13 जुलाई 2011

इससे मुक्ति पा सकते हो

कामवासना - सेक्स थकान लाता है । इसलिए मैं तुमसे कहता हूं कि इसकी अवहेलना मत करो । जब तक तुम इसके पागलपन को नहीं जान लेते । तुम इससे छुटकारा नहीं पा सकते । जब तक तुम इसकी व्यर्थता को नहीं पहचान लेते । तब तक बदलाव असंभव है । यह अच्छा है कि तुम सेक्स से तंग आते जा रहे हो । और स्वाभाविक भी है । सेक्स का अर्थ ही यह है कि तुम्हारी ऊर्जा नीचे की और बहती है । तुम ऊर्जा गंवा रहे हो । ऊर्जा को ऊपर की ओर जाना चाहिए । तब यह तुम्हारा पोषण करती है । तब यह शक्ति लाती है । तुम्हारे भीतर कभी न थकाने वाली ऊर्जा के स्रोत बहने शुरू हो जाते हैं - एस धम्मो सनंतनो । 
लेकिन यदि लगातार पागलों की तरह सेक्स करते ही चले जाते हो । तो यह ऊर्जा का दुरूपयोग होगा । शीध्र तुम अपने आपको थका हुआ और निरर्थक पाओगे । मनुष्य कब तक मूर्खताएं करता चला जा सकता है । एक दिन अवश्य सोचता है कि वह अपने साथ क्या कर रहा है । क्योंकि जीवन में सेक्स से अधिक महत्वपूर्ण और कई चीजें हैं । सेक्स ही सब कुछ नहीं होता । सेक्स सार्थक है । परंतु सर्वोपरि नहीं रखा जा सकता है । यदि तुम इसी के जाल में फंसे रहे । तो तुम जीवन की अन्य सुंदरताओं से वंचित रह जाओगे । और मैं कोई सेक्स विरोधी नहीं हूं । इसे याद रखें । इसीलिए मेरी कही बातों में विरोधाभास झलकता है । परंतु सत्य विरोधाभासी ही होता है । मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता । मैं बिलकुल भी सेक्स विरोधी नहीं हूं । क्योंकि जो लोग सेक्स का विरोध करेंगे । वे कामवासना में फंसे रहेंगे । मैं सेक्स के पक्ष में हूं । क्योंकि यदि तुम सेक्स में गहरे चले गए । तो तुम शीघ्र ही इससे मुक्त हो सकते हो । जितनी सजगता से तुम सेक्स में उतरोगे । उतनी ही शीघ्रता से तुम इससे मुक्ति भी पा जाओगे । और वह दिन भाग्यशाली होगा । जिस दिन तुम सेक्स से पूरी तरह मुक्त हो जाओगे । यह अच्छा ही है कि तुम सेक्स से थक गये हो । अब किसी डाक्टर के पास कोई दवा लेने मत जाना । यह कुछ भी सहायता नहीं कर पायेगी । ज्यादा से ज्यादा यह तुम्हारी इतनी ही मदद कर सकती है कि अभी नहीं । तो जरा और बाद में थकाना शुरू हो जाओगे । अगर तुम वास्तव में ही सेक्स से थक चुके हो । तो यह एक ऐसा अवसर बन सकता है कि तुम इसमे से बाहर छलांग लगा सको । कामवासना में अपने आपको घसीटते चले जाने में क्या अर्थ है । इसमे से बाहर निकलो । और मैं तुम्हें इसका दमन करने के लिए नहीं कह रहा हूं । यदि कामवासना में जाने की तुम्हारी इच्छा में बल हो । और तुम सेक्स में नहीं जाओ । तो यह दमन होगा । लेकिन जब तुम सेक्स से तंग आ चुके हो । या थक चुके हो । और इसकी व्यर्थता जान ली है । तब तुम सेक्स को दबाए बगैर इससे छुटकारा पा सकते हो । सेक्स का दमन किए बिना जब तुम इससे बाहर हो जाते हो । तो इससे मुक्ति पा सकते हो । कामवासना से मुक्त होना एक बहुत बड़ा अनुभव है । काम से मुक्त होते ही तुम्हारी ऊर्जा ध्यान और समाधि की और प्रेरित हो जाती है । ओशो ।
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त्याग सत्य की ओर जीवन क्रांति अत्यंत द्रुत गति से होती है । सत्य की अंतर्दृष्टि भर हो । तो धीरे धीरे नहीं । किंतु युगपत परिवर्तन घटित होते हैं । जहां स्वयं बोध नहीं होता है । वही क्रम है । अन्यथा अक्रम में । और छलांग में ही । विद्युत की चमक की भांति ही जीवन बदल जाता है ।
कुछ लोग एक व्यक्ति को मेरे पास लाए थे । उन्हें कोई दुर्गुण पकड़ गया था । उसके प्रियजन चाहते थे कि - वे उसे छोड़ दें । उस दुर्गुण के कारण उनका पूरा जीवन ही नष्ट हुआ जा रहा था । मैंने उनसे पूछा कि क्या विचार है ? वे बोले - मैं धीरे धीरे उसका त्याग कर दूंगा ।
यह सुन मैं हंसने लगा था । और उनसे कहा था - धीरे धीरे त्याग का कोई अर्थ नहीं होता है । कोई मनुष्य आग में गिर पड़ा हो । तो क्या वह उससे धीरे धीरे निकलेगा ? और यदि वह कहे कि मैं धीरे धीरे निकलने का प्रयास करूंगा । तो इसका क्या अर्थ होगा ? क्या इसका स्पष्ट अर्थ नहीं होगा कि उसे स्वयं आग नहीं दिखाई पड़ रही है ?
फिर मैंने उनसे एक कहानी कही । परमहंस रामकृष्ण की सत्संगति से एक धनाढ्य युवक बहुत प्रभावित था । वह एक दिन परमहंस देव के पास एक हजार स्वर्ण मुद्राएं भेंट करने लाया । रामकृष्ण ने उससे कहा - इस कचरे को गंगा को भेंट कर आओ ।
अब वह क्या करे ? उसे जाकर वे मुद्राएं गंगा को भेंट करनी पड़ीं । लेकिन वह बहुत देर से वापस लौटा । क्योंकि उसने एक एक मुद्रा गिनकर गंगा में फेंकी । एक.. दो.. तीन.. हजार स्वभावत: बहुत देर उसे लगी । उसकी यह दशा सुनकर रामकृष्ण ने उससे कहा था - जिस जगह तू एक कदम उठाकर पहुंच सकता था । वहां पहुंचने के लिये तूने व्यर्थ ही हजार कदम उटाये । सत्य को जानो । और अनुभव करो । तो किसी भी बात का त्याग धीरे धीरे नहीं करना होता है । सत्य की अनुभूति ही त्याग बन जाती है । अज्ञान जहां हजार कदमों में नहीं पहुंचता । ज्ञान वहां एक ही कदम में पहुंच जाता है ।
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