12 जुलाई 2011

दुखिया दास कबीर है जागे और रोवै

किसी भी इंसान की सही स्थिति उसका सुख दुख अन्य प्राब्लम्स अगर ठीक से जानना हो । तो इसका सटीक उपाय है । आप कुछ समय उसी की परिस्थिति में सोचिये । वही बन कर सोचिये । यहाँ मैं फ़िर से स्पष्ट कर दूँ कि मैं आप लोगों की किसी बात से तंग नहीं हूँ । बुरा भी नही मान रहा । बस परिस्थितियाँ ही ऐसी बन जाती है ।
अब आप लोग जितना भी मुझे जान गये । उसी आधार पर सोचिये कि - यदि मेरी जगह आप योगी होते । तो ये सब कैसे एडजस्ट करते ? मैं आपको अपने दिल की बात बताऊँ । तो मेरा दिल कहता है । हिमालय क्षेत्र जैसा कोई शान्त स्थान या मेरी प्रेत कहानियों जैसा कोई गुप्त स्थान हो । और बस मैं वहाँ पर अधिकाधिक समय अकेले समाधिस्थ गुजारूँ । कोई भी न हो । मैं भी न होऊँ । तब आनन्द होता है । जब वही परमात्मा शेष रह जाता है । ठीक ऐसी ही बैचेनी विवेकानन्द जी मीरा जी को भी होती है ।
दूसरे मैं एक कठिन जीवन जी रहा हूँ । जो मुक्त होने का अंतिम जीवन होता है । इसमें शरीर से जुङे करोंङों जन्मों के भोग संस्कार भी भोगने होते हैं । इसके  बाद फ़िर जन्म नहीं होता । इसमें सन्तत्व की कसौटी पर आत्मा को कसा जाता है । या तपना पङता है । मीरा जी विवेकानन्द जी रामकृष्ण परमहंस तुलसीदास जी ईसामसीह आदि सब इस समय के लिये हाय हाय कर गये ।
मीरा के तो मुँह से ही निकल गया - जो मैं ऐसा जानती भगति करे दुख होय । नगर ढिंढोरा पीटती भगति न करियो कोय । मीरा ने और भी कहा है - सूली ऊपर सेज पिया की किस विधि मिलना होय ।

लेख बङा होने से अधिक उदाहरण नहीं दे रहा । किसी भी सन्त का अन्तिम जीवन बेहद कठिन होता है । और हम इस सम्बन्ध में ज्यादा किसी से अपना दुख कह नहीं सकते । इस तरह मेरे लिये जिन्दगी के शेष 40 साल बेहद कठिन हैं । और अभी और अधिक कठिन भी हो सकते है - ग्यान का पंथ कृपाण की धारा । कह कबीर को बरनै पारा ।
इसमें एक चीज और होती है । जरा भी चूक हो जाने पर एक और " नियमों में बंधा जीवन " जीना होगा ।
अब सोचिये । मेरे लिये जीवन का एक एक पल कितना महत्वपूर्ण है ।
- दूसरे मैं एक लेखक जैसा जीवन नहीं जीता । जो जब समय मिला । लिखे । अगर मेरे सुबह के तीन घन्टे और शाम के तीन चार घन्टे में कोई आना जाना । लाइट कट । कोई समस्या वाला । कोई लम्बी फ़ोन बात हुयी । तो फ़िर उस दिन का लिखना खत्म ।
- कहानी जैसा कोई मैटर लिखने हेतु बहुत चीजें देखनी होती हैं । एक गैप के बाद दोबारा लिखने से पहले एक बार फ़िर से पूरे मैटर को एक निगाह देखना होता है । मूड बनाना होता है । अपने शब्दों स्टायल को कथानक शैली में ढालना होता है । कहानी

