30 जनवरी 2012

हरि ॐ तत सत का रहस्य

आदरणीय राजीव जी, प्रणाम ! 
आज मैंने आपके ब्लॉग पर लिखे लेख पढ़े । बहुत ही सरलता से आपने सारे लोगों के प्रश्नों के उत्तर दिए हैं । इसलिए आपको प्रणाम और धन्यवाद किये बिना रहा न गया तो ये मेल कर दिया । आपका प्रेम इंगले ।
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thank u so much sir for add me अगर real में कोई इंसान प्रसून जैसा बन सकता है तो आप मुझे बता सकते हैं कि क्या करना होता है  please - अभि ।
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महाराज जी ! आप एक तरफ तो कबीर साहब को परमात्मा बता रहे हैं और दूसरी तरफ उसे खोज भी रहे हैं । 
परमात्मा ने अपनी वाणी में कहा है - 
वस्तु कहाँ ढ़ूढ़ें कहाँ, किस विधि लागे हाथ ।
एक पलक में पाइओ, भेदी ले ले साथ ।
सत्यप्रकाश विश्वकर्मा ।
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सत्यप्रकाश विश्वकर्मा का ये मेल पढ़कर मेरी समझ में नहीं आया कि - उनका असली आशय क्या है ? इसी मेल के साथ सत्यप्रकाश ने एक PDF फ़ाइल में 284 पेज, ज्ञान गंगा नामक पुस्तक 6.03 mb साइज भी अटैच्ड की है जो किन्ही सन्त रामपाल के सतसंगों का संग्रह है ।
पुस्तक को मैंने जिज्ञासावश देखा, कुछ कुछ पढ़ा भी । 
कहीं की ईंट कहीं का रोङा, भानमती ने कुनबा जोङा । 
तर्ज पर ये पुस्तक - वेद, गीता, देवी भागवत, कबीरवाणी, कुरआन, बाइबल, ग्रन्थसाहब कुछ पुराण आदि से उनके अंशों की मनमानी और अवैज्ञानिक तरीके से व्याख्या करके बनायी गयी है । कैसे, आईये निम्नलिखित पुस्तकीय अंशों के साथ विचार करते हैं । हालांकि पूरी पुस्तक में भ्रामक और अनर्गल बातों की भरमार है और सभी पर बात करने का कोई औचित्य ही नहीं है । इसलिये कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा करते हैं ।
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ज्ञानगंगा - पूर्ण परमात्मा (पूर्ण बृह्म) अर्थात सतपुरुष (पूर्व में लिखे शब्द पुस्तक की ही एक लाइन हैं । पुस्तक में जगह जगह परमात्मा के आगे ‘पूर्ण’ शब्द लगाया गया है और शास्त्र विधि से भक्ति करने पर जोर भी दिया  है)
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मामूली शास्त्र का अध्ययन करने वाले भी जानते हैं कि - शास्त्रों में परमात्मा को असीम अनन्त ही कहा गया है न कि पूर्ण । पूर्ण शब्द से एक निश्चित आकार सीमा रेखा की ध्वनि होती है । साथ ही उसे न सत न असत न स्त्री न पुरुष (सतपुरुष) कहा गया है लेकिन सृष्टि हो जाने के बाद द्वैत स्थिति में वहाँ पहुँचे भक्तों ने (ध्यान से उतरने पर) अपनी भावना से उसे सतपुरुष भी कहा है ।
यह कुछ हद तक ठीक है पर विशेष ध्यान दें । जब बात परमात्मा (वास्तव में आत्मा) की है तो आत्मज्ञान की अन्तिम स्थिति (और भी साफ़ शब्दों में सभी स्थितियों का अन्त) में वहाँ कहने सुनने वाला कोई नहीं होता । द्वैत समाप्त होकर, वह उसी में लीन होकर 1 अद्वैत ही रह जाता है । उसी को शास्त्रों ने ‘सारतत्व’ या आत्मा कहा है ।
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ज्ञानगंगा - जबकि बाइबल में उत्पत्ति विषय के सृष्टि की उत्पत्ति नामक अध्याय में लिखा है कि - प्रभु ने मनुष्य को ‘अपने स्वरूप’ के अनुसार उत्पन्न किया तथा 6 दिन में सृष्टि रचना करके 7वें दिन विश्राम किया ।
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बाइबिल में क्या लिखा है, मुझे नहीं मालूम पर जब यह आत्मा सारतत्व (है - शाश्वत स्थिति) यानी आदिसृष्टि से भी पूर्व आत्मस्वरूप था । तब पहले इसने (शास्त्र में भी यही वर्णन है) 84 आदि योनियों को बनाया पर सन्तुष्ट नहीं हुआ । तब सबसे अन्त में मनुष्य शरीर बनाया और फ़िर सन्तुष्ट होकर उसी में प्रविष्ट हुआ । जाहिर है पूर्व में वह कोई मनुष्य स्वरूप में नहीं था ।
वैसे इस स्थिति को पूर्णतया समझाना बेहद जटिल है पर वास्तव में यह बात विराट माडल के लिये है । एकदम वास्तविक स्थिति में तो परमात्मा विराट से भी परे है । क्योंकि विराट वगैरह जो कुछ भी है । सब उसी में है और निर्मित है । मूल में उसके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं ।
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ज्ञानगंगा - जबकि नानक साहब ने सतपुरुष के आकार रूप में दर्शन करने के बाद अपनी अमृतवाणी महला पहला श्री गुरुग्रन्थ साहब में पूर्ण बृह्म का आकार होने का प्रमाण दिया है ।
लिखा है - धाणक रूप रहा करतार । पृष्ठ 24 ।
हक्का कबीर करीम तू बेएब परवर दिगार । पृष्ठ 721 ।
तथा प्रभु के मिलने से पहले हिन्दू धर्म में जन्म होने के कारण श्री बृजलाल पाण्डे से गीता को पढ़कर नानक साहब बृह्म को निराकार कहा करते थे ।
वह कविर्देव परिभूः अर्थात सर्वप्रथम प्रकट हुआ । जो सर्व प्राणियों की सर्व मनोकामना पूर्ण करता है । वह कविर्देव स्वयंभूः अर्थात स्वयं प्रकट होता है । उसका शरीर किसी माता पिता के संयोग से (शुक्रम अकायम) वीर्य से बनी काया नहीं है । उसका शरीर (अस्नाविरम) नाड़ी रहित है अर्थात 5 तत्व का नहीं है । केवल तेज पुंज से 1 तत्व का है ।
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उपरोक्त वर्णन में इस बात पर जोर है कि ये आत्मा सदैव से ही किसी आकार (मनुष्य रूप) में था । अब आईये, एक प्रयोग करते हैं ।
एक हवाई जहाज (एक आकार) लीजिये । अब इसके चार टुकङे (दूसरा आकार) कर लीजिये । अब इसके सभी पार्ट (तीसरा आकार) अलग अलग कर लीजिये । अब सभी पार्ट का चूरा (चूर्ण आकार, चौथा) कर लीजिये । इस चूरे को उङा (कण कण में) दीजिये ।
अब बताईये इनमें से कौन सा आकार सत्य था ?
इसी matter से फ़िर हवाई जहाज किसी नये रूप, रंग (विचार और इच्छा शक्ति) में बन सकता है । मिट्टी से विभिन्न रंग रूप के खिलौने बनाते हैं । अलग अलग नाम देते हैं पर मूल मिट्टी ही है और उसका कोई निश्चित आकार नहीं है ।
शास्त्रों ने स्पष्ट कहा है कि - वह निराकार और साकार (सृष्टि होने के बाद) दोनों ही हैं । क्योंकि उसके अलावा दूसरा कोई है ही नहीं ।  सब कुछ उसी से है । और भी ध्यान दें परमात्मा को अवर्णनीय कहा है । आकार होने पर उसका वर्णन काफ़ी हद तक संभव था । 
वाणियों में जो - अलख पुरुष, अगम पुरुष आदि का वर्णन है । वह वास्तव में आत्मा की प्रकाशमय स्थिति है । अकह (परम लक्ष्य) को प्राप्त होने वाला । सबसे परे, निज आत्मस्वरूप को ही देखता है । और ये आदिसृष्टि से पूर्व वाली स्थिति ही है । फ़िर बताईये यहाँ एक अलग परमात्मा कहाँ से आया ? अकह का अर्थ ही यह है कि अब कहने सुनने वाला कोई है ही नहीं । फ़िर किससे और क्या कहा जाये ।
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ज्ञानगंगा - परन्तु वेदों में ‘ॐ’ नाम जो केवल बृह्म की साधना का मंत्र है । उसी को वेद पढ़ने वाले विद्वानों ने अपने आप ही विचार विमर्श करके पूर्णबृह्म का मंत्र जानकर वर्षों तक साधना करते रहे । प्रभु प्राप्ति हुई नहीं अन्य सिद्धियाँ प्राप्त हो गई । 
क्योंकि गीता अध्याय 4 श्लोक 34 तथा यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 10 में वर्णित तत्वदर्शी संत नहीं मिला । जो पूर्ण बृह्म की साधना 3 मंत्र से बताता है । इसलिए ज्ञानी भी बृह्म (काल) साधना करके जन्म मृत्यु के चक्र में ही रह गये ।
ज्ञानगंगा - परन्तु पूर्ण परमात्मा की 3 मंत्र की वास्तविक साधना बताने वाला तत्वदर्शी सन्त न मिलने के कारण ये सब मेरी ही (अनुत्तमाम) अति अश्रेष्ठ मुक्ति (गति) की आस में ही आश्रित रहे । अर्थात मेरी साधना भी अश्रेष्ठ है ।
ज्ञानगंगा - गीता अध्याय 9 के श्लोक 20, 21 में कहा है कि - जो मनोकामना (सकाम) सिद्धि के लिए मेरी पूजा तीनों वेदों में वर्णित साधना शास्त्र अनुकूल करते हैं । वे अपने कर्मों के आधार पर महा स्वर्ग में आनन्द मना कर फिर जन्म मरण में आ जाते हैं । 
अर्थात यज्ञ चाहे शास्त्रानुकूल भी हो । उनका एक मात्र लाभ सांसारिक भोग, स्वर्ग और फिर नरक व 84 चौरासी लाख योनियाँ ही हैं । जब तक तीनों मंत्र (ओ3म ॐ तथा तत, सत सांकेतिक) पूर्ण संत से प्राप्त नहीं होते ।
ज्ञानगंगा - सामवेद के श्लोक न 822 में बताया गया है कि जीव की मुक्ति 3 नामों से होगी । प्रथम - ॐ दूसरा सतनाम - तत और तीसरा सारनाम - सत । यही गीता भी प्रमाण देती है कि ॐ तत सत और श्री गुरुग्रन्थ साहब भी यही नाम जपने का इशारा कर रहा है । जो 1 सच्चा नाम है । इसी तरह यह सारनाम भी अकेला ॐ मन्त्र किसी काम का नहीं है ।
ये तीनों नाम व नाम देने की आज्ञा मुझे गुरुदेव स्वामी रामदेवानन्द जी महाराज द्वारा बख्शीश है । जो कबीर साहब से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है ।
कबीर मानुष जन्म पाय कर, नहीं रटे हरि नाम । 
जैसे कुँआ जल बिन, खुदवाया किस काम ।
कबीर हरि के नाम बिना, राजा गदर्भ होय ।
माटी ढोवे कुम्हार की, घास न डारे कोय ।
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उपरोक्त सन्त कबीर साहब की बात कहते हैं ।
देखिये खुद कबीर साहब क्या कह रहे हैं -
वेद हमारा भेद है, मैं वेदों में नाहीं ।
जिस वेद से मैं मिलूं, वेद जानते नाहीं ।
और भी देखिये -
जहाँ तक मुख वाणी कहीं, तहाँ तक काल का ग्रास । 
वाणी परे जो शब्द है, सो सतगुरु के पास । 
और भी देखिये -
हम बैरागी बृह्म पद, सन्यासी महादेव ।
सोहं मंत्र दिया शंकर कूं, करत हमारी सेव ।
और देखें -
रागु गउड़ी पूरबी बावन अखरी कबीर जीउ की ।
सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ।
बावन अछर लोक त्रै । सभु कछु इन ही माहि ।
ए अखर खिरि जाहिगे । ओइ अखर ? इन महि नाहि ।
जहाँ बोल तह अछर आवा । जह अबोल तह मनु न रहावा ।
बोल अबोल मधि ? है सोई । जस ओहु है तस लखै न कोई ।
जब लग ध्यान विदेह न आवे । तब लग जिव भव भटका खावे ।  
ध्यान विदेह और नाम विदेहा ? दोउ लखि पावे मिटे संदेहा ।
अनुराग सागर से देखिये - मनुष्य का 5 तत्वों से बना यह शरीर जङ परिवर्तनशील तथा नाशवान है । यह अनित्य है । इस शरीर का एक नाम रूप होता है परन्तु वह स्थायी नहीं रहता ।
राम, कृष्ण, ईसा, लक्ष्मी, दुर्गा, शंकर आदि जितने भी नाम इस संसार में बोले जाते हैं । ये सब शरीरी नाम हैं । वाणी के नाम हैं । लेकिन इसके विपरीत इस जङ और नाशवान देह से परे उस अविनाशी चैतन्य शाश्वत और निज आत्मस्वरूप परमात्मा का वास्तविक नाम विदेह ? है और ध्वनि रूप है ? वही सत्य है वही सर्वोपरि है ।
और भी देखिये -
काया नाम सबै गोहरावे । नाम विदेह ? विरला कोई पावे ।
जो युग चार रहे कोई कासी । सार शब्द बिन यमपुर वासी ।
सार शब्द विदेह स्वरूपा । निःअक्षर ? वह रूप अनूपा ।
तत्व प्रकृति भाव सब देहा । सार शब्द निःतत्व विदेहा ।
बिनु रसना के ? जाप समाई । तासों काल रहे मुरझाई ।
नहिं वह शब्द ? न सुमरन ? जापा । पूरन वस्तु काल दिखदापा । 
आदि सुरति पुरुष को आही । जीव सोहंगम ? बोलिये ताही ।
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अब - ॐ तत सत का रहस्य देखते हैं । वास्तव में यह मन्त्र ‘हरि ॐ तत सत’ इस तरह है ।
हरि यानी चेतनधारा यानी स्वांस, ॐ यानी शरीर, सत यानी सत्य या सार, तत शब्द का अर्थ संस्कृत शब्दकोश में कई अन्य अर्थों के साथ - वायु और सीमा भी है ।
एक और नजरिये से तत्काल और तत्क्षण में जुङा शब्द ‘तत’ यही या इसी भाव का बोध कराता है । तत काल - इसी समय, तत क्षण - इसी क्षण ।
अब फ़िर से सूत्र को हल करते हैं -  हरि ॐ तत सत, यानी इस - शरीर (ॐ) में (छुपा) सत्य (सत) इसी वायु (तत) में स्वांस (हरि) में है । 
लेकिन केवल - ॐ तत सत का अर्थ तो यही शरीर सत्य है । सिर्फ़ इतना बनता है और फ़िर सबसे बङी बात यह वाणी का शब्द है । जबकि कबीर साहब का नाम निर्वाणी है ।
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- आप एक तरफ तो कबीर साहब को परमात्मा बता रहे है और दूसरी तरफ उसे खोज भी रहे है ।

