31 जुलाई 2011

ये तो बहुत नाइंसाफ़ी है - नवदीप कौर

हैलो राजीव जी ! मैं आई तो आपके पास देर बाद हूँ । लेकिन सवाल कई दिन पहले से दिमाग में घूम रहे थे । लेकिन समझ नहीं पा रही थी कि कहाँ से बात शुरु करुँ । मेरा पूरा जून का महीना तो कनाडा में ही निकल गया था । तो आज फ़िर से बात शुरु करते हैं । मैं आपकी ये बात तो समझ गयी कि - परमात्मा और आत्मा ही अनादि है । ये अखिल सृष्टि अनादि नहीं है । ये आदि है । बनायी गयी है । या बनी है । या रची गयी है । सच्चे साहिब की कला का 1 प्रगटावा ।
आपने शायद किसी पुराने लेख में कहा था कि ये सृष्टि शायद कुछ अरब साल पुरानी है । लेकिन आप ये भी कहते हैं कि हर मनुष्य आत्मा अब तक असंख्य जन्म ले चुकी है । साथ में 84 और किस्म किस्म के नरक स्वर्ग आदि । इस हिसाब से तो ये सृष्टि अति अधिक पुरानी होनी चाहिये ।

ये भी बतायें कि क्या ये अखिल सृष्टि पहली बार ही बनाय़ी गयी है । क्या इससे पहले भी कोई ( जब इस सृष्टि का नाम ओ निशान तक नहीं था ) सृष्टि थी ? क्यूँ कि परमात्मा और आत्मा अनादि है । यानि सदा से है । हमेशा से है । जिनकी कभी शुरुआत ही नहीं हुई । ये भी बतायें कि प्रलय या महाप्रलय के बाद ये सृष्टि बिलकुल ही मिट जायेगी । या फ़िर प्रलय का अर्थ तत्वों का रूपान्तरण होना होता है ।
अगर मान लें कि ये अखिल सृष्टि 1 दिन मिट जायेगी ( महाप्रलय से ) क्या तब फ़िर कभी न कभी परमात्मा या उच्च सत्ता फ़िर से ऐसी या किसी अन्य प्रकार की सृष्टि का निर्माण कर सकती है । क्या ये भी सम्भव है कि अगली बार 5 तत्वों की बजाय कम या अधिक तत्वों की सृष्टि का निर्माण हो । या किसी अन्य तरह की सृष्टि बनाई जाये । क्युँ कि

परमात्मा बेअन्त है ( जिसका कोई अन्त ही नहीं है )
ये भी बतायें कि इस तरह निर्माण । और फ़िर कभी न कभी प्रलय । फ़िर से निर्माण । और फ़िर से प्रलय  आदि । क्या इस तरह ये सिलसिला अब निरन्तर सदा के लिये चलता रहेगा । क्या हर बार के निर्माण और विनाश ( प्रलय या महाप्रलय ) के समय आत्मा को तो कुछ भी नुकसान नही होता होगा ।
अब ये सिलसिला आदिकाल से शुरु हो चुका है । तो क्या इस हिसाब से अब द्वैत और अद्वैत दोनों का ही अस्तित्व हमेशा ही बना रहेगा ( 1 ही सिक्के के 2 पहलूओं की तरह )  ये भी बतायें कि क्या इस अखिल सृष्टि में अनेक बृह्माण्ड होने के कारण बृह्मा , विष्णु और महेश जैसे देवता भी अनेक होंगे ।
मैंने कबीर जी के बोल पता नहीं कहा पढे थे । शायद बाबा गोरखनाथ से बात कर रहे थे । कबीर जी से उनकी उमर पूछने पर । कबीर जी ने कहा था कि - करोडों बृह्मा विष्णु और महेश होकर समाप्त हो गये । न जाने कितने ही असंख्य  काल पुरुष और शक्तियाँ आये । और चले गये । मेरी इतनी उमर है ।
मेरे हिसाब से कबीर जी ने यहाँ अपने आत्मस्वरूप ( आत्मा ) की तरफ़ इशारा किया था । असल में यहाँ उनके कहने का मतलब अपने अनादि होने का था । इस बार सिर्फ़ शारीरिक चोले का नाम कबीर था । आपने किसी पुराने लेख में ये भी कहा था कि 84 का कोई 1 पक्का नियम नही है । किसी को उसके नीच कर्मों अनुसार किसी भी योनि ( 84 की ) में डाल दिया जा सकता है । यानि 84 की शुरुआत किसी भी योनि से की जा सकती है । ये बतायें कि क्या हर कोई फ़ुल 84 ही भोगता है । या किसी के हिस्से में हाफ़ 84 या फ़िर कम या अधिक योनियाँ भी आती होगी ।

क्युँ कि मैने किसी जगह पढा था कि किसी ऋषि ने कोई हिरण का बच्चा पाल लिया । उन्हें उससे मोह अधिक हो गया । उन्होंने अन्तिम समय भी उसकी तरफ़ ध्यान रखा । इससे वो ऋषि जी अगले जनम में हिरण के बच्चे के रूप में ही पैदा हुये । लेकिन अपने पुराने अच्छे संस्कारों के कारण उससे बिलकुल अगले जन्म में वो फ़िर ब्राह्मण कुल में जन्मे । क्या इस हिसाब से कोई व्यक्ति किसी गलती वश सिर्फ़ 1 योनि किसी पशु आदि की भोगकर फ़िर से मनुष्य बन सकता है । आपके अनुसार हर मनुष्य जन्म 84 काटकर यानि भोगकर ही मिलता है । चाहे इंसान अच्छा हो । या बुरा ।
ये तो फ़िर नाइंसाफ़ी है । आदमी अच्छा हो । या बुरा । हर बार 84 में ही जायेगा ? आपने ये भी कहा था कि सबसे


पहले गरीब घर में जन्म होता है ( सन्तमत से दीक्षा न लेने पर ) फ़िर 84 उसके बाद मध्य वर्ग में जनम होता है ( सन्तमत से दीक्षा न लेने पर ) फ़िर 84 फ़िर अमीर घर में जन्म होता है । अब आप ये बताईये कि अगर तब भी कोई सन्तमत से दीक्षा लेकर भगती न कर सके ( किसी कारणवश ) तो क्या तब उसका क्या होगा ? फ़िर से 84 । और दोबारा से फ़िर गरीब घर आदि आदि ।
वैसे जो लोग इस दुनिया या समाज में गरीब है । या गम्भीर रोगी हैं । उनके लिये तो ये मनुष्य जन्म भी नरक ही है । ये भी बताये कि अगर 2 दोस्त हैं । उनका आपस में संस्कार वश सम्बन्ध ( जिस वजह से वो मौजूदा जनम में दोस्त बने ) हैं ।
1 दोस्त भक्ति न करे । बिलकुल नास्तिक बना रहे । और दूसरा सन्तों वाली भक्ति से पूरी तरह जुड जाये । तो 1 तो ( भक्ति वाला ) देह अन्त होने के बाद मोक्ष को चला जायेगा । लेकिन दूसरा यहीं रह जायेगा । अगर भक्ति न करने वाले का उस भक्ति वाले से कोई संस्कार रूपी कर्म शेष रहता हो । तो वो कर्म कैसे भुगता जायेगा । आप मेरे इन सभी सवालों के जवाब बिलकुल स्पष्ट रूप से दे दीजिये ।
क्युँ कि मुझे रूप ने फोन पर वो बात बता दी है । इसलिये मैं भी तब दीक्षा लेने आऊँगी ( उस समय ) तब तक आप मेहरबानी करके मेरे सवालों के जवाब देते हुये मेरी सभी जिग्यासाएं शान्त कर दीजिये । इससे मुझे दीक्षा के समय तक कोई भी सवाल न बचा होने के कारण बहुत शान्ती और सकून का अनुभव महसूस होगा ।
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ये सृष्टि शायद कुछ अरब साल पुरानी है । लेकिन आप ये भी कहते हैं कि हर मनुष्य आत्मा अब तक असंख्य जन्म ले चुकी है । साथ में 84 और किस्म किस्म के नरक स्वर्ग आदि । इस हिसाब से तो ये सृष्टि अति अधिक पुरानी होनी चाहिये ।
- देखिये जिस दृष्टिकोण से आपने प्रश्न पूछा है । उस प्वाइंट पर मैंने आज तक विशेष गौर ही नहीं किया । पर इत्तफ़ाकन कबीर और गोरख संवाद द्वारा आपने स्वयँ ही इस प्रश्न का उत्तर दे दिया । यानी आत्मस्वरूप कबीर ने करोंङो बृह्मा विष्णु महेश कालपुरुष आध्या को उत्पन्न और समाप्त होते देखा । जबकि मनुष्य की तुलना में इनकी आयु बहुत अधिक होती है ।
जहाँ तक मुझे याद है । जिस लेख का आपने जिक्र किया है । उसमें मैं खासतौर पर " इस प्रथ्वी " को लेकर चला था । जिसकी आयु बैग्यानिक 4 अरब और मैं 6 अरब मानता हूँ । हो सकता है । मेरे समझाने या फ़िर आपके समझने में कहीं भूल हुयी हो ।

शास्त्रों और अन्य वाणियों में विराट पुरुष के रोम रोम में खण्ड बृह्माण्ड की बात कही गयी है । और सृष्टियों के प्रमुख कर्ता धर्ता - बृह्मा विष्णु महेश करोंङो बताये गये हैं । शास्त्रों में गहनता से अध्ययन करने पर अलग अलग मंडलों की प्रथ्वियों के अलग अलग नाम भी ( पर्यायवाची नहीं कह रहा ) आये हैं । करोंङों सूर्य और महा सूर्यों का भी वर्णन है । इसका सीधा और सरल सा मतलब ये है कि -
जिस तरह इस प्रथ्वी का सूर्य चन्द्रमा मंगल आदि 9 प्रमुख ग्रहों का एक मंडल हैं । और यहाँ की प्रजा को संभालने हेतु बृह्मा विष्णु महेश आदि पदवी वाली महा आत्मायें नियुक्त हैं । और ये मंडल अपने महा मंडल के अधीनता में रहते हैं । और महा मंडलों का संचालन दूसरी अन्य महा शक्तियों के हाथ में हैं । इसको भी सृष्टि ( 1 प्रथ्वी का मंडल ) कहा जाता है । लेकिन अखिल सृष्टि नहीं । और ऐसी सृष्टियाँ अनगिनत ( मानव गणना क्षमता अनुसार ) हैं ।

मैंने संभवत रूप कौर जी के ही किसी प्रश्न के उत्तर में कहा था । किसी प्रथ्वी पर आदिमानव काल चल रहा है ।  कहीं सतयुग । किसी प्रथ्वी पर कहीं द्वापर । कलियुग । प्रलय और कहीं नव निर्माण अवस्था ।

क्या ये अखिल सृष्टि पहली बार ही बनाय़ी गयी है । क्या इससे पहले भी कोई  सृष्टि थी ?
- अखिल सृष्टि रचना एक ही बार हुयी है । उसके बाद करने की आवश्यकता ही नहीं हुयी । आपकी जानकारी के लिये ये सृष्टि पूर्ण आत्मा द्वारा घबराहट मिली जुली अचम्भित अवस्था में बनी है । इसलिये ये विचित्र और विलक्षण बन गयी । जब मनुष्य आकार बन गया । तब पूर्ण आत्मा संतुष्ट हो गया । इससे पूर्व देव दानव आदि विचित्र जीव बनते रहे । मनुष्य अंतिम और फ़ायनल रचना थी ।
तब पूर्ण आत्मा ने सब रहस्य का पिटारा इस शरीर के अन्दर समायोजित कर दिया । और स्वयँ भी अप्रकट रूपा होकर इसी में स्थित हुआ । इसलिये भी मनुष्य शरीर की वैल्यू है ।


प्रलय या महाप्रलय के बाद ये सृष्टि बिलकुल ही मिट जायेगी । या फ़िर प्रलय का अर्थ तत्वों का रूपान्तरण होना होता है । क्या ये भी सम्भव है कि अगली बार 5 तत्वों की बजाय कम या अधिक तत्वों की सृष्टि का निर्माण हो । या किसी अन्य तरह की सृष्टि बनाई जाये ।
- पहले ही विचित्र और विलक्षण सृष्टि का निर्माण बहुत बङे स्तर पर कल्पनातीत ( यानी महा आत्माओं की कल्पना से भी परे ) हो चुका है । अभी भी कम अधिक तत्वों वाले । बहुत सी अन्य विविधताओं वाले जीव शरीरी देव आदि मौजूद है । और ये मामला जीवन के किसी भी क्षेत्र में प्रारम्भ से लेकर विकसित अवस्था तक मानिये ।
उदाहरण - जैसे इसी कंप्यूटर को ले लीजिये । इसका प्रोसेसर हार्ड वेयर आदि और DOS तथा विण्डोज फ़िर

सहयोगी अन्य साफ़टवेयर । ये सब मैटेरियल अब कई प्रकारों में एक बार ( अब तक जितना सरंक्षित हो चुका है । ) बनकर निर्माण विधि आवश्यक चीजें आदि सब जानकारी के रूप में सुरक्षित हैं ।
अब मान लीजिये । प्रलय में सब कुछ नष्ट हो जाये । मगर इसका जानकार नष्ट न हो । ( क्योंकि वह तो नष्ट होता ही नहीं )  तो वह पुनः निर्माण के समय फ़िर आसानी से उसको बना लेगा ।
इसी प्रकार ये सब बाह्य चीजें प्रलय में उसी कृम में वहीं समाती या लय होती जाती हैं । जहाँ से और जिस कृम से ये उत्पन्न हुयीं हैं । यानी एक तरह से वापस होना । यानी प्रकृति में ।
और प्रकृति पूर्ण आत्मा से उत्पन्न है । इसलिये बहीं लय हो जाती है ।
मतलब जिस तरह नष्ट होना । आप उसका मटियामेट समझ रही हो । वैसा नहीं होता । वह वापस अपने मूल में लय हो जाता है । नष्ट तो एक तिनका भी नहीं होता । न हो सकता है । सिर्फ़ उसका रूप परिवर्तन ही होता है ।
इस तरह निर्माण । और फ़िर कभी न कभी प्रलय । फ़िर से निर्माण । और फ़िर से प्रलय  आदि । क्या इस तरह ये सिलसिला अब निरन्तर सदा के लिये चलता रहेगा । क्या इससे आत्मा को कुछ नुकसान होता होगा ।


- आपकी जागृति नींद स्वपन और तुरियातीत ( गहरी नींद की अवस्था ) तथा तन्द्रा ( एक विचित्र पार अवस्था जिसमें जागते हुये भी कूछ पता नहीं रहता । जिसको - अभी कहाँ खो गये थे । कहा जाता है । ) के सभी पहलूओं को गौर से समझने पर उसमें ये सभी रहस्य पता चल जाते हैं । बस जीव और अजीव के पैमाने का अन्तर होता है । बाकी छोटा खेल और बङा खेल एकदम समान ही होता है । जिस तरह बादल आँधी तूफ़ान आदि आने से सूर्य का कुछ नहीं बिगङता । हालांकि कुछ देर के लिये लगता है । सूर्य गायब हो गया । या महत्वहीन हो गया । लेकिन कुछ ही देर बाद ये सब गायब हो जाते हैं । मगर सूर्य ज्यों का त्यों चमकता रहता है । यही स्थिति आत्मा की है ।
इस हिसाब से अब द्वैत और अद्वैत दोनों का ही अस्तित्व हमेशा ही बना रहेगा । क्या इस अखिल सृष्टि में अनेक बृह्माण्ड होने के कारण बृह्मा , विष्णु और महेश जैसे देवता भी अनेक होंगे ।
- द्वैत और अद्वैत को समझना भी अधिक कठिन नहीं हैं । ये आपके रोज के जीवन में है । जब आप पूरे दिन की चिल्ल पों से तंग आकर आराम करते हुये अकेले शांति से लेटकर केवल खुद ही खुद होते हैं ( यानी उस वक्त

