16 जुलाई 2011

यह सच है निगुरे यमदूतों से मार खाते हुये ही जाते हैं

सतश्री अकाल जी ! मैं कुछ दिन से आपको ई-मेल कर नहीं सकी । गर्मियों की छुट्टियों के कारण हमारे रिश्तेदारों का अपने बच्चों सहित हमारे घर आना जाना लगा रहा । मुझे अपने पति के साथ कभी इधर उधर आते जाते रहना पङा ।
पिछली बार जो मैंने आपसे सवाल जबाब किये थे उनके आधार पर मेरे मन में कुछ प्रश्न और आये हैं
1 जब पिछ्ले लेख में मैंने पूछा था कि - सत्य क्या है  ?
तब आपने कहा था कि - तुम हमेशा हो, ये सत्य है ।
क्या यहाँ पर आपके कहने का अर्थ ये था कि - वास्तव में मेरी जो असली पहचान है या असली स्वरुप है या जो वास्तव में मैं स्वयँ जो हूँ (आत्मा) वो हमेशा है ।
हमेशा का अर्थ तो फ़िर ये हुआ कि - मैं (आत्मा) वास्तव में अनादि और अविनाशी हूँ । इस बारे में जरा अधिक से अधिक खुलकर बताईये ।
2 मुक्त वियोगी होना असल में क्या होता है । जरा खुलकर बताईये ।
3 आपने कहा था कि - सिर्फ़ शरीर में नहीं बल्कि जहाँ पर भी चेतना नजर आती है वो आत्मा की ही चेतना होती है । इसको जरा और खुलकर समझायें ।
4 अगर हम किसी सच्चे सन्त से ‘नामदान’ ले लें । अगर हम युवा हैं और सन्त बजुर्ग । तो जब सन्त स्थूल शरीर त्याग कर सतलोक चले जायें । लेकिन जिस युवा ने नामदान लिया है । उसकी आयु अभी रहती हो और किसी कारणवश वो उस जन्म में साधना पूरी न कर पाये । तो जब शरीर त्यागने का समय आये तो उसे कौन लेने आयेगा ? क्योंकि अक्सर तो सुना है कि - निगुरे लोगों को यमदूत ही लेने आते हैं ।
5 हमें या हम सबको (यानि सब आत्माओं को) परमात्मा का अंश भी बोला जाता है या हर आत्मा को परमात्मा की सन्तान भी बोला जाता है । आत्मा और परमात्मा के इस अटूट रिश्ते को जरा खुलकर समझा दीजिये ।
ये आत्मा परमात्मा का अंश किस प्रकार से है ? क्या आत्मा और परमात्मा का रिश्ता हमेशा से यानि अनादि काल से है और हमेशा ही रहेगा । मतलब सदा ही रहेगा (बेशक संसार या महा संसार भी न रहे)
क्योंकि ये दुनियावी जिन्दगी वास्तव में कितनी अजीब है । हर शरीर के अन्दर आत्मा ही है । आत्मा के होने से ही शरीर की होन्द है वरना तो सिर्फ़ लाश है । जो आत्मा के बिना 72 घन्टों बाद सङने और बदबू मारने लग जाता है । सबके अन्दर विराजमान आत्मा का असली स्वरुप तो सबका एक जैसा है ।
लेकिन अन्तःकरण और जमा हो चुके कर्मों के कारण सबकी बाहरमुखी स्थिति (स्थूल शरीर, घर परिवार, दुख सुख आदि) बिलकुल अलग अलग हैं । दुनियावी जिन्दगियाँ भी रहस्यमयी नाटक की तरह ही हैं । आज अगर कोई बाप बेटा है, क्या पता अगले जन्म में वो दोनों दोस्त रूप में मिलें । अगर कोई भाई बहन है, क्या पता अगले जन्म में बाप बेटी के रुप में मिलें आदि आदि ।
6 ये भी बतायें कि - सनातन और पुरातन का मतलब 1 ही है ? या दोनों के मतलब मे कुछ फ़र्क भी है ? आत्मा को सनातन कहा गया है, क्या आत्मा सचमुच सनातन है कैसे ?
