04 जनवरी 2012

उन्होंने गुरु के होने को उतना महत्व नहीं दिया

आदरणीय राजीव जी...सप्रेम नमन । मेरे प्रश्नों के समाधान हेतु आपने सरल और सटीक भाषा में बोध कराया । उसके लिए कोटिशः धन्यवाद । आपने सुरति साधना हेतु गुरु की आवश्यकता बताई । जो एक तरह से सर्वमान्य सिद्धांत है । मेरा प्रश्न ये है । कई ऐसी भी विभूतियाँ इस धरती पर समय समय पर प्रकट हुई हैं । जिन्होंने गुरु के होने को उतना महत्व नहीं दिया । उदाहरण के लिए - बुद्ध । महावीर । और आधुनिक युग के ओशो रजनीश का नाम गिनाया जा सकता है । कृपा करके इस सम्बन्ध में मेरे मतिभृम को दूर करने में मेरी सहायता करें । आभार सहित । आपका - कृष्ण मुरारी शर्मा । कोटा ।
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संसार में ज्ञान की बङी बङी अजीव स्थितियाँ हैं । और उससे भी बङी बात करोंङों उच्च निम्न स्तर है । और फ़िर करोङों ही ज्ञान परम्परायें । जितने ही गुरु । उतनी ही विधियाँ और परम्परायें । लेकिन हर युग प्रकट कबीर एक ऐसी तोप छोङ जाते हैं । जो हर भृम को चकनाचूर कर देती है । कैसे ?
कबीर जितनी ऊँची । और दो टूक । और आत्मा की सभी स्थितियों पर बात आज तक कोई सन्त नहीं कह पाया । और ये मेरा दावा है । किसी की सुनी पढी हुयी बात नहीं कह रहा । द्वैत के कथा भागवत बाँचने वाले भी आज कबीर के बिना बात नहीं कह पा रहे । उन्हीं कबीर ने पुरजोर शब्दों में गुरु की महत्ता बतायी है ।
अब सबसे बङी बात आप ये समझिये कि बुद्ध और महावीर को व्यर्थ ही आत्मज्ञान से जोङ दिया गया । वास्तव में इनका स्तर अवतारी का है । ज्ञान अवतार । जो सन्तों से बहुत छोटी स्थिति होती है । अवतार की पहुँच शून्य 0 


से ऊपर नहीं होती । इसीलिये इनके नाम में भगवान शब्द जोङा जाता है । और ये बात बहुत पहले लिखे विभिन्न पुराणों में प्रसंग अनुसार आयी है । भविष्य पुराण में भी है । इनके स्तर के व्यास । सौभरि । जीव गोस्वामी आदि बहुत से हुये हैं । और वे अपनी महत्ता अनुसार प्रसिद्ध भी हुये हैं ।
यहाँ एक बात का स्पष्टीकरण आवश्यक हो जाता है । आत्मज्ञान के सन्त यानी हँसदीक्षा के पूर्ण कुशल साधक साधु की स्थिति भी भगवान के बराबर ही होती है । क्योंकि हँस वाला बृह्माण्ड स्थिति तक का होता है । लेकिन दोनों में उसी तरह का अन्तर होता है । जैसे केन्द्र सरकार का मन्त्री । और राज्य सरकार का मन्त्री । जाहिर है । केन्द्र सरकार का आत्मज्ञान से जुङा व्यक्ति हुआ । क्योंकि सर्वत्र आत्मा की ही सत्ता है ।
इससे भी अलग बात ये है कि - बुद्ध । महावीर । और रजनीश । तीनों की यात्रा पिछले कुछ जन्मों से चल रही थी । तब स्थिति को प्राप्त हुये ।
अब यदि इस बात पर गहन चिन्तन मनन किया जाये । तो एक सर्वमान्य स्थापित सिद्धान्त हरेक को मानना होता है कि - व्यक्ति अपने विचारों से अधिक जाना जाता है ।
मुझसे बहुत से पाठकों ने पूछा था - आत्मा का स्वरूप कैसा होता है ? मैंने निर्विकारी मुख्य स्वरूप तो बताया ही । रूपान्तरित स्थिति के दसियों स्वरूप और बता दिये । जबकि पाठकों ने ही मुझे बताया कि - बुद्ध कहते हैं । आत्मा जैसा कुछ नहीं होता । ( क्योंकि न तो मैंने बुद्ध को खास पढा । और न मेरी बुद्ध महावीर में कोई दिलचस्पी । )
अब यहाँ एक बात खास कहना चाहूँगा । सांसारिक परम्परा धार्मिक मामले में बङी अजीब सी है । कोई भी 