आपको पति पत्नी बच्चे अन्य कोई भी नहीं सुहाता ) और आप गहरी नींद में चले जाते हैं । या जाना चाहते हैं । गहराई से सोचिये । उस वक्त आपके अन्दर संसार आदि कुछ नहीं रहता । यही अद्वैत है । अद्वैत में कुछ समय बिताने के बाद आप फ़िर से चैतन्य ( यहाँ विचारशील ) होते हैं । और फ़िर से वही सब दुनियादारी । यही द्वैत है । इसी उदाहरण से पूर्ण आत्मा का द्वैत अद्वैत भाव समझें ।
अगर आप गौर से इस स्थिति को समझ लें । तो इसी में सृष्टि प्रलय द्वैत अद्वैत सब है । फ़र्क इतना है कि ये आपका " जीव " स्तरीय द्वैत अद्वैत होना है । और पूर्ण आत्मा का " अजीव " स्तरीय यानी आपके तुलना में अपरम्पार हो जाता है । अन्य बीच की शक्तियों में भी ये उनके स्तर के अनुसार होता है । पर मुख्य बात समान ही है ।
आपके कैमरे की चिप खाली होना अद्वैत है । उसमें डाटा स्टोर होने पर वही द्वैत है । इसको खाली करना और स्टोर करने की विधि ग्यात होना ही योग है ।
कबीर जी ने कहा था कि - करोडों बृह्मा विष्णु और महेश होकर समाप्त हो गये । न जाने कितने ही असंख्य  काल पुरुष और शक्तियाँ आये । और चले गये । मेरी इतनी उमर है ।
- ये कहने वाला कबीर का शाश्वत आत्म रूप था । जाहिर है । उन्होंने एकदम सत्य ही कहा था ।
ये बतायें कि क्या हर कोई फ़ुल 84 ही भोगता है । या किसी के हिस्से में हाफ़ 84 या फ़िर कम या अधिक योनियाँ भी आती होगी ।


- सामान्य नियम के अंतर्गत फ़ुल 84 ही भोगनी होती है । कभी कभी दण्डस्वरूप या जङ भरत जैसी कोई बात बन जाने पर कम या आधी भी भोगनी होती है । सब कुछ आपके संचित कर्म संस्कारों पर निर्भर है । जैसे एक मुर्गी का अण्डा होते ही खा लिया जाता है । किसी अन्य संस्कार द्वारा वह कुछ आगे चिकन रूप में किसी का आहार बनकर मृत्यु को प्राप्त हो भोग पूरा करता है । कोई कोई मुर्गा या मुर्गी रूप में अधिक जीवित रहता है । तब आहार बनता है । और कोई कोई मुर्गा मुर्गी के रूप में अपनी आयु पूरी करके बिना आहार हुये ही मरता है । जब उसे कोई बीमारी या अन्य वजह से मौत हो जाती है । इसलिये ये सब कर्मरूपी फ़ल संस्कार की ही देन हैं । अब आप देखिये । एक ही तुच्छ जीव के 84 भोग में कितनी विभिन्नता है । अण्डा को मालूम भी नहीं पङा । और उसका एक जीवन भोग पूरा भी हो गया ।
किसी ऋषि ने कोई हिरण का बच्चा पाल लिया ...क्या इस हिसाब से कोई व्यक्ति किसी गलती वश सिर्फ़ 1 योनि किसी पशु आदि की भोगकर फ़िर से मनुष्य बन सकता है । आपके अनुसार हर मनुष्य जन्म 84 काटकर यानि भोगकर ही मिलता है । चाहे इंसान अच्छा हो । या बुरा ।
- जङ भरत नाम के ये उच्चकोटि के ग्यानी थे । ये प्रसंग मेरे ब्लाग पर पूर्व प्रकाशित है । ये किसी गलती या दण्ड से नहीं सिर्फ़ हिरण के बच्चे के मोह में बहुत थोङे समय के लिये हिरण रूप पैदा हुये थे । आत्मग्यानी होने से हिरण जन्म में भी इन्हें सब ग्यान रहा । अपनी गलती बोध होते ही इन्होंने उस शरीर से छुटकारा पाने के लिये खाना पीना त्याग दिया । और उस 84 शरीर से मुक्त हो गये ।


ये तो फ़िर नाइंसाफ़ी है । आदमी अच्छा हो । या बुरा । हर बार 84 में ही जायेगा ?
- ये जीवन जिसको आप मौज मस्ती वाला मायावश समझ बैठे हो । वास्तव में सही अर्थों में एक पाठशाला है । शरीर को किराये का घर और पार उतरने वाला वाहन कहा गया है । जिसको आपने अपना मानते हुये सच मान लिया ।
अब जब तक इसमें पढने वाला छात्र अच्छी तरह अध्ययन कर पास नहीं हो जाता । उसको बारबार पढना ही होगा । और बीच बीच में पढाई ( शरीर न रहने पर ) छूटने पर अग्यान वश वो 84 या अन्य नरक आदि गरीबी आदि दुर्दशा को भी प्राप्त होगा । क्योंकि उसने जीवन का वो अमूल्य समय गँवा दिया । जिसमें कुछ प्राप्त कर वो सुख को प्राप्त हो सकता था । अतः उसी कालेज का पढा हुआ कोई उच्च पदासीन होता है । और कोई रिक्शा खींचता है । कालेज एक ही था । पढाई एक ही थी । शिक्षक बही था । सिर्फ़ पढने वालों की लगन और लापरवाही का अन्तर आ गया । पढने और मेहनत करने वाला अमीर और सुखी होगा ही । और जिसने अमूल्य समय व्यर्थ गँवा दिया । अब उसने तो ठोकरें खानी ही हैं । फ़िर नाइंसाफ़ी कैसे हो गयी ।


ग्यान प्राप्ति में अच्छे बुरे स्वभाव का उतना महत्व नहीं है । एक पढाई में निपुण छात्र हो सकता है । एक फ़िसड्डी स्वभाव के तुलना में बुरे स्वभाव बुरे आचरण वाला हो । पर वह सावधानी से लक्ष्य प्राप्ति के प्रति प्रयत्नशील है । इसलिये वह प्राप्त भी करता है ।
श्रीकृष्ण ने कहा - मुक्ति कर्म ( आपके अनुसार अच्छा बुरा ) से नहीं ग्यान से होती है । हमारे महाराज जी कहते हैं - मुक्ति उसकी युक्ति जानने पर ही हो सकती है ।

ये भी बताये कि अगर 2 दोस्त हैं । उनका आपस में संस्कार वश सम्बन्ध हैं ।
1 दोस्त भक्ति न करे । बिलकुल नास्तिक बना रहे । और दूसरा सन्तों वाली भक्ति से पूरी तरह जुड जाये । तो 1 तो ( भक्ति वाला ) देह अन्त होने के बाद मोक्ष को चला जायेगा । लेकिन दूसरा यहीं रह जायेगा ।
- जैसा कि मैंने ऊपर कहा । भक्ति को आप सर्व सुख देने वाली पढाई जानिये । एक दोस्त पढकर राजा ( मोक्ष ) बन जाता है । और दूसरा मजदूर ( 84 ) ही रहता है । कालांतर में उनकी भेंट होती है । तो राजा यथासंभव उसका स्तर फ़िर से उठाने की चेष्टा करेगा । यही संस्कारी मिलन होगा । अगर वह गरीब दोस्त किसी जेल आदि मुसीबत या निर्धनता में होगा । तो राजा अपने प्रभाव से उसका समाधान करेगा । और ऐसा मिलन भेंटा तभी संभव होगा । जब कोई संस्कार होगा । इसका एक बहुत बङा उदाहरण हैं - श्रीकृष्ण सुदामा जी ।

30 जुलाई 2011

एकाग्रता बढ़ाने की यह प्राचीन पद्धति है

स्त्री - जये धरित्रियाः पुरमेव सारं पुरे गृहं सद्मनि चैक देशः । 
तत्रापि शैया शयने वरा स्त्री रत्नोज्ज्वला राज्यसुखस्य सारः । 
राजा सारी पृथ्वी को जीतकर भी केवल राजधानी में ही महल बनाता है । सारी राजधानी में भी अपना घर ही सारभूत होता है । सारे घर में भी केवल अपना शयन कक्ष ही विश्राम स्थान है । शयन कक्ष में भी केवल शैय्या ही सारभूत है । तथा शैय्या पर भी उत्तम रत्नों से युक्त अपनी पत्नी ही सारभूत है ।
रत्नानि विभूषयन्ति योषा भूष्यन्ते वनिता न रत्नकान्त्या । 
चेतो वनिता हरन्त्यरत्ना नो रत्नानि विनाङ्गनाङ्गसङ्गम । 
रत्नों की शोभा स्त्रियों से होती है । रत्नों से स्त्री की शोभा नहीं होती । क्योकि बिना रत्न के ही स्त्री मन को हर लेती है । जबकि रत्न तभी अपना पूरा प्रभाव दिखाते हैं । जब कोई सुन्दर स्त्री उन्हें धारण कर ले । श्रुतं दृष्टं स्पृष्टम स्मृतं अपि न्रिणाम ह्लाद जननं । 
न रत्नम स्त्रीभ्यो अन्यत क्वचिदपि कृतं लोकपतिना । 
तदर्थं धर्मार्थौ सुतविषयसौख्यानि च ततो गृहे । 
लक्ष्म्यो मान्याः सततमबला मानविभवै: । 
ब्रह्मा ने सबसे कीमती रत्न स्त्री को ही बनाया है । स्त्री से बढ़कर कोई रत्न इस धरती पर न सुना गया । न देखा गया । न छुआ गया । न याद आता है । जो मनुष्यों को एकदम प्रसन्नता से भर देता है । धर्म एवं अर्थ का साधन भी स्त्री के निमित्त ( काम साधन ) ही किया जाता है । स्त्री के कारण ही पुत्र, धन एवं सुख मिलता है । इन्द्रिय सुख भी स्त्री के ही अधीन है । स्त्रियाँ घर में लक्ष्मी रूप होती है । अतः स्त्री को सदैव सम्मान देना चाहिये । ऐश्वर्य पूर्वक उनकी रक्षा करनी चाहिये ।
ये अप्यङ्गनानाम प्रवदन्ति दोषान वैराग्यमार्गेण गुणान विहाय । 
ते दुर्जना पंडित में मनसो वितर्कः सद्भाववाक्यानि न तानि तेषाम । 
जो लोग स्त्रियों के विशिष्ट गुणों का अनादर करते हुए वैराग्य भावना से स्त्रियों की बुराई करते है । वे लोग दुर्जन हैं । ऐसा मेरा ( पंडित राय ) का विचार है । वे लोग अपने साफ मन से यह बात नहीं कहते ।
प्रब्रूत सत्यं कतरो अङ्गनानां दोषों अस्ति यो नाचरितो मनुष्यिः । 
स्त्रियों का ऐसा कौन सा दोष या गुनाह है । जो पुरुष ने स्वयं न किया हो ? बहुत से पुरुष तो अपनी दुष्टता से, अपनी निर्लज्जता से, स्त्रियों को कुमार्ग पर चला देते है । उसमें पुरुषो का ही अधिक दोष है । स्त्रियाँ पुरुषो से अधिक गुणों वाली है । ऐसा मनु ने कहा है ।
सोमस्तासामदाच्छौचम गन्धर्वः शिक्षिताम गिरम । 
अग्निश्च सर्वभक्षित्वं तस्मान्निष्कसमाः स्त्रियः । 
मनु ने कहा है कि सोम ( चन्द्रमा ) ने स्त्रियों को पवित्रता दी है । गन्धर्वो ने खनकती हुई आवाज दी है । अग्नि ने उन्हें सर्वभक्षित्व दिया है । अतः स्त्रियाँ तपे हुए कुंदन के समान हैं ।
ब्राह्मणाः पादतो मेध्या गावो मेध्याश्च पृष्ठतः । 
अजाश्वा मुखतो मेध्या: स्त्रियों मेध्यास्तु सर्वतः । 
ब्राह्मण लोग पैरो की तरफ से पवित्र होते है । गाय पीछे से पवित्र होती है । बकरी एवं घोड़े मुख की ओर से शुद्ध होते हैं । जबकि स्त्रियाँ सब अंगों से पवित्र होती हैं ।
स्त्रियः पवित्रमतुलं नैता दुष्यन्ति कर्हिचित । 
मासि मासि रजो ह्यासाम दुष्कृतान्यपकर्षति । 
स्त्रियाँ परम पवित्र होती हैं । ये कभी दूषित नहीं होती हैं । क्योकि प्रत्येक मास में रजोधर्म के कारण बहने वाला रक्त इनके सब पापों को दूर कर देता है ।
जाया वा स्याज्जनित्री वा संभवः स्त्रीकृतो न्रिणाम । 
हे कृतघ्नास्तयोर्निन्दाम कुर्वतां वः कुतः शुभम ? 
स्त्री माता रूप में हो । या पत्नी रूप में । दोनों ही रूप प्रशंसनीय है । पुनश्च संतानवती पत्नी तो माता व स्त्री का संयुक्त रूप होने से अधिक श्रेयोभागिनी है । अतः हे कृतघ्न पुरुष ! तुझे पैदा करने वाली स्त्री । या तेरे प्रति रूप पुत्र को उत्पन्न करने वाली स्त्री । दोनों ही रूपों में प्रशंसनीय है । उसकी निंदा न करो । अन्यथा तुम्हारा कल्याण कैसे होगा ?
आत्मा वैजायते पुत्रः । ( श्रुतिः ) दम्पत्योर्व्युत्क्रमे दोषः । 
समः शास्त्रे प्रतिष्ठितः । नरा न तमवेक्षन्ते तेनात्र वरमङ्गना: । 
पुरुष द्वारा स्त्री का गमन हो । या स्त्री द्वारा पुरुष का गमन हो । शास्त्रों में दोनों ही स्थितियों में समान दोष माना गया है ।
नहीदृशमनायुष्यम यथा परस्त्रीनिषेवणादिकमित्यादि । 
लेकिन पुरुष स्त्रियों के उक्त दोष की शंका या संभावना मात्र से ही तिल का ताड़ बना देते हैं । इसके विपरीत अपने इसी दोष को गौरव का प्रतीक समझते हैं । अतः स्त्री पुरुष से श्रेष्ठ है ।
अहो धार्षटयमसाधूनाम! निन्दतामनघाः स्त्रियः । 
मुष्णतामिव चौराणाम तिष्ठ चौरेति जल्पताम । 
बड़े आश्चर्य की बात है कि असज्जन लोग, निष्पाप स्त्रियों की भी मिथ्या निंदा करते हैं । यह उनकी धृष्टता की ही पराकाष्ठा है । मानो चोर खुद भागते भागते ही स्वयं " चोर चोर, पकड़ो पकड़ो " चिल्लाकर लोगों का ध्यान अपने ऊपर से हटाने का प्रयत्न कर रहा हो ।
पुरुषश्चटुलानि कामिनीनाम कुरुते यानि रहो न तानि पश्चात । 
सुकृतज्ञतया अङ्गना गतासूनवगूह्य प्रविशन्ति सप्तजिह्वम । 
पुरुष एकांत स्थान में । अन्तरंग क्षणों में स्त्री की प्रशंसा में जितने मधुर वचन बोलता है । उनका थोड़ा सा अंश भी उनकी पीठ के पीछे नहीं बोलता । अतः मनुष्य का मन इस विषय में स्पष्ट नहीं होता है । इसके विपरीत स्त्री अपने मृत पति के शव से संलग्न होकर जीवित ही अग्नि में प्रवेश कर जाती है । अतः स्त्री अधिक कृतज्ञ है ।
स्त्रीरत्नभोगो अस्ति नरस्य यस्य निःस्वो अपि साम्प्रत्यवनीश्वरो असौ । 
राज्यस्य सारो अशनमङ्गनाश्चैव तृष्णानलोंद्दीपनदारु शेषम । 
जिस पुरुष के पास उत्तम लक्षणों से युक्त, प्रेम करने वाली स्त्री हो । वह पुरुष गरीब होता हुआ भी राजा ही होता है । अर्थात अपने घर का राजा तो होता ही है । राज्य का भी चरम सार स्त्री ही बताई है । शेष चीजे, भोजन, शैय्या, महल आदि तो तृष्णा की अग्नि को भड़काने वाला इंधन ही है । अर्थात सुखी व स्नेही दाम्पत्य जीवन संसार की सबसे बड़ी नियामत है ।
कामिनीम प्रथमयौवनान्विताम मंदवल्गुमृदुपीड़ितस्वनाम । 
उत्स्तनिम समवलम्ब्य या रतिः सा न धातृभवने अस्ति में मतिः । अभिनव यौवन से युक्त । समुद्दिप्त मन्मथा स्त्री का कोमल आलिंगन । तथा आलिंगन के समय मृदु व धीमा स्वर करती हुई । उत्तम स्तन भार से युक्त स्त्री का साथ भला योगियों को ब्रह्मलोक में कहाँ मिलेगा ?
तत्र देवमुनिसिद्धचारणेर्मान्यमानपितृसेव्यसेवनात । 
ब्रूत धातृभवने अस्ति किं सुखं यद्रहः समवलम्ब्य न स्त्रियम । 
ब्रह्मलोक में तो पूज्यों की पूजा । सेव्यों की सेवा । मुनि सिद्धों का साथ । सिर्फ इतना ही सुख है । जबकि स्त्री के साथ से उत्पन्न सुखों में उक्त सारी बातों के साथ साथ और अधिक सुख होता है ।
आ ब्रह्मकीटान्तमिदम निबद्धं पुंस्त्रीप्रयोगेण जगत समस्तम । 
व्रीडा अत्र का यत्र चतुर्मुखत्वमीशो अपि लोभाद गमितो युवत्याः । 
ब्रह्मा ने यह सारा संसार छोटे से लेकर बड़े जीवों तक इस तरह बनाया है कि उसके मूल में स्त्री पुरुष या नर मादा का संयोग ही है । स्त्री के प्रति आकर्षण होना कोई लज्जा की बात नहीं है । क्योकि स्वयं महादेव भी स्त्री का रूप देखने के लिये एक बार चतुर्मुख रूप हो गये थे । ( यहाँ सांकेतिक पौराणिक कथा में तिलोत्तमा के रूप की छटा को निहारने के लिये एक बार शिवजी ने चारों दिशाओं में अपने चार मुंह बना लिये थे ।)
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त्राटक - एकाग्रता बढ़ाने की यह प्राचीन पद्धति है । पतंजलि ने 5000 वर्ष पूर्व इस पद्धति का विकास किया था । योगी और संत इसका अभ्यास परा मनोवैज्ञानिक शक्ति के विकास के लिये भी करते हैं । आधुनिक वैज्ञानिक शोधों ने भी यह सिद्ध कर दिया है । इससे आत्मविश्वास पैदा होता है । योग्यता बढ़ती है । और आपके मस्तिष्क की शक्ति का विकास कई प्रकार से होता है । यह विधि आपकी स्मरण शक्ति को तीक्ष्ण बनाती है । प्राचीन ऋषियों द्वारा प्रयोग की गई यह बहुत ही उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण पद्धति है । 
समय - अच्छा यह है कि इसका अभ्यास सूर्योदय के समय किया जाए । किन्तु यदि अन्य समय में भी इसका अभ्यास करें । तो कोई हानि नहीं है ।
स्थान - किसी शान्त स्थान में बैठकर अभ्यास करें । जिससे कोई अन्य व्यक्ति आपको बाधा न पहुँचाए ।
प्रथम चरण - स्क्रीन पर बने पीले बिंदु को आराम पूर्वक देखें ।
दूसरा चरण - जब भी आप बिन्दु को देखें । हमेशा सोचिये - मेरे विचार पीत बिन्दु के पीछे जा रहे हैं । बिना पलकें झपकाए एकटक देखते रहें । इस अभ्यास के मध्य आँखों में पानी आ सकता है । चिन्ता न करें । आँखों को बन्द करें । अभ्यास स्थगित कर दें । यदि पुनः अभ्यास करना चाहें । तो आँखों को धीरे से खोलें । आप इसे कुछ मिनट के लिये और दोहरा सकते हैं । अन्त में आँखों पर ठंडे पानी के छीटे मारकर इन्हें धो लें । एक बात का ध्यान रखें । आपका पेट खाली भी न हो । और अधिक भरा भी न हो । यदि आप चश्में का उपयोग करते हैं । तो अभ्यास के समय चश्मा न लगाएँ । 
यदि आप पीत बिन्दु को नहीं देख पाते हैं । तो अपनी आँखें बन्द करें । एवं भौंहों के मध्य में चित्त एकाग्र करें । इसे अन्तः त्राटक कहते है । कम से कम तीन सप्ताह तक इसका अभ्यास करें । परन्तु, यदि आप इससे अधिक लाभ पाना चाहते हैं । तो निरन्तर अपनी सुविधानुसार करते रहें । त्राटक के लिए ॐ या अन्य चित्र का इस्तेमाल भी किया जा सकता है । त्राटक के लिए दीपक की लौ को भी देखा जा सकता है । जब आँखें थक जाए । तो आँखें बंद कर आज्ञा चक्र में दीपक के लौ की कल्पना करें । उगते हुए या अस्त होते हुए सूर्य का त्राटक चर्म रोगों और कई अन्य रोगों से छुटकारा दिलाता है । जिनकी नजर कमजोर है । या जिनके चश्मे का नंबर दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है । उन्हें अपनी आँखों की रोशनी बढ़ाने के लिए योग में त्राटक की सलाह दी जाती है । जिन्हें हाई पावर का चश्मा लगा हो । उन्हें यह सप्ताह में तीन बार जरूर करना चाहिए । जिनकी नजर कमजोर नहीं है । और चाहते हैं कि उनकी नजरें कमजोर न हो । उन्हें यह हफ्ते में एक बार आवश्यक रूप से करना चाहिए ।

