30 जुलाई 2012

कृपा प्राप्ति का सरलतम मार्ग क्या है ?


श्री सदगुरु महाराज जी की जय । पूछने को बहुत कुछ है महाराज । पर आपके ब्लॉग पर जानकारी के खजाने खुले हुए हैं । आवश्यकता है । तो केवल खंगालने मात्र की । बाकी कोई शंका वगैरह होती है । तो आप श्री की फोन द्वारा कृपा उपलब्ध है ही । महाराज ये कृपा शब्द का आजकल के तथाकथित गुरु लोग बड़े धड़ल्ले से प्रयोग कर रहे हैं । तथा शब्द के इतने प्रचलन से मुझ आलसी और निक्कमे पर बहुत गहरा असर हुआ है । कृपा कर इस कृपा शब्द का शाब्दिक और तात्विक अर्थ बताने की कृपा करें । तथा यह भी कि इस कृपा के प्रमुख घटक क्या क्या हैं । इसकी प्राप्ति का सरलतम मार्ग क्या है ?
दूसरा - एक सच्चे शिष्य के क्या क्या गुण होते हैं । शिष्य का आचरण तथा व्यवहार अपने घर पत्नी तथा बच्चों के प्रति कैसा होना चाहिए । हम प्राय 


सदगुरु के बारे में पूछते है कि सदगुरु के कौन कौन से गुण होते हैं ? परन्तु आप बतायें कि - सदगुरु अपने शिष्य में किन गुणों की आशा रखते हैं ( यदि कोई आशा न भी रखते हों तो भी ) उनका प्रिय बनने के कारक कौन कौन से हैं ? आपकी अति कृपा होगी ।
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आजकल के नकली ( झूठे । ज्ञान से रहित । सिर्फ़ भेष धरे ) कतली ( कत्ल आदि करके बाबा भेष में छुपे ) फ़सली ( कुम्भ । एकादशी । दशहरा आदि धार्मिक पर्वों पर गेरुआ पहन कर धन कमाने हेतु बाबा बने ) बाबाओं ने कृपा शब्द का बेहद गलत प्रयोग करते हुये लालची और वासनाओं की गन्दगी में बिजबिजाते कीङे के समान कुमार्गी मनुष्य को और भी पथ भृष्ट कर दिया है । आप थोङा भी विचार करें । तो कृपा शब्द के अनेक भावों में एक प्रमुख भाव ये भी है कि - आप कितनी भी गलतियाँ करें । भगवान आपके सभी अपराध क्षमा कर देता है । जैसा कि - ईसाई पाप करो । और कनफ़ेसन कर लो । जैसा फ़ार्मूला लेकर चलते हैं । प्रार्थना कर दो भाई ! भगवान का बेटा ? सब माफ़ करा देगा ।
सोचिये । कृपा या दया याचना आपको हमेशा ही कमजोर बनाती है । अभी की नहीं कह सकता । पहले परीक्षाओं में कृपांक देने का चलन था । यदि परीक्षार्थी 1-2 अंकों से फ़ेल हो रहा होता था । तो साल बचाने हेतु 1-

2 अंको की कृपा कर दी जाती थी । कोई डिवीजन में भी घुमा फ़िराकर ऐसी कृपा हो जाती थी । यानी आप 98% पूर्ण थे । 1-2 % की कमी थी । वो योग्यता अनुसार आगे पूरा कर लेंगे । इस स्थिति में तो बात ठीक भी लगती है । पर एकदम फ़िसड्डी नालायक गंवार छात्र पर कृपा करना एक तरह से उसके साथ घोर अन्याय ही करना है । तब ठीक यही है कि वह अपने साथियों को आगे बढता देख पछताये । और जी तोङ अथक मेहनत करने को प्रेरित हो । अब विचार करें । तो कृपा न करके रूखा कठोर और उसकी स्थिति अनुसार उचित व्यवहार करना ही उस पर असली कृपा हुयी । वह आगे के लिये बहुतों के लिये उदाहरण भी बना । 
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यहाँ तक 2 aug 2012 को लिखा था । कल 3 aug 2012 शाम 4 बजे हमारे एक शिष्य का फ़ोन आया । उनके

परिवार में एक 33 वर्ष की अविवाहित लङकी है । उसे अजीव बीमारी है । शरीर के किसी भी भाग में हाथ पैर रीङ सिर पेट आदि में यकायक असहनीय दर्द होने लगता है । इसके अलावा सभी सामान्य है । बीमारी बहुत छोटी उमृ से ही है । अतः घर वालों ने शादी भी नहीं की । लङकी गरीब घर से है । वे इलाज नहीं करा सकते । उनके एक सम्पन्न रिश्तेदार ( भाई ) ने अपने पास रख लिया है । धीरे धीरे 4 लाख रुपया ( अब तक ) खर्च हो गया । कल ही फ़ोन करने से पूर्व 6500 के टेस्ट हुये । डाक्टरों ने काफ़ी खून ही टेस्ट हेतु निकाल लिया ।
- समझ में नहीं आता । फ़ोन कर्ता ने कहा - पैसे का दुख नहीं होता । पर लङकी जब दर्द से तङपती है । तो हमसे ठीक से ( उसका दुख देख कर ) खाना भी नहीं खाया जाता । डाक्टर हैरान है । अनेकों जाँच के बाद भी कोई रोग नहीं निकलता ।
फ़ोन कर्ता ने यह सब प्रसंग वश बताया है । यूँ ही औपचारिक बात छिङ गयी । उसका कोई उद्देश्य नहीं । उसे

अगले क्षणों की कोई कल्पना नहीं । वैसे सुनते सुनते ही मुझे समझ आ गया । यह पाप कर्म का भोग संस्कार है । इसकी दवा नहीं हो सकती । रोग संस्कार की ही दवा हो पाती है । भोग की कभी नहीं ।
आज मौसम अच्छा है । मैं खिङकी से बाहर हरियाली देख रहा हूँ । आसमान में बादल छाये हुये हैं । मैं फ़ोन पर लङकी का विवरण सुन रहा हूँ । खिङकी से बाहर 200 फ़ुट दूर ऊँचाई पर एक बहुत बङा दायरा सा बन गया है । जिसमें लङकी एक सफ़ेद कुत्ते को मारती नजर आ रही है । मैं उत्सुकता से वह सब देखता रहता हूँ । हालांकि मेरे लिये इसमें कुछ भी नया और दिलचस्प नहीं है ।
करीब 20 मिनट हो गये । फ़ोन कभी का कट चुका है । मैं सोच रहा हूँ - बताऊँ । या ना बताऊँ । फ़िर जाने क्यों मन नहीं मानता । विवश हो जाता हूँ ।
- ये लङकी । आखिर मैं फ़ोन मिलाकर कहता हूँ - पूर्व जन्म में कुत्तों को बहुत मारती थी । हमारे सम्पर्क में आने वाले कुत्ते अक्सर हमारे पूर्वज होते हैं । वे अपना संस्कारी कर्जा लेने आते हैं । दुर्व्यवहार करने पर वे सम्बन्धित

व्यक्ति को बददुआ या शाप दे देते हैं । ये दैविक ( पुरखों की ) बाधा है । डाक्टरी दवा काम नहीं करेगी । आप लङकी के हाथ से सफ़ेद कुत्ते को जब जब नजर आये । रोटी खिलाने को कहें । सफ़ेद कुत्ता न होने पर कैसे भी रंग के कुत्ते को खिला दे । वैसे अब तुम टेंशन फ़्री हो जाओ । फ़ायदा अभी से हो जायेगा । रोटी खिलायेगी । तब खिलाती रहेगी ।
- हैरानी है । हमारे मंडल का शिष्य बोला - अब मुझे कुछ कुछ समझ आ रहा है । मैंने अक्सर देखा । हमारे कई लोगों के साथ होने पर भी कुत्ते सिर्फ़ इसी को काटने दौङते । इसी पर भौंकते ।
उन्हें हैरानी थी । इतनी रहस्यमय लाइलाज सी बीमारी का इलाज सिर्फ़ 1-2 रोटी खिलाना । फ़िर शाम 7 बजे फ़ोन आया  - हाँ गुरुजी ! मैंने जब बताया । लङकी भी कह रही थी । वह जब अपने घर में थी । तब भी कुत्ता रोटी के लिये उसी के पास बार बार आता था । कुत्तों का उसके प्रति सामान्य से हट कर व्यवहार  था । पर कुछ समझ में नहीं आता था ।


अगर आगे की बात मैं स्पष्ट न करूँ । तो निसंदेह आपके दिमाग में मेरी छवि एक सुपरमेन एक शक्तिमान एक महागुरु या अलौकिक शक्तियों के ज्ञाता की बनेगी । पर वास्तव में मैं जानता हूँ कि - मैं एकदम 0 हूँ । ये दरअसल तंत्र का खेल है । ये एक tight बिज्ञान है । और मैं सिर्फ़ निमित्त हूँ । फ़ोन कर्ता हमारे यहाँ कुछ समय से शिष्य हैं । ऐसा कभी कोई जिक्र तक नहीं हुआ । न ही पहले मुझे कुछ पता था । ये शिष्य एकदम सात्विक प्रवृति के हैं । अच्छे भक्त हैं । लङकी बहुत समय से उनकी ( उनके परिवार सहित ) सेवा में है । ये लङकी इन्हीं के पूर्व जन्म के भाई की लङकी है । और इस जन्म में मौसी की लङकी । इस खेल की खास शुरूआत आज से 10 लाख वर्ष पूर्व । और बीच में एक पङाव 20 हजार वर्ष पूर्व । और अभी इस मनुष्य जन्म में ( बीच का समय अन्य 84 की योनियाँ ) हुयी । सोचिये । बीमारी कब की । और दवा कब हुयी ? लङकी के कुछ अच्छे संस्कारों से वह भक्त परिवार में ( रहने ) आयी । वह भक्त महाराज जी की शरण में आया । फ़िर मुझसे जिक्र हुआ । मुझे रहस्य और निदान प्रकट हुआ । फ़िर बताने की प्रेरणा हुयी । बताया । अब बताईये । उसकी इस अनोखी लीला में कृपा का कौन सा बिज्ञान कौन सा नियम आप तय करेंगे ? कोई भी कङियाँ आपको सीधे सीधे जुङती नजर आ रही हैं । ये मैंने बहुत संक्षिप्त में बताया । वरना केस के हर पहलू पर गौर करें । तो बहुत पेचीदा मामला है ।
अब आप पाप और भोग संस्कार का गणित बिज्ञान समझें । सिर्फ़ इसी जन्म को लें । तो 33 साल सजा भोगने के बाद यकायक ऐसा प्रसंग बना । और मुझे इलाज बताने का मौन आदेश सा हुआ । अन्य कुछ रहस्यमय क्रियायें घटित हुयीं । और सजा उसी क्षण समाप्त हो गयी । आगे क्या भविष्य होगा । सच कहूँ । तो मुझे भी कुछ पता नहीं । निसंदेह ही जनमानस की आम मानसिकता के अनुसार ( उसके परिचितों में ) इस बात की काफ़ी चर्चा होगी । मुझसे बिना पूछे ही वे मुझे सिद्ध अहा महा बाबा घोषित कर देंगे । जिसने लाख रुपये का इलाज 1-2 रोटी से और रोग बताते ही तुरन्त कर दिया । पर हकीकत में मुझे इसके अलावा कुछ नहीं पता ।
और ऐसी ( मेरी नहीं उसकी ) कृपा किसी किसी के साथ ही होती है । बल्कि कहना चाहिये । समय आने पर खुद होती है । इसलिये इसको कृपा कह भी सकते हैं । और नहीं भी कह सकते हैं । उसकी सेवा आदि कर्म से भोग क्षीण हुआ । समय आया । और 400 किमी दूर लङकी थोङी सी शेष औपचारिकता के बाद मेरे द्वारा लगभग रोग मुक्त हो गयी । जबकि उसने मेरा चित्र तक नहीं देखा । श्री महाराज जी के भी कभी दर्शन आदि नहीं । हमारी शिष्य भी नहीं । सच तो ये है । खुद मुझे पता नहीं था कि आज कुछ ऐसा होगा । सोचिये । कितना जटिल उलझा हुआ बिज्ञान है । जबकि कई लोगों से पूर्व में मैंने कहा - अभी तुम्हें 3 साल लग जायेंगे । श्री महाराज जी ने भी कहा - इसका अभी 15 साल संघर्ष का समय और है ।
सोचिये । अगर मनुष्य की सोच के अनुसार ? कृपा होती । तो निर्मल बाबा । कुमार स्वामी और अन्य बाबाओं के फ़ार्मूले के अनुसार तो सभी के वारे न्यारे हो जाते । फ़िर कर्म फ़ल के दण्ड विधान का कोई मतलब ही न था । जबकि श्री महाराज जी स्पष्ट कहते हैं - काया से जो पातक होई । बिन भुगते छूटे नहीं कोई । मैं एकदम सच कह रहा हूँ । मेरे अपने काम सामान्य अन्दाज में बनते बिगङते रहते हैं । मेरे घर वाले भी सजा से नहीं बचते । जबकि मेरे ही द्वारा अनेकों लोगों पर कृपा हुयी है । अनेक अलौकिक अनुभूतियाँ सिर्फ़ नेट से जुङे लोगों की ही हैं । इसलिये मैं स्व महानता की कोई गलतफ़हमी कभी नहीं पालता । एक डाक्टर लोगों को ठीक करता है । तो वह सिर्फ़ उस मर्ज का जानकार होता है । सहायक होता है । भगवान नहीं । जैसा लोग सोचते हैं । रोग को भोग दवा देती है । डाक्टर नहीं । वह सिर्फ़ दवा बताता है । बाकी दवा खाना और तमाम अन्य प्रयत्न मरीज को करने होते हैं । इसलिये इस लङकी के जीते जागते उदाहरण से कृपा का बिज्ञान समझें । और लाटरी खुलने के समान कृपा होने की मूर्खतापूर्ण सोच कभी न पालें । क्योंकि लाटरी भी भाग्यवानों की ही खुलती हैं । भाग्यहीनों की नहीं । और भाग्य पुण्य से निर्मित होता है । वो पुण्य फ़ल ही होता है । इसीलिये किसी ने एकदम सही कहा है - किस्मत से ज्यादा और समय से पहले कुछ नहीं मिलता । इसलिये सतकर्मों से किस्मत बनाईये । किस्मत बदलिये । और किस्मत का स्वरूप ही इस आधार पर बनता है कि - इससे पूर्व आप किस मत के थे ? 
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आजकल कुछ अतिरिक्त कार्यों में व्यस्त हूँ । अभी ये इस मेल का पूर्ण उत्तर नहीं है । ये ताजा प्रसंग आपको बताना उचित लगा । इसलिये अभी इसी मेल पर और भी विस्तार से समाधान होगा । साथ ही स्वपनिल तिवारी के कई ( सभी ) प्रश्न अभी बाकी हैं । आशा है । जल्द ही समय मिले ।

28 जुलाई 2012

काल पुरुष ने आत्मा को 84 लाख योनियों मे कैसे डाला ?


