26 फ़रवरी 2011

इसे दिन में कम से कम दो बार करो

आपका राजनीति पर क्या कहना है ? ओशो - क्या मुझे कहने की जरूरत है ? मैं इसे अभिशाप देता हूँ । यह दुर्घटना है । जिसके कारण हम सदियों से दुख भोग रहे हैं । राजनीति की कतई जरूरत नहीं है । परंतु राजनेता इसे गैर जरूरी नहीं होने देंगे । क्योंकि तब वे राष्ट्रपति खो देंगे । उनका व्हाइट हाउस । उनके राजभवन । उनके प्रधानमंत्री सब विदा हो जाएँगे । राजनीति की जरूरत नहीं है । यह पूरी तरह से समय बाह्म बात है । इनकी जरूरत थी । क्योंकि देश लगातार लड़ रहे हैं । तीन हजार सालों में पाँच हजार युद्ध लड़े गए हैं । यदि हम देशों की सीमाएँ समाप्त कर देते हैं । जो कि मात्र नक्शों पर होती हैं । न कि जमीन पर । कौन राजनीति की परवाह करेगा ? हाँ, विश्व सरकार होगी । परंतु यह सरकार सिर्फ कार्यकारी होगी । इसकी अलग से कोई प्रतिष्ठा नहीं होगी । क्योंकि वहाँ किसी के साथ किसी प्रकार की प्रतियोगिता नहीं होगी । यदि तुम विश्व सरकार के राष्ट्रपति हो । तो क्या हुआ ? तुम किसी तरह से किसी दूसरे से ऊँचे नहीं हो । कार्यकारी सरकार का मतलब है । जिस तरह से रेलवे चलती है । रेलवे का कौन प्रधान है । इसकी कौन परवाह करता है ? जैसे कि डाक विभाग चलता है । और पूरी तरह से चलता है । डाक विभाग का प्रधान कौन है ? इसकी कौन चिंता लेता है ? देशों को विदा करना होगा । और देशों के विदा होने के साथ ही राजनीति स्वत: विदा हो जाएगी । वह आत्महत्या कर लेगी । कार्यकारी सरकार में जो जरूरी है । वही रहेगा । वह रोटरी क्लब की तरह बनाई जा सकती है । तो कभी काला व्यक्ति प्रधान होगा । कभी स्त्री प्रधान होगी । कभी चीनी प्रधान होगा । कभी रशियन प्रधान होगा । कभी अमेरिकन प्रधान होगा । परंतु वह चक्र की तरह घूमता रहेगा । शायद छह माह से अधिक एक व्यक्ति को नहीं दिया जाना चाहिए । इससे अधिक खतरनाक है । तो छह माह के लिए प्रधान बनो । और उसके बाद हमेशा के लिए खो जाओ । और कोई व्यक्ति फिर से नहीं चुना जाना चाहिए । यह मात्र दिमाग का दिवालियापन है कि एक ही व्यक्ति को बार बार प्रधानमंत्री के लिए चुना जाए । क्या तुम इसमें दिमागी दिवालियापन नहीं देखते हो ? तुम्हारे पास कोई और बुद्धिमान व्यक्ति नहीं है ? तुम्हारे पास मात्र एक ही मूर्ख है ? इस दुनिया में किसी राजनैतिक दल की कोई जरूरत नहीं है । व्यक्ति व्यक्ति के बारे में तय करे । किसी राजनैतिक दल की कोई जरूरत नहीं है । यह लोकतंत्र के लिए बहुत विध्वंसात्मक है । यद्यपि लोग कहते हैं कि लोकतंत्र राजनैतिक दलों के बिना नहीं हो सकता । मैं तुमसे कहना चाहता हूँ कि राजनैतिक दलों के होते लोकतंत्र नहीं आ सकता । क्योंकि उनके अपने निहित स्वार्थ हैं । प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र है । किसी भी पद के लिए । या किसी भी व्यक्ति को चुनने के लिए । और जो भी व्यक्ति आएगा । वह तुम्हारे प्रधानमंत्री से अधिक बुद्धिमान होगा । चूँकि वह उस पद पर सिर्फ छह माह के लिए है । तो वह अपने समय को इस विश्वविद्यालय का उदघाटन या उस पुलिया का उदघाटन । इस सड़क का उदघाटन या सभी तरह की नासमझियों के उदघाटन में जाया नहीं करेगा । और संसद में सांसद सभी तरह की नासमझियों व अर्थहीन बातों पर बहसें किए चले जा रहे हैं । मानो उनके पास अनंत समय हो । एक छोटा से मसौदा स्वीकृत होने में सालों लग जाते हैं । एक व्यक्ति जिसके पास मात्र छह महीने हैं । वह इस तरह की नासमझियों में समय व्यर्थ नहीं कर सकता । वह वैज्ञानिक सलाहकार विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को रखेगा । उदाहरण के लिए अर्थव्यवस्था के लिए वह दुनिया के सभी अर्थशास्त्रियों से सलाह लेगा । उसके पास बहुत समय नहीं है । वह तृतीय श्रेणी के राजनेताओं को साथ नहीं रख सकता । जो सिवाय झूठ बोलने के कुछ नहीं जानते । यदि उसे शिक्षा के बारे में कुछ तय करना है । तो वह दुनिया के महान शिक्षा शास्त्रियों से सलाह लेगा । परंतु अभी तो आश्चर्यजनक चीजें हो रही हैं । भारत में, जब मैं था । उस समय वहाँ की सरकार में जो व्यक्ति केंद्रीय शिक्षामंत्री था । मैं उस व्यक्ति को जानता हूँ । मैंने कई नालायक देखे हैं । परंतु वह सिर्फ नंबर एक था । वह शिक्षामंत्री है । वह पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था के बारे में तय करेगा । परंतु उसने कुछ भी तय नहीं किया । नौकरशाही उसी ढर्रे पर चलती रही । वे टुच्चे खेल खेलते रहे । पीठ में छुरा भोंकना । टांग खींचना । शीर्ष पर पहुँचने के लिए सब तरह की जुगाड़ लगाना । मैं सूत्र देता हूँ - एक विश्व । एक सरकार ।