ध्यान शुद्धि की प्रक्रिया है

भगवान ! संन्यास लेने के बाद बहुत मिला प्रेम । जीने का ढंग । धन्यभागी हूं । परंतु कभी कभी काफी घृणा से भर जाता हूं । आपके प्रति इतना कि - गोली मार दूं । यह क्या है प्रभु ? कुछ समझ नहीं आता ।
- आनंद सत्यार्थी ! जहां प्रेम है - साधारण प्रेम । वहां छिपी हुई घृणा भी होती है । उस प्रेम का दूसरा पहलू है - घृणा । जहां आदर है -साधारण आदर । वहां एक छिपा हुआ पहलू है - अनादर का । जीवन की प्रत्येक सामान्य भावदशा अपने से विपरीत भावदशा को साथ ही लिए रहती है । तुमने अभी जो प्रेम जाना है । बड़ा साधारण प्रेम है । बड़ा सासारिक प्रेम है । इसलिए घृणा से मुक्ति नहीं हो पायेगी । अभी तुम्हें प्रेम का एक और नया आकाश देखना है । एक और नयी सुबह । एक और नये प्रेम का कमल खिलाना है । वैसा प्रेम ध्यान के बाद ही संभव होगा । मेरे साथ दो तरह के लोग प्रेम में पड़ते हैं । एक तो वे, जिन्हें मेरी बातें भली लगती हैं । मेरी बातें प्रीतिकर लगती हैं । और कौन जाने मेरी बातें प्रीतिकर गलत कारणों से लगती हों । समझो कोई शराबी यहां आ जाये । और और मैं कहता हूं - मुझे सब स्वीकार है । मेरे मन में किसी की निंदा नहीं है । अब इस शराबी की सभी ने निंदा की है । जहां गया । वही गाली खायी हैं । जो मिला । उसी ने समझाया है । जो मिला । उसी ने इसको सलाह दी है कि बंद करो यह शराब पीना । मेरी बात सुनकर । मुझे सब स्वीकार है । शराबी को बड़ा अच्छा लगता है । जैसे किसी ने उसकी पीठ थपथपा दी । उसे मेरे प्रति प्रेम पैदा होता है । यह प्रेम बड़े गलत कारण से हो रहा है । यह प्रेम इसलिए पैदा हो रहा है कि उसके अहंकार को जाने अनजाने पुष्टि का एक वातावरण मिल रहा है । यह प्रेम मेरी बात को समझकर नहीं हो रहा है । इस बात का वह आदमी अपने ही व्यक्तित्व को मजबूत कर लेने के लिए उपयोग कर रहा है । तो प्रेम हो जायेगा । लेकिन इस प्रेम में पीछे घृणा छिपी रहेगी । तुम्हारे जीवन में प्रेम की कमी है । न तुम्हें किसी ने प्रेम दिया है । न किसी ने तुमसे प्रेम लिया है । और जब मैं तुम्हें पूरे हृदय से स्वीकार करता हूं । तो तुम्हारा दमित प्रेम उभर कर ऊपर आ जाता है । लेकिन यह प्रेम अपने पीछे घृणा को छिपाए हुए है ।
और ध्यान रखना । जैसे दिन के पीछे रात है । और रात के पीछे दिन है । ऐसे ही प्रेम के पीछे घृणा है । तो कई बार प्रेम समाप्त हो जायेगा । तुम एकदम घृणा से भर जाओगे । बेबूझ घृणा से । और तुम्हें समझ में ही नहीं आयेगा कि इतना तुम प्रेम करते हो । फिर यह घृणा क्यों ? घृणा इसीलिए है कि वह जो तुम प्रेम करते हो । अभी ध्यान से पैदा होता है । ध्यान से जब प्रेम गुजरता है । तो सोने में जो कूड़ा कचरा है । वह सब जल जाता है - ध्यान की अग्नि में । और ध्यान की अग्नि से जब गुजरता है प्रेम । तो कुंदन होकर प्रगट होता है । फिर उसमें कोई घृणा नहीं होती । फिर एक समादर है । जिसमें कोई अनादर नहीं होता । नहीं तो समादर करने वालों को अनादर करने में देर नहीं लगती । वे ही लोग फूल मालायें पहनाते हैं । वे ही लोग गालियां देने लगते हैं । वे ही लोग चरण छूते हैं । वे ही लोग फूल मालायें पहनाते हैं । वे ही लोग गालियां देने लगते हैं । वे ही लोग चरण छूते हैं । वे ही लोग गर्दन काटने को तैयार हो जाते हैं । ऐसी ही तुम्हारी दशा है - आनंद सत्यार्थी ।
तुम कहते हो - कभी घृणा से भर जाता हूं इतना कि गोली मार दूं ।  स्वभावत:, इसके पीछे एक और कारण है । वह भी समझ लेना चाहिए । वह सबके उपयोग का है । संन्यास से जो भी तुम्हें मिलेगा । वह इतना ज्यादा है कि तुम उसका मूल्य न चुका सकोगे । संन्यास से तुम्हें जो भी मिलेगा । वह इतना ज्यादा है कि तुम्हारे सब धन्यवाद छोटे पड़ जायेंगे । और तब तुम मुझे क्षमा न कर पाओगे । तुम्हें जरा बेबूझ बात मालूम पड़ेगी । जो व्यक्ति हमें कुछ दे । हम उसके सामने छोटे हो जोते हैं । अगर हम उसे कुछ लौटा सकें प्रत्युत्तर में । तो हम फिर समतुल हो जाते हैं । लेकिन अगर ऐसी कोई चीज दी जाये कि उसके उत्तर में हम कुछ भी न लौटा सकें । ऋण को चुकाने का उपाय ही न हो । तो फिर हम ऐसे व्यक्ति को कभी क्षमा नहीं कर पाते । माफ नहीं कर पाते ।
मेरे एक परिचित हैं । बड़े धनपति हैं । एक बार मेरे साथ ट्रेन में सफर किया । कभी मुझे कहा नहीं था । लेकिन ट्रेन में अकेले ही थे साथ मेरे । बात होते होते बात में से बात निकल आई । उन्होंने कहा कि आज पूछने का साहस करता हूं । मेरी जिंदगी में एक दुर्घटना अमावस की तरह छाई हुई है । और दुर्घटना यह है कि मैंने अपने सारे रिश्तेदारों को, मित्रों को, सबका इतना दिया कि आज मेरे सब रिश्तेदार धनी हैं । सब मित्र धनी हैं । सब परिचित धनी है । ( धन उनके पास काफी है । और उन्होंने जरूर दिल खोल कर दिया है । ) मगर कोई भी मुझसे प्रसन्न नहीं । उल्टे वे सब मुझसे नाराज हैं । उल्टे वे मुझे बर्दाश्त ही नहीं कर सकते । यह मेरी समझ में नहीं आता कि मैंने इतना किया । सबके लिए किया । और यह सच है । मैं उनके रिश्तेदारों को जानता हूं । जो भिखमंगे थे । आज अमीर हैं । मैं उनके मित्रों को जानता हूं । जिनके पास कुछ नहीं था । आज सब कुछ है । यह बात सच है । इस बात में जरा भी अतिशयोक्ति नहीं कि उन्होंने बहुत दिया है । और देने में उन्होंने जरा भी कृपणता नहीं की है । उनके हाथ बड़े मुक्त हैं । मुक्त भाव से दिया है । तो स्वभावत: उनका प्रश्न सार्थक है कि मुझसे लोग नाराज क्यों हैं ? मैंने कहा कि - आपको समझ में नहीं आता । लेकिन मैं एक बात पूछता हूं । और उससे बात स्पष्ट हो जायेगी । आपने इन मित्रों को, परिजनों को, परिवार वालों को उत्तर में कुछ आपके लिए करने दिया है कभी ? उन्होंने कहा कि - नहीं, कोई जरूरत ही नहीं । मेरे पास सब है । और अगर कभी कोई कुछ करना भी चाहा है । तो मैंने इनकार किया है कि क्या फायदा । मेरे पास बहुत है । तो मैंने किसी से कोई प्रत्युत्तर में तो लिया नहीं । बस मैंने कहा - बात साफ हो गई । क्यों वे नाराज हैं । वे आपको क्षमा नहीं कर पा रहे । वे आपको कभी क्षमा नहीं कर पायेंगे । आपने उनको नीचा दिखाया है । उनके भीतर ग्लानि है । वे जानते हैं कि आप ऊपर हैं । दानी हैं । दाता हैं । और हम भिखमंगे हैं । भिखमंगे कभी दाताओं को क्षमा नहीं कर सकते । आप एक काम करो । उनसे मैंने कहा - छोटे छोटे काम उनको भी आपके लिए करने दो । मुझे पता है । आपको कोई जरूरत नहीं । मगर छोटे छोटे काम । आप बीमार हो । कोई एक गुलाब का फूल ले आये । तो ले आने दो । और गुलाब का फूल लेकर अनुग्रह मानो । कभी किसी मित्र को कह दिया कि भाई यह काम तुमसे ही हो सकेगा । यह मुझसे नहीं हो पा रहा । तुम्हीं निपटाओ । जरा मौका दो उन्हें कुछ करने का । छोटे छोटे मौके । जरूर मुझे पता है कि आपको कुछ भी नहीं । आप सारे अपने काम खुद ही कर ले सकते हैं । लेकिन अगर उनको थोड़ा कुछ करने का आप मौका दे सको । तो वे आपको धीरे धीरे क्षमा करने में समर्थ हो पायेंगे । उनको लगेगा । हमने लिया ही नहीं । दिया भी । उनको लगेगा । हम नीचे ही नहीं हैं । समतुल हो गये । मगर यह उनके अहंकार के विपरीत है । यह वे नहीं कर पाये । दो वर्ष वाद जब मैंने उनसे पूछा । उन्होंने कहा - मुझे क्षमा करें । मैं किसी से ले नहीं सकता । गुलाब का फूल भी नहीं ले सकता । यह मेरी जीवन प्रक्रिया के विपरीत है । मैं यह बात मान ही नहीं सकता कि मैं और किसी से लूं । मैंने देना ही जाना है । लेना नहीं । फिर मैंने कहा कि - जिनको आपने दिया है । वे आपके दुश्मन रहेंगे ।
आनंद सत्यार्थी ! यही कठिनाई यहां है । इसलिए नहीं कि मैं तुमसे कुछ लेने में संकोच करूं । इसलिए नहीं कि मेरा कोई अहंकार है । मगर यह जो देना है । यह ऐसा है कि इसका लौटाना हो ही नहीं सकता । मैं तो सब उपाय करता हूं । छोटे छोटे करता हूं । जो भी मुझसे बन सकता है । वह उपाय करता हूं । छोटे छोटे काम लोगों को दे देता हूं । कोई जा रहा है अमेरिका । उसको कह देता हूं - एक कलम मेरे लिए खरीद लाना कि एक पौधा मेरे बगीचे के लिए ले आना । ऐसे मेरे बगीचे में जगह नहीं है । और कलमें इतनी इकट्ठी हो गई हैं कि विवेक मुझसे बार बार पूछती है । इनका करियेगा क्या ? उसको सम्हालना पड़ता है । साफ सुथरा रखना पड़ता है । और जब फिर कोई जाने लगता है । और मैं कहता हूं कि मेरे लिए एक कलम ले आना । तो उसकी समझ के बाहर है कि यह जरूरत क्या है ? जरूरत केवल इतनी है कि मैं तुम्हें एक मौका देना चाहता हूं कि कुछ तुमने मेरे लिए किया । अभी मैं जल्दी नहीं चाहता कि कोई मुझे गोली मार दे । बाद में मार देगा । जरा ठहरो । थोड़ा काम हो जाने दो । वह तो आखिरी पुरस्कार है । लेकिन अभी तो काम शुरू ही शुरू हुआ । अभी जरा सम्हालना ।
आनंद सत्यार्थी ! गोली वगैरह रखना तैयार । मगर सम्हालना । थोड़ा काम व्यवस्थित हो जाने दो । थोड़े संन्यास का यह रंग छितर जाने दो पृथ्वी पर । हां कोई न कोई गोली मारेगा । और संभावना यही है कि कोई संन्यासी ही गोली मारेगा । जिसके बिलकुल बर्दाश्त के बाहर हो जायेगा । जो सह न सकेगा । जिसको इतना मिलेगा कि उत्तर देने का उसके पास कोई उपाय न रह जायेगा । आखिर जीसस को जुदास ने बेचा - तीस रुपये में । और जुदास जीसस का सबसे बड़ा शिष्य था । सबसे प्रमुख था । उसने ही जीसस को मरवाया । उसने ही सूली लगवायी । और देवदत्त ने बुद्ध को मारने बहुत चेष्टाएं कीं । और देवदत्त बुद्ध का भाई था । अग्रणी शिष्य था ।
यह सब स्वाभाविक है । इसके पीछे एक जीवन का गणित है । गणित यह है कि तुम इतने दब जाते हो ऋण से कि तुम करो क्या । गोली न मारो तो करो क्या ? मगर अभी नहीं । पर । रुको । ठीक समय पर मैं खुद ही तुमसे कह दूंगा - सत्यार्थी, कहां है गोली ? साधारण प्रेम का यही रूपांतरण होने वाला है । हर साधारण प्रेम घृणा में बदल जायेगा । इसलिए अगर सच मैं ही तुम चाहते हो कि मेरे प्रति तुम्हारे मन में कोई घृणा न रह जाये । तो तुम्हें ध्यान से गुजरना होगा । ध्यान शुद्धि की प्रक्रिया है - प्रेम को शुद्ध करने का आयोजन है । रसायन है । यहां कुछ लोग हैं । जो मुझे प्रेम करते हैं । मगर ध्यान नहीं करते । वे कहते हैं - हमें तो आपसे प्रेम है । अब ध्यान की क्या जरूरत ? उनका प्रेम खतरनाक है । उनका प्रेम कभी भी मंहगा पड़ सकता है । क्योंकि घृणा इकट्ठी होती जायेगी । ध्यान से घृणा को धोते चलो । ताकि प्रेम निखरता चले । तो एक दिन जरूर ऐसे प्रेम का जन्म होता है । जिसके विपरीत तुम्हारे भीतर कुछ भी नहीं होता । उस प्रेम को अनुभव कर लेना अमृत को अनुभव करना है ।
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जिस आदमी को इसमें कम रस है कि - मैं क्या हूँ ? और इसमें ज्यादा रस हैं कि लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं ? वह अधर्म के रास्ते पर चला जाता है ।