स्वपनिल तिवारी के कुछ अन्य प्रश्न - सत्य पुरुष ने रचना का प्रारम्भ किया । तो क्या इसका भी अंत होगा ? क्योंकि शास्त्रों में ऐसा कहा जाता है कि - जिसका भी प्रारंभ है । उसका अंत भी होता है । या ये नियम मात्र काल पुरुष के लोक जहाँ काल ( समय ) का राज है । वहीं तक सीमित है ?
जब काल पुरुष ने इस सृष्टि की रचना की । तब उसने आत्मा को 84 लाख योनियों मे कैसे डाला ? क्या उसने सभी को मनुष्य बनाया ? क्योंकि तब तो किसी ने कोई कर्म किया ही नही था । या काल पुरुष ने उस समय भी भृम से उनके अंदर संस्कार डाल दिए थे ? अगर ऐसा है । तब तो वो अन्यायी/अधर्मी है । तब भी उसका नाम धर्मराय है ? ये कर्म फल का नियम कब से है ? और क्या ये सतलोक में भी लागू होता है ( पिछले प्रश्नों के उत्तर में ये स्पष्ट नहीं हो पाया था । पर आपके लेख से यही भान हुआ कि - यह हमेशा से है । क्योंकि अगर यह सतलोक में न होता । तो सतलोक में जाने के बाद हंस के उत्थान पर विराम लग जाता ) ?
84 लाख योनियों में जाने वाली आत्मा को क्या सभी योनियों से होकर जाना पड़ता है । मनुष्य जन्म प्राप्त करने के लिए ? या कर्म अनुसार जिनसे संस्कार जुड़े हों । उन्हीं से बस निकल कर मनुष्य देह पुनः प्राप्त हो जाती है ? अथवा बहुत नीच कर्म होने पर लगातार 84 में ही चक्कर काटते रहने की भी स्थिति

हो सकती है । जिसकी अवधि साढ़े 12 लाख वर्ष से भी अधिक हो ? ऐसी कौन सी स्थिति अथवा मनुष्य को छोड़ कर योनि होती है । जिसमें प्राण दशम द्वार से निकलते हैं । और पुनः मनुष्य जन्म प्राप्त होता है ? क्या मनुष्य जैसी ही दैहिक संरचना अन्य किसी योनि में भी है । जिसमें दशम द्वार हो ? अथवा मनुष्य जन्म मात्र पिंडज खंड की योनि से ही प्राप्त हो सकता है । क्योंकि उनमें भी 9 द्वार होते हैं । तो दसवे की भी सम्भावना है ?
अद्वैत में जड़ और चेतन की क्या परिभाषा है ? 
प्राण तत्व क्या है ? 
बाल हाथ नाखून आदि देह के अंग होते हैं । और देह में जब तक प्राण रहते हैं । इन अंगों में भी प्राण का संचार होता रहता है (बाल और नाखूनों में नहीं ?) पर जब ये अंग किन्ही कारणों से देह से अलग हो जाते हैं । तब इनसे प्राण चले जाते हैं । अगर ऐसा होने से आत्मा के देह में प्रवेश करने का प्रयोजन आगे पूर्ण नहीं हो सकता है । तब क्या देह से भी प्राण निकल जाते है ?
पर चेतनता वस्तुओ में यथा रूप बनी रहती है । चाहे उनकी स्थिति जहाँ भी हो । और चाहे । उनमें प्राण हों । या न हों ?
क्या किसी भी स्थूल/सूक्ष्म वस्तु/तत्व के अस्तित्व के लिए चेतनता ही आधार है । या जो चीज मान ली जाती है । वो अस्तित्व में आती जाती है ? 


क्या प्राण तत्व वायु तत्व से सम्बंधित है ? क्या किसी भी स्थूल वस्तु (अथवा सूक्ष्म भी ?) की गति के लिए प्राण तत्व ही कारण है ?
स्थावर खानी की श्रेणी में पेड़ पौधे वृक्ष पर्वत आदि आते हैं । पेड़ पौधों में तो जीवन समझ में आता है । क्योंकि वो स्वांस लेते हैं । और प्रजनन करते हैं । परन्तु पर्वत पत्थर आदि में जीवन कैसे जाना जा सकता है ?
उपरोक्त प्रश्न द्वैत/अद्वैत प्राण/चेतना सम्बंधित संशयों को समझने के लिए है ।
आपके द्वारा किसी लेख में 32 तत्व बताये गए थे । ये तत्व क्या क्या हैं ? क्या इनमे 25 तत्व सांख्य के ही हैं ?
महाराज एक और संशय है । वर्तमान में राष्ट्र में विभिन्न क्षेत्रों में उपदृव हिंसा आदि हो रहे हैं । इन्हें देख कर अगर आध्यात्मिक चिंतन किया जाये । तब यह लगता है कि - जो हो रहा है । ये उनके कर्मो का फल ही है । उपद्रव हिंसा आदि करने वाले अपने संस्कार और स्वभाव के कारण ऐसा कर रहे हैं ।

और ये घटनायें और वो लोग व्यापक राष्ट्रीय परवर्तन के निमित्त मात्र हैं । परन्तु ऐसा सोचने पर एक अकर्मण्यता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है । फिर एक ओर ये भी लगता है कि - अगर ये हमारे साथ हो रहा होता तब ? तब ये आध्यात्म कहा जाता ? पर फिर लगता है । ऐसा सोचना तो मूर्खतापूर्ण है । क्योंकि ये सत्य तो शाश्वत है कि - जो किया । वो तो भुगतना ही पड़ेगा । ऐसे नहीं । तो वैसे सही । पर ऐसा चिंतन करने पर न जाने कितने संस्कार बनते बिगड़ते होंगे ? ऐसे में क्या करना चाहिये है ?  
मैं अभी भी अनुराग सागर के माध्यम से ही अपने प्रश्नों के उत्तर ढूंढ रहा हूँ । इसी कारण से बहुत समय से कोई प्रश्न नहीं पूछे आपसे । ॥ जय जय श्री गुरुदेव ॥
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आपने काफ़ी दिन हो गये । स्वपनिल तिवारी के प्रश्न का उत्तर नहीं दिया । कृपया जल्दी उत्तर दें । अनाम टिप्पणी । लेख - परम सन्तुष्टि और परमात्मा की प्राप्ति कैसे सम्भव है ? इस लेख के लिये नीचे लिंक पर क्लिक करें ।
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2012/05/blog-post_13.html?showComment=1342961640112#comment-c2363593485247542744
इस लेख पर टिप्पणी आने के बाद दूसरे दिन स्वयं श्री स्वपनिल तिवारी द्वारा भेजे गये लिंक -
॥ जय जय श्री गुरुदेव ॥ प्रणाम महाराज । टिप्पणीकर्ता द्वारा मांगे गए उत्तरों के लिंक -
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2012/05/blog-post_7046.html
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2012/05/blog-post_15.html
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2012/05/blog-post_8437.html
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2012/05/blog-post_17.html
[ अनेकों रहस्य साथ में होने के कारण उत्तर अस्पष्ट प्रतीत होते हैं । अधिक जानकारी के लिए कृपया अनुराग सागर पढ़ें ] स्वपनिल तिवारी ।
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1 हजार हिन्दुओं का कत्ल करो । फ़िर न्यूज दिखाऊँगा - राजदीप सरदेसाई । IBN7 चीफ़ । विस्त्रत जानकारी देखें । डा. दिव्या ( ZEAL ) के इस ब्लाग लिंक पर ।
http://zealzen.blogspot.in/2012/07/blog-post_28.html
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सत्यकीखोज के पाठकों की जिज्ञासा और चिंतन मनन देखकर सदैव ही अच्छे अच्छे विद्वान भी दंग रह गये । लेकिन इस वाक्य पर कोई भी टीका टिप्पणी करने से पहले ये ध्यान रखना कि - ऐसी जिज्ञासायें युवा अपरिपक्व और सामान्य श्रेणी में आने वाले पाठकों की हैं । न कि गहन अध्ययन किये विद्वानों की । अतः इस दृष्टिकोण से इन जिज्ञासाओं का स्तर बहुत ऊँचा हो जाता है । मैं 100% गारंटी से कह सकता हूँ । ऐसे प्रश्न उत्तर या जिज्ञासायें आपको बङे बङे प्रसिद्ध कथावाचकों साधुओं महा मंडलेश्वरों के प्रवचनों सतसंग आदि में देखने सुनने में नहीं आयी होंगी । यदि किसी इक्का दुक्का अपवाद ने कोई सूक्ष्म स्तर का प्रश्न पूछा भी होगा । तो उसका उत्तर टाल मटोल किस्म का मिला होगा । पर सत्यकीखोज मंच पर ऐसा नहीं है । यहाँ आपके प्रश्न जिज्ञासा का उत्तर प्रश्न से भी अधिक बारीक बिन्दुओं पर देने की कोशिश की जाती हैं । कोशिश शब्द का प्रयोग 


मैंने इसलिये किया । क्योंकि आध्यात्म के एक सामान्य प्रश्न को भी पूर्णतया बारीकी से समझाने हेतु कम से कम ( ऐसे ) दस लेखों की आवश्यकता होती है । जो कि सम्भव नहीं होता । अतः विभिन्न बिन्दुओं अनुसार अलग अलग स्थानों पर अंश रूप उनकों टुकङों में ही समझाने की कोशिश की जाती है । मेरे एक स्थायी पाठक के अनुसार - मैंने विभिन्न बङे स्तरों के भी कई धार्मिक ब्लाग साइटस देखें हैं । पर सभी पर मक्खियाँ ही भिनभिनाती रहती हैं । इस ब्लाग जैसा भीङभाङ और आध्यात्म का आस्था पूर्ण चिंतन कहीं देखने में नहीं आया ।
खैर..आज रविवार है । सुबह को छुट्टी कर लेता हूँ कभी कभी । शाम को या समय मिलते ही इन सभी प्रश्नों के उत्तर विस्तार से दियें जायेंगे ।

26 जुलाई 2012

ये भगवान मर क्यों नहीं जाता


राजीव जी ! अगर भगवान सब कुछ कर सकता है । तो क्या वो अपने आपको मार सकता है ? क्या वो अपने आपका अस्तित्व समाप्त कर सकता है । अगर नहीं । तो उसे सर्व शक्तिशाली नहीं कह सकते । क्या वो 2 और 2 पाँच कर सकता है ? नहीं न । या सत्य कुछ और ही है । जो हमेशा रहता है । जैसे 2 और 2 चार ही होते है । इसे कैसा भी भगवान नहीं बदल सकता । तो जो है । उसी में जीना सीखो । और जो है । उसे स्वीकार करो । और हाँ ! एक बात और । हमेशा ऐसा मान लो कि - मैं कुछ न जानता । बस मैं हूँ ।  पता नहीं कैसे हूँ ? न होता किसी का भी अस्तित्व । तो न दुःख होता । न सुख । पर कैसे ? ये संसार है । ये एक रहस्य है । तो मुझे गौतम बुद्ध की बातें ज्यादा यथार्थ लगी । मैं तो ये मानता हुँ कि - जो है । उसे स्वीकार करते जाओ । बस क्यों है । पता नहीं । पर बस इतना स्वीकार करना काफी है । न मैं ये जानता कि - कोई भगवान है या नहीं ? क्योंकि असलियत तो है । जो ही 


है । हमारे मानने या न मानने से उसका कोई सम्बन्ध नहीं । उपेन्द्र मीणा । ई मेल से ।
ANS - कोई भी थोङा सा धार्मिक अध्ययन किया हुआ इंसान इस मेल के शब्दों में छिपी अपरिपक्वता को  भलीभांति समझ सकता है । उपेन्द्र मीणा के इसी तरह के कशमकश भाव वाले कुछ मेल मुझे प्राप्त हो चुके हैं । जिनका यथासंभव उत्तर भी दिया जा चुका है । दरअसल आप गौर करें । तो उपेन्द्र मीणा आस्तिकता और नास्तिकता के असमंजस युक्त झूले पर झोटे ( झूले का आगे पीछे होना ) खाते युवा की विचारधारा है  । इस झूले का एक झोटा आस्तिकता का है । तो दूसरा नास्तिकता का है । ये धार्मिकता का सही बोध न होने से एक आम आदमी का धार्मिकता के प्रति चिङचिङापन है । क्योंकि अज्ञान में धार्मिकता रूढियों का भारी बोझ ही महसूस होती है । कौन है भगवान ? हम क्यों मानें ? वो हमारे 


लिये क्या करता है ? दरअसल ये चिङचिङे प्रश्न आज हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई के ही नहीं हैं । बल्कि हर उस इंसान के हैं । जो सही मार्गदर्शन न मिलने से आस्था अनास्था के अनिश्चित झूले पर बैठा हुआ है । मानना मजबूरी वश है । और न मानने से भी शान्ति नहीं मिलती ।
उपेन्द्र मीणा जैसे तमाम लोगों को नहीं पता । सिर्फ़ अनदेखी अनजानी आत्मा ही अमर नहीं है । बल्कि तमाम दृश्य तुच्छ चीजें भी अमर हैं । एक तुच्छ तिनके को भी मारना असंभव है । सिर्फ़ उसका रूप और स्थिति परिवर्तन ही हो सकता है ।
हाँ ! वाकई उपेन्द्र मीणा सही कहते हैं । भगवान इस मामले में कमजोर ही है । वह न सिर्फ़ अपने आपको मार ( क्या इनका मतलब सुसाइड से था ? ) सकने में असमर्थ है । बल्कि वह चीटीं जैसे तुच्छ जीव को भी नहीं मार सकता । बस कर्मफ़ल आधार पर उसका शरीर और स्थिति परिवर्तन होगा । लेकिन उसे सर्व शक्तिशाली इसलिये कहते हैं कि - इस अखिल सृष्टि पर उसी का नियम कानून चलता है । सभी उसी  के कानून का पालन करते हैं ।
क्या वो 2 और 2 पाँच कर सकता है - वास्तव में तो वो 2 और 2 को 6 या 10 भी कर सकता है । क्योंकि 5 भी उसी

के नियम से हुये हैं । उसने एक बहुरंगी विलक्षण खेल बनाया है । भारत की बिल्ली..बिल्ली सुनते सुनते समझ ( सीख ) जाती है कि उसी से कहा जा रहा है । पर अमेरिका योरोप की बिल्ली CAT कहने पर ही समझ पायेगी । क्योंकि उसे CAT ( pussy ) सुनने की आदत हो गयी है । लेकिन दोनों ही एक ही जानवर है । बताईये ये  ೫ ௫ ౫ ൫ ૫ ੫ ৫ ୫ v क्या लिखा हुआ है ? खा गये ना चक्कर । ये ५ या 5 विभिन्न भाषाओं में लिखा हुआ है । लेकिन आप इनमें से कितने 5 को जानते थे ? इसलिये उपेन्द्र तुमने बहुत छोटी बात बाल बुद्धि से की । उसकी सृष्टि के तिनका भर खेल को समझने में ज्ञानियों के कई जन्म व्यतीत हो जाते हैं । इसलिये सत्य कुछ और नहीं । सिर्फ़ वही ( आत्मा ) सत्य है । और बाकी सब उसका खेल भर है । 

और जो है । उसे स्वीकार करो - अगर आपकी दाल में मक्खी गिर जाये । तो फ़िर उसे स्वीकार कर लेना । और ऐसे ही मक्खी सहित दाल खा लेना । अगर रास्ते में चलते समय आपके पद चिह्नों की सीध में मल आ रहा हो । तो कोई बात नहीं । उसी से गन्दे होते हुये चले जाना । थोङा इधर उधर मत होना । कोई रोग हो जाये । तो दवा मत लेना । साइकिल पंचर हो गयी हो । तो टयूब में हवा मत डलवाना । पंचर न जुङवाना । रात हो जाय । तो लाइट मत जलाना । और मुँह गन्दा हो जाय । तो धोना मत । और कभी नहाना भी मत । जो जैसा है । उसे स्वीकार करो ? अगर आप इन कुछ ही बातों पर ( क्योंकि ऐसी बातें तो लाखों हैं ) उचित तर्क रखते हैं । तो फ़िर कोई और आपका समर्थन करे । ना करे । मैं अवश्य करूँगा । वैसे एक बात माननी होगी । आप भगवान के सामने 