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ध्यान विधि स्वर्णिम प्रकाश ध्यान श्वास भीतर लेते हुए स्वर्णिम प्रकाश को सिर से अपने भीतर आने दो । क्योंकि वहीं पर ही स्वर्ण पुष्प प्रतीक्षा कर रहा है । वह स्वर्णिम प्रकाश सहायक होगा । वह तुम्हारे पूरे शरीर को स्वच्छ कर देगा । और उसे सृजनात्मकता से पूरी तरह भर देगा । यह पुरुष ऊर्जा है । इसे दिन में कम से कम दो बार करो । सबसे अच्छा समय सुबह सुबह का है । ठीक तुम्हारे बिस्तर से उठने से पहले । जिस क्षण तुम्हें लगे कि तुम जाग गए । इसे कम से कम बीस मिनट के लिए करो । सुबह सबसे पहला यही काम करो । बिस्तर से मत उठो । वहीं । उसी समय । तत्क्षण इस विधि को करो । क्योंकि जब तुम नींद से जग रहे होते हो । तब बहुत नाजुक और संवेदनशील होते हो । जब तुम नींद से बाहर आ रहे होते हो । तब बहुत ताजे होते हो । और इस विधि का प्रभाव बहुत गहरा जाएगा । जिस समय तुम नींद से बाहर आ रहे होते हो । तो उस समय सदा की अपेक्षा तुम बुद्धि में कम होते हो । तो कुछ अंतराल हैं । जिनके माध्यम से यह विधि तुम्हारे अंतर्तम सत्व में प्रवेश कर जाएगी । और सुबह सुबह, जब तुम जाग रहे होते हो । और पूरी पृथ्वी जाग रही होती है । उस समय पूरे विश्व में जाग रही ऊर्जा की एक विशाल लहर होती है । उस लहर का उपयोग कर लो । अवसर को मत चूको । सभी प्राचीन धर्म सुबह सुबह प्रार्थना किया करते थे । जब सूर्य उगता है । क्योंकि सूर्य का उगना अस्तित्व में व्याप्त सभी ऊर्जाओं का उदित होना है । इस क्षण में तुम उदित होती ऊर्जा की लहर पर सवार हो सकते हो । यह सरल होगा । शाम तक यह कठिन हो जाएगा । ऊर्जाएं वापस बैठने लगेंगी । तब तुम धारा के विरूद्ध लड़ोगे । सुबह के समय तुम धारा के साथ जोओगे । तो इसे शुरू करने का सबसे अच्छा समय सुबह सुबह का है । ठीक उसी समय जब तुम आधे सोए । और आधे जागे होते हो । और प्रक्रिया बड़ी सरल है । इसके लिए किसी मुद्रा, किसी योगासन, किसी स्नान इत्यादि, किसी चीज की जरूरत नहीं है । तुम अपने बिस्तर पर जैसे लेटे हुए हो । वैसे ही अपनी पीठ के बल लेटे रहो । अपनी आंखें बंद रखो । जब तुम श्वास भीतर लो । तो कल्पना करो कि एक विशाल प्रकाश तुम्हारे सिर से होकर तुम्हारे शरीर में प्रवेश कर रहा है । जैसे तुम्हारे सिर के निकट ही कोई सूर्य उग गया हो - स्वर्णिम प्रकाश । तुम्हारे सिर में उंडल रहा है । तुम बिलकुल रिक्त हो । और स्वर्णिम प्रकाश तुम्हारे सिर में उंडल रहा है । और गहरे से गहरा जाता जा रहा है । और तुम्हारे पंजों से बाहर निकल रहा है । जब तुम श्वास भीतर लो । तो इस कल्पना के साथ लो । और जब तुम श्वास छोड़ो । तो एक और कल्पना करो - अंधकार पंजों से प्रवेश कर रहा है । एक विशाल अंधेरी नदी तुम्हारे पंजों से प्रवेश कर रही है । ऊपर बढ़ रही है । और तुम्हारे सिर से बाहर निकल रही है । श्वास धीमी और गहरी रखो । ताकि तुम कल्पना कर सको । बहुत धीरे धीरे बढ़ो । और सोकर उठने के बाद तुम्हारी श्वास गहरी और धीमी हो सकती है । क्योंकि शरीर विश्रांत और शिथिल है । मुझे दोहराने दो । श्वास भीतर लेते हुए स्वर्णिम प्रकाश को सिर से अपने भीतर आने दो । क्योंकि वहीं पर ही स्वर्ण पुष्प प्रतीक्षा कर रहा है । वह स्वर्णिम प्रकाश सहायक होगा । वह तुम्हारे पूरे शरीर को स्वच्छ कर देगा । और उसे सृजनात्मकता से पूरी तरह भर देगा । यह पुरुष ऊर्जा है । फिर जब तुम श्वास छोड़ो । तो अंधकार को, जितने अंधेरे की तुम कल्पना कर सकते हो । जैसे कोई अंधेरी रात । नदी के समान । अपने पंजों से उपर उठने दो । यह स्त्रैण ऊर्जा है । यह तुम्हें शांत करेगी । तुम्हें ग्राहक बनाएगी । तुम्हें मौन करेगी । तुम्हें विश्राम देगी । और उसे अपने सिर से निकल जाने दो । तब फिर से श्वास लो । और स्वर्णिम प्रकाश भीतर प्रवेश कर जाता है । इसे सुबह सुबह बीस मिनट के लिए करो । और दूसरा सबसे अच्छा समय है - रात को । जब तुम वापस नींद में लौट रहे हो । बिस्तर पर लेट जाओ । कुछ मिनट आराम करो । जब तुम्हें लगे कि अब तुम सोने और जागने के बीच डोल रहे हो । तो ठीक उस मध्य में प्रक्रिया को फिर से शुरू करो । और उसे बीस मिनट तक जारी रखो । यदि तुम इसे करते करते सो जाओ । तो सबसे अच्छा । क्योंकि इसका प्रभाव अचेतन में बना रहेगा । और वह कार्य करता चला जाएगा । तीन महीने की एक अवधि के बाद तुम हैरान होओगे । जो ऊर्जा सतत मूलाधर पर, निम्नतम कामकेंद्र पर इकठ्ठी हो रही थी । अब वहां इकठ्ठी नहीं हो रही है । वह उपर जा रही है । 

