11 जनवरी 2012

यह संसार रहे तो भी अच्छा न रहे तो भी अच्छा

42 प्रश्न - तपस्या क्यों करनी चाहिये । स्वामी जी महाराज, दया कर बताइये ।
उत्तर - काम । क्रोध । लोभ । मोह का दमन करने के लिये तपस्या करना जरूरी है । कुछ पैसे के कण्डे खरीद कर । उसे जलाकर आग के बीच में बैठना बहुत सरल है । पर काम, क्रोध आदि रिपुओं को दमन करके रखना । उन्हें सिर न उठाने देना ही असली तपस्या है । जो श्री सदगुरू देव जी महाराज का एकाग्र मन में दर्शन । पूजा । सेवा । भजन । चिन्तन । ध्यान करने से ही सम्भव है । इसी कृम से काम । क्रोध । मोह । लोभ । ममता आदि में विजय पाना श्री स्वामी जी महाराज की दया से उनके भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान से सम्भव होता है ।
43 प्रश्न - श्री सदगुरू स्वामी जी महाराज ! शास्त्र इत्यादि में जो बातें लिखी हैं । उन पर विश्वास किया जा सकता है ?
उत्तर - हां । वे सब सत्य हैं । लोगों के कल्याण के लिये युग युग से ये सब व्यवस्थायें की गई हैं । वह सब मानना चाहिये । शास्त्रोक्त कर्म करने होंगे । नहीं तो नहीं चलेगा । ये कर्म ही धर्म पथ पर अग्रसर करते हैं । धर्म पथ के सच्चे प्रदर्शक । जीवों के हितैषी । श्री सदगुरू देव जी महाराज ही हैं । सभी धार्मिक पुस्तकों का आस्था सहित मनन । अध्ययन करना चाहिये । ये कर्म ही आपको सदगुरू तक ले जायेंगे । पुस्तकों के अध्ययन अध्यापन से सकारात्मक सोच मिलती है । और सकारात्मक सोच दिशा बदल देती है । इसलिये शास्त्र और धार्मिक गृन्थों का अध्ययन एवं उनके सत्य वचनों पर अमल एवं विश्वास करना चाहिये । श्री सदगुरू देव जी महाराज द्वारा लिखी पुस्तकों का अध्ययन करने पर दिमाग की खिडकियां खुल जाती हैं । श्री

सदगुरू देव जी महाराज द्वारा प्रदत्त नाम मन्त्र के सुमिरन से । सेवा से । दर्शन से । ध्यान से । सत्य उपलब्धि होती है । तब सारे कर्म अपने आप झर जायेंगे । मिट जायेंगे । और सच्चे धर्म पथ । कर्म पथ पर सवार हो जाओगे । शास्त्र की बातों पर विश्वास और उनमें लिखी बातें सामने आयेंगी । और विश्वास बढेगा ।
44  प्रश्न - श्री स्वामी जी महाराज ! कोई एक भाव मेरे लिये हानिकारक है । यह जानने के बाद भी यदि वह मन में बार बार उठे । तब क्या करना चाहिये ?
उत्तर - सोचियेगा कि यह भाव मेरे लिये अत्यन्त विघ्नकारक हैं । इससे मेरा अशुभ है । ऐसा समझकर तत्क्षण श्री सदगुरू देव जी महाराज का स्मरण कर उसी पल भजन करना प्रारम्भ करें । गुरू वाणी याद करें । अशुभ विचार को मन में स्थान न दीजिये । श्री सदगुरू देव जी महाराज को मन मन्दिर में स्थापित कीजिये । देखिये । धीरे धीरे अपने आप ही वह अशुभ भाव मन से चला जायेगा । श्री सदगुरू देव जी महाराज के दर्शन । पूजन । चिन्तन । सुमिरन में खोए रहने से अशुभ विचार भी मन पर कोई छाप नहीं डाल पाते । उनका असर क्षण भंगुर रहता है । हमेशा अच्छे विचार मन में रखें । मन बडा विचित्र है । जो सिखाया जायेगा । वही सीखेगा ।
45  प्रश्न - श्री स्वामी जी महाराज ! बीच बीच में अविश्वास आये तो क्या करें ?
उत्तर - बात क्या है । जानते हो । जब तक श्री स्वामी जी में या किसी व्यक्ति या किसी वस्तु में पक्का विश्वास नहीं होता । जब तक कि अनुभूति नहीं होती । यदि एक बार श्री सदगुरू देव जी महाराज का अन्दर दर्शन हो जाए ।