भी अपना तर्क रखो । तो भगवान का भी दिमाग घूम सकता है । प्रभु उवाच - what a logic upendra
मैं कुछ न जानता । बस मैं हूँ । पता नहीं कैसे हूँ - चलिये मैं आपकी ये बात भी मान लेता हूँ । लेकिन किसी पुलिस वाले के पकङ लेने पर । स्कूल में शिक्षक के पूछने पर । खुद के खो जाने पर । लङकी के घर वालों द्वारा रिश्ते के लिये आने पर । मोबाइल फ़ोन का कनेक्शन लेने पर । गैस की बुकिंग । रेल आदि की टिकट बुक आदि आदि आदि आदि..जैसी परिस्थितियों में फ़िर आप क्या कहोगे ? सोचिये । अगर आपने ये जबाब दिया - मैं कुछ न जानता । बस मैं हूँ । पता नहीं कैसे हूँ ? तो लोग आपको जिस जगह ले जायेंगे । उसका नाम हिन्दी में पा..और अंग्रेजी में M से शुरू होता है ।
जब इस क्षण भंगुर ( पानी के बुलबुले समान ) जीवन में आपको कदम कदम पर न सिर्फ़ अपना नाम बल्कि पूरा ब्यौरा बताना होता है । तब जीवन के पार भी निरंतर जीवन है । इसलिये आप यदि अपनी और दूसरों की ID जाने बिना किसी चमत्कार से जीवन की गतिविधियाँ सामान्य रख सकते हैं । तो मैं 100% SURE हूँ । ये बिज्ञान । ये चमत्कार । ये उपलब्धि । अभी भगवान तक को भी हासिल नहीं हुयी । तब वो जरूर आप जैसी विलक्षण प्रतिभा से मिलना चाहेगा । अब क्योंकि आपके तर्क विचार मेरी पढाई से भी ऊपर जा रहे हैं । फ़िर मैं इनका उत्तर कैसे दे सकता हूँ ? बेहतर होता । आप 


ही अपने इस अदभुत ज्ञान को  विस्तार देते ।
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hello मैंने आपके ब्लाग की काफ़ी कहानियाँ पढी हैं । मुझे आपसे एक जरूरी बात कहनी है । पहले तो मैं आपसे ये पूछना चाहता हूँ कि आपकी भूत प्रेतों की जो कहानियाँ हैं । ये सिर्फ़ काल्पनिक है । या हकीकत है ? अगर हकीकत है । तो आपकी कहानियों के किरदार मि. प्रसून और नीलेश ये कौन हैं ?  आपके जबाब के बाद मैं आपको कुछ ऐसा बताऊँगा । जो शायद आपको अच्छा लगेगा । thanks राम चौधरी । ई मेल से  ।
ANS - मैंने पहले भी ऐसी जिज्ञासाओं का उत्तर दिया है । मेरी प्रेत कहानियाँ या अन्य अलौकिक वर्णन सत्य तथ्यों पर आधारित होते हैं । लेकिन इसके दुष्प्रभावों से आपको दूर रखने हेतु मैं 


अलग अलग घटनाओं का मिश्रण करके 1 कहानी बनाता हूँ । क्योंकि मैं जानता हूँ । इन रोचक वर्णनों और घटनाकृमों को आप बहुत गहराई से पढते हैं । कोई भी 1 घटना और उसके स्थान पात्र आदि ज्यों के त्यों होने पर आप अनजाने ही गहराई से उससे जुङ जायेंगे । ये कोई कल्पना नहीं । बल्कि मनोबैज्ञानिक सत्य है । और विराट माडल की स्थिति के अनुसार " ये सभी चीजें " हरेक के अन्दर मौजूद हैं । तब कोई शरीरी अशरीरी तांत्रिक या भूत प्रेत आपको आवेशित कर प्रभावित कर सकता है । आप गौर करें । तो सभी शास्त्रों में मंत्र तंत्र गृन्थों में सामान्य जानकारी के बाद कई महत्वपूर्ण अंगों को संकेत में बताया जाता है । या छोङ दिया जाता है । इसलिये क्योंकि हठी दुस्साहसी

लोग उनमें दी गयी चेतावनी के बाबजूद ( कि बिना जानकार या गुरु के सानिध्य में जाये वगैर न करें ) भी वो प्रयोग करे बिना नहीं मानेंगे । लेकिन अपूर्ण जानकारी से वे असफ़ल हो जाते हैं । और इसके परिणाम खतरनाक होते हैं । यही वजह है । ऐसे शास्त्र आदि गृन्थों को आज के समय में काल्पनिक या myth कहा जाता है । यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ । मेरी कहानियों अलौकिक घटनाओं के स्थान पात्र और घटनायें न सिर्फ़ इसी प्रथ्वी बल्कि अन्य अलौकिक लोकों से भी जुङी होती हैं । अतः कुछ वर्णन छुपा देने से पाठक इसके हानिकारक प्रभावों से पूर्णतया दूर रहता है । इसी तरह कहानियों के किरदार या मुख्य पात्र जो होते हैं । जरूरी नहीं । वह घटना उन्हीं के साथ घटी हो । बल्कि 


महत्वपूर्ण है । घटना किस तरह की थी । और उसका हल क्या था । संभावित गतिविधियाँ परिणाम क्या हो सकते थे । इस सबके बाबजूद भी मेरी इन प्रेतक बातों में कैसी भी कोई रुचि नहीं है । भूत प्रेतों के सम्बन्ध में फ़ैली गलतफ़हमियों को दूर करने और लोगों को जागरूक करने हेतु मैंनें ऐसे विवरण प्रकाशित किये । हाँ ! लेकिन वाकई कोई ऐसी रहस्यमय स्थितियों से गुजर रहा है । तो फ़िर मैं अवश्य उसकी सहायता कर सकता हूँ । लेकिन बाधा अलौकिक और बेहद खतरनाक स्तर की हो । तभी मजा आता है । आप जो बताना चाहें । बता सकते हैं ।
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आपने काफ़ी दिन हो गये । स्वपनिल तिवारी के प्रश्न का उत्तर नहीं दिया । कृपया जल्दी उत्तर दें । अनाम टिप्पणी । लेख - परम सन्तुष्टि और परमात्मा की प्राप्ति कैसे सम्भव है ? इस लेख के लिये नीचे लिंक पर क्लिक करें ।
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2012/05/blog-post_13.html?showComment=1342961640112#comment-c2363593485247542744
ANS - अभी मुझे ये तो याद नहीं कि इस लेख के विवरण और प्रश्न आधार पर मैंने जो उत्तर पोस्ट की थी । वह

किस शीर्षक से थी । लेकिन इसके बाद से तो स्वपनिल तिवारी के कई प्रश्न उत्तर आदि के लेख प्रकाशित हो चुके हैं । जो सम्भवत आपकी निगाह में नहीं आये होंगे । ये भी सम्भव है कि वो उत्तर परमात्मा ब्लाग पर प्रकाशित हुये हों । लेकिन सत्यकीखोज और परमात्मा ब्लाग के अलावा मेरे अन्य ब्लाग पर नहीं हुये । इतना तय है । मैं चाहूँगा । स्वपनिल या अन्य को इस उत्तर का लिंक मालूम हो । तो मुझे आनलाइन URL  से कापी करके सीधा मेल में पेस्ट कर भेज दें । तब वो लिंक मैं इस पोस्ट के नीचे ADD कर दूँगा ।

ये पोस्ट देखने के बाद दूसरे दिन स्वयं श्री स्वपनिल तिवारी द्वारा भेजे गये लिंक -
॥ जय जय श्री गुरुदेव ॥ प्रणाम महाराज । टिप्पणीकर्ता द्वारा मांगे गए उत्तरों के लिंक -
[ अनेको रहस्य साथ मे होने के कारण उत्तर अस्पष्ट प्रतीत होते हैं । अधिक जानकारी के लिए कृपया अनुराग सागर पढ़े ] स्वपनिल तिवारी ।


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राजीव जी ! नमस्कार कृपया नीचे दी हुयी लिंक देखिये । ये अष्टावक्र गीता के संस्कृत श्लोको के साथ हिंदी टीका हैं । जो सचमुच में आत्मज्ञान से भरपूर है । आशा है । बहुजन लाभ ले पायेंगे । धन्यवाद । योगेन्द्र परदेशी ।  
http://www.slideshare.net/praveenkmr78/ashtavakra-gitasanskrithindi 

25 जुलाई 2012

पहले कश्मीर फिर केरल और अब आसाम


The Only Alive God On Earth At This Time Is The COWs & GAU; save cows
मेरा निवेदन है कि इस लेख को थोड़ा समय देकर पढें । आजादी के बाद कांग्रेस सरकार के प्रंधानमंत्री नेहरु
की कश्मीर नीति की विफलता और मुस्लिम तुष्टीकरण के कारण देश को कश्मीर समस्या का एक जख्म मिला । जो आज नासूर बन गया है ।
कश्मीर में पाकिस्तानी झंडा फहराया जाता है । कहने को तो कश्मीर भारत का हिस्सा है । लेकिन श्रीनगर के लाल चौक पर भारत सरकार की इतनी हिम्मत नही है कि वहाँ तिंरगा फहरा सके ।
। हजारों कश्मीर पंडितो का कत्ले आम हुआ । स्थानीय निवासी अपने ही राज्य में आज भी शरणार्थी बने हुये है । पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगते हैं । लेकिन बहरी जम्मू कश्मीर और केन्द्र की कांग्रेस सरकार को ये सुनाई नहीं देते । लेकिन उससे सबक ना लेते हुये कांग्रेस सरकार ने इस देश के लिये " एक और कश्मीर " तैयार कर दिया है । असम में हालात खराब हैं । बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों ने संगठित होकर
स्थानीय निवासियों को कत्ले आम शुरु कर दिया है । अब तक मरने वालों की संख्या बढ़कर 32 ( सरकारी आंकड़े ) हकीकत हजारों में है । । हिंसा राज्य के 11 जिलों के करीब 500 गांवों में पहुंच गई है । वहीं प्रदेश में अब तक 2 लाख लोग घर छोड़कर भाग चुके हैं । 50 हजार से ज्यादा लोग राहत शिविरों की शरण ले चुके हैं । 
बोडो लोगों की रिहायश वाले राज्य के आठ जिलों में तनाव का माहौल है । हालात से निपटने के लिए राज्य सरकार ने केंद्र से अर्द्धसैनिक बलों की 50 और कंपनियां मांगी हैं । आठ जिलों में कर्फ़्यू लगा है । देखते ही गो्ली मारने के आदेश जारी कर दिये हैं । पूरे हिंदुस्तान का संपर्क इस समय वहाँ से टूटा हुआ है ।
कल रात राजधानी एक्सप्रेस पर हमला हुआ । करीब 37 ट्रेन रद्द हैं । और 30 हजार यात्री असम में भूखे प्यासे फंसे हुये हैं । इन हालातों के जिम्मेदार कौन ?
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जिम्मेदार हैं - बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिये । जिन्हें कांग्रेस सरकार ने मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति पर चलते हुये राजनैतिक संरक्षण दिया । वर्षों से अवैध बांग्लादेशियों को इस देश में शरण दी जाती रही है । और एक अध्ययन और BBC की रिपोर्ट के अनुसार अब तक 3 करोड़ बाग्लादेशी अवैध रुप से भारत में रहते हैं । इन्हें कभी देश से नहीं निकाला गया । क्योंकि ये कांग्रेसी वोटर हैं । खुद कांग्रेसियों ने इनके फर्जी वोटर कार्ड बनवाये । इस वीडियो को देखें कि - कैसे पकड़े गये बांग्लादेशियों ने फर्जी नागरिकता दस्तावेज बनवाये । ये महिला कबूल कर रही है कि - ये कांग्रेसी वोटर है । और बांग्लादेशी है । http://www.youtube.com/watch?v=yprBKTOgnkI 
असम के सोनारिपारा में पाकिस्तानी झंडा फहरा दिया दिया है ।
देखें वीडियो http://www.youtube.com/watch?v=0oI-PjQkXx4 
कहाँ है - इस देश का मीडिया ? सरकार ? वो सब राष्ट्रपति की ताजपोशी में लगे हैं । इसका आम आदमी ऐसे ही मरता रहा है । और आगे भी मरता रहेगा । आज असम में कत्ले आम हो रहा है । कल हमारी बारी है । आप सोते रहो । कर भी क्या सकते हो ? इंसानी लाशो का तमाशा देखने के सिवा । जब रोम जल रहा था । तब नीरो बंसी बजा रहा था । ये बात तो हुई पुरानी । आज का आधुनिक नीरो भारत में है । नाम है - मनमोहन सिंह । पद - प्रधानमंत्री भारत सरकार । काबिलियत - संसद के पिछले दरबाजे ( राज्यसभा ) से निर्वाचित । जिनको भारत की जनता ने नहीं चुना । उनको आसाम की एक राज्य सभा सीट के जरिये भारत पर खडाऊ शासन के लिये नियुक्ति मिली है । फिलहाल मुद्दा ये है कि प्रधानमंत्री जिस आसाम के पते से निवाचित हुए हैं । और बही आसाम पिछले एक महीने से भीषण बाढ़ की चपेट में है । आसाम के कई हिस्सों का संपर्क भारत से कट चुका है । इसी वीच कोढ़ में खाज जैसी स्थिति तब पैदा हुई । जब कांग्रेस के स्थायी वोट बैक ie बंगलादेश से आये मुस्लिम घुसपैठियों ने बड़ी संख्या में स्थानीय निबासियो का कत्लेआम करना शुरू कर दिया । ये बही आसाम है । जहाँ पर अक्सर सीमा पर भारतीय सुरक्षा बलों की मुस्लिम घुसपैठियों द्वारा घेर कर हत्याएं की जा चूकी हैं । सूचना मिली थी कि राष्ट्रपति चुनाव की गतिविधियों में से कुछ घंटो का समय निकाल कर भारत के दोनों प्रधानमंत्रियों ने ( घोषित + अघोषित )
आसाम का हवाई सर्वेक्षण करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है । आसाम के हालत इस समय इतने खराब हैं कि उस पर विदेशी मीडिया भी चिंता प्रकट कर रहा है । लेकिन भारत के नीरो मनमोहन एंड कम्पनी की बात तो छोडिये । खुद को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहने का दम भरने बाला मीडिया भी सन्नाटा मारे है ।
http://www.bbc.co.uk/news/world-asia-india-18964870 -
मित्रो ! आसाम मे बांग्लादेशियो का हौसला इतना कैसे बढ गया कि वहाँ उन्होंने नापाकिस्तान का झण्डा फहरा दिया ? मैं बताता हुँ - कुछ साल पहले महज वोटों के लिये यूपीए - 1 के एक मंत्री रामविलास पासवान का ये बयान आया - बांग्लादेशियों को भारत का नागरिक बना दिया जाये । उन्हें मत का अधिकार दिया जाये । और उनकी सुरक्षा का इंतजाम किया जाये । अल्पसंख्यको के हितों का संरक्षण किया जाये । जब भ..वे मंत्रियों के ये बयान होंगे । तो भारत मे इसी तरह कश्मीर पे कश्मीर बनते जायेंगे । इसीलिये जागो । और देश बचाओ । आसाम में एक कमी रह गयी थी । वो भी अब पूरी हो गयी है । बहुत बहुत बधाई हो । इस देश के सेकुलर और धर्मनिरपेक्ष लोगों को । जो अब भी भाई भाई का नारा देते हैं । जिहादी मुल्लों ने जिन बोडो हिन्दू आदिवासी इलाकों को आतंक और मार काट से खाली करवाया था । अब वहाँ पाकिस्तानी झंडा लहरा दिया है । सरे आम तथाकथित धर्म निरपेक्ष सविंधान और कानून
व्यवस्था का बलात्कार किया जा रहा है
http://www.youtube.com/watch?v=1B60_gPf0Ro 
आसाम में कई जगह मुसलमानों ने पाकिस्तान का झंडा फहरा दिया है । ये देखिये टाइम्स नाऊ की रिपोर्ट । अब कहाँ छुपा है भोंदू युवराज ? भठ्ठा परसौल में नौटकी करता था । अब कोकराझार में जाकर कब नौटंकी करेगा ? मित्रों ! सिर्फ दो टके के वोट के लिए कांग्रेस ने इस देश को आज बर्बाद कर दिया है । पहले कश्मीर । फिर केरल और अब आसाम । जागो हिन्दुओ जागो । अब जाति पाति से उपर उठकर सम्पूर्ण हिन्दुत्व के बारे में सोचो । गुजरात के पटेल मित्रो ! किसी भी बापा के बहकावे में आने से पहले एक बार आसाम के बारे में जरूर सोच लेना । एक जमाने में असाम में हिंदू कई जाति और जनजातियों में बटी थी । जैसे - गारो । खासी । जयंतिया । बोडो । मारवाड़ी । बिहारी । प्रवासी आदि । लेकिन आज सब एक होकर
बंगलादेशी मुसलमानों का मुकाबला कर रहे हैं । खबर आसाम से है । असम में बंगलादेशी घुसपैठियों ने


