23 जनवरी 2012

क्या आप जानते हैं ?

क्या आप जानते हैं - सिर्फ़ कबीर साहब  ही अब तक " सन्त शिरोमणि " हुये हैं । उनके समकक्ष दूसरा कोई भी यह स्थान प्राप्त न कर सका । और यह बात सिर्फ़ आत्मज्ञान में उनकी लक्ष्य प्राप्ति के लिये नहीं कही जाती । बल्कि उनका - जीवन । आचरण । पाखण्ड विरोध । उनके सर्वोच्च उपदेश आदि सबको मिलाकर उन्हें यह उपाधि दी गई है । जबकि आत्मज्ञान के परम लक्ष्य को प्राप्त हुये दूसरे सभी सन्त इस मामले में तुलनात्मक अधिकतम 10% रहे । आत्मज्ञानी  सन्तों के नाम पर जो फ़ौज ( केवल प्रसिद्ध लोगों की बात । अभी जीवित । और शरीर त्याग चुके भी ) नजर आती है । इन्हें आत्मज्ञान की हवा तक का स्पर्श नहीं हुआ था ।
क्या आप जानते हैं - भक्त शिरोमणि का स्थान सिर्फ़ मीरा जी को ही प्राप्त है । अखिल सृष्टि में यह एकमात्र महिला हैं । जिनका मैं आदर करता हूँ । महिला शब्द मैं ज्ञान को प्राप्त हुये उनके शरीर और उस जन्म के आधार पर कह रहा हूँ । वरना स्वयं परमात्म स्वरूप मीरा जी अब न स्त्री है । न पुरुष । अब वे हमेशा के लिये एक शुद्ध चैतन्य अविनाशी आनन्द स्वरूप आत्मा हैं । जाहिर है । इन्होंने परम लक्ष्य प्राप्त कर लिया था ।
क्या आप जानते हैं - द्वैत या कुण्डलिनी योग में श्रीकृष्ण के बराबर योगी आज तक नहीं हुआ । इनको भी योग शिरोमणि या योगेश्वर की उपाधि प्राप्ति है । इन्होंने योग में अंतिम लक्ष्य को प्राप्त किया था । इनको पूर्ण पुरुष भी कहा जाता है । लेकिन ये सिर्फ़ 125 वर्ष ही सशरीर

मृत्युलोक में रहे । सफ़ल योगी होने के कारण पूरे जीवन इनका शरीर 18 वर्षीय सुन्दर युवा जैसा ही रहा । इनका अदभुत सिद्धांत था - जीवन में सभी नियम आवश्यक है । फ़िर कोई भी नियम आवश्यक नहीं । परिस्थिति के अनुसार जो सबके लिये  कल्याणकारी हो । वही कार्य और नियम सर्वश्रेष्ठ है ।
क्या आप जानते हैं - मर्यादा पुरुषों में शिरोमणि दशरथ पुत्र मर्यादा पुरुषोत्तम राम ही सर्वोच्च हैं । मर्यादा निभाने में इनके समान आज तक दूसरा कोई नहीं हुआ । प्राण जाये पर वचन न जाई । इनके खानदान यानी रघुकुल की रीति ही थी । लेकिन ये हजारों साल जीवित रहे थे । और श्रीकृष्ण की तरह ही सफ़ल योगी होने के कारण पूरे जीवन इनका शरीर 18 वर्षीय सुन्दर युवा जैसा ही रहा । शास्त्र के अनुसार 12000 वर्ष तो इन्होंने राज्य ही किया था ।
क्या आप जानते हैं - व्यास पुत्र श्री शुकदेव जी गर्भ ज्ञानी थे । आत्मज्ञान में ये महाराज जनक के शिष्य हुये । अपनी योग उपलब्धियों के चलते पूर्व में यह स्वर्ग प्राप्ति के अधिकारी तक हो गये । लेकिन इन्होंने कोई गुरु नहीं किया था । लिहाजा विष्णु ने इन्हें स्वर्ग से लौटा दिया । यह कहकर - ये नियम विरुद्ध है । बिना सच्चे गुरु के किसी को स्वर्ग या अन्य कोई भी उपलब्धियाँ नहीं दी जा सकती ।
अब मजे की बात ये है कि - श्री शुकदेव जी त्रेता युग ( जनक के शिष्य ) से लेकर पूरा द्वापर युग और कलियुग के प्रारम्भ तक सशरीर रहे । और राम और श्रीकृष्ण से 


भी चार कदम आगे इनका योग शरीर सदा किशोरावस्था वाला ही रहा । इन्होंने ही राजा परीक्षित को तक्षक सर्प द्वारा डसे जाने का शाप लग जाने पर 88000 ऋषि मुनियों की मौजूदगी में नैमिषारण्य में मोक्ष ज्ञान कराया था । और मृत्यु के मात्र 7 दिन शेष रह जाने पर । 7 दिन में परीक्षित की आत्मा को काल सीमा से ऊपर उठाकर मोक्ष कराया । इसी आधार पर आज तक भागवत सप्ताह का आयोजन होता है । जिसका मोक्ष से दूर दूर तक का वास्ता नहीं होता ।
क्या आप जानते हैं - संसार में अधिकांश लोग धर्म के नाम पर फ़ैला बातूनी कचरा समेटे हुये उसे हीरे मोती समझ कर प्रसन्न हो रहे हैं । जबकि ठोस हकीकत एकदम अलग है । ऊपर मैंने अपने दृष्टिकोण से कोई बहुत ज्यादा उच्च  गूढ महत्वपूर्ण रहस्य नहीं बताये । पर ईमानदारी से अपना आंकलन करिये । क्या आप ये साधारण बातें भी जानते थे । या आपका जिन विद्वानों से परिचय है । उन्होंने कभी ये बताया ।
बौखलाकर मुझे गाली देना शुरू करें । इससे पहले ही दो प्रसिद्ध सांसारिक प्रमाण - 1 कबीर को आज भी तमाम विद्धान पंडित आचार्य वगैरह एक अनपढ । साधु । कवि और साधारण इंसान मानते हैं । जिसे केवल कविता की गहरी समझ थी । जबकि कबीर अजन्मा अविनाशी स्वयं प्रकट परमात्मा ही हैं ।


2 मीरा जी को आज भी श्रीकृष्ण की भक्त के रूप में ही लोग अधिक जानते हैं । जबकि मीरा जी आज वो हैं । जिसके लिये श्रीकृष्ण सिर्फ़ सपना ही देख सकते हैं । और मीरा जी की एक झलक पाना भी श्रीकृष्ण के लिये असंभव है । क्योंकि बङे से बङे योगियों का प्रवेश तक वहाँ कभी हो ही नहीं सकता । वहाँ सिर्फ़ सन्त जाते हैं ।
एक टिप्पणी भेजें

Follow by Email