24 फ़रवरी 2011

यहां दूर के ढोल सुहावने हैं

संन्यास क्या वे ही लोग लेते हैं । जिन्हें जीवन की व्यर्थता का बोध हो गया ?
- और कौन लेगा ? संन्यास कोई खिलवाड़ तो नहीं । संन्यास कोई बच्चों का खेल तो नहीं । जिन्हें जीवन की व्यर्थता का बोध हो गया है । जिन्हें यह बात दिखायी पड़ गयी कि जीवन में दौड़ो कितना ही । पहुंचोगे कहीं भी नहीं । कमाओ कितना ही । अंततः सब कमाना गंवाना सिद्ध होगा । जिन्हें यह दिख गया है कि यहां दूर के ढोल सुहावने हैं । पास आने पर सब व्यर्थ हो जाते हैं । जिन्हें जीवन की मृगमरीचिका का बोध हो गया है । वे ही तो संन्यासी होते हैं । संन्यास का अर्थ ही क्या है ? संसार की व्यर्थता का बोध ही संन्यास है । संन्यास का अर्थ ही इतना है कि जहां हमें कल तक आशा थी । वहां आशा न रही । यह 1 रूपांतरण है । जहां जहां हमने सोचा था - सुख है । वहां सुख नहीं है । धन में सोचा । पद में सोचा । प्रतिष्ठा में सोचा । मोह में । मद मत्सर में सोचा । नहीं है । नहीं है । तब भी तो 1 जीवन होगा । संसार में सुख नहीं है । तब 1 नए जीवन की शुरुआत होती है । सुख भीतर है । सुख स्वयं में है । सुख आंतरिक संपदा है । स्वभाव है ।
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हास्य की क्षमता स्वयं की ओर इंगित होनी चाहिए । स्वयं पर हंसना बहुत बड़ी बात है । और जो स्वयं पर हंस सकता है । वह धीरे धीरे दूसरों के प्रति करूणा और उत्तरदायित्व से भर जाता है । पूरी दुनिया में कोई घटना । कोई विषय हास्य को इस भांति से नहीं लेता है । ओशो
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ध्यान - गैर यांत्रिक होना ही रहस्य है । अगर हम अपनी क्रियाओं को गैर यांत्रिक ढंग से कर सकें । तो हमारी पूरी जिंदगी ही 1 ध्यान बन जाएगी । तब कोई भी छोटा सा कृत्य जैसे स्नान करना । भोजन करना । मित्रों से बातचीत करना । ध्यान बन जाएगा । ध्यान 1 गुणवत्ता है । जो किसी भी चीज के साथ जोड़ी जा सकती है । यह 

