29 जुलाई 2011

अगर खुदा है तो फिर कोई फिक्र क्यों ?

कांटा सेती कांटा बूटे कूची सेती ताला - 
जैसे कांटे से काटा निकल जाता है । ऐसे ही इस शब्द के जन्मने के साथ ही और सब शब्द निकल गये और जो भीड़भाड़ थी शब्दों की, सिद्धातों की, शास्त्रों की इस एक शब्द के आने से सब गयी । एक ॐकार में सब लीन हो गया । इस एक के हाथ लग जाने से, ताला खुल गया । जीवन का रहस्य अब रहस्य नहीं है अब अनुभव है । अब जीवन के रहस्य पर कोई घूंघट नहीं है । घूंघट हट गया । देख लिया जीवन का जो अंर्ततम है ।
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समाधि का अनुभव अमृत का स्वाद है । समाधि का अनुभव उस अनंत की सुवास है । समाधि का अनुभव आलिंगन है । समाधि का अनुभव प्रकाश के तूफान का बरस जाना है और समाधि का अनुभव अनाहत का नाद है ।
सारी इंद्रियां अपना सब कुछ निछावर कर देती हैं । सारी इंद्रियों के अनुभव का जोड़ निश्चित ही अपूर्व होगा । उसकी तुम कल्पना ही कर सकोगे अभी लेकिन कल्पना भी हृदय को तरंगित कर देगी । कल्पना भी हृदय में आवेश जगा देगी, प्यास जगा देगी ।
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ऐसी पुकार हम सबके मन में है न मालूम किन शांत, हरियाली घाटियों से हम आए हैं न मालूम किस और दूसरी दुनिया के हम वासी हैं । यह जगत हमारा घर नहीं । यहां हम अजनबी हैं । यहां हम परदेशी हैं और निरंतर एक प्यास भीतर है अपने घर लौट जाने की, हिमाच्छादित शिखरों को छूने की ।
जब तक परमात्मा में हम वापस न लौट जाएं तब तक यह प्यास जारी रहती है । प्राण पूछते ही रहते हैं -जुहो..जुहो ?
तुमने पूछा है - मेरे भीतर एक प्यास है । बस इतना ही जानता हूं किस बात की । यह साफ नहीं है । आप कुछ कहें । मैंने यह कहानी कही इस पर ध्यान करना । सभी के भीतर है । पता हो न पता हो । होश से समझो तो साफ हो जाएगी - ओशो ।
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सिद्ध मिलै तो साधिक निपजै । जब घटि होय उजाला ।
जब तुम्हें कुछ किसी सौभाग्य से, किसी पुण्य से, किसी सिद्ध से मिलन हो जायेगा । तभी तुम्हारे भीतर वास्तविक साधक का जन्म होगा । लोग उल्टा सोचते हैं । लोग सोचते हैं हम साधक हैं । इसलिए सिद्ध की तलाश कर रहे हैं । हम शिष्य हैं इसलिए गुरु की तलाश कर रहे हैं ।
असलियत में बात उल्टी है । गुरु मिलेगा तो तुम शिष्य बनोगे और सिद्ध मिलेगा तो तुम्हारे भीतर साधना पैदा होगी, क्यों ?
क्योंकि जब तक तुम्हें ऐसा व्यक्ति न मिल जाये । जिसने जाना हो, जीया हो, स्वाद लिया हो तब तक तुम्हारे भीतर कौन उठायेगा प्यास । कौन तुम्हें जगायेगा । कौन तुम्हें पुकारेगा । जिसने कभी देखा ही न हो कुछ भीतर । उसे भीतर की याद भी कैसे आये ? असंभव है ।
जिसने भीतर कुछ अनुभव न किया हो । उसे भीतर जाने का सवाल भी नहीं उठता । वह तो बाहर ही बाहर घूमता है । वह तो बाहर ही बाहर प्रतीक्षा करता है ।
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जो जागे हैं । उन्होंने भीतर ज्योति ही नहीं पायी है वरन गीत पूर्ण ज्योति पायी । उन्होंने ज्योति और संगीत का समन्वय पाया । अंतस को प्रकाश से भरा हुआ देखा । इतना ही नहीं प्रकाश स्वर पूर्ण था । बोलता था, नाचता था । प्रकाश के पैरों में शर भी बंधे थे । प्रकाश के हाथ में वीणा भी थी । प्रकाश सूना सूना नहीं था, संगीत से आपूर था । जिस दिन अंतरात्मा में प्रवेश होता है तो ये दोनों घटनाएं एक साथ घटती हैं । वह अनुभव केवल दर्शन नहीं है, श्रवण भी है । उसमें आंख का भी उतना ही हाथ होता है जितना कान का ।
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मैत्री - मित्रता संबंध है । तुम कुछ लोगों के साथ संबंध बना सकते हो । मैत्री गुणवत्ता है न कि संबंध । इसका किसी दूसरे से कुछ लेना देना नहीं है । मौलिक रूप से यह तुम्हारी आंतरिक योग्यता है । जब तुम अकेले हो तब भी तुम मैत्री पूर्ण हो सकते हो । जब तुम अकेले हो तब तुम संबंध नहीं बना सकते । दूसरे की जरूरत होती है पर मैत्री एक तरह की खुशबू है । जंगल में फूल खिलता है कोई भी नहीं गुजरता । तब भी वह खुशबू बिखेरता है । इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई जानता है या नहीं, यह उसका गुण है ।
