13 जुलाई 2012

तब तुम ऊलजलूल बकने लगते हो

जीवन अहस्तांतरणीय है - जगत में जो भी मूल्यवान है - जीवन, प्रेम या सौंदर्य । उसका आविष्कार स्वयं करना पड़ता है । उसे किसी ओर से पाने का कोई उपाय नहीं है । 1 अदभुत वार्ता का मुझे स्मरण आता है । दूसरे महायुद्ध के समय मरे हुए, मरणासन्न, चोट खाये हुए सैनिकों से भरी हुई किसी खाई में 2 मित्रों के बीच 1 बातचीत हुई थी । उनमें से 1 बिलकुल मृत्यु के द्वार पर है । वह जानता है कि वह मरने को है । उसकी जीवन ज्योति थोड़ी ही देर की और है । वह उसके पास ही पड़े अपने मित्र से कहता है - मित्र सुनो । मैं जानता हूं कि तुम्हारा जीवन शुभ नहीं रहा । बहुत अपराध तुम्हारे नाम हैं । और अक्षम्य भूलें । उनकी काली छाया सदा ही तुम्हें घेरे रही हैं । उसके कारण बहुत दुख और अपमान तुमने सहे हैं । लेकिन मेरे विरोध में अधिकारियों के पास कुछ भी नहीं है । मेरी किताबों में कोई दाग नहीं । तुम मेरा नाम ले लो । मेरा सैनिक नंबर और मेरा जीवन भी । और मैं तुम्हारा नाम और जीवन ले लेता हूं । मैं तो मर रहा हूं । मैं तुम्हारे अपराध और कालिमाओं को अपने साथ लेता जाऊं । देर न करो । यह मेरी किताब रही । कृपा करो । अपनी किताब मुझे दे दो । प्रेम में कहे ये शब्द कितने मधुर हैं । काश, ऐसा हो सकता ? लेकिन, क्या जीवन बदला जा सकता है ? नाम और किताबें बदली जा सकती हैं । क्योंकि वे जीवन नहीं हैं । जीवन को किसी से कैसे बदला जा सकता है ? और न किसी की जगह मर ही सकता है । वस्तुत: कोई भी, किसी भी भांति उस बिंदु पर नहीं हो हो सकता है । जहां किसी और का होना है । किसी के पाप या पुण्य लेने का कोई मार्ग नहीं है । यह असंभव है । जीवन ऐसी वस्तु नहीं है । जिसे कि किसी से अदल बदल किया जा सके । उसे तो स्वयं से और स्वयं ही निर्मित करना होता है । उस दूसरे सैनिक ने अपने विदा 

होते मित्र को हृदय से लगाकर कहा था - क्षमा करो । तुम्हारा नाम और किताब लेकर भी तो मैं ही बना रहूंगा । मनुष्य के समक्ष अन्य दिखूंगा । लेकिन असली सवाल तो परमात्मा के सामने है । उन आंखों के सामने तो बदली हुई किताबें धोखा नहीं दे सकेंगी । अपना जीवन प्रत्येक को वैसे ही निर्मित करना होता है । जैसे कि कोई नृत्य सीखता है । यह चित्रों या मूर्तियों के बनने जैसा नहीं है । उसमें तो बनाने वाला और बनने वाला 1 ही हैं । इसलिए अपना जीवन न तो किसी को भेंट किया जा सकता है । और न किसी से उधार ही पाया जा सकता है । जीवन अहस्तांतरणीय है । ओशो । 