कोई अलग से किया गया काम नहीं है । लोग सोचते हैं कि ध्यान भी 1 कृत्य है । जब हम पूर्व दिशा में मुंह करके बैठते हैं । किसी मंत्र का जाप करते हैं । धूप अगरबत्ती जलाते हैं । किसी विशेष समय पर । विशेष मुद्रा में । किसी विशेष ढंग से कुछ करते हैं । ध्यान का इन बातों से कोई संबंध नहीं है । ये सब ध्यान को यांत्रिक बनाने के तरीके हैं । और ध्यान यांत्रिकता के विरोध में है । तो अगर हम होश को संभाले रखें । तो कोई भी कार्य ध्यान है । कोई भी क्रिया हमें बहुत सहयोग देगी । ओशो
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प्रेम को जानने का उपाय - पत्थर को सुंदर मूर्ति में निर्मित कर लेना । प्रेम को जानने का 1 उपाय है । साधारण शब्दों को जोड़ कर 1 गीत रच लेना । प्रेम को जानने का 1 उपाय है । नाचना कि सितार बजाना कि बांसुरी पर 1 तान छेड़ना । ये सब प्रेम के ही रूप है । ओशो
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जिसको तुम प्रेम करते हो । जिसकी जरा जरा सी बात की तुम चिन्ता फिकर करते हो कि उसके पैर में मोच न आ जाए । इसकी फिकर लेते हो । तुम उसी को गोली मार सकते हो । अगर उसका व्यवहार तुम्हारे अहंकार के विपरीत हो जाए । तो उसको जहर पिला सकते हो । उसी को तुम पहाड़ से ढकेल सकते हो । ऐसा तुम्हारा प्रेम । प्रेम नहीं हैं । जो प्रेम घृणा बन सकता है । वह प्रेम नहीं है । प्रेम यदि सच में ही प्रेम है । तो वह घृणा कैसे बन सकता है ? ओशो
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उदासी - उदासी उतना उदास नहीं करती । जितना उदासी आ गई । यह बात उदास करती है । उदासी की तो अपनी कुछ खूबियां हैं । अपने कुछ रहस्य हैं । अगर उदासी स्वीकार हो । तो उदासी का भी अपना मजा है । मुझे कहने दो इसी तरह कि उदासी का भी अपना मजा है । क्योंकि उदासी में 1 शांति है । 1 शून्यता है । उदासी में 1 गहराई है । आनंद तो छिछला होता है । आनंद तो ऊपर ऊपर होता है । आनंद तो ऐसा होता है । जैसे नदी भागी जाती है । और उसके ऊपर पानी का झाग । उदासी ऐसी होती है । जैसी नदी की गहराई - अंधेरी और काली । आनंद तो प्रकाश जैसा है । उदासी अंधेरे जैसी है । अंधेरी रात का मजा देखा ? अमावस की रात का मजा देखा ? अमावस की रात का रहस्य देखा ? अमावस की रात की गहराई देखी ? मगर जो अंधेरे से डरता है । वह तो आंख ही बंद करके बैठ जाता है । अमावस को देखना ही नहीं चाहता । जो अंधेरे से डरता है । वह तो अपने द्वार दरवाजे बंद करके खूब रोशनी जला लेता है । वह अंधेरे को झुठला देता है । अमावस की रात आकाश में चमकते तारे देखे ? दिन में वे तारे नहीं होते । दिन में वे तारे नहीं हो सकते । दिन की वह क्षमता नहीं है । वे तारे तो रात के अंधेरे में । रात के सन्नाटे में ही प्रकट होते हैं । वे तो रात की पृष्ठभूमि में ही आकाश में उभरते हैं । और नाचते हैं । ऐसे ही उदासी के भी अपने मजे हैं । अपने स्वाद हैं । अपने रस हैं । ओशो
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तुम ध्यान करते हो । लेकिन तुम इस उद्देश्य के साथ ध्यान करते हो कि ध्यान के द्वारा तुम कहीं किसी लक्ष्य तक पहुंच जाओगे । तुम बात चूक रहे हो । ध्यान में डूबो । और उसका आनंद लो । कोई लक्ष्य नहीं है । कोई भविष्य नहीं है । आगे कुछ नहीं है । ध्यान करो । अगर आनंद मनाओ । बिना किसी उद्देश्य के ।
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X ray vision - The flame of awareness functions like an X-ray. It sees things through and through, and in that very seeing there is freedom. In that light the darkness is no more there. You attain to buddhalike clarity. OSHO

22 फ़रवरी 2011

कुछ अपने अनुभव


नमस्कार राजीव जी । बिलम्ब के लिये माफ़ कीजियेगा । एक्चुअली कुछ दिनों से मेरा डाटा कार्ड काम नहीं कर रहा था । इसलिये रिप्लाई नहीं कर सका । यहाँ कुछ अपने अनुभव लिख रहा हूँ । जो मेरे साथ घटित हुये ।
No-1 एक बार मैं सोया हुआ था कि एकदम नींद से मेरी आँख खुली । तो पाया । अपने माथे के दाँयी तरफ़ किसी का हाथ मेरे सिर पर था । जैसे कोई प्यार से थपकी दे रहा हो । एकदम से रियल में हो रहा था सब कुछ । मैं 2 मिनट को हिला भी नहीं । और जैसे था । वैसे ही लेटा रहा । क्योंकि मेरे रोंगटे खङे हो गये थे । जब होश संभाला । तो एकदम से सिर घुमाया कि कौन है ? पर मैं अकेला था । कुछ समझ में नहीं आया कि ये क्या हुआ है मेरे साथ । एक्चुअली मैं अकेला ही सोता हूँ । और मेरे रूम का डोर अन्दर से बन्द रहता है । इसलिये किसी के आने का भी कोई सवाल नहीं था । और ना में उस वक्त आधी नींद में था । और न ही कोई सपना देख रहा था । ये एकदम असल में महसूस की हुयी घटना थी मेरे साथ ।
No-2 अध्यात्म की ओर मेरा रुझान पिछले 7-8 सालों से बहुत बढ गया है । और मुझे महसूस होता है कि मुझे इस राह में और आगे बढना है । जैसे कोई अदृश्य शक्ति मुझे खुद इस ओर खींच रही हो । मेरा मन भी अब सांसारिक भोग के विषयों में नहीं लगता । पर हाँ कभी कभी जब मन विचलित होकर कहता है कि थोङा सा ये भी करके देख । और मैं गलत दिशा में अग्रसर होने ही वाला होता हूँ । तो तभी कोई अजीब शक्ति मुझे किसी ना किसी बहाने से संदेश देती है कि जो मेरे मन में चल रहा है । वो गलत है । और मैं उस शक्ति को धन्यवाद देते हुये गलत काम करने से बच जाता हूँ । फ़ार एग्जाम्पल..मैंने सुबह कोई काम करने का सोचा । जो एक सच्चे इंसान के लिये गलत मार्ग है । तो शाम को उसी दिन मुझे ये मैसेज मिल जाता है कि ऐसा मत करना । और अचम्भे की बात ये है कि वो मैसेज उसी टापिक से रिलेटिड होता है । जो मैनें सोचा होता है । और मैसेज भी हमारी रोजमर्रा की चीजों से मिलता है । जैसे कि किसी बुक या टीवी । या किसी को बात करते हुये । या किसी न्यूजपेपर में । या किसी मूवी से । और मजे की बात यह है कि ये उसी दिन मिलता है । मैं हैरान हो जाता हूँ कि ये सब क्या है ? कौन मुझे आगाह कर देता है ।
No-3 मेरे अब तक 3 बहुत रहस्यमय एक्सीडेंट हुये हैं । रहस्यमय इसलिये कह रहा हूँ । क्योंकि वो एक्सीडेंट ऐसे थे कि बचने का कोई सवाल ही नहीं रहता । लेकिन करिश्मा ये है कि मुझे तीनों बार कोई चोट भी नहीं आयी । शायद किसी अजीव शक्ति ने बचाया मुझे...??
No-4 आज से करीब 1 साल पहले मैंने ऐसे ही रात को बैठे बैठे अपना ध्यान लगाया । तो मेरा ध्यान एक ऐसी आनन्ददाई स्थिति में चला गया कि उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है । ऐसे लगता था । जैसे मैं अनन्त आकाश में उङ रहा हूँ । पर ऐसा सिर्फ़ उसी दिन हुआ था । उसके बाद कई बार कोशिश की । वैसा ध्यान लगा पाऊँ । पर आज तक वैसा आनन्द हासिल नहीं कर पाया । धन्यवाद ।
RAJEEV..पंजाब से एक नियमित पाठक के कुछ अलौकिक अनुभव । इसके बारे में अपने विचार किसी अन्य पोस्ट में बताऊँगा । लेकिन..यदि आप भी कुछ ऐसा अनुभव करते हैं । कुछ अजीव सा आपके जीवन में भी हुआ है । तो हमें GOLU224@YAHOO.COM पर लिख भेजिये । हम उसे प्रकाशित करेंगे । ताकि अन्य लोग भी आपके अलौकिक अनुभव जान सकें । धन्यवाद ।