हो सकता है कि कभी किसी को पता नहीं चलेगा लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है । फूल आनंदित हो रहा है । संबंध एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य के बीच ही बन सकता है या अधिक से अधिक मनुष्य और जानवर के साथ - घोड़ा, कुत्ता । लेकिन मैत्री चट्टान के साथ नदी के साथ पहाड़ के साथ बादल के साथ दूर के तारों के साथ भी हो सकती है । मैत्री असीम है क्योंकि यह दूसरों पर निर्भर नहीं है । यह पूरी तरह से आपकी अपनी खिलावट है । इसलिए मैत्री बनाओ । बस मैत्री सारे अस्तित्व के साथ और उस मैत्री में तुम वह सब पा लोगे जो पाने योग्य है । मैत्री में तुम आत्यंतिक मित्र पा लोगे - ओशो ।
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ओम सबदहि सबदहि कूची - 
ॐ ही सब कुछ है । वही शब्दों का शब्द है वही स्रोत है । जहां से सारे शब्दों का जन्म हुआ है ।
सबद भया उजियाला -
और यह सूत्र बड़ा अदभुत है बहुत कम संतों में मिलेगा । सबदहि भया उजियाला - संगीत जगा है । ॐकार का नाद पैदा हुआ है लेकिन शब्द ज्योतिर्मय है । जैसे हर शब्द के भीतर उजियाला हो । जैसे हर शब्द के प्राण पर ज्योति जगमगाती हो । जैसे हर शब्द एक दीया हो । राग ही नहीं बज रहा है । राग के भीतर से रोशनी भी प्रगट हो रही है ।
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ध्यान रहे अकेलापन सदा उदासी लाता है । एकांत आनंद लाता है । वे उनके लक्षण हैं । अगर आप घड़ी भर एकांत में रह जाएं तो आपका रोआं रोआं आनंद की पुलक से भर जाएगा और आप घड़ी भर अकेलेपन में रह जाएं तो आपका रोआं रोआं थका और उदास, और कुम्हलाए हुए पत्तों की तरह आप झुक जाएंगे ।
अकेलेपन में उदासी पकड़ती है क्योंकि अकेलेपन में दूसरों की याद आती है और एकांत में आनंद आ जाता है । क्योंकि एकांत में प्रभु से मिलन होता है । वही आनंद है और कोई आनंद नहीं है - ओशो ।
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सबद हमारा षडूतर षाड़ा - 
लेकिन खयाल रखना । सिद्धों के पास होना आसान मामला नहीं है । उनके शब्द तलवारों की तरह होते हैं उनके शब्द चोट करते हैं । वे चोट न करें तो तुम्हें जगा भी न सकेंगे । सिद्धों के शब्द मलहम पट्टी नहीं करते और तुम मलहम पट्टी की तलाश में होते हो । इसलिए तुम सिद्धों से चूक जाते हो । और दो कौड़ी के लोगों के हाथ के शिकार हो जाते हो ।
पंडित पुरोहित, जिन्होंने खुद भी कुछ जाना नहीं है लेकिन एक बात वे जानते हैं । उन्हें तुम्हारी आकांक्षा का पता है कि तुम क्या खोज रहे हो । उन्हें पता है कि तुम सांत्वना खोज रहे हो । सत्य नहीं । भला तुम लाख कहो कि मैं सत्य खोज रहा हूं । तुम खोज रहे हो - सांत्वना । तुम डरे हो । भयभीत हो, मौत आती है । तुम्हारे पैर कंप रहे हैं । रोज मौत घटती है । रोज कोई मरता है । रोज अर्थी उठती है और हर बार तुम्हें झकझोर जाती है । तुम डरे हो तुम सोचते हो आगे का कुछ इंतजाम कर लूं ।
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निर्जन में भी फूल खिलते हैं और सुगंध फैला देते हैं । निर्जन में, एकांत में प्रेम की सुगंध को पकड़ें । जब एक बार एकांत में प्रेम की सुगंध पकड़ जाएगी तो आपको खयाल आ जाएगा कि प्रेम कोई रिलेशनशिप नहीं है । कोई संबंध नहीं है । प्रेम स्टेट ऑफ माइंड है । स्टेट ऑफ कांशसनेस है । चेतना की एक अवस्था है ।
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आंख सर्वाधिक महत्वपूर्ण है जीवन के अनुभव में । इसलिए अधिक ने परमात्मा का वर्णन प्रकाश की तरह किया है । गोरख परमात्मा का वर्णन शब्द की तरह करते हैं । उनके पास एक संगीतज्ञ का हृदय रहा होगा । निश्चित ही उनके पद इसके गवाह हैं, गवाही हैं । एकएक शब्द रस पूर्ण है । एकएक शब्द काव्य पूर्ण है और काव्य भी ऐसा नहीं है कि आयोजित हो । सहज प्रवाहित हुआ काव्य है । कोई गोरख कवि नहीं हैं लेकिन अनुभव इतना रसपूर्ण हुआ है कि उसके कारण कविता अपने से बन गयी है । अनुभव से कविता बनी है । कविता बनायी नहीं गयी है । मात्राएं, छंद, व्यवस्था बिठाई नहीं गयी है लेकिन भीतर इतना छंद पूर्ण अनुभव हुआ है । ऐसे संगीत का आविर्भाव हुआ है कि उसके आविर्भाव के कारण ही शब्दों में सौंदर्य आ गया है । रस आ गया है छंद आ गया है ।
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प्यारे ओशो !