29 जुलाई 2011

अगर खुदा है तो फिर कोई फिक्र क्यों ?

कांटा सेती कांटा बूटे कूची सेती ताला - 
जैसे कांटे से काटा निकल जाता है । ऐसे ही इस शब्द के जन्मने के साथ ही और सब शब्द निकल गये और जो भीड़भाड़ थी शब्दों की, सिद्धातों की, शास्त्रों की इस एक शब्द के आने से सब गयी । एक ॐकार में सब लीन हो गया । इस एक के हाथ लग जाने से, ताला खुल गया । जीवन का रहस्य अब रहस्य नहीं है अब अनुभव है । अब जीवन के रहस्य पर कोई घूंघट नहीं है । घूंघट हट गया । देख लिया जीवन का जो अंर्ततम है ।
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समाधि का अनुभव अमृत का स्वाद है । समाधि का अनुभव उस अनंत की सुवास है । समाधि का अनुभव आलिंगन है । समाधि का अनुभव प्रकाश के तूफान का बरस जाना है और समाधि का अनुभव अनाहत का नाद है ।
सारी इंद्रियां अपना सब कुछ निछावर कर देती हैं । सारी इंद्रियों के अनुभव का जोड़ निश्चित ही अपूर्व होगा । उसकी तुम कल्पना ही कर सकोगे अभी लेकिन कल्पना भी हृदय को तरंगित कर देगी । कल्पना भी हृदय में आवेश जगा देगी, प्यास जगा देगी ।
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ऐसी पुकार हम सबके मन में है न मालूम किन शांत, हरियाली घाटियों से हम आए हैं न मालूम किस और दूसरी दुनिया के हम वासी हैं । यह जगत हमारा घर नहीं । यहां हम अजनबी हैं । यहां हम परदेशी हैं और निरंतर एक प्यास भीतर है अपने घर लौट जाने की, हिमाच्छादित शिखरों को छूने की ।
जब तक परमात्मा में हम वापस न लौट जाएं तब तक यह प्यास जारी रहती है । प्राण पूछते ही रहते हैं -जुहो..जुहो ?
तुमने पूछा है - मेरे भीतर एक प्यास है । बस इतना ही जानता हूं किस बात की । यह साफ नहीं है । आप कुछ कहें । मैंने यह कहानी कही इस पर ध्यान करना । सभी के भीतर है । पता हो न पता हो । होश से समझो तो साफ हो जाएगी - ओशो ।
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सिद्ध मिलै तो साधिक निपजै । जब घटि होय उजाला ।
जब तुम्हें कुछ किसी सौभाग्य से, किसी पुण्य से, किसी सिद्ध से मिलन हो जायेगा । तभी तुम्हारे भीतर वास्तविक साधक का जन्म होगा । लोग उल्टा सोचते हैं । लोग सोचते हैं हम साधक हैं । इसलिए सिद्ध की तलाश कर रहे हैं । हम शिष्य हैं इसलिए गुरु की तलाश कर रहे हैं ।
असलियत में बात उल्टी है । गुरु मिलेगा तो तुम शिष्य बनोगे और सिद्ध मिलेगा तो तुम्हारे भीतर साधना पैदा होगी, क्यों ?
क्योंकि जब तक तुम्हें ऐसा व्यक्ति न मिल जाये । जिसने जाना हो, जीया हो, स्वाद लिया हो तब तक तुम्हारे भीतर कौन उठायेगा प्यास । कौन तुम्हें जगायेगा । कौन तुम्हें पुकारेगा । जिसने कभी देखा ही न हो कुछ भीतर । उसे भीतर की याद भी कैसे आये ? असंभव है ।
जिसने भीतर कुछ अनुभव न किया हो । उसे भीतर जाने का सवाल भी नहीं उठता । वह तो बाहर ही बाहर घूमता है । वह तो बाहर ही बाहर प्रतीक्षा करता है ।
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जो जागे हैं । उन्होंने भीतर ज्योति ही नहीं पायी है वरन गीत पूर्ण ज्योति पायी । उन्होंने ज्योति और संगीत का समन्वय पाया । अंतस को प्रकाश से भरा हुआ देखा । इतना ही नहीं प्रकाश स्वर पूर्ण था । बोलता था, नाचता था । प्रकाश के पैरों में शर भी बंधे थे । प्रकाश के हाथ में वीणा भी थी । प्रकाश सूना सूना नहीं था, संगीत से आपूर था । जिस दिन अंतरात्मा में प्रवेश होता है तो ये दोनों घटनाएं एक साथ घटती हैं । वह अनुभव केवल दर्शन नहीं है, श्रवण भी है । उसमें आंख का भी उतना ही हाथ होता है जितना कान का ।
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मैत्री - मित्रता संबंध है । तुम कुछ लोगों के साथ संबंध बना सकते हो । मैत्री गुणवत्ता है न कि संबंध । इसका किसी दूसरे से कुछ लेना देना नहीं है । मौलिक रूप से यह तुम्हारी आंतरिक योग्यता है । जब तुम अकेले हो तब भी तुम मैत्री पूर्ण हो सकते हो । जब तुम अकेले हो तब तुम संबंध नहीं बना सकते । दूसरे की जरूरत होती है पर मैत्री एक तरह की खुशबू है । जंगल में फूल खिलता है कोई भी नहीं गुजरता । तब भी वह खुशबू बिखेरता है । इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई जानता है या नहीं, यह उसका गुण है ।
हो सकता है कि कभी किसी को पता नहीं चलेगा लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है । फूल आनंदित हो रहा है । संबंध एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य के बीच ही बन सकता है या अधिक से अधिक मनुष्य और जानवर के साथ - घोड़ा, कुत्ता । लेकिन मैत्री चट्टान के साथ नदी के साथ पहाड़ के साथ बादल के साथ दूर के तारों के साथ भी हो सकती है । मैत्री असीम है क्योंकि यह दूसरों पर निर्भर नहीं है । यह पूरी तरह से आपकी अपनी खिलावट है । इसलिए मैत्री बनाओ । बस मैत्री सारे अस्तित्व के साथ और उस मैत्री में तुम वह सब पा लोगे जो पाने योग्य है । मैत्री में तुम आत्यंतिक मित्र पा लोगे - ओशो ।
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ओम सबदहि सबदहि कूची - 
ॐ ही सब कुछ है । वही शब्दों का शब्द है वही स्रोत है । जहां से सारे शब्दों का जन्म हुआ है ।
सबद भया उजियाला -
और यह सूत्र बड़ा अदभुत है बहुत कम संतों में मिलेगा । सबदहि भया उजियाला - संगीत जगा है । ॐकार का नाद पैदा हुआ है लेकिन शब्द ज्योतिर्मय है । जैसे हर शब्द के भीतर उजियाला हो । जैसे हर शब्द के प्राण पर ज्योति जगमगाती हो । जैसे हर शब्द एक दीया हो । राग ही नहीं बज रहा है । राग के भीतर से रोशनी भी प्रगट हो रही है ।
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ध्यान रहे अकेलापन सदा उदासी लाता है । एकांत आनंद लाता है । वे उनके लक्षण हैं । अगर आप घड़ी भर एकांत में रह जाएं तो आपका रोआं रोआं आनंद की पुलक से भर जाएगा और आप घड़ी भर अकेलेपन में रह जाएं तो आपका रोआं रोआं थका और उदास, और कुम्हलाए हुए पत्तों की तरह आप झुक जाएंगे ।
अकेलेपन में उदासी पकड़ती है क्योंकि अकेलेपन में दूसरों की याद आती है और एकांत में आनंद आ जाता है । क्योंकि एकांत में प्रभु से मिलन होता है । वही आनंद है और कोई आनंद नहीं है - ओशो ।
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सबद हमारा षडूतर षाड़ा - 
लेकिन खयाल रखना । सिद्धों के पास होना आसान मामला नहीं है । उनके शब्द तलवारों की तरह होते हैं उनके शब्द चोट करते हैं । वे चोट न करें तो तुम्हें जगा भी न सकेंगे । सिद्धों के शब्द मलहम पट्टी नहीं करते और तुम मलहम पट्टी की तलाश में होते हो । इसलिए तुम सिद्धों से चूक जाते हो । और दो कौड़ी के लोगों के हाथ के शिकार हो जाते हो ।
पंडित पुरोहित, जिन्होंने खुद भी कुछ जाना नहीं है लेकिन एक बात वे जानते हैं । उन्हें तुम्हारी आकांक्षा का पता है कि तुम क्या खोज रहे हो । उन्हें पता है कि तुम सांत्वना खोज रहे हो । सत्य नहीं । भला तुम लाख कहो कि मैं सत्य खोज रहा हूं । तुम खोज रहे हो - सांत्वना । तुम डरे हो । भयभीत हो, मौत आती है । तुम्हारे पैर कंप रहे हैं । रोज मौत घटती है । रोज कोई मरता है । रोज अर्थी उठती है और हर बार तुम्हें झकझोर जाती है । तुम डरे हो तुम सोचते हो आगे का कुछ इंतजाम कर लूं ।
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निर्जन में भी फूल खिलते हैं और सुगंध फैला देते हैं । निर्जन में, एकांत में प्रेम की सुगंध को पकड़ें । जब एक बार एकांत में प्रेम की सुगंध पकड़ जाएगी तो आपको खयाल आ जाएगा कि प्रेम कोई रिलेशनशिप नहीं है । कोई संबंध नहीं है । प्रेम स्टेट ऑफ माइंड है । स्टेट ऑफ कांशसनेस है । चेतना की एक अवस्था है ।
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आंख सर्वाधिक महत्वपूर्ण है जीवन के अनुभव में । इसलिए अधिक ने परमात्मा का वर्णन प्रकाश की तरह किया है । गोरख परमात्मा का वर्णन शब्द की तरह करते हैं । उनके पास एक संगीतज्ञ का हृदय रहा होगा । निश्चित ही उनके पद इसके गवाह हैं, गवाही हैं । एकएक शब्द रस पूर्ण है । एकएक शब्द काव्य पूर्ण है और काव्य भी ऐसा नहीं है कि आयोजित हो । सहज प्रवाहित हुआ काव्य है । कोई गोरख कवि नहीं हैं लेकिन अनुभव इतना रसपूर्ण हुआ है कि उसके कारण कविता अपने से बन गयी है । अनुभव से कविता बनी है । कविता बनायी नहीं गयी है । मात्राएं, छंद, व्यवस्था बिठाई नहीं गयी है लेकिन भीतर इतना छंद पूर्ण अनुभव हुआ है । ऐसे संगीत का आविर्भाव हुआ है कि उसके आविर्भाव के कारण ही शब्दों में सौंदर्य आ गया है । रस आ गया है छंद आ गया है ।
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प्यारे ओशो !
कई बार आप भी प्रवचन में बड़ी बहकी बहकी बाते करते है । यह बात भला आपने कैसे कही कि आपके जाने के बाद हम किसी नए सदगुरु को खोज लें ? आप अच्छी तरह जानते है कि हम अनंत काल तक के लिए विवाह सूत्र में बंध चुके हैं । आप इस सूत्र से बचने की कोशिश कर रहे हैं तो अच्छी बात नहीं है । बुद्ध पुरुषों को तलाक की सुविधा नहीं है । इतना आप अच्छी तरह जान लो कि हम हर पत्थर में, हर फूल में, हर आँख और हर सितारे में आपका पीछा करते रहेंगे ।
भगवान श्री ने कहा - मुझे इतना भरोसा है । इसीलिए तो ऐसे खेल खेल सकता हूँ । इसीलिए मैं कह सकता हूँ कि किसी जीवित गुरु को खोज़ लेना । मुझे तुम पर पूरा भरोसा है । इसीलिए तो कह सकता हूँ । जब मैं चला जाऊं तो मेरी चिंता मत करना । किसी नए गुरु को खोज़ लेना लेकिन तुमने मुझे प्रेम किया है तो तुम्हारे लिए मैं हमेशा जीवित रहूँगा । मैं तुम्हारे प्रेम में जीऊंगा । यदि तुमने मुझे प्रेम किया है तो भले ही मेरा शरीर चला जाए । मैं तुम्हारे लिए कभी नहीं मरूंगा लेकिन मैं ये बहकी बहकी बातें कर सकता हूँ । क्योंकि मैं तुम्हारे प्रेम को जानता हूँ । तुम्हारे प्रेम में मेरा भरोसा है ।
जब कोई गुरु ऐसा कहता है कि किसी और के पास मत जाना । मुझसे चिपके रहना । मैं चला भी जाऊं तो मेरे साथ चलते रहना तो इसका मतलब है । वह तुम पर भरोसा नहीं करता वह डरा हुआ है । उसको संदेह है । उसे पता है कि उसके जाते ही तुम भी चलते बनोगे बल्कि उसे पता है कि उसके जीते जी ही तुम अपने रस्ते लगने वाले हो ।
वह बचाव करता है । वह कहता है - किसी और के पास मत जाओ । तुम्हारे लिए बस मैं ही हूँ । वह इतना संदेह में डूबा हुआ है कि शिष्य से उसका परिणय पूरा नहीं हो पाता । उसे तलाक होने का डर है । वह कहेगा - कभी किसी की आराधना मत करना । किसी को प्रेम मत करना न किसी के पास जाना । न किसी को सुनना । बस मुझे देखो और बाक़ी पूरे संसार को भूल जाओ । बस मुझे ही प्रेम करो ।
मैं तुमसे ऐसा नहीं कहता । मैं जानता हूँ । मैं चला भी जाऊँगा तो तुम मुझे खोजते रहोगे । हां, मैं यह भरोसा कर सकता हूँ कि तुम हर पत्थर में, हर आँख में और हर सितारे में मेरी खोज करोगे ।
और एक बात का वायदा मैं भी तुमसे कर सकता हूँ । मुझे खोजोगे तो मुझे पा ही लोगे । हर आँख हर सितारे में मुझे पा लोगे । क्योंकि तुमने अगर सचमुच किसी सदगुरु को प्रेम किया है तो तुम उसके साथ ही समय की अनंतता में प्रवेश कर जाते हो । यह सम्बन्ध समय का नहीं समयातीत का है ।
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शाश्वत सत्य - यह संपूर्ण ब्रह्मांड महज एक कण है उस विराट में जो विराजता है मेरे अंतरतम में - सदगुरु ।
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बुतपरस्त अर्थात मूर्ति पूजा और उस एक परमपिता परमात्मा (अल्लाह) के लिए कुरआन ए शरीफ मे क्या कहा गया है ? एक बार जरूर पढ़ें (कापी पेस्ट)
http://www.alislam.org/quran/tafseer/?page=10&region=HI
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Meditation is nothing but a bridge between you and light.
Any action in which you can be total becomes meditation.
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अगर खुदा नहीं है, तो उसका ज़िक्र क्यों ?