- कृपया बतायें । आपको मेरी किस बात से लगा कि मैं परमात्मा को खोज रहा हूँ ?

26 जनवरी 2012

आखिर ये अमरकथा क्या है ? देवत्व को प्राप्त हुआ तोता

आदरणीय राजीव जी ! सादर सप्रेम नमस्कार । मेरे प्रश्नों के जवाब में आपने बहुत ही सारगर्भित जानकारियाँ दी । और मेरे ज्ञान में अभिवृद्धि की । इसके लिए अनेकानेक धन्यवाद प्रेषित करता हूँ । शुकदेव जी के प्रसंग में आपने बताया कि गर्भ से ही वे पूर्ण रूप से ज्ञान को प्राप्त किये हुए थे । लेकिन गुरु नहीं बनाने के कारण उन्हें स्वर्ग द्वार से लौटा दिया गया । यह तो वही बात हुई कि किसी का प्रमाण पत्र लेकर आओ कि u r well educated .बिना प्रमाण पत्र के तुम्हारे ज्ञान से हमें कुछ मतलब नहीं । एक बात और । ज्ञान तो मेरे विचार से स्वयं ही पूर्णता दे देता है । फिर उसे किसी स्वर्ग या अन्य किसी उच्चतर लोक में जाने का क्या प्रयोजन है ? अपने अज्ञानवश अगर मैंने उपर्युक्त बातें कही हों । तो बच्चा समझ कर माफ़ करेंगे । और अज्ञान से बाहर निकलने का रास्ता बताएँगे । इसी आशा के साथ । आपका ही - कृष्ण मुरारी ।
क्या गुरु बनाना किसी विश्वविधालय की डिग्री पाने जैसा है । शीर्षक ( ई मेल सबजेक्ट ) के साथ ।
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गर्भ योगेश्वर गुरु बिना लागा हरि की सेव । कह कबीर बैकुण्ठ से फ़ेर दिया शुकदेव ।
जीव ( मनुष्य ) अल्पज्ञ है । वह बहुत सीमित ही सोच सकता है । जबकि प्रभु की लीला अनन्त और विलक्षण है । श्रीकृष्ण के गोलोक में तैनात जय विजय नाम के दो द्वारपाल थे । एक बार श्रीकृष्ण ने उन्हें सख्त हिदायत दी 


कि एक निश्चित समय तक कोई भी अन्दर न आये । दो सन्त उसी समय पहुँच गये । और श्रीकृष्ण से मिलने का बारबार आगृह करने लगे । पर जय विजय ने उन्हें अन्दर नहीं जाने दिया । उनके सख्त आसुरी व्यवहार से खिन्न होकर सन्तों ने उन्हें असुर हो जाने का शाप दिया । पर श्रीकृष्ण जैसे महात्मा की सेवा में होने के कारण इस शाप से उन्हें कोई भय नहीं हुआ । उन्हें अच्छी तरह पता था । श्रीकृष्ण इस शाप को बेअसर या क्षीण कर देंगें । लेकिन वो तब आश्चर्यचकित रह गये । जब श्रीकृष्ण ने पूरी पूरी बेरुखी दिखाई । और उनके पक्ष में किसी सहानुभूति अथवा सहयोग भावना का प्रदर्शन नहीं किया । जबकि वो पूरी वफ़ादारी से उन्हीं की आज्ञापालन कर रहे थे । तब उनके मन में श्रीकृष्ण के लिये घृणा द्वेष प्रतिशोध वैर आदि बहुत सी बदले की भावनाओं का उदय हुआ । और इसके जटिल संस्कारी बीज पङ गये । दोनों को गोलोक 


से ( शाप के कारण ) गिरा दिया गया । तब वे प्रथम जन्म हिरणाकश्यप और हिरण्याक्ष असुर बने । दूसरे जन्म रावण और कुम्भकरण बने । अगले जन्म कंस और शिशुपाल बने । भगवत सत्ता के प्रति इनके घोर विरोध की कहानी सभी को मालूम ही होगी । सोचिये । एक मामूली सी घटना ने क्या गुल खिलाया । कितने बङे इतिहास को जन्म दिया । मैंने इस घटना के तार गोलोक से जोङे अवश्य है । पर इसके बीज और भी पहले से चले आ रहे होंगे । जो समय आने पर अंकुरित हो गये । ये है असली कहानी । लेकिन सोचिये । इस कहानी से कितनी अन्य ढेरों कहानियों ने जन्म लिया । कैकयी ने ये किया । मन्थरा की गलती थी । श्रवण के माता पिता का शाप था । उधर रावण और सीता ( वेदवती कन्या रूप में शाप ) का लफ़ङा अलग । शूर्पनखा । 


कौशल्या दशरथ के पूर्वजन्म में भगवान को पुत्र रूप में प्राप्त करने हेतु कङा तप । 10000 कारण तो मैं सिर्फ़ याददाश्त से ही बता सकता हूँ । अब गौर से सोचिये । इन सबका कोई 1 ही ठोस कारण आप बता सकते हैं ? कभी नहीं ।  ऐसे ही श्रीकृष्ण बनाम कंस लफ़ङा । और ऐसे ही हिरणाकश्यप का लफ़ङा । गौर करें । मोटे मोटे कई ग्रन्थ लिख जायें । जबकि मूल घटना वही । ये था आपकी बात का रहस्यात्मक चिंतनीय स्तर पर उत्तर । अब मुद्दे पर बात करते हैं ।
लेकिन बात शुरू करने से पहले आपको शुकदेव की जन्मकुण्डली के बारे में बतायें । महाराज शान्तनु और धीवर कन्या सत्यवती के पुत्र व्यास के पुत्र शुकदेव कैसे गर्भज्ञानी थे ? संस्कृत में शुक तोते से कहते हैं । देवत्व को प्राप्त हुआ तोता ।
एक बार पार्वती के गुरु नारद ने उनसे कहा - पार्वती शंकर तुम्हें अपनी सभी बातें नहीं बताते । कुछ बचाकर भी

रखते हैं । पार्वती हैरान रह गयीं । और बोली - नहीं नहीं मुझे सब बताते हैं । तब नारद बोले - उन्होंने तुम्हें कभी बताया कि शंकर के गले में पङी नरमुण्ड माला क्या है ? किसकी है । पार्वती फ़िर भौंचक्का रह गयीं । वाकई उन्हें यह बात मालूम नहीं थी । शंकर ने उनके पूछने पर उत्तर दिया - पार्वती ये तुम्हारे ही मुण्डों की माला है । तुम्हारे इतने जन्म हो चुके हैं । इतनी बार तुम मेरी पत्नी बनकर मृत्यु को प्राप्त हुयी हो । पार्वती और भी हैरान हुयी । बोली - मैं बार बार मर जाती हूँ । फ़िर आप क्यों नहीं मरते ? शंकर बोले - मैं अमरकथा जानता हूँ । और जो अमरकथा जानता है । उसकी मृत्यु नहीं होती । तब पार्वती को बेहद उत्सुकता हुयी कि - आखिर ये अमरकथा क्या है ? जिस समय की यह बात है । उस समय शंकर अमरनाथ 


नामक स्थान पर थे । उस स्थान को उन्होंने पूर्णत जीव जन्तु रहित कर दिया था । सिर्फ़ एक तोते का विकसित अण्डा शंकर की गुफ़ा में बचा रह गया था । रात का समय था । शंकर पार्वती को अमरकथा सुनाने लगे । और इसी समय अण्डे का कवच तोङकर वह तोता बाहर आ गया था । दैवयोग से अमरकथा सुनते समय कुछ ही देर में पार्वती को नींद आ गयी । और उनकी जगह वह तोता शिशु हूँ हूँ करता हुआ हुंकार देता हुआ कथा सुनता रहा । रात से सुबह हो गयी । अमरकथा सुनाने के रस में डूबे हुये शंकर ने देखा । पार्वती तो सो रही हैं । फ़िर ये हूँ हूँ कौन कर रहा है ? तब उनका ध्यान तोते पर गया । शंकर चौंके । ये तो नियम विरुद्ध तोता अमर हुआ जा रहा था । वे त्रिशूल लेकर उसके पीछे दौङे । त्रिशूल से बचकर भागता हुआ तोता ( आत्मज्ञान 