बोडो जाति के हिन्दुओं को मार कर भगा दिया है । और असम में लगा दिया है - पाकिस्तान झंडा ।
कांग्रेस ने वोटों के लालच में इन बंगला देसी मुल्लों को शरण दी । और कांग्रेस का साथ और समर्थन पा कर ही आज ये अपनी औकात भुला बैठे है । 
कांग्रेसियों की इस हरकत को देख कर मुझे एक बहुत पुरानी कहानी याद आ रही है । बहुत पहले एक राजा हुआ करता था - जयचंद । उसने प्रथ्वीराज चौहान को हराने के लिए मुल्लों का साथ दिया । उम्मीद थी कि हम इसी तरह राज़ करते रहेंगे । हुआ उल्टा ही । मुल्लों से हाथ मिलाया । मुल्लों ने पीठ पर वार किया । न सत्ता बची । न जान । कुछ ऐसा होता आज भी नज़र आ रहा है । सत्ता के लिए मनमोहन सरकार इनका साथ तो दे रही है । पर कहीं न कहीं अपने पतन की और बढ़ रही है । पर याद रहे दोस्तों । जयचंद की उस एक गलती ने हमें सालों तक गुलामी की जंजीरों में लपेट दिया था । अब हम ऐसा नहीं होने देंगे । और उसके लिए जरुरत है । खड़े होकर आवाज उठाने की । किसी के भरोसे मत रहो । कोई कुछ नहीं करेगा । जो करना है । आपको खुद ही करना होगा । कश्मीर में जब हिन्दू मर रहा था । तो कोई नहीं गया । ना आज आसाम में कोई जा रहा है । दोस्तों ! कोई भगवा पहन कर सर पर काली टोपी लगाने वाला संत कभी संत नहीं हो सकता । कोई मुल्लों के आगे हाथ फ़ैलाने वाला किसी हिन्दू के लिए लड़ने नहीं आएगा । मित्रों हिन्दुत्व की कीमत पर हमे कोई नीला पीला और काला धन नहीं चाहिए । नहीं चाहिए । कोई लोकपाल और जोकपाल । हिन्दुत्व की कीमत पर । अगर अपना घर अपना परिवार बचाना है । तो उठ खड़े हो जाओ ।
और अपने अन्दर के हिन्दुत्व को जगाओ । या फिर सेकुलर बन अपनी बारी का इंतजार करो । हो सकता है । आप बच भी जाओ । पर आपकी अगली पीढ़ी कभी नहीं बच पायेगी । जय महाकाल !
अगर असम में हिंदुओं के नरसंहार को आप टीवी चैनलों पर नहीं देख पा रहें हैं । तो उसके पीछे कुछ खास वजहें हैं । राजदीप सरदेसाई के अनुसार - जब तक 1000 हिंदू नहीं मरते । तब तक वो कोई खबर ही नहीं है । बेचारे को गुजरात के दंगों से बड़ा सदमा पहुँचा हुआ लगता है । या फिर मुँह में इतने पैसे ठूंस दिए गए हैं कि - सच नहीं निकाल पा रहा है । अगर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ऐसा होता है । तो मैं थूकता हूँ । ऐसी मीडिया के दलालों पर । जिनके लिए दंगे तो केवल 'गुजरात' में होते हैं । और दंगा पीड़ित केवल मुसलमान होते हैं । आ......क थू । सोचिए जरा ।
साभार - http://www.facebook.com/photo.php?fbid=447539085277024&set=a.242016039162664.64418.242011395829795&type=1 क्लिक करें ।
इस लेख पर कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ -
 1 नरेश आर्य - विश्वस्त सूत्रों से खबर आई है कि वर्तमान समय में जो देश के हालात है ( बरेली में कांवड़ियों के ऊपर मुसलमानों द्वारा हमला । दिल्ली में मुसलमानों द्वारा सुभाष पार्क पर नाजायज कब्ज़ा । आसाम में बंगलादेशी मुसलमानों द्वारा एक लाख हिन्दुओं को मारपीट कर भागना ) उसके लिए अन्ना और रामदेव के आंदोलनों से घबराई कोंग्रेस सरकार अपने आपको बचाने के लिए और जनता का ध्यान आंदोलनों से भटकाने के लिए इन सब मुसलमानों को हिन्दुओं के खिलाफ भड़का कर दंगे करवाना चाह रही है । वरना क्या एक भी कोशिश नहीं की जाती । इन सबको रोकने के लिए ?
2 The Only Alive God On Earth At This Time Is The COWs & GAU; save cows 
आसाम के दंगे । देशी के बजाय विदेशी मीडिया कर रहा है । आसाम के दंगो की रिपोर्टिंग ।  देश का इलेक्ट्रानिक मीडिया खुद को खुदा समझता है । बड़ी बड़ी बातें करना । और देश की सुरक्षा का इकलौता ठेकेदार समझना । उसका सबसे पसंदीदा शगल है ।
लेकिन जरा ध्यान दीजिए । फ़िल्मी हीरो हीरोइनों क्रिकेटरों की तलबा चाटी करने । खबरों के लिये उनके आगे पीछे घूमने । और कभी कभी राखी सावंत के चुम्मे की कबरेज करने बाला मीडिया आसाम के परिदृश्य से पूरी तरह गायब है । इस समय आसाम के 11 जिले दंगो की चपेट में है । सरकारी आंकडो के अनुसार 63678 लोग सरकारी कैम्पों में पहुँच चुके हैं ।  आसाम से मिल रही खबरों के अनुसार लगभग 170000 लोग बेघर हुए हैं । हजारों मकानों को जलाया जा चुका है । कुछ जगहें ऐसी है । जहाँ खुले आम हत्या । लूट । बलात्कार जारी है । लेकिन भारत का मीडिया अपने आरामदायक बिलों में छिपा बैठा है ।
आसाम से जितनी भी खबरें या चित्र आ रहे हैं । उन सबकी कबरेज विदेशी मीडिया कर रहा है । अब तक आई सूचनाओं में सबसे जादा रिपोर्टिंग बी. बी . सी लंदन के पत्रकारों द्वारा की गयी है ।
3 Saurabh Sah - अब हैदराबाद को ही ले लो । आपको जानकर आश्चर्य होगा कि - वहाँ के मंदिरों में घंटी बजाने पर रोक है । अगर आपने घंटी बजाई । तो आपकी बज जायेगी । हा..हा .हा... क्या बात है । मुसलमान 24 धंटे में 5 बार ( 2 बार तो रात में ) माइक पर चिल्लाये । तो कोई बात नहीं । लेकिन हिन्दू अगर 24 घंटे में 2 बार सुबह शाम घंटी बजाये । तो उनकी "फ..ने" लगती है । और उन्होंने वहाँ पर कानून बना डाला कि - हैदराबाद में घंटी नहीं बजेगी कोई मंदिर में । और कोई हिन्दू कुछ नही उखाड़ पाया । इस बार भी ऐसा ही होगा । देख लियो । इसलिए हिन्दुओं मैं तो एक ही बात कहूँगा - Always Take Care तुम रहोगे । तभी तो तुम्हारी वंश रहेगी । बाकी तुम जानो । और तुम्हारा काम । जय राम जी की & I Again Say - TAKE CARE और हाँ Good Night...Bye..
सभी जानकारी और चित्र साभार बेवपेज से - http://www.facebook.com/photo.php?fbid=447539085277024&set=a.242016039162664.64418.242011395829795&type=1 
नोट - इस पेज को प्रकाशित करने का उद्देश्य आपको  इस हैरतअंगेज ( यदि सच है ) सत्य से परिचय कराना है । अगर आपको ये सार्थक लगता है । तो इस पेज के लिंक या जानकारी को आप भी साझा कर सकते हैं ।
विशेष - यह पेज सिर्फ़ महत्वपूर्ण  सूचना के आधार पर इस ब्लाग पर प्रकाशित किया गया है । ठोस सबूत न होने से यह ब्लाग इसकी प्रमाणिकता की गारंटी नहीं दे सकता । सत्य या असत्य ? इस जानकारी के बारे में आप कुछ जानते हैं । तो कमेंट में लिख सकते हैं । लेकिन यदि यह सत्य है । तो बङे पैमाने पर आवाज उठाने और इसका समर्थन करने की आवश्यकता है ।

24 जुलाई 2012

हिन्दुओं की पूज्य गाय कसाईयों के हाथों कैसे पहुँच जाती है ?

आजकल कम से कम आगरा में मौसम बहुत अच्छा ही रहता है । बस बारिश नहीं हो रही । कभी हल्के कभी गहरे बादल छाये रहते हैं । धूप बहुत कम निकलती है । और जगहों से लोग जब फ़ोन पर बेहद गर्मी की बात कहते हैं । तो फ़िर ख्याल आता है । कम से कम यहाँ ऐसा तो नहीं है । पिछले कुछ दिनों से दिनचर्या अव्यवस्थित सी हो चली है । अचानक के काम लग जाते हैं । लेकिन हैं बहुत जरूरी ।
खैर..सुबह को चाय पीते समय अक्सर मेल  देखने के बाद अपना फ़ेस बुक पेज खोलता हूँ । इसमें मैंने बहुत सारे - जन जागृति अभियान । क्रांतिकारी विचार । अदभुत जानकारी । आश्चर्य । मुस्कान.. आदि आदि जैसे पेज पसन्द किये हुये हैं । उनके UPDATE देखता हूँ । और मुझे लगता है । बहुत कम शब्दों और चित्रों द्वारा ये लोग बहुत अच्छा काम कर रहे हैं । लेकिन आगे बढने से पहले आप इस UPDATE घटना को पढिये ।
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आज एक कहानी सुनाते हैं । कहानी उस समय की है । जब भारत में अकबर का शासन था । एक दिन एक कसाई एक गाय को पकड़ कर काटने के लिए ले जा रहा था । अपनी मौत को करीब आते देख गाय घोर गम

के आगोश में डूबी जा रही थी । चेहरे पर निराशा और गले से ऐसे स्वर फुट रहे थे । मानो रुदायन कर करके अपनी जान की भीख मांग रही हो ।
अचानक उस गाय पर एक ' कविराज ' की दृष्टि पड़ी । उसकी इतनी दयनीय हालत देख कर उन्हें उस गाय पर तरस आ गया । तो उन्होंने उस कसाई को उस गाय की कीमत देकर खरीद लिया ।
उसके बाद वो उस गाय को घर ले गए । उसे खिलाया पिलाया । तो गाय के हर्षाये मुख मंडल को देख कर अति प्रसन्न हुए । परन्तु फिर सोचने लगे । आज तो मैंने इसे बचा लिया । परन्तु पता नहीं । पूरे देश में रोज़ कितनी ही निरपराध बेजुबान गायों के प्राण हर लिए जाते होंगे । इनकी प्राणों की रक्षा के लिए अवश्य ही कुछ करना होगा । ऐसा सोच कर उन्होंने एक योजना बनायीं ।
उस समय अकबर ने अपने राज्य के बीचो बीच । या यूँ कहें कि अपने महल के पास एक बड़ा सा घंटा लगवा 


रखा था । और पूरे प्रजा में ऐलान करवा रखा था । कोई भी फरियादी कोई भी फ़रियाद लेकर आये । तो उस घंटे को बजाये । उसकी फ़रियाद हम खुद आकर सुनेगे ।
कविराज ने एक पत्र लिखा । महाराज अकबर के नाम । उस गाय की ओर से कि - महाराज मेरा क्या कसूर है । मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है । मैंने तो किसी का कभी कोई अहित नहीं किया । मैंने तो आज तक कभी कोई भेद भाव नहीं किया । चाहे वो हिन्दू हो । या मुस्लिम ।
मैंने तो सभी को मीठा दूध ही दिया । मैंने तो ऐसा कभी नहीं किया कि एक हिन्दू को मैंने पौष्टिक दूध दिया हो । और एक मुस्लिम को नहीं । फिर मुझे क्यों इतनी बेदर्दी से मारा जाता है । बेगुनाह होने के बावजूद मुझे क्यूँ मार दिया जाता है ।

क्या मुझे जीने का कोई अधिकार नहीं ? महाराज आप तो हर फरियादी की फ़रियाद सुनते हैं । उसे न्याय देते हैं । क्या आप मुझे न्याय नहीं देंगे । क्या मेरे जीवन की कोई कीमत नहीं । ऐसा लिख कर उन्होंने ये ख़त गाय के गले में बांध दिया । और उस घन्टे के पास ले जाकर घंटा बजा कर स्वयं वहाँ से हट कर दूर खड़े हो गए । घंटे की आवाज सुनकर जब महाराज अकबर आये । तो उन्होंने देखा कि घंटे के आस पास कोई नहीं है । सिर्फ एक गाय खड़ी है । अकबर ने अपने सेवकों को भेज कर उस गाय को अपने पास बुलवाया । तो देखा । उसके गले में एक पत्र है । उस पत्र को खोल कर पढ़ा । तो अकबर की आँखों में आंसू आ गए । अकबर ने ठीक उसी वक़्त ऐलान किया कि - आज से मेरे राज में कहीं भी कोई गौ हत्या नहीं होगी । और जो इस आदेश का उलंघन करेगा । उसे दंड दिया जायेगा ।
नोट - ये कोई मनघढंत कहानी नहीं है । बल्कि सत्य है । इतिहास उठा कर देख लीजिये । अकबर के राज्य में गौ हत्या पर प्रतिबन्ध था । अब हम क्यूँ न कहें - आज के गौ हत्यारे ( मुल्ले ) इंसानियत पर ही नहीं । अपने धर्म पर भी कलंक है । क्योंकि कुरआन तो निर्दोष की हत्या को हरम की कहता है ।
साभार - The Only Alive God On Earth At This Time Is The COWs & GAU; save cows
http://www.facebook.com/photo.php?fbid=446893125341620&set=a.242016039162664.64418.242011395829795&type=1&theater क्लिक करें ।
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अगर आप सरसरी  तौर पर यह घटना पढ जायें । कोई चिंतन न करें । तो निसंदेह आपको पूरा कसूर मुसलमानों या अन्य निम्न जाति वर्ग के कसाईयों का ही नजर आयेगा । और जब ऐसा विचार बनेगा । तो