अगर खुदा है, तो फिर कोई फिक्र क्यों ?

जब पाप पुण्य भ्रम जारि

मनुष्य की चेतना भीतर से कब स्वस्थ होती है ?
ओशो - ध्यान का पहला अर्थ है कि हम अपने शरीर और स्वयं के प्रति जागना शुरु करें । यह जागरण अगर बढ़ सके । तो आपका मृत्यु भय क्षीण हो जाता है । और जो चिकित्सा शास्त्र मनुष्य को मृत्यु के भय से मुक्त नहीं कर सकता । वह चिकित्सा शास्त्र मनुष्य नाम की बीमारी को कभी भी स्वस्थ नहीं कर सकता । उसे भीतर की चेतना का अहसास शुरु हो जाए । भीतर की चेतना की फीलिंग शुरु हो जाए ।
हमें आमतौर से भीतर की कोई फीलिंग नहीं होती । हमारी सब फीलिंग शरीर की होती है । हाथ की होती है । पैर की होती है । सिर की होती है । ह्रदय की होती है । उसकी नहीं होती । जो मैं हूं । हमारा सारा बोध, हमारा सारी अवेयरनेस घर की होती है । घर में रहने वाले मालिक की नहीं होती । यह बड़ी खतरनाक स्थिति है । क्योंकि कल अगर मकान गिरने लगेगा । तो मैं समझूंगा - मैं गिर रहा हूं । वही मेरी

बीमारी बनेगी । नहीं । अगर मैं यह भी जान लूं कि मैं मकान से अलग हूं । मकान के भीतर हूं । मकान गिर भी जाएगा । फिर भी मैं हो सकता हूं । तो बहुत फर्क पड़ेगा । बहुत बुनियादी फर्क पड़ जाएगा । तब मृत्यु का भय क्षीण हो जाएगा ।
ध्यान के अतिरिक्त मृत्यु का भय कभी भी नहीं काटता ।
तो ध्यान का पहला अर्थ है - अवेयरनेस ऑफ वनसेल्फ ।
हम सदा, जब भी होश में हैं । तो हमारा होश जो है । वह अवेयरनेस अबाउट, किसी चीज के बाबत है सदा । वह कभी अपने बाबत नहीं है । इसीलिए तो हम अकेले बैठें । तो हमको नींद आनी शुरू हो जाती है । क्योंकि वहां क्या करे ? अखबार पढ़े । रेडियो खोलें । तो थोड़ा जागना सा मालूम पड़ता है । अगर एक आदमी को हम बिलकुल अकेले में छोड़ दें । अंधेरा कर दें कमरे में । अंधेरे में इसीलिए नींद आ जाती है आपको । क्योंकि कुछ दिखाई नहीं पड़ता । तो चेतना की कोई जरूरत नहीं रह जाती । कुछ चीज दिखायी पड़ती नहीं । तो अब क्या करे ? सिवाय सोने के कोई उपाय नहीं मालूम पड़ता । अकेले पड़ जाएं । अंधेरा हो । कोई बात करने को न हो । कुछ सोचने को न हो । तो बस आप गए नींद में । और कोई उपाय नहीं है ।
ध्यान रहे । नींद और ध्यान एक अर्थ में समान हैं । एक अर्थ में भिन्न । नींद का मतलब है - आप अकेले हैं । लेकिन सो गए हैं । ध्यान का मतलब है - आप अकेले हैं । लेकिन जागे हुए हैं । बस इतना ही फर्क है । अगर आप अपने अकेलेपन में और अपने भीतर जाग सकते हैं अपने प्रति ।
एक आदमी बुद्ध के सामने बैठा है एक दिन । और अपने पैर का अंगूठा हिला रहा है । बुद्ध ने कहा कि - अंगूठा क्यों हिलाते हो ?
उस आदमी ने कहा - छोड़िए ! ऐसे ही हिलता था । मुझे पता न था ।
बुद्ध ने कहा - तुम्हारा अंगूठा हिले । और तुम्हें पता न हो । अंगूठा किसका है यह । तुम्हारा ही है ?
उसने कहा - मेरा ही है । लेकिन आप भी कहां की बातें कर रहे हैं । आप जो बात करते थे । जारी रखिए ।
बुद्ध ने कहा - वह मैं नहीं करूंगा अब । क्योंकि जिस आदमी से मैं बात कर रहा हूं । वह बेहोश है । पता नहीं तुम 

मेरा सुन भी रहे हो कि नहीं ? उसने कहा - आप भी कैसी बातें कर रहे हैं । अंगूठा हिल रहा है ।
बुद्ध ने कहा - तो अपने अंगूठे के हिलने का आगे से होश रखो । तो उससे दोहरा होश । जो होश में है अंगूठे के प्रति । उसका होश भी पैदा हो जाएगा ।
अवेयरनेस इज़ आलवेज डबल एरोड । अगर हम उसका प्रयोग करें । तो उसका एक तीर तो बाहर की तरफ रह जाएगा । और दूसरा तीर भीतर की तरफ हो जाएगा ।
तो ध्यान का पहला अर्थ है कि हम अपने शरीर और स्वयं के प्रति जागना शुरू करें । यह जागरण अगर बढ़ सके । तो आपका मृत्यु भय क्षीण हो जाता है । और जो चिकित्सा शास्त्र मनुष्य को मृत्यु के भय से मुक्त नहीं कर सकता । वह चिकित्सा-शास्त्र मनुष्य नाम की बीमारी को कभी भी स्वस्थ नहीं कर सकता । हां चिकित्सा शास्त्र कोशिश करता है । वह कोशिश करता है । उम्र लंबी करके । उम्र लंबी करने से सिर्फ मृत्यु की प्रतीक्षा लंबी होती है । और कोई फर्क नहीं पड़ता । और लंबी प्रतीक्षा से छोटी प्रतीक्षा अच्छी है । उम्र लंबी करने से सिर्फ मौत और भी दुखदायी होती चली जाती है ।
क्या आपको अंदाज है कि जिन मुल्कों में चिकित्सा शास्त्र ने लोगों की उम्र ज्यादा बढ़ा दी है । वहां एक नया आंदोलन चल रहा है । वह है - अथनासिया का । वह यह है कि बूढ़े कह रहे हैं कि हमें मरने का अधिकार होना चाहिए संविधान में । क्योंकि आप हमको लटकाए चले जा रहे हैं । और हमको अब जिंदा रहना बहुत कठिन हो गया । आप तो लटका सकते हैं । एक आदमी को आक्सीजन का सिलेंडर रखकर न मालूम कितनी देर तक लटका सकते हैं । और उसको जिंदा रख सकते हैं । लेकिन उसकी जिंदगी मरने से बदतर हो जाएगी ।
अब न मालूम कितने लोग यूरोप और अमेरिका के अस्पतालों में उलटे सीधे शीर्षासन की हालत मे आक्सीजन के सिलेंडरो से बंधे हुए पड़े हैं । उनको मरने का हक नहीं है । वे मरने के हक की मांग कर रहे हैं । मैं मानता हूँ कि आने वाले इस सदी के पूरे होते होते दुनिया के सी सुशिक्षित राष्ट्रों के संविधान में जन्म सिद्ध अधिकारों में मरने का अधिकार जुड़ जाएगा । क्योंकि चिकित्सक को यह हक नहीं हो सकता कि वह किसी आदमी को उसकी इच्छा के विपरीत जिंदा रखे । अब तक तो हक यह नहीं था कि उसकी इच्छा के विपरीत मारे । लेकिन अभी तक जिंदा रखने का उपाय नहीं था । अब है ।
आदमी की उम्र बढ़ाने से मृत्यु का भय कम नहीं होगा । आदमी को स्वस्थ कर देने से जिंदगी ज्यादा सुखी हो जाएगी । लेकिन ज्यादा अभय नहीं होगी । अभय तो सिर्फ एक ही स्थिति में । फियरलेसनेस एक ही स्थिति में आती है कि मुझे भीतर पता चल जाए कि कुछ है । जो मरता ही नहीं । उसके बिना कभी नहीं हो सकता ।
तो ध्यान उस अमरत्व का बोध है । वह जो मेरे भीतर है । वह कभी नहीं मरता है । और वह जो मेरे बाहर है । वह मरता ही है । इसलिए जो बाहर है । उसकी चिकित्सा करो कि वह जितने दिन जिए । सुख से जिए । और वह जो भीतर है । उसका स्मरण करो कि मृत्यु भी द्वार पर खड़ी हो जाए । तो भय न कंपा दे - ओशो