हो जाने के कारण सूक्ष्म शरीर में ) व्यास पत्नी के गर्भ में प्रविष्ट होकर छिप गया । और 12 वर्ष छिपा रहा । 12 वर्ष तक शंकर ने पहरा लगा दिया । और वहीं द्वार पर डटे रहे । फ़िर हारकर लौट गये । तब शुकदेव गर्भ से बाहर आये । और ज्ञान हो जाने के कारण 12 वर्ष के सुन्दर योग शरीर बालक में परिवर्तित हो गये । क्योंकि ज्ञान हो चुका था । ये उसी समय विरक्त भाव तपस्या करने चल दिये । पुत्र मोह में व्यास भी इनके पीछे पीछे चले । और बारबार रुकने का आगृह करने लगे । मार्ग में सरोवर में स्त्रियाँ नहा रही थी । शुकदेव को देखकर ज्यों की त्यों नग्न नहाती रहीं । मगर व्यास को देखकर वस्त्र पहन लिये । व्यास ने आश्चर्य से पूछा - मैं वृद्ध हूँ । और मेरा पुत्र युवा । फ़िर तुमने मेरी शर्म ही क्यों की ? स्त्रियों ने कहा - शुकदेव को स्त्री पुरुष अंतर का बोध ही नहीं है । ये था । शुकदेव के गर्भज्ञानी होने का रहस्य ।
एक बार पार्वती ने पूछा - महादेव मुक्ति किस किसकी हो सकती है ।
शंकर ने उत्तर दिया - पितर । यक्ष । गन्धर्व । देवता । असुर । मनुष्य इनकी मुक्ति नहीं हो सकती । केवल ध्यान परायण योगी की ही हो सकती है । जो 9 ध्वनियों और उससे भी परे 10 वीं तुरंगी ध्वनि को सुनता है । उसी की मुक्ति होती है । महादेव निर्वाणी । गिरजा सुन अमरकहानी ।
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अब आपकी शंकाओं पर बात करते हैं ।
गुरु नहीं बनाने के कारण उन्हें स्वर्ग द्वार से लौटा दिया गया - वैसे मुझे लगता है । ऊपर बहुत कुछ स्पष्ट हो गया । लेकिन फ़िर भी लगभग 2 युग जीवित रहे शुकदेव जी के जीवन रहस्य को समझना इतना सरल भी नहीं है । मैंने पहले ही बताया है । द्वैत का योग विशेष रूप से अतिरिक्त अहंकार का सृजन करता है । द्वैत में कहीं नहीं आता - ये तो घर है प्रेम का । खाला का घर नाहिं । शीश ( अहम ) उतार भूमि धरो । तब पैठो घर मांहि । जब मैं ( अहम ) था । तब हरि नहीं । अब हरि हैं । मैं नाहिं ।
अब शुकदेव को अपने पूर्व पुण्य संस्कार आदि से गर्भ स्थिति से ही उच्चतम ज्ञान की उपलब्धि ( मगर प्रारम्भिक । और अभी प्रयोग रहित ) हुयी । तो उनमें अहंकार का समावेश होना स्वाभाविक था । उनके पिता व्यास भी अच्छे ज्ञानी थे । मगर शुकदेव उन्हें भी महत्व नहीं देते थे । व्यास भी ये बात समझते थे कि पिता पुत्र का सम्बन्ध होने के कारण शुकदेव उनकी बातों पर कान नहीं देगा । पात्र अच्छा था । पर अहंकार बहुत था । ये सिलसिला चलता रहा । पर जैसा कि अटल सत्य है । आत्मज्ञान के बिना शान्ति और आंतरिक सन्तुष्टि हो ही नहीं सकती । शुकदेव को भी यही बैचेनी थी । तव व्यास ने उन्हें आत्म ज्ञानी वैदेही महाराज जनक के पास जाने की सलाह दी । जो बाल्यावस्था के गुरु अष्टावक्र जी से उस समय तक पूर्ण ज्ञान को उपलब्ध हो चुके थे । शुकदेव केवल आज्ञापालन से विवश बेमन से जनक के पास गये । क्योंकि जनक से ज्यादा श्रेष्ठ ज्ञानी तो वह खुद को ही मानते थे । जनक ने कुछ दिनों उन्हें रखकर तरह तरह के प्रयोगों द्वारा उनका कचूमर निकाल दिया । अंततः शुकदेव का अहंकार चूर चूर हो गया । और वे जनक के पैरों पर गिर पङे । जनक और शुकदेव के बीच हुये प्रयोगों का विवरण बहुत विस्तार में है । अतः बताना संभव नहीं । कुछ कुछ ऐसा ही वाकया दशरथ पुत्र राम और उनके गुरु वशिष्ठ जी के बीच हुआ । और वशिष्ठ ने राम को बहु भांति समझाया । ये सभी रोचक प्रसंग आप वशिष्ठ योग ( गीता प्रेस गोरखपुर )  में पढ सकते हैं । आत्मज्ञान पर यह भी बहुत अच्छी पुस्तक है ।
u r well educated but ? - चलिये थोङी देर को गुरु को भी एक संस्था ही मान लेते हैं । मगर बात आपसे शुरू करते हैं । परिवार संस्था । आपके पुत्र से ही कोई अनजान व्यक्ति आपके विषय में पूछे । तो वह कुछ इस तरह उत्तर देगा - आज वह नीला शर्ट पहने हैं । गोल मुँह हैं । 5 फ़ीट लम्बाई है । शरीर अच्छा है । मेरा घर ? इस रास्ते से उस रास्ते । उस रास्ते से । फ़िर उस रास्ते आदि । विवरण बहुत बङा हो सकता है । फ़िर भी सही बात समझाना बहुत मुश्किल है । अब देखिये । सर्टिफ़िकेट - पिता का नाम कृष्ण मुरारी शर्मा । निवास - इस स्थान पर । कार्य - ये । मैं उनका पुत्र । मेरा नाम ये । बहुत कम शब्दों में सटीक एकदम ठिकाने की जानकारी । नो टेंशन । और भी देखिये । एक MBBS तक के स्तर का व्यक्ति । मगर विदाउट कालेज । कहीं एप्लाई करे । तो खुद को कैसे साबित करेगा । एप्लीकेशन में क्या विवरण देगा ? जबकि एक सर्टीफ़िकेट वाला सीधा सीधा संस्था और डिग्री का नाम लिख देगा । और बिना झंझट एक स्पष्ट तस्वीर चन्द शब्दों में ही बन जायेगी । सार ये कि मनमानी जंगलराज जंगल व्यवस्था से बचने के लिये ही नाम रूप पद अनुभव जैसी चीजों का नियम है । उसी आधार पर कोई नियुक्त संभव है ।
स्वर्ग या अन्य किसी उच्चतर लोक में जाने का क्या प्रयोजन - एक बात बताईये । आपने विवाह । संतान । घर बनाना । सर्विस । ये सब क्यों किया ? ये सब एक इंसान को - स्त्री । विना विवाह संतान । रहने को आवास । और भोजन वस्त्र । घर बसाने के वगैर भी प्राप्त हो जाते हैं । फ़िर इनकी क्या आवश्यकता ? आखिर जीव किसी न किसी स्थिति में तो रहेगा ही । या फ़िर आत्म ज्ञान से सभी स्थितियों का अन्त ही हो जाये । ज्ञान से जीवात्मा सुख को । और श्रेष्ठतम को उपलब्ध होता है । आत्म ज्ञान से रहित ये 84 नरक प्रेत योनि आदि में जाता है  । अब ये 5 तत्व शरीर एक दिन तो छूटना ही है । तब जीवात्मा की स्थिति अनुसार गति होनी तय है । तब वह कहीं तो जायेगा ही ? फ़िर कौन पागल होगा । जो श्रेष्ठ को छोङकर साधारण को चुनेगा । ये सब परमात्मा ही तो विभिन्न रूपों में खेल रहा है । अगर उसे खेल बेकार लगे । तो पलक झपकते ही सृष्टि खत्म । अपनी मढी में आप मैं खेलूँ । खेलूँ खेल स्वेच्छा ।
अज्ञान से बाहर निकलने का रास्ता - अज्ञान कहते किसे हैं ? किसी बात के प्रति अंधकार में होना । यानी तमोगुणी माया से आच्छादित हो जाना । प्रकाश का अभाव होना । गु कहते हैं - अंधकार को । और रू कहते हैं प्रकाश को । जो अंधकार से प्रकाश में ले जा सके । वही गुरु है । गुरु ही अज्ञान दूर कर सकता है । और गुरु का कोई विकल्प नहीं हैं ।

25 जनवरी 2012

इसमें नर्क 84 और प्रेतयोनि का कोई कालम ही नहीं है

क्या आप जानते हैं । जब भी कोई सच्चा सन्त आपसे आत्मा की आत्मज्ञान की बात करता है । तो यकायक आप चौंक से उठते हैं । झंकृत हो उठते हैं । कुछ भूला सा । कुछ खोया सा याद आता है । कोई हूक सी अन्दर उठती है । और आप बैचेन से होकर सब कुछ जानने को उतावले हो उठते हैं । लेकिन ये सब एक क्षणिक टंकार के समान ध्वनि आपके अन्दर होकर रह जाती है । और फ़िर आप - यों ? क्यों ? क्या ? लेकिन ? किन्तु ? परन्तु ? में उलझकर रह जाते हैं । तब अचानक चौंके भी आप ही थे । और फ़िर संशय भी आप ही करने लगे । ये क्या रहस्य है ?
अगर बात में कोई दम नहीं था । एकदम फ़ुल्ली फ़ालतू थी । तो फ़िर चौंके क्यों ? कोई आपको अन्दर से बिना ठोस हकीकत कैसे चौंका  सकता है ? और फ़िर संशय क्यों करने लगे । आईये इसी रहस्य पर बात करते हैं ।
मान लीजिये । एक बच्चा ( जीवात्मा । सोहं ) कुम्भ के मेले में ( संसार । त्रिलोक ) फ़ँसकर छुटपन ( जन्म जन्म से ) से ही परिवार ( सतलोक । हँस जीव का असली घर ) से बिछुङ ( माया । वासना ) गया । बस उस बच्चे के गले में एक लाकेट ( स्वांस में गूँजता उसका नाम । उसके घर का पता । और नक्शा ) उसकी असली पहचान और 


निशानी के तौर पर रह गया । जाहिर है । इस लाक्ड लाकेट ( आज्ञाचक्र । बृह्माण्डी द्वार ) की चाबी और नक्शे का रहस्य वहीं ( सतलोक ) का कोई ( गुरु । सतगुरु । सन्त ) ज्ञानी ( रहस्य जानने वाला ) बता सकता है । तो ये भूल जाना माया ( आत्मा पर चङे इच्छा आवरण ) की स्थिति है ।
अब ऐसा नहीं कि इस देश ( मृत्युलोक । त्रिलोक ) के राष्ट्रपति ( काल पुरुष ) को यह सत्य ( कि जो ये जीव बना दीन हीन ( वासना से क्षीण हुआ ) सा भटक ( 84 में ) रहा है । ये बहुत शक्तिशाली और धनी है ) मालूम नहीं । अच्छी तरह मालूम है । पर वह जानता है कि एक एक आत्मा ( क्योंकि चेतन गुण और अमरत्व सिर्फ़ इसी के पास है ) कितनी मूल्यवान है । इसलिये उसने इस जीव को सदा फ़ँसाये रखने के इतने वासनात्मक और 


आकर्षक इन्तजाम किये हैं कि उन सबको बता पाना बहुत कठिन है । बस पूरा खेल सिर्फ़ यही है ।
अब आईये । फ़िर से पहली वाली बात करते हैं । आप चौंके इसलिये कि आपके अन्दर कहीं गहराई में एक क्षीण सी चमक अब भी है कि - आप दरअसल ये हैं ही नहीं । और इसलिये आप घनचक्कर से बने रहते हैं कि ये सब चक्कर क्या हैं ? who am i ? आखिर मैं वास्तव में कौन हूँ ?
और दूसरा कारण भी है । जन्म जन्म हो गये आपको सुख शान्ति तलाशते । पर कभी नहीं मिली । गौर करिये । सुख शान्ति आनन्द । यानी ये आपके अन्दर कहीं छिपी हैं । यही खो गयी है । इसी की आपको सदा तलाश रही है । अन्दर कहीं आपको अहसास है । आप आनन्द स्वरूप है । नित नूतन हैं । अमर अजर हैं । और आनन्द का विपक्ष या विलोम शब्द है ही नहीं । इसलिये जब सन्त ने कहा - तुम न मन हो । न शरीर हो । बल्कि आत्मा हो । तो आप यकायक बुरी तरह चौंक गये । ऐसा लगा कि जन्म जन्मान्तर के बाद आपके देश का कोई आपको मिल 


गया । और गौर करें । इसमें कोई संशय भाव नहीं था । आत्मा में संशय नाम की चीज तक नहीं है । संशय दरअसल संसार का पर्यायवाची है । ये थी पहली बात । जो मेरे ख्याल से स्पष्ट हुयी । अब आईये दूसरी बात करते हैं ।
फ़िर अचानक ही आप संशय करने लगे । उस आपके ही परम हितैषी निस्वार्थी परमार्थी सन्त पर बिना वजह शंका करने लगे । तरह तरह के प्रश्न पूछने लगे । तर्क कुतर्क करने लगे । बहस करने लगे । ऐसा क्यों हुआ । आपको बताता हूँ । क्योंकि दरअसल ये विरोधी क्रियायें आप कर ही नहीं रहे । इसको करने वाला कोई और ही है ? कौन है वो ? बोलो बोलो कौन है वो ?
दरअसल आप चौंके थे । वो आपका विवेक था । जो क्षणिक जागृत हुआ था । और जो जीव की ज्ञानरहित वासनात्मक स्थिति में सोया रहता है । लेकिन जैसे ही कोई सन्त आपके सम्मुख आया । और आपका ध्यान शाश्वतता की ओर गया । कालपुरुष और उसकी मनमोहिनी पत्नी माया सतर्क हो गये । जहाँ तक हो सके । इस जीव को भृमित रखो । और काल फ़ाँस से निकलने न दो । लेकिन इन दोनों ने ये किया कैसे ? यही बताता हूँ ।
कालपुरुष । यमराय । राम ( दशरथ पुत्र ) । श्रीकृष्ण । खुदा । पहला पुरुष ( लगभग ) । मन । ये  सब एक ही

हस्ती के नाम रूप हैं । योगमाया । महामाया । माया । महादेवी । आदि शक्ति । आध्याशक्ति । इच्छाशक्ति । अष्टांगी । पहली औरत ( पूर्णतया ) । सीता । राधा । ये भी  सब एक ही हस्ती के नाम हैं ।
अब इनके तीन पुत्र कृमशः - बृह्मा ( रजोगुण ) विष्णु ( सतोगुण ) शंकर ( तमोगुण ) इनके भी छोटे बङे अलग अलग सबके हजार हजार नाम रूप हैं । ये मियाँ बीबी और इनके दो या तीन बच्चे । होते हैं घर में अच्छे । ही इस त्रिलोकी सृष्टि के सर्वेसर्वा हैं ।
अब मजे की बात ये है कि ये 5 मायावी प्रचार करते हैं कि त्रिलोकी में भी भक्तियोग सिद्धांत है । जबकि थोङा सा भी ध्यान से देखा जाये । तो त्रिलोकी के संविधान में कहीं भक्तियोग है ही नहीं । सिर्फ़ कर्मयोग ही है । प्रमाण और उदाहरण - त्रिलोकी में 4 प्रकार की

मुक्ति का प्रावधान है । ध्यान दें - मुक्ति । मुक्त नहीं । और यही ( यदि भक्ति कहें तो ) सबसे बङा फ़ल है । इससे बङा फ़ल द्वैत में है ही नहीं । क्या ? आप विष्णु । शंकर । बृह्मा । के समकक्ष और उतने ही बङे लोक और अधिकारों के मालिक बन सकते हैं । साफ़ शब्दों में कहा जाये । तो त्रिलोकी की भक्ति ? द्वारा कोई भी जीव सेम - विष्णु । शंकर । बृह्मा । का पद और वैसा ही लोक प्राप्त कर सकता है । ध्यान रहे । द्वैत भक्ति में कोई भी पुरुष भक्त - कालपुरुष । राम । श्रीकृष्ण । कभी भी किसी भी हालत में नहीं बन सकता । और न ही कोई स्त्री - अष्टांगी या उसके अन्य पद रूप अधिकार प्राप्त कर पायेगी ।
अब और भी मजे की बात देखिये । इसको ये 5 जन्म मरण से मुक्ति और मोक्ष बताते हैं । जबकि खुद का  ठिकाना