7 आखिर में 1 बात और पूछनी है (जिज्ञासावश) ये जो प्रेत कहानियाँ लिखते है । क्या वाकई ये सच्चाई पर अधारित हैं ? क्या ये कोई कल्पना वगैरह तो नहीं । अगर ये बातें या तथ्य या सब जानकारियाँ (जो प्रेत कहानियों में लिखते हैं ) सच हैं तो फ़िर तो ये वाकई हैरत में डालने वाली बात है । मैं तो सोच कर हैरान हूँ कि (प्रसून जी जैसे) जिन साधकों का प्रेत कहानियों मे जिक्र करते हैं । वैसे साधक तो सच में बहुत निडर, हिम्मत और हौसले वाले होंगे । क्योंकि लोग तो प्रेत का नाम सुनते ही डर से कांपने लगते है ।
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व्यक्ति के शरीर की सुन्दरता उसके सुन्दर विचारों से होती है । पिछले जन्मों के उच्च संस्कारों से भी होती हैं । चेहरा मन का दर्पण होता है ।
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1 पिछ्ले लेख में मैंने पूछा था कि - सत्य क्या है  ? तब आपने कहा था कि - तुम हमेशा हो - ये सत्य है मैं (आत्मा) वास्तव में अनादि और अविनाशी हूँ । इस बारे में जरा अधिक से अधिक खुलकर बताईये ।

उत्तर - वैसे इसका उत्तर ब्लाग में कई रूपों में मौजूद है पर दिव्य प्रकाश युक्त आत्मा (मूल मन) अनादि और अविनाशी है । इसमें इच्छा पैदा होने से मन अंतःकरण आदि उपकरण जुङने से जीव भाव जुङ जाता है तो अपने उस भाव के अनुसार ये जीवन जीती है ।
इस जीवन रूपी यात्रा में घर परिवार सम्बन्धियों का संयोग वियोग (मिलना बिछुङना) और घरों का बदलना जारी रहता है पर इंसान अपने मूल में वैसा ही है ।
ऐसे ही आत्मा मन के द्वारा अनन्तकाल से झूठे मिथ्या संस्कार वश बने सम्बन्धों का खेल खेलती आ रही है पर मूल रूप में ज्यों की त्यों है । आत्मज्ञान हो जाने पर स्थिति भिन्न हो जाती है । अज्ञान में जीवात्मा इस सबको सच मानती है पर आत्मज्ञान होने पर ये सिर्फ़ एक खेल है ।
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2 मुक्त विरोगी होना असल में क्या होता है । जरा खुलकर बताईये ।
उत्तर - अक्षर (ज्योति) जिस पर सभी योनियों के शरीर बनते हैं । योग में इस स्थिति को प्राप्त कर लेना ‘मुक्त विरोगी’ होना है । यहाँ पहुँचा साधक 84 लाख योनियों से मुक्त तो हो गया पर विरोगी  यानी यहाँ से आगे न जा पाने वाला साधक ‘आत्मा परमात्मा’ को नहीं जान सका । ऐसे साधक को स्थिति अनुसार कोई उच्च उपाधि प्राप्त हो जाती है ।
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3 आपने कहा था कि - सिर्फ़ शरीर में नहीं बल्कि जहाँ पर भी चेतना नजर आती है वो आत्मा की ही चेतना होती है । इसको जरा और खुलकर समझायें ।
उत्तर - संसार में बिजली और अदृश्य में आत्मा की चेतना एक समान है । बिजली या अन्य उर्जा पदार्थ चेतना का प्रतीक रूप है । मोबायल की बैटरी से लेकर बङे बङे यन्त्रों में बिजली या अन्य उर्जा पदार्थ जिस तरह कार्य करते हैं । ठीक उसी तरह प्रकृति में कण कण में चेतन विद्यमान है । इसको बिना किसी साधना के खुली आँखों से चिलचिलाती धूप में कुछ देर तक देखने से चमकते उज्जवल सफ़ेद चेतन अणुओं के रूप में देखा जा सकता है ।
अपने कमरे की खिङकी आदि से आती धूप में उङते हुये त्रसरेणु (धूल जैसे कण) को देखने से भी कण कण में समायी चेतना का एक रूप दिखायी देता है । सूर्य की किरणों का फ़ैलना, वायु का चलना, पेङ पौधों आदि सभी जीवधारियों का घटना बढ़ना, पर्वत पहाङ आदि का बढ़ना घटना, नदियों का बहना ये सब चेतना से ही संभव है । चेतना का एक अर्थ ही गति है ।
