22 जुलाई 2011

परियाँ और फ़रिश्ते

हैलो सर ! हाउ आर यू ! आशा है । आपके यहाँ सब कुशल मंगल होगा । आपको ई-मेल करने को दिल तो बहुत करता है । लेकिन मेरे सर पर डबल जिम्मेदारी है । 1 तो कम्पनी की जाब । और दूसरा " मीरर " मैगजीन की असिस्टेंट हैड होने के नाते वहाँ की जवाबदारी भी मेरे उपर है । मुझे लगा । आप भी सोचते होंगे कि डाली मैडम अचानक कहाँ गायब हो गये । मैंने स्पेशल टाइम निकाल कर आपको ई-मेल किया है । मैंने आपके और नवरूप के ताजे सवाल जवाब पढे । मुझे खुशी भी हुई । और हैरानी भी कि नवरूप अभी सिर्फ़ 26 साल की है । लेकिन उसकी समझ कितनी गहरी हो चुकी है ।
वाकई राजीव जी ! आपका कहना ठीक था । लोगों को इन जैसी लडकियों से सीख लेनी चाहिये । इस आधार पर मेरे मन में 1 सवाल आया है । मेरा सवाल ये है कि क्या इसे भी सतसंग का नाम दिया जा सकता है ? जैसे नवरूप आपको कोई आत्मिक ग्यान वाला सवाल पूछे । और आप उसका जवाब दो । ये सवाल जवाब ब्लाग पर छ्पने के कारण और

लोग भी इसको पढ लेते हैं । कितने ही लोगों को बिना पूछे जानकारी मिल जाती है । जिनको कुछ नहीं भी पता होता । उनका भी ग्यानवर्धन हो जाता है । क्या ये भी 1 प्रकार का पुण्य या सतकर्म है ? 1 उदाहरण और लीजिये । रूप ने आपसे कितने सवाल जवाब ( मैंने वो वाले पुराने लेख समय निकाल कर पढ लिये थे ) उसे तो जानकारी मिली ही । साथ में और पाठकों को भी जानकारी और ग्यान मिला । साथ में उसने हम सबको बताया । हम लोग तो अपनी अपनी व्यस्त जिंदगियों में उलझे हुये थे । लेकिन रूप ही हम सबको यहाँ ले आयी । ऐसे कर्मों का क्या फ़ल है । क्या रब्ब ऐसे लोगों से खुश होता होगा । जाते जाते 1 सवाल का जवाब और दे दीजिये । लोग अपने बच्चों को परियों या फ़रिश्तों की कहानियाँ सुनाते हैं । क्या वाकई परियाँ होती हैं ? ये फ़रिश्ते कौन होते हैं ? क्या फ़रिश्तों का इशारा देवताओं की तरफ़ तो नहीं ?
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 ये सच है डाली जी ! आप लोग जब भी मुझे याद करते हो । वे भावनायें  वे अदृश्य तरंगे मुझ तक आती हैं । मैं उन्हें महसूस भी करता हूँ । और ऐसा नहीं है कि ये खास बात सिर्फ़ मेरे ही साथ हो । कोई भी इंसान जब भी किसी को सच्चे दिल से याद करता है । और जैसी भावना से याद करता है । वह भावना रूपी तरंग उस तक पहुँचती ही है । पर इस तरह की रिसीविंग के लिये जो रिक्वायरमेंट जरूरी होती है । वह हरेक के पास नहीं होती । बस इसलिये आम इंसान को अक्सर पता नहीं चलता ।
नवरूप जी की धार्मिक भावना देखकर मैं वाकई आश्चर्यचकित ही हो गया था । वह सिर्फ़ न जिंदगी को गहरे अर्थों

में जानती हैं । बल्कि उनके सवालों में भी आत्मिक टच और अध्यात्म की गहराई मौजूद होती है । ये बात मैं कई बार कह चुका हूँ । वह अपने उमर की नवविवाहितों के लिये आदर्श ही हैं ।
रूप कौर जी का जब भी जिक्र आता है । मुझे उनका भोलापन और सादगी और सरलता स्वतः याद आ जाते हैं । रूप कौर जी का ये गुण जहाँ उन जैसे किसी भी इंसान के लिये बेहद घातक हो सकता है । वहाँ किसी सच्चे साधु के संसर्ग में ऐसी आत्मा पहुँच जाने पर समर्पण भावना के कारण ऐसी आत्मा का आध्यात्मिक उत्थान भी बहुत जल्दी ही होता है । क्योंकि किसी भी प्राप्ति में समर्पण की अहम भूमिका होती है । और घातक इसलिये । क्योंकि किसी गलत आदमी पर सरलता से विश्वास कर लेने पर वो उसका गलत फ़ायदा उठाते हुये किसी भी प्रकार का छल भी कर सकता है
पर मैंने ये भी देखा है कि सीधे सच्चे इंसानों की प्रभु स्वयँ सहायता करते हैं । अतः ऐसा कम ही होता है कि कोई उनको किसी प्रकार से ठग सके ।