नहीं है । अपने बच्चों के भी सगे नहीं हैं । ध्यान दें - विष्णु । शंकर । बृह्मा । तीनों बच्चों ने ही अपनी माँ ( माया जिसने प्रचारित कर रखा है । वही सब कुछ है ) से अमर होने का ( उसी वर्तमान शरीर और स्थिति का ) वरदान माँगा । उसने स्पष्ट मना कर दिया । ये हरगिज नहीं मिल सकता । कैसे दे सकती है ? खुद कालपुरुष और अष्टांगी भी अमर नहीं हैं । अमर होना छोङिये । निश्चित आयु से ज्यादा आयु भी नहीं ।
और भी ध्यान दें । विष्णु । शंकर । बृह्मा आदि की पूजा करने वाले रावण आदि बहुत से अन्य असुरों तथा समय समय पर तमाम अन्य तपस्वियों ने इनसे अमरता का वरदान माँगा । जिसके लिये साफ़ मना कर दिया गया । अब बताईये । प्रमाणित हो गया । द्वैत में भक्ति योग नहीं है । तपस्या रूपी जितना कर्म किया । उतना फ़ल मिला । जब उनको ही 84 में फ़ेंक दिया जाता है । तो फ़िर आप पर रियायत क्यों कर होगी ? फ़िर ये मुक्ति कहाँ हुयी ?
अब अद्वैत का सबसे छोटा नियम देखिये । इसमें - नर्क । 84 । और प्रेतयोनि का कोई कालम ही नहीं है । इसमें मेहनत करने से आप राम । श्रीकृष्ण । कालपुरुष । अष्टांगी जैसी उपाधियाँ तो प्राप्त कर ही सकते हैं । अच्छी मेहनत करने पर इससे कहीं उच्चतम स्थितियों को प्राप्त कर सकते हैं । और फ़िर परम लक्ष्य अमरता को भी प्राप्त कर सकते हैं ।
तो जैसे ही आप सत्य ( आत्मा ) की तरफ़ आकर्षित हुये । काल चौंक गया । डर गया । काल ( मन ) विशेष रूप

से ( उस समय ) प्रभावी हो गया । उसने जीव को आवेशित कर दिया । ध्यान रहे । उसे मालूम है कि वो इस अजर अमर अविनाशी जीव को न मार सकता है । न जला सकता है । न काट सकता है । उसके मूल का किसी प्रकार से अहित नहीं कर सकता है । बस डरा सकता है । धमका सकता है । भृमित कर सकता है । सो उसने वही किया । पर आत्मा की चमक का प्रभाव भी मामूली नहीं होता । जीव फ़िर भी सन्त की तरफ़ आकर्षित हुआ । तब इसकी पत्नी माया भी सक्रिय हो गयी । और उसने धन वैभव वासना कामवासना का जाल उस पर ( वैसे तो ये जाल है ही । पर इस समय विशेष रूप से ) बारबार फ़ेंकना शुरु किया ।
पर सन्तों के सामने माया की दाल भी नहीं गलती । तब इसके तीनों पुत्र भी सक्रिय हो गये । और तीन गुणों - सत रज तम के द्वारा जीव को पाप पुण्य अच्छा बुरा स्वर्ग नरक आदि भय दिखाने लगे । लेकिन अपनी असली पहचान के

प्रति प्रयत्नशील करोंङों जन्मों से भटकता जीव जब फ़िर भी इनके झाँसे में नहीं आया । तब इनके चमचे अन्य ( चिल्लर ) देवी देवता भी सक्रिय ( उस समय विशेष ) हो उठे । और विभिन्न दैवीय परेशानियों द्वारा उस भक्त को विचलित करने लगे ।
अब सार समझिये । जब भी आप सच्चे आत्मज्ञान की तरफ़ उन्मुख हुये । ये 5 और इनकी विशाल सेना आप पर कङी चौकसी करने लगी । और आप अंतर्द्वन्द के झूले में झूलते हुये कभी इनको तो कभी सन्त को सच मानने लगे ।
लेकिन कालपुरुष अच्छी तरह जानता था । इतनी व्यवस्था भी काफ़ी नहीं । इतने इन्तजाम के बाद भी बच्चा अपने असली मम्मी पापा को याद करेगा ही । तब उसने नकली आत्मज्ञान का प्रपंच फ़ैलाकर उन पर विशेष कालदूतों को नियुक्त कर दिया । आज इतना ही ।

24 जनवरी 2012

सहज योग फ़ुल आटोमैटिक सिस्टम है

जय गुरुदेव । 29  प्रश्न - श्री स्वामी जी महाराज ! मन को कैसे स्थिर किया जाय ?
उत्तर - मन को स्थिर करने के लिये मन को प्रतिदिन श्री स्वामी जी महाराज के नाम के भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । आरती । दर्शन । ध्यान में नियमित नियमानुसार लगाना चाहिये । प्रतिदिन ध्यान करना चाहिये । ध्यान करने का सुन्दर समय है । सुबह का बृह्म मूहूर्त । बृह्म मूहूर्त में उठकर निश्चित रूप से ध्यान । सुमिरन करना चाहिये । ऐसे नियम के साथ थोडा शास्त्र पाठ । यानी अपने श्री सदगुरू देव जी महाराज की लिखी पुस्तकों का अध्ययन करने से मन सहज ही एकाग्र हो जाता है । ध्यान के बाद कम से कम आधा घण्टा गुरू भाव में चुपचाप बैठना जरूरी है । ध्यान के तुरन्त बाद मन को किसी सांसारिक कार्य में नहीं लगाना चाहिये । उसमें बहुत हानि होती है ।
जय गुरुदेव !
1 राजीव भैया मैं तो ध्यान के बाद तुरन्त उठ जाता हूँ । क्योंकि सुबह इतना टाइम नहीं होता है । तो क्या इससे हानि होगी ?
ans - जैसा कि मैंने इस प्रश्नोत्तरी के ही एक लेख के अन्त में लिखा - ये प्रश्न उत्तर हमारे यहाँ के नहीं हैं । हालांकि किसी तरह इंसान इन नियमों पर चल सके । तो निसंदेह ये नियम किसी इंसान को अच्छा साधक और उत्तम भक्त बना सकते हैं । लेकिन अगर गौर से सोचें । तो इन नियमों का पालन करना आज के समय में शायद किसी के लिये संभव नहीं हैं । सही और भाव भक्ति में तो पूरे भाव से लिया गया

एक बार का नाम भी अत्यन्त फ़लदाई है - स्वांसा खाली जात है तीन लोक का मोल । और सही भक्ति में कभी भी किसी प्रकार की हानि नहीं होती । जो चीटीं की भी पग ध्वनि सुनता है । उसे क्या इतना भी मालूम न होगा कि आपके पास बैठने का निश्चित समय है । इसलिये वह आपको हर तरह सहयोग ही करता है । न कि अत्याचार । परमात्मा दयालु है । आतंकवादी नहीं । बस उसका नियम बेहद सख्त है । दूसरे मैंने कई बार कहा - सहज योग फ़ुल आटोमैटिक है । एक बार सच्चे गुरु से नाम मिल जाने पर ये पूरी व्यवस्था अपने हाथ में ले लेता है । ये आपको खुद ध्यान पर बैठा भी देगा । उठा देगा । आपकी दीक्षा को कुछ महीने होने को आये । आपने महसूस किया होगा । ये ज्ञान आपको तेजी से बदलकर सार्थकता की ओर ले जा रहा है । और मुझसे जुङने के बाद आपके अन्दर एक व्यापक बदलाव हो भी चुका है । अगर आपने अभी तक इस बिन्दु पर ध्यान नहीं दिया । तो अब देकर देखना । जो लोग बिना दीक्षा के भी मुझसे जुङे हैं । उनके अन्दर भी एक क्रान्तिकारी परिवर्तन आ चुका है । अगर उन्होंने कभी इस तरफ़ ध्यान नहीं दिया । तो अब अपनी स्थिति का आंकलन करें । निश्चय ही उनमें भी आमूलचूल बदलाव हो चुका है । सहज योग में सिर्फ़ एक बात महत्वपूर्ण है । परमात्मा के प्रति गहरा प्रेम भाव ।  वह सिर्फ़ भाव का भूखा है । इसे ही बनाये रखें । बहुत जल्द लाभ होने लगेगा ।
2 मेरे पास श्री स्वामी जी महाराज की आरती नहीं है । कृपया आप मुझे मेल कर दे ।


ans - आरती वाला फ़ोटो इसी लेख के साथ प्रकाशित कर रहा हूँ । अलग से आरती भी प्रकाशित करूँगा । पर ये आवश्यक नहीं है कि इसको आप जबरन नियम बनायें । हाँ लेकिन शाम को नियमित आरती करने से ध्यान और सांसारिक स्थितियों में काफ़ी लाभ होगा । बस ये ध्यान रखें । गुरु की पूजा आलमारी देवी देवताओं के साथ नहीं होनी चाहिये । यानी एक ही आलमारी में रख दो । गुरु का स्थान बहुत ऊँचा है । एक ही कमरे में । या एक ही आलमारी के ऊपर नीचे खानों में ऐसी व्यवस्था करने पर विशेष ध्यान रखें कि गुरु का चित्र इनसे ऊपर हो । वैसे तो गुरु को प्रणाम या सुमरन करने से सभी उसमें आ जाते हैं । क्योंकि गुरु ज्ञान स्वरूप होते हैं । अतः फ़िर अन्य की पूजा आरती आदि की आवश्यकता ही नहीं । फ़िर भी जन्म जन्म के संस्कारवश लोग इसको एकदम छोङते हुये घबराते हैं । और हम किसी से छोङने को कहते भी नहीं । जब तक उनमें आंतरिक रूप से खुद परिवर्तन न हो । इसलिये आप किसी देवता भगवान आदि की पूजा आरती करते भी हैं । तो उसे बाद में करें । तभी सही लाभ होगा । वरना ये ठीक इसी तरह होगा । रेल के डिब्बों के सबसे पीछे इंजन डिब्बों की तरफ़ ही मुँह करके जोङा जाये । तो फ़िर रेल कैसे चलेगी । ध्यान के वक्त भी आपको पूर्व में भाव प्रार्थना 


आदि करने की आदत है । तो उस वक्त सिर्फ़ गुरु से ही करें । अगर देवी भी मनाई । देवा भी मनाया । भगवान भी मनाया ।  गुरु भी मनाया । तो फ़िर कुछ हाथ नहीं आयेगा । एकहि साधे सब सधे । सब साधे सब जाहि ।
3 मैं अभी नया साधक हूँ । मुझे ये बताये कि दिन में काम करते हुए भजन कैसे करें ।
ans - ये प्रश्न आपका तभी तक रहने वाला है । जब तक ध्यान में सही प्रविष्टि और भजन पर पकङ नहीं हो जाती । एक बार भजन आपको पकङ लेगा । तो मजाक नहीं कर रहा । वह लेट्रीन में भी आपसे नाम सुमरन करायेगा । ऊपर ही मैंने कहा - सहज योग फ़ुल आटोमैटिक सिस्टम है । बस साधक स्थिति अनुसार कुछ समय अवश्य लग जाता है । फ़िर भी आप ये जरूरी नहीं कि हर समय भजन की टेंशन पाल लें । बस फ़ुरसत के समय ठीक उसी तरह सुस्ताये । जैसे कठिन परिश्रम के बाद मजदूर  सुस्ताता है । और गौर करें । उस समय उसका ध्यान कहाँ जाता है ? वह तेजी से चलती सांसों को ठहराव देता हुआ फ़िर अपने आपको रीचार्ज करता है । बस यही भजन है । फ़र्क इतना है । वह अनजाने में करता है । और सतनाम दीक्षा  प्राप्त न होने से अधिकारी नहीं है । आप इसको जानते हुये करोगे । और इसके अधिकारी हो । इसलिये आपकी  एक एक सांस ( जिस पर आपने ध्यान दिया ) खाते में लिखी जायेगी । जिसका सुमरन फ़ल निश्चय ही आपको प्राप्त होगा । वैसे काम करते हुये भजन करने के सन्तमत में कुछ प्रसिद्ध

उदाहरण हैं । जैसे - पनिहारिने सर पर मटकी रखे । बिना उसे पकङे आराम से बातें भी करती हुयी चलती है । और मटकी को ध्यान द्वारा संभाले रहती हैं । स्त्रियों द्वारा ओखली में धान आदि कूटना । और बातचीत करना । ड्राइविंग करते वक्त गाने सुनना । और ड्राइविंग का भी ध्यान रखना आदि बहुत से उदाहरण हो सकते हैं । जिनमें अभ्यस्त हो जाने पर इंसान खतरनाक स्थिति में भी मौज से बातचीत और वह काम भी करता रहता है । श्रीकृष्ण तो यहाँ तक कहते हैं - अर्जुन युद्ध कर । और निरन्तर भजन कर ।
4 श्री स्वामी जी महाराज कहते है कि - अपने परिवार की अच्छी व्यवस्था करें । उनके अच्छे खाने पीने व अच्छी पढाई की व्यवस्था करें । तो क्या इन सबको ईश्वर से चाहना । या कामना करना 


