15 जुलाई 2011

बृह्माण्ड का शाब्दिक अर्थ क्या है ? - टीना ग्रेवाल

हैलो सर ! मेरा नाम टीना ग्रेवाल है । मैं अनीता गोयल जी की छोटी बहन हूँ । मैं दिल्ली में रहती हूँ । मुझे उन्होंने आपके बारे में कुछ समय पहले ही बताया था । वैसे तो हम दिल्ली में ही सेट है । लेकिन दुबई भी आते जाते रहते हैं ।
मैं आपके पास पहली मुलाकात के साथ साथ 1 प्रश्न भी लेकर आयी हूँ । 
मैं जानना चाहती हूँ कि - बृह्माण्ड का शाब्दिक अर्थ क्या होता है ? बृह्म + अण्ड इस बात को जरा खु्लकर समझा दीजिये ।

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नमस्कार टीना जी ! सुस्वागतम ! सत्यकीखोज पर आपका बहुत बहुत स्वागत है । आपसे मिलकर हार्दिक प्रसन्नता हुयी । आपने बहुत संक्षिप्त में मगर बहुत बङा सवाल पूछा है ।
 तो चलिये । आपके साथ  बातचीत की शुरूआत करते हैं ।
- अण्ड का तात्पर्य अण्डे से ही है । वास्तव में यह विशाल बृह्माण्ड अण्डाकार ही है । और सभी सृष्टि इसी विशाल अण्डे में ही है । सभी सृष्टि से तात्पर्य सूरज चाँद तारे आदि सभी कुछ इसी में ही है ।
अखिल सृष्टि की संरचना को वैसे थोङे शब्दों में समझाना कठिन है ।
यह पूरी सत्ता सृष्टि आदि कृमशः - विराट । ईश्वर । हिरण्य़गर्भ ..इन तीन ढाँचों पर निर्मित है । इसमें सबसे ऊपरी भाग - विराट । मध्य का भाग - ईश्वर । और

उसके भी अन्दर - हिरण्य़गर्भ है । इसी हिरण्यगर्भ पुरुष में सभी जीवों की स्थिति है । विराट का आकार ठीक मनुष्य शरीर जैसा ही है ।
- यहाँ मैं एक बात और भी स्पष्ट कर दूँ । जो मैंने बङे बङे विद्वान टीकाकारों की पुस्तक में देखा है । वे लोग ईश्वर शब्द को बहुत लोकप्रिय होने से ईश्वर को विराट से बङा समझते हैं । जबकि यह पूरी तरह गलत है ।
- इसी विराट पुरुष में अनगिनत खण्ड बृह्माण्डों लोक लोकान्तरों की सृष्टि है । विराट को बहुत कम योगी आदि जान पाते हैं । ईश्वरीय बेस से ही पार हो पाना बेहद कठिन बात होती है । इसीलिये ईश्वर शब्द बहुत लोकप्रिय है । और प्रायः लोग ईश्वर भगवान प्रभु मालिक परमेश्वर आदि शब्दों में फ़र्क नहीं कर पाते । वास्तव में यह सब आत्मा की विभिन्न स्थितियाँ और फ़िर उनसे बनी उपाधियाँ ही हैं ।
मूल चेतन शक्ति आत्मा और परमात्मा ही है ।
महाकारण को पारबृह्म कहते हैं ।
शून्य 0 में हमेशा अदृश्य सूक्ष्म तत्व विचरण करते रहते हैं । या गतिशील हैं ।
स्त्री पुरुष द्वारा फ़ल भोजन आदि खाध्य पदार्थ खाने से उनमें मिले हुये ये सूक्ष्म तत्व पेट के अन्दर घनीभूत हो जाते हैं । पदार्थ का स्थूल भाग विभिन्न मलों के रूप में शरीर से बाहर निकल जाता है । और इस पदार्थ के शरीर के अन्दर एकत्र हुये सूक्ष्म तत्व पुरुष के अन्दर वीर्य और स्त्री के अन्दर रज रूप में एकत्र हो जाते हैं ।
इसी रज के और भी घनीभूत होने पर अण्डा बनता है । और वीर्य के घनीभूत होने पर चेतन शुक्राणु बनता है । दोनों के संयोग पर पिण्ड या इंसानी शरीर बनता है । इसलिये पहले अण्ड बना । फ़िर चेतन के संयोग से वह पिण्ड बना ।
जीव जब तक वासना से लिपटा हुआ है । तब तक वह जीव है । ग्यान द्वारा हिरण्यगर्भ में प्रवेश पाने पर वह ईश की उपाधि को प्राप्त हो जाता है ।
ईश से ऊपर उठने पर वह कारण में पहुँचता है । जहाँ विभिन्न जन्मों के संस्कार बीज जमा है । जो आगे ( जन्मों में ) जमने पर उत्पन्न होने वाले हैं । योग अग्नि द्वारा इन्ही को जलाकर भून दिया जाता है । तब वे निर्वीज हो जाते हैं ।

कारण से ऊपर उठने पर " महाकारण " आता है । यहाँ आकर आत्मा को बोध होता है - अहं बृह्मास्मि ।
मैं ही बृह्म हूँ । ये सब खेल मेरे द्वारा ही हो रहा है । महाकारण में सृष्टि की विभिन्न गतिविधियाँ क्यों है ? यह सभी बातें मौजूद हैं ।
महाकारण से ऊपर परमात्मा आत्मा है । उनमें यह सब कोई बात नहीं हैं
विशेष - जिस प्रकार स्त्री पुरुष के सयोंग से पिण्ड शरीर ( बच्चे ) का निर्माण होता है । ठीक उसी प्रकार शून्य 0 में विचरण करते सूक्ष्म तत्व - चेतन ( पुरुष ) और प्रकृति ( स्त्री ) के संयोग से अण्ड पिण्डों का निर्माण करते हुये विभिन्न सृष्टि करते हैं ।
कहने का मतलब स्त्री पुरुष द्वारा बच्चे का पैदा होना । और इस सृष्टि की निर्माण प्रक्रिया एकदम समान है । पर एक स्थूल और दृश्य है । तो दूसरा सूक्ष्म और अदृश्य है ।
जिस प्रकार एक पेङ पर बनते छोटे बङे हजारों फ़ल एक ही तरीके से बनते बिगङते ( खत्म होना ) रहते हैं । उसी प्रकार जो निर्माण क्रिया अदृश्य विराट में हो रही है । ठीक वही निर्माण क्रिया एक बच्चे के जन्म से लेकर मुत्यु तक होती है ।
यह सभी बृह्माण्ड निकाय ( नगर ) माया के परदे पर निर्मित है । इस तरह बृह्म का अर्थ " महाकारण " और " अण्ड " का शाब्दिक अर्थ अण्डे से है ।
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