17 फ़रवरी 2011

क्या रावण ने काल को बाँध लिया था ?


ही ही ही..क्या हाल है ? जनाव का । अंकल जी ( वैसे तो मैं आपका अंकल हूँ । ) मैंने आपको कुछ दिन पहले दो सवाल भेजे थे । तुमने आंसर नहीं भेजा । अरे यार तुम तो ग्यानी हो । प्लीज आंसर दे दिया करो । हम जैसे पापी लोगों का भला करो ?? अब दोबारा सवाल सुनो ?? एन्ड इनका आंसर अपने ब्लाग में आर्टीकल के रूप में छापो ???
Q 1 क्या गीता 4 वेद का सार है ?
Q 2 क्या रावण ने काल को बाँध लिया था ?
Q 3 ये शून्य 0 या महाशून्य 0 या परमशून्य 0 अवस्था क्या होती है ? ये शून्य 0 का लफ़ङा मैंने बुद्धिज्म के आर्टीकल में पढा था । लेकिन ससुर समझ कुछ नहीं आया । वहाँ लिखा था । बुद्ध जी परमशून्य अवस्था 0 में पहुँच गये ( आप बता दो कि वो कहीं टट्टी करने तो नहीं चले गये थे ? )
Q 4 मुझे टीथ टूटने का सपना कई बार आ चुका है । पिछले 3 या 4 साल से ( सिर्फ़ टीथ टूटने का सपना ही ज्यादा क्यों आया ? ऐसा सपना मंथ या 2 मंथ में 1 बार आता है । )
लालाजी मजाक तो मैं इसलिये करता हूँ । क्योंकि मैं हँसमुख आदमी हूँ । अगर कुछ सीरीयस काम भी करना है । तो स्मायल से । ये रोना धोना । ( आई डोन्ट लाइक ) ज्यादा चुटकले मेरे को आते नहीं । मैं खुद जैसा फ़ड्डू हूँ । वैसी ही फ़ड्डू बात करके दूसरे को हँसाने की कोशिश करता हूँ । तुम माइंड मत करना । मुझे आशा है कि इन आंसर के जवाव ?? आप नेक्स्ट आर्टीकल में जरूर दोगे । अब चलते हैं । क्योंकि जय जवान । जय किसान । ही ही ही ही ।.. विनोद त्रिपाठी । ई मेल से ।
ANS 1 वेद की बातें बहुत लोग करते हैं । पर सच्चाई जानने वाले गिनेचुने ही होंगे । वेद तीनों लोकों का संविधान है । जिसमें यहाँ के कानून । साइंस । पदाधिकारी और वस्तुओं का निर्माण । वनस्पतियों आदि के गुण अवगुण । अलौकिक बिग्यान आदि की जानकारी है । यहाँ आपके प्रश्नानुसार उसमें भक्ति का वर्णन केवल इसीलिये है कि वो चीज या शक्ति या ग्यान आप उसके नियत देवता या अधिकारी द्वारा कैसे प्राप्त करेंगे । यानी वेद स्वयँ उस ग्यान के बारे में साइंस की तरह । ये साधारण जिग्यासा उठने पर..कि ऐसा हो तो जायेगा । पर क्यों ?? हो जायेगा । के लिये " नेति नेति " कहता है । यानी बात इतनी ही नहीं है । इसलिये वेद कहता है कि मेरी सीमा बस यही है । अन्य ग्यान के लिये मैं नहीं हूँ । गीता को वेदों का सार । नये टीकाकारों ने ही कहा है । और वो भी इसलिये कि वेदों में जीवन मूल के आत्मतत्व और उनकी जिग्यासा उस तरह नहीं मिलती । जैसी कि गीता में है । वेद जिसके लिये " नेति नेति " कहते हैं । गीता उससे आगे की बात करती है । और संक्षिप्त शब्दों में करती है । इसलिये उससे प्रभावित लोगों ने अपने ग्यान के आधार पर गीता को वेदों का " सार " कहा है । जबकि गीता और वेदों का आपस में इस विषय पर कोई रिश्ता नहीं है । वेद अलग और गीता अलग बात कह रही है ।
ANS 2 पहले ये समझिये कि रावण की बैकग्राउन्ड क्या थी ? और इसके लिये फ़्लैशबैक में जाना होगा । भगवान श्रीकृष्ण के " गोलोक " में " जय और विजय " नाम के दो द्वारपाल थे । जिन्हें किसी गलती के चलते गोलोक से निकाल दिया गया था । अपमान और बदले की भावना लिये इन्हें इस मृत्युलोक में आना पङा । जहाँ इनका पहला जन्म हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के रूप में हुआ । और इनका वध वराह अवतार द्वारा..हिरण्याक्ष । नृसिंह अवतार द्वारा..हिरण्यकश्यप का हुआ । प्रतिशोध की इसी भावना के साथ इनका अगला जन्म रावण और कुम्भकरण के रूप में हुआ । और वध श्रीराम द्वारा हुआ । इनका तीसरा जन्म मथुरा नरेश कंस और शिशुपाल के रूप में हुआ । और इन दोनों का वध भी भगवान श्रीकृष्ण द्वारा हुआ । इस तरह क्रिया..प्रतिक्रिया के आधार पर रावण पहले ही मृत्युलोक की कालसीमा ? से बाहर था । लेकिन आपके प्रश्नानुसार जो कथा लोक प्रचलन में आयी । उसकी वजह थी । रावण का अपनी शक्तियों के कारण तीनों लोक 1 प्रथ्वीलोक 2 स्वर्गलोक 3 पाताललोक में बेहद आंतक था । वह निर्वाध रूप से स्वर्ग जाता था । जहाँ प्राणी मरने के बाद जाता है ।