कुछ अनुभूति हो जाए । तभी ठीक ठीक विश्वास होता है । श्री सदगुरू देव जी महाराज का दर्शन । पूजन । सेवा । ध्यान करने पर स्वत: ही दृढ विश्वास हो जाता है । उसके पहले जो भी तीवृतम विश्वास होता है । वह उस पूर्ण विश्वास की अत्यन्त सन्निकट अवस्था कही जा सकती है । जब सन्देह आये । तो सोचना चाहिये - भगवान सत्य है । एक मात्र श्री सदगुरू देव जी महाराज ही सत्य हैं । अपने दुर्भाग्य के कारण । अपने अशुभ संस्कारों के कारण । उन्हें समझ नहीं पा रहा हूं । जब सदगुरू देव जी महाराज की दया होगी । कृपा होगी । तब अटल विश्वास होगा । व सदा रहेगा । वार बार ऐसा करते करते विश्वास दृढ होता है ।
46 प्रश्न - श्री गुरू महाराज जी ! इस संसार में कुछ कार्यों के प्रति कर्तव्य बोध मालूम होता है । उन्हें किस प्रकार करना चाहिये ।
उत्तर - यदि आप इस भाव से कर सकें कि यह संसार श्री सदगुरू देव जी महाराज का है । मेरा नहीं । तो फ़िर आपको कोई हानि नहीं होगी । संसार में आये हो । तो कर्म करना है । यदि निष्काम कर्म करो । तो सबसे उत्तम है । सब श्री स्वामी जी को समपर्ण करके करो । बन्धन मुक्त रहोगे । आगे का मार्ग साफ़ और सरल हो जायेगा ।
संसार की किसी भी वस्तु पर मेरा पन न रखियेगा । जब तक उनकी इच्छा मुझे यहां रखने की है । रखेंगे । और जब उनकी इच्छा होगी । ले जायेंगे । संसार में काम करते समय खूब मन लगाकर कीजिये । किन्तु मन में यह भाव दृढ रखें कि मेरा यह सब कुछ भी नहीं है । किसी भी वस्तु पर आसक्ति न रहे । मन प्राणों में अनुभव करना होगा - 


मैं कुछ भी नहीं हूं । श्री सदगुरू देव जी महाराज ही सब कर रहे हैं । उनकी इच्छा से यह संसार रहे । तो भी अच्छा । न रहे । तो भी अच्छा । श्री सदगुरू देव जी महाराज की जैसी इच्छा हो । वे करें ।
47  प्रश्न - श्री स्वामी जी महाराज ! महापुरूषों के बारे में जो स्वप्न होते हैं । वे क्या सत्य होते हैं ?
उत्तर - हाँ पूर्ण सत्य । महापुरूष लोग स्वप्न में दर्शन देते हैं । वे कृपा करके स्वप्न में बहुत कुछ कर देते हैं । कह देते हैं । श्री सदगुरू स्वामी जी महाराज के बारे में स्वप्न पूर्ण सत्य होते हैं । ये स्वप्न जिस तिसको नहीं कहना ही अच्छा है । उनका प्रभाव और फ़ल बहुत दिनों तक रहता है ।
48  प्रश्न - श्री स्वामी जी महाराज ! काम काज के कारण भजन । ध्यान । सेवा । पूजा । दर्शन के लिये समय नहीं मिलता है । क्या करूं ?
उत्तर - काम काज के कारण सेवा । पूजा । भजन । सुमिरन । दर्शन । पूजन । ध्यान आदि के लिये समय नहीं मिलता । यह सोचना भूल है । मन में गोलमाल के कारण भजन, ध्यान के लिये समय नहीं मिलता । कर्म, उपासना एक साथ करने का अभ्यास करना होगा । केवल साधन, भजन लेकर रहना उत्तम तो है । किन्तु वह कितने लोग कर सकते हैं ? गीता में कहा है - कर्म किये बिना ज्ञान लाभ नहीं होता है । कर्म करते हुए सेवा । पूजा । भजन । सुमिरन । दर्शन । ध्यान । चिन्तन मनन करते रहना होगा । जो लोग कर्म छोड करके साधन भजन करते हैं । उनका समय भी कुटिया बनाने और रोटी पकाने में । साफ़ सफ़ाई करने में बीत जाता है । जो भी कर्म करो । वह श्री सदगुरू स्वामी जी महाराज का है । इस भाव से करने पर कोई बन्धन नहीं होगा । यही नहीं । उसके द्वारा आध्यात्मिक । नैतिक । बौद्धिक एवं शारीरिक, सभी