महात्मा प्रसिद्ध हुआ । उसका सम्बन्ध सीधे आत्मज्ञान से जोङ दिया । या बेहद बङा चढाकर कर दिया जाता है । जबकि द्वैत में ही लाखों स्थितियाँ उपाधियाँ निर्मित होती हैं । और उनके साधक उसी स्थिति को प्राप्त होते हैं । ज्ञान प्राप्ति ( जो भी हुयी हो ? ) के बाद बुद्ध जब घर आये । तो उनकी पत्नी ने सिर्फ़ एक प्रश्न किया - जो वहाँ वन में प्राप्त हुआ । क्या घर में नहीं हो सकता था ? बुद्ध पर इस बात का कोई उत्तर न था । जाहिर है । किसी हद तक बात एकदम ठीक थी । बुद्ध से ही लोग जब पूछते थे कि - भगवान है ? उत्तर - मौन । भगवान नहीं है ? उत्तर - अब भी मौन ।
लेकिन इसका उत्तर है - हाँ कहूँ तो है नहीं । ना कही ना जाय । हाँ ना के बीच में साहिब रहा समाय । यानी वो सब में है । और सब उसी में है ।  और फ़िर - ये सब कुछ नहीं है । लेकिन वो - है । है । है । शब्द पर ध्यान दें । है । उसको सन्तों ने - है कहा है । शाश्वत । है ।
लेकिन - बुद्ध पर इस बात का कोई उत्तर न था ? क्यों ? क्यों ?
मैंने कहा । व्यक्ति को जानना है । उसके ज्ञान को जानना है । तो उसके विचारों के स्तर से जानिये । अब यहाँ एक बात और भी है । संसारी परम्परा के अनुसार किसी भी विभूति की मुख्य मुख्य बातें पकङ ली जाती हैं । यह विचारे बिना कि वह बात उसने कैसी परिस्थितियों में कहीं थी । किन स्थितियों के लिये कही थी । बुद्ध गाँव गाँव घूमते थे । उन्हें सुनने वाले 10 लोग भी मुश्किल से नहीं होते थे । मुझे एक दिन में औसत 600 लोग पढते हैं । फ़ोन काल करते हैं । खुद आते हैं । और मुझे ये मेहनत ( लेख लिखने में ) सिर्फ़ 1 बार