रजनीशवाद जैसी कोई चीज न कभी थी । न है । न होगी । मैं वादों का दुश्मन हूँ । इन्हीं वादों ने दुनिया को बरबाद किया है । आखिर इस्लाम क्या है ? आखिर ईसाइयत क्या है ? आखिर जैनिज्म क्या है ? ये किन्हीं व्यक्तियों की चेष्टाएँ हैं । सारी दुनिया को अपनी लपेट में लेने की । ये सब हार गए । और अपनी हार में सारी दुनिया को गंदगी में पटक गए । मैं कोई ऐसा पाप करने को राजी नहीं हूँ । मैं दुनिया को अपने घेरे में नहीं लेना चाहता । मैं चाहता हूँ कि दुनिया मुझे अपने घेरे में ले ले । भूल जाए मेरा नाम । भूल जाए मेरा पता । अपनी याद करे । मैं अपने पीछे कोई धर्म नहीं छोड़ जाना चाहता हूँ - ओशो ।
सच पूछो तो दिल ही रब का मंदिर है ।
कोई दिल ना टूटे रब दिलोँ के अन्दर है ।
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राबिया अलअदाबिया एक सूफी फकीर औरत गुजरती थी एक रास्ते से । उसने फकीर हसन को एक मस्जिद के सामने हाथ जोड़े खड़े देखा । और जोर से वह फकीर हसन कह रहा था - हे प्रभु ! द्वार खोलो । कबसे पुकारता हूं । कृपा करो । मुझ दीन पर अनुकंपा करो । द्वार खोलो । हसन की आंखों से आंसू बह रहे हैं । राबिया वहां से निकलती थी । वह खड़ी हो गई । हंसने लगी । और उसने कहा - भाई ! मेरे आंख तो खोलो । जरा देखो भी । द्वार बंद कहां है ? द्वार खुला ही है । जरा देखो तो । हसन ने शास्त्रों में पढ़ा था । पढ़ा होगा जीसस का वचन - पूछो । और मिलेगा । खटखटाओ । और खुलेगा । शास्त्र से पढ़ा था । चीखो । पुकारो । आर्त तुम्हारी पुकार हो । तो परमात्मा का द्वार खुलेगा । यह राबिया शास्त्र से पढ़ी हुई नहीं है । इसने देखा कि द्वार परमात्मा का कभी बंद ही नहीं । वह कहने लगी - भाई मेरे ! आंख तो खोलो । नाहक शोरगुल मचा रहे हो । द्वार बंद कब था ? द्वार खुला ही है । अपनी आंख चाहिए ।
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अपने अकेलेपन में आनंद लेना ही ध्यान है । ध्यानी वह है । जो अपने अकेले होने में गहरा उतरता है । यह जानते हुए कि हम अकेले पैदा होते हैं । हम अकेले मरेंगे । और गहरे में हम अकेले जी रहे हैं । तो क्यों नहीं । इसे अनुभव करें कि यह अकेलापन है क्या ? यह हमारा आत्यंतिक स्वभाव है । हमारा अपना होना । हम अकेले पैदा होते हैं । हम अकेले मरते हैं । इन दो वास्तविकताओं के बीच हम साथ होने के हजारों भ्रम पैदा करते हैं । सभी तरह के रिश्ते । दोस्त और दुश्मन । प्रेम और नफरत । देश । वर्ग । धर्म । एक तथ्य कि हम अकेले हैं को टालने के लिए हम सभी तरह की कल्पनाएं पैदा करते हैं । लेकिन जो कुछ भी हम करते हैं । सत्य बदल नहीं सकता । वह ऐसा ही है । और उससे भागने की जगह, श्रेष्ठ ढंग यह है कि इसका आनंद लें - ओशो ।
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इसे ख्याल रखो । अस्तित्व के प्रेम में रहो । और प्रेम श्वास उच्छ्वास की तरह रहे । श्वास लो । छोड़ो । लेकिन ऐसे जैसे प्रेम अंदर आ रहा है । और बाहर जा रहा है । धीरे धीरे हर श्वास के साथ तुम्हें प्रेम का जादू निर्मित करना है । इसे ध्यान बनाओ । जब तुम श्वास छोड़ोगे । ऐसे महसूस करो कि तुम अपना प्रेम अस्तित्व में उंडेल रहे हो । जब तुम सांस ले रहे हो । तो अस्तित्व अपना प्रेम तुममें डाल रहा है । और शीघ्र ही तुम देखोगे कि तुम्हारी श्वास की गुणवत्ता बदल रही है । फिर वह बिलकुल अलग ही हो जाती है । जैसा कि पहले तुमने कभी नहीं जाना था । इसीलिए भारत में हम उसे प्राण या जीवन कहते हैं । सिर्फ श्वास नहीं । वह सिर्फ आक्सीजन नहीं है । कुछ और भी है । स्वयं जीवन ही ।
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इसलिए नीति का सूत्र है कि तुम वही करो दूसरों के साथ । जो तुम चाहते हो कि दूसरे तुम्हारे साथ करें । इसका परमात्मा, मोक्ष, ध्यान से कोई संबंध नहीं । यह सीधी समाज व्यवस्था है ।
धर्म नीति से बहुत ऊपर है । उतने ही ऊपर है । जितना अनीति से ऊपर है । अगर तुम एक त्रिकोण बनाओ । तो नीचे के दो कोण नीति और अनीति के हैं । और ऊपर का शिखर कोण धर्म का है । वह दोनों से बराबर फासले पर है । इसलिए धर्म महाक्रांति है । नीति तो छोटी सी क्रांति है कि - तुम पाप छोड़ो । धर्म महाक्रांति है कि - तुम पुण्य भी छोड़ो । पाप तो छोड़ना ही है । पुण्य भी छोड़ना है । क्योंकि जब तक पकड़ है । तब तक तुम रहोगे । पकड़ छोड़ो । कर्ता का भाव चला जाए । जब पाप पुण्य भ्रम जारि...
जब पाप और पुण्य दोनों के भ्रम जल गए । तब भयो प्रकाश मुरारी । तभी कोई परमात्मा को उपलब्ध होता है - ओशो 
चलती चाकी देख कर दिया कबीरा रोय ।
दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय ।
दो पाट = पाप, पुण्य ।
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सब है । फ़िर कुछ नहीं है । सब कुछ है - वो कुछ नहीं है । जो कुछ नहीं है - वो सब कुछ है ।

28 जुलाई 2011

श्री गुरु ग्रन्थ साहिब इस समय विश्व का सर्वोत्तम और सर्वोच्च ग्यान है

सत श्री अकाल महाराज ! मैं बहुत दिन से आपसे बात करने की सोच ही रहा था । लेकिन उचित टापिक नजर नहीं आया । काम काज की भाग दौड अलग से थी । लेकिन आज मैं सिर्फ़ " श्री गुरु ग्रन्थ साहिब " के बारे में ही कुछ बात करना चाहता हूँ ।
यहाँ हमारे पडोसी ( आस्ट्रेलिया में ) पंजाबी परिवार से ही हैं । पंजाबी सिख परिवार है । उनके परिवार में जो 1 बजुर्ग व्यक्ति हैं । उन्हें मैं अंकल बोलता हूँ । उनकी उमर 65 साल की है । आपका ब्लाग पढने के बाद मैंने उनके साथ 1 दिन धार्मिक चर्चा छेड ली । उन्होंने श्री गुरु ग्रन्थ साहिब का पूरा पाठ किया हुआ है । उनकी बातों से जाहिर हुआ कि उनकी समझ हमारे सिख धर्म के जो पेशेवर पाठी सिंह या भाई जी हैं । उन सब लोगों से अधिक समझ उन अंकल को है ।
उन अंकल ने बताया कि - श्री गुरुगृंथ साहिब में सतलोक ( सचखन्ड ) का भी वर्णन है । साथ में अलख लोक ।

अगम लोक और अनामी लोक का वर्णन भी है । उन्होंने कहा कि - श्री गुरू ग्रन्थ साहिब  में परमात्मा को मालिक कहते हुये । उसे बेअन्त कहा गया है । उन्होंने ये भी बताया कि  ग्रन्थ साहिब  में महाकाल स्थिति के बारे में भी बात है । साथ में कालपुरुष । आदिशक्ति । 3 प्रमुख देव और अनेकों ही खण्डों और बृह्माण्डों का जिकर है
उन्होंने ये भी बताया कि ग्रन्थ साहिब  में बार बार नाम जपो का सन्देश है । बार बार " सुरत शब्द योग " की महिमा गायी गई है । उन्होंने ये भी बताया कि इस समय जो सन्तमत की बहुत ही उच्च शाखा " राधास्वामी " चल रही है । ये शाखा भी श्री गुरु ग्रन्थ साहिब की ही वाणी का पाठ और व्याख्या को मुख्य समझती है ।
गुरु ग्रन्थ साहिब में जो पाँच शब्दों की साधना पर विशेष इशारा किया गया है । ये एक अलग ही स्थिति है । जो हर कोई नहीं जानता । ये ही पंचनामा राधा स्वामी सम्प्रदाय में दिया जाता है । जो पाँच शब्द  राधास्वामी में दिये जाते हैं । वो आम पंचनामों की तरह ॐ से शुरु होकर नमः तक वाला नहीं है । उस पंचनामे या पाँच शब्दों या पाँच शब्द वाले नाम में ही ( भी ) सार शब्द या निर्वाणी नाम ( जो स्वांस स्वांस चल रहा है ) या सत्यनाम है ।
क्युँ कि ग्रन्थ साहिब  में जिस सतनाम ( अजपा जाप )

का सन्देश है । वो नाम राधास्वामी लोगों को दे रहे हैं । पाँच शब्दों के रुप में ये नाम इसलिये दिया जा रहा है । क्युँ कि इस पंचनामे की साधना के निचोड में सारी बात क्लीयर हो जाती है । काल, महाकाल और अकाल स्थिति ।
उस अंकल के अनुसार ( उन्होंने कबीर जी की वाणी को भी समझा है ) राधा स्वामीयों के पंचनामे में वो ही ढाई अक्षर का नाम ( कबीर जी वाला ) है । लेकिन इस पंचनामे की साधना का तरीका आम साधना से थोडा सा अलग है ।
लेकिन अफ़सोस अग्यान के कारण हमारे कुछ कट्टर सिख भाई या पेशेवर पाठी सिंह और कुछ अग्यानी साधु टायप लोग ( जो प्रेक्टिकली अधूरे हैं ) इस बात का विरोध करते हुये इस बात को नकारते हैं । हमारे सिख कट्टर भाई पता नहीं क्युँ राधास्वामीयों को सिख धर्म का दुश्मन समझते हैं । कोई उनसे पूछे - भई !

जो काम ( वाणी की व्याख्या और नामदान ) आप लोगों को करना चाहिये । वो अब दूसरे लोग कर रहे हैं । आपने तो किया नहीं । और न ही करने की नीयत लगती है आपकी । तो फ़िर दूसरों को तो अच्छा काम कर लेने दो ।
लोग अपने आत्म कल्याण के लिये कहीं न कहीं किसी न किसी के पास तो जायेंगे ही । उस अंकल ने ये भी बताया कि श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में अलग अलग स्तर के भगतों की वाणी दर्ज है ( ये तो आपको भी और बहुत से लोगों को भी पता ही होगा ) ग्रन्थ साहिब में कबीर जी को सबसे उत्तम भगत कहा गया है । 1 खास बात ग्रन्थ साहिब में नौवें गुरु " गुरु तेगबहादुर जी " की वाणी सबसे गहरी और गम्भीर है । ये वाणी ग्रन्थ साहिब के आखिरी अंगों ( पन्नों ) पर दर्ज है ।

ग्रन्थ साहिब के कुल 1430 अंग ( पन्ने ) हैं । उस अंकल ने ये भी बताया कि ग्रन्थ साहिब में जो भगतों की वाणी है । वो " गुरु नानक देव जी " ने अपने जीवन काल में स्वयँ जगह जगह जाकर खुद इकठ्ठी की थी । कईयों से वो स्वयँ मिले । तो कईयों के ( जो गुजर चुके थे ) अनुयाईयों से वाणी ली गई । उस अंकल ने ये भी कहा था कि कबीर जी की सम्पूर्ण वाणी में से जो कबीर जी की वाणी का सबसे मोस्ट इम्पोर्टेंट भाग था । वो ही ग्रन्थ साहिब में दर्ज किया गया है ।
उन अंकल के अनुसार अगर सिख समाज ये बात समझ जाये । तो उन्हें कहीं जाने की जरुरत नहीं ( उनका यहाँ अर्थ था कि किसी किस्म के पाखण्ड करने की जरुरत नहीं ) बस सिख समाज इन पेशेवर पाठी सिंह ( जिन्होंने केवल बाहरी भेष धारण किये हुये हैं ) के चक्कर से निकल कर ग्रन्थ साहिब का अध्ययन करे । 

बात को ठीक से समझते हुये फ़िर किसी सच्चे सन्त की शरण में जाये । और अपना आत्म कल्याण करे ।
अगर समय की कमी के कारण लोग अधिक अध्ययन नहीं भी कर पाते । तो भी कोई बात नहीं । सिख समाज सिर्फ़ गुरु नानक देव जी की ही वाणी को गहराई से समझ ले । तो भी अति बेहतर रहेगा । उस अंकल के अनुसार गुरु नानक देव जी भी परवश जनम न लेकर प्रकट ही हुये थे । सतगुरु क्या होता है ? गुरु नानक देव जी इसके प्रमुख उदाहरण हैं ।
वैसे वो अलग बात है । हर सम्प्रदाय अपने अपने बीते हुये महापुरुष को सतगुरु कहती है । चाहे कबीर जी हों । या ओशो । या राधा स्वामीयों के पुराने गुरु । लेकिन ये सब लोग अपने अपने समय के सतगुरु ही थे । बात सब ( असल में अगर गहराई से समझा जाये तो ) 1 ही कह रहे हैं । सिर्फ़ भाषा के अलग अलग होने या झूठे अहंकार के कारण लोग बात समझने की बजाय झगडा करने लग जाते हैं ।
मैं आपको अपने 3 छोटे छोटे अनुभव बताता हूँ । जब मैं आस्ट्रेलिया आने से पहले दिल्ली में था । तब मेरी शादी भी नहीं हुई थी । बस पढाई ही चल रही थी । उस समय जहाँ दिल्ली में हम रहते थे । आसपास हिन्दू भाई बहन भी बहुत रहते थे । मैं अपने 1 दोस्त के घर गया । जो हिन्दू था । उनके यहाँ कोई पूजा हो रही थी । पूजा के बाद मैंने वैसे ही जिग्यासा वश पन्डित जी को अपना हाथ दिखाया । और कहा - पन्डित जी !जरा बता दीजिये । मुझे अच्छी नौकरी मिल जायेगी कि नहीं ?
पन्डित जी ने भी बस इधर उधर की बातें कर दी । फ़िर मैंने अचानक वैसे ही पूछ लिया - पन्डित जी ! आप शिवजी ( शंकर जी )  विष्णु जी और बृह्माजी को रब्ब बताते हो । लेकिन मैंने सुना है । रब्ब तो सिर्फ़ 1 है । मेरी बात सुनकर पन्डित जी थोडा सा हैरानी 


और फ़िर हँसकर बोले - अरे नहीं नहीं ऐसी बात नहीं है । ये सब रब्ब ही है । रब्ब ही 3 रुपों में है ।
मुझे उस समय इतनी समझ नहीं थी । मैंने चुपचाप उनकी बात मान ली । लेकिन वो अलग बात है कि आपके ब्लाग पर किसी लेख में शिव जी ( शिवशक्ति ) और  शंकर भगवान के अन्तर को स्पष्ट कर दिया गया । मुझे मेरे दोस्त ने बाद में बताया था कि - ये पन्डित जी एम काम पास हैं । लेकिन कहीं ठीक से नौकरी न मिलने के कारण पन्डिताई लाइन में आ गये ।
मेरे दोस्त ने ये भी कहा कि - ये पन्डित जी ने ज्योतिष वगैरह की डिगरी बनारस से ली है । मेरे दोस्त ने उनकी हासिल किसी और किस्म की विध्या के बारे में भी बताया था । वो बात मेरे को ठीक से याद नहीं ।
अब मैं आपको दूसरी घटना सुनाता हूँ । ये घटना पहली वाली घटना के काफ़ी बाद की बात है । मैंने 1 बार किसी पुराने पन्डित को जो किसी शिवालय का प्रमुख पुजारी आदि है । उससे अचानक किसी के घर मुलाकात की । मैंने उससे आत्मा के ग्यान और श्रीमदभगवत गीता  के बारे में बात की । तो उसने कहा कि - आप लोग आत्मा वात्मा के चक्कर में मत पङो ।
मैंने फ़िर जरा बिनती के स्टायल में पूछा । तो उन्होंने कहा कि - आत्मा क्या है ? जैसे ये हवा चल रही है । वैसे ही आत्मा है । हवा की तरह आत्मा भी दिखती नहीं । बस महसूस हो जाती होगी । साथ में उसने ये भी कहा था कि - भगवत गीता तो वो लोग पढते हैं । 