फ़िर हिन्दू ही गाय का सबसे बङा रक्षक नजर आयेगा । पर वास्तविक सत्य क्या है ? शायद आपने कभी इस पर विचार नहीं किया । मैंने हिन्दू मुसलमान ईसाई इन तीन धर्म के लोगों को ( भारत में ) काफ़ी करीब से देखा है । जाना है । सिखों के बारे में इस विषय चिंतन के अनुसार ? नहीं जानता । लेकिन सिख परिचितों के अनुसार ( पंजाब आदि में ) सिख भी गाय पालते हैं । ध्यान रखें । यहाँ मैं सिर्फ़ भारत की बात कर रहा हूँ । क्योंकि गौ रक्षा की बात भारत में ही अधिक होती है । बाकी अन्य देशों ( के लोगों ) का गाय के प्रति भारतीय हिन्दुओं जैसा सम्माननीय भाव नहीं है । उनके लिये गाय सिर्फ़ एक दुधारू पशु और माँस उत्पाद का अच्छा स्रोत भर है । आप बारीकी से गौर करेंगे । तो हिन्दू ही गौ हत्या रोकने के प्रति आन्दोलन आदि करता नजर आयेगा । अब थोङा गहरायी से विचार करना । मैंने भारत में सर्वाधिक % पर हिन्दुओं को ही गाय पालते

देखा है ( गौर करें । अधिकतर मुसलमान ईसाई बकरी मुर्गी पालन करते ही दिखेंगे ) । इसके तुलनात्मक ईसाई या मुसलमान जिस % पर गौ पालते हैं । उसे सामान्य बोली में इक्का दुक्का कहा जायेगा । इससे सहज सिद्ध हो जाता है । गौ की मालिकी अधिकांश हिन्दुओं की ही है । अब बङा सवाल ये उठता है - फ़िर हिन्दुओं की पूज्य गाय कैसे कसाईयों के हाथों में पहुँच जाती है ?
मेरे आगरा आवास के आसपास ( 2 किमी तक ) अधिक संख्या में यादव रहते हैं । और ज्यादातर लोगों के घर गाय भैंस पली हुयी हैं । ( सिर्फ़ कुछेक ( नगण्य ) मुसलमान डेयरी उधोग के तौर पर गाय भैंस रखते हैं )  मुझे इनमें से किसी का भी गाय का प्रति ऐसा दया भाव नहीं दिखा । मैंने पहले भी लिखा है । गाय के बछङा या भैंस के पड्ढा हो जाने पर ये लोग सिर्फ़ शुरू के 2-3 दिन बहुत मामूली ( 250 gm ) दूध उसे पिलाते हैं । जिससे पशु दूध देता रहे ।  2-3 दिन का बच्चा घास नहीं खा सकता । अतः कुछ दया वाले लोग उसे गुढ आटे का पतला घोल कुछ दिन और पिला देते हैं । इसके बाद उसे भूखा ही रहने दिया जाता है । कुछ और भी दयावान नरम घास आगे डाल देते हैं ।

लेकिन संक्षेप में कुल मिलाकर वह तङपती भूख से ही मर जाता है । ऐसे पशु पालकों के घर के आगे से सभी कसाई पेशे वाले सुबह नियम से गुजरते हैं । और अभिवादन करते हैं । लोग जान गये हैं । अतः हँसते हैं - फ़िर किसी की मौत का अभिलाषी है । आप कल्पना कीजिये । हाल का पैदा हुआ बच्चा अपनी भूखी जिन्दगी के 10-15 दिन इन दयावानों के बीच तङप तङप कर जीता हुआ मर जाता है । प्रसन्न कसाई उसका आंतरिक भाग निकाल कर खाल में भूसा भरकर लौटा जाता है । इस ( ऐसे तमाम ) बुत बच्चे पर नारकीय ढंग से मक्खियाँ भिनभिनाती है । बङे बङे डिब्बों में ( 35-40 रुपये किलो ) 2-3 किलो दूध लेने वाले सभ्रांत डाक्टर इंजीनियर पुजारी पंडित आदि आदि  दयावान धर्मी लोग इस दृश्य को रोज ही देखते हैं । मुझे भी दूध का धुला न समझें । गाय को रोटी आटे की लोई खिलाने वाली मेरी पूर्ण धार्मिक माँ भी यहीं से ( ऐसे कई घर ) ढाई किलो दूध लाती है । मैं सोचता हूँ । कसाई पशु का वध करता होगा । तो बहुत हद उसे 15 मिनट कष्ट होता होगा ..ना ?
मैंने इस स्थान ( वर्तमान आवास या बहुत से अन्य भी ) को 9 वर्ष पहले भी देखा था । तब यहाँ पशुओं के चरने के लिये बहुत से स्थान थे । अब सिर्फ़ 100 वर्ग गज जमीन लोगों को मकान बनाने के लिये नहीं है । कहीं कोई टुकङा शेष नहीं । 100 वर्ग गज जमीन 8 00 000 के आसपास कीमत पर भी नहीं मिलती । क्योंकि है ही नहीं । फ़िर पशुओं के लिये कहाँ से हो ?
लेकिन लोग अपनी प्राचीन भारतीय सभ्यता संस्कृति के प्रति बेहद जागरूक हैं । उन्होंने गाय माता को पालना नहीं छोङा । गाय सङकों पर घूमती हुयी नालियों के किनारे उगी घास । लोगों द्वारा फ़ेकें सब्जियों आदि के छिलके । खराब हुयी पकी सब्जियाँ आदि आदि फ़ेंकी गयी कूङा जैसी चीजों को खाती रहती है । फ़िर यदि वो दूध देती है । तो शाम को उसका मालिक याद से दुह लेता है । बेकार हो जाने पर कसाई को दे देता है । मैं सोचता हूँ । कसाई पशु का वध करता होगा । तो बहुत हद उसे 15 मिनट कष्ट होता होगा ..ना ?
** खैर छोङिये । इस क्रूर कहानी के बजाय गाय की इस दुर्दशा का मूल कारण जानते हैं । आदि सृष्टि के समय जब काल पुरुष की पत्नी अष्टांगी ने अपने अंश से गायत्री कन्या को उत्पन्न किया । और उसे अपने पिता की खोज में गये ( अपने पुत्र ) बृह्मा के पास भेजा । तो अपने अहम की तुष्टि हेतु बृह्मा ने उससे झूठ बोलने को कहा कि - कहना बृह्मा ने मेरे ( गायत्री ) सामने अपने पिता ( काल पुरुष ) के दर्शन पाये । गायत्री ने इस झूठ को बोलने के लिये बृह्मा से काम भोग करने की शर्त रखी । फ़िर दोनों ने अष्टांगी से झूठ बोला । अष्टांगी ने बह्मा को अपूज्य देवता और गायत्री को गाय होने का शाप दिया । जिसकी कामवासना की पूर्ति कई सांड करेंगे । और भक्ष्य अभक्ष्य का सेवन करेगी । गायत्री ने पलट कर अष्टांगी को अवैध तरीके से उत्पन्न 5 पुत्रों की माँ ( कुन्ती ) होने का शाप दिया । अगर आप अनुराग सागर पढें । तो गाय का सभी सच आपके सामने होगा । गाय इंसानी मल भी खाती है । ये सभी जानते ही हैं ।
- लेकिन मैं सोचता हूँ । इस पाशविकता का कारण समय से उत्पन्न परिस्थितियाँ ही हैं । वरना गाय हर तरह से बेहद उपयोगी पशु है । उसका गोबर मूत्र दूध दही मक्खन यहाँ तक उसके स्वांस प्रश्वांस में वो क्षमता है । जिसको जानकर आज भी लोग आश्चर्य चकित हो सकते हैं । अगर सिर्फ़ जमीन का अभाव न होता । तो आज भी बूङी होकर मरी कई वर्ष तक दूध न देने वाली गाय भी कतई घाटे वाली नहीं थी । अतः कसाई कोई 2-4 लोग नहीं हैं । हम सब कसाई हैं ।
- चलिये मैं आपसे वादा करता हूँ । मैं अकेला ही गौ हत्या जीव हत्या रोक दूँगा । पर आप मुझे सिर्फ़ इतना बताईये । इनके खाने पीने रहने का आपके पास क्या इंतजाम है ? जंगल नहीं रहे । जमीन नहीं रहीं । तब जब ये पशु सङकों पर बस्तियों में आवारा होकर भोजन की तलाश में घूमते हैं । उस समय कितने ही हिन्दुओं को दयावानों को पंडो पुजारियों को मैंने इन्हें मोटे डंडे से मारते देखा है । अक्सर देखता हूँ । आप नहीं देखते क्या ? इसीलिये तो.. मैं सोचता हूँ । कसाई पशु का वध करता होगा । तो बहुत हद उसे 15 मिनट कष्ट होता होगा ..ना ?
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और किन किन चीजों मे गौ मांस होता है । जानने के लिए यहाँ क्लिक करे ।
http://www.youtube.com/watch?v=Ze1syyZYLYg
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इंटरनेट के जागरूक लोगों की वजह से इस दोगले ( हिन्दू से ईसाई ) के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही आरम्भ हो गयी । मुझे आशा है । आप लोग अपने अपने तरीके से सुविधा साधनों से इसे ( और इस जैसों को ) सबक सिखाने हेतु इस कार्यवाही का बङे स्तर पर समर्थन करेंगे ।
साभार - Hindu Janajagruti Samiti
HJS files FIR against Converted Christian Laxman Johnson insulting Hinduism
Read full story at : http://www.hindujagruti.org/news/14568.html क्लिक करें ।
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17 जुलाई 2012

1 यूवती मेरे लिए रिज़र्व रखना

महाराज जी के साथ राधा स्वामी गुरु की फ़ोटो है ? ये बात समझ नहीं आयी राजीव जी .. अनाम जिज्ञासा युक्त टिप्पणी God Particle का रहस्य लेख पर ( क्लिक करें )
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इस सम्बन्ध में मैंने पहले भी लिखा है । फ़िरोजाबाद से 22 km दूर नगला भादों के पास चिंताहरण नाम से प्रसिद्ध हमारा आश्रम.. आश्रम के ( दिवंगत ) संस्थापक द्वारा श्री महाराज जी को अर्पित किया गया । लेकिन इससे भी कुछ ही पहले आश्रम के लिये 5 बीघा जमीन ( चिंताहरण आश्रम से कुछ ही दूर ) किसी ग्रामीण ने महाराज जी को अर्पित की । इसके अतिरिक्त राधा स्वामी पंथ से जुङे किसी श्रद्धालु ने एक निर्मित आश्रम श्री महाराज जी की सेवा में लगाया । इस तरह ढाई किमी की दूरी में 3 आश्रम महाराज जी की अध्यक्षता में चल रहे हैं । स्मरणीय है । महाराज जी इस क्षेत्र में सिर्फ़ 6 महीने से टिके हुये हैं । इस तरह ( उस ) राधा स्वामी आश्रम वाले भी चिंताहरण आश्रम पर आते जाते रहते हैं ।
गुरु पूर्णिमा पर्व के अवसर पर उन्हीं लोगों ने अपनी भावना से राधा स्वामी पंथ के किसी गुरु का फ़ोटो रख दिया होगा । किसी भी सन्त समागम में इस तरह का मत विरोध नहीं होता । सन्तों की आपस में बैठक ज्ञान के आदान प्रदान और प्रेम भाव को बाँटने के लिये होती है । न कि मैं ऊँचा । तू नीचा के लिये । सन्त मत के गूढ अर्थ के अनुसार राधा का अर्थ सुरति और स्वामी का मालिक है । इस तरह काफ़ी हद तक वह सुरति शब्द योग ही है । पर थोङा सा ही मार्ग अलग सा हो जाने के कारण वह अद्वैत का वह सहज योग नहीं है । जो सर्वोच्च 



है । ऐसा ( उनके ) गुरु द्वारा प्राप्त हुयी स्थिति और साधना तरीके की परम्परा बन जाने से होता है । 
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हमारे मण्डल के एक साधारण शिष्य का मेल -
( चेतन प्रकृति के बिना अपूर्ण है । यह बात दूसरे भाव में कुछ गलत हो जाती है । क्योंकि चेतन अपने आप में पूर्ण है । और प्रकृति उससे ही प्रकट हुयी है । लेकिन जब ( पहली बार ) से यह सृष्टि खेल शुरू हुआ है । तभी से यह सारा खेल प्रकृति में ही हो रहा है । इसलिये किसी हद तक ऐसा कहा जा सकता है )
सोचिये । ऐसे ही बारिश की बूँदें पङ रही हों । आप अकेले हों । प्रकृति पूर्ण रोमानियत से मचल रही हो । तब आपको किस बात की इच्छा होगी । निसंदेह । गर्मागर्म पकौङे । चाय । एक खूबसूरत प्रेमिका या पत्नी । और पूरी बेतकल्लुफ़ी के हसीन पल । यही है - चेतन और प्रकृति का खेल । और ध्यान रहे । ये सिर्फ़ कामवासना हरगिज नहीं है । बल्कि एक उच्च धरातल पर 

तो ये वासना भी नहीं है । आप गहराई से सोचें । तो इससे बङी चाहत और कोई हो ही नहीं सकती । । क्योंकि सचखण्ड और ऊपर के लोकों या मेरे निजी लोक में रहने का अधिकार सामान्य युवती को किसी कीमत पर नहीं मिल सकता ) 
God Particle का रहस्य से लेख अंश ( क्लिक करें ) 
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2012/07/god-particle.html
- और इसके बाद खुद की भावनायें -
क्या आप अपना लोक बना सकते हो । उस लोक में कितनी यूवतियाँ होंगी ? उनमें से 1 यूवती मेरे लिए रिज़र्व रखना । लेकिन आपका लोक बनने में तो अभी काफी टाइम लगेगा । आप तो परम सत्ता से जुड़े हुए हो । आपके पास तो काफी पॉवर है । अगर आप किसी यक्षिणी को या अप्सरा को आज्ञा देंगे । तो वो आपको मना नहीं करेगी । आप एक यक्षिणी को या अप्सरा मेरे पास भेज दो । अगर वो ज्यादा दिन नहीं रूक सके । तो कुछ समय के लिए ही सही । पर भेज दो । नहीं तो एक बार दर्शन ही दे जा ।
मैंने कोई तपस्या नहीं की । लेकिन आपने तो बहुत की है । आपका तो कहना मानेगी ना ?  तो आज आप भेजो किसी को । ये सिर्फ़ कामवासना हरगिज नहीं है । जल्दी भेजो । जल्दी भेजो । जल्दी भेजो - एक प्रेमिका । और पूरी बेतकल्लुफ़ी के हसीन पल । और ध्यान रहे । ये सिर्फ़ कामवासना हरगिज नहीं है 
 Thursday, 12 July 2012 8:54 AM ( को मेल भेजा गया )
 Friday, 13 July 2012 8:23 AM ( को फ़ारवर्ड किया गया ) मेल का विषय देखते हुये नाम छापना उचित नहीं लगा ।
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मेरी तरफ़ से हमारे एक अन्य साधक द्वारा दिया गया उत्तर -  Who am i to judge you ?
सबसे पहले तो मैं ये कहना चाहूँगा कि अभी तक आप खुद ही विश्वास से नहीं कह सकते कि - कोई अपना लोक बना सकता है । और दूसरी तरफ आप पूर्ण विश्वास से कहते हो कि - आपका लोक बनने में तो अभी टाइम लगेगा ( किस भरोसे से आप ये कह रहे हैं ? ) और खुद ही विरोधाभास भी पैदा कर रहे हो कि आपके पास तो काफी पॉवर है । और आप परम सत्ता से जुड़े हुए हो । तो फिर आप ही बताओ कि अगर कोई व्यक्ति किसी पावर फुल सत्ता से जुड़ा हुआ है । तो उसके लिए अपना कोई लोक बनाना कितना मुश्किल काम होगा ?. खैर आपकी जानकारी के लिए जोड़ना चाहूँगा कि प्रकृति ने स्वयं ही कितने लोक लोकांतर बनाये हुए हैं । और प्रत्येक लोक में उत्पत्ति और विनाश का खेल निरंतर चल रहा है । और प्रत्येक लोक का कोई न कोई स्वामी या

