20 मार्च 2014

अनहद नाद सुनने के लाभ

प्रश्न 11 - क्या अवतार के भी अवतार होते हैं ?
- हाँ अवतार के भी अवतार होते हैं लेकिन ये इस पर निर्भर है कि स्वयं उस अवतार या दिव्य शक्ति की क्षमता क्या है ? सरलता से अवतार का मतलब ऐसे समझो । जैसे एक प्रभावशाली और अधिकारी व्यक्ति एक या दस या सौ लोगों को स्व हस्ताक्षरित कागज पर अपनी क्षमता के अन्दर कोई भी कार्य लिख दे तो सम्बन्धित जगह वह कार्य होगा ही । जैसे कोई व्यक्ति अपने ए टी एम कार्ड से जमा राशि के आधार पर कुछ भी सेवायें प्राप्त कर सकता है । मैंने कई बार बताया । शक्ति और धन और अधिकार इनकी लङाई आत्म क्षेत्र में भी काफ़ी ऊपर तक है । जबकि द्वैत का तो सर्वोच्च पद भी सिर्फ़ इन्हीं तीन पर निर्भर है । जहाँ कोई भी जीवात्मा कृमशः ज्ञान स्थिति द्वारा निरुपाधि निरस्थिति निःअक्षर हो जाता है । वहाँ ये सब समाप्त हो जाता है । फ़िर वह सब कुछ होते हुये भी कुछ नहीं होता । एक बार ऐसा हो जाने पर वह स्वेच्छावश किसी भी सृष्टि स्थिति में रूप धरना चाहे । उस पर कोई नियम लागू नहीं होता । क्योंकि वह पूर्ण ज्ञान स्थिति में होता है ।
प्रश्न 12 - सूक्ष्म शरीर हमारे स्थूल शरीर की नाभि से एक पतले तंतु रजत रज्जू से जुड़ा होता है । ये रजत रज्जू क्या होता है ?
- वास्तव में हमारे शरीर की सभी यानी बाल से भी महीन नाङियों में एक विद्युत धारा बहती है । खास मस्तिष्क में तो ये विशेष रूप से दौङती रहती है । जो मूल चेतना का दैहिक ऊर्जा रूपांतरण है । तो रजत चांदी से और रस्सी रज्जु से कहा जाता है । अब रजत को समझो । ये दरअसल आसमानी बिजली की चमक की एक अति क्षीण से क्षीण किरण को रजत रज्जु कह सकते हैं । र कहते हैं चेतना (शरीर ऊर्जा) को । ज कहते हैं जङता (चेतना रहित शरीर) को और त कहा गया है , इन दोनों की संयुक्त स्थिति को । 
तो ये सच है कि इसी बेहद चमकीले धवल प्रकाश की किरण के बेहद बारीक से अति क्षीण तन्तु डोरी से सूक्ष्म शरीर से स्थूल शरीर संयुक्त होता है लेकिन ध्यान रहे कि इसको रज्जु डोरी आदि कहा अवश्य जाता है । पर किसी भी विद्युत धारा के समान ये डोरी वगैरह कुछ नहीं होती । जैसे कि विद्युत धारा भी किसी धारा या डोरी के समान ही मानी जा सकती है । किसी प्रकाश किरण का भी कोई पदार्थिक या भौतिक अस्तित्व मानने को बाध्य होना पङता है  पर यथार्थ में क्या इनका कोई ऐसा अस्तित्व होता है ? यही बेहद बिडंवना
है । यही बेहद अजीब खेल है कि कोई चीज जितनी है भी और उतनी ही नहीं भी है ।
प्रश्न 13 - अगर कोई योगी सूक्ष्म शरीर से यात्रा करे तो क्या ये रजत रज्जू टूटने का खतरा भी रहता है ? और अगर टूट जाये तो क्या मृत्यु भी हो सकती है । 
- जो योगी सूक्ष्म शरीर से यात्रा कर सकने की स्थिति में होगा । उसने इससे पहले कितनी ज्ञान यात्रा कितना अभ्यास किया होगा ? तब यहाँ पहुंचा । क्या लालाराम हलवाई को अंतरिक्ष यात्रा हेतु नासा के अंतरिक्ष यान में भेजा जा सकता है ? कोई भी योगी ही तब बन पाता है । जब इस तरह के शिक्षण प्रशिक्षण से गुजर कर सफ़लता पूर्वक पार हो जाता है । अतः ऐसा होना संभव ही नहीं । अतः फ़िर कोई खतरा नहीं होता ।
क्योंकि - डर के आगे ही जीत है ।

प्रश्न 14 - अनहद नाद सुनने से क्या लाभ है ?