जिन्होंने साधु वगैरह बनना होता है । जिनकी जिन्दगी नीरस हो जाती है । गृहस्थ के लोगों के लिये गीता ठीक नहीं है ।
जाते जाते उस पन्डित जी ने ये भी कह दिया कि - असल मसला तो सिर्फ़ रोजी रोटी का ही है । आप सिर्फ़ उधर ध्यान दीजिये ।
मैं बाद में सोचता रहा कि रोजी रोटी तो खैर कमा ही लेंगे । अब तक उसी में तो लगे हुये हैं । लेकिन आत्मा को हवा बता दिया । लेकिन मैंने सुना है कि आत्मा दिव्य प्रकाश रुपा है ।
अब मैं आपको तीसरी बात बताता हूँ । मुझे 1 बाबा किसी के घर मिला । वो बाबा पाठ तो गुरु ग्रन्थ साहिब का करता था । लेकिन था शायद हिन्दु । लेकिन कपडे साधुओं वाले भगवे रंग के ही पहनता था । उसके परिवार का सारा खर्चा पाठ पूजा करके कमाये हुये पैसों से ही चलता था ।

मैंने उसे 1 बार गुरु नानक देव जी के बारे कुछ पूछा । तो उसने कहा कि - गुरु नानक देव जी विष्णु भगवान के अवतार थे । उसने यहाँ तक कह दिया कि - कृष्ण जी और गुरु नानक जी विष्णु जी का ही अवतार थे । हर अवतार विष्णु जी का ही आता है । विष्णु जी ही रब्ब हैं ।
1 बात और उस आदमी ने कही । जिससे मुझे शक हुआ कि ये आदमी असल में कुछ भी नहीं जानता । उस आदमी को शायद सन्तों की अहमियत नहीं पता । वो सन्तों को अपने बराबर मानता है । वो कहता है कि - मैं विद्वान हूँ । अगर कोई दूसरा विद्वान ( यहाँ उसका मतलब था सन्त ) सामने आ जाये । तो फ़िर 1 विद्वान दूसरे विद्वान को पहचान ही लेता है ।
तो इन सब बातों से ये साफ़ जाहिर होता है कि - दुनिया में असली बाबा ( जो कही सुनी और लिखती बातों के साथ पूरा प्रेक्टीकल भी जानते हों ) बहुत ही कम हैं । अधूरे किस्म के बाबा लोग भरे पडे हैं । लेकिन प्रेक्टीकली भी हर किसी की पहुँच एक समान नहीं होती ।

ये भी सत्य है । ऐसे सच्चे सन्त जिनकी पहुँच पारबृह्म अकाल पुरुष तक हो । विरले ( कोई कोई ) ही होते हैं । उनके चेहरे का नूर ही उनकी स्थिति बयान कर देता है । उन्हें किसी किस्म के फ़ालतू पचडों की आवश्यकता कभी नहीं पडती ।
इसलिये राजीव जी ! कई बातों का लिखती खुलासा तो आपके ब्लाग पर आकर ही हुआ । इसलिये मैं आपकी बात से 100 %  सहमत हूँ कि - श्री गुरु ग्रन्थ साहिब इस समय विश्व का सर्वोत्तम और सर्वोच्च ग्यान है । अब आप इस पूरे लेख के आधार पर कोई उचित राय सभी पाठक भाई बहनों को जरुर दें । सत श्री अकाल । सबका भला करे करतार ।

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- किसी दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह आपका ये मेल मुझे इतना महत्वपूर्ण लगा कि कल रात को आये इस मेल को मैंने सबसे पहले छापना उचित समझा । अच्छी और सर्वजन हितार्थ महत्वपूर्ण बात जितनी जल्दी लोगों तक पहुँचे । उतना ही शुभ है । कहते हैं ना । शुभ कार्य में देर नहीं करनी चाहिये ।
आपके इस मेल से मेरे कलेजे में बेहद ठंडक सी महसूस हुयी । एक असीम शांति का अनुभव हुआ । दिल से यही 


निकला - रब्ब तेरा लख लख शुक्र । जो मेरी मेहनत सफ़ल हुयी ।
आपका ये मेल मेरे पास होने में 100 में से 100 नम्बर देने वाली मार्कशीट ही है ।
- जैसा कि कहा जाता है । ग्यानी का हर जगह ही सम्मान होता है । उसे सबका प्रेम मिलता है । मैं खुद को ग्यानी ध्यानी तो नहीं मानता । बस रब्ब दी मेहर और संतों की कृपा से जो कुछ जान सका । बस उसी की चर्चा कर लेता हूँ ।
ये बात मैं खास इसलिये कह रहा हूँ कि प्रभु कृपा से आज दिन तक कट्टर सिख भाईयों से मेरा पाला नहीं पङा । सिख महिलाओं और युवतियों में तो मैंने हमेशा ही एक विनमृता और अपनत्व की भावना महसूस की । ये बात मैं सिर्फ़ यहाँ ब्लाग पर ही नहीं । जीवन में रूबरू हुये अनुभव के बेस पर कह रहा हूँ । और मुझे यह भी आश्चर्य होता है कि - वे कौन से सिख हैं । जो गुरु परम्परा को नकारते हैं ? क्योंकि हमारे मण्डल के नंगलीधाम ( मेरठ ) तपोभूमि ( आगरा ) श्री अद्वैत स्वरूप आश्रम w/9 राजौरी गार्डन दिल्ली । सार शब्द मिशन - निजात्म नगर बस्ती नौ जालंधर । तथा कानपुर आदि में कई बार इन जगहों पर सिख भाई बहनों से भेंटा हुआ । उन सभी ने नामदान या उपदेश लिया हुआ था । और उनके गुरु भी थे ।
हाँ इस बात से मैं अवश्य सहमत हूँ कि कुछ गुरुद्वारों में नियुक्त पाठी आदि लोगों से मुझे अच्छा अनुभव नही हुआ । उन्हें ये लगा कि - मैं मुफ़्त की चाय पीने या लंगर से पेट भरने आया हूँ । जबकि मैं न कहीं चाय पीता हूँ । न

खाना खाता हूँ । यहाँ तक कि लोग जो परसाद टायप कुछ बाँटते हैं । उसको भी पहले तो मैं लेता ही नहीं । और मजबूरी में लेने पर कुत्ते आदि को खिला देता हूँ । ये मेरी बचपन से ही आदत रही ।
इसको भी छोङिये । तो भी मुझे उनके अन्दर ऐसी टोन महसूस हुयी कि वे ही खास हैं । और मैं या अन्य लोग हीन हैं । इससे भी आगे की बात ये कि - जब मैंने उनसे कुछ सतसंग टायप करना चाहा । तो उसमें उनकी कोई रुचि नहीं थी ।
वास्तव में गुरुद्वारा में कोई जगह मिलते ही किसी भी इंसान के एक तरह से वारे न्यारे हो जाते हैं । कमाने खाने की चिंता नहीं । कोई खास मेहनत नहीं । खाओ और मौज करो । ये सिर्फ़ मैं इक्का दुक्का जगह हुआ अनुभव बता रहा हूँ । हो सकता है । अन्य जगहों पर ये बात न हो ।
वास्तव में सभी प्रकार की धार्मिक भावनायें विचार और रीति रिवाज का सही उपयोग एक विशाल दरिया पर बने पुल के समान होना चाहिये । जिससे पार होकर हम एक दूसरे को अच्छी तरह समझें । बहुरंगी संस्कृति का आनन्द लें । उनसे मिलना जुलना हो । हम एक दूसरे का दुख सुख बँटाये । जबकि हो ये रहा है कि - धार्मिकता का उपयोग लोगों ने इंसान के बीच अधिक से अधिक चौङी मजहबी खाई खोदने के लिये अधिक किया है ।
खैर..आपने स्वयँ बहुत कुछ कह दिया । किसी भी समझदार व्यक्ति के लिये इशारा ही काफ़ी होता है । जबकि आपने बुजुर्ग अंकल जी के माध्यम से बहुत कुछ विस्तार से बता दिया । जो एकदम सही है ।
बस मुझे यही बात खलती है कि जब सिख बिरादरी में ऐसे समझदार बुजुर्ग मौजूद हैं । फ़िर दूसरे लोग उनसे सीख क्यों नहीं लेते । जो उन्हें भी इस मनुष्य जीवन का लक्ष्य और परम सत्य पता चले ।

कोई आदमी अगले मनुष्य जनम में औरत बन सकता है - अम्बर धारीवाल

हैलो जी ! हैलो ! हैलो ! क्या हाल हैं सर ? मेरा नाम अम्बर धारीवाल है । मैं गोआ में रहता हु । मैं नेवी में कमान्डर हूँ । मुझे आपके बारे में सुशील जी ने बताया था । मैं सुशील जी का रिश्तेदार हूँ । सुशील जी पिछ्ले हफ़्ते गोआ आये थे । तब हमने रात को समुन्दर के किनारे बैठकर बीयर पी । तब सुशील जी ने आपके ब्लाग के बारे में बताया । और आपकी बहुत तारीफ़ की ।
मुझे बङी जिग्यासा हुई । उनकी बातें सुनकर । इसलिये मैं अपने आपको रोक नहीं पाया । और आपके ब्लाग पर श्रीगणेश कर दिया । मैं आपसे ये जानना चाहता हूँ कि - अगर कोई आदमी है । क्या वो अगले मनुष्य जनम में औरत बन सकता है । अगर कोई औरत है । तो क्या वो अगले मनु्ष्य जनम में आदमी बन सकती है । क्या ये सम्भव है ?
मैं ये भी जानना चाहता हूँ कि - क्या हम जैसा सोचते हैं । वैसा ही धीरे धीरे अन्दर से बनते चले जाते हैं । कहते हैं कि पहले विचार पैदा होता है । बाद में एक्शन में चेन्ज होता है । तो क्या इस तरह हमारी जैसी सोच होती है । हम वैसा ही बनते चले जाते हैं । सोच के बदलने से हम भी बदल जाते हैं । लेकिन सही जमीन ( समय ) मिलने पर उस सोच रूपी संस्कार को फ़ूलने फ़लने का मौका मिल जाता है । इस तरह इंसान कर्म योनि होने के कारण जैसा चाहे बन सकता है । क्या इंसान के अलावा और कोई योनि कर्म योनि नहीं है । क्या देवता लोग भी भोग योनि के अन्दर ही

आते हैं । क्या देवता या अन्य अलौकिक सूक्ष्म योनियाँ ( चाहे प्रेत हो या दिव्य योनियाँ ) भी कर्म योनि नहीं है । क्या वो सब भी भोग योनियों में आती हैं । प्लीज इन सब बातों के बारे में खुलकर समझा दीजिये । इन बातों को भी जरा खोलकर समझा दीजिये - जहाँ आसा । वहाँ वासा और जैसी मति । वैसी गति । धन्यवाद

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सत श्री अकाल  धारीवाल जी ! सत्यकीखोज पर प्रथम आगमन पर आपका बहुत बहुत स्वागत है । आपसे मिलकर बेहद खुशी हुयी । आपके बारे में जानकर अच्छा लगा । सुशील जी का बहुत बहुत धन्यवाद । जो उन्होंने आपसे मिलाया । गोआ वास्तव में इंडिया का खूबसूरत शहर है । आधा हिंदी आधा इंगलिश है भी । और नाम भी गोआ । यानी जा और आ । मतलब गोआ आने जाने को बारबार दिल करे । ऐसा ही है - गोआ । चलिये आप जैसी शानदार पर्सनालिटी से शानदार बातचीत का आरम्भ करते हैं ।


1 - अगर कोई आदमी है । क्या वो अगले मनुष्य जनम में औरत बन सकता है । अगर कोई औरत है । तो क्या वो अगले मनु्ष्य जनम में आदमी बन सकती है । क्या ये सम्भव है ?
- औरत का आदमी और आदमी का औरत अगले जन्मों में बनना ये लिंग परिवर्तन की एक बेहद जटिल और उलझी हुयी प्रक्रिया है । जो यकायक होना असंभव ही है । यहाँ में मूल परिवर्तन होने की बात कर रहा हूँ । वैसे छदम रूप में विभिन्न योग शक्तियाँ इस तरह का शरीर बदल लेती हैं । जिसका सबसे बङा उदाहरण भगवान विष्णु द्वारा मोहिनी रूप धारण करना था । पर वह बनाबटी मामला होता है ।
हर शरीर के अन्दर एक स्त्री और एक पुरुष दोनों ही होते हैं । पर सामान्य अवस्था में यह % 15 और 85 के लगभग अनुपात में होता है । यानी एक पुरुष में 15 % स्त्री 85 % पुरुष । इसी तरह एक स्त्री में 15 % पुरुष और 85 % स्त्री । ये बात आप किसी के स्वभाव में विपरीत गुण से सरलता से अनुभव कर सकते हैं । अब क्योंकि ये प्रक्रिया लाखों जन्म उपरान्त हो पाती है । अतः % की ये दर 1 - 1 बिंदु पर बदलती है । और इस घनचक्करी लीला में सामान्य को छोङकर फ़िर बदलाव प्रक्रिया से गुजर रहे जीवों का अनुपात अलग अलग होता चला जाता है । 16/84..17/83..46/54 etc
और इसको किसी भी स्त्री में पुरुष % गुण स्वभाव का समावेश होना । और किसी पुरुष में स्त्री % गुण स्वभाव आदि का समावेश होना । यदि हम बारीकी से देखें । तो स्पष्ट पता चल जाता है ।

समलैंगिकता की भी एक मुख्य वजह यह भी होती है । किसी पुरुष के अन्दर यह स्त्री इच्छा जागृत होना कि आखिर सम्भोग के समय स्त्री कैसा फ़ील करती है । वह कुछ हद तक इसका अनुभव अप्राकृतिक गुदा मैथुन द्वारा महसूस करता है । दूसरे बहुत स्त्रियों को भी यह पुरुष भावना हो जाती है कि आखिर ये ऊँट सवारी सी करता हुआ पुरुष क्या फ़ील करता है । तब वे कृतिम लिंगों की बेल्ट पहनकर इस भावना को महसूस करने की कोशिश करती हैं ।
ये तो हुयी कामभावना वाली मुख्य बात । इसके अतिरिक्त भी बहुत सी स्वभाव गत चीजें ऐसी हैं । जिनको आज के समय में स्पष्ट देखा जा सकता है । जैसे महिलाओं पुरुषों का एक दूसरे के क्षेत्र में प्रवेश । पुरुष खाना अचार मसाले आदि स्त्रियोचित विषयों में निपुण हैं । और स्त्रियाँ तमाम पुरुषोचित कार्यों में । किसी पुरुष को स्त्रियों जैसा मेकअप लुभाता है । तो कोई स्त्री पुरुष जैसा रफ़ टफ़ नजर आती है ।
इस तरह जव ये गुण और स्वभाव का % चेतना में घुलकर सही स्तर पर पहुँच जाता है । तब लिंग परिवर्तन हो जाता है । इस तरह ऊपर बताये गये % का लेवल घट बङ होता रहता है ।
अगर लिंग योनि की बनावट पर आपने गौर किया हो । तो वो समान है । अगर आप लिंग को एक बैलून मानें । तो ये जो बाहर बेलानाकार है । इसी को बैलून के छेद के बजाय दूसरे कोने से पेंसिल आदि से बीच में दबाया जाये । और पुरुष शरीर में अन्दर कर दिया जाये । तो यही योनि बन जायेगी । और अण्डकोष को अन्दर एडजस्ट कर दिया जाये । तो वो गर्भाशय । इस तरह दोनों एक ही हैं । मैं कहता हूँ ना । सेक्स एकदम फ़ालतू मैटर ।