प्रबंध कर्ता भी नियुक्त है । एक "जागृत साधक" अपने शरीर के भीतर ही अनेक लोकों के दर्शन करने में सक्षम होता है । आपके पास तो सतगुरु द्वारा प्रदान की हुई कुंजी है ही । और "हाथ कंगन को आरसी क्या..." आप मुझसे मांगने के बजाय स्वयं ही इस बात का PRACTICLE कर सकते थे । और ऐसा भी नहीं है कि मेरे लिए यह कोई बहुत बड़ा कार्य हो । परन्तु मैं आपके लिए यह कार्य किस आधार पर करूँ ? इसलिए कि आप हमारे मंडल से जुड़े हैं ? यदि हाँ ! तो इस मंडल में आप अकेले नहीं हैं । और मंडल से जुड़ने पर जो सत्ता आपके साथ काम कर रही है । उसका स्तर शायद आप जानते नहीं है । यदि जानते । तो इस तरह का प्रश्न ही न करते । और जुड़े है । तो किसी स्वार्थ वश ही । भले ही वह स्वार्थ आत्म उन्नति का ही क्यों न हो । या फिर इसलिए कि आप मुझे औपचारिक रूप से जानते हैं । तो मैं यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि औपचारिक जानकारी के चलते भी मैं यह कार्य आपके लिए क्यों करूँ ?
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और अब मेरी बात - धार्मिक इतिहास में ऐसे कई योगी और भक्त हुये हैं । जिनका जीवन चरित्र आपके प्रश्न का उत्तर है । और यह सब विवरण मैं कई लेखों में प्रसंग अनुसार बता भी चुका हूँ । प्रहलाद और ध्रुब द्वैत योग के असली मगर सामान्य भक्त की श्रेणी में आते हैं । क्योंकि उनकी भक्ति की तकनीक और प्रकार बङी प्राप्ति के फ़ल वाला नहीं था । प्रहलाद अब तक इन्द्र पद पर रहा है । और स्वर्ग लोक का राजा और देवताओं का राजा इन्द्र पदासीन ही होता है । सीधी सी बात है । किसी 

प्रधानमंत्री के निर्वाचित कार्यकाल ( 5 वर्ष ) की तरह इन्द्र को स्वर्ग मण्डल के समय अनुसार हजारों साल का दिव्य जीवन और भोग प्राप्त होता है । इन्द्र के लिये इन्द्राणी या स्वर्ग देवांगनायें या अप्सरायें वे युवतियाँ होती हैं । जिन्होंने ऐश विलास भोग की भरपूर कामना के साथ तपस्या या ऋषि महर्षि सन्तों आदि की सेवा की हुयी होती है । और परिणाम स्वरूप वे उस गति को प्राप्त होती हैं । जाहिर है । वे सामान्य युवतियाँ नहीं होती । इसके लिये कभी उन्होंने कठिन परिश्रम किया था ।
मैंने इस प्रश्न से पहले ही सूक्ष्म लोकों की ये जानकारी दी थी कि - अब ध्रुब को इन्द्र पद मिलने वाला है । इस समय के बीच ध्रुव दिव्य लोकों में सुख भोगता हुआ आनन्द से रहा । ये  प्रसिद्ध बाल भक्त अवश्य हुये । पर बहुत उच्च श्रेणी के भक्त नहीं थे । इसलिये आपके प्रश्न का उत्तर तो यहीं मिल जाता है ।
इसके बाद इस मामले में ( प्रसिद्ध लोगों में ) क्रोधी ऋषि विश्वामित्र की बात करें । द्वैत के सफ़ल योगी या महर्षि विश्वामित्र आराम से ऐसा लोक  ( अपने स्तर का ) तपोबल से बना सकते थे । और अप्सराये तथा देवांगनायें उनकी सेवा में रहती थी ।
इसके बाद दशरथ पुत्र राम हँस ( दीक्षा ) योगी हुये । और उनका राम लोक है । ये स्वर्ग आदि से बहुत ऊँचा है । इसी कृम में परम हँस ( दीक्षा ) योगी योगेश्वर वसुदेव पुत्र श्रीकृष्ण हुये । इनका गोलोक है । बृह्माण्ड में सबसे ऊँचा यही लोक होता है । इन दोनों लोकों में भी साधारण स्त्री पुरुष रूप

सेवकों की जो दिव्य आभा सौन्दर्य और शक्ति होती है । वह बङे बङे देवताओं के लिये ईर्ष्या का विषय होती है । उदाहरण के लिये श्रीकृष्ण के लोक में सुन्दर सेविकाओं युवतियों की भरमार होती है । इसका क्षेत्रफ़ल इतना बङा है कि प्रथ्वी के पैमाने से उसका आंकलन नहीं किया जा सकता । ये पालिंग ( सूक्ष्म लोकों का पैमाना ) में होता है । सामान्य धार्मिक जानकारी रखने वाले भी जानते हैं कि बृह्मा विष्णु शंकर का भी अपना अपना एक लोक होता है । और ये सभी वे मनुष्य ही हैं । जिन्होंने कभी अपने तप भक्ति से इन पदों को प्राप्त किया ।
- पर अद्वैत गुरु के ( सफ़ल ) सिर्फ़ हँस जीव ही श्रीकृष्ण से ऊँची स्थिति को प्राप्त होते हैं । क्योंकि इन्हें सचखण्ड में हँस जीव का स्थान मिलता है । और सचखण्ड महा प्रलय में भी नष्ट नहीं होता । जबकि बृह्माण्ड की चोटी तक की सृष्टि और आत्मायें महाप्रलय में ( अपनी प्राप्त स्थिति से )  नष्ट हो जाती हैं । ये उपरोक्त विवरण प्रमाणिक रूप से धार्मिक बिज्ञान । भक्ति नियम । और इतिहास पर आधारित है ।
अब उपरोक्त के बाद मैं अपने स्तर पर बात कहता हूँ । मैं कोई लोक वगैरह बनाता नहीं हूँ । यह सव अद्वैत की सत्ता अपने आप तैयार कराती है । प्रथ्वी पर जिस तरह किसी D.M किसी मंत्री । मुख्य मंत्री । प्रधानमंत्री । राष्ट्रपति के लिये कोई राज्य । देश । आलीशान सुसज्जित भवन । सभी व्यवस्थायें । सेवक । कर्मचारी आदि सरकार मुहैया कराती है । ऐसे ही त्रिलोकी राज सत्ता और केन्द्र सत्ता योग में सफ़ल हुए विभिन्न पदासीनों को नियम अनुसार लोक और अन्य सुविधायें उपलब्ध कराती हैं ।

मेरा लोक पहले ही तैयार है । मैं अक्सर वहाँ आता जाता भी हूँ । इसलिये न तो बनने में कोई टाइम लगना है । और न ही बनाना है । जहाँ तक युवतियों की बात है । और ये भाव आपने ( युवतियों से ) वासनात्मक सम्बन्ध के दृष्टिकोण से किया है । तो ये पूर्णतया गलत है । किसी भी लोक की दिव्यांगनाओं से सभी के साथ रति भाव नहीं होता । हालांकि उन युवतियों में से अधिकांश की चाहत यही होती है । इसका एक प्रमाणिक उदाहरण रावण जैसे असुर के जीवन चरित्र से देख सकते हैं । रावण के रंगमहल में उसके साथ काम भोग विलास की इच्छुक लंका की तमाम राक्षस युवतियाँ रहती थी । बहुत सी देव । यक्ष । गंधर्व । नाग कन्याओं में श्रेष्ठ और सुन्दरतम युवतियाँ उसके रंगमहल में होती थी ।
उच्च स्तर के एक योग पुरुष को सामान्यतः 8 पत्नियाँ और 1 प्रेमिका रखने का सिद्ध अधिकार होता है । वास्तव में ये शक्ति रूपा आत्मायें होती हैं । जिनके परस्पर प्रेम भाव के अतिरिक्त कई महत्वपूर्ण कार्य भी होते हैं । और जो करोंङों जन्मों से ऐसी प्राप्ति के लिये तपशील होती हैं । इसके भी अतिरिक्त जो सेवक सेविकाओं के तौर पर गण जैसी नियुक्तियाँ होती हैं । वे भी काफ़ी संचित पुण्य भक्ति द्वारा इस परिणाम को प्राप्त होते हैं । फ़िर अन्य पद स्तरों की आत्माओं की बात और भी अलग है । भले ही आप मेरे मण्डल से दीक्षित हो । पर ( अभी की स्थिति अनुसार ) न तो ऐसे लोकों तक कभी जा सकते हो । और न वहाँ रहने का कोई स्थान प्राप्त होगा । यहाँ तक मात्र देखने के लिये भी प्रवेश नहीं मिल सकता । सरल शब्दों में नीची स्थिति वाले ऊपर जा ही नहीं सकते । अतः ऐसे लोकों की एक साधारण सेविका भी बहुत बङी हैसियत वाली होती है । बृह्म वैवर्त पुराण या गर्ग सहिंता जैसे शास्त्रों में इसकी एक झलक मिलती है । जब बृह्मा विष्णु और शंकर को विशेष कार्य से और विशेष सिफ़ारिश से किसी सन्तों के साथ गोलोक भेजा गया । तो वहाँ के लम्बे गलियारों में घूमते साधारण सेवक 

सेविकाओं ने उन्हें न बैठने को पूछा । और न ही उनमें कोई दिलचस्पी दिखाई । शंकर को हैरानी हुयी । क्योंकि अब तक उन्हें दूसरों द्वारा प्रणाम स्तुति भगवान आदि सुनने का अनुभव अभ्यास था । अतः उन्होंने अपना परिचय दिया - मैं भगवान शंकर हूँ ।
तब उस ( जिससे कहा ) गोपिका ने कहा - वो तो ठीक है । पर कौन सी प्रथ्वी खण्ड के । कौन से बृह्माण्ड के । क्या काम है ? यहाँ तो रोज ही हजारों बृह्मा विष्णु शंकर और जाने कौन कौन दर्शन की फ़रियाद लेकर आते हैं । जाहिर है । ये प्रसंग गोलोक की साधारण सेविका के सामने बृह्मा विष्णु शंकर जैसे त्रिदेवों की हैसियत बता देता है । अतः अभी की स्थिति अनुसार आपकी एक साधारण सेवक की भी स्थिति नहीं बनेगी । तब दिव्य युवतियों का मिलना कतई निराधार बात है । लेकिन ये दीक्षा जीव की भक्ति चाह रहने तक निरंतर मनुष्य जन्म और भक्ति योग प्रदान करती है । इसलिये कोई भी साधक भक्त की पूर्ण परिभाषा में आ जाने पर बहुत कुछ प्राप्त कर सकता है । तब ऐसी कोई युवती मांगने की आवश्यकता नहीं होगी ।
अब जैसा कि मैं हमेशा ही कहता रहा हूँ । और जैसा हमारे साधक ने ऊपर उत्तर में कहा है । मेरा आपसे क्या परिचय है ? क्या सम्बन्ध है ? क्या लेना देना है ? आप अभी सिर्फ़ हमारे स्कूल के साधारण छात्र भर हो । वो भी जिसका सिर्फ़ नाम लिखा है । जिसमें कोई उल्लेखनीय बात या गुण या उपलब्धि नहीं । फ़िर आप कोई 1 वजह ही बताईये । जिस आधार पर ऐसा सोचा जाये । जबकि आपसे बहुत अच्छे स्तर के बहुत से छात्र हैं । और अच्छे योग्य छात्रों को ऐसे प्रयोगात्मक अनुभव स्वयं ही होते हैं । और वे जिज्ञासावश मुझसे अनुभव की जानकारी के बारे में पूछते हुये भी हिचकते हैं ।
जिस तरह निर्धन व्यक्ति का समाज में कोई स्थान महत्व नहीं होता । उसी तरह भक्ति रहित व्यक्ति को ऐसे  दिव्य स्वपन भी स्वपनावस्था में देखना नसीब नहीं होता । फ़िर दिव्य लोगों से सम्पर्क की बात ही बहुत बङी है । अतः अभी समय है । यदि ऐसी कोई इच्छा है । तो उसके लिये कठोर तप करें । धार्मिक इतिहास गवाह है । तमाम स्त्री पुरुषों ने अपने तप और भक्ति से बङे बङे ऊँचे स्थान और दिव्य भोग प्राप्त किये हैं ।

15 जुलाई 2012

उस स्त्री के अनेकों लिंग योनियाँ हैं


सदगुरु महाराज की जय ! सर्वप्रथम तो क्षमा चाहूँगा कि कबीर बीजक की रमैनियों को लिखित रूप देने का दिया गया कार्य बहुत विलम्ब से शुरू कर पा रहा हूँ । दूसरी ओर आपके पावन प्रवचनों के अनुसार शायद यही नियति थी । परन्तु अपनी ओर से नियति को दोष देना भी अनुचित ही होगा । आपकी आप ही जानो । महाराज मुझे बस यही समझ आता है कि - देरी के लिए क्षमा कीजियेगा । कारण जो भी रहा हो ।
रमैनी - 1
अंतर जोति सब्द इक नारी । हरि ब्रह्मा ताके त्रिपुरारी ।
ते तिरिये भग लिंग अनंता । तेऊ न जाने आदिऊ अन्ता ।
वाखरी एक विधाते कीन्हा । चोदह ठहर पाठ सो लीन्हा ।
हरी हर ब्रह्मा महंतो नाऊँ । तिन पुनि तीन बसावल गाऊं ।
निन्ह पुनि रचल खंड ब्रह्मंडा । छव दरसन छानबे पाखंडा ।
पेटहि काहू न वेद पढाया । सुनति करे तुरक नहीं आया ।
नारी मोचित गर्भ प्रसूति । स्वांग धरे बहूते करतूती ।
तहिया हम तुम एके लोहूँ । एके प्रान वियापे मोहूँ ।
एके जनी जना संसारा । कौन ज्ञान ते भयऊ निनारा ।
भव बालक भग द्वारे आया । भग भोगी के पुरख कहाया ।
अविगति की गति काहू न जानी । एक जीभ कित कहों बखानी ।
जो मुख होय जीभ दस लाखा । तो कोई आय महन्तों भाखा ।
कहे कबीर पुकारि के ।  इ लेऊ व्यवहार । राम नाम जाने बिना । बूडी मुवा संसार ।
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अंतर ( अन्दर ) जोति ( प्रकाश ) सब्द ( शब्द ध्वनि ) इक नारी ( सुरति ) । हरि ( विष्णु या सत गुण ) ब्रह्मा ( बृह्मा या रज गुण ) ताके त्रिपुरारी ( शंकर या तम गुण ) । ते ( उस ) तिरिये ( स्त्री ) भग ( योनि या औरत ) लिंग ( शिश्न या पुरुष ) अनंता ( अनगिनत ) । तेऊ ( वो भी ) न जाने आदिऊ ( शुरूआत ) अन्ता ( अन्त ) । वाखरी ( सृष्टि ) एक विधाते ( सृष्टि कर्ता ) कीन्हा । चोदह ( 14 भुवन - तल । अतल । तलातल  आदि ) ठहर पाठ सो लीन्हा । तिन पुनि तीन बसावल गाऊं ( इन तीनों से 3 गुण ) । छव दरसन ( 6 दर्शन ) छानबे पाखंडा ( 96 शास्त्र आदि ) नारी ( प्रकृति ) मोचित गर्भ ( इच्छा ) प्रसूति ( जीव ) । एके जनी जना संसारा ( उसी प्रकृति में सुरति द्वारा सारा सृष्टि खेल )  भव बालक ( जीवात्मा और सृष्टि की अनगिनत उपाधियाँ ) भग द्वारे ( सृष्टि साकार ) आया । भग भोगी के पुरख कहाया ।
अर्थ  - चेतना की अति सूक्ष्म आंतरिकता से इस दृश्य जगत की स्थूलता तक आते आते एक ही चीज के अनेक रूप स्थितियाँ और भाव हो जाते हैं । इसलिये अल्पज्ञ श्रेणी में आने वाले मनुष्य और परमात्म ज्ञान की गूढता नियम अनुसार इस अति गहन सूक्ष्म और गोपनीय ज्ञान को सरलता से समझाने हेतु प्रतीकों के माध्यम से अधिक कहा गया है । जैसे - काल पुरुष । अष्टांगी या आदि शक्ति । बृह्मा । विष्णु । महेश आदि । पर वास्तविक स्थिति में ये आत्मा > मन ( या विचार  ) > इच्छा ( वासना रूप ) रूप स्वपन वत सृष्टि ही है । जो वास्तव में ज्ञान स्थिति में है ही नहीं । सिर्फ़ भृम मात्र है । इसलिये हमारे मुख्य उद्देश्य सुरति शब्द ज्ञान की मूल स्थित के अनुसार ही अर्थ जानते हैं ।  
- मैं कौन हूँ ? who am i या खुद को जानने हेतु आपको किसी सच्चे आत्मज्ञानी सन्त की शरण में जाकर सुरति शब्द योग विधि द्वारा - अन्दर जाना होगा । अन्दर प्रकाश है । शब्द ध्वनि है । और सुरति है । 3 गुणों का खेल है । इसी प्रकाश । शब्द ध्वनि । और 3 गुणों से अनन्त नर ( लिंग ) मादा ( भग ) रूपी जीव सृष्टि का निर्माण हुआ है । लेकिन वे भी इसकी शुरूआत और अन्त नहीं जानते । सृष्टि कर्ता ने सृष्टि बनायी । और 14 भुवन का ठहराव या आधार दिया । बृह्मा विष्णु महेश नाम ( पद या उपाधि ) के 3 अधिकारी नियुक्त किये गये । जिन्होंने 3 गुण सत रज तम का निर्माण किया । फ़िर उन्होंने अनेक खण्ड बृह्माण्डों की रचना की । सृष्टि का कानून ( या बिज्ञान ) तय करते हुये 6 दर्शन और 96 शास्त्र आदि का सृजन किया । इन्हीं से सभी जाति धर्म आदि का चलन हुआ । जन्म से ही ब्राह्मण ( जाति ) कोई नहीं हुआ । और कोई मुसलमान पैदायशी सुन्नत ( खतना ) हुआ नहीं होता । ये सभी पाखण्ड बनाये हुये हैं । जीव या मनुष्य के रूप में सभी समान हैं । और उसी प्रकाश और अक्षर ( ज्योति ) और सुरति ( अंतःकरण ) से बने हैं । जीव की इसी इच्छा से सुरति के द्वारा अनेकों प्रकार के खेल सृष्टि में हो रहे हैं । पर वही तत्व । खून । प्राण आदि की समानता सभी में समान रूप से है । उसी 1 से ये समस्त संसार हुआ है । और इस ज्ञान ( या बिज्ञान ) से कोई अलग नहीं है । वही एक आत्म चेतना अनगिनत उपाधियों में रमण करती हुयी भोग ( खेल ) रही है । पर ये विलक्षण खेल कोई नहीं जान पाता । इसका 1 जीभ ( मुख ) से कितना वर्णन किया जाये । अगर मुँह के अन्दर 10-20 लाख जीभ होती । तब कोई ज्ञानी पुरुष भले ही  इसका वर्णन कर पाता । कबीर कहते हैं । यही लोक व्यवहार ( गति स्थिति ) है । इसमें राम नाम ( अंतर शब्द ) जाने बिना संसार ( जीवात्मायें ) डूब मरता है ।

