26 फ़रवरी 2011

इसे दिन में कम से कम दो बार करो

आपका राजनीति पर क्या कहना है ? ओशो - क्या मुझे कहने की जरूरत है ? मैं इसे अभिशाप देता हूँ । यह दुर्घटना है । जिसके कारण हम सदियों से दुख भोग रहे हैं । राजनीति की कतई जरूरत नहीं है । परंतु राजनेता इसे गैर जरूरी नहीं होने देंगे । क्योंकि तब वे राष्ट्रपति खो देंगे । उनका व्हाइट हाउस । उनके राजभवन । उनके प्रधानमंत्री सब विदा हो जाएँगे । राजनीति की जरूरत नहीं है । यह पूरी तरह से समय बाह्म बात है । इनकी जरूरत थी । क्योंकि देश लगातार लड़ रहे हैं । तीन हजार सालों में पाँच हजार युद्ध लड़े गए हैं । यदि हम देशों की सीमाएँ समाप्त कर देते हैं । जो कि मात्र नक्शों पर होती हैं । न कि जमीन पर । कौन राजनीति की परवाह करेगा ? हाँ, विश्व सरकार होगी । परंतु यह सरकार सिर्फ कार्यकारी होगी । इसकी अलग से कोई प्रतिष्ठा नहीं होगी । क्योंकि वहाँ किसी के साथ किसी प्रकार की प्रतियोगिता नहीं होगी । यदि तुम विश्व सरकार के राष्ट्रपति हो । तो क्या हुआ ? तुम किसी तरह से किसी दूसरे से ऊँचे नहीं हो । कार्यकारी सरकार का मतलब है । जिस तरह से रेलवे चलती है । रेलवे का कौन प्रधान है । इसकी कौन परवाह करता है ? जैसे कि डाक विभाग चलता है । और पूरी तरह से चलता है । डाक विभाग का प्रधान कौन है ? इसकी कौन चिंता लेता है ? देशों को विदा करना होगा । और देशों के विदा होने के साथ ही राजनीति स्वत: विदा हो जाएगी । वह आत्महत्या कर लेगी । कार्यकारी सरकार में जो जरूरी है । वही रहेगा । वह रोटरी क्लब की तरह बनाई जा सकती है । तो कभी काला व्यक्ति प्रधान होगा । कभी स्त्री प्रधान होगी । कभी चीनी प्रधान होगा । कभी रशियन प्रधान होगा । कभी अमेरिकन प्रधान होगा । परंतु वह चक्र की तरह घूमता रहेगा । शायद छह माह से अधिक एक व्यक्ति को नहीं दिया जाना चाहिए । इससे अधिक खतरनाक है । तो छह माह के लिए प्रधान बनो । और उसके बाद हमेशा के लिए खो जाओ । और कोई व्यक्ति फिर से नहीं चुना जाना चाहिए । यह मात्र दिमाग का दिवालियापन है कि एक ही व्यक्ति को बार बार प्रधानमंत्री के लिए चुना जाए । क्या तुम इसमें दिमागी दिवालियापन नहीं देखते हो ? तुम्हारे पास कोई और बुद्धिमान व्यक्ति नहीं है ? तुम्हारे पास मात्र एक ही मूर्ख है ? इस दुनिया में किसी राजनैतिक दल की कोई जरूरत नहीं है । व्यक्ति व्यक्ति के बारे में तय करे । किसी राजनैतिक दल की कोई जरूरत नहीं है । यह लोकतंत्र के लिए बहुत विध्वंसात्मक है । यद्यपि लोग कहते हैं कि लोकतंत्र राजनैतिक दलों के बिना नहीं हो सकता । मैं तुमसे कहना चाहता हूँ कि राजनैतिक दलों के होते लोकतंत्र नहीं आ सकता । क्योंकि उनके अपने निहित स्वार्थ हैं । प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र है । किसी भी पद के लिए । या किसी भी व्यक्ति को चुनने के लिए । और जो भी व्यक्ति आएगा । वह तुम्हारे प्रधानमंत्री से अधिक बुद्धिमान होगा । चूँकि वह उस पद पर सिर्फ छह माह के लिए है । तो वह अपने समय को इस विश्वविद्यालय का उदघाटन