2 - क्या हम जैसा सोचते हैं । वैसा ही धीरे धीरे अन्दर से बनते चले जाते हैं....जमीन ( समय ) मिलने पर उस सोच रूपी संस्कार को फ़ूलने फ़लने का मौका मिल जाता है । इस तरह इंसान कर्म योनि होने के कारण जैसा चाहे बन सकता है ।
- आपने एकदम सही कहा । इसका उत्तर मैं आपको प्रेक्टीकल रूप में देता हूँ । आप अपना रियल अस्तित्व एक घने बर्फ़ीले कोहरे के रूप में कल्पना करिये । जिसको आत्मा से चेतना प्राप्त होती है । ये आत्मा से जुङा अदृश्य प्रकृति रूपी मैटर है । अब इस कोहरे में आप विभिन्न रंगों का गुलाल ( यहाँ गुण कर्म आदि ) उछालिये । जाहिर है । कोहरा रंगों से मिलकर रंगीन हो जायेगा । इसकी खासियत ये होती है कि आपके उछाले गये अलग अलग रंग घनीभूत होकर अलग अलग कर्मफ़ल रूपी संस्कारी बीज का निर्माण कर देते हैं । और जैसा कि आपने सही कहा कि जमीन मिलने पर संस्कार रूपी बीज उत्पन्न होकर फ़लने लगता है । मतलब आपके दयालु विचार हैं । तब तक दयालु टायप बीज अंकुरित होकर फ़लते फ़ूलते हैं । जैसे ही आपकी विचारधारा किसी भी वजह से बदलती है । तब वैसे बीज फ़ूलने लगते हैं । मिश्रित मामला भी होता है ।

इसका सबसे बङा उदाहरण भीष्म पितामह का है । उन्हें अपने उच्च संस्कारों के चलते जीवन में कोई कष्ट नहीं हुआ । पर धृतराष्ट की अनीतियों को विवशता से मानना । और उनके सामने द्रोपदी का नंगा किया जाना आदि वे परिस्थितियों वश देखते रहे । और उनके पापकर्म का बीज फ़लित हो गया । तब उन्हें शरशैय्या का पीङादायी कष्ट भोगना पङा ये मैटर विस्तार से जानने के लिये " मेरी ऐसी गति क्यों हुयी " लेख आप इन्हीं ब्लाग में देखें ।
3 - क्या इंसान के अलावा और कोई योनि कर्म योनि नहीं है । क्या देवता लोग भी भोग योनि के अन्दर ही आते हैं । क्या देवता या अन्य अलौकिक सूक्ष्म योनियाँ ( चाहे प्रेत हो या दिव्य योनियाँ ) भी कर्म योनि नहीं है ।
- यहाँ पहले आप कर्मयोनि शब्द का सही अर्थ समझ लें । हालांकि आप और बहुत लोग इसको जानते भी होंगे । लेकिन अन्य अनजान पाठकों के हितार्थ बताना ठीक ही है । कर्मयोनि से तात्पर्य होकर यह ध्वनि नहीं निकलती कि कर्मयोनि न होने से कोई कार्य नहीं करना होगा । ठाले बैठे मुफ़्त की खाओ । ऐसा नहीं है । देवता से लेकर एक बहुत छोटी सी चींटी तक का कर्म निर्धारित है । सिर्फ़ आत्मा या परमात्मा ये कोई कर्म नहीं करते । बाकी बङी से बङी शक्ति को अपनी डयूटी बङे सख्त नियम के अधीन करनी होती है ।
यहाँ कर्मयोनि से आशय ये है कि - मनुष्य को छोङकर बाकी कोई भी योनि वाला कर्मफ़ल द्वारा अपनी गति या


स्थिति में बदलाव नहीं कर सकता लेकिन मनुष्य ऐसा कर सकता है । इसलिये इसका बेहद महत्व है । ये सबसे शक्तिशाली आत्मा या आत्मरूप को मनुष्य शरीर के रहते प्राप्त कर सकता है । और शेष सभी भोग योनियाँ ही हैं ।
4 - जहाँ आसा । वहाँ वासा और जैसी मति । वैसी गति ।
- ये तो बङी साधारण सी बात है । पहले आपकी इच्छा से आशा बन जाती है । फ़िर आप अपने आशा महल को सृजन भी कर लेते हो । यह बात हर चीज में हर जगह लागू होती है । पूरा खेल ही आसा वासा पर डिपेंड है । बस जीवन को गौर से देखिये । ये उत्तर हर जगह मौजूद है ।
मति से गति भी सरल है । अपराध मति है । तो जेल ही होगी । और उच्च मति है । तो फ़िर तदनुसार गति होगी ही । किस्मत शब्द का मतलब ही यह है कि - आप किस - मत के हो । वही आपकी किस्मत हो जायेगी ।
बस मति गति का गणित और परमात्मा का कानून जानना अनिर्वाय है । भक्ति की मति हुयी । तो भक्ति अनुसार मोक्ष या स्वर्ग आदि । पशुवत मति रही - तो फ़िर कानून अनुसार 84

22 जुलाई 2011

परियाँ और फ़रिश्ते

हैलो सर ! हाउ आर यू ! आशा है । आपके यहाँ सब कुशल मंगल होगा । आपको ई-मेल करने को दिल तो बहुत करता है । लेकिन मेरे सर पर डबल जिम्मेदारी है । 1 तो कम्पनी की जाब । और दूसरा " मीरर " मैगजीन की असिस्टेंट हैड होने के नाते वहाँ की जवाबदारी भी मेरे उपर है । मुझे लगा । आप भी सोचते होंगे कि डाली मैडम अचानक कहाँ गायब हो गये । मैंने स्पेशल टाइम निकाल कर आपको ई-मेल किया है । मैंने आपके और नवरूप के ताजे सवाल जवाब पढे । मुझे खुशी भी हुई । और हैरानी भी कि नवरूप अभी सिर्फ़ 26 साल की है । लेकिन उसकी समझ कितनी गहरी हो चुकी है ।
वाकई राजीव जी ! आपका कहना ठीक था । लोगों को इन जैसी लडकियों से सीख लेनी चाहिये । इस आधार पर मेरे मन में 1 सवाल आया है । मेरा सवाल ये है कि क्या इसे भी सतसंग का नाम दिया जा सकता है ? जैसे नवरूप आपको कोई आत्मिक ग्यान वाला सवाल पूछे । और आप उसका जवाब दो । ये सवाल जवाब ब्लाग पर छ्पने के कारण और

लोग भी इसको पढ लेते हैं । कितने ही लोगों को बिना पूछे जानकारी मिल जाती है । जिनको कुछ नहीं भी पता होता । उनका भी ग्यानवर्धन हो जाता है । क्या ये भी 1 प्रकार का पुण्य या सतकर्म है ? 1 उदाहरण और लीजिये । रूप ने आपसे कितने सवाल जवाब ( मैंने वो वाले पुराने लेख समय निकाल कर पढ लिये थे ) उसे तो जानकारी मिली ही । साथ में और पाठकों को भी जानकारी और ग्यान मिला । साथ में उसने हम सबको बताया । हम लोग तो अपनी अपनी व्यस्त जिंदगियों में उलझे हुये थे । लेकिन रूप ही हम सबको यहाँ ले आयी । ऐसे कर्मों का क्या फ़ल है । क्या रब्ब ऐसे लोगों से खुश होता होगा । जाते जाते 1 सवाल का जवाब और दे दीजिये । लोग अपने बच्चों को परियों या फ़रिश्तों की कहानियाँ सुनाते हैं । क्या वाकई परियाँ होती हैं ? ये फ़रिश्ते कौन होते हैं ? क्या फ़रिश्तों का इशारा देवताओं की तरफ़ तो नहीं ?
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 ये सच है डाली जी ! आप लोग जब भी मुझे याद करते हो । वे भावनायें  वे अदृश्य तरंगे मुझ तक आती हैं । मैं उन्हें महसूस भी करता हूँ । और ऐसा नहीं है कि ये खास बात सिर्फ़ मेरे ही साथ हो । कोई भी इंसान जब भी किसी को सच्चे दिल से याद करता है । और जैसी भावना से याद करता है । वह भावना रूपी तरंग उस तक पहुँचती ही है । पर इस तरह की रिसीविंग के लिये जो रिक्वायरमेंट जरूरी होती है । वह हरेक के पास नहीं होती । बस इसलिये आम इंसान को अक्सर पता नहीं चलता ।
नवरूप जी की धार्मिक भावना देखकर मैं वाकई आश्चर्यचकित ही हो गया था । वह सिर्फ़ न जिंदगी को गहरे अर्थों

में जानती हैं । बल्कि उनके सवालों में भी आत्मिक टच और अध्यात्म की गहराई मौजूद होती है । ये बात मैं कई बार कह चुका हूँ । वह अपने उमर की नवविवाहितों के लिये आदर्श ही हैं ।
रूप कौर जी का जब भी जिक्र आता है । मुझे उनका भोलापन और सादगी और सरलता स्वतः याद आ जाते हैं । रूप कौर जी का ये गुण जहाँ उन जैसे किसी भी इंसान के लिये बेहद घातक हो सकता है । वहाँ किसी सच्चे साधु के संसर्ग में ऐसी आत्मा पहुँच जाने पर समर्पण भावना के कारण ऐसी आत्मा का आध्यात्मिक उत्थान भी बहुत जल्दी ही होता है । क्योंकि किसी भी प्राप्ति में समर्पण की अहम भूमिका होती है । और घातक इसलिये । क्योंकि किसी गलत आदमी पर सरलता से विश्वास कर लेने पर वो उसका गलत फ़ायदा उठाते हुये किसी भी प्रकार का छल भी कर सकता है
पर मैंने ये भी देखा है कि सीधे सच्चे इंसानों की प्रभु स्वयँ सहायता करते हैं । अतः ऐसा कम ही होता है कि कोई उनको किसी प्रकार से ठग सके ।

प्रभु की चर्चा परमार्थ की चर्चा किसी भी रूप में हो सतसंग ही कहलाती है । सतसंगी की भावना के अनुसार इसका पुण्यफ़ल भी बनता है ।
जब रूप कौर जी से सवाल जबाब हो रहे थे । तब मैंने उन्हें कहा था -
नाम लेयु और नाम न होय । सभी सयाने लेंय । मीरा सुत जायो नहीं शिष न मुंडयो कोय ।
यानी इस सतनाम की खासियत ही ये है कि - ये  हर तरह से आपको सुखी और नामवाला बनाता है । आज आप लोग देख सकते हैं । महज 1 साल के अंदर रूप कौर जी ( लगभग ) विश्व प्रसिद्ध हैं । मेरे पास जो प्रतिक्रियायें आती हैं । उस आधार पर बता रहा हूँ । सभी उनके विचारों का सम्मान करते हैं ।
दूसरे मैं ये भी पहले ही कह चुका हूँ कि रूप कौर जी ने इतने से ही बहुत पुण्य कमा लिया । अब जैसे ही ये पौधा बङा होकर वृक्ष बनेगा । उस पर फ़ल आना शुरू होंगे । उनको फ़ल ( लाभ ) मिलने लगेगा।


दूसरे यदाकदा जब भी रूप कौर जी मुझे मेल करती हैं । उन्होंने स्वीकार किया है । उनमें बहुत परिवर्तन हो गये हैं । बहुत सी कठिनाईयाँ अब उन्हें महसूस नहीं होती ।
रब्ब ऐसे लोगों से सिर्फ़ खुश ही नहीं होता । बल्कि उनके दिलों में ही वास ( रहना ) करने लगता है । ये बातें आस्ट्रेलिया वालों को उनके पहुँचने पर खुद पता चल जायेंगी ।
क्या वाकई परियाँ होती हैं - कितनी अजीव बात है । अगर आपने रूप कौर जी का इस मेल में जिक्र न किया होता । तब मैं इसका उत्तर अन्य तरह से देता । पर अब इसी उदाहरण से दूँगा । जो आपको आसानी से समझ भी आयेगा ।
रूप कौर जी में जो भी गुण भाव स्वभाव etc मैटेरियल है । यह परी या अप्सराओं वाला ही है । बस उनके किसी पुण्य सतकर्म से उनका वास्ता आत्मग्यान से हो गया । अतः अब वो इस श्रेणी से ऊपर उठ जायेंगी । इसके विपरीत वह किसी द्वैत ग्यान से जुङ जातीं । तो फ़िर उनका परी या अप्सरा बनना तय था । इसके अलावा वह किसी भी ग्यान से न जुङती । तब ये सब व्यर्थ ही चला जाता ।
परियाँ और अप्सरायें लगभग समान होती हैं । कभी आपने कहावत टायप में यह सुना होगा - इन्द्र की परी । परियाँ वैसी ही होती हैं । जैसी कहानियों में वर्णन की जाती हैं । अतः यह विस्तार से बताना बेकार ही है । लेकिन परी या अप्सरा बनती कैसे है ? यह लगभग कोई नहीं जानता ।
कोई भी लङकी सुन्दर सरल भोले विचारों वाली हो । और दूसरे अपने विचार और संस्कार के कारण उसका मुखमंडल और सम्पूर्ण देहयिष्ट इतनी सुन्दर हो कि - सब देखते रह जायें । और उसे अपनी इस सुन्दरता का

अहसास भी हो । उसमें दूसरों के प्रति सहायता भाव । करुणा । दया । सहानुभूति आदि सदगुण भी हों । लेकिन ?? स्वर्गिंक भोगों की अभिलाषा और मुक्त स्वछन्द काम भोगों की चाह भी उसके अन्दर हो । तब इस सबके बाद प्रभु भक्ति की पूरी श्रद्धा भी उसके ह्रदय में हो । यह सब बातें जब मिल जाती हैं । तब एक परी या अप्सरा का निर्माण होता है । इसी नियम से जीवन गुजार लेने पर देह अन्त पर वह परी बन जाती है ।
लेकिन ठीक इन्हीं गुणों वाली लङकी जब आत्मग्यान को प्राप्त होती है । तो वह सुन्दर हँसिनी ( आत्मा का एक बेहद सुन्दर रूप । जिसका प्रकाश 16 सूर्य के बराबर होता है । ) बनती है ।
अगर वह मीरा जी की तरह भक्ति कर लेती है । फ़िर वह मुक्त आत्मा हो जाती है । उसकी डिटेल शब्दों में बताना असंभव है । वह परम शक्ति रूपा होती है ।
 ये फ़रिश्ते कौन होते हैं - फ़रिश्ते वास्तव में द्वैत भक्ति वाले सिद्ध पुरुष या तांत्रिक ही होते हैं । बस अन्तर ये होता है कि इनमें दया गुण सहायता भाव इन्हें फ़रिश्ते उपाधि दिला देता हैं । क्योंकि दूसरे सिद्ध पुरुष या तांत्रिक अलग स्वभाव के भी हो सकते हैं ।
परी या फ़रिश्ते दोनों ही अपनी अपनी क्षमता अनुसार दुखियों की सहायता करते हैं । कैसे ? ये सब ज्यादातर कहानियों में आता ही है । ये शरीर बनाकर प्रकट रूप अपना काम कर जाते हैं । और फ़िर अपने सूक्ष्म रूप में चले जाते हैं ।

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