गलत है  । यदि वो अभी इतना करने के योग्य नहीं है । क्योंकि परिवार की जिम्मेदारी भी तो निभानी है ।
ans - अभी की स्थिति में आप सब ईश्वर के लिये बच्चे के समान हो । इसलिये ईश्वर से कोई भी कामना करना गलत नहीं है । लेकिन ध्यान रहे । ईश्वर के बहुत सारे बच्चे हैं । इसलिये देते समय वह कर्म सिद्धांत पर ही देता है । जो भी जिस लायक है । वह उसे निश्चित देता है । लेकिन बहुत से आलसीपने में सिर्फ़ ईश्वर से बिना कुछ करे । माँगते हैं । उन्हें वह ठेंगा दिखाता है । इसलिये इस मामले में सत्ता का नियम बहुत सख्त है । जो भी प्राप्त होगा । कर्मफ़ल या भक्तिफ़ल के आधार पर ही प्राप्त होगा । इन दो के अतिरिक्त तीसरा कोई उपाय है ही नहीं । मैं आपको झूठी तसल्ली देने के लिये झूठ नहीं बोल सकता । वह एक बार को आपकी वाकई मजबूर स्थिति हो जाने पर लोन के समान सहायता अवश्य करता है । मगर मय ब्याज के वसूल भी कर लेता है । अटल सत्य यही है कि - मुफ़्त में नान रिफ़ंडेबल वह 1 रुपया भी किसी को नहीं देता । चाहे चिल्ला चिल्लाकर मर क्यों न जाओ । उसका ला एण्ड आर्डर बङा सख्त है भैया । इस दृष्टिकोण से ? 1 नम्बर का कंजूस भी है । दस साल तो मुझे हो गये नौकरी करते । 1 भी सैलरी नहीं मिली । कहा 1 टाइम पास बीबी ही दे दो । तो उत्तर मिला - अगले जन्म में ।


5 कृपया मुझे ये भी बताये कि मेरा ध्यान सही राह पर चल रहा है । या नहीं ? मैं ध्यान के प्रारंभ में आँखों व कानों को अपनी उंगलियों व अंगूठे से बंद करता हूँ । तो मुझे सर की नसों की सनसनाहट की अलावा एक ध्वनि सुनाई देती है । वो क्या है ? आप तो ये आसानी से जान सकते है । भैया मेरे ज्यादातर प्रश्न व्यक्तिगत होते हैं । फिर भी समय निकाल कर जवाब देने की कृपा करें । मेरे और भी प्रश्न हैं । जो बाद में मेल करूँगा । गुरूजी की कृपा से मुझे अपने मन व वासना पर काफी नियंत्रण लगने लगा है । विष्णु ।

ans - जैसा कि मैंने ऊपर ही कहा । सहज योग फ़ुल आटोमैटिक होता है । यह आपको गलत राह चलने ही नहीं देगा । यह ठीक इसी कम्प्यूटर की तरह होता है । जहाँ एक अक्षर भी गलत लिख जाने पर वह तुरन्त सन्देश देता है कि - यह गलत है । सही करिये । इसलिये आप सहज योग को सहजता से यानी आराम आराम से बेताल्लुक मौज में करिये । यह खुद आपको बहुत से उत्तर देगा । बस कुछ समय लगेगा । और आपको सुमरन करते रहना होगा । अच्छी लगन भाव भक्ति से सुमरन करने पर विभिन्न आकाशवाणियाँ ( ध्वनियाँ ) पहले कुछ क्षीण और अस्पष्ट सी सुनाई देती हैं । जो भक्ति ध्यान गहराने के साथ अधिकाधिक स्पष्ट होती जाती है । नसों की सनसनाहट कालचक्र के रथ की ध्वनि है । और विभिन्न ध्वनियाँ उसी अक्षर ( झींगुर जैसी ध्वनि ) से प्रकट हो रही हैं । प्रारम्भ में यह परिणाम भी उत्साहजनक हैं । ध्वनि का प्रकट होना अच्छे संकेत देता है । आपके प्रश्न कैसे भी हों । मेरे लिये महत्वपूर्ण हैं । अतः आप कभी संकोच न करें ।

23 जनवरी 2012

क्या आप जानते हैं ?

क्या आप जानते हैं - सिर्फ़ कबीर साहब  ही अब तक " सन्त शिरोमणि " हुये हैं । उनके समकक्ष दूसरा कोई भी यह स्थान प्राप्त न कर सका । और यह बात सिर्फ़ आत्मज्ञान में उनकी लक्ष्य प्राप्ति के लिये नहीं कही जाती । बल्कि उनका - जीवन । आचरण । पाखण्ड विरोध । उनके सर्वोच्च उपदेश आदि सबको मिलाकर उन्हें यह उपाधि दी गई है । जबकि आत्मज्ञान के परम लक्ष्य को प्राप्त हुये दूसरे सभी सन्त इस मामले में तुलनात्मक अधिकतम 10% रहे । आत्मज्ञानी  सन्तों के नाम पर जो फ़ौज ( केवल प्रसिद्ध लोगों की बात । अभी जीवित । और शरीर त्याग चुके भी ) नजर आती है । इन्हें आत्मज्ञान की हवा तक का स्पर्श नहीं हुआ था ।
क्या आप जानते हैं - भक्त शिरोमणि का स्थान सिर्फ़ मीरा जी को ही प्राप्त है । अखिल सृष्टि में यह एकमात्र महिला हैं । जिनका मैं आदर करता हूँ । महिला शब्द मैं ज्ञान को प्राप्त हुये उनके शरीर और उस जन्म के आधार पर कह रहा हूँ । वरना स्वयं परमात्म स्वरूप मीरा जी अब न स्त्री है । न पुरुष । अब वे हमेशा के लिये एक शुद्ध चैतन्य अविनाशी आनन्द स्वरूप आत्मा हैं । जाहिर है । इन्होंने परम लक्ष्य प्राप्त कर लिया था ।
क्या आप जानते हैं - द्वैत या कुण्डलिनी योग में श्रीकृष्ण के बराबर योगी आज तक नहीं हुआ । इनको भी योग शिरोमणि या योगेश्वर की उपाधि प्राप्ति है । इन्होंने योग में अंतिम लक्ष्य को प्राप्त किया था । इनको पूर्ण पुरुष भी कहा जाता है । लेकिन ये सिर्फ़ 125 वर्ष ही सशरीर

मृत्युलोक में रहे । सफ़ल योगी होने के कारण पूरे जीवन इनका शरीर 18 वर्षीय सुन्दर युवा जैसा ही रहा । इनका अदभुत सिद्धांत था - जीवन में सभी नियम आवश्यक है । फ़िर कोई भी नियम आवश्यक नहीं । परिस्थिति के अनुसार जो सबके लिये  कल्याणकारी हो । वही कार्य और नियम सर्वश्रेष्ठ है ।
क्या आप जानते हैं - मर्यादा पुरुषों में शिरोमणि दशरथ पुत्र मर्यादा पुरुषोत्तम राम ही सर्वोच्च हैं । मर्यादा निभाने में इनके समान आज तक दूसरा कोई नहीं हुआ । प्राण जाये पर वचन न जाई । इनके खानदान यानी रघुकुल की रीति ही थी । लेकिन ये हजारों साल जीवित रहे थे । और श्रीकृष्ण की तरह ही सफ़ल योगी होने के कारण पूरे जीवन इनका शरीर 18 वर्षीय सुन्दर युवा जैसा ही रहा । शास्त्र के अनुसार 12000 वर्ष तो इन्होंने राज्य ही किया था ।
क्या आप जानते हैं - व्यास पुत्र श्री शुकदेव जी गर्भ ज्ञानी थे । आत्मज्ञान में ये महाराज जनक के शिष्य हुये । अपनी योग उपलब्धियों के चलते पूर्व में यह स्वर्ग प्राप्ति के अधिकारी तक हो गये । लेकिन इन्होंने कोई गुरु नहीं किया था । लिहाजा विष्णु ने इन्हें स्वर्ग से लौटा दिया । यह कहकर - ये नियम विरुद्ध है । बिना सच्चे गुरु के किसी को स्वर्ग या अन्य कोई भी उपलब्धियाँ नहीं दी जा सकती ।
अब मजे की बात ये है कि - श्री शुकदेव जी त्रेता युग ( जनक के शिष्य ) से लेकर पूरा द्वापर युग और कलियुग के प्रारम्भ तक सशरीर रहे । और राम और श्रीकृष्ण से 


भी चार कदम आगे इनका योग शरीर सदा किशोरावस्था वाला ही रहा । इन्होंने ही राजा परीक्षित को तक्षक सर्प द्वारा डसे जाने का शाप लग जाने पर 88000 ऋषि मुनियों की मौजूदगी में नैमिषारण्य में मोक्ष ज्ञान कराया था । और मृत्यु के मात्र 7 दिन शेष रह जाने पर । 7 दिन में परीक्षित की आत्मा को काल सीमा से ऊपर उठाकर मोक्ष कराया । इसी आधार पर आज तक भागवत सप्ताह का आयोजन होता है । जिसका मोक्ष से दूर दूर तक का वास्ता नहीं होता ।
क्या आप जानते हैं - संसार में अधिकांश लोग धर्म के नाम पर फ़ैला बातूनी कचरा समेटे हुये उसे हीरे मोती समझ कर प्रसन्न हो रहे हैं । जबकि ठोस हकीकत एकदम अलग है । ऊपर मैंने अपने दृष्टिकोण से कोई बहुत ज्यादा उच्च  गूढ महत्वपूर्ण रहस्य नहीं बताये । पर ईमानदारी से अपना आंकलन करिये । क्या आप ये साधारण बातें भी जानते थे । या आपका जिन विद्वानों से परिचय है । उन्होंने कभी ये बताया ।
बौखलाकर मुझे गाली देना शुरू करें । इससे पहले ही दो प्रसिद्ध सांसारिक प्रमाण - 1 कबीर को आज भी तमाम विद्धान पंडित आचार्य वगैरह एक अनपढ । साधु । कवि और साधारण इंसान मानते हैं । जिसे केवल कविता की गहरी समझ थी । जबकि कबीर अजन्मा अविनाशी स्वयं प्रकट परमात्मा ही हैं ।


2 मीरा जी को आज भी श्रीकृष्ण की भक्त के रूप में ही लोग अधिक जानते हैं । जबकि मीरा जी आज वो हैं । जिसके लिये श्रीकृष्ण सिर्फ़ सपना ही देख सकते हैं । और मीरा जी की एक झलक पाना भी श्रीकृष्ण के लिये असंभव है । क्योंकि बङे से बङे योगियों का प्रवेश तक वहाँ कभी हो ही नहीं सकता । वहाँ सिर्फ़ सन्त जाते हैं ।

सार शब्द जब आवे हाथा तब तब काल नवावे माथा

कई बार संसार में फ़ैले भ्रामक धर्म विचारों सिद्धांतों अनेक पूजा पाठ कर्म काण्ड से तृस्त मगर भक्ति के इच्छुक भक्त जिज्ञासुओं ने मुझसे पूछा है - काल पूजा और परमात्मा की पूजा में अन्तर कैसे किया जाये । सच क्या है । कैसे पता चले । हमारा गुरु या पंथ हमसे जो भक्ति करा रहा है । वो काल पूजा है । द्वैत है ।  या अद्वैत है आदि आदि ।
अब मुश्किल ये थी कि ये पूछने के साथ साथ उन्होंने किसी धार्मिक संस्था या गुरु आदि का नाम भी साथ में जोङ दिया । और आज मैं ये सच कहता हूँ कि - मैं तब पूर्ण स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाया । कारण आप आसानी से समझ सकते हैं । तमाम लोगों की आस्था को चोट न पहुँचाना । क्योंकि ये उत्तर मैं व्यक्तिगत न देकर ब्लाग पर सार्वजनिक रूप से दे रहा था । इसलिये थोङा घुमा के झूठ बोल दिया । अगर प्रश्नकर्ता समझदार है । तो इसमें छिपे रहस्य को पकङ लेगा । ऐसी ही मिली जुली जिज्ञासाओं के समाधान हेतु ये लेख है । जो आपको वास्तविकता से रूबरू करायेगा ।
सबसे पहली बात तो यही है कि परमात्मा की भक्ति मौन हर कर्म काण्ड से रहित और नाम जप पूर्णतया निर्वाणी (  बिना वाणी के जपा जाना । अजपा । जिसका जप स्वयं हो रहा है ) है । मतलब आपको 2 अक्षरों से बने शब्द का भी कोई भी नाम या मन्त्र गुरु देता है । तो वह सन्तमत आत्मज्ञान या अद्वैत की भक्ति नहीं है । बल्कि काल पूजा ही है । यहाँ नये लोगों को थोङी अङचन हो सकती है । क्योंकि हम या सच्चे सन्त मत के गुरु भी जो नाम देते हैं । उसको भी ढाई अक्षर का कहा जाता है । जाहिर है । ढाई अक्षर का होने से वह भी शब्द हुआ । पर अन्तर है । यह नाम वाणी के जैसा न होकर ध्वनि स्वरूप है । और चेतनधारा यानी स्वांस में स्वयं गूँज रहा 