करनी होती है । फ़िर उसे हजारों लोग पढते रहते हैं । बुद्ध जितने लोग अपने जीवन में नहीं जोङ पाये । उतने मैंने शुरूआत में ही जोङ दिये ।
ये स्थिति परिस्थिति का ही अन्तर है । अगर बुद्ध के समय में इंटरनेट होता । तो शायद वे भी इस सुविधा का प्रयोग करते । मैंने ऊपर कहा है । कबीर ऐसी तोप छोङ गये हैं । जो हर अज्ञान को उङा  देती है । आप बुद्ध महावीर और कबीर को पढकर तुलना करें । दोनों में अन्तर और असल सच्चाई स्वयं पता चल जायेगी ।
अब आपकी जिज्ञासा पर बात करते हैं - गुरु के होने को उतना महत्व नहीं दिया ।
सच्चाई ये नहीं है । गुरु को बराबर महत्व दिया । पर समझने वालों ने समझने में भूल की । या वो विवरण सही रूप में प्रकाश में नहीं आया । अगर गुरु का महत्व नहीं था । तो फ़िर उनके शिष्यों की टोली जो साथ रहती थी । वे कौन थे ? और बुद्ध महावीर उनके कौन थे । कई शिष्य आजीवन घर बार छोङकर साथ रहे । उनसे कह देना था - भाई ! गुरु का कोई महत्व नहीं होता । ये ज्ञान समझ लो । और जाकर बाल बच्चे देखो । जप तप करो । अपने साथ क्यों लगाये रहे । अगर गुरु का महत्व नहीं था । तब बुद्ध के शिष्य आनन्द को उनके शरीर छोङने के बाद कैसे ज्ञान हुआ । क्योंकि तब उसके दिल में सच्ची गुरु भक्ति जागी - अरे ! अब तो इन्हें शरीर रूप कभी देख ही नहीं पाऊँगा । वही अन्दर की अति आवश्यक प्यास उनके शरीर छोङते समय उसके अन्दर प्रकट हुयी । किसके प्रति ?
यहाँ एक और बात स्पष्ट कर दूँ । अक्सर लोगों को बात को न समझने से कई गलतफ़हमी हो जाती है । जैसे गुरु का महत्व । कहा गया है - गुरु शिष्य की एक ही काया । कहन सुनन को दो बतलाया ।
यानी लीन होने की स्थिति । यहीं कहा जाता है । अब कोई गुरु नहीं । गुरु शिष्य का भेद ही मिट गया । यही बात पुनर्जन्म सिद्धांत पर लागू होती है । बहुत से लोगों ने पकङ लिया कि - पुनर्जन्म है ही नहीं । जबकि ये बात भी स्थिति के लिये ही कही गयी है । यानी उस स्थिति पर पहुँच जाओ । जहाँ पुनर्जन्म होता ही नहीं है । तब पुनर्जन्म है ही नहीं । इसलिये जब आप बारीक तकनीकी चिन्तन करेंगे । तो कोई वजह नहीं कि किसी भी ज्ञानी ने गुरु को महत्व न दिया हो ।
अब रही बात - ओशो रजनीश की । उनके लिये भी यही बात है । आप उनकी " अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप " 91 भाग में ( सभी लिंक इसी ब्लाग पर - 135  घण्टे में सहज मोक्ष प्राप्त करें ) सुनें । ये पूरी गुरु महिमा ही बताती

है । और ओशो ने कदम कदम पर गुरु की आवश्यकता बतायी है । बस शैली के अन्तर से समझने में कुछ भूल हो सकती है ।
देखिये । मैंने पहले भी कहा है । अलौकिक ज्ञान की एक खासियत होती है । इसमें दोहराव नहीं होता । वाल्मीकि द्वारा संस्कृत में रामायण लिखने के बाद उसे दोबारा संस्कृत में लिखने की आवश्यकता ही नहीं थी । इसलिये लिखी न गयी । आम बोली में तुलसीदास ने लिखी । दूसरी न लिखी गयी । लिखने की आवश्यकता ही नहीं थी । आंचलिक बोलियों में जरूरत अनुसार लिखा गया । लेकिन प्रमुख ये दो ही हैं । इसी आधार पर रजनीश ने बुद्धिजीवियों ( जो धार्मिकता के नाम पर नाक भौं सिकोङते थे ) की भाषा में बात कही । उनकी समझ अनुसार बात कही । जरूरत के हिसाब से कही । और पढे लिखे वर्ग को ज्ञान से जोङ दिया । बुद्ध ने । महावीर ने अपने अपने समय और ज्ञान के अनुसार बात कही । मैं अपने हिसाब से कर रहा हूँ ।
कुल मिलाकर सार यही है । जो मैंने आपके पिछले प्रश्नों के उत्तर में भी कहा - सन्तों ने ऐसी बातें कभी नहीं कहीं । बल्कि लोगों से उन्हें सही रूप में समझने में भूल हुयी ।
फ़िर से हमेशा वाली बात कहूँगा । प्रश्न और जिज्ञासा आपकी व्यक्तिगत है । लेकिन मेरा उत्तर सभी के लिये है । इसलिये ऐसा न सोचें । मैं व्यक्तिगत आपके लिये कुछ कह रहा हूँ । ये जन सामान्य की जिज्ञासा मानकर दिया गया उत्तर है । किसी बिन्दु पर असन्तुष्ट होने पर निसंकोच फ़िर से पूछ सकते हैं ।
- आप सबके अन्दर विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।
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