या उस पुलिया का उदघाटन । इस सड़क का उदघाटन या सभी तरह की नासमझियों के उदघाटन में जाया नहीं करेगा । और संसद में सांसद सभी तरह की नासमझियों व अर्थहीन बातों पर बहसें किए चले जा रहे हैं । मानो उनके पास अनंत समय हो । एक छोटा से मसौदा स्वीकृत होने में सालों लग जाते हैं । एक व्यक्ति जिसके पास मात्र छह महीने हैं । वह इस तरह की नासमझियों में समय व्यर्थ नहीं कर सकता । वह वैज्ञानिक सलाहकार विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को रखेगा । उदाहरण के लिए अर्थव्यवस्था के लिए वह दुनिया के सभी अर्थशास्त्रियों से सलाह लेगा । उसके पास बहुत समय नहीं है । वह तृतीय श्रेणी के राजनेताओं को साथ नहीं रख सकता । जो सिवाय झूठ बोलने के कुछ नहीं जानते । यदि उसे शिक्षा के बारे में कुछ तय करना है । तो वह दुनिया के महान शिक्षा शास्त्रियों से सलाह लेगा । परंतु अभी तो आश्चर्यजनक चीजें हो रही हैं । भारत में, जब मैं था । उस समय वहाँ की सरकार में जो व्यक्ति केंद्रीय शिक्षामंत्री था । मैं उस व्यक्ति को जानता हूँ । मैंने कई नालायक देखे हैं । परंतु वह सिर्फ नंबर एक था । वह शिक्षामंत्री है । वह पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था के बारे में तय करेगा । परंतु उसने कुछ भी तय नहीं किया । नौकरशाही उसी ढर्रे पर चलती रही । वे टुच्चे खेल खेलते रहे । पीठ में छुरा भोंकना । टांग खींचना । शीर्ष पर पहुँचने के लिए सब तरह की जुगाड़ लगाना । मैं सूत्र देता हूँ - एक विश्व । एक सरकार ।
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ध्यान विधि स्वर्णिम प्रकाश ध्यान श्वास भीतर लेते हुए स्वर्णिम प्रकाश को सिर से अपने भीतर आने दो । क्योंकि वहीं पर ही स्वर्ण पुष्प प्रतीक्षा कर रहा है । वह स्वर्णिम प्रकाश सहायक होगा । वह तुम्हारे पूरे शरीर को स्वच्छ कर देगा । और उसे सृजनात्मकता से पूरी तरह भर देगा । यह पुरुष ऊर्जा है । इसे दिन में कम से कम दो बार करो । सबसे अच्छा समय सुबह सुबह का है । ठीक तुम्हारे बिस्तर से उठने से पहले । जिस क्षण तुम्हें लगे कि तुम जाग गए । इसे कम से कम बीस मिनट के लिए करो । सुबह सबसे पहला यही काम करो । बिस्तर से मत उठो । वहीं । उसी समय । तत्क्षण इस विधि को करो । क्योंकि जब तुम नींद से जग रहे होते हो । तब बहुत नाजुक और संवेदनशील होते हो । जब तुम नींद से बाहर आ रहे होते हो । तब बहुत ताजे होते हो । और इस विधि का प्रभाव बहुत गहरा जाएगा । जिस समय तुम नींद से बाहर आ रहे होते हो । तो उस समय सदा की अपेक्षा तुम बुद्धि में कम होते हो । तो कुछ अंतराल हैं । जिनके माध्यम से यह विधि तुम्हारे अंतर्तम सत्व में प्रवेश कर जाएगी । और सुबह सुबह, जब तुम जाग रहे होते हो । और पूरी पृथ्वी जाग रही होती है । उस समय पूरे विश्व में जाग रही ऊर्जा की एक विशाल लहर होती है । उस लहर का उपयोग कर लो । अवसर को मत चूको । सभी प्राचीन धर्म सुबह सुबह प्रार्थना किया करते थे । जब सूर्य उगता है । क्योंकि सूर्य का उगना अस्तित्व में व्याप्त सभी