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विज्ञान भैरव तंत्र का जगत बौद्धिक नहीं है । वह दार्शनिक भी नहीं है । तंत्र शब्द का अर्थ है - विधि, उपाय, मार्ग । इसलिए यह 1 वैज्ञानिक ग्रंथ है । विज्ञान क्यों की नहीं, कैसे की फिक्र करता है । दर्शन और विज्ञान में यही बुनियादी भेद है । दर्शन पूछता है - यह अस्तित्व क्यों है ? विज्ञान पूछता है - यह अस्तित्व कैसे है ? जब तुम कैसे का प्रश्न पूछते हो । तब उपाय विधि महत्वपूर्ण हो जाती है । तब सिद्धांत व्यर्थ हो जाती है । अनुभव केंद्र बन जाता है । विज्ञान का मतलब है चेतना है । और भैरव का विशेष शब्द है । तांत्रिक शब्द । जो पारगामी के लिए कहा जाता है । इसीलिए शिव को भैरव कहते हैं । और देवी को भैरवी । वे जो समस्त द्वैत के पार चले जाते हैं । पार्वती कहती हैं - आपका सत्य रूप क्या है ? यह आपका आश्चर्य भरा जगत क्या है ? इसका बीज क्या है ? विश्व चक्र की धुरी क्या है ? यह चक्र चलता ही जाता है - महा परिवर्तन, सतत प्रवाह । इसका मध्य बिंदु क्या है ? इसकी धुरी कहां है ? अचल केंद्र कहां है ? रूपों पर छाए । लेकिन रूप के परे यह जीवन क्या है ? देश और काल, नाम और प्रत्यय के परे जाकर हम इसमे कैसे पूर्णत: प्रवेश करे ? मेरे संशय निर्मूल करें ।
लेकिन संशय निर्मूल कैसे होंगे ? किसके ऊपर से ? क्या कोई उत्तर है जो कि मन के संशय दूर कर दे ? मन ही तो संशय है । जब तक मन नहीं मिटता है । संशय निर्मूल कैसे होंगे ? शिव उत्तर देंगे । उनके उत्तर में सिर्फ विधियां है - सबसे पुरानी, सबसे प्राचीन विधियां । लेकिन तुम उन्हें अत्याधुनिक भी कह सकते हो । क्योंकि उनमें जोड़ा नहीं जा सकता । वे पूर्ण हैं । 112  विधियां । उनमें सभी संभावनाओं का समावेश है । मन को शुद्ध करने के, मन के अतिक्रमण के सभी उपाय उनमें समाए हैं । शिव की 112  विधियों में 1 और विधि नहीं जोड़ी जा सकती । कुछ जोड़ने की गुंजायश ही नहीं है । यह सर्वांगीण है । संपूर्ण है । अंतिम है । यह सबसे प्राचीन है । और साथ ही सबसे आधुनिक । सबसे नवीन । पुराने पर्वतों की भांति ये तंत्र पुराने हैं । शाश्वत जैसे लगते हैं । 

और साथ ही सुबह के सूरज के सामने खड़े ओस कण की भांति ये नए हैं । ये इतने ताजे हैं । ध्यान की इन 112  विधियों से मन के रूपांतरण का पूरा विज्ञान निर्मित हुआ है । 1-1  कर हम उनमें प्रवेश करेंगे । पहले हम उन्हें बुद्धि से समझने की चेष्टा करेंगे । लेकिन बुद्धि को मात्र 1 यंत्र की तरह काम में लाओ । मालिक की तरह नहीं । समझने के लिए यंत्र की तरह उसका उपयोग करो । लेकिन उसके जरिए नए व्यवधान मत पैदा करो । जिस समय हम इन विधियों की चर्चा करेंगे । तुम अपने पुराने ज्ञान को पुरानी जानकारियों को 1 किनारे धर देना । उन्हें अलग ही कर देना । वे रास्ते की धूल भर हैं । इन विधियों का साक्षात्कार निश्चित ही सावचेत मन से करो । लेकिन तर्क को हटाकर करो । इस भ्रम में मत रहो कि विवाद करने वाला मन सावचेत मन है । वह नहीं है । क्योंकि जिस क्षण तुम विवाद में उतरते हो । उसी क्षण सजगता खो जाती है । सावचेत नहीं रहते हो । तुम तब यहां हो ही