प्रकार की उन्नति होगी । उनके चरणों में आत्म समर्पण करो । श्री सदगुरू के श्री चरणों में शरीर, मन सब कुछ समर्पित कर दो ।
श्री चरणों के दास हो जाओ । कहो - यह शरीर और मन सभी तुम्हें दे दिया । आपको अपर्ण कर दिया है । इससे जो कराना चाहो । करा लो । मैं अपनी अल्प शक्ति से कुछ नहीं कर सकता । मैं तो बस आपके श्री चरणों में समर्पित हूं । जो कुछ करवाना है । करने के लिये हमेशा तैयार हूं ।
राजी है हम उसी में जिसमें तेरी रजा रहे । कुछ और चाहिये ना सेवक बनूं तिहारा ।
ऐसा करने पर तुम्हारा भार उन पर हो जाएगा । श्री स्वामी जी को समर्पित होकर निश्चिन्त हो जाओ । फ़िर तुम्हें और कुछ नहीं करना होगा । ठीक ठीक ऐसा करना चाहिये । नहीं तो राम भी कहोगे । और कपडा भी उठाओगे । यह नहीं चलेगा । इसका सम्बन्ध एक किस्से से है । एक ग्वालिन थी । जो पुरोहित को नित्य दूध दिया करती थी । नाव की अनियमितता के कारण कभी कभी उसे दूध पहुंचाने में विलम्ब हो जाता था । एक दिन पुरोहित ने डांटकर विलम्ब का कारण पूछा ।
तो ग्वालिन ने कहा - मैं क्या करूं महाराज । कभी कभी नाव के लिए बडी लम्बी बाट जोहनी पड जाती है । पण्डित जी बोले - अरी भली मानस । लोग भगवान का नाम लेकर इस संसार समुद्र को पार कर जाते हैं । और तू छोटी सी नदी पार नहीं कर सकती । उस दिन से उसने दूध देने में विलम्ब नहीं किया । पुरोहित ने पूछा - क्या बात है ? आजकल समय पर दूध दे जाती हो । ग्वालिन ने सरल भाव

से कहा - मैं भगवान का नाम लेती हूं । और जैसा मुझे आपने बतलाया है । नदी पार कर जाती हूं ।
पुरोहित को आश्चर्य हुआ । वे अपने आंखों से इसे देखना चाहते थे । अत: वे ग्वालिन के साथ नदी पर गये । उन्होंने देखा कि ग्वालिन ने भगवान का नाम लिया । और नदी के जल पर चलने लगी । बीच में पहुंच कर वह लौटकर देखने लगी । पुरोहित पानी के ऊपर अपने कपडे उठाये धीरे धीरे उसके पीछे आ रहे हैं ।
वह बोली - यह कैसी बात है । राम का नाम भी लेते हो । और कपडा भी उठाते हो । क्या विश्वास नहीं है । हम लोग भी पांच छह वर्ष घूम घाम कर आखिर में काम में लग गये । श्री स्वामी जी महाराज ने मुझे बुलाकर कहा था - अरे ! उसमें कुछ नहीं है । काम कर । तभी तो हम लोगों ने सब प्रकार के काम किए । पर उससे कोई हानि हुई हो । ऐसा तो नहीं लगता । पर हां । श्री स्वामी जी की वाणी पर हमको अगाध श्रद्धा थी । तुम लोग भी महापुरूष श्री सदगुरू देव जी महाराज वाणी पर विश्वास रखकर बढ जाओ । कोई डर नहीं है । दृढ विश्वास रखो । कितने लोग इस काम में रोडे डालेंगे । कटाक्ष करते हुए कहेंगे कि क्या यही सब स्वामी जी का काम है । पर किसी की बात मत सुनना । । यदि सारी दुनियां विरोध में खडी हो जाए । तो भी उसे नहीं छोडना । सदा सदा उनकी वाणी । दर्शन । पूजा । ध्यान । भजन । सुमिरन । चिन्तन । मनन पर अगाध श्रद्धा रखो ।
49 प्रश्न - श्री सदगुरू देव जी महाराज ! ध्यान, भजन कर रहा हूं । किन्तु उसमें किस प्रकार का रस नहीं पा रहा हूं । लगता है । मानो जबरदस्ती कर रहा हूं । इसका क्या उपाय है ?
उत्तर - तुमसे जितनी कार्यशक्ति है । पूरी की पूरी उधर लगाओ । अन्य किसी भी तरफ़ देखना नहीं । अपने श्री