वास्तव में एक बच्चे को जन्म देने के समान होती है । कहानी लिखते समय लेखक को उसे जीना होता है । आप लोग अगर प्रसिद्ध लेखकों के प्रकाशित लेख पढते हों । तो बङे बङे लेखक 6 महीने में एक कहानी लिख पाते हैं ।
- जबकि लेख । किसी चीज की व्याख्या । अर्थ । कोई वर्णन आदि इनमें कोई दिक्कत नहीं होती । शब्दों की गाङी किधर भी मोङ दो । अनुराग सागर जैसे मैटर किसी आगंतुक से बात करते हुये भी लिखे जा सकते हैं ।
- दूसरे आप में से बहुत लोगों को मालूम नहीं अक्सर मेरे पास इतने बङे ( यहीं तक लिखे मान लो ) मेल आ जाते हैं । जिनका जबाब व्यक्तिगत रूप से देने का वे आग्रह करते हैं । और अपने आपको ब्लाग पर शो नहीं करना चाहते ।
- जिन लोगों ने अक्सर ऐसे बङे मेल किये हैं । वे खुद अन्दाजा लगा लें । इसमें एक से दो घन्टे का समय अवश्य लग जाता है । इससे थोङा कम मुझे भी लगता है ।
- सुखिया सब संसार है खावै और सोवै । दुखिया दास कबीर है जागे और रोवै । हरेक साधक के लिये रात बङी महत्वपूर्ण होती है । क्योंकि रात में संसारी वासनाओं का % बहुत कम हो जाता है । अतः साधु को रात में निश्चय ही जागना होता है ।

- ध्यान से बाहर आने के बाद दिमाग की स्थिति 0 शून्य होती है । संतुलित अंदाज में व्यवहार बातचीत तो बहुत दूर साधारण अनपढ अन्दाज में भी बात करना मुश्किल होता है । कई बार 3 बजे दोपहर आये । फ़ोन करने वालों को ऐसा फ़ील हुआ कि - राजीव जी ही बोल रहे हैं या कोई और ? बिकाज ये तो ठीक से बात भी नहीं कर पा रहे । साधारण इंसान की ऐसी मिलती जुलती स्थिति गहरी नींद में एकदम जगा देने पर । और सुबह नींद से उठने पर भी होती है । ये अनुभव नींद से तुरन्त जागे किसी छोटे बच्चे पर आजमा कर देखना । वह नार्मल होने में दस पन्द्रह मिनट तक लेगा । ध्यान से बाहर आने पर यह स्थिति साधारण इंसान की तुलना में ध्यान की गहरायी के अनुसार हजार या लाख गुना तक होती है ।

- साधु साधक साधना - ये सभी जीवन आम जीवन से एकदम अलग हटकर होता है । उनके लिये संसार में कोई रस नहीं होता । आखिर लम्बे समय तक तपस्यारत साधुओं को ऐसा क्या मिलता है ? जो वे एक कठिन आसन में लगातार महीनों बैठे रहते हैं । आप एक दिन कमरे में ही बैठकर देखिये । कैसा लगता है ।
- अंत में एक महत्वपूर्ण बात - मेरा ब्लाग देखकर कई धार्मिकता जागरूकता आदि विषयों पर अखबार पत्रिकायें आदि निकालने वालों ने मुझसे उनके लिये लिखने का आग्रह किया । जिसे मैंने टालमटोल कर दिया । इस तरह की कुछ धार्मिक साइटस ने भी कांटेक्ट किया कि - मैं उनके लिये ( अच्छी सेलरी पर ) काम करूँ । मैंने वो भी अनसुना कर दिया । अन्य तरह से प्रचारक हेतु आफ़र आये । मगर सबके लिये - नो आनली नो ।
- इस तरह बहुत सी ऐसी बातें हैं । जो आप बङती उमर और जीवन के अनुभवों से जानोगे ।
उमा दारु जोषित की नाई । सबै नचावै राम गुसाई ।
शंकर जी बोले - हे पार्वती ! ये सभी इंसान कठपुतलियों की भांति हैं । जिनकी डोरी राम ( परम शक्ति ) के हाथ में है । उसी अनुसार सब जीव नाच ( व्यवहार कर ) रहे हैं ।