- अनहद नाद यानी निःअक्षर से प्रेरित चेतित अक्षर की विभिन्न स्थितियां विभिन्न मंजिलें । इसी से सृष्टि प्रतिपल सृजित और क्षरण भी हो रही है । प्रतिपल निर्माण और विध्वंस भी इसी से हो रहा है । तब इस अनहद नाद मूल ॐकार का भी मूल ररंकार को सुनना कितने प्रकार के लाभ दे सकता है । वर्णन असंभव है । 
क्योंकि इससे पूरी सृष्टि को खुद को भी न सिर्फ़ जाना जा सकता है वरन नियन्त्रित भी किया जा सकता है । ध्यान रहे सृष्टि शब्द में सिर्फ़ प्रकृति ही नहीं । सभी महा शक्तियां दिव्य शक्तियां आदि भी आ जाती हैं । क्या आप भौतिक जगत के ही बिजली सूर्य वायु जल वनस्पति आदि से लिये जा सकने वाले लाभों को बता सकते हैं ? या कितने लोग इन सम्पदाओं का पूर्णरूपेण लाभ ले पाते हैं ? सच में न के बराबर ।
प्रश्न 15 - ऐसी कौन सी साधनां है । जिनमें ईश्वर से (ध्यानवस्था) में बात की जा सकती है ?
- यहाँ मेरे लिये ईश्वर शब्द से क्या तात्पर्य है । ये समझना बेहद कठिन है । क्योंकि दिव्य सृष्टि में तो ईश्वरों की भरमार ही है । हाँ आपने जो भी इष्ट जो भी मन्त्र जो भी तन्त्र जो भी ज्ञान जो भी गुरु धारण किया है । उसके सफ़लता पूर्वक सिद्ध हो जाने पर उस इष्ट या ईश्वर से अवश्य बात की जा सकती है और सच तो ये है कि सिद्ध हो जाने के बाद किसी ध्यान अवस्था की भी आवश्यकता नहीं । क्योंकि सिद्ध होने का मतलब ही है । एक हो जाना । उससे मिल जाना ।
प्रश्न 16 - कागभुसुंडि कौन है ?
- कागभुसुंडि एक ऋषि हुये हैं । वैसे ये एक ऋषि उपाधि भी है । ये एक शरीर का क्रिया अंग भी है । गले में काग का स्थान ही कागभुसुंडि का स्थान है । काग कौये को और भुसुंडि सूंड को कहा जाता है । गले के काग का आकार किसी सूंड के समान ही होता है । ये जीवात्मा की एक प्रकार की योग यात्रा का रूपक भी है । कागभुसुंडि के बारे में तुलसी के रामचरित मानस के उत्तर कांड में विस्तार से पढ सकते हैं ।
प्रश्न 17 - क्या हैं (धुनात्मक नाम) को निःअक्षर कह सकते हैं ?
