13 जुलाई 2012

किरन और संजय


10 july 2012 मंगलबार शाम 5 बजे से खराब हुयी इंटरनेट सर्विस शुक्रवार 13 july  2012 शाम 6 बजे सही हुयी । अच्छा या बुरा समय हमें नये नये अनुभवों से परिचित कराता है । विद आउट इंटरनेट 72 घन्टे या 3 दिन का ये अनुभव कैसा था । इस पर अवसर मिलते ही बात होगी । फ़िलहाल बीच में छूट गये समय के पृष्ठ पढते हैं । लेकिन आपको एक बात अवश्य बता दूँ । अशोक खुफ़िया तौर पर मेरा स्टिंग आपरेशन करते रहते हैं । और चुपचाप मेरा फ़ोन रिकार्ड कर रहे हैं । काफ़ी बातचीत रिकार्ड भी हो चुकी है । इस बातचीत में क्या है ? ये समय आने पर ( जल्दी ही ) अशोक ही आपको बतायेंगे । और आडियो format में यह फ़ाइल्स आपको सुनने और डाउनलोड के लिये शीघ्र उपलब्ध होंगी ।
कोई भी स्त्री पुरुष दिखने में एकदम सामान्य से हो सकते हैं । पर उनके विगत में बहुत सा रहस्य छुपा हुआ  


हो सकता है । इतना रहस्य कि वे खुद भी नहीं जानते । मैं अक्सर ही ऐसे लोगों से रूबरू होता रहता हूँ । सामान्य जीवनयापन करने वालों के लिये ये अजूबा हो सकता है । पर आम लीक से हटकर जीने वालों के लिये नहीं । उदाहरण के लिये बैंक वाले जानते हैं कि - वास्तविक रूप से धनी कौन है ? कोई जौहरी जानता है कि - असली हीरे जवाहरात किसके पास है  ? एक डाक्टर ही बेहतर जानता है कि - वास्तव में स्वस्थ कौन और रोगी कौन है ? 
लेकिन उपरोक्त उदाहरणों में किसी हद तक व्यक्ति अपनी प्राप्तियों या हैसियत से परिचित होता है । पर पूर्व जन्म में अलौकिक ज्ञान की किसी भी शाखा का किसी भी स्तर पर कुछ % तक ज्ञान प्राप्त कर चुके पुनः मनुष्य जन्म लिये मनुष्य साधकों के साथ अक्सर ऐसा नहीं होता । वे अपनी ही संचित पूँजी को नहीं जानते । ये उनके उस जन्म के संस्कार के चलते होता है । और उन्हीं संस्कारों के चलते वे संस्कार की आयु अनुसार माया का अज्ञान युक्त जीवन जीते हैं । जैसे ही उनकी जीवन पुस्तिका में ज्ञान या भक्ति संस्कार का पेज खुलने का कृम शुरू होता है । किसी स्वपन व्यक्ति स्थान या अन्य संकेतक माध्यम द्वारा वे बार बार चौंकने लगते हैं । उनके जीवन में कुछ ऐसा घटित होने लगता है । जिससे उन्हें अहसास होता है - नहीं ! बात कुछ और ही है । ऐसा लगता है । मैं कुछ भूल रहा था । जो याद आ रहा है । 
- गुरुजी ! मेरे कमरे में मेरे सामने बैठी हुयी किरन हँसती हुयी कहती है - मैं बार बार सपने में अपना घर भूल 


जाती थी । ऐसा लगता था । मैं रास्ते में चलती हुयी बार बार अपने घर को खोज रही हूँ । पर वह मुझे मिल नहीं रहा । ये सपना मुझे पहले बहुत बार आता था । पर जबसे हँस दीक्षा ली । नहीं आता । इस सपने का मतलब या रहस्य क्या था ?
अगर आप मन का मनोबिज्ञान । स्वपन रहस्य । और कारण शरीर के बारे में सटीक जानकारी नहीं रखते । तो फ़िर आजीवन ये रहस्य.. रहस्य ही रहेगा । पर आप यदि उपरोक्त विषयों की जानकारी रखते हैं । फ़िर ये कोई बहुत बङी बात नहीं है ।
आपस में पति पत्नी संजय और किरन मेरे सामने कुर्सियों पर बैठे हुये हैं । संजय का छोटा भाई मनोज जो C.A अध्ययनरत है । भी आया हुआ है । उसे ज्यादा छुट्टी नहीं मिलीं । अतः वह 3 घण्टे रुककर वापिस लौट गया । पर किरन और संजय रुक गये । मनोज क्योंकि जाने वाला था । अतः तब तक का पूरा समय मैं उसी को देता हूँ । मनोज नवयुवक है । और गम्भीर सा दिखता है । मैं उसके मन में सदियों से परम्परागत बैठा हुआ इंसानी डर देखता हूँ ।
- इस दीक्षा के बाद । मनोज पूछता है - रास्ते में कोई देवी देवता का मन्दिर मिले । तो माथा नवाना है या नहीं ?
भारत को धार्मिक ज्ञान में सर्वोच्च और विश्व धर्म गुरु हमेशा कहा जाता है । क्योंकि तुलनात्मक स्तर पर इतनी धार्मिकता और धार्मिक समृद्धि किसी और देश में आज तक देखने में नहीं आयी । मुझे डिस्कवरी चैनल पर कामेडियन पाल द्वारा भारत दर्शन पर तैयार किया