उसने सभी देवताओं को अपनी तप से अर्जित ताकत के बल पर बन्दी बना लिया था । जिसमें यमराज जैसे भी थे । यमराज और इनके जैसे तमाम देवता उसकी चौखट पर सलाम बन्दगी करते थे । रावण शंकर जी और बह्मा जी का भक्त था ही । उसकी नाभि में अमृतग्यान होने से अमृत स्थिति थी । शंकर जी को सिर काटकर अर्पित करने से उसे वरदान द्वारा इस तरह से भी नहीं मारा जा सकता था । उस पर शंकर और बृहमा द्वारा दिये वरदानों की भरमार थी । उसने अपने तप से अनेक मायावी शक्तियाँ हासिल कर ली थीं । बृह्मा ने सिर्फ़ उसका एक अति इच्छित वरदान देने से मना कर दिया था । जिसके अनुसार वह चाहता था कि उसकी कभी मृत्यु ही न हो ? क्योंकि यह वरदान देने की पावर बह्मा या शंकर या विष्णु के पास नहीं थी । विष्णु से वह वैसे ही द्रोह करता था । क्योंकि देवताओं से उसकी लङाई में विष्णु उसे कङी टक्कर देते थे ।..अब जैसा कि लोग समझते हैं कि विष्णु जी ने राम अवतार लेकर उसे मारा था । यह गलत है । क्योंकि उसका तो जय विजय वाला त्रिलोकी के मालिक कालपुरुष से श्रीकृष्ण के रूप में वैर था । अतः कालपुरुष याने श्रीकृष्ण याने राम ने उसका वध किया था । अब साधारण मृत्यु के आर्डर चित्रगुप्त यमराज आदि के यहाँ से होते हैं । और इनके ही कार्यकर्ता जीव का प्राणीनाम लेने आते है । तो जिनका मालिक ही किसी से डरता हो । उसके प्रतिनिधि की क्या बिसात कि वो उस इंसान के प्राण हरण कर लायें । ऐसी ही बातों के आधार पर यह कहा जाने लगा कि रावण ने काल को भी वश में कर लिया था । काल यानी यहाँ के ? समय और उसकी गतिविधियों पर रावण का पूरा नियंत्रण था । क्योंकि ये पूरी सरकार ही एक तरह से लगभग उसके कब्जे में थी ।
ANS 3 शून्य 0 महाशून्य 0 परमशून्य 0 ।.. सभी लोक किसी बहुमंजिला इमारत की तरह से ऊँचाई और नीचाई पर स्थित हैं । इस तरह से लगभग दस मंजिल के बाद जो फ़्लोर ( यहाँ आकाश ) आता है । उस पहले आकाश को यहाँ शून्य 0 कहा गया है । ये स्थान एकदम खाली और सृष्टि और लोक के नियमों यथा गुरुत्वाकर्षण आदि से रहित होता है । जिसे संतों की भाषा में सुन्न न कि शून्य 0 कहा जाता है । इसी आधार पर काफ़ी ऊपर जाने पर महाशून्य 0 आता है । परमशून्य 0 जैसी कोई जगह या स्थिति नहीं होती । परम का अर्थ ही परे है । तो फ़िर परे के बाद भी अगर शून्य है । तो फ़िर वो परे या परम कैसे हुआ ??
बुद्ध परमशून्य में पहुँच गये थे ? ऐसी हजारों नहीं बल्कि लाखों बातें किसी भी महात्मा या ग्यानी के अनुयाइयों और बाद के लोगों ने उनकी कहानी में जोङ दी । जिनका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं था । इसीलिये कहा जाता है कि.. रहिमन तेरे देश में भांति भांति के लोग..???
ANS 4 अगर दाँत में कीङा लगना । पायरिया । केविटीज या उमर अधिक होने से दाँत की जङ कमजोर होने से हिलने पर ऐसा सपना आता है । तो ये कोई अजीब बात नहीं है । भूखे अवस्था में सोने पर भोजन के । मूत्र त्याग की जरूरत होने पर लघुशंका के । कामातुर भाव रहने पर संभोग के । बच्चों को खेल के । विध्यार्थियों को इम्तहान के । गरीब को धन प्राप्त होने के आदि..मन की तीवृ चाहत के अनुसार सपने आते ही हैं । पर कोई सपना बिना किसी कारण के बारबार आता हो । तो वह भविष्य में घटने वाली घटना का संकेतक ही होता है । दाँत टूटने का सपना । किसी गंभीर बीमारी । उसी स्तर के अपयश । या किसी भी कारणवश धनहानि की ओर इशारा करता है । विशेष कारणों में यह आने वाली अपंगता भी दर्शाता है । अतः फ़ायनली कोई एक बात कहना कठिन है ।..ऐसा भी हो सकता है । ज्यादा ही ही करने से भगवान चेतावनी देता हो कि ज्यादा ही ही करोगे बच्चू । तो दाँत ही तोङ दूँगा । जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी ।