है । और साधारण जीव स्थिति में यह नाम उल्टा हो गया है । इसी के लिये कहा गया है - उल्टा नाम जपा जग जाना । वाल्मीकि भये बृह्म समाना । इसी उल्टे नाम को प्राप्त कर जीव जब काग वृति ( कौआ स्वभाव । मल विष्ठा युक्त चीजों में आसक्ति ) से हँस हो जाता है । और बृह्माण्ड में ऊँचा उठने लगता है । तब ये हँस ज्ञान बोध से प्रकाशित हुआ इसी नाम को उलटकर " हँसो..हँसो " कहता है । जबकि काग वृति में अहम वश " सोहं..सोहं " पुकारता है । कहीं ररंकार आदि स्थिति पर ये र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र और म्म्म्म्म्म्म्म्म यानी काल पुरुष का र अक्षर और उसकी पत्नी माया का म अक्षर संयुक्त कर राम ध्वनि भी गुँजाता है । बस खास बात यही है कि अद्वैत में ये सब ध्वनि स्वरूप है । जबकि कुण्डलिनी जागरण जैसी क्रियाओं में ॐ आदि शब्द कुछ अन्य मन्त्र भी बिना बोले ठीक उसी तरह सुनाई देते हैं । जैसे हम वाणी से बोलते हैं ।
अतः कोई भी गुरु आपसे वाणी द्वारा 1 अक्षर का भी नाम या मन्त्र वाणी द्वारा जपने को कहता है । तो वह सतनाम यानी परमात्मा की भक्ति नहीं है । वाणी के सभी स्वर अक्षर ( अंतर आकाश में झींगुर जैसी निरन्तर ध्वनि ) और उसके कंपन  से उत्पन्न हो रहे हैं । और हमारे मुँह से निकलकर वापस आकाश में जाकर उसी अक्षर में लीन हो जाते हैं । और अक्षर को ही ज्योति कहते हैं । मतलब ज्योति कहते ही नहीं । इसका ठीक  दीपक की ज्योति जैसा सुघङ स्वरूप है । जबकि अपने दूसरे अक्षर स्वरूप में ये झींगुर 


जैसी निरन्तर ध्वनि है । इसी को अखण्ड रामायण । राम कथा । या शंकर द्वारा पार्वती को सुनाई - अमरकथा भी कहते हैं । लगभग यही स्थिति शून्य 0 ज्ञान की कही जाती है । और यही काल भी है । देखिये - अक्षर को ही सत्य बतावे । वे है मुक्त वियोगी ।
जहाँ तक मुख वाणी कही सो सब काल का ग्रास । वाणी परे जो शब्द है सो सतगुरु के पास । और वह सार शब्द है । कबीर साहब ने कहा है - धर्मदास  तोहे लाख दुहाई । सार शब्द बाहर नहिं जाई ।
अब इसके सबूत भी देखिये - सार शब्द जब आवे हाथा । तब तब काल नवावे माथा ।
यानी बिलकुल अंतिम स्थिति । जितनी भी आपने पढी या सुनी । उनसे एकदम अलग । इसी निर्वाणी नाम की भक्ति करते करते जब जीव अक्षर से भी पार । कई और स्थितियों से गुजरकर । एक तिनका वासना से भी रहित हो जाता है । तब ये सार शब्द ऊर्ध्व से उतरता है । और उसे खींचकर पार ले जाता है । लेकिन इससे पहले की स्थिति तक काल भी है । और माया भी । हालांकि राहत की बात ये हो जाती है कि कई VIP सहूलियतें साधक को पहले से ही मिलनी

शुरू हो जाती हैं । जैसे - जबसे रघुनायक  मोहि अपनाया । तबसे मोहि न व्यापे माया । यानी माया के क्षेत्र में रहते हुये भी उससे प्रभावित नहीं होते । उसका जादू बेअसर ही रहता है । काल हानि नहीं पहुँचाता - जबसे शब्द सुनो असमानी । तब से काल करे नहिं हानि ।
यही सार शब्द खींचकर परमात्मा से मिलाता है । उसी स्थिति को साक्षात्कार । आनन्द । परमानन्द । अवर्णनीय आदि कहा गया है । देखिये - अक्षर तीत शब्द एक बांका । अजपा हू से है जो नाका । ऊर्ध्व में रहे अधर में आवे । जो जब जाहिर होई । जाहि लखे जो जोगी फ़ेरि जन्म नहिं होई ।
यानी इससे पहले आवागमन है । जन्म मरण है ।
और भी प्रमाण देखिये - सार शब्द निर्णय का नामा । जासे होत मुक्त को कामा । यानी असली आत्मा का लक्ष्य । और यही गूढ है । अति गुप्त - सार शब्द निज गुप्त है कहऊँ वेद तोय सार । पाईये सो पाईये बाकी काल पसार । इसका जानने वाला शरीर बदलता हुआ सदैव अपने आप में स्थित रहता है । यानी माया से परे - शब्द न बिनसे बिनसे देही । हम साधु हैं शब्द सनेही ।
और देखिये । अद्वैत सन्तमत की एक मामूली लाइन । जो पूरे द्वैत ज्ञान की धज्जियाँ ही उङा देती है ।
धर्म कर्म दोऊ बटे जेवरी । मुक्ति भरे जहाँ पानी । यह गति बिरले जानी ।


और अन्त में - क्या आप जानते हैं । शंकर । महादेव । महाकाल । रुद्र । ( कालपुरुष और अष्टांगी माया के सबसे छोटे पुत्र । ) आदि कई रूपों वाले इस देवता की पूजा करने वाले अन्ततः सिर्फ़ भूत प्रेत योनि को प्राप्त होकर दीर्घकाल के लिये प्रेत गण बनते हैं । उनका अन्य कोई परिणाम नहीं होता । क्योंकि शंकर ही तम गुण का प्रतिनिधित्व करते हैं । ये इन्हीं की कुर्सी है । प्रमाण - बृह्मा - रज । विष्णु - सत । शंकर - तम । और ये बताने की आवश्यकता नहीं कि तम गुण आसुरी प्रवृति को पोषण देता है ।
तो अब क्या ठीक है - भोले शंकर भूल न जाना । गाङी छोङ के दूर न जाना । ये या - भोले शंकर भूल ही जाना । मेरी गाङी के कभी पास न आना । ये ?

22 जनवरी 2012

बुद्ध परमात्मा के सम्बन्ध में मौन नहीं हैं

आदरणीय राजीव भाई जी को स्नेहाभिवादन..आपने आत्मज्ञान के विषय में कबीर जी को सर्वोपरि गिनाया है । कबीर के बारे मेरा ज्ञान तो इतना ही है कि वो एक फक्कड किस्म के संत थे । जो जात-पांत और उंच-नीच के भेद को नहीं मानते थे । और जिन्हें आत्मा - परमात्मा की बातों से ज्यादा सामाजिक सरोकारों से अधिक मतलब था । यहाँ तक कि आजकल के साम्यवादी भी उन्हें कोट करते हैं । और कबीर उन्हें संत से ज्यादा साम्यवाद के पक्षधर लगते हैं । कबीर की तरह ही बुद्ध भी कम्युनिस्टों की पहली पसंद हैं । क्योंकि वे भी परमात्मा के सम्बन्ध में मौन हैं । कृपा करके कबीर के जन्म , जीवन और उनकी शिक्षाओं के बारे में विस्तार से बताएं । जिससे हमारे ज्ञान में अभिवृद्धि हो । और ज्ञान के उजाले में आपने जीवन की राह को अधिक आसान बना सकें । आपका । कृष्ण मुरारी कोटा से ।
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बुद्ध परमात्मा के सम्बन्ध में मौन नहीं हैं । उन्होंने बात को अपने ढंग से कहा है । उनका मतलब है । खुद को पूरी तरह से जान लेना ही परमात्मा को जान लेना हैं । तुलसीदास ने कहा है - जेहि जानहि जाय देहु जनाई । जानत तुमहिं तुमहीं हुय जाई । यानी भेद मिट जाता है । आत्मा अपनी सभी स्थितियों उपाधियों से परे होकर अपने मूल में मिल जाता है । उसी को परमात्म स्वरूप कहते हैं ।
कबीर के बारे में अनुराग सागर के लेखों और अन्य स्थानों पर बहुत कुछ प्रकाशित हो चुका है । फ़िर भी एक नये अन्दाज में और भी जानकारी देने की कोशिश करूँगा ।


सबसे पहले वास्तविक कबीर क्या है ? इसका मतलब समझिये - काया में जो रमता वीर । कहते उसका नाम कबीर । यानी धुर ( सिर के मध्य ) से लेकर नाभि तक जो स्वांस में रमण कर रहा है । वही कबीर है । साधारण स्थिति में स्वांस मुँह में तलुये ( नाक द्वारा ) से नाभि तक आती जाती प्रतीत होती है । पर वास्तव में इसका आना जाना धुर से हो रहा है । हँस दीक्षा में सत्यनाम द्वारा साधक ज्यों ज्यों ऊपर की मंजिलें तय करता जाता है । वो इस चेतनधारा से जुङता जाता है ।
अवतार की तर्ज पर कबीर भी यदा यदा धर्मस्य ग्लानि..की तरह अज्ञान और तन्त्र मन्त्र के पाखण्डी ज्ञान का बोलबाला हो जाने पर हर युग में प्रकट होते हैं । त्रेता में इन्होंने ही हनुमान को वास्तविक राम का बोध कराया था । जबकि वे तब तक अवतारी राम को ही सब कुछ 


मानते थे । रावण पत्नी मंदोदरी को भी कबीर ने ज्ञान यानी हँसदीक्षा दी थी । आज से लगभग 500 वर्ष पहले - सिकन्दर । राजा वीर सिंह । मगहर नरेश बिजली खाँ पठान आदि राजा महाराजा कबीर के शिष्य हुये ।
अवतार और सन्त कभी जन्म नहीं लेते । बल्कि प्रकट होते हैं । इसके 2 तरीके होते हैं । 1 तो अपनी इच्छा अनुसार किसी अबोध शिशु से लेकर बालक तक का शरीर बनाकर कहीं प्रकट हुये । और नाटकीय ढंग से किसी दम्पत्ति आदि को प्राप्त हो गये । और फ़िर लीला करने लगे ।
दूसरे किसी ऐसे दम्पत्ति को । जो जन्म जन्म से इस इच्छा से पुण्य तप आदि कर रहा है कि उसकी सन्तान के रूप में कोई दिव्य । भगवत । या सन्त आत्मा उत्पन्न हो । तब उचित समय आने पर जब उस स्त्री को गर्भ धारण होता है । तो सम्बन्धित आत्मा उस गर्भ के लिये संकल्प कर देती है । और गर्भस्थ शिशु बिना आत्मा के ही समय पूरा कर जन्म लेता है । जब वह उदर से बाहर आ जाता है । तब सम्बन्धित आत्मा उसमें प्रविष्ट हो जाती है । इस तरह ये लोग गर्भवास में नहीं रहते ।
वैज्ञानिक आधार पर यह बात बङी अटपटी सी लगती हैं । पर इस विलक्षण रहस्यमय सृष्टि में बहुत कुछ अनोखा है । ठीक यही तरीका कछवी अपने अण्डों को सेने में अपनाती है । कछवी रेत में अपने अण्डे देकर फ़िर उनके पास नहीं जाती । और मात्र ध्यान से पोषित करती हैं । और ये वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित बात है । दो कछवी एक साथ अण्डे दें । और उनमें से एक की मृत्यु हो जाये । तो उस कछवी के अण्डे सङ जायेंगे ।


और जिन्हें आत्मा - परमात्मा की बातों से ज्यादा सामाजिक सरोकारों से अधिक मतलब था - जैसा कि मैंने अक्सर कहा । लोगों का यह स्वभाव ही होता है कि वे अपने मतलब की बात पकङ लेते हैं । 15 वर्ष की आयु में मैं अक्सर एक बात कहता था - एक भगवान का संविधान होता है । एक देश का संविधान होता है । और एक प्रत्येक व्यक्ति अपनी अनुकूलता के आधार पर निजी संविधान बनाता है । जिससे वह खुद को झूठी तसल्ली दे सके । मजे की बात है । ये संविधान हम बालपन से ही शुरू कर देते हैं । देखिये । मैया मोरी मैं नही माखन खायो । मैया मोरी मैंनें ही माखन खायो । इस बात को थोङा स्टायल में लय से कहने पर समान शब्द बिलकुल  विपरीत अर्थ कर रहे हैं ।
कबीर के बारे में मैंने हमेशा कहा । सिर्फ़ 2 लाइनों में । आरपार । और बहुत ऊँची बातें उन्होंने कही है । जैसी उपलब्ध इतिहास में ( मेरा दावा । दूसरे शब्दों में चुनौती भी । आगे प्रमाण भी देखें ) कोई कह ही नहीं पाया । यही कबीर कहते हैं - रहना नहीं देश विराना है । यह संसार कागद की पुङिया बूँद पङे गल जाना है । केहि समुझावे सब जग अँधा । सबहिं भुलाने पेट के धँधा ।
अब गौर करिये । कितनी गहन बात है । अविनाशी जीव का ये अपना देश ही नहीं है । पराया देश है । काल (

पुरुष ) और उसकी पत्नी माया का देश । जीव को उसने एक समझौते के तहत अपने धन ( युगों के तप से ) से खरीदा है । और समझौते के विरुद्ध उसे काम क्रोध आदि मायाजाल में फ़ँसाकर बँधुआ मजदूर की तरह अत्याचार करने लगा । और ये संसार । जिससे तुम मोहित हो रहे हो । इसकी हैसियत एक कागज की पुङिया समान है । जिस पर ज्ञान रूप जल की बूँद पङते ही गल जायेगा । यानी इतना तुच्छ । जिसकी एक ज्ञान बूँद के बराबर भी महत्व नहीं ।
अब दूसरी बात देखिये । किसको समझाये । सब जग अँधा हो रहा है । और सिर्फ़ पेट भरने में अपने असली लक्ष्य को भूल गया । और भी देखिये ।
तू मति जाने बावरे । मेरा है यह कोय । प्रान पिण्ड सो बंधि रहा । सो नहिं अपना होय ।