कई बार आप भी प्रवचन में बड़ी बहकी बहकी बाते करते है । यह बात भला आपने कैसे कही कि आपके जाने के बाद हम किसी नए सदगुरु को खोज लें ? आप अच्छी तरह जानते है कि हम अनंत काल तक के लिए विवाह सूत्र में बंध चुके हैं । आप इस सूत्र से बचने की कोशिश कर रहे हैं तो अच्छी बात नहीं है । बुद्ध पुरुषों को तलाक की सुविधा नहीं है । इतना आप अच्छी तरह जान लो कि हम हर पत्थर में, हर फूल में, हर आँख और हर सितारे में आपका पीछा करते रहेंगे ।
भगवान श्री ने कहा - मुझे इतना भरोसा है । इसीलिए तो ऐसे खेल खेल सकता हूँ । इसीलिए मैं कह सकता हूँ कि किसी जीवित गुरु को खोज़ लेना । मुझे तुम पर पूरा भरोसा है । इसीलिए तो कह सकता हूँ । जब मैं चला जाऊं तो मेरी चिंता मत करना । किसी नए गुरु को खोज़ लेना लेकिन तुमने मुझे प्रेम किया है तो तुम्हारे लिए मैं हमेशा जीवित रहूँगा । मैं तुम्हारे प्रेम में जीऊंगा । यदि तुमने मुझे प्रेम किया है तो भले ही मेरा शरीर चला जाए । मैं तुम्हारे लिए कभी नहीं मरूंगा लेकिन मैं ये बहकी बहकी बातें कर सकता हूँ । क्योंकि मैं तुम्हारे प्रेम को जानता हूँ । तुम्हारे प्रेम में मेरा भरोसा है ।
जब कोई गुरु ऐसा कहता है कि किसी और के पास मत जाना । मुझसे चिपके रहना । मैं चला भी जाऊं तो मेरे साथ चलते रहना तो इसका मतलब है । वह तुम पर भरोसा नहीं करता वह डरा हुआ है । उसको संदेह है । उसे पता है कि उसके जाते ही तुम भी चलते बनोगे बल्कि उसे पता है कि उसके जीते जी ही तुम अपने रस्ते लगने वाले हो ।
वह बचाव करता है । वह कहता है - किसी और के पास मत जाओ । तुम्हारे लिए बस मैं ही हूँ । वह इतना संदेह में डूबा हुआ है कि शिष्य से उसका परिणय पूरा नहीं हो पाता । उसे तलाक होने का डर है । वह कहेगा - कभी किसी की आराधना मत करना । किसी को प्रेम मत करना न किसी के पास जाना । न किसी को सुनना । बस मुझे देखो और बाक़ी पूरे संसार को भूल जाओ । बस मुझे ही प्रेम करो ।
मैं तुमसे ऐसा नहीं कहता । मैं जानता हूँ । मैं चला भी जाऊँगा तो तुम मुझे खोजते रहोगे । हां, मैं यह भरोसा कर सकता हूँ कि तुम हर पत्थर में, हर आँख में और हर सितारे में मेरी खोज करोगे ।
और एक बात का वायदा मैं भी तुमसे कर सकता हूँ । मुझे खोजोगे तो मुझे पा ही लोगे । हर आँख हर सितारे में मुझे पा लोगे । क्योंकि तुमने अगर सचमुच किसी सदगुरु को प्रेम किया है तो तुम उसके साथ ही समय की अनंतता में प्रवेश कर जाते हो । यह सम्बन्ध समय का नहीं समयातीत का है ।
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शाश्वत सत्य - यह संपूर्ण ब्रह्मांड महज एक कण है उस विराट में जो विराजता है मेरे अंतरतम में - सदगुरु ।
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बुतपरस्त अर्थात मूर्ति पूजा और उस एक परमपिता परमात्मा (अल्लाह) के लिए कुरआन ए शरीफ मे क्या कहा गया है ? एक बार जरूर पढ़ें (कापी पेस्ट)
http://www.alislam.org/quran/tafseer/?page=10&region=HI
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Meditation is nothing but a bridge between you and light.
Any action in which you can be total becomes meditation.
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अगर खुदा नहीं है, तो उसका ज़िक्र क्यों ?

अगर खुदा है, तो फिर कोई फिक्र क्यों ?
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