । संस्कार सम्बन्ध । अनिश्चित पूजा आदि बहुत सी चीजों ) की प्यास क्यों बुझायेगा ? वो जो भी करेगा । ठोस करेगा । सीधी सी बात है । ज्ञान होते ही माया नष्ट हो जायेगी । तो अंधे माँ बाप ( ईश्वर के बारे में अज्ञान । अंधापन ) मर ही जायेंगे ।
लेकिन अंधों ने एक बङे काम की बात कहीं - तुम भी एक दिन मरोगे ।
दशरथ अन्त समय राम राम ( सुमिरते हुये ) करते हुये मर गये । बात किससे कही । दशरथ से  ( यानी दस इन्द्रियों के समूह । इस शरीर को ही सत्य मानने वाले से ) जाहिर है । राम ( नाम ) सुमरन से जब अज्ञान नष्ट हो जाता है । तो देह अभिमान भी नष्ट हो जाता है । और जीव जान जाता है कि - मैं न मन हूँ । न शरीर हूँ । बल्कि आत्मा हूँ ।  तब दशरथ अपने आप ही मर जायेगा ।
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