वृत चित्र याद आता है । Paul ने उस भाग में कुभ मेले का एक दृश्य जोङा है । जिसमें भारी भीङ में Paul अपनी एक भारतीय सहयोगी के साथ नागा साधुओं के कैंप में जाते हैं । उलझे गन्दे बालों की जटायें और तन पर भभूत लपेटे वह साधु Paul से पूछता है - क्या तुम मुझे गुरु बनाना पसन्द करोगे ?
Paul हिन्दी नहीं जानते । वह अपनी दुभाषिया सहयोगी के माध्यम से प्रतिप्रश्न करते हैं - अवश्य ! पर इससे मुझे क्या फ़ायदा होगा ? दुभाषिया नागा के उत्तर को बताती है - आत्म उन्नति । वह साधु एक साधारण सी पतले दानों की रुद्राक्ष जैसी माला Paul के गले में डाल देता है । और कानों में फ़ूँक मार देता है । बस बन गया गुरु । इसके बाद शायद ही जीवन या जीवन के बाद इन गुरु शिष्य ? का कभी मिलना हो ।
इसलिये C.A अध्ययनरत भारत के इस युवा के प्रश्न पर मुझे कुछ हैरानी सी होती है । जबकि काफ़ी दिनों से यह मेरे ब्लाग पढ रहा है । सम्पर्क में भी है ।
- अगर उसी मन्दिर के बाहर । मैं मनोज को उत्तर देने के बजाय प्रश्न करता हूँ - पत्थर की बनी शेर की मूर्ति लगी हो । तो तुम डरोगे । या भागोगे ?
मनोज दोनों प्रतिक्रियाओं के लिये मना करता है ।
- उसी तरह । मैंने कहा - तुम माथा टेकते हो । तब भी कोई बात नहीं । नहीं टेकते हो । तब भी कोई बात नहीं । पत्थर बेजान है । पत्थर का देवता भी बेजान है । वह बेचारा है ही नहीं । तब क्या फ़ायदा । और क्या नुकसान ? जो कुछ है । सिर्फ़ अज्ञानवश तुम्हारी धारणा बन गयी है । जब बालपन में तुम्हें पाठय पुस्तक से आ से आम का परिचय कराया गया था । तो क्या अब भी तुम उसी आम के चित्र से आम को पहचानते हो । या चित्र खाने से तुम्हारा आम खाने का काम हो जाता है । जाहिर है । अब तुम असली आम कैसा है । क्या है । कहाँ है से परिचित हो गये हो ।
कोई 1 घण्टे की बातचीत में मनोज के काफ़ी संशय दूर हो जाते हैं । वह ध्यान की सही विधियों का अभ्यास जानता सीखता है । और तुरन्त ही क्रियात्मक प्रयोग के छोटे अभ्यास करता है ।
अभी मैं किरन के प्रश्न का उत्तर दे पाता कि संजय ने प्रश्न किया  - हाँ गुरूजी ! एक स्वपन मुझे भी बार बार आता है । उसमें मैं एक ट्रेन में बैठा हुआ होता हूँ । पर वह ट्रेन अपनी मंजिल पर कभी नहीं पहुँच पाती । और चह सफ़र बीच में ही गङबङा सा जाता है । इसका क्या  रहस्य है । और एक और बात गुरुजी ! मेरा आप सबसे मिलना क्या हमारे पिछले जन्म के संस्कार थे । और मैं पूर्वजन्म में कौन था ?
डा. संजय कोई 9-10 महीने पहले मेरे सम्पर्क में आया था । शुरूआती 4 महीने तो संजय ब्लाग ही पढते रहे । और हर पेज पढकर चौंके - अरे ! यही तो वह सब है । जिसकी मुझे आज तक तलाश थी । लेकिन लगातार ब्लाग पढने के बाद भी संजय ने प्रत्यक्ष रूप से कभी सम्पर्क नहीं किया । इसके पीछे हर आम पाठक की तरह एक अनजानी सी झिझक भी थी । फ़िर आखिरकार संजय ने फ़ोन से सम्पर्क किया । और मुझसे मिलने और ( श्री महाराज जी से ) हँस दीक्षा की अनुमति चाही । फ़िर कई बार फ़ोन के बाद मार्च 2012 में होली पर यह शुभ अवसर आया । और संजय अपनी पत्नी और दोनों बच्चों के साथ हमारे ( आत्मज्ञान ) परिवार का ही सदस्य बन गया ।