नहीं । ये विधियां किसी धर्म की नहीं है । वे ठीक वैसे ही हिंदू नहीं है । जैसे सापेक्षवाद का सिद्धांत आइंस्टीन के द्वारा प्रतिपादित होने के कारण यहूदी नहीं हो जाता है । रेडियों टेलीविजन ईसाई नहीं है । ये विधियां हिंदुओं की ईजाद अवश्य है । लेकिन वे स्वयं हिंदू नहीं हैं । इसलिए इन विधियों में किसी धार्मिक अनुष्ठान का उल्लेख नहीं रहेगा । किसी मंदिर की जरूरत नहीं है । तुम स्वयं मंदिर हो । तुम ही प्रयोगशाला हो । तुम्हारे भीतर ही पूरा प्रयोग होने वाला है । और विश्वास की भी जरूरत नहीं है । तंत्र धर्म नहीं है । विज्ञान है । किसी विश्वास की जरूरत नहीं है । कुरआन या वेद में । बुद्ध या महावीर में आस्था रखने की आवश्यकता नहीं है । नहीं, किसी विश्वास की आवश्यकता है । प्रयोग करने का महा साहस पर्याप्त है । प्रयोग करने की हिम्मत काफी है । 1 मुसलमान प्रयोग कर सकता है । वह कुरआन के गहरे अर्थों को उपलब्ध हो जाएगा । 1 हिंदू अभ्यास कर सकता है । और वह पहली दफा जानेगा कि वेद क्या है ? वैसे ही 1 जैन इस साधना में उतर सकता है । बौद्ध इस साधना में उतर सकता है । 1 ईसाई इस साधना में उतर सकता है । वे जहां हैं । तंत्र उन्हें आप्तकाम करेगा । उनके अपने चुने हुए रास्ते जो भी हों । तंत्र सहयोगी होगा । यही कारण है कि जनसाधारण के लिए तंत्र नहीं समझा गया । और सदा यह होता है कि जब तुम किसी चीज को नहीं समझते हो । तो उसे गलत जरूर समझते हो । क्योंकि तब तुम्हें लगता है कि समझते जरूर हो । तुम रिक्त स्थान में बने रहने को राज़ी नहीं हो । दूसरी बात कि जब तुम किसी चीज को नहीं समझते हो । तुम उसे गाली देने लगते हो । यह इसलिए कि यह तुम्हें अपमानजनक लगता है । तुम सोचते हो । मैं और नहीं समझूं । यह असंभव है । इस चीज के साथ ही कुछ भूल होगी । और तब तुम गाली देने लगते हो । तब तुम ऊलजलूल बकने लगते हो । और कहते हो कि - अब ठीक है । इसलिए तंत्र को नहीं समझा गया । और तंत्र को गलत समझा गया । महान राजा भोज ने पवित्र उज्जैन नगरी में तंत्र के विद्यापीठ को खत्म कर दिया । 1 लाख तांत्रिक जोड़ों को काट दिया । क्यों ये क्या है ? हमारी समझ में नहीं आता । कुछ सालों पहले वहीं पर राजा विक्रमादित्य ने उन्हीं तांत्रिकों कितना सम्मान दिया । यह इतना गहरा और उँचा था कि यह होना स्वाभाविक था । तीसरी बात कि चूंकि तंत्र द्वैत के पार जाता है । इसलिए उसका दृष्टिकोण अति नैतिक है । कृपया कर इन शब्दों को समझो - नैतिक, अनैतिक, अति नैतिक । नैतिक क्या है ? हम समझते हैं । अनैतिक क्या है ? हम समझते हैं । लेकिन जब कोई चीज अति नैतिक हो जाती है । दोनों के पार चली जाती है । तब उसे समझना कठिन है । ओशो । 