08 फ़रवरी 2011

क्या आपने भगवान को देखा है ?

यह सत्य है कि भगवान या परमात्मा के बारे में एकदम निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है । गौतम बुद्ध को सबसे ज्यादा इसी प्रश्न का सामना करना पङा था ।.. क्या आपने भगवान को देखा है ? बुद्ध इस प्रश्न पर मौन हो जाते थे । उत्तर दें । तो आखिर क्या दें । ना कह नही सकते थे । हाँ कहने पर ढीठ प्रश्नकर्ता कहेगा । है..तो हमें भी दिखाओ । तुलसी को भी इसी प्रश्न का सामना अपने सतसंग में अक्सर करना पङता था । हारकर तुलसीदास जी ने कहा ।.. घट में है । सूझत नहीं । लानत ऐसी जिंद । तुलसी जा संसार को भओ मोतियाबिंद । तब किसी सतसंगी ने फ़िर कहा । महाराज..ये मोतियाबिंद हो तो गया । मगर अब कटेगा कैसे ? तब तुलसी ने कहा ।.. सतगुरु पूरे वैध हैं । अंजन है सतसंग । ग्यान सलाई जब लगे । तो कटे मोतियाबिंद ।
 नानक देव को भी इस प्रश्न का सामना करना पङा था ।.. क्या आपने भगवान को देखा है ? लेकिन नानक जी अपने स्वभाव के अनुसार मौन नहीं होते थे । बल्कि कह देते थे । हाँ देखा है । तब सामने वाला कहता ।.. देखा है । तो मुझे भी दिखाओ । नानक जी कहते । दिखा तो मैं दूँगा । पर इस दिखाने की कीमत तू क्या देगा ? क्या तू भगवान को देखा जाना साधारण बात मानता है ।.. मम दर्शन फ़ल परम अनूपा । जीव पाय जब सहज सरूपा ।.. सनमुख होय जीव मोहि जबहीं । कोटि जन्म अघ नासों तबहीं ।.. मामूली बात है । भगवान का देखा जाना ? तुमने तो जीभ उठाकर पटक दी । संत के सामने । मानों भगवान न हुआ । कोई छोटी मोटी वस्तु हो गयी । बता कितनी कीमत मानता है ? इस दर्शन की ।.. नानक जी बङे अच्छे लेकिन आलोचकों के लिये विचित्र स्वभाव के भी थे ।
जिस स्थान पर मैं रहता हूँ । नानक के समय में यहाँ घना जंगल था । एक दिन नानक जी ने अपनी मंडली के साथ एक पेङ के नीचे डेरा जमा लिया । और बैठे हुये तमाम चरवाहों से कहा । बालको कुछ भोजन मिलेगा । इस पर किसी चरवाहे ने व्यंग्य से कहा ।..हाँ गल्ला ( अनाज ) आप पैदा करके रख गये होगे । नानक जी ने कहा । बस इतनी बात । कितना गल्ला चाहिये । वह भी उसी टोन में बोला । गाँव का भंडारा हो जाता महाराज । नानक जी ने चार दाने हथेली के बीच रखे । और फ़िर दोनों हाथ जोङे हुये ही हथेली से अनाज गिराने लगे । अनाज के ढेर लग गये ।
 खैर..यही प्रश्न विवेकानन्द जी ने रामकृष्ण परमहँस से किया था । .. क्या आपने भगवान को देखा है ?
परमहँस ने उत्तर दिया । हाँ नरेन्द्र । बिल्कुल उसी तरह जिस तरह तुम्हें देख रहा हूँ । आगे विवेकानन्द जी के पास कहने को कुछ बचा ही नहीं था ।..हाँ कहो तो.. है नहीं । ना कही ना जाय । हाँ ना के बीच में साहिब रहा समाय । रामकृष्ण के बारे में यह तो प्रसिद्ध ही हो चुका था कि वे काली देवी का तुरन्त साक्षात कर लेते थे ।
 इतिहास गवाह है कि अत्यंत धार्मिक ? इस प्रथ्वीलोक में जब भी किसी संत ने प्रभु दर्शन के बारे में या साक्षात्कार विधि के बारे में बात कही है । उसे कई स्तरों पर आलोचना झेलनी पङी । ये बात अलग है कि बाद में जीत हमेशा उस प्रभु के प्यारे की ही हुयी । कबीर । बुद्ध । महावीर । नानक । नये संतों में रजनीश आदि की काफ़ी थुक्का फ़जीहत लोगों ने की । और ये भी इतिहास है कि बाद में जय जयकार भी की ।
हैरत इसी बात की है । बेहद पूजा करने वाले भी जब दर्शन की बात करो । तो वाद विवाद पर उतर आते हैं ।..मुझे उन दिनों की बात याद आती है । जब मैं कक्षा सात आठ में पढता था । तो बीजगणित के अनोखे सवाल देखकर मुझे बङी उलझन होती थी । राम के पिता की उमर य वर्ष है । राम की उमर 10 साल की है । 10 वर्ष बाद राम के पिता की उमर उसकी दुगनी हो जायेगी आदि ।..मुझे हैरानी इस बात की होती थी कि य मान लेने के बाद इसमें सूत्र लगा देने से उमर निकल आती थी ।..आज इसका रहस्य समझ में आया । तब झूँझल होती थी । आज उन सवालों का सही रहस्य समझ में आया । परमात्मा भी अग्यात है ।..माना परमात्मा य है । बस अब इसको सही ग्यात करने का सूत्र जोङना है ।