चले गये सो ना मिले । किसको पूछू जात । मात  पिता सुत बान्धवा । झूठा सब संघात ।
जागो लोगों मत सुवो । ना करो नींद से प्यार । जैसा सपना रैन का ।  ऐसा यह संसार ।
मूरख शब्द न मानई  । धर्म न सुने विचार । सत्य शब्द नहिं खोजई  । जावे जम के द्वार ।
चेत सवेरे बाचरे । फिर पाछे पछिताय । तोको जाना दूर है  । कहैं कबीर बुझाय ।
क्यों खोवे नर तन वृथा । पर विषयन के साथ । पांच कुल्हाड़ी मारता ।  मूरख अपने हाथ ।
आंखि न देखे बावरा । शब्द सुने नहिं कान । सिर के केस उज्ज्वल भये  । अबहु निपट अजान ।
कबीर से ही उदाहरण बहुत से हो सकते हैं । पर वे सभी एक ही सन्देश देते हैं । साढे 12 लाख साल की 84 भोगने के बाद । जो ये दुर्लभ मानव शरीर मिला है । इसके रहते हरसंभव मोक्ष का उपाय कर लेना चाहिये । फ़िर कोई रास्ता ही न बचेगा ।
अब जैसा कि मैंने ऊपर कहा । हमें जो बात अच्छी लगती है । उसे ही गृहण कर लेते हैं । कबीर ने जात पाँत ऊँच नीच के लिये तत्कालीन स्थितियों अनुसार बात कही । पर उनके मुख्य उपदेश परमात्म प्राप्ति के लिये ही थे । जिनमें से बहुत थोङे का उदाहरण भी मैंने दिया । इसलिये आपकी बात को मैं एकदम विपरीत ढंग से कहता हूँ - कबीर को आत्मा - परमात्मा की बातों से अधिक और सामाजिक सरोकारों से बहुत कम मतलब था । वे उनकी निगाहों में तुलनात्मक मोक्ष लक्ष्य एकदन नगण्य और महत्वहीन ही थे । सिर्फ़ उसको ठीक ढंग से समझना भर होगा ।
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कबीर के जन्म जीवन और उनकी शिक्षाओं के बारे में विस्तार से नेट पर और मेरे ब्लाग पर भी बहुत सी सामग्री उपलब्ध है । अतः उसको लिखने से कोई लाभ नहीं । इसके लिये हिन्दी में " कबीर " शब्द द्वारा गूगल में सर्च कर सकते हैं । 

17 जनवरी 2012

गुरु क्या मानव देहधारी ही हो सकता है ?

आदरणीय राजीव जी ..सप्रेम एवं सादर दंडवत प्रणाम । आज मैं आपको अपने बचपन से अब तक की कहानी सुनाने का दु:साहस कर रहा हूँ । कृपया सहानुभूति पूर्वक बाँच कर मुझे उचित मार्गदर्शन दें कि आगे अब मुझे क्या करना चाहिए । आप जैसा आदेश । सन्देश करेंगे । मैं वैसा ही करने का पूरे मनोयोग से प्रयत्न करूँगा ।
बचपन में मैं एक अपने आप में मगन सा रहने वाला बालक था । जिसे दुनियादारी से अधिक मतलब नहीं होता था । पढाई में औसत से ऊपर रहता था । इसलिए घर वालों को इस बारे में अधिक चिंता नहीं थी । चिंता थी तो इस बात की कि बड़ा होकर ये कही साधू वगैरह ना हो जाए । मेरे अंतर्मुखी स्वभाव को बदलने के लिए मेरी ममतामयी माँ ने किसी थानक पर ले जाकर एक बार पूजा वगैरह करवाई । जिससे निश्चित ही मेरे स्वभाव में कुछ बदलाव भी देखा गया ।
इसके पश्चात एक दूसरी समस्या कुछ दिन बाद खड़ी हुई कि दस बारह वर्ष की उम्र में भी भरपूर शारीरिक श्रम के बाद भी देर रात तक मुझे निद्रा लाभ नहीं होता था । मन में अनेक तरह के विचार चलते रहते । और दिमाग उनमे उलझा रहता ।
इसका भी उपाय एक दिन मेरी प्रात: स्मरणीय माँ ने ही बताया । एक दिन उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि बेटा नींद ना आये । तो राम का नाम लिया करो ( उनकी भाषा में हमारे अंदर भी एक जीभ होती है । उसी से राम को स्मरण किया करो )  यह उपाय भी कारगर रहा । और नींद लेने का एक सुगम उपाय मुझे मिल गया ।
सबसे बड़ी समस्या जो किशोरवय में कदम रखने के एक दो वर्ष बाद ही शुरू हुई । और आज तक जिसने मेरा पीछा नहीं छोड़ा । वह है - अप्राकृतिक यौनाचार । इस बीच शादी ,बच्चे सब हो गये । पर वासना है कि साथ नहीं छोडती । योगासन वगैरह 


का बचपन से मुझे शौक रहा । और इनकी वजह से आम स्वास्थ्य अच्छा बना रहा । पर अब 60 की उम्र के बाद धीरे धीरे शारीरिक कष्ट बढ़ने लगे है । आपने वासना से छूटने का उपाय सुरति शब्द साधना को बताया है । कृपया बताएं । ये दीक्षा मैं कब और कहाँ ले सकता हूँ ।
एक बात और । करीब दस वर्षों तक मैंने प्रात:काल में सूर्योदय के समय सूर्य के समक्ष ( सूर्य को गुरु  मान कर ) मन एकाग्र करने की साधना की । उसके तात्कालिक लाभ भी हुए । और स्वास्थ्य में सुधार और वासना पर लगाम भी लगी । लेकिन धीरे धीरे शारीरिक शिथिलता के चलते उसे बंद करना पड़ा । मेरा प्रश्न ये है कि - गुरु क्या मानव देहधारी ही हो सकता है ? या इतर भी गुरु हो सकते हैं । प्रतीक रूप से । हमारे एक नियमित पाठक ।
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मैं अपने सभी पाठकों को बता दूँ कि पावर कट व्यवधान अभी हद से ज्यादा ही चल रहा है । इसलिये उत्तर देने तथा अन्य लेख आदि के प्रकाशन में काफ़ी रुकावट आ रही है
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हर इंसान को ऐसा लगता है कि वह कुछ खास है । और उसका जीवन कुछ अलग सा है । ये मैं अपनी जिन्दगी में मिले हजारों लोगों से अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ । जबकि सच ये नहीं है । हर इंसान अपने आप में अनोखा है । बशर्ते आप उसको सही से जान पायें । आप गौर कीजिये । समस्त जीव चाहे वो मनुष्य योनि में हों । या 84 में । एक सीमित वर्ग में जीते हैं । एक खास अपना वर्ग । अनजाने में आपको लगता है कि आप दुनियाँ

जहान को जानते हैं । उसकी नालेज आपको है । वृद्ध लोगों का अक्सर प्रसिद्ध जुमला है - ये बाल धूप में सफ़ेद नहीं किये ।
पर ये सच नहीं हैं । एक मजदूर से लेकर प्रधानमन्त्री और धनपति तक एक सीमित वर्ग में जीने को मजबूर है । इसका उदाहरण आप किसी खास बीमारी में आसानी से देख सकते  हैं । जब आपकी जानकारी में कोई एक विशेष रोग से गृसित होता है । और आप सोचते हैं - ऐसा तो आज तक नहीं देखा । पर जब अस्पताल जाते हैं । तो उससे भी गये गुजरे मरीज वहाँ देखने को मिलते हैं । तब आपको नया आश्चर्य होता है । और पुराना खत्म हो जाता है ।
अतः विभिन्न छोटे बङे सच्चे अलौकिक अनुभवों से जुङे मुझे बहुत लोग मिले । और सबको यही लगता था कि उनका अनुभव खास है । पर इस संसार को विलक्षण कहा गया है । विलक्षण शब्द पर गौर करिये । अनोखा और प्रतिपल चमत्कारिक ।
द्वैत जीवन का पूरा खेल कर्म संस्कार पर आधारित है । और संस्कार से विभिन्न सुख दुख का कर्मफ़ल बनता है । इसे हर हालत में भोगना ही होता है ।  दुख की बात छोङिये । कोई इंसान चाहे कि - उसे प्राप्त सुख नहीं भोगना । असंभव । भोगना ही होगा - देह धरे के दण्ड को भोगत है हर कोय । ज्ञानी भोगे ज्ञान से मूरख भोगे रोय ।
इसलिये आप साधु हो जाते । या डाकू । आपकी माताजी इसमें कुछ नहीं कर सकती थी । अतः ये पूजा वगैरह । होने वाले कार्य का माध्यम बनकर । बहाना बन जाते हैं । होनी परमात्मा के बाद दूसरी सबसे बङी शक्ति है । ये महा देवताओं

को भी नहीं बख्शती । इसलिये सच्चाई में यह सब मन को झूठी तसल्ली देना भर है । वास्तविकता यही है । जो होना था । वैसी ही स्थिति बन गयी - तुलसी जैसी भवितव्यता तैसी होत सहाय ।
हाँ नींद न आने वाली आपकी बात एकदम योग बिज्ञान के अनुसार बैज्ञानिक आधार पर है । दरअसल कभी कभी विशेष भोजन या हमारे शरीर में अनेक कारणों से बन रहे उत्तेजना पैदा करने वाले रसायन एक स्थिति में बनने लगते हैं । मनोचिकित्सिक इसे दिमाग एक्टिव होना कहते हैं । सामान्य जीवन में कभी कभी शादी । नौकरी का इंटरव्यू । कोई झगङा आदि बहुत से कारणों से भी दो तीन दिन ऐसी स्थिति बन जाती है । जब नींद नहीं आती । बहुत से लोग सोते समय एक अतिरिक्त स्ट्रोंग चाय ही पी लें । तो भी उनको नींद नहीं आयेगी । क्योंकि उसका उत्तेजक रसायन निश्चित अवधि तक सक्रिय रहता है ।
इसलिये जब आपने मौन ( केवल सोचने द्वारा बोलना ) राम राम कहा । तो ये एक योग स्थिति हो गयी । और गौर करें । उस वक्त इसमें कुछ न कुछ भक्ति भाव का भी ‍% रहा होगा । अब मजे की बात ये है कि राम राम की जगह आप अपना नाम या माताजी पिताजी भाई बहन किसी का भी इसी तरीके से मौन जपते । तो भी 100% परिणाम यही होता । इसकी जगह एकटक किसी बिन्दु को देखते रहते । तो भी 100% परिणाम यही होता । योग में अन्दर जाने का तरीका ही यही है । निशब्द ।
हमारे सम्पर्क में आने पर हम आपको आपका असली नाम बता ( जगा ) देंगे । और बहुत अच्छा है । आप बचपन में ही इसका अभ्यास कर चुके हैं । तब आप अपने सभी रहस्य स्वयं जानेंगे ।
अप्राकृतिक यौनाचार - यहाँ भी वही बात है । आपको लगता है । यह आपके अन्दर है । या कुछ लोगों के अन्दर

ही होती है । पर मुझे लगता है 70% लोग इसके शिकार होते हैं । मेरी एक महिला से बात हो रही  थी । जब मैंने प्रसंगवश ये सच कहा  - गुदा मैथुन वाले  निश्चय ही नर्क जाते है । उसने मजाक किया - योनि वाले स्वर्ग जाते है क्या ?
पर वास्तव में यह मजाक की बात नहीं थी । अटल सत्य था । गुदा से प्राण निकलने पर जीवात्मा नरक ही जाता है । और गुदा मैथुन में आसक्ति होने पर अन्त समय में वश कुवश उसकी समस्त चेष्टायें उधर ही हो जाती हैं । और वह मजबूर हो जाता है । खैर..कामवासना के ऐसे ही मुद्दों पर अपने अनुभव का लेख जल्द ही लिखूँगा ।
दीक्षा कब और कहाँ - श्री महाराज जी ही आपको इच्छानुसार दीक्षा देंगे । लेकिन इससे पहले आप मेरे सभी ब्लाग्स पर लिखे मोबायल नम्बर पर उनसे बात कर लें । मेरा अनुभव कहता है । आपको होली के आसपास दीक्षा मिल पायेगी । वो भी तब । जब आप श्री महाराज जी से तब तक दो तीन बार बात कर लेंगे । और आपको अनुमति मिल जायेगी । अब श्री महाराज जी भृमण पर या आगरा आदि नहीं आते । इसलिये आपको आगरा से फ़िरोजाबाद ( 50 km ) और फ़िरोजाबाद से कौरारी आश्रम ( 25 km ) आना होगा ।
यदि आपके पास समय हो । तो कम से कम दो तीन दिन का समय लेकर आयें । एकदम 100% दीक्षा होगी । जल्दबाजी में वह बात नहीं हो पाती । होली के बाद महाराज 