सदगुरू देव जी महाराज की तरफ़ दृष्टि लगाओ । दूसरी किसी भी तरफ़ शक्ति नियोजित मत करना । बढते जाओ । बढते जाओ । कभी भी सन्तुष्ट नहीं होना । एक प्रकार की अशान्ति । उत्पन्न करने की चेष्टा करो । मेरा क्या हो रहा है । कुछ भी तो नहीं हो रहा है । इस तरह सोचकर रोज रात में सोने से पहले एक बार आत्म विशलेषण करना कि कितना समय अच्छे कार्य में बीता । और कितना बुरे वक्त में बीता । कितना समय चिन्तन । और कितना समय भजन । ध्यान । सेवा । पूजा । दर्शन । सुमिरन में बीता । कितना आलस्य प्रमाद में । तपस्या और बृह्मचर्य के द्वारा मन को शक्ति सम्पन्न कर डालो । इसके लिये बहुत चेष्टा करनी पडती है । मन की तुलना दुष्ट घोडे के साथ की गयी है । दुष्ट घोडा गलत रास्ते में ले जाय । तो जो लगाम लगाकर खींचकर रख सकता है । वही ठीक चलता है । खूब चेष्टा करो । खूब श्रद्धापूर्वक श्री सदगुरू स्वामी जी महाराज का दर्शन । भजन । सुमिरन । पूजा । ध्यान । चिन्तन । मनन करो । नाम भजन में डूब जाओ । रस मिलने लगेगा । मन तरंग है । मन को श्री सदगुरू देव जी महाराज के श्री चरणों में एकाग्र चित्त से लगाओ । भजन । सुमिरन । सेवा । भजन । दर्शन । ध्यान में आनन्द मिलने लगेगा ।
50 प्रश्न - हे मेरे गुरू महाराज ! हम लोग सब छोडकर आये हैं । तो भी मन के दोष नहीं जाते । कई साधकों, संन्यासियों के साथ मिलकर नहीं रह सकते हैं ।
उत्तर - देखो । कोशिश करने से सब बन जाता है । सहज हो जाता है । सब सहते जाना चाहिये । श्री स्वामी जी महाराज के ध्यान । पूजन में । दर्शन में मन लगाकर श्री चरणों का ध्यान करके सब सहते जाना चाहिये । जो

सहता है । वह रहता है । देखो सभी में मिल जुलकर रहने के समान क्या कोई अन्य गुण है ? संसार में बहुत कुछ सहना पडता है । जो दूसरों को सुख देते हैं । वह सुख पाते हैं । जो दूसरों को दुख देते हैं । वह दुख पाते हैं । जो दूसरे के मन को कष्ट देते हैं । उन लोगों का क्या कभी कल्याण होगा । कदापि नहीं ।
सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयत न ब्रूयात सत्यमप्रियम ।
सत्य बोलना । प्रिय बोलना । किन्तु सत्य अप्रिय मत बोलना । अप्रिय सत्य बोलने से मन को कष्ट पहुंचता है । तो वैसा कभी मत बोलना । यही देखो न । मेरे पास भले बुरे कितने प्रकार के लोग आते हैं । मैं सभी के प्रति समान रूप से स्नेह प्रदर्शित करता हूं । बुरे लोगों के आने से यदि मैं उन्हें घृणा की दृष्टि से देखूं । तो वे कहां जायेंगे ? सनक, सनातन के समान लोगों को लेकर तो सब रह सकते हैं । सब लोगों को लेकर रहना ही असल में अच्छी बात है । यही सच्ची भावना । सच्ची दृष्टि रखकर सबके साथ रहें ।
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यह शिष्य जिज्ञासा पर आधारित प्रश्नोत्तरी श्री राजू मल्होत्रा जी द्वारा प्रेषित की गयी है । हमारे कुछ साधकों को भृम हो गया है कि  - ये उत्तर श्री महाराज जी के हैं । पर ऐसा नहीं है ।
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