ऊर्जाओं का उदित होना है । इस क्षण में तुम उदित होती ऊर्जा की लहर पर सवार हो सकते हो । यह सरल होगा । शाम तक यह कठिन हो जाएगा । ऊर्जाएं वापस बैठने लगेंगी । तब तुम धारा के विरूद्ध लड़ोगे । सुबह के समय तुम धारा के साथ जोओगे । तो इसे शुरू करने का सबसे अच्छा समय सुबह सुबह का है । ठीक उसी समय जब तुम आधे सोए । और आधे जागे होते हो । और प्रक्रिया बड़ी सरल है । इसके लिए किसी मुद्रा, किसी योगासन, किसी स्नान इत्यादि, किसी चीज की जरूरत नहीं है । तुम अपने बिस्तर पर जैसे लेटे हुए हो । वैसे ही अपनी पीठ के बल लेटे रहो । अपनी आंखें बंद रखो । जब तुम श्वास भीतर लो । तो कल्पना करो कि एक विशाल प्रकाश तुम्हारे सिर से होकर तुम्हारे शरीर में प्रवेश कर रहा है । जैसे तुम्हारे सिर के निकट ही कोई सूर्य उग गया हो - स्वर्णिम प्रकाश । तुम्हारे सिर में उंडल रहा है । तुम बिलकुल रिक्त हो । और स्वर्णिम प्रकाश तुम्हारे सिर में उंडल रहा है । और गहरे से गहरा जाता जा रहा है । और तुम्हारे पंजों से बाहर निकल रहा है । जब तुम श्वास भीतर लो । तो इस कल्पना के साथ लो । और जब तुम श्वास छोड़ो । तो एक और कल्पना करो - अंधकार पंजों से प्रवेश कर रहा है । एक विशाल अंधेरी नदी तुम्हारे पंजों से प्रवेश कर रही है । ऊपर बढ़ रही है । और तुम्हारे सिर से बाहर निकल रही है । श्वास धीमी और गहरी रखो । ताकि तुम कल्पना कर सको । बहुत धीरे धीरे बढ़ो । और सोकर उठने के बाद तुम्हारी श्वास गहरी और धीमी हो सकती है । क्योंकि शरीर विश्रांत और शिथिल है । मुझे दोहराने दो । श्वास भीतर लेते हुए स्वर्णिम प्रकाश को सिर से अपने भीतर आने दो । क्योंकि वहीं पर ही स्वर्ण पुष्प प्रतीक्षा कर रहा है । वह स्वर्णिम प्रकाश सहायक होगा । वह तुम्हारे पूरे शरीर को स्वच्छ कर देगा । और उसे सृजनात्मकता से पूरी तरह भर देगा । यह पुरुष ऊर्जा है । फिर जब तुम श्वास छोड़ो । तो अंधकार को, जितने अंधेरे की तुम कल्पना कर सकते हो । जैसे कोई अंधेरी रात । नदी के समान । अपने पंजों से उपर उठने दो । यह स्त्रैण ऊर्जा है । यह तुम्हें शांत करेगी । तुम्हें ग्राहक बनाएगी । तुम्हें मौन करेगी । तुम्हें विश्राम देगी । और उसे अपने सिर से निकल जाने दो । तब फिर से श्वास लो । और स्वर्णिम प्रकाश भीतर प्रवेश कर जाता है । इसे सुबह सुबह बीस मिनट के लिए करो । और दूसरा सबसे अच्छा समय है - रात को । जब तुम वापस नींद में लौट रहे हो । बिस्तर पर लेट जाओ । कुछ मिनट आराम करो । जब तुम्हें लगे कि अब तुम सोने और जागने के बीच डोल रहे हो । तो ठीक उस मध्य में प्रक्रिया को फिर से शुरू करो । और उसे बीस मिनट तक जारी रखो । यदि तुम इसे करते करते सो जाओ । तो सबसे अच्छा । क्योंकि इसका प्रभाव अचेतन में बना रहेगा । और वह कार्य करता चला जाएगा । तीन महीने की एक अवधि के बाद तुम हैरान होओगे । जो ऊर्जा सतत मूलाधर पर, निम्नतम कामकेंद्र पर इकठ्ठी हो रही थी । अब वहां इकठ्ठी नहीं हो रही है । वह उपर जा रही है । 
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