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4 अगर हम किसी सच्चे सन्त से नामदान ले लें तो जब शरीर त्यागने का समय आये तो उसे कौन लेने आयेगा ? क्योंकि अक्सर तो सुना है कि - निगुरे लोगों को यमदूत ही लेने आते हैं ।
उत्तर - यह सच है (बिना सतनाम दीक्षा वाले) निगुरे अपने कर्म कारणादि वश मार खाते हुये ही जाते हैं चाहे प्रथ्वी पर जीवन में उनकी स्थिति राजा के समान ही क्यों न हो । सगुरा के पास यमदूत तो क्या उनके पिता भी नहीं फ़टक सकते ।
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5 हमें या हम सबको (यानि सब आत्माओं को) परमात्मा का अंश भी बोला जाता है..दुनियावी जिन्दगियाँ भी रहस्यमयी नाटक की तरह ही हैं । आज अगर कोई बाप बेटा है क्या पता अगले जन्म में वो दोनों दोस्त रूप में मिले । अगर कोई भाई बहन है क्या पता अगले जनम में बाप बेटी के रुप में मिले आदि आदि ।
उत्तर - लेख बढ़ा हो जाने से इसका उत्तर अलग लेख में । वैसे आपने जो क्या पता ? कहा वो 100%  सत्य है मगर अगले जन्म में नहीं 84 भोगने के बाद ।
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6 ये भी बतायें कि - सनातन और पुरातन का मतलब 1 ही है ? या दोनों के मतलब मे कुछ फ़र्क भी है ? आत्मा को सनातन कहा गया है । क्या आत्मा सचमुच सनातन है । कैसे ?
उत्तर - सनातन का मतलब लगातार या हमेशा या शाश्वत और पुरातन का मतलब सिर्फ़ पुराना । आत्मा हमेशा रहती है और इसमें कोई भी कैसा भी परिवर्तन नहीं होता । इसलिये इसको सनातन कहते हैं ।
सनातन धर्म - यानी जो शरीर से जुङा हुआ धर्म है वही सनातन धर्म है । बाकी धार्मिक मान्यतायें व्यक्तियों गुरुओं समूहों वर्गों से स्थान आदि आधार पर जुङ गयी हैं । जिनका मूल सनातन धर्म से कुछ भी लेना देना नहीं है । इसका सबसे बङा सबूत सभी इंसानी शरीरों का एक सा होना चाहे वे किसी भी बनावटी धर्म के क्यों न हों ।
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7 आखिर में 1 बात और पूछनी है ...तो फ़िर तो ये वाकई हैरत में डालने वाली बात है..वैसे साधक तो सच में बहुत निडर, हिम्मत और हौसले वाले होंगे । क्योंकि लोग तो प्रेत का नाम सुनते ही डर से कांपने लगते है ।
उत्तर - प्रसून जैसे साधकों की जिन्दगी की मिलती जुलती झलक देखने के लिये आप Discovery पर ये दो प्रोग्रेम Man vs Wild और Survivor Man को देखिये । अगर आपने ये प्रोग्रेम अभी तक नहीं देखे हैं तो निश्चय ही आप इनकी फ़ैन हो जाओगे । शुरू में ये थोङा अजीब से लगेंगे लेकिन फ़िर आपको इनके सामने ये सीरियल आदि एकदम बेमजा ही लगेंगे । इनसे आपको बहुत कुछ सीखने को भी मिलेगा ।
Discovery पर कुछ और भी बहुत बेहतर प्रोग्रेम हैं । जिनका नाम शायद should not we alive तथा एक दो कार्यकृम और हैं जो आपको जिन्दगी की असल हकीकत बताते हैं ।
‘नगर कालका’ का केस मेरे सामने अभी पिछले 6 साल में 2 बार घटित हो चुका है ।
वैसे प्रेतों का सच इससे भी अधिक होता है । जब भी कोई साधक कुण्डलिनी या सन्तमत की दीक्षा लेता है तो बहुत से साधकों को शुरूआत में इन लोकों से जाना होता है । एक दो बार तो उसे भय लगता है फ़िर उसे मजा आता है । क्योंकि (दीक्षा होने के कारण) भूत प्रेत चुटकी बजाते ही भाग जाते हैं ।
कहने का मतलब ज्यादातर लोग साधारण जिन्दगी जीते हैं । वरना बिना साधना वाले ही एक से एक दुस्साहसी दिग्गज पङे हुये हैं । डर हमारे अन्दर एक भृम है ।
वास्तव में तो - डर के आगे जीत है ।
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