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नटराज ध्यान - नृत्य को अपने ढंग से बहने दो । उसे आरोपित मत करो । बल्कि उसका अनुसरण करो । उसे घटने दो । वह कोई कृत्य नहीं । 1 घटना है । उत्सव पूर्ण भाव में रहो । तुम कोई बड़ा गंभीर काम नहीं कर रहे हो । बस खेल रहे हो । अपनी जीवन ऊर्जा से खेल रहे हो । उसे अपने ढंग से बहने दे रहे हो । उसे बस ऐसे जैसे हवा बहती है । और नदी बहती है । प्रवाहित होने दो । तुम भी प्रवाहित हो रहे हो । बह रहे हो । इसे अनुभव करो । और खेल के भी में रहे । इस शब्द " खेल पूर्ण भाव " का ध्यान रखो । मेरे साथ यह शब्द बहुत प्राथमिक है । इस देश में हम सृष्टि को परमात्मा की लीला, परमात्मा को खेल कहते है । परमात्मा ने संसार का सृजन नहीं किया है । वह उसका खेल है ।
निर्देश - पहला चरण । 40 मिनट । आंखे बंद कर इस प्रकार नाचें । जैसे आविष्ट हो गए हों । अपने पूरे चेतन को उभरकर नृत्य में प्रवेश करने दें । न तो नृत्य को नियंत्रित करें । और न ही जो हो रहा है । उसके साक्षी बनें । बस नृत्य में पूरी तरह डूब जाएं ।
दूसरा चरण - 20 मिनट । आंखे बंद रखे हुए ही तत्क्षण लेट जाएं । शांत और निश्चल रहें ।
तीसरा चरण - 5 मिनट । उत्सव भाव से नाचें । आनंदित हों । और अहो भाव व्यक्त करें । नर्तक को । अहंकार के केंद्र को भूल जाओ । नृत्य ही हो रहो । यही ध्यान है । इतनी गहनता से नाचो कि तुम यह बिलकुल भूल जाओ कि तुम नाच रहे हो । और यह महसूस होने लगे कि तुम नृत्य ही हो । यह 2 का भेद मिट जाना चाहिए । फिर वह ध्यान बन जाता है । यदि भेद बना रहे । तो फिर वह 1 व्यायाम ही है । अच्छा है । स्वास्थकर है । लेकिन उसे अध्यात्मिक नहीं कहा जा सकता है । वह बस 1 साधारण नृत्य ही हुआ । नृत्य स्वयं में अच्छा है । जहां तक चलता है । अच्छा है । उसके बाद तुम ताजे और युवा महसूस करोगे । परंतु वह अभी ध्यान नहीं बना । नर्तक को विदा देते रहना चाहिए । जब तक कि केवल नृत्य ही न बचे । तो क्या करना है ? नृत्य में समग्र होओ । क्योंकि नर्तक नृत्य भेद तभी तक रह सकता है । जब तक तुम उसमें समग्र नहीं हो । यदि तुम 1 और खड़े रहकर अपने नृत्य को देखते रहते हो । तो भेद बना रहेगा । तुम नर्तक हो । और तुम नृत्य कर रहे हो । फिर नृत्य 1 कृत्य मात्र होता है । जो तुम कर रहे हो । वह तुम्हारा प्राण नहीं है । तो पूर्णतया उसमें संलग्न हो जाओ । लीन हो जाओ । 1 और न खड़े रहो । 1 दर्शक मत बने रहो । सम्मिलित होओ । ओशो  
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भगवान शिव ने शिवतत्व पाने के लिए 4 सूत्र दिए हैं - हनुमान । । गणेश । नंदी । कछुआ ।
हनुमान - ब्रह्मचर्य, अहं मुक्त । गणेश - आज्ञा चक्र का खोलना ।
नंदी - तन मन से स्वस्थ और उर्जावान । कछुआ - चेतना से अंतर्मुखी होना । इन 4 गुणों से सम्पन्न व्यक्ति को अवश्य शिवतत्व की प्राप्ति होती है ।
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