13 जुलाई 2012

किरन और संजय


10 july 2012 मंगलबार शाम 5 बजे से खराब हुयी इंटरनेट सर्विस शुक्रवार 13 july  2012 शाम 6 बजे सही हुयी । अच्छा या बुरा समय हमें नये नये अनुभवों से परिचित कराता है । विद आउट इंटरनेट 72 घन्टे या 3 दिन का ये अनुभव कैसा था । इस पर अवसर मिलते ही बात होगी । फ़िलहाल बीच में छूट गये समय के पृष्ठ पढते हैं । लेकिन आपको एक बात अवश्य बता दूँ । अशोक खुफ़िया तौर पर मेरा स्टिंग आपरेशन करते रहते हैं । और चुपचाप मेरा फ़ोन रिकार्ड कर रहे हैं । काफ़ी बातचीत रिकार्ड भी हो चुकी है । इस बातचीत में क्या है ? ये समय आने पर ( जल्दी ही ) अशोक ही आपको बतायेंगे । और आडियो format में यह फ़ाइल्स आपको सुनने और डाउनलोड के लिये शीघ्र उपलब्ध होंगी ।
कोई भी स्त्री पुरुष दिखने में एकदम सामान्य से हो सकते हैं । पर उनके विगत में बहुत सा रहस्य छुपा हुआ  


हो सकता है । इतना रहस्य कि वे खुद भी नहीं जानते । मैं अक्सर ही ऐसे लोगों से रूबरू होता रहता हूँ । सामान्य जीवनयापन करने वालों के लिये ये अजूबा हो सकता है । पर आम लीक से हटकर जीने वालों के लिये नहीं । उदाहरण के लिये बैंक वाले जानते हैं कि - वास्तविक रूप से धनी कौन है ? कोई जौहरी जानता है कि - असली हीरे जवाहरात किसके पास है  ? एक डाक्टर ही बेहतर जानता है कि - वास्तव में स्वस्थ कौन और रोगी कौन है ? 
लेकिन उपरोक्त उदाहरणों में किसी हद तक व्यक्ति अपनी प्राप्तियों या हैसियत से परिचित होता है । पर पूर्व जन्म में अलौकिक ज्ञान की किसी भी शाखा का किसी भी स्तर पर कुछ % तक ज्ञान प्राप्त कर चुके पुनः मनुष्य जन्म लिये मनुष्य साधकों के साथ अक्सर ऐसा नहीं होता । वे अपनी ही संचित पूँजी को नहीं जानते । ये उनके उस जन्म के संस्कार के चलते होता है । और उन्हीं संस्कारों के चलते वे संस्कार की आयु अनुसार माया का अज्ञान युक्त जीवन जीते हैं । जैसे ही उनकी जीवन पुस्तिका में ज्ञान या भक्ति संस्कार का पेज खुलने का कृम शुरू होता है । किसी स्वपन व्यक्ति स्थान या अन्य संकेतक माध्यम द्वारा वे बार बार चौंकने लगते हैं । उनके जीवन में कुछ ऐसा घटित होने लगता है । जिससे उन्हें अहसास होता है - नहीं ! बात कुछ और ही है । ऐसा लगता है । मैं कुछ भूल रहा था । जो याद आ रहा है । 
- गुरुजी ! मेरे कमरे में मेरे सामने बैठी हुयी किरन हँसती हुयी कहती है - मैं बार बार सपने में अपना घर भूल 


जाती थी । ऐसा लगता था । मैं रास्ते में चलती हुयी बार बार अपने घर को खोज रही हूँ । पर वह मुझे मिल नहीं रहा । ये सपना मुझे पहले बहुत बार आता था । पर जबसे हँस दीक्षा ली । नहीं आता । इस सपने का मतलब या रहस्य क्या था ?
अगर आप मन का मनोबिज्ञान । स्वपन रहस्य । और कारण शरीर के बारे में सटीक जानकारी नहीं रखते । तो फ़िर आजीवन ये रहस्य.. रहस्य ही रहेगा । पर आप यदि उपरोक्त विषयों की जानकारी रखते हैं । फ़िर ये कोई बहुत बङी बात नहीं है ।
आपस में पति पत्नी संजय और किरन मेरे सामने कुर्सियों पर बैठे हुये हैं । संजय का छोटा भाई मनोज जो C.A अध्ययनरत है । भी आया हुआ है । उसे ज्यादा छुट्टी नहीं मिलीं । अतः वह 3 घण्टे रुककर वापिस लौट गया । पर किरन और संजय रुक गये । मनोज क्योंकि जाने वाला था । अतः तब तक का पूरा समय मैं उसी को देता हूँ । मनोज नवयुवक है । और गम्भीर सा दिखता है । मैं उसके मन में सदियों से परम्परागत बैठा हुआ इंसानी डर देखता हूँ ।
- इस दीक्षा के बाद । मनोज पूछता है - रास्ते में कोई देवी देवता का मन्दिर मिले । तो माथा नवाना है या नहीं ?
भारत को धार्मिक ज्ञान में सर्वोच्च और विश्व धर्म गुरु हमेशा कहा जाता है । क्योंकि तुलनात्मक स्तर पर इतनी धार्मिकता और धार्मिक समृद्धि किसी और देश में आज तक देखने में नहीं आयी । मुझे डिस्कवरी चैनल पर कामेडियन पाल द्वारा भारत दर्शन पर तैयार किया

वृत चित्र याद आता है । Paul ने उस भाग में कुभ मेले का एक दृश्य जोङा है । जिसमें भारी भीङ में Paul अपनी एक भारतीय सहयोगी के साथ नागा साधुओं के कैंप में जाते हैं । उलझे गन्दे बालों की जटायें और तन पर भभूत लपेटे वह साधु Paul से पूछता है - क्या तुम मुझे गुरु बनाना पसन्द करोगे ?
Paul हिन्दी नहीं जानते । वह अपनी दुभाषिया सहयोगी के माध्यम से प्रतिप्रश्न करते हैं - अवश्य ! पर इससे मुझे क्या फ़ायदा होगा ? दुभाषिया नागा के उत्तर को बताती है - आत्म उन्नति । वह साधु एक साधारण सी पतले दानों की रुद्राक्ष जैसी माला Paul के गले में डाल देता है । और कानों में फ़ूँक मार देता है । बस बन गया गुरु । इसके बाद शायद ही जीवन या जीवन के बाद इन गुरु शिष्य ? का कभी मिलना हो ।
इसलिये C.A अध्ययनरत भारत के इस युवा के प्रश्न पर मुझे कुछ हैरानी सी होती है । जबकि काफ़ी दिनों से यह मेरे ब्लाग पढ रहा है । सम्पर्क में भी है ।
- अगर उसी मन्दिर के बाहर । मैं मनोज को उत्तर देने के बजाय प्रश्न करता हूँ - पत्थर की बनी शेर की मूर्ति लगी हो । तो तुम डरोगे । या भागोगे ?
मनोज दोनों प्रतिक्रियाओं के लिये मना करता है ।
- उसी तरह । मैंने कहा - तुम माथा टेकते हो । तब भी कोई बात नहीं । नहीं टेकते हो । तब भी कोई बात नहीं । पत्थर बेजान है । पत्थर का देवता भी बेजान है । वह बेचारा है ही नहीं । तब क्या फ़ायदा । और क्या नुकसान ? जो कुछ है । सिर्फ़ अज्ञानवश तुम्हारी धारणा बन गयी है । जब बालपन में तुम्हें पाठय पुस्तक से आ से आम का परिचय कराया गया था । तो क्या अब भी तुम उसी आम के चित्र से आम को पहचानते हो । या चित्र खाने से तुम्हारा आम खाने का काम हो जाता है । जाहिर है । अब तुम असली आम कैसा है । क्या है । कहाँ है से परिचित हो गये हो ।
कोई 1 घण्टे की बातचीत में मनोज के काफ़ी संशय दूर हो जाते हैं । वह ध्यान की सही विधियों का अभ्यास जानता सीखता है । और तुरन्त ही क्रियात्मक प्रयोग के छोटे अभ्यास करता है ।
अभी मैं किरन के प्रश्न का उत्तर दे पाता कि संजय ने प्रश्न किया  - हाँ गुरूजी ! एक स्वपन मुझे भी बार बार आता है । उसमें मैं एक ट्रेन में बैठा हुआ होता हूँ । पर वह ट्रेन अपनी मंजिल पर कभी नहीं पहुँच पाती । और चह सफ़र बीच में ही गङबङा सा जाता है । इसका क्या  रहस्य है । और एक और बात गुरुजी ! मेरा आप सबसे मिलना क्या हमारे पिछले जन्म के संस्कार थे । और मैं पूर्वजन्म में कौन था ?
डा. संजय कोई 9-10 महीने पहले मेरे सम्पर्क में आया था । शुरूआती 4 महीने तो संजय ब्लाग ही पढते रहे । और हर पेज पढकर चौंके - अरे ! यही तो वह सब है । जिसकी मुझे आज तक तलाश थी । लेकिन लगातार ब्लाग पढने के बाद भी संजय ने प्रत्यक्ष रूप से कभी सम्पर्क नहीं किया । इसके पीछे हर आम पाठक की तरह एक अनजानी सी झिझक भी थी । फ़िर आखिरकार संजय ने फ़ोन से सम्पर्क किया । और मुझसे मिलने और ( श्री महाराज जी से ) हँस दीक्षा की अनुमति चाही । फ़िर कई बार फ़ोन के बाद मार्च 2012 में होली पर यह शुभ अवसर आया । और संजय अपनी पत्नी और दोनों बच्चों के साथ हमारे ( आत्मज्ञान ) परिवार का ही सदस्य बन गया ।
- गुरुजी ! दीक्षा के 8 दिन बाद आश्रम से लौटते समय संजय ने रास्ते से मुझे फ़ोन किया - आपसे मिलने की बहुत इच्छा थी ।
- ठीक है । पर अभी नहीं । मैंने संक्षेप में कहा - आने वाली गुरु पूर्णिमा पर मिल लेना ।
और अब 9 july 2012  को संजय और किरन मेरे सामने बैठे थे ।
- आप लोग पूर्व जन्म में माँ पुत्र थे । मैं अगली सुबह संजय और किरन से कहता हूँ - फ़िर एक दूर के रिश्ते में मौसेरे भाई बहन भी रहे । लेकिन महत्वपूर्ण बात ये है कि आपका मनुष्य रूप में ये दूसरा जन्म है । इससे पहले जन्म में भी आप मनुष्य योनि में ही थे । इसका कारण आपकी इससे पूर्व जन्म में सच्चे सन्त द्वारा हुयी हँस दीक्षा थी । 1947 में तोतापुरी > अद्वैतानन्द > स्वरूपानन्द > अनिरुद्ध सन्त द्वारा आपकी हँस दीक्षा हुयी थी । अपने पूर्व जन्म में आप चम्पारण बिहार के रहने वाले थे । स्वरूपानन्द के बेहद योग्य सन्त अनिरुद्ध जी महाराज ने भी सतनाम का डंका बजा दिया था । और पूरे भारत में प्रचार किया था ।
लेकिन अनिरुद्ध सिर्फ़ हँसदीक्षा ही देते थे । ( पाठकों की जानकारी हेतु बता दूँ । सतपाल । विदेश में बसे बाल योगेश्वर आदि चारों भाईयों के पिता हँस महाराज के नाम से प्रसिद्ध सन्त हँस भी इन्हीं अनिरुद्ध के शिष्य थे । बाद में किसी कारण से थोङा अनबन टायप मूड में हँस अनिरुद्ध के ही गुरु स्वरूपानन्द के पास चले गये थे । जो उस समय सशरीर थे )
लेकिन क्योंकि 1947 का समय और वो भी बिहार का चम्पारण जैसा क्षेत्र इसलिये आपने इस दुर्लभ अनमोल ज्ञान को भेङचाल अन्दाज में ही लिया । इसकी असली कीमत नहीं जानी । यानी ठीक से भजन का अभ्यास नहीं किया । कोई नाम कमाई नहीं की । इसलिये मनुष्य जन्म ( की नाम उपलब्धि ) को छोङकर बाकी संस्कार लिपटे रहे । इसलिये ही वह ज्ञान बीज बार बार आपको स्वपन ( वास्तव में कारण शरीर योग ) द्वारा याद दिलाता रहा । जिसमें किरन अपने ( असली ) घर (  सचखण्ड ) का पता भूल गयी । और आप ट्रेन द्वारा कोई सफ़र ( नाम जप से योग यात्रा ) तय नहीं कर पाये । या मंजिल तक नहीं पहुँचे । बाकी अभी 200 दिन और आपको कुछ असमंजस जैसा समय रहेगा । जो कठिन योग अभ्यास भावना से क्षीण भी हो सकता है ।
इन हँसमुख मिलनसार स्वभाव वाले पति पत्नी से और भी बहुत सी बातें हुयीं । जिनको समय समय पर प्रसंग अनुसार बताता रहूँगा । पर अभी सुबह के 10:30 होने जा रहे हैं । और कार्य समय समाप्त हो रहा है । इसलिये आज इतना ही । साहेब ।