ऐसे ही साधक भावों और परिस्थितियों से मिलती जुलती उपनिषद की एक कथा " ओशो " के शब्दो में पढिये -
****उपनिषद में 1 कथा है । उद्दालक का बेटा श्‍वेतकेतु ज्ञान लेकर घर लौटा । विश्‍वविद्यालय से घर आया । बाप ने देखा । दूर गांव की पगडंडी से आते हुए । उसकी चाल में मस्‍ती कम और अकड़ ज्‍यादा थी । सुर्य पीछे से उग रहा था । अंबर में लाली फेल रही थी । पक्षी सुबह के गीत गा रहे थे । पर उद्दालक सालों बाद अपने पुत्र को घर लौटते देखकर भी उदास हो गया ।
क्‍योंकि पिता ने सोचा था । विनमृ होकर लौटेगा । वह बड़ा अकड़ा हुआ आ रहा था ।  अकड़ तो हजारों कोस दूर से ही खबर दे देती है अपनी । अकड़ तो अपनी तरंगें चारों तरफ फैला देती है । वह ऐसा नहीं आ रहा था कि - कुछ जानकर आ रहा है । वह ऐसे आ रहा था । जैसे मूढ़ता से भरा हुआ । ऊपर ऊपर ज्ञान तो संगृहीत

कर लिया है । पंडित होकर आ रहा है । विद्वान होकर आ रहा है । प्रज्ञावान होकर नहीं आ रहा । ज्ञानी होकर नहीं आ रहा । कोई अपनी समझ की ज्‍योति नहीं जली है । अंधेरे शास्‍त्रों का बोझ लेकर आ रहा है । बाप दुखी और उदास हो गया ।
बेटा आया । उद्दालक ने पूछा कि - क्‍या क्‍या तू सीखकर आया ?
उसने कहा - सब सीखकर आया हूं । कुछ छोड़ा नहीं ।
यही तो मूढ़ता का वक्‍तव्‍य है । उसने गिनती करा दी । कितने शास्‍त्र सीखकर आया हूं । सब वेद कंठस्थ कर लिए है । सब उपनिषद जान लिए है । इतिहास  भूगोल । पुरान । काव्‍य । तर्क । दर्शन । धर्म सब जान लिया है । कुछ छोड़ा नहीं है । सब परीक्षाए पूरी करके आया हूं । गोल्ड मैडल लेकर आया हूं ।
पिता ने कहा -  लेकिन तूने उस 1 को जाना । जिसे जानकर सब जान लिया जाता है ?
उसने कहा - कैसा 1 ? किस 1 की बात कर रहे है आप ?
बाप ने कहा - तूने स्‍वयं को जाना । जिसे जानने से सब जान लिया जाता है । श्वेतकेतु उदास हो गया । उसने कहा - उस 1 की तो कोई चर्चा वहाँ हुई ही नहीं ।

तो बाप ने कहा - तुझे फिर जान पड़ेगा । क्‍योंकि हमारे कुल में हम सिर्फ जन्‍म से ही ब्राह्मण नही होते रहे है । हम जान से ब्राह्मण होते है । यह हमारे कुल की परम्‍परा है । मेरे बाप ने भी मुझे ऐसे ही वापस लौटा दिया था । 1 दिन तेरी  तरह मैं भी अकड़कर घर आया था । सोचकर कि सब जान लिया है । सब जानकर आ रहा हूं । झुका था बाप के चरणों में । लेकिन मैं झुका नहीं था । अंदर से । भीतर तो मेरे यही ख्‍याल था कि मैं अब बाप से ज्‍यादा विद्वान हो गया हूं । ज्‍यादा जान गया हूं । लेकिन मेरे पिता उदास हो गये । और उन्‍होंने कहा - वापस जा । उस 1 को जान ।  जिसे जानने से सब जान लिया जाता है बृह्म को जानकर ही हम ब्राह्मण होते है । तुझे भी वापस जाना होगा । श्‍वेतकेतु ।
श्‍वेतकेतु की आंखों मैं पानी आ गया । और अपने पिता के चरण छुए । और वापस चला गया । घर के अंदर भी न गया था ।
मां ने कहा - बेटा आया हैं । सालों बाद  बैठने को भी नहीं कहा । और कुछ खाने को भी नहीं । कैसे पिता हो ?
लेकिन श्‍वेतकेतु ने मां के पैर छुए । और जल पिया । और कहा - मां अब  उस 1 को जानकर ही तुम्हारे चरणों में आऊँगा । जिसे पिताजी ने जाना है । या जिसे हमारे पुरखों ने जाना है । मैं कुल पर कलंक नहीं बनूंगा ।
श्‍वेतकेतु गया गुरु के पास । और पूछा - गुरूवर उस 1 को जानने के लिए आया हूं ।