प्रभु की चर्चा परमार्थ की चर्चा किसी भी रूप में हो सतसंग ही कहलाती है । सतसंगी की भावना के अनुसार इसका पुण्यफ़ल भी बनता है ।
जब रूप कौर जी से सवाल जबाब हो रहे थे । तब मैंने उन्हें कहा था -
नाम लेयु और नाम न होय । सभी सयाने लेंय । मीरा सुत जायो नहीं शिष न मुंडयो कोय ।
यानी इस सतनाम की खासियत ही ये है कि - ये  हर तरह से आपको सुखी और नामवाला बनाता है । आज आप लोग देख सकते हैं । महज 1 साल के अंदर रूप कौर जी ( लगभग ) विश्व प्रसिद्ध हैं । मेरे पास जो प्रतिक्रियायें आती हैं । उस आधार पर बता रहा हूँ । सभी उनके विचारों का सम्मान करते हैं ।
दूसरे मैं ये भी पहले ही कह चुका हूँ कि रूप कौर जी ने इतने से ही बहुत पुण्य कमा लिया । अब जैसे ही ये पौधा बङा होकर वृक्ष बनेगा । उस पर फ़ल आना शुरू होंगे । उनको फ़ल ( लाभ ) मिलने लगेगा।


दूसरे यदाकदा जब भी रूप कौर जी मुझे मेल करती हैं । उन्होंने स्वीकार किया है । उनमें बहुत परिवर्तन हो गये हैं । बहुत सी कठिनाईयाँ अब उन्हें महसूस नहीं होती ।
रब्ब ऐसे लोगों से सिर्फ़ खुश ही नहीं होता । बल्कि उनके दिलों में ही वास ( रहना ) करने लगता है । ये बातें आस्ट्रेलिया वालों को उनके पहुँचने पर खुद पता चल जायेंगी ।
क्या वाकई परियाँ होती हैं - कितनी अजीव बात है । अगर आपने रूप कौर जी का इस मेल में जिक्र न किया होता । तब मैं इसका उत्तर अन्य तरह से देता । पर अब इसी उदाहरण से दूँगा । जो आपको आसानी से समझ भी आयेगा ।
रूप कौर जी में जो भी गुण भाव स्वभाव etc मैटेरियल है । यह परी या अप्सराओं वाला ही है । बस उनके किसी पुण्य सतकर्म से उनका वास्ता आत्मग्यान से हो गया । अतः अब वो इस श्रेणी से ऊपर उठ जायेंगी । इसके विपरीत वह किसी द्वैत ग्यान से जुङ जातीं । तो फ़िर उनका परी या अप्सरा बनना तय था । इसके अलावा वह किसी भी ग्यान से न जुङती । तब ये सब व्यर्थ ही चला जाता ।
परियाँ और अप्सरायें लगभग समान होती हैं । कभी आपने कहावत टायप में यह सुना होगा - इन्द्र की परी । परियाँ वैसी ही होती हैं । जैसी कहानियों में वर्णन की जाती हैं । अतः यह विस्तार से बताना बेकार ही है । लेकिन परी या अप्सरा बनती कैसे है ? यह लगभग कोई नहीं जानता ।
कोई भी लङकी सुन्दर सरल भोले विचारों वाली हो । और दूसरे अपने विचार और संस्कार के कारण उसका मुखमंडल और सम्पूर्ण देहयिष्ट इतनी सुन्दर हो कि - सब देखते रह जायें । और उसे अपनी इस सुन्दरता का

अहसास भी हो । उसमें दूसरों के प्रति सहायता भाव । करुणा । दया । सहानुभूति आदि सदगुण भी हों । लेकिन ?? स्वर्गिंक भोगों की अभिलाषा और मुक्त स्वछन्द काम भोगों की चाह भी उसके अन्दर हो । तब इस सबके बाद प्रभु भक्ति की पूरी श्रद्धा भी उसके ह्रदय में हो । यह सब बातें जब मिल जाती हैं । तब एक परी या अप्सरा का निर्माण होता है । इसी नियम से जीवन गुजार लेने पर देह अन्त पर वह परी बन जाती है ।
लेकिन ठीक इन्हीं गुणों वाली लङकी जब आत्मग्यान को प्राप्त होती है । तो वह सुन्दर हँसिनी ( आत्मा का एक बेहद सुन्दर रूप । जिसका प्रकाश 16 सूर्य के बराबर होता है । ) बनती है ।
अगर वह मीरा जी की तरह भक्ति कर लेती है । फ़िर वह मुक्त आत्मा हो जाती है । उसकी डिटेल शब्दों में बताना असंभव है । वह परम शक्ति रूपा होती है ।
 ये फ़रिश्ते कौन होते हैं - फ़रिश्ते वास्तव में द्वैत भक्ति वाले सिद्ध पुरुष या तांत्रिक ही होते हैं । बस अन्तर ये होता है कि इनमें दया गुण सहायता भाव इन्हें फ़रिश्ते उपाधि दिला देता हैं । क्योंकि दूसरे सिद्ध पुरुष या तांत्रिक अलग स्वभाव के भी हो सकते हैं ।
परी या फ़रिश्ते दोनों ही अपनी अपनी क्षमता अनुसार दुखियों की सहायता करते हैं । कैसे ? ये सब ज्यादातर कहानियों में आता ही है । ये शरीर बनाकर प्रकट रूप अपना काम कर जाते हैं । और फ़िर अपने सूक्ष्म रूप में चले जाते हैं ।
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