जी दीक्षा देने के बाद पूरे 11 दिन आश्रम में रखने का नियम भी बनायेंगे । ताकि 11 दिन तक अपनी देखरेख में शिष्य की ध्यान में पूर्ण प्रविष्ट कराई जा सके । फ़िर पक्का काम हो जाता है । अन्यथा शिष्य अपनी कमी का दोष गुरु को लगाता है । हमारे जो पुराने शिष्य हैं । जिन्हें ठीक से प्रविष्ट नहीं हुयी । या अनुभव नहीं हो पा रहे । वे यदि चाहें । तो 11 दिन आकर ध्यान पक्का कर लें ।
गुरु मानव देहधारी - ज्यों तिल माँही तेल है । ज्यों चकमक में आग । तेरा सांई तुझमें है । जाग सके तो जाग । ये बात सामान्य और अज्ञान निद्रा में सोये मनुष्य के लिये कबीर साहब ने कही है । सोचिये । 1 सामान्य मनुष्य में सांई मौजूद है । तो गुरु सतगुरु में क्यों न होगा । शास्त्र के इन वचनों को याद करिये । उसने विभिन्न योनियाँ रची । पर सन्तुष्ट न हुआ । तव उसने मनुष्य शरीर बनाया । और सन्तुष्ट होकर इसी में प्रविष्ट हो गया । आपने सूर्य को गुरु माना । वर्ष के 12 सूर्यों के अलग अलग 12 आदित्य पुरुष हैं । देहधारी । आपकी माँ ने आपको नींद  न आने का उपाय (  ज्ञान = गुरु ) बताया । किसने बताया । माँ = गुरु । देहधारी । हाँ ये अलग बात है । राजीव बाबा वास्तव में एक भूत है । मजाक कर रहा हूँ । यहाँ भी आपको उत्तर देहधारी ही दे रहा है ।
गौर करें । तो जन्म से ( माँ गुरु ) बालपन ( बङे भाई बहन सखा आदि गुरु ) पढाई ( शिक्षक गुरु ) बीमारी आदि ( डाक्टर गुरु ) शादी आदि ( पण्डित गुरु ) यहाँ तक कि आप मामूली रास्ता भी पूछें ( बताने वाला गुरु ) आप किसी किताब से ज्ञान ले ( उसका लेखक गुरु

) गहराई से सोचें । तो जिन्दगी 1 मिनट गुरु के बिना नहीं चल सकती । ये प्रथ्वी जिस पर आप रहते हैं । टिकी और घूमती है - गुरुत्व बल पर । सूरज चाँद तारे सभी टिके हैं और घूमते हैं -  गुरुत्व बल पर । आपके अन्दर भी एक आंतरिक गुरु मौजूद है । देहधारी गुरु आपको उसी गुरु से मिलाते हैं । आपके दूसरे उत्तर में भी ऐसी बातें आयेंगी । अतः आज इतना ही ।
आप सबके अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।

15 जनवरी 2012

अब बताईये । गुरु बनायें तो किसे ?

राजीव जी को बारम्बार नमस्कार । आपके ब्लॉग में कबीर - वाणी पढ़ने को मिली । अच्छा लगा । निश्चय ही कबीर जी ने गुरु की अनिवार्यता बताई है । जिसके बिना मानव का कोई ठौर-ठिकाना नहीं । साथ ही उनके कुछेक दोहे ( साखियाँ ) ऐसी भी पढ़ने को मिली । जिनमें गुरु की पहचान किये बिना ही उसका पिछलग्गू होने के खतरे गिनाये गए हैं । उदाहरण के लिए कुछ यहाँ लिख रहा हूँ -
बंधे को बंधा मिला । छूटे कौन उपाय । अन्धे को अंधा मिला । मारग कौन बताय ।
जानीता बूझा नहीं । बूझि किया नहीं गौन । अन्धे को अंधा मिला । पड़ा काल के फंद ।
गुरु लोभी शिष लालची । दोनों खेले दाव । दोनों बूडे बापुरे । चढ़ पाथर की नाव ।
अब बताईये । गुरु बनायें तो किसे ? वैसे आज के युग में तो लोहे के जहाज भी तैरते हैं । कबीर जी के युग में पत्थर की नाव डूब जाती होगी । इसलिए उन्होंने ऐसा कहा । कृपया मार्गदर्शन करें कि गुरु की क्या परीक्षा लेकर फिर उसे गुरु माना जावे । आपका ही । कृष्ण मुरारी कोटा ।
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तिल गुड खाओ । मीठे बचन सुनाओ । इस ब्लॉग के पाठकों का दिल मीठा बनाओ । Happy Makar Sankranti - Dr S K Keshari
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कल रविवार को पूरे दिन नेट कनेक्टिविटी फ़ेल रही । आज अभी 8:30 से कनेक्ट हुआ । आगरा में बिजली के कारण सङक पर आन्दोलन तक हो रहा है । इस हेतु सभी कार्यों में बाधा आ रही है ।
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सात दीप नव खण्ड में सतगुरु फ़ेंकी डोर । ता पर हँसा ना चढे तो सतगुरु की क्या खोर । कबीर के सभी दोहों की तरह यह दोहा भी खासा रहस्यमय है । सात दीप नव खण्ड यानी इस शरीर में सतगुरु शिष्य के लिये डोर डाल देते है । अब शिष्य को ध्वनि नाम रूपी इस डोर पर चढकर मंजिल यानी धुर तक पहुँचना होता है ।
वास्तव में कबीर के इसी दोहे में आपका पूर्ण उत्तर छिपा हुआ है । सतगुरु की सबसे बङी पहचान यही है कि वह आपकी स्वांस यानी चेतनधारा में गूँजते

नाम को प्रकट कर देते हैं । और साधक की स्थिति अनुसार ये नाम उसको ऊपर ले जाता है । ये पहचान सतगुरु की हुयी कि - वह निर्वाणी ध्वनि रूपी नाम ( झींगुर की आवाज जैसी ध्वनि ) को सिर के अन्दर मध्य में प्रकट कर देते हैं । इस नाम को प्रकट करने की क्षमता सिर्फ़ सदगुरु की है । ध्यान रहे । सिर के अन्दर मध्य में प्रकट झींगुर जैसी महीन झंकार ।
लेकिन इसमें भी एक रहस्य है । ठीक ऐसी ही मगर तेज और मोटी आवाज में झंकार सिर के दाँये या बाँये या एकदम कान के आसपास सुनाई देती है । यह काल की आवाज है । जो गुरु या किसी सिद्ध के सानिध्य में होने की पहचान है ।
इसी आबाज का एक और रहस्य है । और खास तौर पर जापान में तो यह आम बात है । यह मस्तिष्क और कान की विभिन्न बीमारियों में भी बिलकुल

ऐसी ही झींगुर जैसी झंकार सिर के आंतरिक भाग में स्पष्ट सुनाई देती है । पर यह न गुरु न सिद्ध और न ही सदगुरु के द्वारा प्रकट है । बल्कि यह बीमारी है । इन सब आवाजों में अंतर होता है । जिसे कोई अनुभवी ही बता सकता है ।
इसी आवाज का एक और रहस्य है । काल और उसकी बीबी मायावती भाभी ने सतनाम के साधकों को भृमित करने हेतु झाँझरी आदि दीपों की रचना कर जगह जगह ऐसे मिथ्या मायावी संगीत का जादू फ़ैला दिया । ताकि ज्ञान की शरण में आया जीव भृमित हो जाये । लेकिन जो वास्तविक सतगुरु की शरण में होता है । उस पर ये जादू बेअसर रहता है । ये खासतौर पर मैंने आपको सतगुरु की पहचान बताई । क्योंकि गुरु में पारबृह्म तक ले जाने की क्षमता नहीं होती । भले ही वह आत्मज्ञान या हँसज्ञान का ही हो ।

मैंने पहले भी कहा है । परमहँस दीक्षा वाले साधक सिर्फ़ हमारे यहाँ हैं । अन्य कहीं परमहँस दीक्षा नहीं होती । अब चाइना माल की तरह नकली और घटिया चलन चलाने वाले साधुओं में भी होते हैं । पर वे दो मिनट में पता चल जाते हैं कि हँस हैं या कौवा है ? फ़िर परमहँस की तो बात ही जाने दें । मैंने पहले भी कहा है । परमहँस दीक्षा साधक के शरीर से निकलने की स्थिति बनने लगे । तब दी जाती है । हँस ज्ञान देने वाला गुरु होता है । दशरथ पुत्र राम का हँस ज्ञान था । और श्रीकृष्ण का परमहँस ।
अब आईये । गुरु की बात करते हैं । सतगुरु 1 समय में सिर्फ़ 1 होता है । जबकि ठीक उसी समय में गुरु लाखों हो सकते हैं । हजारों तो प्रायः हर समय ही बने रहते हैं । ये मैं वास्तविक अंतर ज्ञानियों की बात कर रहा हूँ । न कि परम्परा नियम के तहत बने गद्दीधारी गुरुओं की । और न ही रामायण महाभारत गीता या अन्य धा्र्मिक पोथियों की कथा बाँचने वाले रटन्तू तोतों की ।
दुनियाँ में तन्त्र मन्त्र या किसी भी प्रकार का अलौकिक ज्ञान हो । उसका मुख्य आधार सिर्फ़ 1 ही है । कुण्डलिनी जागरण । केवल इसी कुण्डलिनी ज्ञान के विस्तार में अनेकों स्तर के लाखों गुरु तक हो सकते हैं । और उनकी एकमात्र पहचान यही है । जो भी प्रयोग साधना वो करायें । उनसे स्पष्ट अलौकिक अनुभव होना ।
आत्मज्ञान के सबसे उच्चतम सहज योग या राज योग का पहला चरण होता है । आत्मा की जङ चेतन से जुङी 


गाँठ को काट देना । और दूसरा उसका तीसरा नेत्र खोल देना । इस तरह अब तक जन्म जन्म से अज्ञान की जंजीरों में जकङा हँस आत्मा बृह्माण्ड की यात्रा करता है । और सुदूर लोकों को देखता है ।
अब सबसे मुख्य बात - अक्सर जिज्ञासु इस तरह के प्रश्न तो पूछते रहते हैं । पर दो खास बिन्दुओं की तरफ़ उनका ध्यान नहीं जाता । ये तीनों पूर्ण होने चाहिये । 1 पूर्ण गुरु । 2 पूर्ण ज्ञान ( यानी शिष्य को पूरी थ्योरी पता हो ) 3 पूर्ण शिष्य । तभी सही सफ़लता मिलती है । ये बात जीवन के हर क्षेत्र में भी लागू होती है । बस सिर्फ़ आपको गौर करना होगा ।
अब महत्वपूर्ण ये है कि लोग मुझसे पूर्ण गुरु के विषय में तो पूछते हैं । लेकिन अपने ही दो खास बिन्दुओं से कन्नी काट जाते हैं । और ये बात हमारी दीक्षा ( ले चुके ) वालों पर भी लागू होती है 


। जरा सोचिये । तमाम पाठकों ने लिखित स्वीकारा है - राजीव जी ! आपके सिवाय हमें ऐसा कोई दिखाई नहीं देता । जो हमारे प्रश्नों का उत्तर दे सके । शंकाओं का समाधान कर सके । और मैंने उन्हें उत्तर दिये । बल्कि ये कहना अधिक उचित है । वे प्रश्न भी मैंने ही दिये । वरना उस स्तर के प्रश्न आप सोच ही नहीं सकते थे ।
अब दूसरी बात है । क्या आपको राजीव का विकल्प दिखाई देता है ? सिर्फ़ 1 । सिर्फ़ 1 । मुझे बताईये । बल्कि मिलाईये । मैं आपका बहुत आभारी होऊँगा । मैंने यह बात खुद ही कही है । जो और जैसा और जिस तरह । मैं बता रहा हूँ । आप इतिहास में से भी इसका सिर्फ़ 1 सिर्फ़ 1 ही उदाहरण खोजकर बताईये । ध्यान रहे । जैसी बारीक व्याख्या मैं करना चाहता हूँ । अभी 10% भी नहीं कर पाया । समय के साथ साथ करता जाऊँगा ।


ये था - 1 पूर्ण गुरु वाला स्पष्टीकरण । अब मान लीजिये । आप निरुत्तर हो गये । शून्यवत 0 हो गये । समर्पित हो गये । ज्ञान लेने के इच्छुक हो गये । या ले भी लिया । अब विशेष गहराई से सोचें । 2 पूर्ण ज्ञान ( यानी शिष्य को पूरी थ्योरी पता हो ) 3 पूर्ण शिष्य ? क्या आप अपने ही इन दो बिन्दुओं को पूरा कर पायेंगे । या हमारे मण्डल के तमाम शिष्य इसको पूरा कर रहे हैं ? राजीव जी की तरह पूरी सृष्टि में घूमने की जल्दी सबको है । अप्सराओं यक्षणियों से मेल मिलाप की भी भारी चाह है । पर राजीव जी की 3rd eye खुलने के साथ साथ जो शिष्यता में 3rd डिग्री की मार पङी । उस पर किसी का ध्यान शायद नहीं जाता । मैंने बताया भी 


है । कोल्हू में डालकर पेरा गया है मुझे । सब कुछ तो लिख दिया । तब आज मैं खुद को शिष्य कह पाता हूँ । पूर्ण शिष्य फ़िर भी नहीं ।
शर्मा जी वैसे मेरे 10 ब्लाग्स पर आपके प्रश्न का उत्तर पहले से भी मौजूद है । फ़िर भी आगे इसी विषय पर और भी लिखूँगा । आपके दूसरे प्रश्न का उत्तर भी जल्द ही दूँगा । इस लेख में आपकी जिज्ञासा दूर करने के साथ साथ हमारे मण्डल के लोगों को भी उत्तर दिया है ।

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