- निःअक्षर या सार शब्द एक ही बात होती है और ये ही सृष्टि के किसी भी ज्ञान या आत्मज्ञान की सर्वोच्च उपलब्धि है । यह ध्वनि निरंतर सुनाई नहीं देती । बल्कि प्रकट होती है । तब जब मन या जीव विचार शून्य ही नहीं । सृष्टि शून्य भी हो जाता है । वास्तव में यही सार शब्द असली परमात्मा से मिलाता है । बाकी निरंकार ररंकार हंग छंग आदि की ध्वनियां प्रकट होने के बाद निरंतर सुनाई देती रहती हैं । जिनमें सोऽहंग सबसे स्थूल है । जो बिना किसी दीक्षा बिना किसी ज्ञान के थोङे ही प्रयास से सांसों पर ध्यान देने से सुन सकते हैं ।
प्रश्न 18 - क्या सभी परमहंस वाले गुरु संतमत वाले होते हैं ?
- असल में गुरु, सदगुरु, ऋषि, महर्षि आदि आदि सनातन ज्ञान उपाधियों का आजकल पाखंडियों ने मतलब ही बदल कर रख दिया है । हंऽस या हंऽसो क्योंकि शुद्ध (जीव) आत्मा ही है और वास्तविक आत्मज्ञान सिर्फ़ सन्तमत से ही संभव है । अतः शुद्ध रूप में कहा जाये तो परमहंस वाले सन्तमत के ही हुये पर बाद में समतुल्य स्थितियों में कुन्डलिनी आदि द्वैत ज्ञान में भी लोगों ने परमहंस शब्द जोङ दिया । 
परमहंस का मतलब हंस जीवात्मा की स्थिति परमात्म क्षेत्र में है और ये स्थिति पूरी हो जाने पर आगे और भी स्थितियां हैं पर एक मूल भाव में हंस परम को प्राप्त हो गया । यानी परमात्मा को जान लिया । तब ऐसे लोगों को सदगुरु या परमहंस ही भी कह देते हैं ।
प्रश्न 19 - आपके यहाँ आज्ञा चक्र के अलावा बाकी चक्र क्यों नहीं जाग्रत करते ?
- आपने समझने में भूल की है । सहज योग लय योग है यानी इसमें अखिल सृष्टि के सभी योगों का लय होता है । इसको ऐसे भी कहा जाता है -
जिसको जान लेने पर सब जाना हुआ हो जाता है । हे श्वेतकेतु ! तूने उसको जाना ? 
तो कहने का अर्थ हमारे मंडल में भृंग गुरु और विहंगम योग का तरीका है । इसलिये आज्ञा चक्र जाग्रत करते ही कुन्डलिनी और नीचे के सभी चक्र स्वतः जाग्रत हो जाते हैं । जो उस शिष्य साधक को आगे अनुभव में आते हैं । अच्छे पात्र साधकों को हमारे यहाँ शीघ्र ही `कारण शरीर' से जोङ दिया जाता है । तब वह जन्म जन्मांतरों से संचित आवागमन और बारबार जन्म के कारणों को योग अग्नि से जलाकर मुक्त होने की ओर तेजी से बढता है ।
प्रश्न 20 - आज्ञा चक्र जाग्रत करने के बाद उसी समय से रोज रोज अशरीरी जैसे भूत प्रेत खुली आँखों से दिखने लगेंगे ?
- आज्ञाचक्र ज्ञाग्रत होना या तीसरी आंख खुलना एक ही बात है लेकिन शुरूआत में साधक को जब आज्ञाचक्र पर ध्यान टिकने का अभ्यास और अंतःकरण मलिन वासनाओं से स्वच्छ होने लगे । तब ऐसी स्थिति होती है । और इसके साथ अधिकाधिक समय योग को दिया जाय लेकिन जो साधक निरन्तर अभ्यासी है । वह ध्यान करते समय यदि संस्कारवश या कारणवश किसी ऐसे स्थान पर हैं । जहाँ ऐसे अशरीरी प्रेतादि मौजूद हैं । तो वह दिखते हैं और उसी समय साधक आंखें खोल ले और भले ही अर्द्ध ध्यान जैसी अवस्था हो । तो वह स्थान और वे छायायें या अशरीरी आदि उसी स्थान पर खुली आंखों से भी दिखेंगे ।  
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