तब तुम ऊलजलूल बकने लगते हो

जीवन अहस्तांतरणीय है - जगत में जो भी मूल्यवान है - जीवन, प्रेम या सौंदर्य । उसका आविष्कार स्वयं करना पड़ता है । उसे किसी ओर से पाने का कोई उपाय नहीं है । 1 अदभुत वार्ता का मुझे स्मरण आता है । दूसरे महायुद्ध के समय मरे हुए, मरणासन्न, चोट खाये हुए सैनिकों से भरी हुई किसी खाई में 2 मित्रों के बीच 1 बातचीत हुई थी । उनमें से 1 बिलकुल मृत्यु के द्वार पर है । वह जानता है कि वह मरने को है । उसकी जीवन ज्योति थोड़ी ही देर की और है । वह उसके पास ही पड़े अपने मित्र से कहता है - मित्र सुनो । मैं जानता हूं कि तुम्हारा जीवन शुभ नहीं रहा । बहुत अपराध तुम्हारे नाम हैं । और अक्षम्य भूलें । उनकी काली छाया सदा ही तुम्हें घेरे रही हैं । उसके कारण बहुत दुख और अपमान तुमने सहे हैं । लेकिन मेरे विरोध में अधिकारियों के पास कुछ भी नहीं है । मेरी किताबों में कोई दाग नहीं । तुम मेरा नाम ले लो । मेरा सैनिक नंबर और मेरा जीवन भी । और मैं तुम्हारा नाम और जीवन ले लेता हूं । मैं तो मर रहा हूं । मैं तुम्हारे अपराध और कालिमाओं को अपने साथ लेता जाऊं । देर न करो । यह मेरी किताब रही । कृपा करो । अपनी किताब मुझे दे दो । प्रेम में कहे ये शब्द कितने मधुर हैं । काश, ऐसा हो सकता ? लेकिन, क्या जीवन बदला जा सकता है ? नाम और किताबें बदली जा सकती हैं । क्योंकि वे जीवन नहीं हैं । जीवन को किसी से कैसे बदला जा सकता है ? और न किसी की जगह मर ही सकता है । वस्तुत: कोई भी, किसी भी भांति उस बिंदु पर नहीं हो हो सकता है । जहां किसी और का होना है । किसी के पाप या पुण्य लेने का कोई मार्ग नहीं है । यह असंभव है । जीवन ऐसी वस्तु नहीं है । जिसे कि किसी से अदल बदल किया जा सके । उसे तो स्वयं से और स्वयं ही निर्मित करना होता है । उस दूसरे सैनिक ने अपने विदा 

होते मित्र को हृदय से लगाकर कहा था - क्षमा करो । तुम्हारा नाम और किताब लेकर भी तो मैं ही बना रहूंगा । मनुष्य के समक्ष अन्य दिखूंगा । लेकिन असली सवाल तो परमात्मा के सामने है । उन आंखों के सामने तो बदली हुई किताबें धोखा नहीं दे सकेंगी । अपना जीवन प्रत्येक को वैसे ही निर्मित करना होता है । जैसे कि कोई नृत्य सीखता है । यह चित्रों या मूर्तियों के बनने जैसा नहीं है । उसमें तो बनाने वाला और बनने वाला 1 ही हैं । इसलिए अपना जीवन न तो किसी को भेंट किया जा सकता है । और न किसी से उधार ही पाया जा सकता है । जीवन अहस्तांतरणीय है । ओशो । 
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विज्ञान भैरव तंत्र का जगत बौद्धिक नहीं है । वह दार्शनिक भी नहीं है । तंत्र शब्द का अर्थ है - विधि, उपाय, मार्ग । इसलिए यह 1 वैज्ञानिक ग्रंथ है । विज्ञान क्यों की नहीं, कैसे की फिक्र करता है । दर्शन और विज्ञान में यही बुनियादी भेद है । दर्शन पूछता है - यह अस्तित्व क्यों है ? विज्ञान पूछता है - यह अस्तित्व कैसे है ? जब तुम कैसे का प्रश्न पूछते हो । तब उपाय विधि महत्वपूर्ण हो जाती है । तब सिद्धांत व्यर्थ हो जाती है । अनुभव केंद्र बन जाता है । विज्ञान का मतलब है चेतना है । और भैरव का विशेष शब्द है । तांत्रिक शब्द । जो पारगामी के लिए कहा जाता है । इसीलिए शिव को भैरव कहते हैं । और देवी को भैरवी । वे जो समस्त द्वैत के पार चले जाते हैं । पार्वती कहती हैं - आपका सत्य रूप क्या है ? यह आपका आश्चर्य भरा जगत क्या है ? इसका बीज क्या है ? विश्व चक्र की धुरी क्या है ? यह चक्र चलता ही जाता है - महा परिवर्तन, सतत प्रवाह । इसका मध्य बिंदु क्या है ? इसकी धुरी कहां है ? अचल केंद्र कहां है ? रूपों पर छाए । लेकिन रूप के परे यह जीवन क्या है ? देश और काल, नाम और प्रत्यय के परे जाकर हम इसमे कैसे पूर्णत: प्रवेश करे ? मेरे संशय निर्मूल करें ।
लेकिन संशय निर्मूल कैसे होंगे ? किसके ऊपर से ? क्या कोई उत्तर है जो कि मन के संशय दूर कर दे ? मन ही तो संशय है । जब तक मन नहीं मिटता है । संशय निर्मूल कैसे होंगे ? शिव उत्तर देंगे । उनके उत्तर में सिर्फ विधियां है - सबसे पुरानी, सबसे प्राचीन विधियां । लेकिन तुम उन्हें अत्याधुनिक भी कह सकते हो । क्योंकि उनमें जोड़ा नहीं जा सकता । वे पूर्ण हैं । 112  विधियां । उनमें सभी संभावनाओं का समावेश है । मन को शुद्ध करने के, मन के अतिक्रमण के सभी उपाय उनमें समाए हैं । शिव की 112  विधियों में 1 और विधि नहीं जोड़ी जा सकती । कुछ जोड़ने की गुंजायश ही नहीं है । यह सर्वांगीण है । संपूर्ण है । अंतिम है । यह सबसे प्राचीन है । और साथ ही सबसे आधुनिक । सबसे नवीन । पुराने पर्वतों की भांति ये तंत्र पुराने हैं । शाश्वत जैसे लगते हैं । 

और साथ ही सुबह के सूरज के सामने खड़े ओस कण की भांति ये नए हैं । ये इतने ताजे हैं । ध्यान की इन 112  विधियों से मन के रूपांतरण का पूरा विज्ञान निर्मित हुआ है । 1-1  कर हम उनमें प्रवेश करेंगे । पहले हम उन्हें बुद्धि से समझने की चेष्टा करेंगे । लेकिन बुद्धि को मात्र 1 यंत्र की तरह काम में लाओ । मालिक की तरह नहीं । समझने के लिए यंत्र की तरह उसका उपयोग करो । लेकिन उसके जरिए नए व्यवधान मत पैदा करो । जिस समय हम इन विधियों की चर्चा करेंगे । तुम अपने पुराने ज्ञान को पुरानी जानकारियों को 1 किनारे धर देना । उन्हें अलग ही कर देना । वे रास्ते की धूल भर हैं । इन विधियों का साक्षात्कार निश्चित ही सावचेत मन से करो । लेकिन तर्क को हटाकर करो । इस भ्रम में मत रहो कि विवाद करने वाला मन सावचेत मन है । वह नहीं है । क्योंकि जिस क्षण तुम विवाद में उतरते हो । उसी क्षण सजगता खो जाती है । सावचेत नहीं रहते हो । तुम तब यहां हो ही नहीं । ये विधियां किसी धर्म की नहीं है । वे ठीक वैसे ही हिंदू नहीं है । जैसे सापेक्षवाद का सिद्धांत आइंस्टीन के द्वारा प्रतिपादित होने के कारण यहूदी नहीं हो जाता है । रेडियों टेलीविजन ईसाई नहीं है । ये विधियां हिंदुओं की ईजाद अवश्य है । लेकिन वे स्वयं हिंदू नहीं हैं । इसलिए इन विधियों में किसी धार्मिक अनुष्ठान का उल्लेख नहीं रहेगा । किसी मंदिर की जरूरत नहीं है । तुम स्वयं मंदिर हो । तुम ही प्रयोगशाला हो । तुम्हारे भीतर ही पूरा प्रयोग होने वाला है । और विश्वास की भी जरूरत नहीं है । तंत्र धर्म नहीं है । विज्ञान है । किसी विश्वास की जरूरत नहीं है । कुरआन या वेद में । बुद्ध या महावीर में आस्था रखने की आवश्यकता नहीं है । नहीं, किसी विश्वास की आवश्यकता है । प्रयोग करने का महा साहस पर्याप्त है । प्रयोग करने की हिम्मत काफी है । 1 मुसलमान प्रयोग कर सकता है । वह कुरआन के गहरे अर्थों को उपलब्ध हो जाएगा । 1 हिंदू अभ्यास कर सकता है । और वह पहली दफा जानेगा कि वेद क्या है ? वैसे ही 1 जैन इस साधना में उतर सकता है । बौद्ध इस साधना में उतर सकता है । 1 ईसाई इस साधना में उतर सकता है । वे जहां हैं । तंत्र उन्हें आप्तकाम करेगा । उनके अपने चुने हुए रास्ते जो भी हों । तंत्र सहयोगी होगा । यही कारण है कि जनसाधारण के लिए तंत्र नहीं समझा गया । और सदा यह होता है कि जब तुम किसी चीज को नहीं समझते हो । तो उसे गलत जरूर समझते हो । क्योंकि तब तुम्हें लगता है कि समझते जरूर हो । तुम रिक्त स्थान में बने रहने को राज़ी नहीं हो । दूसरी बात कि जब तुम किसी चीज को नहीं समझते हो । तुम उसे गाली देने लगते हो । यह इसलिए कि यह तुम्हें अपमानजनक लगता है । तुम सोचते हो । मैं और नहीं समझूं । यह असंभव है । इस चीज के साथ ही कुछ भूल होगी । और तब तुम गाली देने लगते हो । तब तुम ऊलजलूल बकने लगते हो । और कहते हो कि - अब ठीक है । इसलिए तंत्र को नहीं समझा गया । और तंत्र को गलत समझा गया । महान राजा भोज ने पवित्र उज्जैन नगरी में तंत्र के विद्यापीठ को खत्म कर दिया । 1 लाख तांत्रिक जोड़ों को काट दिया । क्यों ये क्या है ? हमारी समझ में नहीं आता । कुछ सालों पहले वहीं पर राजा विक्रमादित्य ने उन्हीं तांत्रिकों कितना सम्मान दिया । यह इतना गहरा और उँचा था कि यह होना स्वाभाविक था । तीसरी बात कि चूंकि तंत्र द्वैत के पार जाता है । इसलिए उसका दृष्टिकोण अति नैतिक है । कृपया कर इन शब्दों को समझो - नैतिक, अनैतिक, अति नैतिक । नैतिक क्या है ? हम समझते हैं । अनैतिक क्या है ? हम समझते हैं । लेकिन जब कोई चीज अति नैतिक हो जाती है । दोनों के पार चली जाती है । तब उसे समझना कठिन है । ओशो । 
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नटराज ध्यान - नृत्य को अपने ढंग से बहने दो । उसे आरोपित मत करो । बल्कि उसका अनुसरण करो । उसे घटने दो । वह कोई कृत्य नहीं । 1 घटना है । उत्सव पूर्ण भाव में रहो । तुम कोई बड़ा गंभीर काम नहीं कर रहे हो । बस खेल रहे हो । अपनी जीवन ऊर्जा से खेल रहे हो । उसे अपने ढंग से बहने दे रहे हो । उसे बस ऐसे जैसे हवा बहती है । और नदी बहती है । प्रवाहित होने दो । तुम भी प्रवाहित हो रहे हो । बह रहे हो । इसे अनुभव करो । और खेल के भी में रहे । इस शब्द " खेल पूर्ण भाव " का ध्यान रखो । मेरे साथ यह शब्द बहुत प्राथमिक है । इस देश में हम सृष्टि को परमात्मा की लीला, परमात्मा को खेल कहते है । परमात्मा ने संसार का सृजन नहीं किया है । वह उसका खेल है ।
निर्देश - पहला चरण । 40 मिनट । आंखे बंद कर इस प्रकार नाचें । जैसे आविष्ट हो गए हों । अपने पूरे चेतन को उभरकर नृत्य में प्रवेश करने दें । न तो नृत्य को नियंत्रित करें । और न ही जो हो रहा है । उसके साक्षी बनें । बस नृत्य में पूरी तरह डूब जाएं ।
दूसरा चरण - 20 मिनट । आंखे बंद रखे हुए ही तत्क्षण लेट जाएं । शांत और निश्चल रहें ।
तीसरा चरण - 5 मिनट । उत्सव भाव से नाचें । आनंदित हों । और अहो भाव व्यक्त करें । नर्तक को । अहंकार के केंद्र को भूल जाओ । नृत्य ही हो रहो । यही ध्यान है । इतनी गहनता से नाचो कि तुम यह बिलकुल भूल जाओ कि तुम नाच रहे हो । और यह महसूस होने लगे कि तुम नृत्य ही हो । यह 2 का भेद मिट जाना चाहिए । फिर वह ध्यान बन जाता है । यदि भेद बना रहे । तो फिर वह 1 व्यायाम ही है । अच्छा है । स्वास्थकर है । लेकिन उसे अध्यात्मिक नहीं कहा जा सकता है । वह बस 1 साधारण नृत्य ही हुआ । नृत्य स्वयं में अच्छा है । जहां तक चलता है । अच्छा है । उसके बाद तुम ताजे और युवा महसूस करोगे । परंतु वह अभी ध्यान नहीं बना । नर्तक को विदा देते रहना चाहिए । जब तक कि केवल नृत्य ही न बचे । तो क्या करना है ? नृत्य में समग्र होओ । क्योंकि नर्तक नृत्य भेद तभी तक रह सकता है । जब तक तुम उसमें समग्र नहीं हो । यदि तुम 1 और खड़े रहकर अपने नृत्य को देखते रहते हो । तो भेद बना रहेगा । तुम नर्तक हो । और तुम नृत्य कर रहे हो । फिर नृत्य 1 कृत्य मात्र होता है । जो तुम कर रहे हो । वह तुम्हारा प्राण नहीं है । तो पूर्णतया उसमें संलग्न हो जाओ । लीन हो जाओ । 1 और न खड़े रहो । 1 दर्शक मत बने रहो । सम्मिलित होओ । ओशो  
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भगवान शिव ने शिवतत्व पाने के लिए 4 सूत्र दिए हैं - हनुमान । । गणेश । नंदी । कछुआ ।
हनुमान - ब्रह्मचर्य, अहं मुक्त । गणेश - आज्ञा चक्र का खोलना ।
नंदी - तन मन से स्वस्थ और उर्जावान । कछुआ - चेतना से अंतर्मुखी होना । इन 4 गुणों से सम्पन्न व्यक्ति को अवश्य शिवतत्व की प्राप्ति होती है ।

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