लेकिन आलोचक इसको भी हजम नहीं कर पाते । तब इसके लिये थोङा पीछे जाना होगा । कुछ देर के लिये आदिमानव बनना होगा । कभी किसी ने तो पहली बार दुधारू पशु पाला होगा ? दूध गर्म किया होगा । दही भी जमाया होगा । फ़िर किसी प्रेरणा से दही को मथा होगा । तब उसमें से मक्खन निकला होगा । फ़िर घी बना होगा । क्रिया दर क्रिया । अब घी का बहुविधि इस्तेमाल तो हो सकता है । पर और कुछ नहीं बन सकता ।..अब कल्पना कीजिये । दूध से घी का ये आविष्कारक इस विधि से अनजान किसी अन्य आदिमानव के पास जाकर कहे । देखो इस दूध से ही यह बहुमूल्य पदार्थ प्राप्त हुआ है ।
असंभव । दूसरा यही तो कहेगा । पर वास्तव में ऐसा ही हुआ था ।
बात और भी है ।.. कभी माचिस भी पहले किसी ने बनायी ही होगी । और तब उसने जाकर किसी से कहा होगा । अब देर तक पत्थर से पत्थर या लकङी से लकङी रगङने की आवश्यकता नहीं । ये तीली फ़ुर्र करो । और आग जली । तब भी कहा होगा । असंभव ?? असंभव कहने की हमें जन्मजात आदत जो पङ गयी है । आज नया जमाना है । मुझे नये उदाहरण देने होते हैं । मैं लोगों को यह कहकर चौंका देता हूँ । ये सामने खाली जगह । ऊपर आसमान में देखो । करोङों अरबों आदमी । औरत । आवाजें । अक्षर । चित्र आदि यहाँ सब हवा में खन्ड खन्ड तैर रहे हैं । अपने बुलाने वाले के पास चले जाते हैं । उस माध्यम में उतर जाते हैं । उस तरीके में उतर जाते हैं । जो इनके लिये तय है । जिस वे में ये भृमण कर रहें हैं । क्या ये बात पहले कभी आपने सोची थी ?
आप यकीन करिये । अच्छे अच्छे पढे लिखे भी चौंक जाते । कहाँ महाराज ?? हमें तो कुछ भी नजर नहीं आ रहा ? ..और ये भी पहले मानने से ही हुआ था । कभी किसी ने सोचा ही होगा कि चीजों को तोङकर वायु के माध्यम से भेजा जा सकता है । जहाँ वे गंतव्य पर पहुँचकर पुनः रिसीवर में अपने मूल रूप में आ जायेंगी । यही साइंस है । यही योग है । साइंस कोई आसमान से तो टपकी नहीं ? कब । क्यों । कैसे । पर निर्भर साइंस केवल जान ही तो लेती है कि ऐसा करने पर ऐसा हो जाता है ।
आज के सुविधाजनक सामान क्या आसमान से टपके हैं ? इसी प्रथ्वी से ही तो सब उत्पन्न हुआ है । धातु । प्लास्टिक आदि कई चीजों को मिलाकर असंख्य चीजों का निर्माण हो गया । सबाल ये है कि ये सब पहले से थीं । केवल इनका तरीका ही तो जान गये हम । ये अब सिद्ध हो गयीं । महत्वपूर्ण तो तरीका ही है । लोग कहते । कहाँ हैं ? हवा में आदमी औरत आदि ? आदिमानव के पास भी यही सब सामान होता । तरीका ग्यात होता । तो उस समय भी TV फ़ोन इंटरनेट सब कुछ बन सकता था । इससे यही साबित होता है कि ये सब पहले से था । केवल हम तरीका ही जान गये हैं । इसलिये तरीका जानना ही महत्वपूर्ण हैं । बिना तरीके के तो सब कुछ असंभव है । मैं कहता । कमाल है । आपके TV । इंटरनेट । फ़ोन में जो इकठ्ठे हो जाते हैं । वो खंडित आसमान में ही तो तैरते हैं ।
 अब दूध से घी सिद्ध हो गया । माचिस से आग सिद्ध हो गयी । लेकिन क्या ये सब सच है ? वास्तव में दूध से घी कभी नहीं सिद्ध हुआ । बिना क्रिया कराये आज भी दूध से घी का काम नहीं लिया जा सकता । माचिस से आग कभी सिद्ध नहीं हुयी । दूध अब भी दूध है । घी उसी तरह अब भी दूध में छिपा हुआ है । बस क्रिया सिद्ध हो गयी । हम दूध से घी बनाना जान गये । दूध भी हमेशा था । और उसमें घी भी हमेशा ही था । बस हम जानते नहीं थे । जान गये तो सब सरल सहज हो गया । यही संत कहते हैं । हमेशा मानते ही मत रहो । उसको जानों । उसको सिद्ध करो । एक बार सिद्ध हो गया । फ़िर सब सरल है । सब सहज है ।

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