- गुरुजी ! दीक्षा के 8 दिन बाद आश्रम से लौटते समय संजय ने रास्ते से मुझे फ़ोन किया - आपसे मिलने की बहुत इच्छा थी ।
- ठीक है । पर अभी नहीं । मैंने संक्षेप में कहा - आने वाली गुरु पूर्णिमा पर मिल लेना ।
और अब 9 july 2012  को संजय और किरन मेरे सामने बैठे थे ।
- आप लोग पूर्व जन्म में माँ पुत्र थे । मैं अगली सुबह संजय और किरन से कहता हूँ - फ़िर एक दूर के रिश्ते में मौसेरे भाई बहन भी रहे । लेकिन महत्वपूर्ण बात ये है कि आपका मनुष्य रूप में ये दूसरा जन्म है । इससे पहले जन्म में भी आप मनुष्य योनि में ही थे । इसका कारण आपकी इससे पूर्व जन्म में सच्चे सन्त द्वारा हुयी हँस दीक्षा थी । 1947 में तोतापुरी > अद्वैतानन्द > स्वरूपानन्द > अनिरुद्ध सन्त द्वारा आपकी हँस दीक्षा हुयी थी । अपने पूर्व जन्म में आप चम्पारण बिहार के रहने वाले थे । स्वरूपानन्द के बेहद योग्य सन्त अनिरुद्ध जी महाराज ने भी सतनाम का डंका बजा दिया था । और पूरे भारत में प्रचार किया था ।
लेकिन अनिरुद्ध सिर्फ़ हँसदीक्षा ही देते थे । ( पाठकों की जानकारी हेतु बता दूँ । सतपाल । विदेश में बसे बाल योगेश्वर आदि चारों भाईयों के पिता हँस महाराज के नाम से प्रसिद्ध सन्त हँस भी इन्हीं अनिरुद्ध के शिष्य थे । बाद में किसी कारण से थोङा अनबन टायप मूड में हँस अनिरुद्ध के ही गुरु स्वरूपानन्द के पास चले गये थे । जो उस समय सशरीर थे )
लेकिन क्योंकि 1947 का समय और वो भी बिहार का चम्पारण जैसा क्षेत्र इसलिये आपने इस दुर्लभ अनमोल ज्ञान को भेङचाल अन्दाज में ही लिया । इसकी असली कीमत नहीं जानी । यानी ठीक से भजन का अभ्यास नहीं किया । कोई नाम कमाई नहीं की । इसलिये मनुष्य जन्म ( की नाम उपलब्धि ) को छोङकर बाकी संस्कार लिपटे रहे । इसलिये ही वह ज्ञान बीज बार बार आपको स्वपन ( वास्तव में कारण शरीर योग ) द्वारा याद दिलाता रहा । जिसमें किरन अपने ( असली ) घर (  सचखण्ड ) का पता भूल गयी । और आप ट्रेन द्वारा कोई सफ़र ( नाम जप से योग यात्रा ) तय नहीं कर पाये । या मंजिल तक नहीं पहुँचे । बाकी अभी 200 दिन और आपको कुछ असमंजस जैसा समय रहेगा । जो कठिन योग अभ्यास भावना से क्षीण भी हो सकता है ।
इन हँसमुख मिलनसार स्वभाव वाले पति पत्नी से और भी बहुत सी बातें हुयीं । जिनको समय समय पर प्रसंग अनुसार बताता रहूँगा । पर अभी सुबह के 10:30 होने जा रहे हैं । और कार्य समय समाप्त हो रहा है । इसलिये आज इतना ही । साहेब ।
एक टिप्पणी भेजें

Follow by Email