तब गुरु हंसा । और कहां 400 गायें बंधी है गोशाला में । उन्‍हें जंगल में ले जा । जब तक वह 1000 न हो जाये । तब तक न लौटना । श्वेतकेतु 400 गायों को ले जंगल में चला गया । गाये चरती रहती । उनको देखता रहता । अब 1000 होने में तो समय लगेगा । बैठा रहता । पेड़ो के नीचे । झील के किनारे । गाय चरती रहती । शाम जब गायें विश्राम करती । तब वह भी विश्राम करता । दिन आये । रातें आई । चाँद उगा । चाँद ढला । सूरज निकला । सूरज गया । समय की धीरे धीरे बोध ही नहीं रहा ।
क्‍योंकि समय का बोध आदमी के साथ है । कोई चिंता नहीं । न सुबह की । न शाम की । अब गायें ही तो साथी है । और न वहां ज्ञान जो सालों पढ़ा था । उसे ही जुगाल कर ले । किसके साथ करे । खाली होता चला गया । श्‍वेतकेतु गायों की मनोरम स्‍फटिक आंखे आसमान की तरह पारदर्शी । देखना कभी गायों की आंखों में झांककर तुम किसी और ही लोक में पहुंच जाओगे । कैसे निर्दोष और मासूम  कोरी  0 शून्यवत होती है । गायें की आंखे । उनका ही संग साथ करते । कभी बैठकर बांसुरी बजा लेता । अपने अन्‍दर की बांसुरी भी धीरे धीरे बजने लगी । सालों गुजर गये ।
और अचानक गुरु का आगमन हो गया । तब पता चला । मैं यहां किसलिये आया था ।


तब गुरु ने कहा - श्‍वेतकेतु हो गयीं 1000 एक गाय । अब तू भी गऊ के समान निर्दोष हो गया है । और तूने उसे भी जान लिया । जो पूर्ण से पूर्ण है । पर श्वेतकेतु इतना पूर्ण हो गया कि उसमे कहीं मैं का भाव ही नहीं था । श्‍वेतकेतु बुद्ध हो गया । अरिहंत हो गया । जान लिया बृह्म को ।
जब श्वेतकेतु अपने घर आया । तो ऐसे आया कि उसके पदचाप भी धरा पर नहीं छू रहे थे । तब ऐसे आया विनमृता आखिरी गहराइयों को छूती हो । मिटकर आया । और जो मिटकर आया । वहीं होकर आया । अपने को खोकर आया । वह अपने का पाकर आया । ये कैसा विरोधाभास है ।
शास्‍त्र का बोझ नहीं था अब सत्‍य की निर्भार दशा थी । विचारों की भीड़ न थी । अब ध्‍यान की ज्‍योति थी । भीतर 1 विराट शून्य 0 था । भीतर 1 मंदिर बनाकर आया । 1 पूजाग्रह का भीतर जन्‍म हुआ । अपने होने का जो हमे भेद होता है । वह सब गिर गया श्वेतकेतु का  अभेद हो गया । वही जो उठता है । निशब्द में । शब्‍दों के पास ।
आज का इंसान भी कुछ ऐसा ही हो गया है । जो शिक्षा चाहता है ।  गोल्ड मैडल चाहता है । सबसे आगे रहना चाहता है । प्रमाणपत्र चाहता है । पर ज्ञान नहीं । ज्ञान के लिए विनमृता जरुरी है । स्वयं का ज्ञान होना ही बृह्म का ज्ञान है ।
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