12 जनवरी 2012

भक्ति पदारथ तब मिले जब गुरु होय सहाय

भक्ति जु सीढ़ी मुक्ति की ।  चढ़े भक्त हरषाय । और न कोई चढ़ि सके ।  निज मन समझो आय । 
भक्ति दुहेली गुरुन की ।  नहि कायर का काम । सीस उतारे हाथ सों ।  ताहि मिले निज धाम । 

भक्ति पदारथ तब मिले ।  जब गुरु होय सहाय । प्रेम प्रीति की भक्ति जो ।  पूरण भाग मिलाय । 
भक्ति भेष बहु अन्तरा ।  जैसे धरनि अकाश । भक्त लीन गुरु चरण में ।  भेष जगत की आस । 
कबीर गुरु की भक्ति करूं ।  तज विषय रस चौंज । बार  बार नहिं पाइये ।  मानुष जन्म की मौज । 
भक्ति दुवारा सांकरा ।  राई दसवें भाय । मन को मैगल होय रहा ।  कैसे आवे जाय । 
भक्ति बिना नहिं निस्तरे ।  लाख करे जो कोय । शब्द सनेही होय रहे ।  घर को पहुँचे सोय । 
भक्ति नसेनी मुक्ति की ।  संत चढ़े सब धाय । जिन जिन आलस किया ।  जनम जनम पछिताय ।
गुरु भक्ति अति कठिन है ।  ज्यों खाड़े की धार । बिना साँच पहुँचे नहीं ।  महा कठिन व्यवहार । 
भाव बिना नहिं भक्ति जग ।  भक्ति बिना नहीं भाव । भक्ति भाव इक रूप है ।  दोऊ एक सुभाव । 
कबीर गुरु की भक्ति का ।  मन में बहुत हुलास । मन मनसा मांजे नहीं ।  होन चहत है दास । 
कबीर गुरु की भक्ति बिन ।  धिक जीवन संसार । धुवां का सा धौरहरा ।  बिनसत लगे न बार । 
जाति बरन कुल खोय के ।  भक्ति करे चितलाय । कहे कबीर सतगुरु मिले ।  आवागमन नसाय । 
देखा देखी भक्ति का ।  कबहुँ न चढ़ सी रंग । बिपति पड़े यों छाड़सी ।  केचुलि तजत भुजंग । 
आरत है गुरु भक्ति करूँ ।  सब कारज सिध होय । करम जाल भौजाल में ।  भक्त फँसे नहिं कोय ।
जब लग भक्ति सकाम है ।  तब लग निष्फल सेव । कह कबीर वह क्यों मिले ।  निहकामी निजदेव । 
पेटे में भक्ति करे ।  ताका नाम सपूत । मायाधारी मसखरे ।  लेते गये अऊत । 
निर्पक्षा की भक्ति है ।  निर्मोही को ज्ञान । निरद्वंद्वी की भक्ति है ।  निर्लोभी निर्बान । 
तिमिर गया रवि देखते ।  कुमति गयी गुरु ज्ञान । सुमति गयी अति लोभ ते ।  भक्ति गयी अभिमान । 
खेत बिगारेउ खरतुआ ।  सभा बिगारी कूर । भक्ति बिगारी लालची ।  ज्यों केसर में घूर । 

एक टिप्पणी भेजें

Follow by Email